The Mysterious Bell836 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 836

7 min read November 5, 2026

मैंने अपनी घंटी को हथेली में उठाया। वो पहले ठंडी थी। अब गरम थी, एकदम गरम, जैसे कोई उसे दोनों हाथों में लेकर सहला रहा हो। और मैंने देखा — घंटी के भीतर, जीभ के नीचे, पीतल की सतह पर एक धुँधली सी चमक जगी, एक छोटी सी लकीर, फिर दूसरी।

"अंकुश," टिंकू ने दरवाज़े से ही चिल्लाया, "अंकुश, घंटी के अंदर कुछ लिखा दिख रहा है!"

"बाहर खड़ा रह," मैंने कहा।

"पर तेरे हाथ में है, वो चमक रहा है —"

"बाहर खड़ा रह, टिंकू," मैंने दोहराया, और मेरी आवाज़ में वो चीज़ थी जो टिंकू को चुप करा गई।

मैंने घंटी को आँखों के पास लिया। उस्ताद और याकूब चाचा दोनों उठ खड़े हुए। मशीन उनके पीछे स्थिर खड़ी थी, जैसे किसी बूढ़े ने सालों बाद पीठ सीधी कर ली हो।

और घंटी के अंदर, पीतल की उस सतह पर, अक्षर बनने लगे। पहले धुएँ जैसे — कोई आकृति उभरती, फिर मिटती, फिर दोबारा उभरती। जैसे कोई बहुत दूर से किसी की लिखाई पढ़ने की कोशिश कर रहा हो।

माँ भी आ गई थीं। कब आईं, मुझे पता नहीं चला। काजल उनके पीछे खड़ी थी। मीरा ने कैमरा ऊपर उठाया और फिर बहुत धीरे से नीचे कर दिया, जैसे उसे लगा कि ये कैमरे की चीज़ नहीं है।

"पहचान रहे हो?" उस्ताद ने कहा। उनकी आवाज़ फटी हुई थी।

"न… नहीं," मैंने कहा। "अक्षर बनते हैं और फिर…"

मैं रुक गया। क्योंकि अबकी बार अक्षर नहीं मिटे।

वो साफ़ हो गए। धीरे-धीरे। एक-एक करके। छोटे, सीधे अक्षर, जैसे किसी ने नाखून से पीतल पर खुरचे हों। और मैंने उन्हें पढ़ा।

शि व ना रा य ण या द व

मैंने एक बार पढ़ा। फिर दूसरी बार पढ़ा। फिर घंटी को उलटकर देखा, जैसे मुझे ग़लत पढ़ने का मौक़ा चाहिए था।

"ये…" याकूब चाचा ने कहा और उनकी लाठी हाथ से छूटकर लकड़ी के फ़र्श पर गिर गई, "ये तो…"

"शिवनारायण यादव," मैंने धीरे से कहा। "मेरे परदादा। जिन्होंने इलाही बक्श के साथ ये घंटी बनाई थी।"

उस्ताद ने अपना चश्मा उतार लिया और उसे मेज़ पर रख दिया। उनका चेहरा अचानक बूढ़ा हो गया, बहुत बूढ़ा, पचास साल एक पल में।

"तो तीसरा नाम," उन्होंने कहा, "वो नाम है जो मैंने कभी ज़ुबान पर नहीं लिया।"

"आपने कहा था," मीरा ने कहा, "कि तीसरा नाम आपसे छिन गया है और आप उसे नहीं लेंगे।"

"मैंने झूठ नहीं कहा था," उस्ताद ने कहा। "मैंने सिर्फ़ ये नहीं कहा कि वो नाम मेरे अपने घर में लिखा हुआ है।"

मैंने घंटी को थोड़ा ऊपर किया और उस पीली रोशनी में उन अक्षरों को घूमाकर देखा। वो चमक रहे थे। हल्की, सुनहरी, झुर्रीदार चमक, जैसे कोई पुराना सिक्का धूप में रखा हो।

और तभी मुझे महसूस हुआ कि कमरे में कोई चुप है।

बहुत चुप।

मैंने पलटकर देखा।

माँ खड़ी थीं। उनका मुँह खुला था और आँखें उसी नाम पर जमी थीं। उनका चेहरा पीला पड़ गया था — नहीं, सफ़ेद, एकदम सफ़ेद, जैसे किसी ने उनके चेहरे से खून ही खींच लिया हो। उनका हाथ मेज़ के किनारे पर था और उँगलियाँ इतनी ज़ोर से कसी हुई थीं कि नाखून किनारे पर सफ़ेद दिख रहे थे।

"माँ?" काजल ने कहा और उनकी तरफ़ बढ़ी। "माँ, क्या हुआ?"

माँ ने कुछ नहीं कहा।

"माँ," मैंने कहा और घंटी नीचे कर दी, "ये तो परदादा का नाम है। इसमें डरने वाली क्या बात है?"

माँ ने बहुत धीरे से अपनी ज़ुबान पर आवाज़ लाई, जैसे वो किसी बहुत गहरी जगह से ऊपर आ रही हो।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "ये नाम…"

"हाँ?"

उन्होंने घंटी मेरे हाथ से ली। उनके हाथ काँप रहे थे। उन्होंने उसे आँखों के पास लिया, देखा, और फिर बहुत धीरे से मेरी तरफ़ देखा — और उनकी आँखों में वो डर था जो मैंने उनकी आँखों में उस रात देखा था, जब घर का लकड़ी का दरवाज़ा खुला मिला था और भीतर दीया जल रहा था।

"ये नाम," उन्होंने कहा, "उस काग़ज़ पर नहीं है, जिसे तेरे पापा ने अंगूठा लगाकर साइन किया था।"

"तो?"

"ये नाम," माँ ने कहा और उनकी आवाज़ टूट गई, "उस काग़ज़ पर है जिसे मैंने अपनी हिसाब की कॉपी के पिछले हिस्से में बाईस साल से छुपा रखा है। और अंकुश — उस काग़ज़ पर ये नाम मेरे ससुर के हाथ की लिखाई में नहीं है। ये नाम किसी और ने लिखा है।"

"किसने?" मैंने पूछा।

माँ ने घंटी को मेरी हथेली पर रख दिया, और मेरी तरफ़ देखे बिना, बहुत धीमे से कहा —

"जिसने मुझे इस घर में बहू बनाया था।"

बाहर, गली में, मशीन का शोर फिर शुरू हुआ — इस बार और पास, और इस बार और ऊँचा, जैसे कोई घड़ी की सुई जान-बूझकर आगे बढ़ा रहा हो।

॥

माँ की आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी पुराने कुएँ से बाल्टी ऊपर आ रही हो — धीरे, भारी, और रस्सी के साथ कुछ और भी खिंचता हुआ आ रहा हो।

"माँ," मैंने कहा, "धीरे-धीरे। बैठ जाओ।"

"मैं बैठूँगी नहीं," उन्होंने कहा, पर उनका हाथ मेज़ के किनारे से नहीं छूटा। "बाईस साल मैं बैठी रही, अंकुश। बाईस साल। हर रात सोचती रही कि किसी को पता न चले। अब नहीं बैठूँगी।"

काजल ने पीछे से एक स्टूल खींचकर उनके पैरों के पास रख दिया। माँ ने उसे देखा, कुछ कहना चाहा, फिर चुपचाप बैठ गईं। थकान पैरों से ऊपर चढ़ रही थी, मैं देख सकता था। वो थकान जो इंसान के चेहरे पर सफ़ेदी बनकर आती है।

उस्ताद ने अपना चश्मा फिर नहीं पहना। वो उसे मेज़ पर ही छोड़े हुए थे और बिना चश्मे के बैठे थे। बिना चश्मे के उनका चेहरा अलग लग रहा था — ज़्यादा थका हुआ, ज़्यादा सच्चा, कम उस्ताद, ज़्यादा इंसान।

"सुशीला जी," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में एक ऐसा आदर था जो मैंने उनमें पहले कभी नहीं सुना, "आप कह रही हैं कि ये नाम आपके ससुराल के पुराने ताले पर खुदा है?"

माँ ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस मेरी तरफ़ देखा और अपनी साड़ी का पल्लू सीधा किया।

"माँ," मैंने कहा, "उस्ताद पूछ रहे हैं।"

"मैं सुन रही हूँ," उन्होंने कहा। फिर उन्होंने अपना मुँह उठाया और उस्ताद की तरफ़ देखा। "हाँ उस्ताद साहब, खुदा है। मेरे ससुराल के उस पुराने लकड़ी के संदूक पर जो आज भी मेरे घर के पीछे वाले कमरे में रखा है। जिसका बाहरी ताला आज गले की चाबी से खुला।"

कमरे में सन्नाटा उतर आया।

याकूब चाचा ने अपनी लाठी उठाने के लिए हाथ बढ़ाया, पर हाथ हवा में ही रुक गया। वो मेरी तरफ़ देखने लगे, फिर उस्ताद की तरफ़, फिर माँ की तरफ़।

"ये…" उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में हवा नहीं थी, "ये सच है? आप कह रही हैं कि मेरे सीने पर पचास साल से जो पोटली बँधी है, उसका निशान आपके संदूक के ताले पर भी है?"

माँ ने गर्दन हिलाई। बहुत छोटी हरकत। पर वो हरकत कमरे में गूँज गई।

याकूब चाचा का हाथ काँपने लगा। उन्होंने अपनी सीने की पोटली नहीं खोली, बस उस पर हाथ रख दिया, जैसे कोई बच्चा अपनी माँ की उँगली पकड़ता है।

"पचास साल," उन्होंने कहा। "पचास साल मैं उसे अपने सीने पर लेकर सोया हूँ। कभी सोचा नहीं कि वो किसी और के घर में भी लिखा हुआ मिलेगा।"

मीरा ने अपना कैमरा मेज़ पर रख दिया। उसका हाथ धीरे से काँप रहा था और मैंने देखा कि उसने जान-बूझकर कैमरा नीचे रखा — इस बात को कैमरे में नहीं लेना था। ये बात किसी को दिखाने की नहीं थी। ये बात पहले घर की थी, फिर खबर की।

"ताला लाओ," मैंने कहा।

माँ ने अपनी साड़ी के कोने से वो छोटा लोहे का ताला निकाला, जो अभी तक मेज़ पर पड़ा था। ज़ंग लगा, छोटा, मोटा — वो ताला जिसके भीतर से अभी-अभी खुरचने की आवाज़ आई थी, फिर बंद हो गई थी।

मैंने ताला मेज़ के बीच में रखा।

फिर घंटी रखी — वो पीतल की घंटी, जिसके भीतर अभी शिवनारायण यादव का नाम उभरा था।

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