The Mysterious Bell – Chapter 743
उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा। वो हाथ भारी था — इतना भारी कि मुझे लगा मेरी कमर झुक जाएगी। उसकी उँगलियाँ मेरे कंधे की हड्डी पर इस तरह बैठी थीं, जैसे कोई किसान अपनी ज़मीन पर हल रखता हो। उसने बहुत धीरे कहा, इतनी धीमी आवाज़ में कि माइक ने भी नहीं पकड़ा —
"डरने की बात नहीं, बेटा। शहर तो तुम्हारे जैसे लड़कों का है।"
मैंने सिर घुमाकर उसे देखा।
वो मुस्कुरा रहा था। ऐसी मुस्कान जिसमें कोई ज़हर नहीं, कोई नफ़रत नहीं — सिर्फ़ एक ठंडी सी जानकारी कि अब तुम बंधे हुए हो। उसकी आँखों में वही चमक थी जो बड़े तालाब के पानी में शाम की आख़िरी किरण में होती है। सुंदर। पर छूने से काँप देती है।
मैंने अपना हाथ जेब से बाहर निकाला।
उँगली पर धागे की एक लकीर चिपकी थी — हल्की नीली। मैंने उसे नाखून से खुरच दिया।
भीड़ अब भी ताली बजा रही थी। कुछ देर पहले मुझे लगा था ये तालियाँ रणवीर के लिए हैं। अब मुझे समझ आया — ये तालियाँ भीड़ अपने ही डर को दबाने के लिए बजा रही थी। जब कोई बहुत बड़ा आदमी सामने खड़ा हो और तुम्हें सच में कुछ बोलना हो, और तुम न बोल पाओ, तो तुम ताली बजाते हो। ताली सबसे आसान चीज़ है दुनिया में। किसी का दिल दुखाने वाली बात कहने से आसान। किसी की चोरी देखकर रोने से आसान। और अपने आप को आदमी समझने का सबसे सस्ता तरीक़ा।
मैंने अपनी साँस रोकी और गिना। मैं खड़ा हूँ। मैं नीचे नहीं गिरा। मेरे पैर ज़मीन पर हैं। मेरे हाथ दोनों साबुत हैं। मेरा चेहरा सामने है। मेरी आँखें खुली हैं।
मेरा शरीर ज़िंदा है।
अब सवाल सिर्फ़ एक — मेरे पास क्या बचा है?
मैंने चारों तरफ़ देखा। सामने तीन-चार कुर्सियाँ खाली थीं — वो कुर्सियाँ जो भारद्वाज ट्रस्ट ने ख़ास तौर पर खाली रखी थीं। मुझे पता है वो क्या चाहते थे। वो चाहते थे कि मैं उन कुर्सियों पर बैठकर तस्वीर में आऊँ। कि लोग देखें कि अंकुश यादव भी साहब की मेहमानी में शामिल है। और फिर दूसरे दिन जब सारे काग़ज़ उनके नाम पर हो जाएँ, तो कोई न कहे कि अंकुश ने ख़बर दी। कोई न कहे कि अंकुश ने खुलकर विरोध किया। सब कहें — देखो, वो भी साहब के साथ था।
तभी मुझे याद आया — मेरी जेब में सिर्फ़ धागा नहीं था। मेरी जेब में एक और चीज़ भी थी। मीरा का दिया हुआ सुनहरा कार्ड। और वो रात की धमकी वाली पर्ची — जिस पर लिखा था कि मंच पर तेरी घंटी बजेगी और तू चुप रहेगा।
मैंने अपने मुँह के भीतर जीभ को तालू से सटाया। जैसे ये जाँचना हो कि अंदर कुछ अब भी महसूस हो रहा है। हाँ। महसूस हो रहा था। एक कड़वाहट, जो गले से ऊपर आ रही थी।
मेरे सीने में एक चीज़ अब भी धड़क रही थी। और वो चीज़ थी — गुस्सा।
पर यह गुस्सा किसी और पुराने तरीक़े वाला नहीं था। यह अलग तरह का गुस्सा था। ठंडा। जैसे लोहे की रॉड जो एक बार टूट कर चुपचाप पड़ी हो, और उसके टूटे सिरे से सिर्फ़ एक बात आ रही हो — मैं अभी मरी नहीं हूँ।
मैंने माइक की तरफ़ हाथ बढ़ाया।
सिर्फ़ मेरा हाथ बढ़ा — कोई शब्द नहीं, कोई तर्क नहीं, कोई नाटक नहीं। बस हाथ। जैसे किसी दुकान पर बैठा आदमी कहे — भाई, ज़रा वो औज़ार दे देना।
रणवीर ने मेरी तरफ़ देखा।
वो एक पल रुका।
उस पल में मैंने उसकी आँखों में एक सवाल देखा — पागल हो गया है क्या ये। पर फिर उसने वही मुस्कान ओढ़ ली, और माइक मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। क्योंकि भीड़ देख रही थी। और वो भीड़ के सामने माइक मना नहीं कर सकता था। वो भीड़ के सामने अच्छा ही दिखना चाहता था। उसकी सारी ताक़त इसी में थी — अच्छा दिखने में।
मैंने माइक अपने हाथ में लिया।
हाथ काँप रहा था। मैं झूठ नहीं बोलूँगा। मेरे हाथ में माइक था और मेरा हाथ काँप रहा था। मैंने माइक को दूसरे हाथ से थामा और अपनी साँस रोकी। फिर छोड़ी। फिर दोबारा भरी।
— और फिर मैंने कहा।
धीरे, बहुत धीरे, जैसे कोई बीमार आदमी अपने घर वालों से बोलता है, जब वो अपनी बात कहने से पहले लंबी साँस लेता है —
"मैं आज किसी पर इल्ज़ाम नहीं लगाऊँगा।"
पूरा पंडाल चुप हो गया।
उस पल मैंने महसूस किया कि मेरी आवाज़ कितनी फटी हुई है। जैसे कोई बहुत पुराना लाउडस्पीकर, जो गर…जो गरमी में चटक गया हो और अब बोलने से पहले हाँफता हो।
"मैं आज किसी पर इल्ज़ाम नहीं लगाऊँगा।"
मैंने एक पल रुककर भीड़ को देखा। सामने की पंक्ति में वो लोग बैठे थे जिन्हें कुर्सी मिली थी — कुछ बुज़ुर्ग, कुछ मोटे कुर्ते वाले, कुछ औरतें जिनके हाथ में पोटली थी। उनके पीछे खड़ी भीड़, और आख़िरी पंक्ति में मेरी गली। उस्ताद अली बक्श अपनी लाठी पर झुके खड़े थे। शबनम आपा दोनों हाथ जोड़े। भोला भाई मुँह उठाए। और मेरे पाँच जासूस — टिंकू के हाथ में तीसरी चाबी, सानिया की गोद में लाल कवर वाली कॉपी।
मैंने साँस ली और आगे कहा।
"क्योंकि इल्ज़ाम लगाने से कुछ नहीं होता। इल्ज़ाम लगाने से इंसान सुनता नहीं, वो सिर्फ़ बचता है। मैंने यह बात महीने भर में सीखी है। धीमे-धीमे। खुद पर।"
कुछ लोग हँसे। हल्की हँसी, जो अक्सर तब आती है जब कोई अपनी ही बात उड़ा दे।
"आज मैं सिर्फ़ एक बात कहूँगा। और वो बात भी कोई बड़ी नहीं है। छोटी सी है। अगले रविवार से पहले, जो भी इस गली में रहता है, जो भी इस मोहल्ले में रहता है — अपने घर से एक चीज़ निकालकर लाए। एक याद। नई नहीं, पुरानी। जो अस्पताल से जुड़ी हो।"
भीड़ में सनसनी सी दौड़ी।
"नूर अस्पताल के बाहर से जुड़ी कोई पुरानी चीज़ — कोई पर्ची, कोई तस्वीर, कोई दवा का खाली डिब्बा, कोई काग़ज़, किसी का कोई फटा हुआ रूमाल। जो भी हो। जिसे आपने संभाल के रखा है। किसी दराज़ में, किसी संदूक में, किसी तकिये के नीचे। उसे अगले रविवार सुबह दस बजे पीपल के नीचे लेकर आएँ। मैं वहाँ बैठा मिलूँगा। कुछ बेचने को नहीं बुला रहा। कुछ लेने को नहीं बुला रहा। सिर्फ़ देखने को बुला रहा हूँ — कि इस मोहल्ले के पास क्या है।"
एक आदमी ने बीच से पूछा, "और क्या होगा इससे?"
मैंने माइक से सीधे कहा, "यही तो देखना है।"
हँसी फैल गई। पर उस हँसी में एक अजीब सी चीज़ थी — जैसे किसी ने अपने घर की अलमारी में रखी पुरानी चीज़ के बारे में पहली बार सोचा हो।
मैंने माइक थोड़ा और ऊपर किया।
"और हाँ, यह बात मैं सिर्फ़ गली वालों से नहीं कह रहा। मैं मंच पर खड़े साहब से भी कह रहा हूँ। साहब, आप भी एक याद लाइए। अस्पताल से जुड़ी। आपके पास तो बहुत कुछ है — आपने कितने लोगों को मुफ़्त इलाज दिया, कितने कंबल बाँटे। सोचिए, आपके पास ऐसी कौन सी याद है जो अस्पताल से जुड़ी हो और जिसे आपने संभालकर रखा हो।"
और यहाँ मैं रुका।
क्योंकि मैं देखना चाहता था।
रणवीर भारद्वाज का चेहरा — जिसने अब तक पूरी भीड़ को अपनी उँगली पर नचाया था — उस पर पहली बार एक बात दिखी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी।
उनकी आँखों के कोनों में एक हल्की सी खिंचाव आई। ऊपर के होंठ नीचे के होंठ पर थोड़ा दब गए। यह सब एक पल का था। फिर उन्होंने दोनों हाथ जोड़े, हँसे, और अपना सिर हिलाया — मानो कह रहे हों, बहुत बढ़िया, बहुत बढ़िया, यह लड़का तो दार्शनिक निकला।
पर वो चुक गए।
क्योंकि मैंने उन्हें अपनी दुकान पर पहले भी देखा था, और पीपल के नीचे भी, और उस सफ़ेद गाड़ी में भी। पर यह बात मैंने पहली बार देखी थी — कि जब रणवीर भारद्वाज को अपने बारे में कोई सवाल पूछा जाए, तो वो एक पल के लिए अपनी मुस्कान भूल जाते हैं।
और मुझे उसी पल की ज़रूरत थी।
मैंने माइक नीचे किया।
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