The Mysterious Bell777 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 777

7 min read November 5, 2026

मीरा ने मेरी नज़र पकड़ी।

"कोई यहाँ था," उसने कहा।

"हाँ," मैंने कहा। "और वो गया नहीं। वो सिर्फ़ वहाँ चला गया जहाँ हम नहीं देख रहे।"

हम बाहर निकले। बबलू अब भी वहीं खड़ा था, दरवाज़े के अंदर, एक कदम पर। उसने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखें कुछ कह रही थीं जो उसके मुँह से नहीं निकल रहा था।

"अंकुश," उसने कहा।

"हाँ।"

"जब ऊपर जाओ," उसने धीरे से कहा, "तो जो सुनोगे, वो सच नहीं लगेगा। और जो देखोगे, वो तुम्हारे नाम पर लिखा होगा।"

मेरे पैर वहीं रुक गए।

"मतलब?"

पर बबलू ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस अपना सिर हिलाया, जैसे वो खुद भी इस बात को समझ नहीं पा रहा हो। फिर वो सीढ़ियों की तरफ़ मुड़ा।

"बबलू," मैंने कहा। "तू ऊपर जा रहा है या भाग रहा है?"

वो रुका।

"दोनों," उसने कहा। "और यही फ़र्क़ है मुझमें और तुझमें। तू ऊपर जाएगा, क्योंकि तुझे लगता है कि तू किसी को बचा सकता है। मैं ऊपर जा रहा हूँ, क्योंकि मुझे अब भी लगता है कि कोई मुझे बचा सकता है।"

वो सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। उसके लकड़ी के जूतों की आवाज़ ऊपर जाती रही — टक, टक, टक — और फिर धीमी पड़ गई। फिर बिल्कुल बंद।

मैंने एक बार पीछे मुड़कर उस कमरे को देखा। मेज़, काग़ज़, कील, रस्सी। और वो चौकोर साफ़ जगह, जहाँ से बक्सा उठाया गया था। मुझे लगा कि वो जगह मुझे देख रही है, जैसे खाली पेट देखता है।

टिंकू ने मेरी कलाई खींची।

"उस्ताद," उसने कहा। "वो सीढ़ी पर जो डर खड़ा है — वो कौन है?"

मैंने सीढ़ियों की तरफ़ देखा।

"वो," मैंने कहा, "वही है जो अब तक हमें नहीं मिला।"

मैंने टॉर्च बमैंने टॉर्च बंद कर दी।

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा, हैरान।

"अंधेरा है, उस्ताद।"

"हाँ," मैंने कहा। "पर अब जो चीज़ें बची हैं, वो रोशनी से नहीं दिखेंगी।"

"तो किससे?"

"सुकून से," मैंने कहा। "पर तू सुकून में नहीं है। इसलिएअंधेरे में मैंने अपनी आँखें बंद कीं।

सुनने की कोशिश की। वो आवाज़ जो दरवाज़े के पीछे से आ रही थी — काग़ज़ का पन्ना फर्श पर खिंचने जैसी — अब भी थी, पर धीमी, बहुत धीमी, जैसे कोई बहुत बूढ़ा आदमी बहुत धीरे-धीरे पन्ने पलट रहा हो।

"उस्ताद," टिंकू ने फुसफुसाया। "कुछ दिख नहीं रहा।"

"अंधेरे में कुछ नहीं दिखता," मैंने कहा। "पर सुनाई देता है।"

"तो क्या सुन रहे हो?"

मैंने उसकी तरफ़ मुड़कर देखा, हालाँकि उसका चेहरा भी नहीं दिख रहा था।

"जो अब तक नहीं सुना," मैंने कहा।

मीरा ने अपनी जेब से कुछ निकाला। एक छोटी सी आवाज़ आई — क्लिक जैसी। फिर मुझे एहसास हुआ कि उसने अपना कैमरा बंद कर दिया है।

"क्यों बंद किया?" मैंने पूछा।

"क्योंकि जो आवाज़ आ रही है," उसने धीरे से कहा, "मुझे नहीं लगता कि वो कैमरे के लिए है।"

मैंने सिर हिलाया।

"ठीक सोचा," मैंने कहा। "कुछ चीज़ें अपनी आवाज़ सबको नहीं देतीं। वो चुनती हैं कि कौन सुनेगा।"

टिंकू ने मेरी कलाई पकड़ ली। उसका हाथ छोटा और गरम था, और उँगलियाँ काँप रही थीं।

"उस्ताद," उसने कहा। "मैं डर रहा हूँ।"

"पता है," मैंने कहा।

"तुम्हें नहीं लगता?"

"लगता है," मैंने कहा। "पर डर के साथ चलना आता है। ऐसे चलो कि डर तुम्हारे पीछे हो, आगे नहीं।"

उसने कुछ नहीं कहा, पर मेरी कलाई पकड़ने वाला उसका हाथ थोड़ा और मज़बूत हो गया।

मैंने थोड़ी देर और इंतज़ार किया। मैं चाहता था कि अंधेरा मुझे अपनी आदत डाल दे, मुझे खुद को सुनने दे। पर मेरी आँखों के सामने अब भी सिर्फ़ काला था, और उस काली के अंदर सिर्फ़ वो खिंचती आवाज़ थी।

आख़िरकार मैंने टॉर्च जला दी।

रोशनी निकली और कमरे ने एक झटके में अपना चेहरा दिखा दिया। रजिस्टरों का ढेर वहीं था। टूटी कुर्सियाँ वहीं थीं। और वो चौकोर साफ़ जगह — जहाँ से बक्सा उठाया गया था — उस धूल में ऐसे खुली पड़ी थी जैसे किसी ने दाँत निकालकर मुँह खोल रखा हो।

मैं उसी जगह की तरफ़ बढ़ा।

मीरा मेरे पीछे आई, और टिंकू भी। हमारी परछाइयाँ दीवारों पर हिल रही थीं, और जैसे-जैसे हम आगे बढ़े, वैसे-वैसे परछाइयाँ छोटी होती गईं, फिर एक ही जगह सिमट गईं।

उस चौकोर जगह के पास पहुँचकर मैं रुक गया।

मुझे सिर्फ़ धूल दिख रही थी। धूल जिसने किसी चीज़ का आकार याद रखा था।

"यहाँ कुछ था," मीरा ने कहा।

"हाँ," मैंने कहा।

"क्या?"

"एक बक्सा," मैंने कहा।

उसने मेरी तरफ़ देखा।

"तुमने देखा?"

"नहीं," मैंने कहा। "पर जगह बोल रही है। ये धूल आकार में चौकोर है। कोई चीज़ इस पर बैठी थी, बहुत दिन तक। और अब वो नहीं है।"

मैंने घुटने के बल बैठकर उस जगह को उँगली से छुआ। धूल मेरे उँगली पर चिपक गई। सूखी, बहुत सूखी, जैसे बरसों से किसी ने उसे हवा से बचाकर रखा हो।

"अंकुश," मीरा ने कहा। "वो बात जो बबलू ने कही थी। बक्सा यहाँ नहीं।"

मैंने सिर हिलाया।

"हाँ," मैंने कहा। "पर मुझे ये समझना है कि वो यहाँ नहीं है, कि वो यहाँ था। दोनों में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है।"

मैं उठा। मैंने दीवार वाली छिपी अलमारी की तरफ़ देखा, जिसका ताला अब टूटा खुला था। फिर उस बड़ी काली लोहे की आलमारी की तरफ़, जिससे तीन खटखटें आई थीं।

वो अब भी खड़ी थी। चुप। जैसे जानती हो कि उसकी बारी भी आएगी, पर अभी नहीं।

मैं कुछ कहने ही वाला था कि ऊपर से आवाज़ आई।

लकड़ी के जूतों की आवाज़।

टक। टक। टक।

तेज़, हाँफती हुई।

तीनों ने एक साथ ऊपर देखा। सीढ़ियों की तरफ़।

फिर बबलू दरवाज़े पर आकर रुक गया।

वो अंदर नहीं आया। दरवाज़े के चौखट पर ही खड़ा रह गया। उसका एक कदम अंदर था, पर तीन बाहर। उसकी साँस फूली हुई थी, और उसका चेहरा — पसीने से भीगा हुआ, और उस पसीने में काली धूल की लकीरें थीं।

"बबलू भाई?" मैंने कहा। "तू तो ऊपर गया था।"

"गया था," उसने कहा। फिर बात को काटकर, जैसे उसे ज़्यादा नहीं कहना था, "बंसीलाल ऊपर नहीं है।"

"क्या?"

"वहाँ," उसने हाँफते हुए कहा, "उसकी चारपाई पर दो आदमी खड़े थे। लकड़ी के जूते। और बंसीलाल की चारपाई खाली थी।"

टिंकू का हाथ मेरी कलाई पर और कस गया।

मीरा ने फौरन अपनी जेब से कलम निकाली। पर उसने लिखा नहीं।

बबलू ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में अब वो पुरानी चालाकी नहीं थी, बस एक आदमी की थकान थी।

"अंकुश," उसने कहा। "मैंने तुझसे कहा था — बक्सा अब अस्पताल में नहीं है।"

"तो कहाँ है?"

वो चुप रहा। उसकी नज़र एक बार कमरे के कोने की तरफ़ गई, जहाँ अंधेरा सबसे ज़्यादा काला था, फिर वापस मेरे चेहरे पर आई।

"जहाँ सबसे ज़्यादा शोर होता है," उसने कहा, "वहाँ सबसे गहरा सन्नाटा रखा जाता है। ये साहब की आदत है। वो चीज़ें उस जगह रखता है जहाँ कोई ढूँढने की ज़हमत नहीं करता।"

"इसका मतलब?"

"इसका मतलब," उसने कहा, "कि वो बक्सा यहाँ नहीं है। यहाँ सिर्फ़ उसकी जगह है। और उस जगह को देखकर ही साहब को पता चल गया है कि कोई उसे ढूँढ रहा है।"

मेरे भीतर कुछ ठंडा हुआ। वो ठंडक जो गुस्से से पहले आती है।

"तू ये सब मुझे क्यों बता रहा है, बबलू?" मैंने पूछा। "कल तक तू साहब का हाथ था।"

वो हँसा। छोटी, सूखी हँसी।

"क्योंकि," उसने कहा, "आज सुबह साहब ने मेरे घर का पता भी लिया है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तेरे घर का?"

"मेरे घर का," उसने कहा। "और ये कोई नई बात नहीं है उसके लिए। ये उसकी आदत है। जो लोग साहब के रास्ते में आते हैं, उनके घर के बाहर एक गाड़ी खड़ी हो जाती है। कोई उतरता नहीं। कोई बात नहीं करता। बस खड़ी रहती है। और फिर एक दिन आदमी को अपने ही घर में लगने लगता है कि वो कोई और है।"

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