The Mysterious Bell821 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 821

7 min read November 5, 2026

"और हर बार वो अंगूठा एक रिश्ता तोड़कर गया।" मैंने कहा। "पचास साल पुराना अंगूठा भी वही कर रहा है, आज भी। वो अभी भी इन दोनों के बीच खड़ा है। और मुझे नहीं लगता कि वो अकेले जाएगा।"

मैंने अपनी जेब पर हाथ रखा।

"इसे यहीं खत्म करना पड़ेगा।"

याकूब ने मेरी तरफ़ देखा।

"तू कौन है, बेटा?" उसने पूछा। "जो मेरे और मेरे भाई के बीच में खड़ा है?"

मैंने कहा—

"मैं वो हूँ जिसके पास वो घंटी है, जिसका हिस्सा आप माँगने आए हैं।"

याकूब एक पल चुप रहा।

फिर वो धीरे से हँसा। वो हँसी भी खाँसी जैसी थी।

"जगदीश के खून में यही बात थी।" उसने कहा। "सीधा मुँह पर।"

फिर उसने अपना थैला उठाया।

और उसने उसे खोला।

अंदर से पहले एक पुराना कपड़ा निकला, जिसे उसने गोद में रखा। फिर एक छोटा डिब्बा, जिसका ढक्कन उतर गया था। फिर एक पुरानी किताब जैसी चीज़, जिसकी जिल्द टूट रही थी। और फिर—सबसे नीचे से—एक काग़ज़।

नहीं, काग़ज़ नहीं।

एक तस्वीर।

उसने उसे दोनों हाथों से पकड़कर बाहर निकाला और अपनी गोद पर रख दिया।

मैं उसके पास गया और झुककर देखा।

काली-सफ़ेद तस्वीर थी। कोने मुड़े हुए, किनारों पर पानी के निशान, और बीच में एक सीधी सी लकीर, जैसे तस्वीर को कभी बीच से मोड़कर रखा गया हो और बाद में फिर खोल दिया गया हो।

तस्वीर में दो जवान लड़के खड़े थे।

दोनों के बाल घने, दोनों के चेहरे पर वो उम्र थी जिसमें आदमी अपने आप पर यक़ीन करता है। एक के हाथ में औज़ार था—छोटा हथौड़ा जैसा कुछ। दूसरे के गले में नापने का फीता लटक रहा था, जैसे अभी-अभी मशीन से उठा हो।

और दोनों के बीच में, तस्वीर के ठीक बीच में, एक कील से लटकी हुई…

…घंटी।

मेरी घंटी।

मैंने उसे पहचाना। फूल का निशान, घुमावदार किनारा, वो छोटा सा डंडा जो आज भी मेरे साइकिल के हैंडल पर है।

मेरी जेब में घंटी ज़ोर से बजी।

एक बार।

और मैंने महसूस किया कि मेरी जेब गरम हो रही है, जैसे घंटी अंदर से धक्का दे रही हो।

"ये…" मैंने कहा। "ये वही घंटी है।"

"हाँ।" याकूब ने कहा।

उसने उँगली तस्वीर पर रखी।

"ये मैं हूँ।" उसने बाएँ वाले लड़के पर उँगली रखी। "और ये अली है।"

उस्ताद ने तस्वीर की तरफ़ देखा और उनका चेहरा टूट गया।

"ये मेरी दुकान के पीछे वाले कमरे की तस्वीर है।" उन्होंने धीरे से कहा। "ये दीवार… ये वही दीवार है।"

"हाँ।" याकूब ने कहा। "वही दीवार।"

उसने तस्वीर को पलट दिया।

पीछे की तरफ़, पुरानी नीली स्याही से, टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में कुछ लिखा था। स्याही फीकी पड़ चुकी थी, कुछ अक्षर घिस गए थे, पर शब्द पढ़े जा सकते थे।

वो चार शब्द थे।

आधी मेरी, आधी तेरी।

मैंने उसे पढ़ा।

फिर मैंने दोबारा पढ़ा।

गलियारे में कोई नहीं बोला।

उस्ताद ने अपना हाथ बढ़ाया, जैसे तस्वीर छूना चाहते हों, पर उन्होंने उसे नहीं छुआ। उनका हाथ हवा में ही रुक गया।

"ये लिखाई…" उन्होंने कहा।

उनकी आवाज़ अचानक बहुत धीमी हो गई।

उन्होंने तस्वीर के पीछे झुककर देखा। उन्होंने अपनी उँगली उन अक्षरों के पास ले जाकर रखी, बिना छुए।

फिर उन्होंने अपना सिर उठाया और याकूब की तरफ़ देखा।

और उनके चेहरे पर वो भाव आया जो मैंने उनके चेहरे पर कभी नहीं देखा था।

डर।

डर, जो किसी बीमारी का नहीं था। डर, जो किसी और चीज़ का था।

"याकूब।" उस्ताद ने कहा।

"क्या?"

"ये लिखाई मेरी नहीं है।"

याकूब ने कुछ कहना चाहा, पर उस्ताद ने उसे रोक दिया।

"और ये तेरी भी नहीं है।"

याकूब ने उनकी तरफ़ देखा।

फिर उसने तस्वीर की तरफ़ देखा।

फिर उसने उसे अपने हाथ में उठाया, नज़दीक लाया, और उन चार शब्दों को देखा, जैसे वो अपनी पूरी ज़िंदगी में पहली बार उन्हें पढ़ रहा हो।

"अली।" उसने कहा, और उसकी आवाज़ फट गई। "अगर ये मेरी लिखाई नहीं है, और तेरी भी नहीं…"

वो रुक गया।

उसके हाथ काँपने लगे, और तस्वीर उसके हाथ में हिलने लगी, और मुझे लगा कि वो अभी उसके हाथ से गिर जाएगी।

उस्ताद ने उसका हाथ पकड़ लिया।

दोनों भाइयों के हाथ एक ही तस्वीर पर थे।

"…तो ये किसकी है?" याकूब ने पूछा।

मेरी जेब में घंटी फिर बजी।

इस बार दो बार।

और मैंने उसे साफ़ सुना।

"आधी मेरी, आधी तेरी।" घंटी ने कहा।

मैंने उसे धीरे से निकाला और हथेली पर रखा।

वो गरम थी।

"लेकिन तीसरा कौन है?" मैंने उससे धीरे से पूछा। "तीन भाई थे। तीन में से एक आ गया, तूने कहा। तो बाकी दो कौन हैं?"

घंटी एक पल चुप रही।

गलियारे की बत्ती फिर झपकी।

"गिनती अभी पूरी नहीं।" घंटी ने कहा।

और चुप हो गई।

मैंने तस्वीर को देखा।

दो जवान लड़के। एक घंटी। और चार शब्द, जिन्हें किसी तीसरे हाथ ने लिखा था।

और मुझे लगा कि उस गलियारे की हवा अब पहले जैसी नहीं है।

याकूब ने तस्वीर अपने सीने से लगा ली।

उस्ताद ने उसका हाथ नहीं छोड़ा।

॥

उस्ताद ने याकूब का हाथ नहीं छोड़ा। उनकी उँगलियाँ याकूब की कलाई पर ऐसी बैठी थीं, जैसे कोई पुराना ताला किसी पुरानी कुंडी को पकड़ ले — न खुद खुलता है, न सामने वाले को जाने देता है।

गलियारे की बत्ती फिर झपकी। दूर कहीं बाल्टी गिरने की आवाज़ आई, फिर किसी ने धीरे से कुछ कहा और चुप हो गया। अस्पताल की हवा में दवा, फिनाइल और पुराने काग़ज़ों की गंध मिली हुई थी।

मैंने तस्वीर देखी। दो जवान लड़के, बीच में घंटी, और पीछे चार शब्द — आधी मेरी, आधी तेरी।

मेरी जेब में घंटी अब भी गरम थी।

उस्ताद ने बहुत देर बाद अपना हाथ छोड़ा। उन्होंने याकूब की तरफ़ नहीं देखा। उन्होंने दीवार की तरफ़ देखा, जैसे दीवार पर कुछ लिखा हो और वो उसे पढ़ रहे हों।

फिर उन्होंने कहा, "ये जगह नहीं है।"

"क्या?" याकूब ने कहा।

"ये जगह इस बात के लिए नहीं है।" उस्ताद ने कहा। "अस्पताल है। नीचे शंकर भाई लेटे हैं। ऊपर मरीज़ हैं। यहाँ हमारी पुरानी बात नहीं उठेगी।"

याकूब ने गला साफ़ किया। "तो कहाँ उठेगी?"

उस्ताद ने पहली बार मेरी तरफ़ देखा।

"मेरे साथ चल।"

हम लोग अस्पताल के गेट से बाहर निकले।

धूप अब ढल रही थी और गली की मिट्टी में वो पीली रोशनी फैल रही थी, जो हर शाम को चीज़ों को पुरानी और अच्छी दिखाने लगती है। पीपल के नीचे चबूतरी खाली थी। किसी ने चबूतरी पर एक रोटी रख दी थी और दो कौवे उसके ऊपर बैठे थे।

टिंकू मेरे पीछे-पीछे चल रहा था। उसने दो बार मुझे खींचा और दोनों बार मैंने उसका हाथ पकड़कर कहा, "चुप, चल।"

तीसरी बार उसने खुद ही कहा, "उस्ताद, मैं चुप हूँ। पर मैं अंदर आऊँगा।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तू अंदर नहीं आएगा," मैंने कहा।

"मैं पानी रखूँगा," उसने कहा। "बाहर। दरवाज़े पर। अगर कोई रोए तो पानी दे दूँगा।"

मेरे अंदर कुछ हिला।

"ठीक है," मैंने कहा। "पानी लेकर आ।"

उस्ताद की पुरानी दुकान पीछे की गली में थी।

नीला दरवाज़ा। रंग उतरा हुआ। ऊपर की तरफ़ लकड़ी फूल गई थी और नीचे से पानी चढ़कर उसने एक नक्शा सा बना दिया था। दरवाज़े पर ज़ंग लगा ताला लटक रहा था।

उस्ताद ने जेब से चाबी निकाली। उनके हाथ काँप रहे थे। चाबी दो बार छेद से फिसल गई।

मैंने आगे बढ़कर कहा, "मैं खोल दूँ?"

"ना," उन्होंने कहा। "ये ताला मैं खुद खोलूँगा। ये मेरा पचास साल से लगा हुआ है। इसे मैंने लगाया था।"

तीसरी बार में चाबी घूमी।

ताला खुला, और जैसे ही दरवाज़ा खिसका, अंदर से एक हवा बाहर आई।

और वो हवा लंबी थी।

उसमें पुराने कपड़े की गंध थी, मशीन के तेल की गंध थी, और कुछ ऐसी गंध थी जो सिर्फ़ बंद कमरों में रखी चीज़ों से आती है — जैसे घर छोड़कर गए किसी आदमी की कमीज़ में।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho