The Mysterious Bell721 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 721

7 min read November 5, 2026

रिंच की आवाज़ कमरे में ठहर गई थी। जैसे किसी ने लोहे की थाली पर चोट मारी हो और थाली बजना बंद कर दे, पर गूँज अंदर ही अंदर चलती रहे। मैं अपनी चारपाई पर आधा उठा, आधा बैठा रह गया था। मेरी उँगलियाँ मेज़ के किनारे पर थीं और मेज़ की लकड़ी में जो एक चीर थी, उसमें मेरा नाखून घुसा हुआ था।

पापा दरवाज़े के फ्रेम में खड़े थे।

उनकी शर्ट की एक बाँह पर तेल लगा था। बाल बिखरे थे। आँखें लाल थीं, पर वो लाली रोने की नहीं थी, वो लाली उस आदमी की थी जो बहुत देर से जाग रहा हो और जागने के बाद यह समझ न पा रहा हो कि कहाँ खड़ा है।

और उनका चेहरा सफ़ेद था। बिल्कुल सफ़ेद। जैसे कोई काग़ज़ हाथ में आ जाए जिस पर स्याही सूखी ही न हो और हवा का एक झोंका उसे गीला कर दे।

गोविंद भाई चारपाई से खड़े हो गए थे। उनके हाथ अब भी काँप रहे थे और उनकी आवाज़ में एक अजीब सी सिसकी थी, जैसे किसी पुराने दरवाज़े की कुंडी धीरे से खुल रही हो।

"शंकर यादव।"

बस इतना ही।

और पापा का चेहरा उस एक नाम से और सफ़ेद हो गया। उन्होंने अपना हाथ दरवाज़े के फ्रेम से हटाया, फिर वापस रख दिया, जैसे उन्हें लग रहा हो कि अगर वो फ्रेम न पकड़ेंगे तो ज़मीन उनके पैरों के नीचे से खिसक जाएगी।

मैंने उन्हें पहले कभी ऐसा नहीं देखा था।

पापा वो आदमी हैं जो सुबह उठकर चाय पीते हैं, दुकान पर आते हैं, एक ही जगह बैठकर औज़ार पोंछते हैं, माँ की डाँट पर सिर हिलाते हैं और शाम को फिर से चुप हो जाते हैं। उनकी चुप्पी हमारे घर में उस पुराने पंखे की तरह है जो चलता तो है, पर आवाज़ नहीं करता। मुझे लगता था कि पापा की चुप्पी आदत है। आज पता चला कि वो आदत नहीं, छत थी। और आज उस छत पर दरार पड़ गई थी।

"पापा," मैंने कहा और मेरी आवाज़ मेरे ही कानों में अजनबी लगी।

उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा। उनकी नज़र सीधे मेज़ पर थी। उस पीले पन्ने पर, जिसे सुबह से हम सब मिलकर देख रहे थे और जिसे देखते-देखते मुझे लगने लगा था कि ये काग़ज़ नहीं, कोई जानवर है जो सो रहा है।

उस्ताद अली बक्श अब तक सबसे पीछे बैठे थे। वो चुपचाप उठे। उनकी उम्र के हिसाब से वो उठते बहुत धीरे हैं, पर आज उन्होंने ऐसे उठने की ज़हमत नहीं करवाई जैसे कोई बोझा उठा रहे हों। वो सीधे खड़े हुए, कुर्ते की अंदरूनी जेब में हाथ डाला और एक कपड़े में लिपटी चीज़ बाहर निकाली।

वो कपड़ा सफ़ेद था, पर पुराना। धुला हुआ, फिर भी पीला पड़ा हुआ। उस्ताद ने उसे दोनों हाथों से मेज़ पर रखा और बिना जल्दबाज़ी के खोला। उनकी उँगलियाँ इतनी सधी हुई थीं कि जैसे उन्होंने ज़िंदगी में हज़ार बार कुछ ऐसा खोला हो।

कपड़े के अंदर से पीला पन्ना निकला।

और कमरे की हवा बदल गई।

पापा ने एक कदम पीछे हटाया। बस एक कदम। उनके जूते की एड़ी फ़र्श पर टकराई और वो आवाज़ इतनी तेज़ लगी कि जैसे कोई पत्थर कुएँ में गिरा हो। उनका हाथ अब भी दरवाज़े के फ्रेम पर था, पर उँगलियाँ सफ़ेद हो गई थीं। उनके नाखून कसने से उनका अंगूठा धँस गया था लकड़ी में।

मैंने देखा — उनका अपना अंगूठा काँप रहा था।

और मैंने ये भी देखा कि उनकी नज़र बार-बार मेरे गले की तरफ़ जा रही थी। मेरी गले की पुरानी चाबी की तरफ़। वो चाबी, जो पापा ने मुझे पंद्रह-सोलह साल की उम्र में दी थी और जिसके बारे में उन्होंने कभी नहीं बताया कि ये किस चीज़ की है।

चाबी मेरे सीने पर पड़ी थी। साधारण, काली, घिसी हुई। पर आज वो मुझे भारी लग रही थी। जैसे उस पर कोई नाम लिखा हो जो मैं पढ़ नहीं पा रहा हूँ।

उस्ताद ने पन्ने को सीधा किया। उनकी उँगली पन्ने के ऊपर धीरे-धीरे चली।

"यहाँ नाम है," उन्होंने कहा। "गोविंद का।"

गोविंद भाई ने सिर हिलाया।

"और यहाँ," उस्ताद की उँगली थोड़ी नीचे आई, "धुँधला अंगूठा है। पुराना। बहुत पुराना।"

उनकी उँगली और नीचे आई।

"और यहाँ छोटा सा गड्ढा है। चाबी की नोक जैसा। कोई काग़ज़ के ऊपर चाबी रखकर दबा गया हो, या चाबी काग़ज़ पर गिरी हो।"

मेरा गला सूख गया।

"और बाएँ कोने पर," उस्ताद ने कहा, "एक छोटी लकीर है। जान-बूझकर खींची गई है। कोई निशान बनाया गया था, फिर मिटाया गया।"

कमरे में सन्नाटा था। इतना कि मुझे अपनी साँस सुनाई दे रही थी। पीछे के कमरे में लोहे की अलमारी थी, उसका एक पाया बरसों से ऊँचा-नीचा है, कभी-कभी वो खुद-ब-खुद खड़खड़ाती है। आज वो भी चुप थी।

गोविंद भाई ने धीरे से कहा, "उस्ताद साहब, ये पन्ना मेरे बंडल में नहीं था।"

उस्ताद ने उनकी तरफ़ देखा।

"पक्का?"

"पक्का।" गोविंद भाई की आवाज़ में अब थोड़ी जान आई थी, जैसे डर भी किसी को हिम्मत देने लगता है जब कोई और डरने लगे। "मैंने उस बंडल को अपने हाथ से बाँधा था। सात पन्ने। सात। मैं गिनकर बाँधता हूँ, उस्ताद साहब। मेरी आँखें कमज़ोर हैं, पर उँगलियाँ गिनना नहीं भूलीं। आठवाँ पन्ना मेरे पास था, मेरी जेब में, अलग। ये पन्ना मेरे बंडल का नहीं।"

मीरा ने आगे झुककर पूछा, "तो ये उसमें आया कैसे?"

गोविंद भाई ने अपना चश्मा सीधा किया। नाक पर टेप से बँधा हुआ चश्मा। उनकी उँगली काँपी।

"जब सफ़ेद कुर्ते वाले ने बंडल खींचा," उन्होंने कहा, "तो गाँठ खुल गई और काग़ज़ हवा में बिखर गए। उस वक़्त हर आदमी अपने हाथ आगे कर रहा था। कोई पकड़ने के लिए, कोई झपटने के लिए। उस भीड़ में कोई भी किसी की भी जेब में हाथ डाल सकता था।"

उन्होंने एक पल रुककर सबको देखा।

"मुझे लगता है," वो बोले, "यह पन्ना मेरे बंडल में जान-बूझकर डाला गया। ताकि जब मैं सबके सामने काग़ज़ खोलूँ, यह भी सबके सामने आ जाए। ताकि सब देखें कि गोविंद भाई का नाम कहाँ-कहाँ लिखा है।"

टिंकू दरवाज़े के बाहर से अंदर झाँक रहा था। उसकी आँखें बड़ी थीं। वो कुछ कहना चाहता था, पर उसने होंठ भींच लिए। मैंने उसे देखा और वो पीछे हट गया।

शबनम आपा बाहर थीं। मुझे उनकी चिमटी की आवाज़ आई — धातु पर धातु। वो गुमटी से निकलकर आई थीं और दरवाज़े के बाहर खड़ी थीं, और उनके होंठ कुछ बड़बड़ा रहे थे। मैंने सुना — "अब काग़ज़ कम नहीं पड़े। अब इसमें बंदा भी डाला जाएगा।"

मुझे हँसी आती थी। पर आज नहीं आई।

पापा अब भी दरवाज़े पर खड़े थे। उन्होंने अभी तक एक कदम भी अंदर नहीं रखा था। उनका शरीर बाहर था और आँखें अंदर। और वो आँखें सिर्फ़ उस पन्ने पर टिकी थीं।

फिर उन्होंने मुँह खोला।

"यह काग़ज़ तुम्हें कहाँ से मिला?"

आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी ने पुराने कुएँ से बाल्टी खींची हो और बाल्टी में पानी न हो, सिर्फ़ कीचड़ हो।

मैंने उनकी तरफ़ देखा। मैंने सोचा कि झूठ बोल दूँ। पर मैं जानता हूँ, जब ये काग़ज़ वाला खेल चल रहा होता है, तब झूठ बोलना सबसे बड़ी गलती है। और सच ये भी है कि मैं पापा से झूठ बोलकर आगे नहीं बढ़ सकता। मैंने पहले एक बार चुप रहकर बहुत कुछ खोया है। अब नहीं।

"अस्पताल के पीछे," मैंने कहा। "लोहे के फाटक पर। गोविंद भाई बंडल लेकर आए थे। जब हम मिलने वाले थे, तभी सफ़ेद कुर्ते वाले ने बंडल खींचा। काग़ज़ हवा में उड़ गए। ये पन्ना मेरे पैरों पर गिरा। गोविंद भाई कहते हैं ये उनके बंडल में नहीं था।"

पापा ने मेरी तरफ़ देखा।

और वो जो मेरी तरफ़ देखा, उसमें सवाल नहीं था। उसमें डर था। और उस डर के पीछे कुछ और था — कुछ ऐसा जो मैंने पहले कभी नहीं देखा। जैसे कोई आदमी अपनी ही आवाज़ से चौंक जाए।

कमरे में कोई नहीं बोला।

फिर पापा ने धीरे से कहा, "ये काग़ज़ — अभी दुबे अंकल को नहीं देना।"

मैं उठ खड़ा हुआ।

"क्या?"

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