The Mysterious Bell – Chapter 851
और मेरी मुस्कान देखकर बबलू का चेहरा बदला, क्योंकि जिस आदमी को तुम गुस्से में देखने के लिए तैयार हो, उसकी मुस्कान तुम्हारे लिए सबसे बड़ी बेईमानी होती है।
"ठीक है भाई," मैंने कहा। "जाकर अपने साहब से कह दो — शंकर यादव का बेटा आज तीसरी मंज़िल की सीढ़ी चढ़ेगा।"
बबलू की भौंहें उठीं।
"और सुन लो," मैंने कहा, "वो चढ़ेगा भी बिना चोरी किए। दरवाज़ा खुलेगा, हम अंदर जाएँगे, काग़ज़ माँगेंगे। लिखकर माँगेंगे। मुहर लगाकर माँगेंगे। और अगर तुम्हारे साहब के पास उस काग़ज़ पर एक भी ऐसी लकीर है जो मेरे पापा के हाथ की नहीं, तो उसे आज ही सबके सामने दिखा दे।"
दरोगा जी ने कुर्सी घुमाई।
"अंकुश," वो बोले। उनकी आवाज़ में अब सिर्फ़ ऑफ़िस की नहीं, किसी पुराने सिपाही की थकान थी। "मैंने तुमसे कहा था — बिना हुक्म कुछ उठाया, तो चोरी कहलाएगा।"
"हुक्म चाहिए?" मैंने कहा। "तो लिख दीजिए, दरोगा साहब।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"आप एक काग़ज़ लिख दीजिए — माँग पत्र। कि थाना, भारद्वाज भवन की तीसरी मंज़िल पर रखे पुराने रजिस्टर को जब्त करने की अनुमति देता है, क्योंकि उस रजिस्टर का संबंध नूर अस्पताल की ज़मीन और उस ज़मीन पर बने काग़ज़ों से है, और उन काग़ज़ों पर एक के बाद एक अंगूठे लगे हैं, जिनमें मेरे पापा और मेरी माँ दोनों का नाम है। आप हस्ताक्षर कर दीजिए। बाक़ी काम मेरा।"
दरोगा जी ने अपनी घिसी नोक वाली कलम उठाई। उन्होंने मेज़ पर पड़े रजिस्टर के ऊपर एक खाली पन्ना रखा — वही रजिस्टर जिसमें आज सुबह पापा का बयान और माँ की चुप्पी दर्ज हुई थी — और लिखने लगे।
कलम फ़र्श पर रगड़ती हुई चल रही थी और उस आवाज़ में कुछ ऐसा था कि बबलू का चेहरा धीरे-धीरे सख़्त होने लगा। वो यह नहीं समझ पा रहा था कि जिस कमरे में वो बयान लिखवाने आया था, वहाँ उसकी आँखों के सामने एक और काग़ज़ बन रहा है।
"दरोगा साहब," उसने कहा। आवाज़ में वो मिठास अब मरने लगी थी। "आप क्या लिख रहे हैं?"
"जो तुमने सुना," दरोगा जी ने सिर उठाए बिना कहा। "इस कमरे में सबने सुना। तुम भी सुन लो।"
उन्होंने स्याही में कलम डुबोई, नीचे तारीख़ लिखी, और हस्ताक्षर के नीचे मोहर लगाकर पन्ना मेरी तरफ़ सरका दिया।
"ये लो," वो बोले। "और याद रखो — ये काग़ज़ तुम्हें कुछ नहीं देता। ये सिर्फ़ इतना कहता है कि जो कुछ करना है, खुलेआम करना है। तोड़ना है तो सामने से तोड़ना है।"
मैंने पन्ना उठाया। काग़ज़ ठंडा था, पर मेरे हाथ में वो गरम लगा।
बबलू ने एक बार मेज़ पर पड़े अपने पीले काग़ज़ की तरफ़ देखा, फिर मेरे हाथ के पन्ने की तरफ़, फिर मुंशी की तरफ़। मुंशी ने बहुत धीरे सिर हिलाया — वो हिलाना जो कहता है कि अब मैं कुछ नहीं कर सकता।
और मुझे उस वक़्त कुछ अजीब सा लगा। मुझे लगा कि बबलू इस कमरे में सबसे ज़्यादा डरा हुआ आदमी है, और उसका डर मुझसे या दरोगा से नहीं है। उसका डर उस चीज़ से है जो उसके पीछे बैठी है और जिसका नाम वो दिन में कभी नहीं लेता।
उसने अपनी चेन को एक बार फिर उँगली में घुमाया। फिर वो मुड़ा।
मुझे लगा बात खत्म।
मैंने सोचा, बबलू दरवाज़े से बाहर जाएगा, बरामदे से उतरेगा, गली में घुसेगा और सब खत्म। मैंने सोचा कि अब हम बैठकर तय करेंगे कि तीसरी मंज़िल कैसे पहुँचना है, कौन साथ जाएगा, कितने बजे।
पर वो दरवाज़े पर रुक गया।
उसका हाथ चौखट पर था। उसने बाहर बरामदे की तरफ़ देखा, जैसे कुछ देख रहा हो — फिर उसने देखा नहीं, बस देखने की ज़हमत नहीं की — और वो वापस मेरी तरफ़ मुड़ा।
और उसकी आवाज़ बदल गई थी।
अब उसमें मिठास नहीं थी। कोई नाटक नहीं था। एक ठंडी, सीधी बात थी, जैसे कोई बाज़ार में दाम बता रहा हो।
"अच्छा, एक बात सुन लो।" उसने कहा। "साहब ने बोला था कि ये बात कमरे में रखनी है। पर मुझे क्या? मैं तो हिसाब लिखने वाला आदमी हूँ, मुझे तो सब पता है, किसी को बताने का हक़ नहीं।"
उसने एक कदम आगे बढ़ाया। उसकी चप्पल फ़र्श पर रगड़ी।
"आज रात बारह बजे, तीसरी मंज़िल के दरवाज़े पर नया ताला लगेगा। अभी लग चुका है, बस ठीक बारह बजे उस पर सरकारी मुहर लगेगी। और उसकी चाबी सिर्फ़ एक आदमी के पास होगी।"
मैंने कुछ नहीं कहा। मैं सुन रहा था और मेरा दिमाग़ उस एक वाक्य में अटक गया था — बारह बजे।
"और वो आदमी," बबलू ने कहा, और इस बार उसने अपनी आवाज़ धीमी कर दी, इतनी धीमी कि दरोगा जी को कुर्सी घुमानी पड़ी, "आज रात तुम्हारे पापा से मिलना चाहता है। अकेले।"
कमरे में इतनी देर तक जो सन्नाटा था, वो अब एक और गहरा हो गया।
"कौन?" मैंने कहा।
बबलू ने पानदान वाला रूमाल जेब में डाला।
"ये तो साहब बताएँगे," वो बोला। "पर मैं इतना कह दूँ — वो कोई चपरासी नहीं है। वो वो आदमी है जिसके पास पुरानी चीज़ें लंबे समय तक टिकती हैं।"
फिर उसने अपनी जेब से कुछ निकाला। एक माचिस की डिब्बी। उसने उसे मेज़ पर रख दिया — फेंका नहीं, रखा। बड़े आराम से, जैसे कोई दवा की पुड़िया रखता है।
"और हाँ," उसने कहा, "तुमने जो आज सुबह थाने में अपने पापा की ज़ुबान बचाई — अच्छा किया। पर याद रखना, ज़ुबान भी एक काग़ज़ है। एक बार अंगूठा लग गया तो बदलता नहीं।"
वो मुड़ा और चला गया।
मुंशी उसके पीछे चला गया और जाते-जाते दरवाज़े की चौखट पर एक पल रुका — मुझे लगा वो कुछ कहेगा। पर वो सिर्फ़ अपना चश्मा सीधा किया और चला गया। काग़ज़ थमाने वाले कभी बोलते नहीं।
दरवाज़ा खुला रह गया। बाहर बरामदे की धूप अंदर आ रही थी और उसमें धूल के कण नाच रहे थे, जैसे कमरे में कुछ हुआ ही न हो।
मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे हाथ में दरोगा जी का लिखा पन्ना था और उँगलियों में ग्रीस की महक थी और मेरी जेब में घंटी अब भी गरम थी — काँप नहीं रही थी, बस गरम थी, जैसे बुखार में कोई चुपचाप पड़ा हो।
माँ ने पहले आवाज़ की।
"बारह बजे," वो बोलीं। उनकी आवाज़ बहुत सपाट थी। "यही तो वो वक़्त है जब ये लोग सीढ़ी बंद करते हैं। अस्पताल की भी सीढ़ी — बारह बजे। और अब तीसरी मंज़िल — बारह बजे।"
उन्होंने अपनी हिसाब की कॉपी खोली और उसका आख़िरी पन्ना देखा, जहाँ पाँच साल पहले उन्होंने अपने हाथ से लिखा था कि पापा ने अंगूठा लगाया और गलती उनकी भी है। फिर उन्होंने फाड़े बिना, बिना पन्ना पलटे, कॉपी बंद कर दी।
"बारह बजे क्यों?" मैंने कहा। "क्यों हर चीज़ बारह बजे?"
दुबे अंकल ने छड़ी उठाई और इस बार उन्होंने उसे हवा में ही रोक लिया, जैसे किसी पुरानी बात को पकड़ रहे हों।
"क्योंकि बारह बजे के बाद काग़ज़ पर तारीख़ बदल जाती है," वो बोले। "और जो काम तारीख़ बदलने के बाद हो, वो पिछली तारीख़ के काग़ज़ से नहीं टकराता।"
गोविंद भाई ने धीरे से कहा, "और बारह बजे बाद… शहर में कोई गवाह नहीं मिलता।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। वो फ़र्श पर पड़ी अपनी रसीदों वाली फाइल उठा रहे थे। उनके हाथ अब पहले से कम काँप रहे थे — यह मैंने नोटिस किया। डरते हुए आदमी का हाथ काँपता है, पर जब वो बोलने लगे तो हाथ स्थिर हो जाता है। यह मुझे इन्हीं को देखकर सीखने को मिला है।
"गोविंद भाई," मैंने कहा। "आप उस अलमारी की चाबी कब तक ला सकते हैं?"
उन्होंने अपना टूटा चश्मा उतारा और कुर्ते के पल्लू से पोंछकर फिर लगाया।
"आज दोपहर में," वो बोले। "पर अंकुश भाई, एक बात साफ़ कर लो। मैं साथ चलूँगा नहीं तो चाबी नहीं। और मैं चलूँगा तो रास्ते में तुम्हें वो भी बताऊँगा जो मैंने बाईस साल किसी को नहीं बताया।"
"क्या?"
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