The Mysterious Bell – Chapter 784
"अरे," मैंने कहा, "साँस ले।"
"नहीं लूँगा! पहले सुनो!"
"क्या?"
चिंटू ने एक कदम आगे बढ़ाया और अपने पैर फैलाकर खड़ा हो गया — एक बड़ा-सा पेट निकाला, गाल फुलाए, और चलने लगा जैसे कोई जान-बूझकर धीरे-धीरे, बड़ी-बड़ी डग भर रहा हो। फिर उसने कहा — "बेटा, तूने साहब की बात नहीं मानी —" और अपनी कलाई घुमाकर पान चबाने की नक़ल की।
कमरे में हँसी फूट पड़ी।
शबनम आपा की हँसी सबसे पहले आई। वो ऐसी हँसीं कि उनका पूरा शरीर हिलने लगा। हबीब चाचा के चेहरे पर भी एक पल के लिए कुछ ढीला हुआ। माँ ने अपनी बैसाखी की तरफ़ देखकर मुँह छिपाया, पर उनके कंधे हिल रहे थे।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"बबलू," सानिया ने कहा। उसकी आवाज़ में गंभीरता वापस आ गई थी। "मैंने उसे मंदिर के पीछे देखा। वो वहाँ बैठा था।"
"क्या कर रहा था?"
सानिया ने चारों तरफ़ देखा, जैसे ये बात बड़ों को बताने से पहले सोचना हो।
"रो रहा था," उसने कहा।
चिंटू की नक़ल की हँसी एकदम रुक गई। जैसे किसी ने बल्ब बुझा दिया हो।
"रो रहा था?" मैंने कहा।
"रो रहा था," सानिया ने कहा। "और वो अपनी जेब टटोल रहा था। जैसे कुछ खो गया हो।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और बिना कुछ बोले हम दोनों एक ही चीज़ सोच रहे थे।
बबलू — जो हमेशा सबको डराता था — वो खुद डरा हुआ है।
और जब डरा हुआ आदमी अकेले रोता है, तो समझ लो कि डर उसके अंदर से बड़ा हो चुका है।
तभी मेरी जेब से एक आवाज़ आई। बहुत धीमी।
"जिसके हाथ खाली हों, वही सबसे ज़्यादा खतरनाक होता है।"
मैंने घंटी के काग़ज़ पर हाथ रखा। उसे थाम लिया।
फिर हबीब चाचा की तरफ़ देखा। उनकी आँखें भर आई थीं — अब सूखी नहीं थीं। वो अब बह रही थीं।
"चाचा," मैंने कहा। और ये दो शब्द इतने धीरे निकले कि शायद मैंने कभी किसी को इतने धीरे से नहीं बुलाया था।
मैंने उनका हाथ थाम लिया। उनकी हथेली ठंडी थी। मैंने अपनी दोनों हथेलियों के बीच थामा और रगड़ा।
"मैं तुमसे वादा नहीं करता," मैंने कहा। "क्योंकि वादा करके तोड़ना मुझे नहीं आता। पर मैं इतना कहता हूँ — जिस दिन इमरान वापस आएगा, उस दिन वो खुद तुम्हारे आँगन के हैंडपंप से पानी पिएगा। और जो हत्था उसने तोड़ा था, वो वो खुद जोड़ेगा। ये मेरा वादा है।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगे। एक लंबी नज़र। फिर उन्होंने सिर हिलाया। एक छोटा-सा हिलाना। पर वो काफ़ी था।
तभी कमरे में सन्नाटा आ गया। मेरा मोबाइल बज उठा।
पहले तो मैंने सोचा कि मीरा का कोई मैसेज होगा। फिर देखा — नंबर।
इमरान का नंबर।
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। क्योंकि मीरा ने सुबह ही कहा था कि इमरान का नंबर अब किसी के नाम पर नहीं है। ऐसे नंबर से कॉल आ ही नहीं सकती।
मैंने अंगूठा स्क्रीन पर नहीं रखा। मैंने कमरे में सबकी तरफ़ देखा। टिंकू ने भी अपनी साँस रोक ली थी।
मैंने कॉल उठाई।
"हेलो?"
दूसरी तरफ़ से कोई आवाज़ नहीं आई।
फिर — तीन आवाज़ें।
खट। खट। खट।
धीमी, बराबर, जैसे किसी ने दीवार पर तीन उँगलियाँ टिकटिकाई हों।
और उसके बाद एक आवाज़ आई। इतनी धीमी कि मुझे शब्द नहीं, छाया सुनाई दी।
"काला कमरा।"
लाइन कट गई।
मैंने फोन को देखा। स्क्रीन अब खाली थी। मीरा की तरफ़ देखा — वो पहले से अपनी कलम से कुछ लिख रही थी। टिंकू ने धीरे से कहा, "उस्ताद, वो इमरान भैया की आवाज़ थी?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि आवाज़ इमरान की नहीं थी।
आवाज़ किसी और की थी।
किसी ऐसे की जो उस कमरे के अंदर है और जो जानता है कि हम क्या खोज रहे हैं।
फिर घंटी बोली। और इस बार उसकी आवाज़ में वो धीमापन नहीं था जो पिछली आवाज़ों में था। इस बार आवाज़ साफ़ थी और कड़ी।
"आज रात। अभी। पीली फाइल कल तक नहीं रुकेगी।"
मैंने घंटी को जेब से निकाला और मेज़ पर रख दिया। उसकी पीतल की चमक अब भी वैसी ही थी, पर मुझे लगा कि वो मेरी नहीं — किसी और की है।
"टिंकू," मैंने कहा।
"हाँ उस्ताद?"
"माचिस का डिब्बा निकाल।"
उसने जेब से निकाला। बबलू का दिया हुआ वो माचिस का डिब्बा, जिसमें तीन बत्तियाँ थीं।
"इसमें बत्तियाँ हैं," उसने कहा।
"आज रात काम आएँगी," मैंने कहा। "और तेरी टॉर्च भी।"
"और चाक?"
"चाक भी।"
मैंने सबकी तरफ़ देखा। माँ, पापा, उस्ताद, शबनम आपा, हबीब चाचा, टिंकू, शबनम आपा के पीछे बैठी रज़िया आपा, और मीरा।
"आज रात," मैंने कहा, "हम अस्पताल जाएँगे। पर जाने से पहले एक बात तय कर लो — कौन अंदर जाएगा और कौन बाहर रहेगा।"
"मैं अंदर जाऊँगा," टिंकू ने तुरंत कहा।
"तू नहीं जाएगा," मैंने कहा।
"उस्ताद —!"
"तू बाहर रहेगा," मैंने कहा, "क्योंकि तेरे पास वो चीज़ है जो शायद हममें से किसी के पास नहीं — तेरी उम्र। अगर अंदर कुछ गड़बड़ हुई, तो तू इतनी तेज़ी से भाग सकता है जितनी तेज़ी से मैं नहीं भाग सकता। और तू सबको बता सकता है। तेरे पास वो आवाज़ है जिसे कोई बंद नहीं कर सकता।"
उसने मुँह बनाया। फिर मान गया।
"पर मैं पीछे नहीं रहूँगा," उसने कहा। "मैं सीढ़ी के मुँह पर रहूँगा।"
"ठीक है," मैंने कहा।
उस्ताद ने अपनी मशीन की तरफ़ देखा। फिर कहा —
"मैं साथ चलूँगा।"
"उस्ताद —"
"मैं साठ साल पहले इस घंटी को चला चुका हूँ," उन्होंने कहा। "और मैं जानता हूँ कि इसे अंधेरे में कैसे पकड़ना है। तू अकेले पकड़ेगा, तो उँगली जल जाएगी।"
मैं कुछ नहीं बोला। क्योंकि जब कोई बुज़ुर्ग अपनी उम्र की फिक्र छोड़कर साथ चलने की बात कहे, तो उसे मना करना उसका अपमान करना होता है।
"ठीक है," मैंने कहा।
पापा आगे आए। पहली बार उस रात उन्होंने मुँह खोला।
"मैं और सलीम बक्श पीछे वाले फाटक पर रहेंगे," उन्होंने कहा।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"पर पापा —"
"जो आदमी एक बार झुक जाए," उन्होंने कहा, "उसके लिए दोबारा खड़ा होना सबसे मुश्किल होता है। मुझे खड़े होने का मौका दे।"
मैंने उनकी आँखों में देखा। और उस वक़्त मुझे वो पापा दिखे जो तीस साल पहले थे — जब वो साइकिल की दुकान चलाते थे, जब उनकी कमर झुकी नहीं थी।
"ठीक है," मैंने कहा।
मीरा उठी। उसने अपना बैग उठाया और कंधे पर टाँगा।
"मैं अंदर चलूँगी," उसने कहा। "क्योंकि अगर ये फाइल मिली और कोई कैमरा नहीं रहा, तो वो फाइल घर नहीं आएगी। ये मेरा काम है।"
"और तेरी जान?"
"मेरी जान," उसने कहा, "पहले से ही किसी और के हिसाब में लिखी है। मैंने पाँच साल पहले रमा मैडम की खबर छापकर अपनी आत्मा बेच दी थी। अब वो वापस कमानी है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो सीधी खड़ी थी।
"ठीक है," मैंने कहा।
फिर मैंने उन बच्चों की तरफ़ देखा। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू।
"तुम लोग —"
"हम?" सानिया ने कहा, जैसे उसे बुरा लगा हो। "हम पीछे रहेंगे। पर हम रास्ता देखेंगे। आज शाम हमने देखा है — कौन सा रास्ता खाली है और कौन सा भरा है।"
"कौन सा है?"
"टंकी के पीछे वाला रास्ता खाली है," उसने कहा। "और पीछे वाले फाटक पर दो लकड़ी के जूते वाले आदमी खड़े हैं। हमने देखा है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। ये बच्ची… ये तेरह साल की बच्ची मुझसे ज़्यादा देख रही थी।
"सानिया," मैंने कहा, "तू मेरी आँखें है।"
उसने सिर हिलाया। और उसकी आँखों में वो चमक आई जो बड़े होने पर किसी इंसान में कम ही आती है — वो चमक जो कहती है कि मुझ पर भरोसा किया गया है।
मैं उठा। कमरे में सब उठे।
मैंने देखा — माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं। उन्होंने सब सुना था। उनकी आँखें में कुछ था जो पहले कभी नहीं था — डर नहीं, बल्कि वो डर जो समझ में बदल गया हो।
"अंकुश," उन्होंने कहा।
"हाँ माँ।"
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