The Mysterious Bell773 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 773

7 min read November 5, 2026

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। उसका चेहरा पीला पड़ गया था। उसने पर्ची अपनी मुट्ठी में कस ली थी, जैसे वो पर्ची अब उसका सहारा हो।

"उस्ताद," उसने कहा। "गली में एक बात कहते हैं। पुराने लोग कहते थे — जो दरवाज़ा बंद होकर नाम बोलता है, वो कभी अपने आप नहीं खुलता। उसे खोलने वाला भी उसमें से होकर गुज़रना पड़ता है।"

"तू ये बातें कहाँ से लाता है?" मीरा ने पूछा।

"माँ कहती थी," टिंकू ने कहा। "पापा के जाने के बाद वो रातों को बैठकर ऐसी बातें कहती थी। मुझे लगता था वो पागल हो गई है। अब लगता है वो कुछ ऐसी चीज़ें देख रही थी जो मैं नहीं देख रहा था।"

मैंने एक लंबी साँस ली।

फिर मैंने मीरा की तरफ़ देखा।

"कैमरा चालू है?"

"चालू है," उसने कहा। "दो मिनट बाक़ी।"

"अच्छा," मैंने कहा। "जब खुले, तो जो अंदर हो, उसे अपना नाम बोलना पड़ेगा। हम नाम बोलेंगे, और वो भी बोलेगा। अगर वो न बोले, तो हम अंदर नहीं जाएँगे।"

मीरा ने सिर हिलाया।

टिंकू ने अपनी जेब से एक छोटा पेचकस निकाला। वो मेरी औज़ार पेटी से उठाया हुआ था, जो कल रात ही मैंने उसे दिया था।

"तुम ये क्यों लाए?" मीरा ने पूछा।

"क्योंकि," टिंकू ने कहा, "अगर ताला नहीं खुलेगा, तो पेचकस से खोलेंगे। और अगर पेचकस से नहीं खुलेगा, तो हम हाथ से खोलेंगे। और अगर हाथ से भी नहीं खुलेगा — तो हम उसी दरवाज़े को बोलेंगे कि वो खुद बताए उसे क्या चाहिए।"

मैं उसकी तरफ़ मुड़ा।

"तू अब कमाल का बच्चा होता जा रहा है," मैंने कहा।

"मैं पहले से था," टिंकू ने कहा। "बस आप देख नहीं रहे थे।"

मैं हँसा।

और उसी हँसी में मैंने चाबी ताले में डाल दी।

चाबी घुसी। पर घूमी नहीं।

मैंने ज़ोर लगाया।

नहीं घूमी।

"ज़ंग," मीरा ने कहा। "मैंने कहा था।"

"ज़ंग नहीं," मैंने कहा और झुककर देखा। "ताला अंदर से जाम है। कोई चीज़ फँसी है।"

मैंने टिंकू से पेचकस लिया और ताले के अंदर महीन सी जगह में डालकर थोड़ा हिलाया।

कुछ खटका।

फिर ज़ोर लगाया।

ताला खुला।

वो छोटी सी आवाज़ — ठस — और मेरे हाथ में ताला बेजान होकर लटक गया।

मैंने ताला उतारा और अपनी जेब में डाल दिया।

और फिर मैंने दरवाज़े पर हाथ रखा।

लकड़ी ठंडी थी। इतनी ठंडी कि लगा जैसे मैंने बर्फ को छुआ हो। मैंने उँगलियाँ उस पर फैलाई और धीरे से धक्का दिया।

दरवाज़ा चरचराया और एक इंच क़रीब खुल गया।

अंदर से एक गंध निकली।

ये जले काग़ज़ की गंध नहीं थी। ये कुछ और था। ये सीलन और लोहे और… और किसी ऐसी चीज़ की गंध थी जिसे मैं पहचानता थी पर नाम नहीं बता सकता था। जैसे माँ के कपड़े की अलमारी में बंद रखे पुराने काग़ज़ की गंध हो, जो तीस साल से खुले ही न हों।

मैंने दरवाज़ा थोड़ा और खोला।

और मेरे पीछे किसी के पैर की आहट आई।

मैंने दरवाज़ा पकड़े हुए ही पलटकर देखा।

मीरा ने अपना कैमरा पलट दिया।

टिंकू ने पेचकस कसकर पकड़ लिया।

ऊपर, सीढ़ियों के मुँह पर, एक आदमी खड़ा था।

मोटा शरीर। काला कोट। बिना सोने की चेन। बिना पानदान। हाथों में कुछ नहीं था और… और वो हाथ काँप रहे थे।

बबलू पांडे।

मैंने कुछ देर उसे देखा।

उसकी हालत देखकर मुझे पहले तो लगा कि वो कोई नाटक कर रहा है। पर नहीं। उसका माथा पसीने से भरा था। उसकी आँखें हमेशा की तरह छोटी नहीं थीं, वो फैली हुई थीं। और उसकी जीभ लगातार होंठों के कोनों पर आ रही थी, जैसे उसने पान चबाया हो और अब थूकने की जगह न मिल रही हो।

"बबलू भाई," मैंने धीरे से कहा। "इतनी जल्दी तुम्हारा ऊपर आना। मैंने तो सोचा था तुम सीढ़ियों पर बैठे रहोगे।"

"मैं सीढ़ियों पर था," बबलू ने कहा।

उसकी आवाज़ भी वो वाली नहीं थी। वो खुरदरी, धमकाने वाली आवाज़ जो हमेशा बड़े साहब की चमकीली सीटी जैसी लगती थी, वो अब बस फुसफुसाहट जैसी थी।

"तो फिर नीचे क्या करने आए?" मीरा ने कहा।

बबलू ने उसकी तरफ़ देखा भी नहीं। उसका ध्यान मेरे पीछे था — उस आधे खुले दरवाज़े पर, जिससे अभी गंध आ रही थी।

"अंकुश," उसने कहा। "मैं तुमसे एक बात पूछूँगा।"

"पूछो," मैंने कहा।

"पर तुम हँसना मत," उसने कहा।

मैं उसकी तरफ़ देखकर रह गया।

मैंने उस आदमी से ज़िंदगी में इतनी नरम आवाज़ कभी नहीं सुनी थी। मुझे लगा जैसे वो अंदर से बहुत दूर किसी चीज़ के पास खड़ा हो और बोल रहा हो।

"हँसूँगा नहीं," मैंने कहा।

बबलू ने एक क़दम नीचे रखा।

फिर रुक गया।

"तुमने बक्सा देखा क्या?" उसने पूछा।

मैंने कुछ नहीं कहा।

"जो उस राख में पड़ा था," बबलू ने कहा। "लोहे का। छोटा। जिसमें कुछ पीला काग़ज़ निकला था।"

मैंने अभी भी कुछ नहीं कहा।

बबलू ने मेरी आँखों में सीधे देखा — और उसकी आँखें सच में काँप रही थीं, मैं झूठ नहीं बोल रहा, आदमी की आँखें काँप रही थीं।

"अगर देखा है," उसने कहा — और उसकी आवाज़ टूट गई — "तो भूल जाओ।"

मैंने एक लंबी साँस ली और पीछे टिंकू की तरफ़ हाथ बढ़ाया, ताकि वो चुप रहे। फिर मैंने दरवाज़ा छोड़ा और एक क़दम बबलू की तरफ़ बढ़ा।

"बबलू भाई," मैंने कहा। "तुम ये बात किसके डर से कह रहे हो?"

उसने जवाब नहीं दिया।

"मैंने तो सुना था," मैंने कहा, "तुम वो हो जो दूसरों को डराता है। आज तुम्हारी आवाज़ क्यों काँप रही है?"

बबलू ने अपना एक हाथ उठाया। मुझे लगा वो मुझे धमकाने के लिए पकड़ने आ रहा है। पर उसने कुछ और किया — उसने अपना हाथ सामने फैला दिया और देखा।

उसका हाथ काँप रहा था।

और वो खुद अपने हाथ को देखकर ऐसे चौंका जैसे पहली बार देखा हो।

"मैं डर नहीं रहा," उसने खुद से कहा, जैसे मुझसे नहीं, खुद से बात कर रहा हो। "मैं डर नहीं रहा। मैंने तो देखा है।"

"क्या देखा?" मीरा ने पीछे से पूछा।

बबलू ने जवाब नहीं दिया। उसने अपना हाथ नीचे किया और उसे कोट की जेब में घुसा दिया, जैसे छिपाना चाहता हो।

"तुम्हारे हाथ में रूमाल था," मैंने कहा। "कल। पीपल पर। जब तुम बिना चेन के आए थे।"

बबलू ने मेरी तरफ़ देखा।

"वो रूमाल चला गया," उसने कहा।

"कहाँ गया?"

"पता नहीं," उसने कहा। "पता नहीं। मैंने उसे सोते समय किसी से बँधवाया था, और सुबह उठा तो… नहीं था। सिर्फ़ मेरी हथेली पर ये निशान था।"

उसने अपना हाथ फिर निकाला और मुझे दिखाया। हथेली के किनारे पर एक उभरी हुई लाल लकीर थी, जैसे कोई धागा रात भर बँधा रहा हो और अब उसकी छाप छोड़ गया हो।

"बबलू भाई," मैंने कहा। "तुम ऐसे आदमी नहीं हो।"

"मैं क्या आदमी हूँ," उसने कहा। "मुझे खुद नहीं पता।"

वो सीढ़ियों पर बैठ गया। बैठा भी नहीं, गिरा। उसका मोटा शरीर धड़ाम से सीढ़ी के पत्थर पर बैठ गया और उसने अपना सिर दोनों हाथों में पकड़ लिया।

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया — रुको।

मैं बबलू के सामने बैठ गया।

"सुनो," मैंने कहा। "तुम कल से यही कह रहे हो — तुमने बक्सा देखा है। अब साफ़ बोलो। क्या देखा?"

बबलू ने सिर उठाया।

उसकी आँखों में पानी था। जी हाँ। बबलू पांडे की आँखों में पानी था, वो आदमी जो मुझे कल गुमटी पर गला पकड़कर उठा लिया था।

"तुम्हारे पापा," उसने कहा।

मैं सकपका गया।

"क्या?"

"तुम्हारे पापा," उसने फिर कहा। "पाँच साल पहले। शंकर यादव। मैंने उन्हें देखा था।"

"कहाँ देखा?"

"यहाँ नहीं," बबलू ने कहा। "ऊपर। भारद्वाज भवन में। चंद्रेश सक्सेना के दफ़्तर में।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा और मेरे भीतर कुछ ऐसा उठा जो बहुत समय से दबा हुआ पड़ा था।

"मुझे बताओ," मैंने कहा।

बबलू ने गला साफ़ किया।

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