The Mysterious Bell – Chapter 861
कमरे में फिर चुप्पी। पर इस बार चुप्पी में कुछ था — कुछ गरम, कुछ जैसे चूल्हे पर रखा दूध, जो धीरे-धीरे उबल रहा हो।
मैंने डायरी बंद कर दी। हथेली उस पर रख दी, जैसे उसे सहारा दे रहा हूँ।
"तो मेरे दादा चुप रहे," मैंने कहा, बिना किसी को दोष देते हुए।
"वो चुप नहीं रहे।" भवानी प्रसाद ने कहा। "नहीं रहे। उन्होंने उस दिन मुझसे सिर्फ़ चुप्पी की शर्त नहीं ली थी। उन्होंने मुझे एक और बात कही थी।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"उन्होंने कहा — भवानी भाई, अगर एक दिन कोई ये काग़ज़ फिर निकाले, तो उसे मेरी तरफ़ से एक बात कह देना।"
"क्या?" काजल ने पूछा। उसकी आवाज़ धीमी हो गई थी।
"उन्होंने कहा — कह देना कि मैंने एक हज़ार रुपये जमा किए थे। अपनी तरफ़ से, चुपचाप, किसी को न बताकर। उस वक़्त एक हज़ार बहुत थे। मैंने उन्हें कहा कि ये पैसे किस लिए, तो उन्होंने कहा — इलाज के लिए। यह ज़मीन अस्पताल के लिए है। मेरा हिस्सा उस ज़मीन में मिले तो इलाज के काम आए। और उस दिन कोई पूछे कि यादव ने क्या दिया था, तो कह देना — उसने एक हज़ार दिए थे और उसका नाम भी लिखवाया था पर पढ़ने से मना कर दिया था।"
मेरा दिमाग़ एक झटके में पीछे चला गया।
मुझे याद आया।
दुबे अंकल।
दो दिन पहले, थाने के बरामदे में, मेरी जेब में एक पीला पुराना लिफ़ाफ़ा रखते हुए उन्होंने कहा था — "ये मत खोलना, सबके सामने खुलेगा।" मैं उसे घर लाया था, संदूक के ऊपर रखा था… नहीं, नहीं, मैंने उसे अपनी कमीज़ की अंदरूनी जेब में रखा था और वो जेब बदलते वक़्त औज़ारदान के ऊपर रखे कपड़ों में चली गई थी।
मैंने अपनी कमीज़ के नीचे हाथ डाला — नहीं, नहीं।
फिर मुझे याद आया। कल रात, दुकान के पीछे वाले कमरे में, जब मैंने औज़ारदान खोला था, एक पीला लिफ़ाफ़ा नीचे गिरा था। मैंने उसे उठाया था और मेज़ के दराज़ में रख दिया था, यह सोचकर कि सुबह देखूँगा।
"एक मिनट," मैंने कहा, और उठा।
टिंकू की तरफ़ देखा। "टिंकू, मेरी जेब में — नहीं। घर जाना पड़ेगा। नहीं, मेज़ के दराज़ में है — दुकान पर।"
"क्या है?" काजल ने पूछा।
"दुबे अंकल का दिया हुआ पीला लिफ़ाफ़ा।" मैंने कहा। "दो दिन से खोलना था। सबके सामने खोलना था। आज सुबह जल्दबाज़ी में भूल गया।"
भवानी प्रसाद ने धीरे से सिर हिलाया, जैसे उन्हें भी कुछ याद आया हो।
"तो जब घर जाओ," उन्होंने कहा, "तो एक बार काग़ज़ देखना। शायद वो काग़ज़ कुछ कहे।"
"नहीं," मैंने कहा। "अभी देखता हूँ।"
मैंने फ़ोन निकाला। टिंकू ने मुझे देखा।
"आप यहाँ रुकेंगे?" मैंने भवानी प्रसाद से कहा। "मैं टिंकू को भेजता हूँ। दुकान की मेज़ के ऊपर वाले दराज़ में पीला लिफ़ाफ़ा है। लेकर आए वो।"
"अंकुश," काजल ने कहा। "इतनी देर में—"
"कुछ नहीं होगा," मैंने कहा। "अगर वो काग़ज़ कुछ कहता है, तो अभी कहना चाहिए। क्योंकि अगली बात चाचा जी की है, और उनकी बात बाद में सुनेंगे तो देर हो जाएगी।"
टिंकू बिना कुछ पूछे खिड़की की तरफ़ बढ़ गया। लोहे की सीढ़ी से उतरते वक़्त उसकी पट्टी वाली गोद फिर से फिसली, पर वो सँभल गया। उसने पीछे मुड़कर मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वही पुरानी बात थी — "उस्ताद, मैं सही जगह हूँ ना?"
मैंने सिर हिलाया। वो उतर गया।
भवानी प्रसाद ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था, पहचान जैसा। जैसे वो मुझमें किसी को देख रहे हों — किसी को नहीं, किसी का कोई पुराना हिस्सा।
"तेरे दादा जैसे हो," उन्होंने कहा। "वही चाल, वही जल्दी, वही ज़िद। फ़र्क़ बस इतना कि वो शिकायत नहीं करते थे, और तू सब कुछ खोलकर रख देता है।"
"मैं उनकी गलती नहीं दोहराना चाहता," मैंने कहा। "वो चुप रहे। मैं नहीं रहूँगा।"
भवानी प्रसाद ने कुछ सोचा, फिर धीरे से बोले, "बात चुप रहने की नहीं है बेटा। चुप्पी में हिसाब होता है। तेरे दादा ने शिकायत नहीं की, पर उन्होंने एक हज़ार रुपये दिए और उसका नाम भी लिखवाया। उन्होंने काग़ज़ पर अपना हक़ छोड़ा — नहीं, माफ़ करना, उन्होंने काग़ज़ पर अपना कर्तव्य निभाया। यही फ़र्क़ है शिकायत और कर्तव्य में। शिकायत एक काग़ज़ पर जाती है, कर्तव्य काग़ज़ से निकलकर लोगों में जाता है। तेरा दादा उस दिन शिकायत लिए थाने नहीं गया, पर उसने एक काग़ज़ पर पैसे लिखवाए, और उस काग़ज़ को वो अपने साथ ले गया। उसने वो काग़ज़ नहीं जलाया। उसे नहीं फाड़ा। उसे अपने पास रखा। यह भी कोई चीज़ कहती है।"
काजल ने धीरे से कहा, "तो मतलब वो काग़ज़ कहीं है?"
"वो काग़ज़ कहीं है," भवानी प्रसाद ने कहा। "वो रसीद किसी शख़्स के पास होनी चाहिए। वो तेरे दादा के पास रही होगी, फिर तेरे पापा के पास।"
मेरे पापा। मेरी आँखें खुल गईं।
तभी खिड़की से टिंकू की आवाज़ आई, "उस्ताद!"
मैं गया, खिड़की से झाँका। टिंकू नीचे, गली के मुहाने पर खड़ा था, हाथ में पीला लिफ़ाफ़ा लिए।
"मिल गया! मैं दुकान की दराज़ से लाया — और उस्ताद, दुकान के बाहर कुछ काग़ज़ चिपका है, कोई नोटिस है—"
"अभी चढ़ आ," मैंने कहा।
वो सीढ़ी से ऊपर आया, आखिरी सीढ़ी पर हाँफते हुए, लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। पीला पुराना काग़ज़, ऊपर बिना नाम-मोहर।
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक ही काग़ज़ — पुरानी रसीद, भूरे किनारों वाली, जिस पर नीली स्याही में लिखा था:
जगदीश यादव — एक हज़ार रुपये — अस्पताल के लिए — शेष काग़ज़ दफ़्तार में जमा।
और मैंने उसे पलटा।
पीठ पर, हाथ से लिखी एक छोटी लाइन — मेरे दादा की लिखाई — पतली सी, काँपती हुई, पर सीधी:
सच कभी पुराना नहीं होता।
मेरे हाथ काँप गए।
काजल ने मेरी तरफ़ देखा। "क्या है?"
मैंने रसीद उसकी तरफ़ बढ़ाई। उसने पढ़ी। टिंकू ने भी पढ़ी, अपनी छोटी उँगली रसीद पर रखकर, जैसे उसे भी कुछ हो रहा हो।
"तेरे दादा ने एक हज़ार दिए थे," भवानी प्रसाद ने धीरे से कहा, कमरे में एक ख़ामोशी के बाद, "और तेरे पास उसका सबूत है। यह रसीद एक बात कहती है — यह ज़मीन किसी एक की नहीं है, यह उन सबकी है जिन्होंने इस पर अपना हक़ नहीं, अपना हिस्सा डाला।"
"मगर ये तो…" मैंने कहा, आवाज़ मुझे अपनी ही सुनाई दी, "ये तो सिर्फ़ एक हज़ार।"
"एक हज़ार सिर्फ़ रकम नहीं है, बेटा," उन्होंने कहा। "यह एक हज़ार भरोसा है। किसी आदमी ने अपने पैसे उस जगह पर डाले जो उसके नाम नहीं थी, सिर्फ़ इसलिए कि वहाँ लोगों का इलाज चलता था। यह ज़मीन अगर आज किसी ठेकेदार की है, तो कल से नहीं होगी।"
"तो अब क्या करना होगा?" मैंने पूछा। "ये रसीद दिखाकर?"
"ये रसीद दिखाने से कुछ नहीं होगा।" भवानी प्रसाद ने सीधे कहा। "क्योंकि यह रसीद किसी दफ़्तार में है ही नहीं। यह किसी चेस्ट में बंद है, किसी घर में, किसी दराज़ में। कचहरी में इसका कोई रिकॉर्ड नहीं। अब तक तो नहीं था।"
वो थोड़ी देर तक मेरी तरफ़ देखते रहे।
"अब तुम्हारे पास दो चीज़ें हैं," उन्होंने कहा। "रजिस्टर, और डायरी। इन दोनों के अलावा एक तीसरी चीज़ चाहिए — वो काग़ज़ जिस पर सबने अंगूठा लगाया था। असली वाला। जिस पर तेरे दादा के भी अंगूठा है। वो काग़ज़ काग़ज़ नहीं, काग़ज़ पर लगा निशान है — जिसे मिटाया नहीं जा सकता।"
"वो काग़ज़ कहाँ है?" मैंने पूछा।
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