The Mysterious Bell948 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 948

7 min read November 5, 2026

“किसके पास?”

“यही जानने आया हूँ।”

भैरों काका उठ खड़े हुए। वो मुझसे कुछ कहना चाहते थे, पर उनके होठ बंद हो गए।

और फिर मैंने देखा, जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था।

भैरों काका डर गए थे।

वो आदमी, जो बीस साल से उन खट-खट करने वाले बक्सों के पास रह रहा था, जिसके पीछे की हथेली में आज तक जला निशान था, वो थरथर काँप रहा था।

“काका…”

“अंकुश,” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ सूख गई थी, “इस चाबी को जेब में रख। और अगर मेरी बात माने, तो आज रात इसे किसी और को मत दिखाना।”

“काका, मुझे सिर्फ़ यह जानना है कि इसका जोड़ा कहाँ मिलेगा।”

“जोड़ा?”

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

“तूने यह शब्द कहाँ से सीखा?”

वो मेरे सामने बैठ गए। उनके हाथ अब भी काँप रहे थे।

“फ़रिश्ते जैसी शक्ल नहीं होती, अंकुश। जोड़े भी इंसान जैसे होते हैं। एक दिखता है, एक छुपा रहता है। और जिस दिन दोनों मिलते हैं, उस दिन कोई चीज़ बंद हो जाती है।”

“क्या बंद हो जाती है?”

“यह मैं नहीं बताऊँगा।”

“काका!”

“अंकुश, मैंने एक बार इस चाबी जैसा कुछ देखा था। उस रात के बाद मैंने शपथ ली थी कि मैं इन बातों में नहीं पड़ूँगा।”

“कौन सी रात?”

उन्होंने कुछ नहीं कहा।

वो उठे और अपनी चटाई की तरफ़ बढ़े। फिर रुके।

“जो आदमी ताला बनाता है, उसके पास चाबी नहीं रहती। उसके पास रजिस्टर रहता है — किसके घर कौन सा ताला लगा, किसकी कितनी चाबी बनी, किसने दूसरी चाबी किसके हाथ में रखी।”

वो मेरी तरफ़ मुड़े।

“अगर तू सच में जोड़ा ढूँढना चाहता है, तो उस आदमी के रजिस्टर तक पहुँच। और अगर वो रजिस्टर ज़िंदा है, तो वो तुझे मिल जाएगा।”

“और अगर नहीं मिला?”

“तो समझ लेना, तेरा ताला जिसका है, उसने अपना नाम रजिस्टर से कटवा दिया है।”

वो झोपड़ी के भीतर चले गए।

मैं वहीं खड़ा रहा।

और तभी भीतर से उनकी आवाज़ आई, बहुत धीमी।

“अंकुश, एक बात याद रखना। जो ताला किसी का बंदा है, उसे खोलने से पहले पूछ — ताला किसका था? क्योंकि ताला अगर किसी औरत का है, तो उसका जोड़ा किसी मर्द के पास होगा। और वो मर्द आज ज़िंदा भी हो सकता है और मरा भी।”

मैंने झोपड़ी की तरफ़ देखा।

“काका, आपको क्या लगता है? वो ज़िंदा है?”

बहुत देर तक कोई जवाब नहीं आया।

फिर सिर्फ़ इतना आया — “जो बीस साल से खुद को ज़िंदा नहीं मानता, वो ज़िंदा होकर भी मरा हुआ होता है।”

मैं बाहर निकला।

बक्सों की कतार अंधेरे में खड़ी थी। छठा बक्सा, जिस पर धूल नहीं थी, वहीं था। मैंने उसकी तरफ़ देखा। मुझे लगा भीतर से कोई साँस ले रहा है।

मैंने तेज़ी से कदम बढ़ाए।

जब मैं दुकान पहुँचा तो सुबह की पहली किरण आसमान पर पीली लकीर बना रही थी।

शटर उठा हुआ था। दुकान के अंदर कोई था।

मैं अंदर गया।

लक्ष्मी दीदी वहीं मेज़ के पास बैठी थीं, पर टिंकू नहीं था।

“दीदी, टिंकू कहाँ?”

“गया है,” उन्होंने कहा।

“कहाँ?”

“जहाँ मैं उसे भेजना नहीं चाहती थी।”

मेरे हाथ में चाबी थी। मैंने उसे मेज़ पर रखा।

“दीदी, साफ़ बोलिए।”

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें भरी हुई थीं, पर आवाज़ साफ़ थी।

“वो रमा मैडम के पास गया है। अपने पैरों से। मैंने उसे नहीं भेजा। उसने आज सुबह मेरा हाथ पकड़ा और कहा, माँ, मैं खुद बात करूँगा।”

मैं दुकान से निकला।

सड़क पार करके स्कूल की तरफ़ वाली गली में मुड़ा। रमा मैडम का घर पीपल की दूसरी गली में था, नीला दरवाज़ा, बाहर टूटी सीढ़ी और सूखा हुआ सा आँगन।

मैं दरवाज़े तक गया। दरवाज़ा खुला था।

मैं अंदर नहीं गया। मैं बाहर बरामदे के खंभे के पीछे खड़ा हो गया।

टिंकू अंदर चटाई पर बैठा था। उसके सामने मेज़ पर वही सफ़ेद फ़ॉर्म रखा था, जिसे मैंने औज़ारों के बक्से में छिपा दिया था।

रमा मैडम उसके सामने कुर्सी पर बैठी थीं।

“टिंकू, एक बार फिर सोच ले,” मैडम कह रही थीं। “आवासीय विद्यालय का मतलब है, तू यहाँ से चला जाएगा। रहना, खाना, पढ़ाई, सब वहीं। महीने में एक या दो बार घर आ पाएगा, अगर आ पाया तो।”

“मैडम, मुझे पता है।”

“और तेरी माँ?”

“माँ ने कहा कि मेरा फैसला मेरा है।”

“और उस्ताद?”

टिंकू एक पल चुप रहा।

फिर उसने कहा, “मैडम, मुझे उस्ताद से नाराज़गी नहीं है।”

“तो फिर जा क्यों रहा है?”

टिंकू ने अपने हाथों को गोद में रखा। वो मेज़ पर पड़े फ़ॉर्म को देख रहा था।

“मैडम, गली में लोग उस्ताद को मिस्त्री कहते हैं। किसी के पास साइकिल का पहिया टूटता है, तो वो उसकी दुकान पर जाता है। पर किसी के पास कोई बड़ी मुसीबत आती है, तो वो उसी दुकान पर आता है। क्यों?”

मैडम ने कुछ नहीं कहा।

“क्योंकि उस्ताद लोगों को जोड़ता है,” टिंकू ने कहा। “मुझे नहीं पता वो कैसे करता है। पर वो करता है।”

उसने मैडम की तरफ़ देखा।

“मैं उस्ताद की दुकान पर पच्चीस साल काम कर सकता हूँ। पर मैं उस दुकान का नाम नहीं बना सकता। क्योंकि दुकान का नाम बनाने के लिए मुझे कुछ बनना पड़ेगा। और वो मैं यहाँ रहकर नहीं बनूँगा।”

मेरा गला सूख गया।

“मैं पढ़ूँगा,” टिंकू ने कहा। “मैं वहाँ जाकर पढ़ूँगा, मैडम। और जिस दिन मेरा नाम किसी नतीजे की सूची में ऊपर आएगा, उस दिन मैं उस सूची के नीचे लिखवाऊँगा — यह लड़का उस दुकान से आता है जहाँ साइकिलें भी ठीक होती हैं और रिश्ते भी। और उस दुकान का नाम अंकुश यादव है।”

मैडम ने उसकी तरफ़ कुछ देर देखा।

फिर उन्होंने कलम उठाई।

“यहाँ नाम लिखना है,” उन्होंने कहा। “पूरा नाम।”

“टिंकू कुमार,” उसने कहा।

“पूरा।”

“मेरे पापा मुझे टिंकू बुलाते थे। कोई पूरा नाम नहीं रखा गया था। स्कूल के रजिस्टर में भी टिंकू कुमार ही लिखा है।”

मैडम ने कलम नीचे रखी।

“तो पूरा नाम आज रख लेते हैं,” उन्होंने कहा। “जो दुकान पर तेरा उस्ताद बुलाता है, वही तेरा नाम है।”

और उन्होंने फ़ॉर्म पर लिखा।

मैं खंभे के पीछे खड़ा था। मैंने अपना मुँह दूसरी तरफ़ कर लिया।

मुझे अपनी आँखें पोंछनी थीं, पर मैं चाहता था कि कोई मुझे इस हाल में न देखे। मैंने अपनी कमीज़ की आस्तीन से चेहरा पोंछा और वहीं खड़ा रहा।

टिंकू बाहर आया।

मुझे खंभे के पीछे देखकर वो एक पल रुका।

“उस्ताद…”

“क्या बात कर रहा था मैडम से?” मैंने कहा, आवाज़ कसकर सामान्य बनाकर।

“कुछ नहीं। फ़ॉर्म भरवा रहा था।”

“फ़ॉर्म?” मैंने आश्चर्य जताया। “कौन सा फ़ॉर्म?”

वो मुस्कुराया। उसे पता था कि मैं झूठ बोल रहा हूँ।

“उस्ताद, तुम मेज़ पर रखा फ़ॉर्म छिपा रहे थे, और अब पूछ रहे हो कौन सा फ़ॉर्म?”

मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।

“टिंकू।”

“हाँ।”

“क्या सच में जाना है?”

उसने मेरी तरफ़ देखा।

“हाँ, उस्ताद। और अब मैं अपने फ़ैसले से जा रहा हूँ, तुम्हारे डर से नहीं।”

मैंने उसका कंधा दबाया।

“तो ठीक है। पर एक बात।”

“क्या?”

“वहाँ से भागकर नहीं आना। अगर मुश्किल हो, तो आना। पर भागकर नहीं।”

उसने सिर हिलाया।

“और टिंकू।”

“हाँ?”

“मैं तुझे भूलूँगा नहीं। तेरे जाने के बाद भी दुकान में तेरी मेज़ रहेगी।”

वो चुप हो गया।

“मेज़?”

“हाँ। जिस पर तेरा नाम लिखा होगा। और जब तू लौटेगा, तो वहीं बैठेगा।”

वो हँसा, पर उसकी आँखों में पानी था।

“उस्ताद, तुम भी रो रहे हो?”

“मैं? मैं तो पसीना पोंछ रहा हूँ।”

“पसीना सुबह सात बजे आस्तीन से पोंछते हो?”

“चल, निकल यहाँ से।”

खबर गली में बिजली की तरह फैली।

और उसी शाम पीपल की चबूतरी पर वो होने लगा जो मैंने कभी नहीं सोचा था।

शबनम आपा ने गुमटी के बाहर दो कड़ाहियाँ चढ़ा दीं।

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