The Mysterious Bell956 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 956

7 min read November 5, 2026

और उसी वक़्त मुझे पीछे से एक आवाज़ सुनाई दी। एक औरत अपने बेटे का हाथ पकड़े जा रही थी, और बेटा मेरी दुकान की तरफ़ देख रहा था — वो चिंटू का दोस्त था, मुझे नाम याद नहीं, पर वो रोज़ अपनी साइकिल की घंटी बजाकर जाता था।

"मम्मी, मुझे भैया को हेलो—"

"चल।"

"पर मम्मी—"

"मैंने कहा चल!"

वो औरत मेरी तरफ़ देख भी नहीं रही थी। वो उल्टी तरफ़ देख रही थी। और यही सबसे बुरा था। जब कोई तुमसे लड़ता है, तो वो तुम्हारी तरफ़ देखता है। जब कोई तुमसे डरता है, तो वो ऐसे देखता है जैसे तुम हवा में हो।

शबनम आपा ने कटोरा मेज़ पर रखा।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "एक बात सुन।"

"कहिए।"

"आज सुबह मेरे पास दो औरतें आईं। दोनों ने कहा — शबनम, तू अपना हिसाब देख। तेरी गुमटी अंकुश की दुकान से सटी है। तेरे यहाँ कोई नहीं आता। कुछ तो गड़बड़ है।"

"और आपने क्या कहा?"

"मैंने कहा — हाँ, गड़बड़ है। मेरी गुमटी के पास एक आदमी खड़ा है जो दूसरों के घर तोड़ रहा है। उसका नाम रणवीर भारद्वाज है।"

मैंने होंठ कस लिए।

"आपा, आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए था।"

"क्यों नहीं?"

"क्योंकि अब वो लोग आपको भी उसी खाते में डाल देंगे।"

शबनम आपा ने चिमटी उठाई, और उसे पीतल की थाली पर ज़ोर से पटका। आवाज़ पूरी गली में गई।

"तो डाल दें!" उन्होंने कहा। "अंकुश, सुन। मैं पंद्रह साल अपनी बहन से नहीं बोली। पंद्रह साल मेरे घर में एक भी मेहमान नहीं आया। मैं अकेली रही, अकेली खाई, अकेली सोई। और उन पंद्रह सालों में मुझे किसी ने नहीं पूछा कि शबनम, तू ठीक है? तूने एक कौर खाया? तेरा चूल्हा जला?"

उनकी आवाज़ भारी हो गई, पर वो रुकीं नहीं।

"और पिछले महीने मेरे पास तेरी माँ आई थी — बुखार में, लाठी के सहारे, सिर्फ़ ये कहने कि शबनम, तू बेटी जैसी है। मेरे घर में कोई नहीं था। कोई नहीं था। तेरी माँ को किसने भेजा था? तूने।"

मैं चुप था।

"तो मैं तेरे साथ हूँ," उन्होंने धीमे से कहा, "चाहे गुमटी बंद हो जाए, चाहे गली में मेरा नाम मिट जाए। मैं तेरे साथ हूँ। और मेरी गुमटी का शटर उस दिन बंद होगा जिस दिन मेरा हाथ चिमटी उठाना भूल जाए।"

मैंने कुछ नहीं कहा। मैं कह भी नहीं सकता था। गला सूख रहा था।

मैंने सिर्फ़ इतना कहा, "चाय और दे दो, आपा।"

वो हँसीं। "अब बात बन रही है।"

दस बजे के करीब उस्ताद की दुकान पर एक आदमी आया।

मैं अपनी दुकान पर बैठा था, पर मैंने देखा। सफ़ेद कमीज़, हाथ में लिफ़ाफ़ा, और चाल में वो जल्दबाज़ी जो सिर्फ़ उन लोगों में होती है जो किसी और का काम करके पैसे लेते हैं।

उसने उस्ताद की दुकान के शटर पर एक काग़ज़ चिपकाया और चला गया। उस्ताद अंदर थे, और जब वो बाहर आए, तो उन्होंने काग़ज़ देखा, पढ़ा, और फिर मेरी तरफ़ मुड़े।

"उस्ताद?"

"अंकुश, आज शाम तक दुकान बंद करनी है।"

मैं उठकर गया। मैंने वो काग़ज़ पढ़ा।

दो दिन में दुकान खाली करने की बात थी, और नीचे एक छोटी लाइन — "अन्यथा कार्रवाई।"

"ये किसने भेजा?" मैंने पूछा।

"ऊपर कुछ लिखा नहीं है," उस्ताद ने कहा। "न मुहर, न तारीख़, न नाम। बस एक टाइप की हुई लाइन।"

"तो हम इसे नहीं मानेंगे।"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। "मैं इसे मानूँगा।"

"उस्ताद!"

"सुन।" उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा। "मैं इस दुकान को सत्तर साल से देख रहा हूँ। मेरे बाप ने इसे खोला, मैंने इसे चलाया, और मेरे भाई ने इसे छोड़ा। मैं जानता हूँ कि काग़ज़ झूठ बोलता है। पर अंकुश, एक बात है — मैं अब अकेला नहीं हूँ।"

"मतलब?"

"मतलब ये कि अगर मैं आज तेरे साथ लड़ने के लिए दुकान नहीं बंद करता, तो कल जब मैं इसे बंद करूँगा, तो कोई नहीं देखेगा।" उन्होंने काग़ज़ मोड़ा। "पर अगर मैं आज बंद कर दूँ, और आज शाम सबके सामने अपना ताला लगाऊँ, तो पूरी गली देखेगी कि मुझे बंद कराया गया। बस यही चाहिए।"

मैं एक पल के लिए रुका।

"आप गलत नहीं हैं," मैंने कहा।

"मुझे पता है," उन्होंने कहा। "सत्तर साल में सीखा है।"

दोपहर में स्कूल के गेट पर भीड़ थी।

मैं वहाँ नहीं जाना चाहता था। पर मीरा का फोन आया — "आ जा, कुछ हो रहा है" — और मैं गया।

स्कूल के गेट के बाहर आठ-दस अभिभावक खड़े थे। चार बच्चे बैग लटकाए खड़े थे, और सानिया उनमें से एक थी। उसके पिता अपना हाथ पकड़े खड़े थे।

"सानिया, चल," वो बोले।

"अब्बा, मुझे टिफ़िन—"

"चल, मैंने कहा।"

मैं आगे बढ़ा। "सानिया के अब्बा—"

"तुम रुको।" उन्होंने हाथ उठाया, पर मेरी तरफ़ देखा नहीं। "तुमसे बात नहीं करनी।"

"मैं सिर्फ़ पूछ रहा हूँ—"

"मैं क्या पूछूँ, अंकुश?" अब उन्होंने देखा। "मैं क्या पूछूँ? कल सुबह मेरी बीवी ने कहा — हमारे घर की बकरी क्यों मरी? मैंने कहा, बकरी बीमार थी। उसने कहा, बकरी अंकुश की गली में बंधी थी। मैंने कहा, बकरी अंकुश की गली में नहीं, अपने घर में बंधी थी। उसने कहा, फिर भी।"

"सानिया के अब्बा—"

"तुम बताओ, मैं अपनी औरत को क्या जवाब दूँ?" उनकी आवाज़ भारी थी। "मैं पढ़ा-लिखा आदमी नहीं हूँ। मैं नहीं जानता जादू होता है या नहीं। मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ कि रात को जब मेरी बच्ची सोती है, तो मैं उसका माथा छूकर देखता हूँ कि बुखार तो नहीं।"

मैं चुप हो गया।

"तुम्हारे पास जवाब है?" उन्होंने पूछा।

मेरे पास जवाब नहीं था। सच में नहीं था। मैं कह सकता था कि जादू नहीं होता, पर मैं झूठ नहीं बोल सकता था। तंत्र होता है। घंटी होती है। तंत्र है, और वो अभी चुप है।

मैंने सिर्फ़ इतना कहा, "मुझे नहीं पता कि बकरी क्यों मरी। पर मुझे इतना पता है कि मैंने किसी की बकरी नहीं मारी।"

"यही तो दिक्कत है," वो बोले। "तुम भी यही कहते हो, और वो भी यही कहता है।"

"कौन?"

"जो कल शाम मेरे घर आया था।" उन्होंने कहा। "सफ़ेद कुर्ता पहने, बैग लिए। बोला — भाई, मैं तुम्हारे बच्चे के भविष्य की बात करने आया हूँ। बोला — तुम्हारी बच्ची रोज़ उस दुकान के पास से गुज़रती है न? वहाँ कुछ ठीक नहीं है। बोला — हम चाहें तो तुम्हारी बच्ची के लिए स्कॉलरशिप करा दें।"

मेरे पेट में फिर वही ठंडा सा उठा।

"आपने क्या कहा?"

"मैंने कहा — मेरी बच्ची को स्कॉलरशिप नहीं चाहिए। मुझे बस इतना चाहिए कि तुम्हारी बकरी ज़िंदा रहे।" उन्होंने अपनी बच्ची का हाथ कस लिया। "और अब जब बकरी मर गई, तो मुझे लग रहा है कि उस आदमी की बात में कुछ तो है।"

मैंने सानिया की तरफ़ देखा। वो अपने अब्बा का हाथ पकड़े खड़ी थी, और उसकी आँखों में पानी था। वो मेरी तरफ़ देख रही थी, और मैं देख सकता था कि वो मुझसे कुछ कहना चाहती है — माफ़ी, या कोई खबर, या सिर्फ़ ये कि "मैं आपके साथ हूँ भैया।"

पर वो चुप थी। क्योंकि बच्चों को सिखाया जाता है कि जब बड़े बोल रहे हों, तो बोलना नहीं।

"सानिया," मैंने कहा। "टिफ़िन खा लेना। ठंडा न हो जाए।"

उसने होंठ कस लिए और सिर हिला दिया।

मैं वहाँ से चला आया। यही सबसे ज़्यादा चुभता है — जब तुम्हारी तरफ़दारी करने वाला भी तुम्हारी तरफ़ देख न सके।

शाम को नल पर झगड़ा हुआ।

मैं उस वक़्त दुकान पर बैठा था, और मुझे बाहर से आवाज़ आई — "बाल्टी मेरी थी!" और दूसरी आवाज़ — "तेरी थी तो नाम लिखा था क्या?"

मैं दौड़कर गया।

मोड़ के नल पर सानिया के अब्बा और गुड्डू के पापा आमने-सामने खड़े थे। बीच में एक लोहे की बाल्टी पड़ी थी, आधी भरी। पानी गली में फैल रहा था, और दोनों के पैर कीचड़ में थे।

"ये बाल्टी मेरी है!" गुड्डू के पापा बोले।

"मेरी है!" सानिया के अब्बा बोले। "मैंने सुबह इसमें पानी भरा था!"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho