The Mysterious Bell – Chapter 728
"नहीं होगी, बेटी। इस पन्ने की नकल नहीं हो सकती। और अब सिर्फ़ इस वजह से नहीं कि मैं डरता हूँ। सच कहूँ तो मैं अब डरता नहीं। डर मुझे अब थकाने लगा है।" उन्होंने अपने घिसे सफ़ेद हाथों को मेज़ पर रखा। "नकल इसलिए नहीं हो सकती, क्योंकि इस काग़ज़ की नकल हो सकती है — पर इस काग़ज़ के पीछे जो बात है, वो नकल नहीं होती। और जो बात नकल नहीं होती, वो कोर्ट में सिर्फ़ डरा हुआ आदमी बताता है। और डरा हुआ आदमी अगर सच बताए, तो सच के साथ उसका डर भी बाहर आता है। फिर वकील उसके डर का नाम रख देता है, और उसी दिन से सच कमज़ोर पड़ जाता है।"
"और याद?" मीरा ने कहा, जैसे वो खुद अपने सवाल को उठा रही हो। "आपने कहा था — सिर्फ़ याद बची है।"
"हाँ, याद बची है।" उन्होंने अपनी कनपटी छुई। "इस पन्ने की याद। कौन-सा नाम किस जगह लिखा था। किस अंगूठे के साथ कौन घूमता है। किस काग़ज़ के साथ किस पन्ने को टाँका गया था। यह सब मेरे अंदर है, काग़ज़ पर है — दो अलग-अलग चीज़ें हैं। और मैंने यह तय किया है कि मेरे साथ रहेगी। क्योंकि यह याद अगर मैं काग़ज़ पर उतार दी, तो मेरा घर टूट जाएगा।"
"घर?" मैंने कहा, बिना सोचे।
"मेरे पास सिर्फ़ एक घर बचा है," भवानी प्रसाद ने कहा। "वो घर नहीं है। वो वो कमरा है जहाँ मेरी बीवी के हाथ की पुरानी रोटी है, और मेरे बेटे के छोटे हुए जूते हैं। बस इतना है। अगर मैंने वो याद काग़ज़ पर उतारी, तो मेरे दफ़्तार का रास्ता बंद हो जाएगा। और मेरे दफ़्तार का रास्ता बंद होते ही मेरे बेटे का रास्ता खुल जाएगा — किसी वकील की तरफ़। और वो मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा। सिर्फ़ इसलिए नहीं कि मैंने उसे खो दिया। इसलिए कि मैंने उसकी ज़मीन अपने हिसाब से नाप दी, जबकि उसने कभी वो चीज़ माँगी ही नहीं थी।"
कमरे में कुछ देर बिल्कुल सन्नाटा रहा। पंखा घूमता रहा। बाहर से किसी बच्चे की आवाज़ आई — चिंटू की, मुझे लगा, कोई चीज़ बेचने वाले के पीछे चिल्ला रहा था — और फिर आवाज़ चली गई।
मैंने अपना सिर नीचे रखा। मेज़ पर पीला पन्ना रखा था। अब भी वहाँ था। नीली स्याही, धुँधला अंगूठा, चाबी की नोक का छोटा गड्ढा, और कोने पर टेप के उजले, अधूरे निशान।
"भवानी जी," मैंने कहा, "आपने पहली बात में कहा था कि यह पन्ना आपके सात पन्नों के बंडल का नहीं है। तो इस पर यह गोविंद भाई का नाम किसने लिखा?"
वो मुस्कुराए — नहीं, मुस्कुराए नहीं। उनके चेहरे पर कोई एक चीज़ ज़रा हिली, जैसे सोई हुई नदी की सतह पर कोई छोटा-सा पत्थर छुआ हो।
"अंगूठे कभी झूठ नहीं बोलते, बेटा।" उन्होंने कहा। "और मैं अंगूठे नहीं पढ़ता।"
"तो उस शर्तनामे पर सात अंगूठों में से कौन-सा आपको याद है?"
वो रुके। फिर उन्होंने धीरे से अपनी उँगली उस पन्ने पर रखी, ठीक उस जगह, जहाँ चाबी की नोक का गड्ढा था — पर छुआ नहीं, बस ऊपर हवा में रखी।
"मैं अंगूठे नहीं पढ़ता," उन्होंने दोहराया। "मैं काग़ज़ों की धूल पढ़ता हूँ। यह मेरा काम है। सत्ताईस साल से। कोई काग़ज़ मेरे हाथ में आता है, तो मैं उसका नाम नहीं देखता — मैं देखता हूँ कि उस पर धूल किस तरह जमी है। जिस पन्ने के कोने से धूल गायब है, वो पन्ना हाथ में पकड़ा गया। जिस जगह पर धूल साफ़ है और लिखाई उभरी हुई है, वहाँ किसी ने उँगली रगड़ी है, बार-बार। जिस पन्ने की धूल जमी एक जैसी नहीं है — कहीं पतली, कहीं मोटी — वो पन्ना किसी रजिस्टर के बीच से निकाला गया है। और जिस काग़ज़ पर तीन लाइरें समानांतर में कटी हैं, वो किसी सिलाई के सुई की वजह से है, किसी लिखाई की वजह से नहीं।"
उन्होंने पीले पन्ने के किनारे की तरफ़ इशारा किया।
"यहाँ देखो। तीन लाइरें — एक सीध में। यह तुम्हारे पापा की कैंची नहीं, यह सुई की वजह से है। जिस काग़ज़ पर सिलाई के तीन छेद सीधे हों, वो काग़ज़ किसी फाइल से सिली हुई निकाला गया था — फाड़ा नहीं। और जिस फाइल की सिलाई तोड़ी जाए, वो फाइल बाद में खुद बोलती है।"
मीरा ने फौरन अपना आतिशी शीशा निकाला। मैंने देखा — उसने पन्ने को उसके सामने उठाया, रोशनी सीधी की, और वो तीन पतली लकीरें साफ़ दिखने लगीं, जैसे किसी ने सुई से काग़ज़ की मचान पर तीन बार कुरेदा हो।
"तीन सुई के छेद," मीरा ने कहा, आधी आवाज़ में।
"तीन," भवानी प्रसाद ने कहा। "और तीनों एक सीध में हैं। इसका मतलब — यह पन्ना किसी रजिस्टर में नहीं, किसी और फाइल में सिला था। किसी मोटी फाइल में। जिसका बोर्ड सख़्त था, वरना तीन छेद नहीं बनते।"
"भारद्वाज दफ़्तार की फाइल?" मीरा ने कहा।
"मुझे नाम नहीं पता, बेटी," भवानी प्रसाद ने कहा। "पर मैं इतना जानता हूँ — मेरे दफ़्तार की कोई फाइल ऐसी सिली नहीं जाती। यहाँ सिर्फ़ सूत और मोम से सिलाई होती है। तीन छेद वाली सिलाई यहाँ कभी नहीं हुई।"
मैंने घंटी को कसकर पकड़ा। वो गरम हो रही थी — धीरे-धीरे, जैसे कोई कहे रहा हो, सुन रहा हूँ, ध्यान से सुन।
"तो फिर," मैंने कहा, "यह पन्ना भारद्वाज भवन से निकला। और उसी भीड़ में जिसने इसे गोविंद भाई के बंडल में डाला… वो जानता था कि अंकुश इसे उठाएगा।"
"और वो जानता था," भवानी प्रसाद ने कहा, "कि तुम इसे मेज़ पर ले आओगे। यही तुम्हारी आदत है, बेटा। तुम टूटी चीज़ें उठाकर उनकी जगह पूछते हो। यही तुम्हारा शौक़ है और यही तुम्हारी मुसीबत।"
वो फिर खिड़की की तरफ़ मुड़े। शटर आधा गिरा था, पर खिड़की का ऊपरी हिस्सा खुला था, और उससे अस्पताल दिखता था — पीली दीवारों वाली इमारत, टूटी खिड़कियाँ, और उसके सामने का खुला हिस्सा, जहाँ शाम को धूप पड़ती थी। अब दोपहर ढल रही थी, और दीवार का रंग धीरे-धीरे गहरा हो रहा था, जैसे कोई पुराना काग़ज़ सूरज में पक रहा हो।
उन्होंने कुछ देर देखा।
"तुम्हें वो पुराना लोहे का फाटक याद है?" उन्होंने पूछा, बिना मुड़े। "अस्पताल के पीछे वाला। जहाँ से ट्रक आते हैं।"
"हाँ," मैंने कहा। "कल रात वहीं हम मिले थे। गोविंद भाई वहीं खड़े थे।"
"वहीं पर एक चीज़ है," उन्होंने कहा। "कोई काग़ज़ नहीं है, कोई ताला नहीं है, कोई रजिस्टर नहीं है। फाटक के लोहे के पाए पर एक चीज़ लिखी है। मैंने उसे जवानी में एक बार देखा था, और फिर कभी नहीं देखा, क्योंकि वहाँ अब कोई नहीं जाता। वो फाटक मर चुका है, बेटा। लोहे के फाटक मरते नहीं, पर हाँ — वो अब किसी दरवाज़े का काम नहीं करता, सिर्फ़ दीवार का काम करता है। और धूल जमी है उस पर इतनी कि धातु बजने की जगह पत्थर जैसी लगती है।"
"क्या लिखा है?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ में उत्सुकता थी — असली उत्सुकता, पत्रकार वाली।
"मुझे पूरा नहीं पता," भवानी प्रसाद ने कहा। "जवानी में मैंने वो पढ़ा नहीं था, सिर्फ़ देखा था। और उस वक़्त मुझे लगा था कि यह किसी मज़दूर की बनाई कोई चीज़ है — कोई नाम, कोई नंबर, कोई हिसाब। पर आज मुझे लगता है — वो हिसाब नहीं था। वो किसी ने लिखा था, जो उस वक़्त किसी से कुछ कहना चाहता था और कह नहीं सका।"
वो पलटे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा — सीधे देखा। उनकी आँखें बूढ़ी थीं, पर उस वक़्त उनमें कुछ ऐसा था जो जवान लगा।
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