The Mysterious Bell – Chapter 804
"उनसे जिनकी ज़मीन पर बनाओगे," मैंने कहा। "इमारत उनकी होगी, दीवार उनकी होगी, बत्ती उनकी होगी — तो पूछ लेना एक बार। बस एक बार। क्योंकि जो जोड़ तुम तोड़ोगे, वो जुड़ जाएगा — पर आख़िरी बार जुड़ेगा। और उसके बाद कोई नहीं जुड़ेगा।"
वो मेरी तरफ़ देखता रहा।
"तुम्हारे पास काग़ज़ है, मुहर है, वकील है, तारीख़ है," मैंने कहा। "मेरे पास सिर्फ़ एक गली है और एक घंटी। पर सुन लो — जिस दिन तुम्हारी इमारत बनेगी और उसमें कोई नहीं रहेगा, उस दिन तुम्हारे पास काग़ज़ बचेगा, मुहर बचेगी, और इमारत भी बचेगी। बस उसे घर कहने वाला कोई नहीं होगा।"
वो पीछे टिका और उसने वो हँसी हँसी जो अब तक मैंने नहीं सुनी थी। खुली हँसी। जैसे किसी ने अच्छा चुटकुला सुनाया हो।
"अंकुश," उसने कहा, "भावना अच्छी है। सच में अच्छी है। तुम्हारी उम्र में मैंने भी ऐसी बातें कही थीं। पर एक बात समझ लो — काग़ज़ काग़ज़ होता है, और मुहर मुहर। भावना से रजिस्ट्री नहीं होती। भावना से ताला नहीं खुलता। और भावना रात को सो जाती है, पर तारीख़ नहीं सोती।"
"सही कहा," किसी ने कहा।
मैं मुड़ा।
डॉक्टर निहाल इसरानी खड़े थे। उनके हाथ में टेप से लिपटा पुराना स्टेथोस्कोप था, और वो उसे पकड़े हुए ऐसे खड़े थे जैसे कोई लाठी पकड़कर खड़ा होता है।
"मुहर से इलाज नहीं होता," उन्होंने कहा। "इलाज से मुहर बनती है।"
रणवीर ने उनकी तरफ़ देखा।
"डॉक्टर साहब, आपकी इज़्ज़त है," उसने कहा। "मैंने आपके लिए कमरा भी रखा था। नई इमारत की दूसरी मंज़िल पर। साफ़, हवादार, बड़ी खिड़की।"
"मुझे खिड़की नहीं चाहिए," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "मुझे वही दरवाज़ा चाहिए जो रात दो बजे खुलता हो।"
वो गाड़ी से थोड़ा और बाहर झुका।
"और एक बात," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "इस अस्पताल में तीस साल से एक मुहर बन रही है। वो कोई दफ़्तार ने नहीं लगाई। वो मरीज़ों ने लगाई है। जो आदमी यहाँ रात भर बैठा, जो माँ अपने बच्चे को लेकर दौड़ी आई, जो बूढ़ा अपनी दवा के लिए सीढ़ी पर बैठा — उन सबके हाथों ने मिलकर वो मुहर बनाई है। आपके काग़ज़ पर जो स्याही है, वो सिर्फ़ उस मुहर के ऊपर लगी है। मुहर नीचे है। और नीचे वाली चीज़ को आप नहीं मिटा सकते।"
गली के मुँह पर भीड़ जमा होने लगी थी। मुझे पता नहीं चला कब। आँगन से लोग उठकर गेट तक आ गए थे — हाथ में थालियाँ लिए, कुछ खाते हुए, कुछ भूखे ही।
तभी भीड़ में से एक आवाज़ आई।
"मुझे बोलने दीजिए।"
सब हट गए।
एक बूढ़ी औरत आगे आई। साफ़ साड़ी, सफ़ेद बाल, कमर झुकी हुई, हाथ में एक काग़ज़ — पुरानी पर्ची, इतनी बार मोड़ी गई थी कि किनारे मुलायम हो गए थे, जैसे कपड़ा हो।
वो गाड़ी के पास आई। खिड़की तक। और उसने वो पर्ची ऊपर उठा दी।
"यह पर्ची मेरे पास बारह साल से है," उसने कहा। "इस पर यहीं के डॉक्टर साहब का हाथ है। मेरा बेटा रात को आया था — साँस रुक रही थी, आँखें पलट रही थीं, मैं रो रही थी, और मेरे हाथ में पैसे नहीं थे। पूरे डेढ़ सौ रुपये थे और मुझे लगता था कि एक हज़ार लगेंगे। उस रात दूसरे अस्पताल ने मुझे बाहर खड़ा कर दिया था। यहाँ का शटर खुला था। डॉक्टर साहब खुद बाहर आए, मेरे बेटे को गोद में लिया, और अंदर ले गए।"
वो रुकी। उसकी आवाज़ में कुछ नहीं बदला। सीधी बात, जैसे कोई हिसाब बता रहा हो।
"मुझे नहीं पता उस रात का बिल किसने भरा," उसने कहा। "मैंने आज तक नहीं जाना। और मैं आज तक नहीं पूछा, क्योंकि मुझे डर लगता है कि कहीं पूछने से मेरा बेटा वापस न चला जाए।"
उसने पर्ची को सीने से लगाया।
"मेरा बेटा अब नए बाज़ार में टेम्पो चलाता है," उसने कहा। "शादी हो गई, दो बच्चे हैं। और आज मैं आपको साफ़ बता दूँ — मैं यह ज़मीन नहीं छोड़ूँगी। मुझे आपकी बीस मंज़िला इमारत नहीं चाहिए। मुझे वही दरवाज़ा चाहिए जो रात दो बजे खुला था।"
वो पीछे हटी और भीड़ में खड़ी हो गई। उसका काम खत्म।
और फिर जो हुआ, वो मैंने कभी नहीं देखा था।
एक आदमी आगे आया — लंबा, पतला, हाथ में थाली। उसने पहले थाली नीचे रखी, फिर बोला। "मेरी बीवी का ऑपरेशन यहीं हुआ। डॉक्टर साहब ने कहा था कि माँ बचेगी, बच्चा नहीं। दोनों बच गए। मेरी बेटी सात साल की है और उसका नाम मैंने इसी अस्पताल के नाम पर रखा — नूर। स्कूल में सब उसे नूर कहते हैं और मुझे हर बार यह अस्पताल याद आता है। मैं यह नाम नहीं बदलूँगा और यह ज़मीन नहीं छोड़ूँगा।"
फिर रामलाल आगे आए — स्कूल के चौकीदार, कंधे झुके हुए। उन्होंने अपनी कलाई उठाई, रुकी हुई घड़ी दिखाई। "यह तीस साल की नौकरी की घड़ी है। दस बजकर कुछ मिनट पर रुकी है। जिस रात स्कूल की ज़मीन का पहला काग़ज़ बना, उसी रात। मैं उसे नहीं बदलूँगा, क्योंकि मुझे याद रखना है कि मैं उस रात चुप रहा था। आज चुप नहीं रहूँगा।"
फिर भवानी प्रसाद आगे आए। उनके हाथ में काग़ज़ था, और हाथ काँप रहा था, पर वो पीछे नहीं हटे। "मैं रजिस्ट्री दफ़्तार में सत्तर साल से काग़ज़ देख रहा हूँ। मैंने अपनी ज़िंदगी में सैकड़ों काग़ज़ छिपाए हैं, किसी के डर से, किसी के पैसे से। पहली बार मैं अपना काग़ज़ दिखा रहा हूँ।"
फिर हबीब चाचा आए। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस यह कहा — "मेरा बेटा इमरान अंदर बंद है। उसकी माँ सो नहीं रही। जिस दिन चाचा अपने बेटे को खोजने यहाँ तक आया, उस दिन मैं नहीं जा सकता।"
फिर शबनम आपा आईं, चिमटी हाथ में। "मैं उस इमारत में चाय नहीं बेचूँगी जिसकी नींव में किसी का घर टूटा हो। मेरी दुकान ही मेरी इमारत है। बाक़ी आप सोच लीजिए।"
फिर रज़िया आगे आई, पंद्रह साल बाद लौटी रज़िया, सूटकेस वाली रज़िया। उसने कुछ लंबा नहीं कहा। बस इतना — "मैं पंद्रह साल बाहर रही। अब और नहीं रहूँगी। जो मेरे हिस्से का है, वो यहीं है।"
फिर सानिया ने अपनी लाल कवर वाली कॉपी खोली। उसने ऊँची आवाज़ में पढ़ा — "पंद्रह तारीख़, सुबह सात बजे, मशीन, दो ट्रक, चार आदमी। सोलह तारीख़, शाम पाँच बजे, सफ़ेद गाड़ी, तीन आदमी। सत्रह तारीख़, दोपहर दो बजे, टेम्पो, बोरियाँ।"
वो रुकी और कहा, "बाक़ी अगली कॉपी में है।"
आँगन में पहली बार तालियाँ बजीं।
न तालियाँ किसी भाषण पर बजीं, न किसी नेता पर। चार सौ लोगों ने, जिनमें से आधे अपनी थाली लिए खड़े थे, एक तेरह साल की लड़की के हाथ में पकड़ी कॉपी पर तालियाँ बजाईं।
और तभी बबलू खड़ा हुआ।
वो पत्थर पर से उठा। उसने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपना सफ़ेद रूमाल बँधा हाथ ऊपर उठाया — जैसे कोई सबूत दिखा रहा हो।
और फिर वो बोला, इतना धीरे कि पहले किसी ने नहीं सुना। "मेरा नाम भी उस काग़ज़ में है।"
आँगन में सन्नाटा।
"मैं वो काग़ज़ नहीं बेचूँगा," उसने कहा।
और वो बैठ गया। नीचे ज़मीन पर, पत्थर पर, थाली गोद में, और रोटी तोड़ने लगा।
माँ ने व्हीलचेयर से कहा, किसी से नहीं, खुद से जैसे — "अब खाना ठंडा हो जाएगा।"
मैं मुड़कर गाड़ी की तरफ़ देखा।
रणवीर की खिड़की अब भी खुली थी।
वो सब सुन रहा था। कुछ नहीं कह रहा था। उसके चेहरे पर वही मुस्कान थी — वो मुस्कान जो हर तस्वीर में होती है, जिसमें हाथ जुड़े होते हैं और नीचे लिखा होता है कि वो कितना समाजसेवी है।
और फिर उसने तालियाँ बजाईं।
धीमी। तीन बार। अकेले। जैसे कोई ताली नहीं बजा रहा हो, बल्कि गिन रहा हो।
"सुंदर," उसने कहा। "सच में सुंदर।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
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