The Mysterious Bell909 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 909

7 min read November 5, 2026

उन्होंने जवाब नहीं दिया।

वो अपनी कुर्सी पर बैठे रहे और उन्होंने अपना चश्मा फिर पोंछा।

और उस वक़्त मुझे लगा कि मैं अपने ही घर की चुप्पी देख रहा हूँ।

क्योंकि मैंने पापा को भी ऐसे ही बैठे देखा था — बिना जवाब, हाथ में कुछ पकड़े, आँखें किसी ऐसी जगह पर जो कमरे में नहीं थी। और मैं उस वक़्त पापा से नाराज़ हुआ था। मुझे लगा था कि वो चुप इसलिए हैं कि उनके पास कहने को कुछ नहीं है।

अब समझ आ रहा था कि लोग चुप इसलिए होते हैं कि उनके पास कहने को बहुत कुछ है, पर उसे कहने की जगह नहीं है।

और यह सबसे बड़ी दिक्कत है — चुप्पी के लिए जगह नहीं होती। चुप्पी के लिए कोई मंच नहीं होता। इसीलिए वो सालों तक चलती रहती है।

मैंने एक कदम आगे रखा।

"रेहाना आपा," मैंने कहा।

उन्होंने देखा।

"आपने कहा कि आपने उस काग़ज़ में कुछ बदला हुआ देखा था।"

"हाँ।"

"क्या आपको याद है कि उस काग़ज़ पर क्या था?"

उन्होंने रजिस्टर बंद कर दिया।

"मुझे तारीख़ याद नहीं," उसने कहा। "मुझे नाम याद नहीं। पर मुझे इतना याद है कि उस काग़ज़ पर दो अंगूठे थे, और दोनों अंगूठों के नीचे एक ही आदमी का नाम था। और उस नाम के नीचे एक और नाम जोड़ा गया था — नई स्याही में, अलग हाथ से।"

मेरी साँस रुक गई।

"क्या वो नाम…" मैंने कहा। "क्या वो नाम शंकर यादव था?"

रेहाना ने मेरी तरफ़ देखा।

"मुझे नाम याद नहीं," उसने कहा। "पर मुझे याद है कि वो नाम बहुत साधारण था। और मुझे यह भी याद है कि उसके नीचे एक खाली जगह थी जिसमें कोई तीसरा नाम आना था — पर वो नहीं आया।"

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।

मेरी उँगली घंटी से छू गई और मुझे लगा कि वो अब ठंडी नहीं है। वो गरम भी नहीं है। वो बिलकुल बीच की है — वो तापमान जो न ठंडा होता है, न गरम। वो तापमान जो तब होता है जब कोई चीज़ साँस रोककर सुन रही हो।

मैंने घंटी निकाली।

उसके पीतल पर उभरे उभरे से दो निशान थे — दो मुड़ी लकीरें और बीच में एक बिंदु। वो निशान जो मैंने चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर देखा था। वो निशान जो मंसूर चाचा के पीले काग़ज़ पर था।

मैंने घंटी रेहाना की तरफ़ बढ़ाई।

"यह पहचानते हैं?"

उसने घंटी को देखा।

और उसका चेहरा बदल गया।

"मैंने यह निशान देखा है," वो धीरे से बोली। "अस्पताल के पुराने काग़ज़ों में। जिन काग़ज़ों को हम कूड़ा कहते थे, असल में वो हिसाब थे। और उनमें यह निशान बार-बार आता था।"

"कहाँ?"

"मोहर के नीचे," उसने कहा। "जिस काग़ज़ पर नीली गोल मोहर लगी होती थी, उसके नीचे कोने में यह निशान उभरा होता था। हर काग़ज़ पर। मैंने एक बार पूछा कि यह क्या है, तो मुझे कहा गया कि यह मोहर बनाने वाले की छाप है। पर एक बात अजीब थी — अलग-अलग साल के काग़ज़ों पर छाप एक जैसी थी।"

मेरे मुँह से जो निकला, वो मैंने सोचा नहीं था।

"यानी यह मोहर बनाने वाले की छाप नहीं है," मैंने कहा। "यह बनाने वाले का निशान है।"

रेहाना ने धीरे से सिर हिलाया।

"यही मैंने सोचा था," उसने कहा। "और यही सोचकर मैंने शिकायत की थी।"

मैंने घंटी जेब में रखी और काजल की तरफ़ देखा।

काजल ने मेरी तरफ़ देखा।

और बिना कुछ कहे हम दोनों ने एक ही बात सोची।

अगर यह निशान हर उस काग़ज़ पर है जिस पर भारद्वाज की मोहर लगी है, तो यह मोहर किसी दफ़्तार की नहीं है। यह उस आदमी की है जिसने इन काग़ज़ों को बनाया है। और उसका नाम वही है जो पापा की उस आधी जली रसीद पर था — खल्लू भाई।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा।

उसने अपना छोटा काग़ज़ निकाल लिया था और उस पर कुछ लिख रही थी।

"अब मैं तुमसे एक आख़िरी बात कहूँगी," रेहाना ने कहा। "और वो बात मैंने पंद्रह साल किसी को नहीं कही।"

वो उठकर खड़ी हो गई।

"डॉक्टर साहब ने मुझे डाँटा था," उसने कहा। "पर उसके बाद, उसी रात, उन्होंने मेरे हाथ में एक काग़ज़ रखा और कहा कि इसे तीन दिन अपने पास रखो, फिर लौटा देना। मैंने उसे अपनी जेब में रखा। वो काग़ज़ मेरे पास तीन दिन नहीं, पंद्रह साल रहा।"

मैंने रेहाना की तरफ़ देखा।

"वो काग़ज़…" मैंने धीरे से कहा।

रेहाना ने अपना बैग खोला। फटा हुआ बैग, जिसका पट्टा दो जगह से सीला हुआ था। उसमें से उसने एक मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला। पीला काग़ज़, जिसके किनारे देर से पीले पड़ गए थे।

उसने वो काग़ज़ डॉक्टर इसरानी की मेज़ पर रखा।

"यह क्या है?" मैंने पूछा।

डॉक्टर इसरानी ने उस काग़ज़ को देखा।

"यह वो शिकायत है," उन्होंने कहा, "जो मैंने खुद लिखी थी।"

मैंने काग़ज़ उठाया।

उस पर सात-आठ लाइनें थीं। हाथ से लिखी। नीली स्याही। कुछ शब्दों पर लकीर लगी थी — जैसे लिखने वाले ने अपनी बात सोच-समझकर नरम कर दी हो।

नीचे हस्ताक्षर थे — "निहाल इसरानी।"

और उसके नीचे एक लाइन थी जो किसी और की लिखाई में थी, छोटी-सी, कोने में।

"इसे खुद देना है। किसी और से नहीं।"

मैंने डॉक्टर साहब की तरफ़ देखा।

"आपने खुद शिकायत लिखी थी," मैंने कहा। "तो फिर दी क्यों नहीं?"

डॉक्टर इसरानी ने कुर्सी की पीठ टेक ली।

"क्योंकि उस हफ़्ते," उन्होंने कहा, "इस शहर के लाइसेंस दफ़्तार में बारह दुकानों के लाइसेंस रद्द हो गए थे। बारह। एक रात में। और सिर्फ़ एक आदमी के हस्ताक्षर से। मैंने अपनी शिकायत वहीं देनी थी। और उसी जगह पर मेरी उँगली रखी गई थी।"

वो उठे।

"मैं एक डॉक्टर हूँ," उन्होंने कहा। "मैं लोगों की जान बचाता हूँ। मैंने यह शिकायत लिखी, और फिर मैंने सोचा — अगर यह फाइल बाहर गई और नहीं खुली, तो इसका मतलब मैं वो लोग जैसा बन जाऊँगा जिनके नाम उस काग़ज़ पर थे। और अगर यह फाइल बाहर गई और खुल गई, तो मैं शायद इस अस्पताल में नहीं रहूँगा। फिर इस अस्पताल का क्या होगा? यहाँ रोज़ पंद्रह मरीज़ आते हैं, चार गरीब, दस बुज़ुर्ग, एक मरने को।"

उन्होंने रेहाना की तरफ़ देखा।

"मैंने तुम्हें यह काग़ज़ दिया," उन्होंने कहा, "क्योंकि मैं तुमसे माफ़ी माँगना चाहता था। पर मैं यह भी नहीं कह सका। मैंने सोचा कि तुम इसे पढ़ कर समझ जाओगी।"

"मैंने इसे पढ़ा," रेहाना ने कहा। "और मैं समझ गई।"

"फिर तुमने इसे दिया क्यों नहीं?"

"क्योंकि आपने यह नहीं लिखा था कि इसे देना कब है," रेहाना ने कहा। "आपने लिखा था — 'इसे खुद देना है, किसी और से नहीं।' मैंने सोचा कि यह काग़ज़ मेरा है, और मैं इसे तब दूँगी जब कोई मुझे सुनेगा। पंद्रह साल कोई नहीं सुना। आज मैंने सुना कि कोई सुनेगा।"

गलियारे में चुप्पी थी। पर पहले जैसी चुप्पी नहीं। यह अब अलग चुप्पी थी। यह वो चुप्पी नहीं थी जो कुछ छिपाती है। यह वो चुप्पी थी जो किसी चीज़ के खुलने का इंतज़ार कर रही हो।

मैंने काग़ज़ उठाया।

"यह माँगने की चीज़ नहीं है," मैंने कहा। "यह गवाही है। और गवाही माँगी नहीं जाती — रखी जाती है।"

रेहाना ने मेरी तरफ़ देखा।

"तुम कितने साल के हो?" उसने पूछा।

"चौबीस।"

"चौबीस साल के लड़के की आवाज़ में यह बात कहाँ से आई?"

मैंने कंधे हिलाए।

"एक घंटी है," मैंने कहा।

वो हँसी — पहली बार। और उसकी हँसी भी एक अलग तरह की थी, जैसे वो सालों से बोलना भूल गई हो और याद कर रही हो कि हँसना कैसे होता है।

"तुम वही हो," उसने कहा, "जिसका नाम भवन में पूछा जा रहा है।"

"मेरा नाम भवन में पूछा जा रहा है?"

"हाँ।" उसने अपना बैग उठाया। "मुझे आज सुबह एक दोस्त ने बताया कि भवन में लोग नए काम पर लग रहे हैं, और वहाँ एक औरत आई थी — सफ़ेद वर्दी में। वो इस अस्पताल की थी। और वो दो नाम पूछ रही थी — एक अंकुश यादव, और एक शांति देवी।"

मैं रुक गया।

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