The Mysterious Bell766 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 766

7 min read November 5, 2026

मैंने देखा — पाँच जोड़ी चप्पलें, एक काला चश्मा, एक टूटा हुआ चश्मा, और एक सिर पर बँधा हुआ गुलाबी दुपट्टा। मेरी माँ का दुपट्टा। टिंकू।

वो दौड़ते हुए आए।

"भैया!" टिंकू ने कहा, और वो इतना हाँफ रहा था कि उसे पहले साँस लेने देनी पड़ी। सानिया उसके पीछे थी, गुड्डू सबसे पीछे, और चिंटू के हाथ में एक टूटी रिम थी, जिसे वो हर हाल में साथ लाता था।

"अरे, पहले साँस ले," मैंने कहा। "कहीं आग लगी है?"

"आग नहीं," टिंकू ने कहा। "पानी।"

"पानी?"

"अस्पताल के पीछे वाली पानी की टंकी। बंसीलाल चाचा वहाँ बैठे हैं।"

मैं उठ खड़ा हुआ।

"टंकी के पीछे," सानिया ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो गर्व था जो सिर्फ़ चौदह साल की उम्र में होता है। "मैंने उन्हें देखा। वो बोरी ओढ़कर बैठे थे और काँप रहे थे। फिर एक सफ़ेद गाड़ी गली के मुँह पर आई, तो वो उठकर टंकी के पीछे चले गए और फिर बाहर नहीं आए।"

मैंने हबीब चाचा की तरफ़ देखा।

"चाचा, आप यहीं बैठिए। टिंकू आपके साथ रहेगा।"

"नहीं," चाचा ने कहा, और वो उठ खड़े। "मैं साथ चलूँगा। मैं घर में बैठकर इंतज़ार नहीं करूँगा। मैंने तीस साल इंतज़ार में गँवा दिए।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी कमर झुकी थी, पर आँखें सीधी थीं।

"ठीक है," मैंने कहा। "पर चाचा, वहाँ जो भी हो, आप शांत रहिएगा। अगर वो डरा हुआ है, तो हमें भी डरा हुआ नहीं दिखना है।"

वो सिर हिलाकर मान गए।

अस्पताल के पीछे वाली पानी की टंकी — मैंने उसे देखा था। बड़ी, काली, लोहे के चार पायों पर टिकी। उसके नीचे सूखी घास उग आई थी, और उस घास में शीशे के टुकड़े और पुरानी पत्तियाँ पड़ी थीं। टंकी से पानी नहीं टपकता था। बरसों से नहीं टपकता था। यही उसकी सबसे अजीब बात थी। टंकी हो और आवाज़ न करे।

जब हम वहाँ पहुँचे, तो धूप सिर पर आ गई थी।

और टंकी के पीछे, ज़मीन पर, बंसीलाल बैठे थे।

उम्र के हिसाब से वो इस तरह नहीं बैठते। वो अपने घुटनों को सीने से लगाकर बैठे थे, बोरी सिर पर ओढ़े हुए, और उनके हाथ ज़मीन पर रखे थे, जैसे वो गिरकर उठे हों और फिर उठने का हौसला न हुआ हो।

"चाचा," मैंने कहा।

वो चौंके। पूरी देह से चौंके, जैसे किसी ने उन पर पानी डाल दिया हो।

"मैं — मैं कुछ नहीं बोलूँगा," वो तुरंत बोले। "मैं कुछ नहीं बोलूँगा। मैंने कुछ देखा नहीं। मैं रात से यहीं हूँ।"

"चाचा, मैं आपसे कुछ पूछने नहीं आया," मैंने कहा, और मैं उनके सामने वैसे ही बैठ गया जैसे सुबह हबीब चाचा के सामने बैठा था। नीचे। घुटनों के पास। "मैं आपका सीटी लौटाने आया हूँ।"

मैंने जेब से वो पीतल की सीटी निकाली, कपड़े खोला और उनकी तरफ़ बढ़ा दी।

बंसीलाल ने उसे देखा, और उनका चेहरा बदल गया।

"ये मेरी है," उन्होंने कहा। और फिर बहुत धीरे से, जैसे खुद को ही सुन रहे हों, "पर कल रात ये बजी नहीं थी।"

"मतलब?"

उन्होंने सीटी अपने दोनों हाथों में ली। उनकी उँगलियाँ उस पीतल को सहला रही थीं, जैसे कोई पुराना ज़ख़्म सहलाता है।

"तीस साल से ये सीटी मेरे पास है," उन्होंने कहा। "मैं रात दो बजे गश्त लगाता हूँ। जब भी कोई चोर दिखता है या कोई आवाज़ आती है, मैं इसे फूँकता हूँ। पर ये खुद कभी नहीं बजी। एक बार भी नहीं।"

वो मेरी तरफ़ देखने लगे, और उनकी आँखों में वो डर था जो उम्र से नहीं आता, जो सिर्फ़ समझने से आता है।

"कल रात ये तुम्हारे हाथ में बजी। और जो आवाज़ इससे निकली, वो मेरी नहीं थी।"

मेरा गला सूख गया।

"तो वो किसकी थी, चाचा?"

वो चुप रहे। उन्होंने टंकी के पीछे देखा, फिर अस्पताल की दीवार की तरफ़, फिर अपने हाथों की तरफ़।

"बेटा," उन्होंने कहा। "मैं बोलूँगा तो मेरी नौकरी जाएगी।"

"नौकरी जाए तो जाए," हबीब चाचा बोले। वो मेरे पीछे खड़े थे, और उनकी आवाज़ में वो कड़क थी जो मैंने उनमें आज तक नहीं सुनी थी। "जान जाए तो?"

बंसीलाल ने उनकी तरफ़ देखा।

"तुम कौन हो?"

"मैं वो हूँ जिसका बेटा कल रात से घर नहीं आया," हबीब चाचा ने कहा। "और मैं तीस साल से अपने आँगन में यही सोच रहा हूँ कि मैं किसी की मदद क्यों नहीं करता। आज सुबह मुझे जवाब मिल गया। क्योंकि जब तक इंसान खुद डरता है, वो किसी और को हिम्मत नहीं दे सकता।"

बंसीलाल ने अपनी बोरी खींचकर और ऊपर कर ली, जैसे ठंड लग रही हो।

"मेरी बेटी की शादी अगले महीने है," उन्होंने कहा। "मेरे पास दो हज़ार रुपये हैं। बस। तीस साल की नौकरी, दो हज़ार। अगर मैं आज बोलूँगा, तो कल किसी और को इस गेट पर खड़ा मिलेगा। और वो मुझसे बदला लेगा, क्योंकि मैं इकलौता हूँ जिसने देखा है।"

"क्या देखा है, चाचा?" मैंने पूछा।

वो चुप रहे।

मैंने उनके सामने वैसे ही बैठे-बैठे कहा, धीरे से, बिना ज़ोर दिए —

"चाचा, मैं आपको कुछ नहीं कहूँगा। न हुक्का, न दुआ, न कोई बड़ी बात। मैं सिर्फ़ इतना कहूँगा कि डर कोई जवाब नहीं होता। डर एक सवाल होता है।"

उन्होंने सिर उठाया।

"सवाल?"

"हाँ, चाचा। जवाब का मतलब होता है — बात खत्म। अब आगे बढ़ो। पर डर खत्म नहीं होता। डर बार-बार पूछता है। रात को पूछता है, सुबह पूछता है, चाय पीते वक़्त पूछता है। और अगर आप उसका जवाब नहीं देंगे, तो वो ज़िंदगी भर पूछता रहेगा।"

मैंने उनके हाथ में पड़ी सीटी की तरफ़ देखा।

"मैं आपसे सभा में खड़े होने को नहीं कह रहा। मैं आपसे काग़ज़ पर अंगूठा लगाने को नहीं कह रहा। मैं सिर्फ़ इतना पूछ रहा हूँ — इमरान कहाँ है?"

बंसीलाल ने आँखें बंद कर लीं।

बहुत देर तक बंद रखीं। इतनी देर कि मुझे लगा वो सो गए हैं, या हमसे बचने के लिए कोई बहाना सोच रहे हैं। पीछे टिंकू खड़ा मेरी तरफ़ देख रहा था, और उसकी आँखों में सवाल था — भैया, ये बोलेगा या नहीं?

फिर बंसीलाल ने आँखें खोलीं।

"साहब," उन्होंने कहा। और आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे आगे झुकना पड़ा।

"साहब?" मैंने दोहराया।

"रणवीर भारद्वाज," उन्होंने कहा, और ये नाम उनके मुँह से ऐसे निकला जैसे कोई भारी बोरी उतार रहा हो। "वो कई रातों से नीचे वाले कमरे में जाता है।"

मैंने साँस रोक ली।

"अकेला?"

"अकेला," बंसीलाल ने कहा। "और बत्ती नहीं जलाता। वो सीढ़ी उतरता है और मैं ऊपर सुनता रह जाता हूँ। कभी-कभी वो चार-पाँच मिनट में लौट आता है। कभी-कभी घंटे भर। और जब लौटता है, तो उसके जूते पर धूल होती है, और उसके हाथ ठंडे होते हैं। मैंने एक बार उसके हाथ की तरफ़ देखा था, और उसने मेरी तरफ़ ऐसे देखा कि मुझे लगा मेरी नौकरी आज रात खत्म।"

"कल रात?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ भारी हो रही थी।

बंसीलाल ने मेरी तरफ़ देखा।

"कल रात मैंने इमरान को उसी सीढ़ी पर खड़ा देखा।"

टंकी के नीचे से हवा का एक झोंका आया और बोरी का कोना हिल गया।

"तीसरी सीढ़ी पर," बंसीलाल ने कहा। "वो खड़ा था, और वो हँस रहा था।"

मेरे पीछे हबीब चाचा की साँस टूटी। मैंने उनकी तरफ़ मुड़कर देखा — उनका हाथ मुँह पर था।

"हँस रहा था?" चाचा ने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी। "इमरान? मेरा इमरान?"

"हाँ, चाचा," बंसीलाल ने कहा। "हँस रहा था। जैसे कोई बच्चा हँसता है जब उसे कोई ऊँची जगह पर बिठा दे।"

मुझे कुछ ठंडा सा महसूस हुआ। मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी अब गरम भी नहीं थी, ठंडी भी नहीं थी। वो बस बैठी थी, जैसे कोई सुन रहा हो।

"और उसके पीछे?" मैंने पूछा।

बंसीलाल ने गला साफ़ किया।

"उसके पीछे एक आदमी खड़ा था," उन्होंने कहा। "जिसके पैरों में लकड़ी के जूते थे।"

उन्होंने सीटी को अपनी जेब में रख लिया और अपनी झुर्रियों वाली गर्दन ऊपर की।

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