The Mysterious Bell – Chapter 736
"और अगर न आए?" सानिया ने पूछा।
"तो मैं उनकी कुर्सी रख दूँगा," मैंने कहा। "खाली कुर्सी भी बोलती है।"
बच्चे हँसे। शबनम आपा ने चाय की केतली उठाई और बोलीं, "तू एक काम कर — पापा को खबर मत भेज। खबर से आदमी नहीं आता, बहाना भेजता है। तू खुद जा और सीधा बता कि तेरा बेटा इंतज़ार कर रहा है। बाप नहीं आए तो गली आएगी, और गली आई तो बाप को आना पड़ेगा।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"आपा," मैंने कहा, "आप गली की सबसे अच्छी इंसान हो।"
"बकवास बंद कर," उन्होंने चिमटी उठाई। "चाय ठंडी हो रही है।"
मैं घर लौटा तो साढ़े आठ बज चुके थे, और गली में एक अजीब सी हलचल थी। बच्चे दौड़ रहे थे, सानिया अपनी लाल कवर कॉपी लिए खड़ी थी, और गुड्डू अपने टाट के टुकड़े पर कुछ लिखकर सबको दिखा रहा था।
और दरवाज़े पर मीरा खड़ी थी।
उसके हाथ में एक कार्ड था — और वो कार्ड ऐसा था कि गली में कभी नहीं आया था। मोटा काग़ज़, सुनहरे किनारे, ऊपर चमकता हुआ निशान, और सुनहरे अक्षरों में नाम। पकड़ते ही हाथ में वज़न लगता था — जैसे काग़ज़ नहीं, कोई ईंट हो।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"पढ़।" मीरा का चेहरा सपाट था। "और पढ़ते वक़्त मेरा चेहरा देख लेना, क्योंकि मैं इसे तेरे लिए खोलकर नहीं पढ़ूँगी।"
मैंने कार्ड खोला।
ऊपर लिखा था — भारद्वाज ट्रस्ट। फिर एक लंबी लाइन, जिसमें लिखा था कि मोहल्ले के एक ईमानदार कारीगर को सम्मानित किया जाएगा। फिर नीचे, बड़े अक्षरों में मेरा नाम।
अंकुश यादव — विशेष अतिथि।
मैंने कार्ड बंद किया। फिर खोला। फिर बंद किया।
"ये मज़ाक है?"
"नहीं," मीरा ने कहा। "ये जाल है। और जाल भी ऐसा, जिसमें तेरा नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा है।"
"कब?"
"कल शाम पाँच बजे। बड़े तालाब के किनारे, वही मैदान जहाँ मेला लगता है।"
मैंने मीरा को देखा।
"उसने मेरा नाम क्यों लिया?"
"क्योंकि वो चालाक है," मीरा ने कहा। "जो आदमी तुझे डराकर नहीं हरा सका, वो अब तुझे बुलाकर हराना चाहता है। मंच पर बुलाकर, माइक पकड़ाकर, ताली बजवाकर। और जिस दिन गली देखेगी कि अंकुश भैया साहब के मंच पर खड़ा था, उस दिन गली में तेरी बात का वज़न आधा हो जाएगा।"
"आधा नहीं," मैंने कहा। "पूरा। गली कहेगी कि वो भी उन्हीं में मिल गया।"
"हाँ," मीरा ने कहा। "इसीलिए ये सिर्फ़ बुलावा नहीं है। ये चाकू है, जिसे पकड़ने के लिए हत्था सोने का बनाया गया है।"
घर में हड़कंप मच गया।
काजल अस्पताल से दस बजे लौटी थी, और जब उसने कार्ड देखा तो उसने पहले तीन सेकंड हँसी, फिर अचानक रुक गई, फिर ऐसे देखा जैसे कार्ड उसी की किताब का कोई पन्ना हो।
"इसमें लिखा है कि तुम हमारे मोहल्ले के प्रेरणास्रोत हो," उसने कहा।
"पढ़ती रह," मैंने कहा।
"और नीचे लिखा है कि तुम्हारे काम से मोहल्ले में एकजुटता बढ़ी है।"
"मैंने कहा था पढ़ती रह।"
वो काग़ज़ मेज़ पर रखकर बैठ गई।
"अंकुश," उसने कहा, "ये केस है। मैंने अस्पताल में नर्सिंग की किताबों के साथ एक किताब पढ़ी थी — किसी के मन को जीतने के दो तरीक़े होते हैं। एक, उसे डरा दो। दो, उसे ऊपर उठाकर सबके सामने खड़ा कर दो, फिर उसका पैर खींच लो।"
"तीसरा तरीक़ा भी होता है," मैंने कहा।
"क्या?"
"उसे दोनों साथ करके देख लो।"
तभी पापा दरवाज़े पर आकर खड़े हो गए। उनके हाथ में चाय का गिलास था, पर चाय ठंडी थी — पता चल रहा था, क्योंकि उसमें भाप नहीं थी। उन्होंने कार्ड उठाया, पढ़ा, और फिर मेज़ पर इस तरह रख दिया जैसे कोई ज़हर का कीड़ा हाथ से उतार दिया हो।
"नहीं जाएगा," उन्होंने कहा।
एक शब्द नहीं, दो शब्द — पर उसकी आवाज़ में तीस साल की चुप्पी थी।
"पापा—"
"मैंने कहा नहीं जाएगा।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "वो आदमी जिस कमरे में बुलाए, वहाँ से लोग ठीक नहीं लौटते। मुझे पता है।"
तभी टिंकू आया — दौड़ता हुआ, दुपट्टा सिर पर, और पीछे-पीछे बाकी बच्चे। वो अपनी कमीज़ ठीक करके उस्ताद की तरह खड़ा हुआ।
"उस्ताद," उसने कहा, "मैंने सोच लिया। मंच पर तुम्हें क्या बोलना है वो मैं लिख दूँगा, क्योंकि तुम बोलते वक़्त भूल जाते हो।"
"मैं भूलता नहीं हूँ," मैंने कहा।
"तू पिछले हफ़्ते सानिया के घर पाँच बार पूछने गया था कि तेरा रिंच कहाँ है, और रिंच तेरी जेब में था।"
बच्चे हँस पड़े।
फिर टिंकू दर्पण के सामने जाकर खड़ा हो गया — घर के उस टूटे दर्पण के सामने, जो किवाड़ पर टँगा है और जिसमें मेरा चेहरा हमेशा दो हिस्सों में दिखता है। वहाँ खड़े होकर उसने गला साफ़ किया।
"आदरणीय सभा," उसने शुरू किया, "मैं अंकुश यादव…"
"तू नहीं बोलेगा," मैंने कहा।
"तो क्या मैं सिर्फ़ एक तरफ़ खड़ा रहूँगा?"
"हाँ। और तू मेरी तरफ़ ऐसे नहीं देखेगा जैसे मैंने गलती की हो।"
वो चुप होकर दर्पण में अपना चेहरा देखने लगा।
गुड्डू दौड़कर आया। उसके हाथ में एक खाली बोतल थी, जिसमें से चिंटू ने स्टील का प्याला उठाकर मुँह पर रख दिया, जैसे माइक हो।
"टेस्टिंग, टेस्टिंग," चिंटू ने कहा। "भैया, दो तीन शब्द बोलिए।"
"मोहल्ले के लोग," रफ़ीक़ ने पीछे से घोषणा की, "अब अंकुश भैया बोलेंगे — जो कल कुछ नहीं बोले।"
मैं हँस पड़ा। पहली बार दो दिनों में हँसा।
सानिया ने अपनी कॉपी खोलकर कहा, "मैंने पूरी गली की लिस्ट बना दी है। कौन क्या पूछेगा, कौन क्या कहेगा। और ये देखो — यहाँ लिखा है कि साहब मंच पर तुम्हें माला पहनाएँगे। माला!"
"माला में क्या है?" मैंने पूछा।
"माला में फूल होते हैं, भैया," चिंटू ने कहा, "पर पैसों वाली माला में सिक्के होते हैं।"
"और उसकी माला में काँटे हो सकते हैं," गुड्डू ने कहा।
"काँटे फूलों में नहीं होते," टिंकू ने कहा।
"काँटे डंडी में होते हैं," गुड्डू ने कहा। "मैंने देखा है — गुलाब की डंडी में।"
बच्चे इसी बात पर बहस करने लगे कि माला किस तरफ़ से पकड़नी चाहिए, और इस बहस में घर का डर थोड़ा हल्का हो गया। यही बात है — बच्चे डर को सबसे तेज़ी से पचा लेते हैं, हम बड़े उसे निगल भी नहीं पाते और ढोते रहते हैं।
तभी माँ की आवाज़ आई।
वो आँगन के दरवाज़े पर खड़ी थीं। अस्पताल से लौटी थीं — काजल उन्हें बैसाखी के सहारे लाई थी। उनका चेहरा पीला था, आवाज़ कमज़ोर, पर आँखें वही थीं।
"कार्ड मुझे दे," उन्होंने कहा।
मैंने दिया। उन्होंने उसे उलटा-पलटा, फिर मेज़ पर रख दिया।
"जाना है तो जा," उन्होंने कहा।
"सुशीला!" पापा का स्वर एकदम ऊँचा हुआ। "तू क्या कह रही है?"
"मैं कह रही हूँ कि ये लड़का चौबीस साल का है, और चौबीस साल के लड़के को रोकने से वो और ज़िद्दी होता है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "पर सुन, अंकुश।"
"हाँ, माँ।"
"वहाँ कोई लिफ़ाफ़ा मत थामना।"
मैं चुप रहा।
"मेरी दुआ का, बाप के नाम का, अपने हिसाब का — कोई लिफ़ाफ़ा हाथ में मत लेना। जो काग़ज़ तुझे बाँटने को दे, वो तेरा नहीं है, उसका है। और जो काग़ज़ वो तुझे पकड़ाए, वो काग़ज़ नहीं, रस्सी होती है। रस्सी जिस सिरे से पकड़ो, दूसरा सिरा उनके हाथ में रहता है।"
मैंने उनका हाथ पकड़ लिया। उनकी हथेली ठंडी थी और उसमें हिसाब की कॉपी की स्याही लगी थी।
"माँ," मैंने कहा, "मैं वहाँ जाकर कुछ नहीं बाँटूँगा। मैं सिर्फ़ उसका चेहरा देखना चाहता हूँ।"
"चेहरा?" पापा ने कहा। "चेहरा देखकर क्या होगा?"
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