The Mysterious Bell – Chapter 859
कमरे में छत का पंखा मुड़े ब्लेड के साथ धीरे घूम रहा था। उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीढ़ियाँ चढ़ते हुए हाँफ रहा हो। खिड़की से आती धूप में धूल के कण तैर रहे थे, और मुझे लगा कि ये धूल भी उसी दफ़्तार के किसी पुराने काग़ज़ से उड़ी है।
मैंने लाल डायरी अपनी गोद से उठाई। जिल्द उखड़ रही थी, कोने फटे थे, और ऊपर हाथ से लिखा था — जिसे पढ़ना हो, पढ़ ले।
"ये डायरी किसकी है?" मैंने पूछा। "ये रणवीर की नहीं लगती। उसकी लिखाई मोटी है, दबाकर लिखता है, जैसे काग़ज़ को सज़ा दे रहा हो। ये लिखाई पतली है और ऊपर की लाइन में विनती है। रणवीर किसी से विनती नहीं करता।"
भवानी प्रसाद ने पहली बार मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने कोई इम्तिहान पास कर लिया हो, बिना तैयारी के।
"अच्छा देखा तूने।" उन्होंने कहा। "तेरे दादा भी ऐसे ही देखते थे। काग़ज़ पढ़ने से पहले आदमी पढ़ते थे।"
"तो ये किसकी है?"
"ये रणवीर की पहली बीवी की है।" उन्होंने कहा।
काजल ने मेरी तरफ़ देखा। "पहली बीवी?"
"हाँ। नाम नहीं बताऊँगा, क्योंकि नाम बताते ही उसका कोई न कोई रिश्तेदार उठ खड़ा होगा और सवाल पूछेगा कि तुमने उसके घर की बात क्यों खोली। पर इतना बता दूँ — वो औरत इस दफ़्तर के कोने वाले कमरे में बैठती थी और हर उस काग़ज़ की नक़ल रखती थी जिस पर अंगूठा लगता था। उसे शक था।" उन्होंने धीरे से कहा। "औरतों को शक नहीं होता, बेटा — उन्हें दिखता है। बस हम सुनते नहीं।"
"उसने ये सब लिखा?"
"उसने नाम लिखे। तारीख़ें लिखीं। किसके अंगूठे से क्या हुआ, कितना पैसा दिया गया, किसका डर इस्तेमाल हुआ, किसको कहा गया कि चुप रहो वरना तुम्हारा नाम भी इसी काग़ज़ पर चढ़ जाएगा।" उन्होंने डायरी की तरफ़ देखा। "रजिस्टर आधा सच है। रजिस्टर में सिर्फ़ वो है जो दफ़्तर के हिसाब में आया। डायरी में वो है जो दफ़्तर के बाहर हुआ। जो चाय की गुमटी में हुआ, जो अस्पताल के गलियारे में हुआ, जो रात के ग्यारह बजे के बाद हुआ।"
काजल ने कहा, "और उस औरत का क्या हुआ?"
भवानी प्रसाद ने कुछ देर छत की तरफ़ देखा। "वो चली गई। एक दिन काग़ज़ देखने के बाद उसने अपना बैग उठाया, मुझे ये डायरी दी और कहा — मुंशी जी, मैं ये अपने साथ नहीं ले जा सकती, बच्चे हैं। आप रख लो। जिस दिन कोई इसे माँगे, दे देना। किसी भी आदमी को नहीं, बस उसको देना जिसके नाम के आगे सच लिखा हो।"
"और आपने बाईस साल किसी को नहीं दी?" मैंने पूछा।
"मैंने बाईस साल किसी को उस लायक नहीं पाया।" उन्होंने कहा। "बहुत आए। कुछ डरकर आए, कुछ लालच में आए, कुछ सिर्फ़ कौतूहल में आए। पर ऐसा कोई नहीं आया जिसके नाम के आगे सच लिखा हो।"
वो मेरी तरफ़ देखकर रुके।
"आज पहली बार लगा कि मैं इसे दे सकता हूँ।"
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने डायरी खोली।
पन्ने पीले थे, नीली स्याही हल्की पड़ चुकी थी। कहीं-कहीं स्याही फैली थी, जैसे लिखते वक़्त हाथ काँपा हो या पोंछने की जल्दी हुई हो। मैंने पन्ने पलटे। बीच में एक पन्ना ऐसा आया जिसका किनारा मुड़ा हुआ था, जैसे बार-बार खोला गया हो, इतनी बार कि काग़ज़ ने हार मान ली हो।
उस पर लिखा था — जगदीश यादव।
मेरे हाथ रुक गए।
टिंकू मेरे कंधे के ऊपर से झाँका और उसने भी पढ़ा। उसके मुँह से बस एक आवाज़ निकली, वो आवाज़ जो लोग तब निकालते हैं जब कुछ ऐसा दिख जाए जिसकी उम्मीद नहीं थी पर डर भी नहीं था।
"उस्ताद, ये तो…"
"हाँ।" मैंने कहा। "मेरे दादा।"
नाम के नीचे तारीख़ थी। पच्चीस साल पुरानी। और उसके नीचे एक लाइन थी, छोटी, साफ़, बिना किसी सजावट के —
इस काग़ज़ को पढ़ने से मना कर दिया। घर चला गया।
मैंने वो लाइन दो बार पढ़ी। तीसरी बार पढ़ते वक़्त मेरी आवाज़ भी निकली, धीमी, "मना कर दिया?"
भवानी प्रसाद ने कुर्सी पर पीछे टेक लगाई।
"तेरे दादा उस दिन यहाँ आए थे," उन्होंने कहा। "मैंने उन्हें काग़ज़ दिया, कहा — पढ़ लो, फिर जो तुम्हारा मन करे। उन्होंने पढ़ा। दो लाइनें पढ़ीं, फिर काग़ज़ मेज़ पर रख दिया और कहा — ये काग़ज़ नहीं, ये जाल है। मैं इसे अपने घर नहीं ले जाऊँगा। मेरे घर में बच्चे हैं, उनके हाथ में काग़ज़ आया तो वो भी इसी जाल में फँसेंगे।"
"और वो थाने क्यों नहीं गए?" काजल ने पूछा। उसकी आवाज़ तेज़ थी, जैसे सवाल में पूरा शक डाल रही हो। "अगर काग़ज़ झूठा था तो शिकायत करते। सिपाही के पास जाते।"
"क्योंकि उन्हें लगा कि सच भी अगर शिकायत बनकर काग़ज़ में बंद हो गया, तो वो काग़ज़ ही उन्हें खा जाएगा।" उन्होंने कहा। "तेरे दादा कम पढ़े-लिखे नहीं थे, बेटी। वो समझते थे। उन्होंने देखा था कि इस दफ़्तर में काग़ज़ कैसे चलता है — किसी का नाम मिटता है, किसी का चढ़ता है, और किसी का नाम बस कट जाता है। उन्हें लगा कि अगर वो शिकायत करेंगे तो उनका नाम भी इसी सिलसिले में एक काग़ज़ पर चढ़ जाएगा और फिर हमेशा वहीं रहेगा — धूल में, रैक पर, किसी के दराज़ में।"
"तो वो गाँव चले गए?" मैंने पूछा।
"वो चुपचाप गाँव चले गए।" उन्होंने कहा। "बैलगाड़ी में, रात को। किसी को नहीं बताया। दुकान बेटे के हाथ में छोड़ गए। दुकान पर जो पीतल की पट्टी लगी थी, वो भी नहीं उतारी। बस चले गए। और जाते वक़्त बस इतना कहा —"…मेरे बेटे से कह देना, दुकान की इज़्ज़त काग़ज़ से नहीं, हाथ से चलती है।"
भवानी प्रसाद ने कप रख दिया। उसमें चाय बची भी नहीं थी, सिर्फ़ तली में भूरी परत बची थी, जैसे कोई पुरानी बात।
"तो अब तुम जान गए," उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "मैं कौन हूँ।"
"आप क्या थे, ये तो पता चल गया," मैंने कहा। "आप अब क्या हैं, ये भी बता दीजिए।"
उन्होंने खिड़की की तरफ़ देखा। बाहर भवन की दीवारें मुंह फेरे खड़ी थीं, सफ़ेद, साफ़, बिना किसी दाग़ के। मुझे लगा जैसे इमारत खुद अपना चेहरा छिपा रही हो।
"मैं यहीं रहता हूँ।" उन्होंने ऊपर की तरफ़ इशारा किया। "छत पर, पीछे की तरफ़, एक छोटा सा कमरा है। दो पंखे वाला। एक चलता है, दूसरा पुराना है, दिखावे के लिए लगा है। तीन साल पहले रिटायर हुआ।''
"आप…" टिंकू ने कहा, "आप साहब के साथ…" और वो रुक गया, इसे कोई सवाल नहीं बना पाया।
"मैं साहब के साथ नहीं था।" भवानी प्रसाद ने कहा, बिना जल्दी के। "मैं उनके काग़ज़ों के साथ था। हिसाब लिखता था। पैंतीस साल। हर रकम, हर अंगूठा, हर तारीख़, हर नाम। मैंने उन सबको लिखा जिन्हें तुम आज खोज रहे हो।"
काजल ने रजिस्टर अपने हाथ में उठा लिया था। उसे सीने से लगा रही थी, जैसे बहुत बोझ हो।
"तो आपने देखा," काजल ने कहा। "आपने सब देखा और…"
"और मैं चुप रहा।" उन्होंने उसकी बात पूरी की। "यही तो मेरा हिसाब बाकी है, बेटी। मैंने सिर्फ़ हिसाब लिखा, हिसाब नहीं दिया।"
"और आपकी अपनी ज़मीन?" मैंने पूछा। सवाल मुँह से ऐसे निकला जैसे कहीं गहरे से आया हो। "आपने कभी सोचा कि आपका क्या हुआ?"
वो हँसे। एक बार फिर वो छोटी हँसी। जैसे बहुत पुराना नल, जिसमें पानी बंद हो चुका है, पर टोंटी खोलने पर एक आख़िरी बूँद टपक जाती है।
"मेरा?" उन्होंने माथा खुजाया, जहाँ पुरानी सिकन थी। "बेटा, तीन साल पहले मैं रिटायर हुआ, तो मैंने एक काम खुद किया। मैंने अपनी ज़मीन की काग़ज़ उठाई। पुरानी फाइल, जो मेरे पिता के ज़माने से थी। मैं बैठा, चश्मा लगाया, पढ़ना शुरू किया।"
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