The Mysterious Bell – Chapter 886
और उसकी आवाज़ में एक ही शब्द था।
"पूरा।"
॥
"पूरा।"
वो शब्द मेरी कमीज़ के अंदर से आया था, धागे से बँधी घंटी से, पर लगा जैसे आँगन की दीवार से टकराकर लौटा हो। पापा ने मेरी तरफ़ देखा, फिर मेरी छाती की तरफ़, जहाँ घंटी लटक रही थी।
"इसने क्या कहा?" पापा ने पूछा।
"पूरा," मैंने कहा।
"क्या पूरा?"
"यही तो मैं भी सोच रहा हूँ, पापा।"
काजल ने ट्रंक का ढक्कन पूरा खोल दिया और अंदर झुककर देखने लगी। उसने हथौड़ा उठाया, फिर रख दिया। छेनी उठाई, फिर रख दी। रेती उठाई और उसके ऊपर जमी ज़ंग देखकर बोली, "अंकुश, यहाँ कुछ भी नहीं है। सिर्फ़ औज़ार हैं और उन पर जमी धूल।"
"धूल में जगह है," मैंने कहा। "चौकोर।"
"हाँ, पर वो पेंच की जगह नहीं है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"पेंच गोल है, काजल। गोल। उसकी जगह गोल होनी चाहिए थी। यह चौकोर है।"
काजल ने मुझे देखा। पापा ने भी।
"तो इसका मतलब?" काजल ने पूछा।
"मतलब," मैंने कहा और ट्रंक के ढक्कन को धीरे से बंद किया, "इस जगह पर पेंच नहीं था। इस जगह पर कुछ और था। कुछ जो चौकोर था।"
पापा ने अपना चश्मा उतारा और आँखें मसलीं। वो चश्मा जिसके कान पर टेप बँधा था, जो बाईस साल से उनके साथ था, जिसे उन्होंने कल रात मेज़ पर रखा था और फिर वापस पहन लिया था।
"मैंने यहाँ पेंच रखा था," पापा ने कहा। "मुझे याद है। मैंने इसे इसी कोने में रखा था, रेती के पास, ताकि यह खो न जाए।"
"पर वो जगह चौकोर है, पापा," मैंने कहा।
"तो मेरी याद गलत है," पापा ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो थकान थी जो हार मान लेती है।
मैंने उनके कंधे पर हाथ रखा।
"नहीं," मैंने कहा। "याद गलत नहीं है। याद सही है। बस जगह गलत है।"
"मतलब?"
"मतलब, पापा, किसी ने इस ट्रंक से सिर्फ़ पेंच नहीं लिया। किसी ने ट्रंक खोलने से पहले ही पेंच निकाल लिया था। और जो चीज़ इस जगह पर थी, वो पेंच के साथ चली गई।"
पापा कुछ नहीं बोले।
काजल ने धीरे से कहा, "यानी कोई हमारे घर के अंदर है।"
आँगन में चुप्पी फैल गई। दूर पीपल के नीचे बच्चों की आवाज़ आ रही थी, कोई हँस रहा था, कोई कुछ चिल्ला रहा था, पर हमारे आँगन में सिर्फ़ चूल्हे की बची हुई आग की धीमी फुसफुसाहट थी।
मैंने पापा की तरफ़ देखा। उनका चेहरा ऐसा था जैसे कोई पुरानी दीवार अचानक झुक गई हो।
"पापा," मैंने कहा। "घर में कितने दरवाज़े हैं जो बंद हैं?"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे लगता है कि हम बहुत दिनों से एक ही दरवाज़े के बारे में बात कर रहे हैं, और घर में एक से ज़्यादा बंद दरवाज़े हैं।"
पापा ने कुछ सोचा। फिर बोले, "तीन।"
"तीन?"
"चूल्हे के पीछे वाला एक। दादा की अलमारी के पीछे वाला, जिसमें लकड़ी का डिब्बा रखा है। और तीसरा…"
वो रुक गए।
"तीसरा?" मैंने पूछा।
"तीसरा तेरी माँ की ब्याहता की संदूकची है," पापा ने कहा। "वो मेरे कमरे के कोने में रखी है, रस्सी बँधी हुई। मैंने उसे कभी नहीं खोला। तेरी माँ ने कहा था कि उसे छूना मत।"
"आज रात छूना पड़ेगा," मैंने कहा।
पापा ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मुझे पहले नहीं दिखा था। डर। पर वो डर मेरे गुस्से का नहीं था। वो डर उस चीज़ का था जो उन्हें भीतर से खा रही थी। शायद वो जानते थे कि उस संदूकची में क्या है। शायद वो जानते थे कि मैं ढूँढ लूँगा। और वो यही नहीं चाहते थे कि मैं ढूँढूँ।
मैं घर के अंदर गया।
पहले मैंने अपना कमरा खोला — दुकान के पीछे वाला छोटा कमरा, जिसमें मेरी चारपाई थी, लोहे की अलमारी थी, औज़ारों का ट्रंक था, और वो बल्ब था जो गुनगुनाता रहता था। मैंने अलमारी का हर दराज़ खोला। मोज़े, कपड़े, पुरानी नर्सिंग की किताबों के नीचे दबी कुछ पुरानी तस्वीरें। कुछ नहीं।
फिर मैं रसोई में गया। माँ चूल्हे के पास बैठी थीं, और उनके हाथ में हिसाब की कॉपी थी, पर वो उसे देख नहीं रही थीं। वो दीवार को देख रही थीं। वो दीवार जिसके पीछे वो दरवाज़ा था।
"माँ।"
"हूँ।"
"पेंच गायब है।"
उन्होंने कॉपी बंद कर दी। "कौन सा पेंच?"
"घंटी का। पीतल का। जो पापा ने कल रात मुझे दिया था।"
माँ ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर अपनी कॉपी के ऊपर हाथ रख दिया, जैसे कुछ ढक रही हों।
"चोरी नहीं हुआ," उन्होंने कहा।
"तुम्हें कैसे पता?"
"क्योंकि जो चीज़ चोरी होती है, वो बेची जाती है," माँ ने कहा। "और इस घर में बाईस साल से कोई चीज़ बेची नहीं गई। सब कुछ रखा गया है। सब कुछ छिपाया गया है।"
"तो यह क्या है?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो थकान थी जो उन्होंने कभी किसी को नहीं दिखाई थी।
"शायद तेरे पापा ने अपने औज़ारों में रख दिया," उन्होंने कहा। "या शायद इस घर ने उसे वापस ले लिया। इस घर की आदत है, अंकुश। यह कभी कुछ पूरा नहीं होने देता।"
"माँ—"
"मेरी बात सुन," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ अचानक सख़्त हो गई। "जो चीज़ इस घर से गायब हुई है, वो कभी चोरी से नहीं गई। वो हमेशा किसी के हाथ से गई है। और आज भी किसी के हाथ में है। सिर्फ़ इतना जान ले कि उस हाथ का मालिक तुझसे कम नहीं जानता।"
"कौन?"
"मुझे नहीं पता," माँ ने कहा। "और यही सबसे डरावनी बात है।"
माँ ने अपने हाथ से आटे का छोटा सा टुकड़ा तोड़ा और उसे गोल करने लगीं। उनके हाथ काँप रहे थे, हालाँकि वो छिपाने की कोशिश कर रही थीं।
"माँ," मैंने धीरे से कहा। "तेरी दवा ले ली?"
"ले लूँगी।"
"आज?"
"कल।"
"माँ।"
"अंकुश," उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "आज रात मेरी दवा की बात मत कर। आज रात मुझे सिर्फ़ यह जानना है कि मेरा बेटा उस कुर्सी पर बैठेगा या नहीं।"
मैं कुछ देर खड़ा रहा। फिर मैं झुका और उनके पैर छुए। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा, और उनका हाथ ठंडा था।
"बैठूँगा," मैंने कहा।
"अच्छा।"
"पर कुर्सी पर बैठकर भी सच बोलूँगा।"
माँ हँसी। बहुत धीमे से। "तो फिर कुर्सी उसकी नहीं रही," उन्होंने कहा।
मैं बाहर आया। पापा आँगन में बैठे थे, एक पुराना तख़्त जिस पर धूल जमी थी। उनके हाथ में रिंच थी और वो उसे बार-बार पलट रहे थे, जैसे उस पर कुछ ढूँढ रहे हों।
काजल दुकान के बाहर खड़ी थी और मीरा से बात कर रही थी। मीरा आई थी, कैमरा लटकाए, बाल उलझे हुए, आँखों में वो चमक जो तभी आती है जब कोई नई खबर मिलती है।
"मैंने सुना," मीरा ने कहा। "पेंच गायब है।"
"हाँ।"
"और घंटी ने पूरा कहा।"
"तूने कैसे सुना?"
"काजल ने बताया।"
मैंने काजल की तरफ़ देखा। वो शर्मिंदा नहीं लग रही थी। "मीरा अब बाहर वाली नहीं है," उसने कहा। "वो हमारे घर की खबर रखती है अब।"
मीरा ने अपना बैग खोला और उसमें से एक छोटी डायरी निकाली।
"चल, मुझे बता," उसने कहा। "आज सुबह से लेकर अब तक क्या-क्या हुआ। एक-एक बात।"
मैंने बताया। पूरा कमरा, अलमारी, ट्रंक, चौकोर जगह, माँ की बात, पापा का चेहरा। मीरा लिखती गई। कभी-कभी रुककर कुछ पूछती, कभी सिर हिलाती।
"तीन बातें साफ़ हैं," उसने कहा और डायरी बंद कर ली। "एक — पेंच ट्रंक से नहीं गया। वो कभी ट्रंक में आया ही नहीं। दो — जो चौकोर जगह है, वो पेंच से पहले से ट्रंक में थी। यानी ट्रंक में तीन चीज़ें थीं, और तीनों अलग-अलग वक़्त पर गईं। तीन — जो व्यक्ति ट्रंक तक पहुँचा, वो घर के अंदर से आया था, बाहर से नहीं।"
"तू इतना कैसे जानती है?"
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