The Mysterious Bell – Chapter 688
"सुशीला जी," उसने कहा। "आपको तकलीफ़ नहीं उठानी थी। इतनी रात, इतनी सीढ़ी—"
"तकलीफ़?" माँ ने कहा। उनकी आवाज़ नीची थी, पर साफ़। "जिस आदमी के अंगूठे की बात हो रही है, साहब, वो मेरा आदमी है। उसके अंगूठे को कोई काग़ज़ बताए और मैं घर में बैठी रहूँ, ऐसा मेरे यहाँ नहीं होता।"
सीढ़ी पर सन्नाटा हो गया। अस्पताल की आवाज़ें भी जैसे दूर चली गईं। कहीं कोई बच्चा खाँस रहा था, वो भी रुक गया।
"मैं सिर्फ़ एक बात कहने आई हूँ," माँ ने कहा, और अब उन्होंने सलीम को नहीं, सीढ़ी के नीचे खड़े पापा को देखा। "मेरे पति का अंगूठा झूठा नहीं है। मजबूर था।"
पापा की आँखें भर आईं। उन्होंने मुँह फेर लिया। पापा जब रोते हैं तो मुँह फेरते हैं। मैंने उन्हें अपनी ज़िंदगी में दो बार रोते देखा है, और दोनों बार उन्होंने मुँह फेरा था। आदमी को रोना मना नहीं होता, भाई, पर गली के आदमी को सामने रोना मना होता है। यही सिखाया जाता है। और ये सिखाने वाले हमें ये कभी नहीं बताते कि जो आँसू सामने नहीं आते, वो सीने में पत्थर बनकर बैठ जाते हैं।
माँ आगे बोलीं, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो सिर्फ़ उस औरत में आती है जिसने अपने आदमी की चुप्पी का बोझ सालों उठाया हो।
"मैं जानती हूँ वो क्यों लगाया," उन्होंने कहा। "मैं उस वक़्त इसी अस्पताल में पड़ी थी। मेरी साँस गिनी जा रही थी। मेरे आदमी के पास पैसा नहीं था, नौकरी नहीं थी, और दो बच्चे थे। जिस दिन वो काग़ज़ लेकर लौटे, उस दिन उन्होंने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। रात भर छत पर बैठे रहे। सुबह आँखें लाल थीं और हाथ ठंडे थे। मैंने पूछा नहीं। मैं भी उस दिन से चुप हूँ। तो साहब, जब मैं ही चुप हूँ, तो आप किस मुँह से उन्हें झूठा कह रहे हैं?"
सलीम ने एक पल सोचा। फिर उसने वो किया जो वो हमेशा करता है। उसने गुस्सा नहीं किया। उसने मुस्कुराया।
"सुशीला जी," उसने कहा, "मैं किसी को झूठा नहीं कह रहा। मैं तो बस काग़ज़ की बात कर रहा हूँ। काग़ज़ झूठा कहता है या सच्चा, ये मैं नहीं तय करता। ये तारीख़ तय करती है।"
"तारीख़?" काजल बोली। उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर वो बोली। "कैसी तारीख़?"
सलीम ने अपनी कलाई की तरफ़ देखा, जहाँ कोई घड़ी नहीं थी। फिर उसने कहा, बड़े ठंडे ढंग से, "मजबूरी की भी एक तारीख़ होती है, बेटा। हर मजबूरी पर एक तारीख़ लिखी होती है। जिस दिन वो मजबूरी आई, वो एक तारीख़। और जिस दिन आदमी ने उसे छिपाया, वो दूसरी तारीख़। दोनों तारीख़ें मिलकर एक कहानी बनाती हैं। और कहानी अगर काग़ज़ पर हो, तो अदालत में वो कहानी दलील बन जाती है।"
वो सीढ़ी की पहली पायदान पर पैर रखकर ज़रा ऊपर आया। अब उसका चेहरा लाल बत्ती में ठीक दिख रहा था। उस चेहरे पर ऐसा कुछ नहीं था जो डरा हुआ हो। उस चेहरे पर सिर्फ़ इंतज़ार था। जैसे रसोई में सब्ज़ी पक रही हो और आदमी बैठकर सिर्फ़ वो पल सोच रहा हो जब उसे परोसी जाएगी।
"कल वो तारीख़ सबको दिखेगी," उसने कहा। "और किसी को कुछ करना नहीं पड़ेगा। बस फाइल खुलेगी। खुद-ब-खुद सब दिख जाएगा।"
तभी मेरी जेब में घंटी हिली। बहुत हल्की। इतनी हल्की कि अगर मैं उसे बीस साल से न जानता, तो मुझे लगता कि मेरी ही साँस में कुछ हिला।
"तारीख़," घंटी ने कहा। बस इतना। एक शब्द। "तारीख़ पर स्याही सूखी है।"
मैंने जेब पर हाथ रखा और आगे बढ़कर पापा का हाथ पकड़ लिया।
उनका हाथ ठंडा था। बहुत ठंडा। जैसे अभी-अभी नल के पानी में डुबोया हो। मैंने उनकी उँगलियाँ अपनी उँगलियों में ले लीं, ठीक वैसे जैसे बचपन में वो मेरी उँगली पकड़कर गली पार कराते थे। आज उलटा हो रहा था।
"पापा," मैंने धीरे से कहा। "फाइल मुझे दे दीजिए।"
वो नहीं बोले।
"पापा, मैं खोल लूँगा। सबके सामने। आज रात। अभी।" मेरी आवाज़ भारी हो रही थी, पर मैं रुका नहीं। "जो सच है, सच बोल देंगे। जो डर था, डर बोल देंगे। फिर जो होगा, साथ में होगा। पर अब आप इस फाइल को सीने से नहीं चिपकाए रहिए। ये काग़ज़ नहीं है, पापा। ये आपके सीने पर पत्थर है।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
और उस पल, उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा। पछतावा नहीं। डर नहीं। बस एक थकान। ऐसी थकान जो सालों से मिल रही हो और जिसका कोई आराम नहीं।
उन्होंने मेरी उँगलियाँ खोल दीं।
धीरे से। बिना झटके। जैसे कोई बच्चे के हाथ से चीज़ छीनता नहीं, बल्कि उसकी उँगली एक-एक करके खोलता है।
"अंकुश," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ सूखी थी। "तू मेरी फाइल नहीं छीन सकता। मैंने ये पाँच साल उठाई है। पाँच साल, हर रात, हर सुबह। अब मैं इसे तेरे हाथ में देकर नहीं जा सकता।"
"जाना कहाँ है, पापा?"
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने फाइल कसकर पकड़ी, मेरे कंधे पर हाथ रखा — एक पल के लिए, बस एक पल — फिर हाथ हटाकर सीढ़ी से नीचे उतरने लगे।
धीरे उतरे। एक-एक पायदान। मैंने पीछे से देखा, और मुझे लगा कि मेरे पापा बूढ़े नहीं हुए हैं। वो बस बहुत देर तक एक ही जगह खड़े रहे हैं, और अब चल रहे हैं।
सीढ़ी के नीचे माँ की कुर्सी थी।
पापा रुके। उन्होंने माँ को देखा। माँ ने उन्हें देखा। दोनों ने कुछ नहीं कहा। पर वो चुप्पी वैसी नहीं थी जैसी पाँच साल से घर में थी। वो चुप्पी अलग थी। उसमें कुछ टूट रहा था। अच्छे वाला टूटना, भाई — वो टूटना जिसके बाद आदमी हल्का हो जाता है।
पापा ने झुककर माँ की साड़ी का पल्लू ठीक किया। बस इतना। कोई शब्द नहीं। फिर वो गेट की तरफ़ बढ़े और अंधेरे में चले गए।
काजल ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में सवाल था।
"जाने दो," मैंने कहा। "वो जो कर रहे हैं, वो उन्हें खुद करना है। हमारा काम है साथ खड़ा होना। पीछे नहीं, साथ।"
तभी सलीम अपनी जेब से रूमाल निकालकर हाथ पोंछने लगा। जैसे उसने कुछ छुआ हो जो उससे गंदा था।
"अच्छा," उसने कहा, "तो फाइल आज नहीं खुली। कोई बात नहीं। काग़ज़ को जल्दी नहीं है। काग़ज़ कभी नहीं भागता। भागते तो हम हैं।"
वो खुद सीढ़ी से नीचे उतरने लगा। सीढ़ी की पहली पायदान पर पैर रखा, फिर रुका, फिर मुड़ा। उसका हाथ रेलिंग पर था और उसकी काली अंगूठी लाल बत्ती में चमक उठी।
"एक बात याद रखना, अंकुश," उसने कहा। "काग़ज़ आज इसलिए नहीं खुला कि तेरे पापा ने नहीं खोला। कल इसे कोई और खोलेगा। और वो कोई और तेरा पापा नहीं होगा।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
सलीम रुका, मानो मेरे जवाब का इंतज़ार कर रहा हो। जब जवाब नहीं आया तो उसने कंधे उचकाए और नीचे उतरता गया। आधी सीढ़ी उतरकर वो फिर बोला, और इस बार उसकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो पूरी रात नहीं थी। जल्दबाज़ी। हल्की-सी। पर थी।
"कल सुबह दस बजे रज़ा सलीम रजिस्टर लेकर आएगा। सलीम अहमद का असली रजिस्टर। उसमें हर मोहर का हिसाब है, हर अंगूठे का हिसाब है, और उसमें तेरे दादा जगदीश यादव का नाम भी है। उस दिन देखेंगे, अंकुश — मजबूरी किसे कहते हैं।"
वो मुड़ा और अस्पताल के गेट की तरफ़ चल दिया। सफ़ेद कुर्ता अंधेरे में सबसे आख़िर में गया। पहले उसके जूतों की आवाज़ गई, फिर कुर्ता, फिर सब कुछ।
मैं सीढ़ी पर खड़ा रह गया।
मेरे पीछे काजल ने माँ की कुर्सी का हैंडल कसकर पकड़ लिया। "भैया," उसने धीरे से कहा, "वो रजिस्टर…"
"हाँ," मैंने कहा। "वो रजिस्टर।"
"उसमें क्या है?"
मैंने जेब से घंटी निकाली। अस्पताल की लाल बत्ती में पीतल ज़रा-सा चमका। घंटी चुप थी। बहुत चुप। जिस तरह आदमी बहुत सोचने से पहले चुप होता है।
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