The Mysterious Bell677 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 677

7 min read November 5, 2026

मैंने साइकिल उठाई। घंटी जेब में थी। और मेरे हाथ में एक ही सवाल।

वो कौन सा औज़ार है, जिसका नाम मेरे दादा के रजिस्टर में लिखा है?

और मेरा दादा — जो बुखार में चले गए, जिनकी दवा देर से आई — वो क्या सच में किसी औज़ार के बारे में कुछ जानते थे?

मैंने साइकिल का हैडल पकड़ा और अस्पताल की तरफ़ मुड़ा।

गली मेरे पीछे छूट रही थी।

और मुझे लगा — आज गली में जो होगा, वो गली में नहीं होगा। आज गली में जो होगा, वो अस्पताल की उस बेंच पर होगा जहाँ एक बूढ़ी माँ अपने बेटे से लड़ रही है।

और उस लड़ाई में, कहीं न कहीं, मेरा नाम भी बोला जाएगा।

॥

मैंने साइकिल का हैडल घुमाया और पैडल पर ज़ोर डाला। टिंकू पीछे की सीट पर बैठा था — या कहो लटक रहा था, क्योंकि उसकी टाँगें ज़मीन को छू रही थीं, और वो हर मोड़ पर मुझे बताता जा रहा था कि दाएँ मुड़ना है, बाएँ नहीं, जैसे गली में ड्राइविंग का सर्टिफ़िकेट उसके पास हो।

"उस्ताद, ज़रा धीरे। आगे चाय वाले भैया हैं।"

"दिख रहे हैं।"

"नहीं, वो दूसरे हैं। उनके पीछे वाले नहीं, आगे वाले।"

"टिंकू, तू सीट पर बैठा है या नक़्शा पढ़ रहा है?"

उसने मेरी कमर पर एक हल्का धक्का दिया और हँसने लगा। दोपहर जैसे-जैसे सिर पर चढ़ने लगी, गली से धूल उठने लगी। साइकिल के पहिये से जो हवा उड़ती थी, वो गरम थी। अस्पताल के मुहाने पर नीम का पेड़ आया, और जैसे ही हम उसकी छाया में घुसे, पीठ पर लगी धूप हट गई।

पर छाया के साथ कुछ और भी आया।

दूर से ही सुनाई दिया।

किसी औरत की आवाज़ — बूढ़ी, धँसी हुई, पर टूटी हुई नहीं। ऐसी आवाज़ जो तीन दशक से लड़ना जानती हो। और उसके सामने एक आदमी की आवाज़ — जवान नहीं, पर बूढ़ा भी नहीं। कहीं बीच की उम्र। पर आवाज़ में वो थकान थी जो उम्र से नहीं, हिसाब से आती है।

मैंने साइकिल रोकी।

टिंकू ने गर्दन आगे की।

"उस्ताद, वो वही औरत है।" उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "जिसके बारे में मीरा दीदी बता रही थीं।"

मैंने साइकिल साइड में खड़ी की और दोनों आगे बढ़े।

अस्पताल की पुरानी सीढ़ियों के नीचे, जहाँ दीवार पर पीला रंग उतरा हुआ था और नीचे की तीन सीढ़ियाँ टूटी हुई थीं, वहाँ लोग जमा थे। दस-बारह लोग होंगे। कोई मरीज़ के साथ बैठा था तो कोई खड़ा सुन रहा था, और कोई — जो आज यहाँ किसी काम से आया था — अपना काम भूलकर इसी लड़ाई को देख रहा था।

औरत सीढ़ी की दूसरी पायदान पर बैठी थी। साड़ी पुरानी, घिसी हुई, पर साफ़ धुली। सिर पर बाल उतने ही सफ़ेद जितने सफ़ेदी दीवार पर थी। कमर में एक बड़ा सा लोहे का बक्सा चिपकाए बैठी थी। बक्सा ऐसा जैसे पचास साल से किसी अलमारी के नीचे पड़ा हो और आज पहली बार बाहर आया हो। उसकी ज़ंग लगी धार, उसका फटा कोना, और बक्से पर बंधी रस्सी — एक ज़माने की रस्सी, जिसका रंग पहचानना मुश्किल था।

सामने खड़ा आदमी — पैंतीस-चालीस के आसपास — सिर पर हाथ रखे बार-बार कह रहा था —

"अम्मा, सुन लो। सुन लो ना। तारीख़ सिर पर है।"

औरत ने अपनी आँखें उस पर उठाईं।

"मैंने तेरी तारीख़ नहीं छिपाई। मैंने तेरा कर्ज़ नहीं किया।"

लोग हँसे। पर हँसी में वो स्वाद नहीं था जो गली की हँसी में होता है — जब शबनम आपा किसी को ताना मारती हैं। इस हँसी में शर्म थी। ये हँसी किसी और के झगड़े पर आती है, जब आदमी खुद को बचाने के लिए हँसता है।

आदमी ने एक कदम आगे बढ़ाया।

"अम्मा, ये बक्सा रखे रखे लोहे का बोझ बन गया है। मैं कह रहा हूँ, इसमें जो भी है, मैं इसका कोई सामान बेच नहीं रहा। मैं सिर्फ़ इतना कह रहा हूँ कि — जो चीज़ें पड़ी हैं, ज़ंग खा रही हैं, उनका कुछ तो काम हो।"

औरत ने बक्से को और कसकर अपने सीने से लगाया। ये कोई चीज़ पकड़ने का तरीक़ा नहीं था। ये कोई चीज़ गिरने से बचाने का तरीक़ा नहीं था। ये कोई आदमी अपने आपको बचाने के लिए अपनी छाती से कोई दीवार बनाता है — वैसा तरीक़ा था।

"ये लोहे के टुकड़े नहीं हैं," उसने कहा। उसकी आवाज़ अब धीमी थी, पर सुनने वालों की भीड़ पूरी चुप हो गई। "ये तेरे पिता की आख़िरी साँस हैं। जब वो अस्पताल में पड़े थे, तब भी इन्हें हाथ से नहीं छोड़ा। इनमें से एक औज़ार पर तेरे पिता का नाम खुदा है। ये अगर कबाड़ में गया, तो मैं भी जाऊँगी।"

आदमी ने सिर पकड़ लिया। फिर पीछे मुड़कर भीड़ की तरफ़ देखा, जैसे कोई उसे बचाने वाली बात कहे। कोई नहीं बोला।

उसकी आवाज़ अब काँप रही थी।

"अम्मा, मुझे कबाड़ नहीं बेचना। वो आदमी कह रहा है, औज़ार पुराने हैं, तो कीमत भी पुरानी मिलेगी — पर वो जानता है इनमें किसका नाम है। कह रहा है, दस हज़ार देगा। दस हज़ार, अम्मा। तेरी दवा इस महीने के आठ-आठ सौ में चल रही है। मैं और कहाँ से लाऊँ?"

"तो मुझे बेच दे। मेरी दवा बंद कर दे। मरने दे।"

ये सुनते ही वो आदमी झुक गया। सीधे ज़मीन पर बैठ गया — सीढ़ी के पास, उस पत्थर पर जो वहाँ सालों से पड़ा था — और अपनी हथेलियों में सिर दबा लिया।

लोगों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।

कोई बोला, "बेटा कह रहा है ना, बुढ़िया भी ज़िद कर रही है।"

कोई बोला, "हाँ, ऐसे तो घर चलता है?"

मुझे ये हँसी अच्छी नहीं लगी। नहीं, हँसी नहीं। ये निर्णय अच्छा नहीं लगा — जो भीड़ ले लेती है जब वो किसी चीज़ को ठीक से नहीं समझती और किसी एक पक्ष को अपना बना लेती है।

मैं आगे बढ़ा।

टिंकू मेरे पीछे था, पर उसकी नज़र कहीं और थी। वो दीवार के उस कोने की तरफ़ देख रहा था जहाँ धूल में कुछ पड़ा था।

मैंने देखा।

अस्पताल की उसी दीवार के किनारे, जहाँ पीले रंग पर धूल की महीन परत जमी थी, एक पुरानी व्हीलचेयर पड़ी थी। या कहो, एक व्हीलचेयर का ढाँचा, जिसके दोनों तरफ़ के पहिये निकाले जा चुके थे — एक तरफ़ का पहिया टूटा हुआ पड़ा था, तीलियाँ मुड़ी हुई; और दूसरी तरफ़, एक पहिया लगा था पर उसकी रिम इतनी ज़ंग खाई थी कि लोहा लकड़ी जैसा लग रहा था। कुर्सी की पीठ पर कहीं कोई लिखावट घिसी हुई थी, कोई नंबर शायद, पर पढ़ा नहीं जा रहा था।

मुझे कुछ हुआ। हाथ वैसा ही हुआ जैसा मरम्मत करने से पहले होता है — जब तुम टूटी चीज़ देखते हो और तुम्हारी उँगलियाँ बिना तुम्हारे पूछे हवा में हिलने लगती हैं।

मैंने अपनी आवाज़ ठीक की, जैसे कोई मज़ाक शुरू कर रहा हो — क्योंकि भाई, उस वक़्त सीधे बोलना भी तो मज़ाक जैसा ही लगता है। और मैंने कहा —

"अरे भाई साहब, एक बात कहूँ?"

आदमी ने सिर उठाया। उसकी आँखें लाल थीं।

"कौन हो तुम?"

"मैं वो हूँ जो इन टूटी चीज़ों के साथ रोज़ उठता-बैठता हूँ।" मैंने व्हीलचेयर की तरफ़ उँगली की। "औज़ार बेचने से पहले ये कुर्सी ठीक कर लो।"

वो चुप रहा।

"क्यों?"

"क्योंकि अगर तुम अम्मा के बक्से को बेचने के लिए जा रहे हो — तो अम्मा को उस बक्से तक लाना-ले जाना भी किसी तरह करना पड़ेगा। और उस तरह से कहीं अच्छा है, ये कुर्सी चले।"

भीड़ हँसी।

बूढ़ी माँ ने गर्दन घुमाई। उसकी आँखें मुझ पर पड़ीं और मुझे एहसास हुआ — ये उन आँखों में से एक है जो इंसान को उस वक़्त भी देख लेती हैं जब आदमी चुप होता है। वो मुझे तौल रही थीं।

"तुम कौन हो, बेटा?" उन्होंने पूछा। आवाज़ में जो अभी डंडा था, वो अब भी था। "कहाँ से आए हो? ये मेरे घर का मामला है।"

"मैं बेटा हूँ, अम्मा।"

"किसका?"

"बस — गली का। साइकिल वाला।"

"तो साइकिल ठीक कर। मेरा घर नहीं।"

लोग फिर हँसे।

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