The Mysterious Bell – Chapter 654
सुबह मैंने पापा के सामने तीन बार पूछा था और हर बार मेरी आवाज़ में यह भावना थी कि वो मुझसे कुछ छिपा रहे हैं। मैंने उनसे यह कभी नहीं पूछा कि उस रात उनके साथ क्या हुआ था। मैंने सिर्फ़ पूछा — आपने क्यों किया। क्यों नहीं बताया। क्यों अंगूठा लगाया।
कभी नहीं पूछा — आप उस रात सीढ़ी पर अकेले क्यों बैठे रहे।
और उस रात से आज तक, पाँच साल, हर महीने की पाँच तारीख़ को वो एक बंद दिखने वाली दुकान के बाहर खड़े रहे और किसी पुराने हिसाब का पन्ना माँगते रहे।
यह वो आदमी है जो मुझे हर सुबह देखता है और बोलता नहीं।
अचानक मेरी आँखें गरम हो गईं। मैंने मुँह फेर लिया। मुझे रोना नहीं था। मैं रोने वालों में से नहीं हूँ। मैं तो वो हूँ जो उस वक़्त मज़ाक कर लेता है ताकि कमरे में कोई न रोए।
पर इस बार मज़ाक कहीं से नहीं आया।
मैं उठकर माँ के पैरों पर झुक गया।
"अरे," माँ ने कहा। "यह क्या कर रहा है?"
"माँ, माफ़ कर दे।"
"उठ, उठ —"
"अभी नहीं।" मेरी आवाज़ अटक गई थी। "मैंने पापा को बुरा आदमी समझ लिया। मैंने सोचा वो डरपोक हैं। मैंने कहा कि वो हमारा घर नहीं बचा पाए।" मैंने सिर उठाया। "माँ, वो आदमी पाँच साल से हर महीने उस दुकान पर जाकर पूछ रहा है कि कोई काग़ज़ बचा है क्या। वो हमें बचाने की कोशिश कर रहा था, और मैं उसके सामने रोज़ अपना हुनर दिखाता रहा।"
माँ ने मेरा सिर दोनों हाथों में पकड़ा और माथे पर होंठ रख दिए।
"सुन," उन्होंने कहा। "मैं भी कुछ कहूँ? मैंने भी ग़लती की है। मुझे पता था कि वो किस वजह से चुप हैं। मैं जानती थी कि काग़ज़ किस बारे में है। और मैंने सोचा — अगर मैं बोली, तो घर में झगड़ा हो जाएगा, बच्चे सुन लेंगे, और वो आदमी हमारी आधी दुकान अगले दिन ले जाएगा। इसलिए मैं चुप रही।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "और मेरी चुप्पी से तुम्हें लगा कि पापा अकेले दोषी हैं। यह मेरी ग़लती है। माफ़ कर दे।"
"माँ —"
"मैं आज से नहीं चुप रहूँगी," उन्होंने कहा। "कल सभा में सबके सामने बोलूँगी। बोलूँगी कि पापा के अंगूठे में मेरा भी दबाव था, क्योंकि मैं बीमार थी, और वो मेरे इलाज के लिए खुद को बेच रहे थे। कोई अपने आप को नहीं बेचता। उसके पीछे कोई और होता है। उस रात उसके पीछे मैं थी।"
मैंने उनके घुटनों पर सिर रख दिया। एक मिनट।
कमरे में सिर्फ़ पंखे की धीमी सी आवाज़ थी, जो बंद था, इसलिए आवाज़ भी नहीं थी। सिर्फ़ माँ की साँस और काजल के गीले कपड़े से पानी टपकने की आवाज़।
फिर मैंने सिर उठाया और अपनी जेब से वो टिन का बक्सा निकाला।
"यह सकीना बी ने दिया," मैंने कहा। "कहा है कि कल सभा में पापा के हाथ में देना। और कहना — शंकर, तुमने कसम निभाई, अब मैं निभाऊँगी।"
माँ ने टिन के बक्से की तरफ़ देखा। और उनका चेहरा बदल गया।
"यह बक्सा," उन्होंने धीरे से कहा।
"क्या?"
"यह बक्सा मैंने देखा है।"
मैं ठिठका।
"कब?"
"पच्चीस साल पहले नहीं," उन्होंने कहा। "बाईस साल पहले। एक रात तेरे पापा इसे सीने से लगाए सोए थे। मैंने पूछा तो बोले — किसी की अमानत है, लौटानी है। और उसके बाद? उसके बाद यह बक्सा घर से ग़ायब हो गया। मैंने दोबारा कभी नहीं देखा। मैंने पूछा भी नहीं, क्योंकि तब तक मैंने चुप रहना सीख लिया था।"
मैंने बक्सा खोला।
अंदर वो छोटी काली जिल्द वाली कॉपी थी, जिसे सकीना बी ने डिब्बे से निकालकर मुझे दी थी۔ मैंने उसे हौले से उठाया।
"मैं इसे पढ़ सकता हूँ?" मैंने पूछा।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "यह तेरे पापा की लिखाई है?"
"नहीं। पापा की नहीं। इसमें पापा के बारे में लिखा है।"
माँ ने एक गहरी साँस ली।
"तो मत पढ़," उन्होंने कहा। "कम से कम आज रात मत पढ़। यह काग़ज़ कल के लिए है। आज रात तू सो जा।"
"मैं सो नहीं सकता।"
"तो बैठ," उन्होंने कहा। "मेरे पास बैठ, और मुझे वो सब बता जो आज तूने देखा। मुझे भी सब पता होना चाहिए, अंकुश। मुझे कल सभा में खड़े होना है। और जो औरत खुद नहीं जानती, वो औरत सभा में बोल नहीं पाती, बस रोती है।"
तो मैं बैठ गया। और मैंने बताया।
सकीना बी की दुकान। शटर। अंधेरा। वो आधी नीली मोहर वाला पीला शर्तनामा जिस पर गली के बुज़ुर्गों के नाम थे — नूर मोहम्मद, बंसीधर, निसार, कलीम, रामदीन और जगदीश यादव। सलीम का हस्ताक्षर। कटा हुआ कोना। रणवीर का बाईस साल पहले छोटा मुनीम होना। तीन दिन के लिए काग़ज़ लेना और फिर कभी न लौटाना।
माँ सब सुनती रहीं। एक बार भी बीच में नहीं रोका।
जब मैं खत्म हुआ, तो उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा —
"तीन दिन।"
"हाँ।"
"अंकुश, तेरे पापा तीन दिन कहाँ गए थे, पता है?"
"नहीं।"
"वो तीन दिन उन्होंने अस्पताल के बाहर बिताए," माँ ने कहा। "मुझे डॉक्टर साहब ने बताया था, बहुत बाद में। कहा कि शंकर साहब रोज़ शाम सीढ़ी पर बैठते थे, और मैं समझती थी कि वो मेरे इलाज की फ़िक्र में बैठते हैं।" उन्होंने आँखें मूँद लीं। "वो उस काग़ज़ को ढूँढ़ रहे थे। तीन दिन, दो जगहों के बीच, जब उनकी बीवी अस्पताल में थी।"
काजल ने अचानक कहा, "भैया।"
"हाँ।"
"अगर पापा ने काग़ज़ इन सबसे बचाया था, तो वो रखा कहाँ है?" उसने मेरे हाथ में कॉपी की तरफ़ देखा। "क्योंकि मुझे लगता है, अगर वो उस संदूक में होता, तो आज तक रणवीर उसे ले जा चुका होता। उनका आदमी कई बार घर तक आया है, काग़ज़ के बहाने।"
मैंने काजल की तरफ़ देखा।
कभी-कभी तेरी छोटी बहन वो बात कह देती है जो तू सोच भी नहीं रहा होता।
"तो कहाँ है?" मैंने कहा।
"बताएँगे तो पता चलेगा," माँ ने कहा। "और आज रात मत पूछना। वो जब लौटें, तब पूछना। पर एक बात का ध्यान रख — पूछना, झगड़ना नहीं।"
"मैं झगड़ा नहीं करूँगा।"
"वादा?"
"वादा।"
माँ मुस्कुराईं। और फिर उन्होंने वो कहा जो वो हर बार कहती हैं जब मुझे कुछ गलत करने की जल्दी होती है।
"मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता, अंकुश, और बात में भी नहीं मिलता। तो मेरे सामने वादा करके मत भूल।"
काजल हँस पड़ी। और मैंने देखा कि वो हँसते-हँसते अपनी आँखें रगड़ रही थी, जैसे कुछ गिरा हो अंदर।
तभी दरवाज़े पर खड़ा टिंकू बोला, "उस्ताद, मैं दुकान की तरफ़ जा रहा था, शटर खुला है —"
"रुक," मैंने कहा। "अकेले मत जा। मैं साथ चलता हूँ।"
"नहीं, रुको," माँ ने कहा। "तू अभी मेरे पास बैठा है। टिंकू, तू दुकान जा, और देख कि तेरे पापा दुकान के पीछे वाले कमरे में हैं या नहीं। अगर हैं, तो एक बात कह देना — सुशीला बुला रही हैं।"
टिंकू रुक गया।
"मैं जाऊँ?" उसने मेरी तरफ़ देखा। "डर नहीं लगेगा?"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
"लगेगा," मैंने कहा। "पर उसी डर में तो काम होता है। छोटी टॉर्च ले जा। और सुन — किसी से बात मत करना। कोई बाहर वाला दिखे, तो चुप्पे-चुप्पे आ जाना।"
वो गया।
मैं वापस बैठ गया। माँ ने मेरे पास वाली तरफ़ देखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "एक बात और है।"
"हाँ।"
"वो संदूक। अगर उसका ताला आज भी बंद है, तो उसे बंद ही रहने दे। मैं तुझे यह नहीं कह रही कि उसमें सच नहीं है। मैं यह कह रही हूँ कि उससंदूक में हमारा नहीं, तेरे पापा का सच है। और जो अपना सच खुद नहीं खोलता, तो उसका सच किसी और से खुले, तो आदमी अंदर से टूटता है। तेरे पापा को छोड़ दे अपना सच खुद खोलने दे। वो तैयार है। आज सुबह जो मैंने उन्हें देखा है, वो ऐसा लड़का है जो सारी रस्सियाँ खुद खोल देगा — बस तुझे उसका हाथ पकड़ना है, यह कहने के लिए कि भागने की ज़रूरत नहीं।"
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