The Mysterious Bell – Chapter 798
मैं मुड़ा और घर की तरफ़ चला। माँ को बताना ज़रूरी था। बात सिर्फ़ बताने की नहीं थी — मुझे उनसे इजाज़त लेनी थी। आज शाम जो होने वाला था, वो सिर्फ़ मेरी गली का काम नहीं था। वो उनका भी था। उनका, पापा का, काजल का, उस पूरे घर का जिसे मैं किसी भी हालत में बचाना चाहता था।
घर का दरवाज़ा खुला था। अंदर से काजल की आवाज़ आ रही थी — वो माँ को कुछ समझा रही थी, और माँ उसे टोक रही थीं।
"अरे, मैं बीमार हूँ, बेवकूफ़ नहीं हूँ," माँ की आवाज़ आई। "मुझे पता है मेरी दवा कब खत्म होगी। तू मुझे कॉपी दिखाने की ज़रूरत नहीं।"
मैं अंदर गया।
माँ पलंग पर बैठी थीं, पीठ के नीचे तकिया रखा था, और सामने मेज़ पर हिसाब की कॉपी खुली थी। उनके हाथ में कलम थी और माथे पर चंदन का टीका था। बीमारी ने उनका चेहरा पतला कर दिया था, पर आँखें वही थीं। वही तेज़, वही सीधी।
काजल मेरी तरफ़ देखकर बोली, "भैया को ही बता दो, मैं तो हार गई।"
"क्या बात है?" मैंने पूछा, पलंग के पास रखी कुर्सी खींचकर बैठते हुए।
माँ ने कलम रख दी।
"बात यह है," वो बोलीं, "कि डॉक्टर इसरानी आज सुबह आए थे और उन्होंने कहा कि काग़ज़ का मामला साफ़ होने तक दवा की नई खेप रुकी हुई है। मैंने कहा, ठीक है, रुकी रहे। और अब ये काजल कह रही है कि आज मैं अस्पताल में ही रहूँ।"
"माँ, आप…" काजल ने हाथ जोड़े।
"काजल, बैठ जा," मैंने कहा।
वो बैठ गई, पर मुँह फुलाए हुए।
मैंने माँ की तरफ़ देखा।
"माँ, आज शाम छह बजे अस्पताल के आँगन में पूरी गली की बैठक है। मैंने बुलाई है। मरीज़ आ रहे हैं। शबनम आपा आ रही हैं, उस्ताद आ रहे हैं, हबीब चाचा आ रहे हैं, बबलू भी आएगा। और आपको नहीं बुलाऊँ, ये मुझसे नहीं होगा।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
"डर लग रहा है?" उन्होंने पूछा।
"हाँ," मैंने कहा। "बहुत।"
"अच्छा है," माँ ने कहा। "जो डरता नहीं, वो अपने ही शब्दों में फँस जाता है।"
फिर वो मुस्कुराईं, और उनकी मुस्कान में वही पुरानी बात थी जो मैं बचपन से सुनता आया था।
"पर सुन ले," उन्होंने कहा। "मैं खाली हाथ नहीं आऊँगी।"
"माँ —"
"कुछ नहीं सुनना। मेरी टिफ़िन सेवा का हिसाब लगा। आज चूल्हा जलेगा।"
"माँ, आप बीमार हैं —"
"मैं बीमार हूँ, मरी हुई नहीं हूँ," उन्होंने साफ़ कह दिया। "और आज जो बात करने आएँगे, उन्हें भूखा नहीं लड़ने दूँगी। मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता, और बात में भी नहीं। पर खाने में घी ज़रूर डालती हूँ। खाली पेट लड़ने वाले आदमी को गुस्सा ज़्यादा आता है, हिम्मत कम।"
काजल ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने आँख से इशारा किया — चुप रह।
"अच्छा," मैंने कहा। "पर एक शर्त है।"
"तू मुझसे शर्त करेगा?"
"हाँ," मैंने कहा। "आप कुर्सी पर आएँगी। चलकर नहीं। दो कदम भी नहीं। वरना मैं आपको बैठक में नहीं आने दूँगा, चाहे आप मुझे मार दें।"
माँ ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर हँस पड़ीं। हँसी में खाँसी आ गई, और काजल दौड़कर पानी ले आई।
"तेरे पापा की ज़ुबान आ गई है तुझमें," उन्होंने पानी पीकर कहा। "ठीक है। कुर्सी से आऊँगी। पर खाना मेरा।"
"खाना आपका," मैंने कहा।
मैं उठा। जाते-जाते मैंने काजल की तरफ़ देखा।
"तू माँ के साथ रह," मैंने कहा। "और काजल — घर की तरफ़ से कोई चीज़ चाहिए तो शबनम आपा को बोल देना।"
काजल ने सिर हिलाया, पर उसकी आँखों में वही बात थी जो मेरे अंदर थी। डर की, और उसके साथ उम्मीद की।
मैं बाहर निकला। दोपहर ढल रही थी और गली अचानक हलचल से भर गई थी।
टिंकू ने बच्चों को बुला लिया था। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — चारों पीपल के नीचे खड़े थे, और टिंकू उन्हें कुछ समझा रहा था, जैसे कोई छोटा सिपाही टुकड़ी को हुक्म दे रहा हो। सानिया के हाथ में उसकी लाल कवर कॉपी थी, गुड्डू के हाथ में माचिस की डिब्बी, रफ़ीक़ ने आँख पर वही टूटा चश्मा चढ़ा रखा था जिसका एक काँच गायब था, और चिंटू नंगे पैर खड़ा था, चप्पल हाथ में।
"उस्ताद आ गए," टिंकू ने कहा, और सब मेरी तरफ़ मुड़े।
"सुनो सब," मैंने कहा। "आज शाम छह बजे अस्पताल के आँगन में बैठक है। मरीज़ आएँगे, गली वाले आएँगे, उन्हें लड़कर आने की ज़रूरत नहीं — गली के आदमी की तरह आएँगे। उन्हें बैठने की जगह चाहिए। तुम लोगों को क्या करना है, बताता हूँ, और अगर कोई अड़चन आए तो उस्ताद को बताना, खुद हल करने की कोशिश मत करना।"
"उस्ताद," चिंटू ने कहा, "मैं क्या करूँ?"
"तू सबसे ज़रूरी काम करेगा," मैंने कहा। "तू अपनी चप्पल पहन ले, पहले।"
सब हँस पड़े। चिंटू शर्म से मुस्कुराया और झुककर चप्पल पहनने लगा।
"सानिया," मैंने कहा, "तू और गुड्डू कुर्सियाँ जमा करो। उस्ताद की दुकान से दो, शबनम आपा की गुमटी से तीन, भोला भाई की दुकान से दो, और हाँ — किराने वाले काका की दुकान के बाहर एक पुरानी बेंच पड़ी है, उसे भी ले आना। पर किसी की चीज़ बिना पूछे मत ले जाना। और लौटाते वक़्त भी बताना कि कहाँ रखी है।"
"उस्ताद, अगर कोई मना कर दे तो?" गुड्डू ने पूछा।
"तो मना करने देना," मैंने कहा। "हम भीख नहीं माँग रहे, हम उन्हीं की गली की बैठक कर रहे हैं। मना करे तो 'ठीक है भाई' कहकर आगे बढ़ जाना। बात का दो टुकड़ा नहीं करना।"
"रफ़ीक़," मैंने मुड़कर कहा, "तू पीपल के नीचे चबूतरी साफ़ कर। पानी ले, झाड़ू ले। उस पर से पत्ते हटा, और जो पुराना काग़ज़-कचरा है, वो भी। छत पर से कुछ पत्ते गिरे होंगे, सब साफ़।"
"मैं चप्पल उतारकर करूँगा, उस्ताद," रफ़ीक़ ने कहा। "गीली चबूतरी पर वैसे ही चलना पड़ेगा।"
"नहीं," मैंने कहा। "चप्पल पहनकर कर। फिसल कर गिर गया तो तेरी अम्मी मेरा नाम लेगी, और मैं उस वक़्त बैठक में बोल रहा होऊँगा।"
वो हँसा और भागा।
"और मैं?" चिंटू ने अपनी चप्पल का पट्टा कसते हुए पूछा।
"तू झंडे बनाएगा," मैंने कहा। "दुकान के पीछे वाले कमरे में काग़ज़ है, पुराना लाल काग़ज़, मैंने पिछले साल होली पर बचाया था। उस्ताद की दुकान से कैंची ले आ, और उस काग़ज़ को ऐसे काटना जैसे झंडे होते हैं। फिर उन्हें रस्सी पर लगाकर आँगन के दोनों तरफ़ बाँध देना। पर ध्यान रखना, रस्सी गले के बराबर न हो, ऊपर रहे, ताकि बुज़ुर्गों को झुकना न पड़े।"
चिंटू ने सीना तान लिया, जैसे उसे कोई बड़ा मंत्रालय सौंपा गया हो।
"उस्ताद," टिंकू ने कहा, "और मैं?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तू मेरे साथ रहेगा," मैंने कहा। "आज तू मेरा दाहिना हाथ है। मुझे जो भूल जाए, तू याद दिलाना।"
उसका चेहरा चमक गया। और वही चेहरा देखकर मुझे अचानक याद आया — ये वही लड़का है जिसने पिछली बार दुकान का पेचकस बेच दिया था, डर के मारे। और आज वो मेरे साथ खड़ा है। इससे बड़ी मरम्मत कौन सी होती है?
मैंने अपने काम की तरफ़ ध्यान दिया।
मुझे दो जगह काम करना था — आँगन में और पीछे मशीन के सामने। यानी मुझे आज एक नहीं, दो बैठकें सँभालनी थीं। घंटी की बात सिर्फ़ शब्द नहीं थी। दो आदमी। मुझे ऐसा आदमी चाहिए था जो आँगन में मेरी जगह बोल सके, जो उन मरीज़ों के सामने खड़ा हो सके जो डर के मारे काँप रहे थे।
मेरे दिमाग़ में एक नाम आया।
उस्ताद अली बक्श।
मैं सीधा उनकी दुकान की तरफ़ गया।
दुकान का दरवाज़ा खुला था और अंदर से सिलाई मशीन की आवाज़ आ रही थी — टिक-टिक, टिक-टिक। मैं अंदर गया तो देखा उस्ताद मशीन पर झुके हुए हैं, और उनके सामने मेज़ पर एक बड़ा सफ़ेद कपड़ा फैला है। वो उस पर बड़े-बड़े अक्षर सी रहे थे।
मैं पास गया और अक्षर पढ़े।
अस्पताल हमारा है।
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