The Mysterious Bell870 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 870

7 min read November 5, 2026

घंटी मेरी हथेली पर गरम थी और उसने "मिल गया" कहा था, फिर चुप हो गई। बिल्कुल चुप। जैसे किसी ने बात कह दी हो और अब जवाब माँगने से डर रहा हो।

मैंने तस्वीर वापस उलटी और फिर से पढ़ी।

जो याद बाँटी जाए वो कभी नहीं टूटती।

नीचे दो नाम। पहला मिटा हुआ। दूसरा — शंकरलाल।

मैंने उँगली उस मिटे हुए नाम पर फेरी। स्याही के ऊपर स्याही। रगड़ के निशान। कोई बैठकर, आराम से, जान-बूझकर, इतनी बार मिटाया था कि सिर्फ़ काग़ज़ की खुरदुराहट बची थी। जैसे किसी ने अपना ही नाम अपनी ही कहानी से चुपचाप हटा दिया हो। और इतना आराम से हटाया हो कि किसी को शक भी न हो।

कमरे में बल्ब गुनगुना रहा था, जैसे हर रात गुनगुनाता है, पर आज उसकी आवाज़ मुझे अजीब लग रही थी। जैसे वो भी चुप होकर कोई बात सुन रहा हो।

मैंने घंटी को जेब में डाला और तस्वीर हाथ में पकड़कर बाहर निकला।

घर में बत्ती जल रही थी।

माँ चूल्हे के पास बैठी थीं, पर चूल्हा बंद था। बस वो वैसे ही बैठी थीं, हाथ में कपड़ा लिए, आँखें नीची। काजल अपने कमरे से दवा का डिब्बा लेकर आ रही थी। पापा आँगन के छोर पर पुराना पंखा खोलकर बैठे थे — आज उन्होंने उसे तोड़ने की कोशिश नहीं की थी, बस फर्श पर रखकर उसे देख रहे थे।

मैं सीधा माँ के पास गया और तस्वीर उनकी गोद में रख दी।

"माँ।"

उन्होंने तस्वीर देखी। पहले सामने वाली तरफ़ — शिवनारायण यादव, इलाही बक्श, बीच से कोई काटा हुआ। फिर उन्होंने उसे पलटा।

और उनकी उँगली उस लिखाई पर रुक गई।

"यह मेरे…" उनका गला रुंध गया। "यह मेरे ससुर की लिखाई है।"

"कैसे पता, माँ?"

"पापा की लिखाई जैसी है," उन्होंने कहा। "बस उनकी बड़ी L थोड़ी और खुली होती थी। यह नीचे वाली L सीधी है। पर बाक़ी सब वही है। वही झुकाव, वही धैर्य। शंकर भी ऐसे ही लिखता है, बस जल्दी में।"

पापा ने सिर उठाया।

"क्या कहा?" उनकी आवाज़ आई।

"आ जाओ," माँ ने कहा, "अपने बाप की लिखाई देख लो।"

पापा उठे। धीरे-धीरे आए। चश्मा कान पर टेप से बँधा था, और जब वो झुके तो चश्मा नाक पर लुढ़कने लगा। उन्होंने उसे उँगली से सही किया और तस्वीर के पीछे देखा।

बहुत देर तक कुछ नहीं बोले।

फिर बस इतना कहा, "हाँ। यह बाबा की लिखाई है।"

"और यह नाम?" मैंने उस मिटे हुए नाम पर उँगली रखी।

पापा ने सिर हिलाया।

"पता नहीं।"

"पापा—"

"सच में नहीं पता," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो थकान थी जो अब मुझे रोज़ सुनाई देती थी। "बाबा ने बहुत कुछ नहीं बताया। कुछ चीज़ें वो ऐसे रखते थे जैसे… जैसे किसी बीमार आदमी के ऊपर कंबल डाल देते हों। ताकि ठंड न लगे। ताकि कोई देख न ले।"

"शंकरलाल कौन है?"

उन्होंने सिर नीचा कर लिया।

"मुझे नाम याद है," उन्होंने धीमे से कहा। "बचपन में एक बार बाबा ने सपने में या बुखार में या… पता नहीं… किसी को पुकारा था। शंकरलाल! ऐसे पुकारा जैसे कोई बड़ा भाई हो। पर जब मैंने पूछा तो उन्होंने कहा — भूल जा।"

"और तुमने भूल गए?"

"मैंने कोशिश की," पापा ने कहा। "और मैंने कभी कोशिश नहीं छोड़ी।"

काजल ने दवा का डिब्बा मेज़ पर रखा और पास आकर बैठ गई।

मैंने तस्वीर उठाई और फिर पढ़ा — जो याद बाँटी जाए वो कभी नहीं टूटती।

"माँ," मैंने कहा, "तुमने कहा था कि तुम्हें कोई पुरानी धुन याद है।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"हाँ।"

"कौन सी? गुनगुनाओ ना।"

वो कुछ देर चुप रहीं। फिर उन्होंने आँखें बंद कर लीं और गुनगुनाने लगीं।

और वो धुन…

मैं जानता था वो धुन।

मैं उसे जानता था, हर सुर जानता था, हर मोड़ जानता था। उसे सुनकर मेरी छाती में कुछ ऐसा हिला जैसे बंद कमरे में कोई पुराना पर्दा हवा से सरक गया हो।

पर शब्द नहीं आ रहे थे।

मैं धुन के साथ होठ हिला रहा था, पर होंठों से कुछ नहीं निकल रहा था। मुझे पता था वहाँ कुछ कहा जाना चाहिए। मुझे पता था कुछ ऐसा है जो उस धुन के साथ गाया जाता था। कुछ…

पर खाली।

बिल्कुल खाली।

जैसे किसी गाने के शब्द पन्ने से मिटा दिए गए हों और धुन बच गई हो। जैसे किसी किताब के पन्ने फाड़ दिए गए हों और सिर्फ़ ऊपर का हाशिया बचा हो।

मेरी आँखें भर आईं।

मैंने पलकें झपकीं और पोंछ लीं। "माँ, यह धुन कहाँ से?"

"मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा। "मुझे बस याद है। जब मैं तुम्हारे पापा के घर आई थी, तब भी यह धुन मुझे आती थी। और जब तुम पैदा हुए… जब तुम रोते थे तो मैं इसे गुनगुनाती थी। और तुम चुप हो जाते थे।"

"मैं चुप हो जाता था?"

"हाँ," माँ ने कहा, और उनकी आँखों में कुछ नरमी आई। "जैसे तुम्हें पता हो कि यह किसकी धुन है।"

मैं कुछ देर बैठा रहा।

फिर मैं पापा की तरफ़ मुड़ा।

"पापा," मैंने कहा। "जब मैं पहली बार दुकान पर आया था — मतलब, जब तुम मुझे लाए थे — तब क्या हुआ था? मुझे याद नहीं।"

पापा ने मेरी तरफ़ देखा। फिर नीचे देखा।

और उन्होंने कुछ देर सोचा, जैसे किसी पुराने दराज़ को खोलने की कोशिश कर रहे हों जिसकी चाबी खो गई हो।

"तू बहुत छोटा था," उन्होंने कहा। "दस साल का। तू उस रात सो नहीं रहा था। तेरी माँ बीमार थी, डॉक्टर के पास जाना था, मैं तुझे दुकान पर ले गया था, कहा कि रात यहीं सो जाना।"

"फिर?"

"फिर कुछ नहीं," पापा ने कहा।

"कुछ तो हुआ होगा, पापा।"

वो चुप रहे।

"पापा।"

"तू रोया नहीं," पापा ने धीमे से कहा। "मैं तुझे दुकान के पीछे वाले कमरे में ले गया, तुझे चारपाई पर लिटाया, और मैंने सोचा तू रोएगा। तू नहीं रोया। तू बस मुझे देखता रहा। और मैंने अपने हाथ से घंटी निकाली — तेरी दादी की घंटी थी, बाबा के पास थी, मेरे पास आई — और मैंने वो तेरी कलाई पर बाँध दी।"

"कलाई पर?"

"हाँ," पापा ने कहा। "और मैंने कहा… मैंने कहा, 'यह सुनते रहना। मैं आ जाऊँगा।'"

मैंने गला साफ़ किया।

"और फिर?"

"फिर," पापा ने कहा, "मैं गया।"

"और मैं?"

"तू सो गया।"

कमरे में बहुत देर तक चुप्पी रही।

फिर पापा ने धीमे से कहा, "सुबह जब मैं लौटा, तो तू जाग रहा था। घंटी तेरे हाथ में थी। और तू… मुस्कुरा रहा था।"

"क्या मैंने कुछ कहा था?"

पापा ने सिर हिलाया।

"मैंने पूछा कि क्या हुआ, तो तूने कहा कि कोई आया था। मैंने पूछा कौन। तो तूने कहा कि वो गा रहा था और उसने तुझे नाम से पुकारा।"

मेरा दिल एक धड़कन रुक गया।

"क्या नाम से?"

"मुझे याद नहीं क्या नाम," पापा ने कहा। "तू उस वक़्त नन्हा था। और मैंने उस वक़्त… मैंने उस वक़्त तुझे गंभीरता से नहीं लिया। मैंने सोचा सपना देखा।"

और फिर, बहुत धीमे से, पापा ने जोड़ा, "मुझे आज तक पछतावा है कि मैंने तुझे गंभीरता से क्यों नहीं लिया।"

कमरे में बल्ब फिर गुनगुनाया।

मैं उठा और बाहर आँगन में चला गया।

रात ठंडी हो रही थी। पीपल का पेड़ अंधेरे में एक बूढ़े की तरह खड़ा था। गली की नाली में पानी की आवाज़ आ रही थी, जैसे कोई बहुत दूर से गा रहा हो।

मैंने घंटी जेब से निकाली और हथेली पर रखी।

वो अब ठंडी थी।

मैंने उसे हिलाया। कुछ नहीं हुआ।

"सुन," मैंने धीमे से कहा। "मैं तुझसे एक बात पूछूँगा और सच बताना, झूठ नहीं।"

चुप्पी।

"उस दिन, जब मैं दस साल का था और मैंने पापा से कहा कि कोई आया था जो गा रहा था — वो कौन था?"

कुछ देर कोई जवाब नहीं आया।

फिर घंटी हिली।

बहुत हल्की।

"बता," मैंने कहा।

और घंटी बोली, धीमे से, जैसे किसी पुराने टेप की आवाज़:

"जो गाता है, वो बंद नहीं होता। बंद की हुई आवाज़ गाती नहीं।"

"मेरा सवाल टाल मत," मैंने कहा। "मेरे अंदर एक कोना खाली है, और मुझे लगता है वो…"

मैं रुक गया।

मेरी आवाज़ भर आई थी।

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