The Mysterious Bell881 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 881

7 min read November 5, 2026

"पता नहीं।" उन्होंने टेप से बँधा चश्मा ठीक किया। "अब लगता है, वो चीज़ मेरे पास आई थी, मेरे पास रही, पर उसने तुझे चुना। यह बात मुझे उस दिन समझ नहीं आई थी।"

मैंने आँखें बंद कीं।

और मुझे वो दिन याद आया।

धुंधला-सा। दुकान की छत पर टीन, जिस पर सुबह की धूप पड़ती थी। साइकिलों की गली। दुकान के सामने का पत्थर, जिस पर बैठकर लोग चाय पीते हैं। पापा का झुका हुआ कंधा और उनके हाथ में कील निकालने वाला पतला औज़ार।

मुझे यह सब याद था।

पर…

पर उस दिन की गरमी नहीं थी।

मुझे याद था कि मैं घंटी बजा रहा था। पर मुझे याद नहीं था कि जब पापा मेरी तरफ़ देखकर हँसे थे, तो मेरे अंदर क्या हुआ था। जैसे कोई दिन का पूरा चित्र हो, और उस चित्र में बस रंग न भरे हों।

मैंने अपनी हथेली खोली।

ग्रीस के निशान। पुराने कटे निशान, नाखून के पास छोटी-सी चोट। रेती की धूल का पतला धब्बा।

पर उस दिन की गरमी नहीं।

"पापा," मैंने कहा। "मुझे याद है कि मैं बजा रहा था। पर मुझे याद नहीं कि मैं कैसे हँसा था।"

पापा ने मेरी हथेली की तरफ़ देखा।

"इसीलिए," उन्होंने कहा। "तू कह रहा था कि तेरी आवाज़ की एक जगह खाली है।"

"आपको कैसे पता?"

"क्योंकि मेरे अंदर भी एक जगह खाली है।" उन्होंने धीरे से कहा। "और मैंने उसे बाईस साल में कभी अलग से नहीं देखा। सोचा, आदमी के अंदर ऐसे ही कुछ छेद रह जाते हैं। पर तेरा खालीपन मेरे से अलग है, अंकुश। तेरा खालीपन किसी ने बनाया है।"

मैंने हथेली बंद कर ली।

"पापा," मैंने कहा। "आपने अंगूठा लगाया।"

"हाँ।"

"डर से।"

"हाँ।"

"और फिर आपने उसे छुपाया।"

वो चुप रहे।

फिर बोले, "यही मेरी सबसे बड़ी गलती थी।"

"अंगूठा लगाना?"

"नहीं।" उन्होंने सीधे मेरी आँखों में देखा। "उसे छुपाना। अंकुश, अंगूठा तो एक रात की कमज़ोरी थी। मगर छुपाना — वो बाईस साल का रोज़ का काम हो गया। हर सुबह उठकर मैं उस सच को उसी तरह ठीक करता रहा जैसे कोई फीकी पड़ी पेंट को उँगली से रगड़ता रहे। उससे फीका ही पड़ता है।"

कमरे में बल्ब गुनगुनाता रहा।

"मैं आपको अभी माफ़ नहीं कर सकता, पापा।"

मैंने यह बहुत धीरे कहा। बिना गुस्से के। और शायद इसीलिए यह ज़्यादा कसकर लगा।

पापा ने सिर नहीं झुकाया। उन्होंने नज़र नहीं फेरी। बस वैसे ही देखते रहे।

"मुझे पता है," उन्होंने कहा।

"मैं झूठ नहीं बोलूँगा। मैं कह सकता था कि सब पुरानी बात है, चलो भूल जाओ। पर मैंने आपसे सीखा है, पापा।" मेरी आवाज़ लड़खड़ाई, पर मैं रुका नहीं। "गली में आजकल हर कोई किसी से कुछ छुपाकर बैठा है। सब पुरानी बातें खोद रहे हैं। और मैं हर बार यही लगाता हूँ कि सच बोलने से रिश्ता टूटता है। पर नहीं।"

"तो क्या होता है?"

"सच बोलने से रिश्ता दिखता है। सामने आ जाता है।" मैंने उनकी तरफ़ देखा। "और आज मैं झूठ बोलकर आपको वो चीज़ नहीं देना चाहता जो मेरे अंदर नहीं है।"

पापा के होंठ हिले।

"याद रखना," उन्होंने कहा। "माफ़ी माँगने से रिश्ता खत्म नहीं होता। रिश्ता तो इंकार से खत्म होता है — जब कोई माँगे ही नहीं। माफ़ी से सिर्फ़ सच खुल जाता है। और सच खुलने से आदमी छोटा नहीं होता। सिर्फ़ दिखने लगता है।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

हम चुप बैठे रहे।

बहुत देर।

इतनी देर कि बल्ब की गुनगुनाहट भी एक तरह की आवाज़ लगने लगी, और मुझे लगा कि अगर यह बुझ जाए तो मैं उस आवाज़ को भी याद रखूँगा।

और उस चुप्पी में कुछ अलग था।

पहले जब हम चुप होते थे, तो उसमें गुस्सा होता था। दीवार जैसा। जिसे छूने पर हाथ कटता था।

आज उसमें थकान थी।

बस थकान। जैसे दो आदमी बहुत दूर से पैदल चलकर आए हों और एक ही पत्थर पर बैठ गए हों।

"तू सो जा," पापा ने कहा और उठने लगे।

"आप भी।"

"मैं थोड़ा बाहर बैठूँगा।"

"आँगन में?"

"हाँ।" उन्होंने एक पल रुककर कहा। "उस दरवाज़े की तरफ़ नहीं। उसके उलटी तरफ़। आज रात मुझे दीये की तरफ़ नहीं, गली की तरफ़ देखना है।"

वो उठे। कमर झुकी हुई थी, पर आज कुछ कम। उन्होंने जेब में हाथ डाला।

"यह रख।"

उन्होंने कुछ मेरी हथेली पर रखा।

मैंने देखा।

एक पेंच था। छोटा, पीतल का, घिसा हुआ। सिर पर एक खाँचा, जैसे किसी पुराने पेचकस से खोला गया हो। किनारे पर हल्की ज़ंग। पेंच बहुत पुराना था, पर तेल से चिकना — जैसे किसी ने उसे बरसों जेब में रखा हो।

"यह क्या है, पापा?"

"यह घंटी का पेंच है।" उन्होंने कहा। "उस दिन मैंने घंटी खोलकर साफ़ की थी, तुझे दुकान पर लाने से पहले। यह पेंच बच गया था। मैंने सोचा था, कभी मौक़ा आएगा तो तुझे दूँगा।"

"और मौक़ा आज आया?"

"मौक़ा आज आया।" वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़े। "पर अंकुश, मौक़ा मैंने नहीं बनाया। मौक़ा तूने बनाया। तू आज बैठा रहा, मेरे सामने, और मुझसे झूठ नहीं बोला। इसीलिए मौक़ा बना।"

वो बाहर चले गए।

दरवाज़ा खुला रह गया। बाहर से आँगन की हवा आई, जिसमें धूल और पीपल की पत्तियों की गंध थी।

मैंने पेंच को हथेली पर रखकर देखा।

और तभी…

घंटी बजी।

मेज़ पर पड़ी घंटी। जिसे मैंने नहीं छुआ था। जिसे कोई छूने वाला भी वहाँ नहीं था। उसकी आवाज़ कमरे में फैली — छोटी, साफ़, पर उसमें वो दोहरापन नहीं था जो पिछले कुछ दिनों से उसमें आ गया था। आज वो अकेली बजी, जैसे बरसों बाद अपनी पुरानी आवाज़ में लौट आई हो।

मेरी हथेली में पेंच गरम होने लगा।

और घंटी ने कहा,

"यह पेंच उस दिन का है।"

मैंने साँस रोक ली।

"जिस दिन तेरी आवाज़ पहली बार मुझसे जुड़ी।"

कमरे में हवा रुकी हुई थी।

मैंने धीमे से पूछा, "मतलब… उस दिन, जब मैं छोटा था? जब पापा मुझे दुकान पर लाए थे?"

घंटी एक पल चुप रही।

फिर बोली, "उस दिन तूने मुझे बजाया नहीं था।"

"तो?"

"उस दिन तूने मुझे सुना था।"

मैं उठ खड़ा हुआ। पेंच मेरी हथेली में चिपक गया, जैसे उसे वहीं रहना हो।

"और मेरी आवाज़? जो खो गई?"

"वो उसी दिन मुझमें आई थी," घंटी ने कहा। "और उसी दिन कोई उसे मुझसे निकाल भी ले गया। तू बैठा हँस रहा था। तेरे पापा पहिया ठीक कर रहे थे। और कोई तीसरा आदमी दुकान के दरवाज़े पर खड़ा था।"

मेरा गला सूख गया।

"कौन?"

"वो," घंटी ने कहा, "जो आज भी अपने जूते चमकाकर रखता है।"

कमरे के बाहर, आँगन में, पापा की कुर्सी चरमराई।

और मैंने अपनी हथेली में पेंच को कसकर पकड़ लिया — उस दिन की गरमी, पहली बार, मेरी उँगलियों में लौट आई थी।

॥

रात के उस पल में मैं कितनी देर बैठा रहा, याद नहीं। बस इतना पता है कि पेंच मेरी हथेली से चिपका रहा, और घंटी की आवाज़ कानों में ऐसे गूँजती रही जैसे दूर किसी मंदिर में लगातार बजती हुई कोई छोटी घंटी हो।

तीसरा आदमी।

वो जो आज भी जूते चमकाकर रखता है।

मैंने कमरे के कोने में रखा पानी का गिलास उठाया और एक साँस में पी गया। पानी गला नहीं उतरा। सीने पर ठहर गया। मैं उठकर दरवाज़े तक गया, बाहर आँगन में पापा की कुर्सी दिख रही थी, कुर्सी पर उनकी झुकी हुई पीठ। वो गली की तरफ़ मुँह किए बैठे थे, ठीक जैसे कहा था — दीये की तरफ़ नहीं।

मैंने पेंच को जेब में डाला।

पर पेंच जेब में भी गरम था।

तभी पीछे माँ की आवाज़ आई — "अंकुश, सो जा। सुबह जल्दी उठना है।"

मैंने सिर हिलाया और चारपाई पर लेट गया, पर आँख बंद करने पर भी वही दिख रहा था — एक बच्चा, तीन साल का, दुकान के फ़र्श पर बैठा। हाथ में पीतल की घंटी। वो बजा नहीं रहा। वो सुन रहा है। और दरवाज़े पर किसी के चमकते जूतों की नोक दिख रही है।

सुबह मैं उठा तो धूप खिड़की पर आ चुकी थी।

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