The Mysterious Bell – Chapter 781
क्योंकि सच यही था। मेरा हाथ काँप रहा था। और मुझे काँपने की आदत नहीं थी। मैं गली की तमाम मशीनों को काँपते हुए ठीक किया था, पर अपना हाथ कभी काँपता हुआ नहीं देखा था।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसने मेरे चेहरे को देखा। और चूँकि वो मीरा है, उसने कुछ नहीं पूछा। वो चुपचाप मेरे पास आई, मेरे कंधे के पास खड़ी हो गई, और उसने भी वो काग़ज़ देखा।
बंसीलाल मेरे सामने खड़ा था, हाथ जोड़े, आँखें नीची किए।
"यह मेरे पास पंद्रह साल से है," उसने कहा। "मैंने इसे कभी नहीं पढ़ा। मैंने पढ़ाई नहीं की है ज़्यादा। पर एक बार किसी को दिखाया था — एक आदमी को जो तीन साल पहले अस्पताल में दवा लेने आया था। उसने पढ़कर कहा कि ये किसी की ज़मीन का काग़ज़ है। और मैं उसे डरकर संदूक में रख दिया। फिर उसी रात मैंने सोचा — अगर ये ज़मीन का काग़ज़ है, तो ये किसी के काम आ सकता है। और फिर मैंने इसे माचिस के डिब्बे में डाल दिया। क्योंकि माचिस के डिब्बे कोई नहीं खोजता।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में आँसू थे, पर वो अब रोना नहीं चाहता था। वो अपनी बात पूरी करना चाहता था, जैसे पंद्रह साल की चुप्पी का कोई बोझ अब उसके सीने पर नहीं रहना चाहिए।
"तुमने इसे क्यों नहीं दिया किसी को?" मैंने पूछा। "कोई भी होता — डॉक्टर इसरानी, गली के लोग, किसी को?"
"क्योंकि मैं डरता था," उसने सीधा कहा। "यही सच है। अगर मैंने ये किसी को दिया और साहब को पता चल गया — तो मेरी नौकरी जाती, मेरी बेटी की शादी रुक जाती। और मैं डरता था कि अगर मैंने इसे किसी को दिया और वो भी कुछ न कर पाया — तो ये काग़ज़ मेरे हाथ से निकल जाता और ये ज़मीन किसी और के हाथ में। तो मैंने सोचा — इसे मेरे पास ही रहने दो। जब वक़्त आएगा, तब निकलेगा। और मैंने यही सोचकर पंद्रह साल बिता दिए।"
मेरे अंदर कुछ ऐसा हिला जो नाराज़ी नहीं थी। ये कुछ और था। इसे मैं नाम नहीं देना चाहता था, पर मैं जानता था — ये वही डर था जो मेरे पापा के अंदर था। जो बबलू के अंदर था। जो हर उस आदमी के अंदर था जिसने सच देखा था पर सच बोलने से डरा था।
मैंने एक लंबी साँस ली।
"बंसीलाल जी," मैंने कहा, "तुमने ये काग़ज़ नहीं छिपाया। तुमने इसे बचाया है। अगर तुमने इसे पंद्रह साल पहले फाड़ दिया होता, या जला दिया होता, तो आज मुझे अपने दादा का हाथ नहीं दिखता।"
उसने मेरी तरफ़ देखा और फिर उसका मुँह फट गया — रोने का वो पुराना तरीक़ा, जिसमें आवाज़ नहीं आती, सिर्फ़ कंधे हिलते हैं।
मीरा ने अपना कैमरा ऑफ किया। उसने मुझे देखा।
"ये बाहर जाएगा?" मैंने पूछा।
"सिर्फ़ तेरी मर्ज़ी से," उसने कहा। "मैंने इसे ऐसे रिकॉर्ड नहीं किया कि आज सबको दिखा दूँ। मैंने इसे सबूत के लिए रिकॉर्ड किया है।"
"तो ठीक है," मैंने कहा। "अभी नहीं।"
मैंने काग़ज़ को मोड़ा — बहुत धीरे, इतना धीरे जैसे कोई किसी चिड़िया के अंडे को उठा रहा हो — और अपनी कमीज़ की अंदरूनी जेब में रखा, घंटी के ठीक बगल में।
और तभी मुझे याद आया।
"रुको," मैंने कहा।
मैंने घंटी निकाली। उसे हथेली पर रखा।
और फिर मैंने उसे वो काग़ज़ दिखाया।
थोड़ी देर कुछ नहीं हुआ। सिर्फ़ सन्नाटा। पर वो सन्नाटा जिसमें तुम अपनी ही साँस सुनते हो।
फिर घंटी ने कहा — धीमे से, रूखी आवाज़ में, जैसे कोई पुराना आदमी बहुत दूर से बोल रहा हो:
"इसे पढ़ा। उसने बोला था। बात पूरी नहीं हुई।"
"किसने बोला था?" मैंने पूछा।
"तेरे दादा ने। ये आख़िरी काग़ज़ नहीं। आख़िरी काग़ज़ वो है जिसे वो उठाकर नहीं जा सके।"
मैंने घंटी को देखा।
"मतलब?"
"इस टुकड़े के चारों तरफ़ जो था," घंटी ने कहा, "वो अब किसी और के हाथ में है। ये टुकड़ा सिर्फ़ उँगली है। हाथ कोई और है।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो भी मुझे देख रही थी।
"तो असली काग़ज़," मीरा ने धीरे से कहा, "ये टुकड़ा नहीं। ये टुकड़ा उस असली काग़ज़ का हिस्सा है।"
"हाँ," घंटी ने कहा। "और जो असली काग़ज़ है, वो इस टुकड़े को अपने पास बुला रहा है। टुकड़ा कहाँ जाएगा?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
मेरे अंदर कुछ हिला। मुझे समझ आया — अगर ये टुकड़ा असली दान-पत्र का हिस्सा है, तो कैसे इस टुकड़े पर सिर्फ़ दादा का नाम और शर्त है? बाक़ी नाम कहाँ गए?
और फिर बंसीलाल ने वो कहा जो मेरी सोच का जवाब था — वो शब्द जो उसने दबी आवाज़ में बोले, पर जो अस्पताल के पूरे बरामदे में गूँज गए।
"असली पन्ना साहब की पीली फाइल में है। और वो फाइल कल रात तक अस्पताल से बाहर जाने वाली है।"
मैंने अपना हाथ रोक लिया।
"तुम्हें कैसे पता?"
"सुबह," वो बोला, "मैं चारपाई पर बैठा था। सामने अस्पताल की नई पट्टी लगी थी। तभी एक टेम्पो आया। उसमें से मनोज उतरा, वो जो काग़ज़ लाया था और फिर गायब हो गया। उसने कहा कि साहब का हुक्म है — पीला फाइल बाक़ी काग़ज़ों से अलग निकालेगा, उसकी नकल नहीं बनेगी, उसकी फोटो नहीं बनेगी, और उसे कल रात बारह बजे से पहले अस्पताल से बाहर पहुँचाना है।"
"कल रात," मैंने दोहराया। "कल रात यानी आज रात।"
"हाँ," उसने कहा। "आज रात।"
मेरे अंदर कुछ चटका।
मीरा ने अपनी कलाई पर बँधी पापा की घड़ी देखी। वो घड़ी नहीं थी — वो मीरा के पापा की घड़ी थी, जो टूटी हुई थी, पर आज सुबह मीरा ने कहा था कि उसने उसे ठीक कराया है और अब सही वक़्त दिखाती है। उसने देखा और उसका चेहरा कस गया।
"अभी चार बजकर सैंतालीस मिनट हुए हैं," उसने कहा।
मैंने मीरा को देखा।
"आज रात तक मतलब सात-आठ घंटे," मैंने कहा। "और वो फाइल किसके पास है? कहाँ है?"
बंसीलाल ने अपना सिर हिलाया।
"मुझे नहीं पता," उसने कहा। "पर एक बात जानता हूँ। मनोज जब आया था, वो अस्पताल के मुख्य दफ़्तर में गया था — टंकी के नीचे वाला कमरा, जहाँ डॉक्टर इसरानी बैठते हैं। वहाँ एक हरी अलमारी है, जिसके ऊपर पुराने काग़ज़ों के बंडल रखे हैं। और वो फाइल आज सुबह वहाँ नहीं थी।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तो कहाँ है?"
बंसीलाल ने कुछ कहना चाहा, फिर रुक गया, फिर अपने दोनों हाथ जोड़ लिए।
"एक बात है," उसने कहा। "पर उसके लिए तुम्हें मेरी एक बात माननी पड़ेगी।"
"कहो।"
"अगर तुम उस फाइल को लाने निकलो — तो तुम मेरे पास से जाओगे। अस्पताल की पिछली दीवार के साथ। वो रास्ता संकरा है, पर उस पर कोई नहीं आता जाता। मैं तीस साल से वहाँ से किसी को नहीं जाने दिया। आज तुम जाओगे।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो आज रात आएगा," उसने धीरे से कहा, "वो आगे के दरवाज़े से आएगा। और अगर तुम आगे से गए, तो वो तुम्हें देख लेगा।"
मैंने उसकी आँखों में देखा।
"बंसीलाल जी," मैंने कहा, "तुमने ये सब इतने साल छिपाया। अब तुम खुलकर क्यों बोल रहे हो?"
वो हँसा — एक छोटी सी, टूटी हुई हँसी।
"क्योंकि तुमने वो किया जो मैं पंद्रह साल से नहीं कर पाया। तुमने चाबी देने से मना किया, जबकि तुम्हारे पास उनके जैसे दो आदमी आए थे। और मैं जानता हूँ कि तुमने क्यों किया — क्योंकि तुम्हारे पास कोई डरने का कारण नहीं था, और मेरे पास था। बेटी की शादी, नौकरी, बूढ़ी बीवी की दवा। पर तुमने देखा कि फर्क क्या है?"
"क्या?"
"तुम्हारे पास भी दवा का कारण था," उसने कहा। "तुम्हारी माँ. और तुमने फिर भी मना किया।"
मैं कुछ नहीं बोला।
क्योंकि अब मेरे पास कहने को कुछ नहीं था।
टिंकू ने मेरे हाथ को फिर पकड़ा। इस बार उसने धीरे से पकड़ा।
"उस्ताद," उसने कहा, "हम फाइल लाएँगे ना?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
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