The Mysterious Bell – Chapter 857
“बंसी बाबा — पीतल की दुकान — ज़मीन — तीन हज़ार दिए — मगर दुकान खाली करने की तारीख़ आगे बढ़ी।”
मैं पलटता गया, पलटता गया, और पन्ने खत्म ही नहीं हो रहे थे। ये एक आदमी का रजिस्टर नहीं था, ये एक पूरी बस्ती का हिसाब था — हर टूटी हुई इच्छा का, हर मजबूर अंगूठे का, हर वो रात जब किसी ने अपना नाम लिखवाया और बदले में कुछ नहीं पाया।
और फिर मैं एक नाम पर अटक गया।
“शबनम — गुमटी — ज़मीन — किराया दस साल — खेलूराम के नाम से सील — बीस साल पहले।”
नीचे एक छोटी लाइन थी, जो किसी और हाथ से लिखी गई थी, जैसे बाद में जोड़ी गई हो।
“शबनम की माँ — भर्ती — अस्पताल — तीन महीने — दवा — मना।”
मैंने आँखें बंद कर लीं। गुमटी की छत पर बैठकर जो रसीदें रज़िया लाई थीं — वो इसी लाइन से जुड़ी थीं। शबनम आपा की माँ का नाम इस रजिस्टर में एक इंसान की तरह नहीं था। वो एक ख़र्चे की लाइन थी। एक हिसाब था। एक दरवाज़ा बंद करने का बहाना था।
मैंने धीरे से कहा, “टिंकू, काजल को बता दे कि हमें रजिस्टर मिल गया।”
टिंकू खिड़की की तरफ़ बढ़ा, पर तभी…
सीटी बजी।
वो पतली सी आवाज़ — जो हमने तय की थी। दो बार, छोटी, फिर एक लंबी। मतलब कोई आ रहा है।
मैंने रजिस्टर अपनी जैकेट में डाला। लाल डायरी उसके ऊपर रखी। जैकेट का दोनों तरफ़ का दबाव एक साथ बढ़ा — मुझे लगा जैसे मैं दो बच्चों को गोद में उठाकर भाग रहा हूँ, जो अभी बोलना सीख रहे हैं और जिनकी आवाज़ किसी और को सुनाई नहीं देनी चाहिए।
खिड़की पर काजल की आवाज़ आई, फुसफुसाती हुई, पर साफ़ — “अंकुश! सीढ़ी पर पाँव पड़े। कोई चढ़ रहा है। जल्दी कर!”
मैंने अलमारी का दरवाज़ा बंद किया। चाबी घुमाई। धूल वापस अपनी जगह आ गई — जैसे किसी ने वक़्त पलटकर पुरानी शक्ल ही दे दी हो।
काजल खिड़की पर पहुँच चुकी थी। उसका एक हाथ अंदर था, दूसरा बाहर के लोहे पर। “आ जा अंदर, मेरे पीछे।”
मैंने टिंकू को पहले भेजा। उसने एक झटके में खिड़की पकड़ी और बाहर। फिर मैं।
मैं अभी खिड़की पर पैर रख ही रहा था कि दरवाज़े की कुंडी की आवाज़ आई।
क्लिक।
मैं वहीं रुक गया — आधा अंदर, आधा बाहर।
दरवाज़ा खुला।
सफ़ेद टोपी। हल्की सफ़ेद दाढ़ी। हाथ में चाय का कप — पीतल का, पुराना, जिसके किनारे से भाप उठ रही थी। और वो खड़े थे दरवाज़े पर, मुझे खिड़की पर देखते हुए, और उनके चेहरे पर मुस्कान थी — वो मुस्कान जो डराती नहीं, पर अंदर तक देखती है।
मेरी साँस रुक गई।
वो बोले, “बेटा, मुझे उम्मीद थी कि तू चोरी नहीं करेगा। इसीलिए मैंने ताले की नक़ल वाली चाबी खुद गोविंद को दी थी।”
काजल ने खिड़की के बाहर से फुसफुसाया, “अंकुश, कौन है ये?”
मैंने उनकी तरफ़ देखा। कप से भाप उठ रही थी। कमरे में धूल थी, पर उनकी सफ़ेद टोपी पर एक भी कण नहीं था — जैसे वो इस कमरे में आए ही नहीं, जैसे कमरा उनके आने से पहले ही उनका था।
मैंने धीरे से कहा, “आप कौन हैं?”
वो मुस्कुराए। उन्होंने कप को अपने होंठों तक ले जाकर एक घूँट लिया, और फिर वो कप दीवार पर लगी रणवीर की तस्वीर के नीचे रखी पुरानी कुर्सी पर रख दिया। टूटी टाँग वाली कुर्सी पर रखा कप हिला नहीं।
“मैं वो हूँ,” उन्होंने कहा, “जिसका नाम इस रजिस्टर के पहले पन्ने पर नहीं है। और मैं यह भी जानता हूँ कि इस रजिस्टर के आख़िरी पन्ने पर क्या लिखा है। बैठ, बेटा। तेरे पैर खिड़की पर हैं और दिल दो जगह। यहाँ आकर बैठ। हम दोनों की बात होनी है। और इस बार चाय मेरी तरफ़ से।”
चलने से पहले, मेरी जेब में घंटी एक बार हिली। धीरे से। जैसे कोई बूढ़ा आदमी जानता हो कि आज मुलाक़ात लंबी होगी, और इसीलिए वो बस इतना कह रहा हो — “सुन ले।”
मैं खिड़की से उतरा। पैर ज़मीन पर पड़े तो धूल उठी और जूतों पर बैठ गई। कमरे में रोशनी कम थी और एक अजीब सी महक थी — पुराने काग़ज़ की, हल्की नमी की, और हल्की चाय की।
“बैठ,” उन्होंने फिर कहा, कुर्सी की तरफ़ इशारा करके। “वो टूटी है, पर तेरे जैसे लड़के के लिए काफ़ी है। जो आदमी ज़िंदगी में बार-बार झुकता है, उसके लिए टूटी कुर्सी भी बड़ी चीज़ होती है।”
मैं बैठ गया। जेब में रजिस्टर और डायरी दोनों दबी थीं। मुझे लगा वो मेरी जेब देख रहे हैं, पर उनकी नज़र मेरे चेहरे पर थी।
“आपने चाबी गोविंद भाई को दी,” मैंने कहा। “आपको कैसे पता चला कि मैं आऊँगा?”
“पता नहीं चला। उम्मीद की थी।” उन्होंने खिड़की की तरफ़ देखा, जहाँ काजल का साया दिख रहा था। “गोविंद रोज़ आता है। उस दिन आया और बोला, उस्ताद भारद्वाज के साथ एक लड़का घूम रहा है जो बातों से तराज़ू तोड़ देता है। मैंने सोचा, अगर ये लड़का सच में तराज़ू तोड़ने वाला है, तो इसे तराज़ू की चाबी देनी चाहिए, दरवाज़े की नहीं।”
“मतलब आप जानते हैं अलमारी में क्या है?”
“मैं जानता हूँ कि उसमें क्या नहीं है।” उन्होंने कप उठाया। “उसमें कोई पैसा नहीं है, कोई ज़ेवर नहीं। जो है, वो सिर्फ़ लिखा हुआ है। और लिखा हुआ ही उस आदमी की सबसे बड़ी दौलत थी।”
“रणवीर?” मैंने दीवार पर लगी तस्वीर की तरफ़ देखा।
“हाँ।” उनका हाथ कप पर ही रुका रहा। “मैं उसके पास बैठकर हिसाब लिखता था। पैंतीस साल। हर अंगूठा मैंने अपनी आँखों के सामने लगवाया। हर आदमी को मैंने रोका — भाई, सोच ले, ये काग़ज़ तेरा नहीं होगा। और वो मुझे ऐसे देखता जैसे कोई बुड्ढा रोटी के पास बैठा हो और हटाने का वक़्त आ गया हो।”
मैंने जेब से डायरी निकाली। “ये आपकी है?”
“ये मेरी आवाज़ है।” उन्होंने कप नीचे रखा। “रजिस्टर उसका था, डायरी मेरी थी। उसमें मैंने वो लिखा जो रजिस्टर में नहीं लिखा जा सकता था — कौन सुबह आया, कौन शाम को रोता हुआ लौटा, किसकी दवा रोकी गई, किसकी लड़की स्कूल से हटा दी गई।”
मैंने धीरे से कहा, “शबनम आपा की माँ का नाम भी उसमें है। रजिस्टर में।”
वो एक पल चुप रहे। उनके होंठ हिले, जैसे कोई पुराना दरवाज़ा बिना आवाज़ के खुल रहा हो।
“मुझे पता है,” उन्होंने कहा। “उस लाइन के नीचे जो जोड़ा गया, वो मेरे हाथ से जोड़ा गया। मैंने उसे लिखते वक़्त कलम दो बार रखी। दोनों बार उठाई। क्योंकि आदमी जब हिसाब लिखता है तो सोचता है कि ये काग़ज़ है, और जब किसी का नाम लिखता है तो पता चलता है कि ये काग़ज़ नहीं, कोई ज़िंदगी है।”
बाहर से टिंकू की खाँसी आई। धूल से उसका गला खराब हो रहा था। बूढ़े आदमी ने खिड़की की तरफ़ देखकर कहा, “अंदर आ जाओ, दोनों। सीढ़ी पर खड़े रहोगे तो पड़ोसी को शक होगा, और मुझे आज शक अच्छा नहीं लगता।”
काजल पहले उतरी, फिर टिंकू। काजल ने मेरे पास आकर रजिस्टर की तरफ़ देखा, फिर उनकी तरफ़।
“आप कौन हैं?” काजल ने सीधा पूछा। उसमें डर नहीं था, बस सवाल था।
“मुझे सब मुंशी कहते थे।” उन्होंने कंधे हिलाए। “अब कोई नहीं कहता। नाम से क्या होता है, बेटी? नाम तो तारीख़ की तरह होता है — बदल जाता है। काम बदलता है तो आदमी बदल जाता है।”
टिंकू ने धीरे से कहा, “मतलब आप उसके साथ थे?”
“मैं उसके साथ नहीं था। मैं उसके सामने बैठता था।” उन्होंने टिंकू की तरफ़ देखा। “फ़र्क़ समझता है ना तू? साथ होने में और सामने बैठने में? सामने बैठने वाला गवाह होता है, साथ वाला साथी। मैं गवाह था। और आज तक मुझे यही डर है कि गवाह को भी उसी काग़ज़ पर लिख देते हैं।”
मैंने कुर्सी पर से कहा, “आप चाहते क्या हैं?”
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