The Mysterious Bell – Chapter 725
"ये रजिस्टर," उसने कहा, और उसकी उँगली अपने सामने के ढेर के तीसरे रजिस्टर पर गई, "इसको मैं रोज़ पोंछता हूँ। रोज़ खोलता हूँ। और रोज़ उसी पन्ने पर जाकर बंद कर देता हूँ।"
"क्यों?"
"क्योंकि उस पन्ने पर मेरे बाप का नाम है," उसने कहा। "वो उस गली के बुज़ुर्गों में थे। जब ज़मीन दी गई थी, तब जो सात लोग खड़े थे, उनमें मेरे बाप भी थे। उनका अंगूठा भी कहीं है।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा बिल्कुल नहीं हिली। वो सिर्फ़ सुन रही थी, और उसका पूरा शरीर ऐसा सुन रहा था जैसे बंदूक चलने से पहले ज़मीन सुनती है।
"फिर आप उसे क्यों नहीं दिखाते?" मैंने पूछा।
"क्योंकि जिस दिन मैं दिखाऊँगा," भवानी प्रसाद ने कहा, "उस दिन मेरी नौकरी जाएगी, और मेरे बेटे की नौकरी पहले ही जा चुकी है।"
वो उठा। उसकी कुर्सी पीछे सरकी और उसके पैर के नीचे फ़र्श पर कुछ चरचराया।
"मेरा बेटा," उसने कहा, और आवाज़ में वो कड़वाहट आई जो आदमी को अंदर से खोखला कर देती है, "आठ साल इसी दफ़्तार में था। उसने एक बार एक काग़ज़ ऐसा उठाया जो उठाना नहीं चाहिए था। दो महीने में उसका तबादला ऐसी जगह हुआ जहाँ बिजली नहीं है। आज वो बस ड्राइवर है। और मुझसे महीने में एक बार बोलता है — जब वो उधर से निकलता है।"
कमरे में पंखा घूमता रहा।
"आप मुझे डरा रहे हैं," मैंने कहा।
"नहीं," उसने कहा। "मैं तुम्हें सच बता रहा हूँ। डराना तब होता जब मैं कुछ छिपाता। मैं तो तुम्हें वो बता रहा हूँ जो मैंने खुद भुगता है।"
मैंने घंटी निकाली। उसे मेज़ पर नहीं रखा। बस हाथ में पकड़ी और उँगलियों में दबाया।
"भवानी जी," मैंने कहा। "मैं आपको किसी चीज़ के लिए मजबूर नहीं करूँगा। और सच कहूँ, मुझे आपकी नौकरी की क़ीमत नहीं पता। पर मैं इतना जानता हूँ — जिस गली में आपके बाप ने अंगूठा लगाया था, वहाँ अब एक अस्पताल है, और उस अस्पताल में आज रात को मेरी माँ की दवा खत्म हो रही है।"
भवानी प्रसाद ने उस पल मेरी तरफ़ देखा — पहली बार पूरी तरह देखा। मुझे लगा उसने मेरे हाथ देखे। ग्रीस के निशान। घुटने पर फटी जींस। वो पुरानी चाबी जो कमीज़ के अंदर से झाँक रही थी।
"तुम शंकर के बेटे हो?" उसने पूछा।
"हाँ।"
उसकी आँखों में कुछ हिला। फिर उसने अपना हाथ मेज़ पर रखा, पीले पन्ने के बहुत पास — पर छुआ नहीं।
"ये पन्ना," उसने कहा, "मैंने एक बार देखा था। बहुत साल पहले। जब मैं जवान था और इस कमरे में नया आया था। तब ये रजिस्टर के साथ सिला हुआ था।"
"सिला हुआ?" मीरा ने कहा।
"हाँ," उसने कहा। "रजिस्टर के अंदर, आख़िरी पन्नों में। किसी ने उसे काटकर अलग कर दिया। और जब काटा, तो उसका एक हिस्सा रजिस्टर में रह गया। और ये — ये उसका दूसरा हिस्सा है।"
मेरी साँस रुक गई।
"मतलब," मैंने कहा, "अगर हम रजिस्टर खोलें, तो ये पन्ना उस जगह पर बैठेगा? बिल्कुल?"
भवानी प्रसाद ने एक लंबा, बहुत लंबा साँस लिया।
"बेटा," उसने कहा, "तुमने अभी बात बदल दी। तुम एक काग़ज़ की बात कर रहे हो। और मैं तुम्हें एक शर्त की बात बताने वाला हूँ, जो काग़ज़ से छोटी लगती है, पर है बहुत बड़ी।"
वो फिर बैठा। उसने कुर्सी को अपने हिसाब से खींचा। फिर उसने चारों तरफ़ देखा — एक बार, दो बार। फिर वो झुका।
और उसने इतनी धीमी आवाज़ में बात कही कि मुझे सुनने के लिए उसके चेहरे के और करीब जाना पड़ा। मीरा भी झुकी। मेरी जेब में घंटी ठंडी थी — बर्फ़ जैसी ठंडी — जैसे कोई कहे रहा हो, ये सुन रहा हूँ, ध्यान से सुन।
"अस्पताल की ज़मीन हकीम साहब ने इस शर्त पर दी थी कि गरीबों का इलाज कभी बंद नहीं होगा।"
और फिर वो चुप हो गया।
बिल्कुल चुप।
शब्द उसके मुँह से निकल चुके थे और अब वहाँ सिर्फ़ उसका चेहरा था — जैसे किसी ने दरवाज़ा खोला हो, अंदर का उजाला बाहर आया हो, और फिर दरवाज़ा बंद कर दिया हो। उसने अपनी कलम उठाई। ढक्कन लगाया। रजिस्टर खोला। और फिर उसी पन्ने पर नज़र गड़ाकर वो लिखने लगा जो उसे लिखना था — जैसे पिछले दो मिनट हुए ही न हों।
मैंने मुँह खोला। मीरा ने मेरी कलाई पकड़ ली। उसकी पकड़ कड़ी थी — मतलब, अभी मत।
पीछे दरवाज़े की तरफ़ से बाहर बेंच पर बैठे टिंकू की आवाज़ आई, खाँसी की आवाज़ — दो बार, तेज़, साफ़।
मैंने पलटकर देखा।
दरवाज़े के बाहर, दूर, दीवार के सहारे एक आदमी खड़ा था — सफ़ेद कुर्ता, हाथ पीछे बँधे। बस खड़ा था। कुछ नहीं कर रहा था।
और मेरे हाथ में घंटी, जो अभी बर्फ़ जैसी ठंडी थी, धीरे-धीरे गरम होने लगी।
॥
मैंने घंटी जेब में धीरे से दबाई। गरम थी, पर जलाती नहीं थी। बस गरम — जैसे किसी की हथेली से अभी-अभी निकली हो और उसका ताप बाकी हो।
भवानी प्रसाद ने कलम रखी और बिना मेरी तरफ़ देखे उठ गया। उसकी कुर्सी पीछे खिसकी, लकड़ी पर लकड़ी की आवाज़ आई, और वो सीधे दरवाज़े तक चला गया।
मैंने सोचा — गया। अब बोलेगा, "तुम लोग जाओ, मेरा काम है।"
पर उसने कुछ और किया।
दरवाज़े पर पहुँचकर उसने बाहर झाँका — एक झलक, दो पल की। फिर उसने शटर पकड़कर नीचे खींचना शुरू किया। शटर आधा नीचे आया, टर्रर्र की आवाज़ के साथ रुका, और उसने पलटकर हम दोनों को देखा।
"अंदर आ जाओ। जल्दी।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने कंधा उचका दिया। क्या करें, यही तो चाहिए था न — अंदर जाना।
हम अंदर आए। शटर और नीचे गया, फिर रुक गया — कुर्सी की ऊँचाई तक। नीचे से बाहर के पैरों की छाया दिख रही थी। परछाईं ज़रा भी नहीं हिली। न ही वो हटी।
भवानी प्रसाद ने अपनी मेज़ की कुर्सी खींची और मीरा को बैठने का इशारा किया। मैं खड़ा रहा। दीवार पर पुराने रजिस्टरों की परछाइयाँ अब और लंबी हो गई थीं, क्योंकि उजाला आधा हो चुका था। पीछे कहीं एक पंखा बहुत धीरे घूम रहा था और उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई बूढ़ा साँस भर रहा हो।
"आपके बाहर वो आदमी—" मैंने कहना शुरू किया।
"वो नहीं जाएगा," भवानी प्रसाद ने काटा।
"क्यों?"
"क्योंकि मैंने उसे देख लिया है," उसने कहा। "जब तक कोई मुझे देखता नहीं, वो सिर्फ़ नापता है। जब देख लिया जाए, तो वो इंतज़ार करता है। बस इंतज़ार। जैसे कहे — मैं जानता हूँ कि तुम जानते हो, अब करो जो करना है।"
"तो यही उसका काम है?" मीरा ने कहा। "डराना?"
"डराना नहीं," भवानी प्रसाद ने कहा। "इंतज़ार कराना। देर कराना। हमारे दफ़्तार की सबसे बड़ी ताक़त देरी है। काग़ज़ एक बार यहाँ आ गया, तो महीने लग जाते हैं, कभी साल लग जाते हैं। और साहब का आदमी बाहर खड़ा रहता है — सिर्फ़ खड़ा रहता है। इतने में उस तरफ़ काग़ज़ यादों से नामों तक पहुँच जाता है।"
उसने मेज़ की तरफ़ देखा। रजिस्टर खुला पड़ा था। पर उसने उसे छुआ नहीं।
"बैठो," उसने कहा। "मैं तुम्हें वो बताता हूँ जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताया। पर पहले एक बात।"
"पूछिए।"
"तुम इस काग़ज़ को जज के सामने ले जाओगे, तो क्या होगा?"
मैंने सोचा। "काग़ज़ सच बोलेगा।"
"ग़लत," उसने कहा। "काग़ज़ सच नहीं बोलता। काग़ज़ वो बोलता है जो उस पर लिखा हो। और जो लिखा हो, वो लिखने वाले ने चुना है। तुम्हारे हाथ में जो है, वो आधा काग़ज़ है। और आधा काग़ज़, आधा सच होता है।"
"तो पूरा कहाँ है?" मीरा ने पूछा।
भवानी प्रसाद ने सामने दीवार पर टँगे कैलेंडर तक देखा। कैलेंडर पुराना था, पर उतारा नहीं गया था। ऊपर एक तस्वीर थी — पहाड़, बादल, और नीचे किसी कंपनी का नाम।
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