The Mysterious Bell890 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 890

2 min read November 5, 2026

काजल ने टॉर्च उठाई। रोशनी में ताले पर पाला जमा दिख रहा था, जैसे किसी ने बाहर से आकर उसे अपनी साँस से जमा दिया हो।

तभी पापा का मोबाइल बजा। पापा ने स्क्रीन देखी और उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

"मंसूर भाई," उन्होंने कहा।

उधर से आवाज़ आई, इतनी साफ़ कि जैसे वो कमरे में ही खड़ा हो। "शंकर, ताला बंद हो गया। अब वो झूठी गर्मी से नहीं खुलेगा। जो सच बाहर निकालने की जिद करेगा, उसके हाथ जलेंगे। खून से नहीं, याद से।"

पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था, पर वो कुछ नहीं बोले। उन्होंने मोबाइल नीचे कर दिया और दीवार की तरफ़ देखने लगे।

वही चुप्पी मुझे फिर चुभी। इस बार गुस्से से ज़्यादा दर्द बनकर।

"पापा," मैंने कहा, "मुझे आपकी सच्चाई नहीं चाहिए। मुझे बस इतना चाहिए कि आप एक बार मेरे सामने झूठ न बोलें। एक बार। बस एक बार।"

उनके होंठ काँपे। "अंकुश, मैं…"

"क्या?"

"मैं डरता हूँ," उन्होंने कहा, और यह पहली बार था कि इतने सालों में उन्होंने इतना साफ़ कहा। "मैं डरता हूँ कि सच बाहर आया तो तुझे, तेरी माँ को, काजल को वो दर्द फिर झेलना पड़ेगा जो मैंने झेला था। मैं तुम्हें बचाना चाहता था।"

"बचाना?" मेरी आवाज़ भर्रा गई। "आपने मुझे बचाया नहीं, पापा। आपने मुझे अकेला छोड़ दिया। मैं रोज़ उस गली में खड़ा हूँ, और आप यहाँ बैठे रहते हैं। डर बाँटने से कम होता है, छुपाने से बढ़ता है।"

माँ ने पीछे से कहा, "शंकर, सुनो। बेटा सही कह रहा है।"

काजल ने भी कहा, "चाचा, अब बस भी करो।"

पापा ने सबको देखा। फिर उन्होंने अपनी खुली हथेलियाँ सामने कीं, जैसे कुछ देना चाहते हों, पर शब्द नहीं मिल रहे थे। उनकी आँखें बोल रही थीं, पर ज़ुबान अटकी हुई थी।

मैंने संदूक का ताला फिर छुआ। ठंड वहीं थी, पर इस बार मैंने हाथ नहीं खींचा।

"सुनो, पापा," मैंने धीरे से कहा। "मैं कल सभा में अकेले नहीं जाऊँगा।"

उन्होंने आँखें ऊपर कीं।

"आप चलेंगे मेरे साथ। एक कदम पीछे, पर मेरे साथ। अगर डर लगे, तो मेरे पीछे छिप जाइए। पर चुप मत रहिए। क्योंकि अब मैं भी थक गया हूँ, पापा। मैं भी अकेले लड़ते-लड़ते थक गया हूँ।"

उनकी आँखों से पानी बहता रहा। उन्होंने धीरे से सिर हिलाया। न हाँ, न ना। बस एक छोटी सी हरकत, जैसे कोई बहुत भूखा आदमी पहली बार पानी देखकर होंठ हिलाए।

और ठीक उसी पल, मेरी जेब में घंटी फिर हिली।

धीमी। टिन। टिन।

मैंने उसे निकाला। वो मेरी हथेली में काँप रही थी, जैसे उसने बहुत मेहनत की हो।

फिर उसने कहा, "टूटा हुआ रिश्ता बाहर नहीं। तेरे ही घर में बैठा है।"

मैंने पापा की तरफ़ देखा।

घंटी ने आख़िरी बार कहा, "जब तक तू उसे नहीं जोड़ेगा, कोई ताला नहीं खुलेगा।"

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