The Mysterious Bell755 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 755

7 min read November 5, 2026

उन्होंने मुँह खोला। फिर बंद कर दिया। जैसे किसी ने उनके अंदर कोई चीज़ रोक दी हो।

और फिर उन्होंने वो कहा जो मुझे रात भर नींद नहीं लेने देगा।

"तुम्हारी घंटी," उन्होंने कहा, बहुत धीरे, "तुम्हारे अपने लोगों ने नहीं, तुम्हारे डर ने खोई है।"

मैं खड़ा रह गया।

"सोचो," उन्होंने कहा। "उस दिन तुमने कितनी बार सोचा कि घंटी कहीं दिखे नहीं, कहीं कोई छीन न ले, कहीं कोई देख न ले? तुमने उसे जेब में रखा, कपड़े में लपेटा, तकिये के नीचे छिपाया। एक औज़ार को तुमने खुद कैद कर दिया। और जो चीज़ कैद में रहती है, वो एक दिन छूटती है। मैंने तो सिर्फ़ हाथ बढ़ाया था।"

मेरे पास शब्द नहीं थे।

वो दरवाज़े तक गए। फिर रुके। पलटे नहीं। सिर्फ़ रुके।

"और हाँ," उन्होंने कहा, "उस रविवार की सभा के लिए। मैं भी आऊँगा। मेरी भी एक याद है। अस्पताल से।"

वो चले गए।

सफ़ेद गाड़ी की आवाज़ आई और फिर गली चुप हो गई।

मैं वहीं खड़ा रहा। मेरी जेब में धागा था। मेरे गले में खाली धागा था। और मेरे सामने मेरे पापा खड़े थे, औज़ारदान ज़मीन पर रखे, और उनके हाथ काँप रहे थे।

"बेटा," पापा ने कहा।

"हाँ?"

"वो सही कह गया।"

मेरा गला सूख गया। "पापा—"

"सुन ले," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा था जो बत्तीस साल से दबा हुआ था। "डर सच बोलता है, बेटा। इसीलिए तो वो सबसे ज़्यादा डराता है। डर कभी झूठ नहीं बोलता। वो बस इतना सच बोलता है कि तू अपनी ताक़त भूल जाए।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। बत्तीस साल की चुप्पी उनके चेहरे पर थी, और उस चुप्पी पर पहली बार कोई दरवाज़ा खुलता दिख रहा था।

"तो फिर," मैंने कहा, "मैं क्या करूँ?"

"तू वो कर जो मैं नहीं कर पाया," पापा ने कहा। "डर को हरा मत। उसके साथ चल। पर उसे कभी मेरी तरह घर मत बना लेना।"

उन्होंने औज़ारदान उठाया और अंदर चले गए।

और मैं दुकान में अकेला खड़ा रह गया, एक खाली धागे के साथ, एक ऐसे शहर में जहाँ उस वक़्त किसी की घंटी नहीं बज रही थी।

॥

मंच से नीचे उतरते वक़्त मेरे पैर सीढ़ी के लाल कालीन पर ऐसे पड़े जैसे किसी और के पैर हों।

ऊपर रणवीर भारद्वाज अभी भी माइक पकड़े खड़े थे। भीड़ ताली बजा रही थी, कैमरे चमक रहे थे, और वो सबको अपनी आवाज़ से ऐसे बाँध रहे थे जैसे कोई बच्चों को कहानी सुना रहा हो। मेरी जेब में एक खाली धागा था। मेरे गले में एक और। बस इतना ही बचा था।

नीचे पहुँचा तो टिंकू सीधा मुझसे चिपक गया।

वो कुछ नहीं बोला। बस मेरी कमीज़ पकड़कर चिपक गया, और उसका छोटा सा सिर मेरी छाती पर टिक गया। उसका पूरा शरीर काँप रहा था। मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।

"उस्ताद," उसने फुसफुसाकर कहा, "मैंने देखा।"

"क्या देखा?"

"मंच के पीछे।"

मैंने उसका कंधा पकड़कर उसे थोड़ा हटाया, ताकि उसका चेहरा दिखे। उसकी आँखें लाल थीं, पर रो नहीं रहा था। उसके होंठ दबे हुए थे। यही तो फ़र्क़ था उसमें और बाक़ी बच्चों में — जब सब रोते हैं, यह चुप हो जाता है। और जब यह चुप होता है, तो कुछ पता होता है।

"धीरे बोल," मैंने कहा। "क्या देखा?"

"बबलू।"

नाम सुनते ही मेरी गर्दन के पीछे का मांस कस गया।

"वो बार-बार मंच के पीछे आ-जा रहा था," टिंकू ने कहा। "तीन बार। पहली बार तो मैंने सोचा पान खाने गया होगा। दूसरी बार मैंने देखा कि वो उस तरफ़ जा रहा है जहाँ से मंच की सीढ़ी पड़ती है। और तीसरी बार —"

वो रुका। गला साफ़ किया।

"तीसरी बार वो सीधा साहब के पीछे खड़ा था। और उसने अपनी जेब टटोली। ऐसे —" टिंकू ने हाथ आगे किया और अपनी जेब के ऊपर से हाथ फेरा, "— ऐसे कि कोई चीज़ अंदर है, और वो देखना चाहता है कि गिरी तो नहीं।"

मेरे अंदर कुछ जल उठा।

वो जलन वैसी नहीं थी जैसी गुस्से में होती है। वो जलन ऐसी थी जैसे कोई मेरे सीने के अंदर एक माचिस जला कर छोड़ गया हो और बंद कर गया हो। मुझमें एक ही इच्छा उठी — बबलू के पास जाऊँ, उसका गला पकड़ूँ, और उसके दाँतों के बीच से पूछूँ कि जेब में क्या था।

मैंने कदम बढ़ाया ही था कि मीरा का हाथ मेरी बाँह पर पड़ा।

"रुक।"

"मीरा—"

"मैंने कहा रुक।"

मैं उसकी तरफ़ पलटा। मीरा के कंधे पर कैमरा था। उसके बाल हवा से बिखरे हुए थे और उसके माथे पर पसीना था। पर उसकी आवाज़ में वही पुरानी कड़क थी, वही जो पहले दिन मेले में मेरे सामने माइक थमाते वक़्त थी।

"सुन," उसने कहा, बहुत धीरे, इतना धीरे कि सिर्फ़ मैं सुन सकूँ। "तू अभी वहाँ गया, सबके सामने उसका गला पकड़ा, तो क्या होगा?"

"उससे पूछूँगा—"

"तो क्या होगा?" उसने दोहराया। "सोच। कुछ सोच भी।"

मैं चुप हो गया।

"तू गला पकड़ेगा," मीरा ने कहा, "और वो चीख़ेगा कि अंकुश ने बिना बात मारपीट शुरू कर दी। और साहब जो अभी ऊपर माइक पर खड़े हैं, वो तुरंत नीचे आएँगे, तेरा कंधा थपथपाएँगे और कहेंगे — देखा, मैंने कहा था न, यह लड़का अभी छोटा है। और पूरी भीड़ उनकी बात मान लेगी। बस इतनी देर में।" उसने उँगली उठाई। "इतनी देर में तेरा सारा काम, तेरे सारे सवाल, वो सब काग़ज़, वो सब लोग जो आज तेरे साथ खड़े हैं — सब खत्म। मुझे बता, यही जीतना है उसे?"

मैंने मुट्ठी बाँधी। नाखून हथेली में धँसे।

"पर वो घंटी—"

"घंटी की बात सबको पता है," मीरा ने कहा। "और यही तो उसका खेल है। वो चाहता है कि तू सबके सामने ऐसा कुछ करे जो उसे तेरे ख़िलाफ़ एक गवाह दे दे। वो चाहता है कि तू गुस्से में बोले और वो रिकॉर्ड कर ले।"

मैंने अपनी साँस रोकी। फिर छोड़ी।

ऊपर मंच पर रणवीर ने मज़ाकिया अंदाज़ में कुछ कहा और भीड़ हँस पड़ी। वो हँसी मेरे कानों में सुई जैसी उतरी।

मैंने पीछे मुड़कर देखा। बबलू मंच के पीछे खड़ा था, एक हाथ पानदान पर और दूसरा जेब के बाहर। उसकी नज़रें मुझ पर नहीं थीं। वो दूसरी तरफ़ देख रहा था, जैसे कुछ भी नहीं हुआ हो। पर उसकी जेब पर रखा हाथ मुट्ठी बनकर टिका हुआ था। यह आदमी जानता था कि उसकी जेब में क्या है। और वो जानता था कि मैं जानता हूँ।

उसने एक बार मेरी तरफ़ देखा। बस एक बार।

और मुस्कुरा दिया।

मैंने अपना गुस्सा पी लिया। सच कहूँ तो मैंने पहली बार ऐसा किया। गुस्सा पीना काफ़ी नहीं होता — गुस्सा पीकर चलते रहना होता है, और मैंने वही किया। मैंने अपनी कमीज़ ठीक की, टिंकू का हाथ पकड़ा, और भीड़ के बीच से बाहर निकल गया।

रास्ते में एक-एक करके चेहरे आए।

भोला भाई — जो मुझे देखकर आँखें चुरा गए। शबनम आपा — जो पीतल की थाली उठाए खड़ी थीं और जिनके चेहरे पर ऐसा कुछ था जैसे वो कुछ कहना चाहती हों पर कह न पा रही हों। उस्ताद अली बक्श — जो एक कोने में खड़े थे, बिल्कुल सीधे, मेरी तरफ़ देख रहे थे। उनके हाथ में कैंची थी। वो कैंची उन्होंने कैसे पकड़ी थी, मुझे आज भी याद है — जैसे कोई तलवार पकड़ता है।

बूढ़ी मैडम दूर खड़ी थीं और उन्होंने मेरी तरफ़ देखा ही नहीं।

और पापा?

पापा वहाँ नहीं थे।

जहाँ मैंने उन्हें खड़ा छोड़ा था, वहाँ सिर्फ़ गिरी हुई एक सफ़ेद कुर्सी थी और ज़मीन पर कुचले हुए कंबलों के फटे काग़ज़।

मेरे पेट में कुछ ठंडा उतरा।

मीरा ने शायद मेरा चेहरा देख लिया।

"पापा गए हैं," उसने कहा। "मैंने देखा। तू मंच पर था तभी। वो चुपचाप पीछे से निकले और सीधे गली की तरफ़ चले गए। किसी से कुछ नहीं कहा।"

मैंने सिर हिलाया।

हम चलते रहे। मेला मैदान पीछे छूट गया, बड़े तालाब की हवा पीछे छूट गई, और गली के मुँह पर पहुँचते-पहुँचते शाम का रंग बदलने लगा था।

और तभी, चलते-चलते, मेरा हाथ अपने आप जेब में गया।

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