The Mysterious Bell872 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 872

7 min read November 5, 2026

वो अपना था।

और अपनों से मिलने के लिए चाबी नहीं चाहिए होती।

बस… हिम्मत चाहिए होती है।

और वो, आज रात, मेरे पास थी।

या शायद नहीं थी।

पर मैं वादा करता हूँ, कल सुबह, वो होगी।

क्योंकि अब मुझे पता था कि मेरे अंदर जो खाली था, वो कोई याद नहीं थी।

वो कोई इंसान था।

और वो मेरे ही घर में साँस ले रहा था।

॥

सुबह की पहली किरण खिड़की से आई, तो मैं उठकर बैठा था। रात भर आँख नहीं लगी। वो धुन मेरे भीतर चलती रही, धीरे-धीरे, जैसे कोई बंद कमरे में बैठकर गुनगुनाता रहे और बाहर आने का रास्ता न ढूँढ पाए।

मैंने पहले अपने कानों को सुना। फिर कमरे को। फिर घर को।

कुछ नहीं।

बस पंखे की धीमी चरचराहट, और बाहर से आती कबूतरों की फड़फड़ाहट।

मैंने कंबल हटाया और चारपाई से उतर गया। पैर नंगे थे। फ़र्श ठंडा था।

मैंने अपने कमरे के हर कोने को देखा — जैसे पहली बार देख रहा हूँ।

कोई छिपा हुआ नहीं है। कोई दरवाज़ा नहीं। कोई दरार नहीं।

फिर मैं बाहर आया। आँगन में सन्नाटा। पीपल की पत्तियाँ हल्की हवा में हिल रही थीं।

माँ चूल्हे पर बैठी थीं। चाय का पानी चढ़ा था। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा।

"माँ," मैंने कहा। "मुझे घर में कुछ ढूँढना है।"

"क्या?"

मैं रुक गया। मैं कैसे बताऊँ कि मुझे क्या ढूँढना है? वो जो आवाज़ है, जिसका नाम मुझे नहीं पता, जिसका चेहरा मैंने कभी नहीं देखा, जो मेरे ही घर में कहीं साँस ले रही है?

"पता नहीं," मैंने सच कहा। "कुछ ऐसा जो पापा के भाई से जुड़ा हो।"

माँ ने चूल्हे में लकड़ी डाली।

"घर के हर बक्से में देख ले," उन्होंने कहा। "मैंने भी कभी नहीं देखा कि उनका कुछ बचा है। पर देख लेना।"

मैंने पीछे वाले कमरे से शुरुआत की।

वहाँ पापा के औज़ारों का ट्रंक था। बड़ा, भारी, लोहे का। ढक्कन खोला, तो पुरानी ग्रीस और लोहे की गंध उठी। हथौड़े, पेचकस, रिंच, कीलें, चमड़े की पट्टियाँ, टूटे ताले की ज़ंजीरें। मैंने एक-एक चीज़ निकाली और नीचे रखी। ट्रंक की तली में सिर्फ़ धूल और ज़ंग के कुछ टुकड़े थे।

मैंने अलमारी खोली। माँ की साड़ियाँ, पापा की कुर्ते, काजल के पुराने कपड़े। सबसे ऊपर एक मोटा बंडल मिला — किसी पुराने तौलिये में लिपटा। खोला, तो उसमें एक बच्चे की कमीज़ थी। बहुत छोटी। इतनी छोटी कि मेरी हथेली में आ जाए। नीली रंग, ऊपर छोटे सफ़ेद फूल। किसी ने ध्यान से मोड़कर रखी थी।

यह मेरी नहीं हो सकती। काजल के कपड़ों से भी छोटी।

मैंने उसे वापस मोड़ा। मगर उसकी गंध हथेली पर रह गई। पुराने साबुन और धूप की गंध।

फिर मैं चूल्हे के पीछे गया।

वो दरवाज़ा अब भी वहीं था। बंद। कुंडे पर ज़ंग। दरवाज़े की लकड़ी पर लिखा वो पुराना निशान — दो लकीरें, बीच में बिंदु — अब भी मौजूद था। मैंने उसे उँगली से छुआ। ठंडा था।

मैंने कान लगाकर सुना। कुछ नहीं।

फिर मैंने धीरे से कहा, "शंकरलाल?"

कोई जवाब नहीं।

"शंकरलाल," मैंने फिर कहा, थोड़ा ज़ोर से।

दरवाज़े के पीछे से बस हवा की एक लकीर निकली, जो मेरे कान को छूकर चली गई।

मैं उसी जगह खड़ा रह गया।

फिर माँ आई। हाथ में चाय का गिलास था।

"देख लिया?" उन्होंने पूछा।

"कुछ नहीं मिला," मैंने कहा। "माँ, मुझे समझ नहीं आता। अगर वो घर में है, अगर वो यहीं है, तो दिखता क्यों नहीं? सुनाई क्यों नहीं देता?"

माँ ने गिलास मेरे हाथ में रखा और दरवाज़े की तरफ़ देखा।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "चुप्पी को कोई ढूँढता नहीं। ढूँढने से वो मिलती नहीं।"

"तो फिर कैसे मिलेगी?"

"बोलकर," उन्होंने कहा। "जो चुप है, वो सिर्फ़ तब खुलता है जब कोई उसे नाम से पुकारे। और पुकारने के लिए ज़रूरी नहीं कि वो जवाब दे। पुकारना काफ़ी होता है।"

"मैंने पुकारा," मैंने कहा। "शंकरलाल, मैंने पुकारा।"

माँ ने मेरे सिर पर हाथ रखा।

"एक बार में नहीं, अंकुश," उन्होंने धीरे से कहा। "यह कोई ताला नहीं है जो एक चाबी से खुल जाए। यह चुप्पी है। बाईस साल की। इसे खोलने के लिए हर दिन पुकारना पड़ेगा। हर दिन याद रखना पड़ेगा। तब जाकर वो इतनी पतली होगी कि उसके पीछे जो बैठा है, वो सुनाई देने लगेगा।"

मैंने चाय पी। गरम थी, पर अंदर तक गई।

काजल छह बजे आई, जैसे उसने कहा था। नर्सिंग का बैग बंद, बाल बँधे हुए, आँखों में नींद की जगह चिंता।

उसने मुझे देखकर कुछ नहीं पूछा। बस मेरे पास बैठ गई।

"माँ ने बताया," उसने कहा। "तू सुबह से ढूँढ रहा है।"

मैंने हाँ कहा।

"कुछ नहीं मिला?"

"सिर्फ़ एक कमीज़ मिली," मैंने कहा। "बहुत छोटी। पैक की हुई।"

काजल की आँखें सिकुड़ गईं।

"कहाँ है?"

"अलमारी में, तौलिये में लिपटी।"

वो उठकर अंदर गई और थोड़ी देर बाद लौटी। कमीज़ उसके हाथ में थी। उसने उसे खोला, कपड़े को उँगलियों के बीच रगड़ा।

"यह किसी बच्चे की है," उसने कहा। "मेरी उम्र के किसी बच्चे की।"

"मेरा नहीं," मैंने कहा।

"तेरा नहीं," काजल ने धीमे से कहा। "मैं तेरी बचपन की तस्वीरें देख चुकी हूँ। तेरे कपड़े और थे। यह किसी और का है।"

हम दोनों चुप हो गए।

फिर मैंने कहा, "हो सकता है कि यह उसी का हो। जो अब भी घर में है।"

काजल ने मेरी तरफ़ देखा।

"मतलब?"

"मतलब यह कि शंकरलाल सिर्फ़ नाम नहीं है, काजल," मैंने कहा। "वो किसी का बच्चा था। वो किसी की ज़िंदगी थी। वो किसी का… पूरा एक इंसान था। और हमारे घर में कहीं, किसी कोने में, उसका होना अब भी है। बस इतना है कि हम उसे देख नहीं पा रहे।"

काजल ने कमीज़ मोड़कर वापस तौलिये में रख दी।

"तो मिल," उसने कहा। "जब तू मिलेगा, तब मैं भी जानूँगी।"

और फिर घड़ी देखकर वो जल्दी से उठ खड़ी हुई। अस्पताल जाना था। माँ की दवा लेनी थी।

दुकान पर मैं दस बजे पहुँचा। शटर उठाया, तो अंदर से वो पुरानी ग्रीस और रबर की गंध आई, जो हर दिन आती है, पर आज कुछ अलग थी। आज उसमें कुछ था जो सुबह की हवा में तैर रहा था।

मैंने पेंच, बोल्ट, चाबियाँ मेज़ पर रखीं। बस कुछ भी करने को नहीं था। मन में सिर्फ़ वही दरवाज़ा घूम रहा था।

तभी मीरा आई। कैमरा इस बार साथ नहीं था। बैग तिरछा, बाल बिखरे। मगर आँखें तेज़ थीं।

"अंकुश," उसने दूर से ही कहा, "आज सुबह रणवीर के दफ़्तर से एक लिफ़ाफ़ा आया है।"

मैंने हाथ रोक दिया।

"किसको?"

"गली में," उसने कहा। "किसी लड़के ने दिया। मैं जानती हूँ यह क्या है। मैंने जबसे सुना है, सुबह से बैठी हूँ। यह लिफ़ाफ़ा किसी काम का नहीं है।"

"लिफ़ाफ़ा कहाँ है?"

"टिंकू के पास," उसने कहा। "वो लेकर आ रहा है।"

और जैसे उसने यह कहा, बाहर से पैरों की आवाज़ें आईं। बच्चों की भागदौड़। टिंकू सबसे आगे, हाथ में कुछ पकड़े हुए। पीछे सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू।

"उस्ताद!" टिंकू चिल्लाया, साँस फूली हुई। "उस्ताद! बड़ा साहब का बंद लिफ़ाफ़ा!"

सानिया ने हाँ में सिर हिलाया और थोड़ी साँस लेकर बोली, "सुनहरा है टिंकू। ऐसा लगता है जैसे किसी इनाम वाला काग़ज़ हो।"

मैंने वो लिफ़ाफ़ा अपनी तरफ़ बढ़ाया।

वो सच में सुनहरा था। नहीं, सुनहरा नहीं। रेशमी। पीले रंग का मोटा काग़ज़, ऊपर चमकती हुई परत, और कोने पर एक छोटी सी जगह खाली छोड़ी गई थी, जहाँ मुहर लगनी थी। बीच में मेरा नाम लिखा था, नीली स्याही में, साफ़ अक्षरों में।

टिंकू ने इसे मेज़ पर रखा और मैंने उँगली से छुआ। काग़ज़ मोटा था, किसी अच्छे दफ़्तर का।

मेरे पीछे मीरा खड़ी थी। उसकी आवाज़ आई, ठंडी, सपाट।

"खोल," उसने कहा। "पर मेरी बात याद रखना। इस लिफ़ाफ़े के अंदर जो है, वो न्योता नहीं है।"

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