The Mysterious Bell – Chapter 710
मैंने उसे उठाया। पट्टे के फटे किनारे रेशेदार थे, और उन पर उँगली रखने से लगा जैसे किसी ने बहुत जल्दी में यह काम किया हो। जल्दी में, पर बिना आवाज़ के। क्योंकि अगर आवाज़ होती तो आँगन में बैठे पचास लोगों में से कोई न कोई सुन ही लेता।
"ये पट्टा है," मैंने कहा। "और ये कलम।"
मीरा ने पट्टा हाथ में लिया और मोबाइल की रोशनी में घुमाया।
"काटा नहीं है," उसने कहा। "फाड़ा है। ज़ोर से।"
"मतलब?"
"मतलब," मीरा ने कहा, "बैग छीनकर नहीं लिया गया। बैग उतारा गया।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "जिसने उतारा, वो शालिनी के बहुत पास था। इतना पास कि उसे पकड़ना न पड़े।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा सा हुआ। वही बात जो उसने दो मिनट पहले कही थी — एक आदमी, शालिनी के कंधे पर हाथ, गले में काली लंबी डोरी।
"बच्चे कहाँ हैं?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ अपने ही कान में अजनबी लगी।
"ऊपर," शबनम आपा ने कहा। वो अपनी केतली नीचे रखकर हमारी तरफ़ आ रही थीं, हाथ में चिमटी, और उनके चेहरे पर वो भाव था जो गुस्से और डर के बीच में बनता है। "छत पर हैं। मैंने खुद देखा। पाँचों।"
"आपने देखा?"
"जब बत्ती गई," शबनम आपा ने कहा, "तो सबसे पहले मैंने ऊपर देखा। क्योंकि बच्चे दीये के पास बैठे थे, और जहाँ दीया हो वहाँ बच्चा बत्ती जाने पर भागता है। मैंने सोचा, अगर ये पाँच ऊपर हैं तो ठीक है। अगर नहीं हैं, तो मैं खुद सीढ़ी चढ़ूँगी।"
"और वो ऊपर थे?"
"थे," शबनम आपा ने कहा। फिर उन्होंने आवाज़ नीची की। "पर वो नीचे आ रहे हैं। उन्होंने कुछ देखा है।"
उन्होंने देखा ही था।
सीढ़ी से सबसे पहले टिंकू उतरा, सिर पर माँ का गुलाबी दुपट्टा, आँखों पर काला एक काँच वाला चश्मा, और चेहरे पर वो भाव जो आज तक मैंने उस पर नहीं देखा था। उसके पीछे सानिया, फिर गुड्डू, फिर रफ़ीक़, और सबसे आख़िर में चिंटू — चिंटू की चप्पल हाथ में थी, और वो उसे सीने से चिपकाए उतर रहा था, जैसे वो कोई हथियार हो।
"उस्ताद," टिंकू ने कहा, और सीधा मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। "मैंने देखा। मैंने अपनी आँखों से देखा।"
"धीरे," मैंने कहा। "साँस ले।"
"मैं साँस ले रहा हूँ!"
"नहीं ले रहा। तेरा चेहरा लाल है।"
टिंकू ने एक लंबी साँस ली, फिर बोला।
"जब बत्ती गई, तो हम छत पर थे। और मैंने नीचे देखा — मंच के पीछे वाली तरफ़। वहाँ से एक आदमी गया। सफ़ेद कुर्ता। सफ़ेद जूते।"
"कितनी दूर?"
"इतनी दूर जितनी दूर से आप दुकान से गुमटी दिखते हो।" टिंकू ने हाथ से नाप दिखाया। "वो भाग नहीं रहा था, उस्ताद।"
मैं रुका।
"क्या कहा?"
"वो भाग नहीं रहा था," टिंकू ने दोहराया, और उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मुझे ठंडा कर गया। "भागने वाला आदमी फ़ुर्सत से नहीं चलता। वो फ़ुर्सत से चल रहा था। जैसे उसे कोई जल्दी न हो। जैसे उसे पता हो कि कोई उसे रोकने वाला नहीं है।"
सानिया आगे आई। उसकी आवाज़ टिंकू से धीमी थी, पर उसमें वही बात थी।
"और उस्ताद," उसने कहा, "उसके एक हाथ में कुछ था। काला। फटा हुआ। और वो उसे सीने से लगाकर नहीं ले जा रहा था। वो उसे नीचे लटका रहा था, जैसे कोई कबाड़ हो।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया — मतलब, हाँ, वही।
तभी आँगन के दूसरे कोने से आवाज़ आई।
"अरे, ये क्या तमाशा है!"
हम सब पलटे।
बबलू।
वो आ रहा था — अपने उसी अंदाज़ में, चलते हुए कंधे हिलाते हुए, मुँह में पान, गले में सोने की चेन, और चेहरे पर वो डिफ़ॉल्ट भाव जो कहता है कि मैं यहाँ मालिक हूँ और तुम सब किरायेदार।
पर आज उस चेहरे पर कुछ और भी था। उसका माथा चमक रहा था। मतलब पसीना। और बबलू चाहे कितना भी मोटा हो, इस उम्र में और इस आँगन में, ठंड के मौसम में पसीना आना आसान नहीं है।
"तू कहाँ गया था?" मैंने पूछा। सीधा। बिना तमीज़ के। मेरे पास आज तमीज़ का बजट खत्म हो चुका था।
"फ़्यूज़ देखने," बबलू ने कहा, और उसने पान को एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ किया। "बत्ती गई तो मैं सीधा मीटर के पास गया। सोचा, ये मोहल्ला अंधेरे में बैठा रहेगा तो मेरी भी इज़्ज़त जाएगी। मैंने तार ठीक किया।"
"तूने तार ठीक किया?"
"हाँ।"
"बबलू भाई," मैंने कहा, और मैंने अपनी आवाज़ बहुत धीमी रखी, क्योंकि जब आवाज़ धीमी होती है तो आदमी को सुनने के लिए झुकना पड़ता है, "तू मीटर के पास गया था, और तेरे जूते पर मंच के पीछे की मिट्टी लगी है।"
बबलू ने अपने जूते की तरफ़ देखा। एक पल के लिए। बस एक पल। उसके बाद उसने पान को ज़ोर से चबाया और हँसा।
"अरे, मैं वहाँ से ही गया था," उसने कहा। "पीछे से मीटर का रास्ता छोटा है।"
"मीटर पीछे नहीं है," मैंने कहा। "मीटर स्कूल के सामने वाली दीवार पर है। स्टोर के बाहर।"
आँगन में फिर चुप्पी। और उस चुप्पी में मैं सुन सका — बबलू की साँस। तेज़, छोटी, बेकाबू।
वो कुछ कहने ही वाला था कि शालिनी का पापा आगे आए।
"तू," उन्होंने कहा, और उनकी उँगली मेरी तरफ़ थी। उनका चेहरा लाल था, आँखें फटी हुई, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो डर के बाद आती है — गुस्सा। "तूने मेरी बेटी को मंच पर खड़ा करवाया। तूने उसे सबके सामने बोलने को कहा। और अब उसका बैग गया, उसका काग़ज़ गया — और तू यहाँ खड़ा है, बबलू भाई के जूते देख रहा है!"
मैंने उन्हें देखा। उनके हाथ काँप रहे थे। और मैं जानता हूँ ये काँपना क्या होता है — ये वो काँपना है जो बेटी के लिए आता है, जब बाप को लगता है कि उसके होते हुए भी कुछ हो गया।
"अंकल," मैंने कहा, और मैंने अपनी आवाज़ नीची ही रखी। "आप सही कह रहे हैं। मैंने उसे मंच पर खड़ा करवाया।"
वो रुक गए। मेरे इस जवाब की उन्हें उम्मीद नहीं थी।
"और मैं फिर करूँगा," मैंने कहा।
"क्या?"
"क्योंकि जो चीज़ आज चोरी हुई है," मैंने कहा, "वो काग़ज़ नहीं है। जो चोरी हुई है, वो उस सच को छुपाने के लिए चोरी हुई है जो आपकी बेटी ने आज बोलना शुरू किया था। और जो सच बोलना शुरू हो जाए, उसे कोई बैग उठाकर नहीं रोक सकता।"
शालिनी के पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
और तभी मेरी जेब से एक आवाज़ आई। बहुत धीमी। इतनी धीमी कि सिर्फ़ मैं सुन सकूँ, और शायद मेरे साथ खड़ी मीरा, क्योंकि वो मेरे कंधे से सटकर खड़ी थी।
"बैग सुबह मिलेगा। दुकान के पीछे।"
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी, और उसका ठंडापन अजीब तरह से स्थिर था, जैसे वो बुखार उतरने के बाद की ठंडक हो।
"कहाँ?" मैंने फुसफुसाया।
"दुकान के पीछे। सुबह।"
"और उसमें?"
घंटी चुप हो गई। मैंने उसे हिलाया। एक हल्की घरघराहट, फिर वो चरचरी आवाज़, और फिर उस टूटी आवाज़ में कुछ ऐसा जो मेरी रीढ़ से सिर तक गया।
"बैग मिलेगा," घंटी ने कहा, "पर उसमें जो नहीं होगा, वही सबसे ज़रूरी होगा।"
मैं वहीं खड़ा रह गया।
मेरे आस-पास आँगन चल रहा था — शबनम आपा चाय बाँट रही थीं, बच्चे एक-दूसरे से फुसफुसा रहे थे, दुबे अंकल अपना पीला लिफ़ाफ़ा सीने से लगाए बैठ गए थे क्योंकि जब तक माहौल ठीक न हो, कोई सच नहीं खोलता, रज़ा सलीम रजिस्टर को दोनों हाथों से पकड़े खड़े थे और उनके नाखून के नीचे की काली बूँदें अब भी सूखी नहीं थीं, उस्ताद दरवाज़े के पास खड़े मेरी तरफ़ देख रहे थे — पर मैं कहीं और था।
मैं सोच रहा था कि आदमी बैग क्यों चुराता है।
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