The Mysterious Bell651 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 651

7 min read November 5, 2026

"नहीं।" उन्होंने कहा। "तीन दिन के बाद मैंने कहलवाया। वो आया और बोला कि उसने डाक से भेज दिया। मैंने कहा कि यह डाक वाला काग़ज़ नहीं, मेरे हाथ से देखा हुआ काग़ज़ है। वो हँसा और बोला — भाभी, आप काग़ज़ को मेरे हिसाब से मत देखिए, काग़ज़ भगवान का नहीं, किसी के बाप का नहीं, काग़ज़ की अपनी ज़ुबान होती है। और उसने पूछा कि क्या मैंने किसी और को बताया था कि यह काग़ज़ मेरे पास था।"

"आपने क्या कहा?"

"मैंने कहा — किसी को नहीं।"

मेरे हाथ की मुट्ठी कस गई।

"और वो चला गया। तीन महीने बाद उस ज़मीन के काग़ज़ों पर नई मुहर लगी — एक ट्रस्ट के नाम पर। मैंने कोई सुध नहीं ली, बेटा। मैं तब किसी से लड़ने की हालत में नहीं थी।"

"पर यह नक़ल किसी के दफ़्तार में तो रहेगी, बी?"

"रहेगी, पर मेरी नहीं।" उन्होंने कहा। "पच्चीस साल पहले उस काग़ज़ की एक और नक़ल बनी थी। जिस रात सलीम गए, उससे एक हफ़्ता पहले। गली के चार बुज़ुर्ग लाए थे, मुआयना करने। उस वक़्त बाज़ार के पुराने रजिस्टर की एक नक़ल बनाई गई थी, एक काग़ज़, जिस पर मुहर भी पूरी थी। और वो काग़ज़ किसी के हाथ में है।"

"किसके?"

वो मेरी तरफ़ देखने लगीं।

"बेटा, तेरे पापा को बताया गया था कि वो काग़ज़ भारद्वाज के दफ़्तार में सुरक्षित है। और तेरे पापा ने वो बात मान ली।"

मैंने आँखें बंद कर लीं।

"पर आज मुझे लगता है," उन्होंने धीरे से कहा, "वो बात आधी सच थी। क्योंकि जो काग़ज़ भारद्वाज के पास होता, वो इतने साल किसी को क्यों पढ़ने देता? वो सिर्फ़ दिखाता है, बताता नहीं। दिखाने से डर बनता है, बताने से खुलासा। और आज वो तेरे काग़ज़ पर अंगूठे की बात कर रहा है, तो इसका मतलब — असली नक़ल उसके पास नहीं है। उसके पास सिर्फ़ उसका डर है।"

मैंने आँखें खोलीं।

"तो फिर असली नक़ल कहाँ है?"

"यही तो," उन्होंने कहा, "सलीम के जाने की रात का सच है।"

वो रुकीं। फिर उन्होंने कुर्सी पर से उठकर पीछे की तरफ़ जाने की कोशिश की। मैंने हाथ बढ़ाकर उनकी कोहनी सँभाली।

"बैठो, बी, क्या चाहिए?"

"वो छोटी कॉपी उठा," उन्होंने कहा। "बक्से में जो है।"

मैंने वो कॉपी उठाई।

कॉपी छोटी, काली जिल्द वाली, कोने मुड़े हुए, पन्ने पीले पड़े थे। खोलने पर पहला पन्ना — खाली। दूसरा — खाली। तीसरा — खाली। आख़िर में एक पन्ने पर दो लाइनें लिखी थीं।

"पढ़," उन्होंने कहा।

मैंने पढ़ा।

"आज रात सलीम को साथ चलना था। नहीं गया। डर गया। — शंकर।"

मेरे हाथ काँपने लगे।

"यह — यह पापा की लिखाई है?"

"हाँ।"

"पर यह लिखा है — 'आज रात सलीम को साथ चलना था। नहीं गया। डर गया।'"

"हाँ," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ भर आई। "जिस रात सलीम गए, उससे चार दिन पहले यह लिखा गया था। तेरे पापा को अस्पताल में किसी के साथ जाना था — किसी को रुपये देने, सलीम के इलाज के वास्ते। तेरे पापा डर गए थे। वो उस रात नहीं गए।"

मैं स्तब्ध रह गया।

"पर यह कॉपी — यह आपके पास कैसे?"

"सलीम के पास था। अस्पताल का हिसाब-किताब इसी कॉपी में होता था। उन्होंने उस रात यह पन्ना लिखा और फिर सलीम के नाम के नीचे एक लाइन और जोड़ी — 'रामनवमी को साथ चलूँगा।' और फिर उन्होंने यह कॉपी अपने जेब से निकालकर यहाँ, मेरी मेज़ पर रख दी थी। शायद वो जानते थे कि अगर वो सलीम के साथ जा रहे हैं, तो सलीम को कुछ हो गया तो यह कॉपी मेरे पास मिलेगी।"

"तो पापा नहीं गए थे —"

"वो नहीं गए थे," उन्होंने कहा। "पर वो उस रात यहाँ थे। दोनों यहाँ थे। सलीम यहाँ से गए, और तेरे पापा यहाँ रहे।"

मेरा दिमाग़ काम नहीं कर रहा था।

"मेरे पापा ने अस्पताल जाने से मना किया था?"

"ना नहीं किया। डर गए। दोनों में फ़र्क़ होता है, बेटा। ना कहने में इंसान अपना फ़ैसला जताता है, डरने में अपनी हालत। पच्चीस साल से तेरे पापा वो डर ढो रहे हैं, जो उस रात यहाँ खड़ा था। उन्होंने खुद को कभी माफ़ नहीं किया।"

मैंने वो कॉपी बंद कर दी।

"बी — यह कॉपी मेरे बाप के ख़िलाफ़ गवाही है। अगर यह सबके सामने आ गई, तो सारी गली कहेगी कि शंकर यादव डरकर भाग गए।"

"और तू क्या कहेगा?"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

वो मेरी तरफ़ देख रही थीं, और उनकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — किसी और के लिए उम्मीद।

"मैं कहूँगा," मैंने धीरे से कहा, "कि मेरे पापा डर गए थे। पर मेरे पापा ने बाईस साल उस डर का सामना किया। और उस डर ने उनसे एक काग़ज़ पर अंगूठा लगवाया। अब वो उसी अंगूठे को मिटाने आए हैं।"

सकीना बी चुप बैठी रहीं।

फिर उन्होंने एक लंबी साँस ली — ऐसी साँस जो बरसों से कहीं अटकी हुई थी।

"अब मैं तुझे वो बात बताती हूँ जो मैंने बाईस साल किसी से नहीं कही," उन्होंने कहा।

मैंने कान सीधा किया।

"उस रात," उन्होंने कहा, "जब मैंने पाया कि सलीम जा चुके हैं और तेरे पापा वापस आए हैं, तो मैंने तेरे पापा से पूछा कि सलीम कहाँ हैं। उन्होंने कुछ नहीं कहा। फिर मैंने पूछा कि वो काग़ज़ किसने लिया। वो फिर चुप रहे।"

"कौन सा काग़ज़?"

"सलीम के जेब में एक पीला काग़ज़ था," उन्होंने कहा। "जो उस रात आपके पास नहीं आया। जो सलीम की जेब से गायब हो गया।"

मेरी आँखें फैल गईं।

"मतलब — जो काग़ज़ आज सक्सेना के पास है, वो —"

"वो वो नहीं है," उन्होंने कहा। "वो सिर्फ़ एक नक़ल है। असली काग़ज़ — असली वो चार बुज़ुर्गों के अंगूठों वाला काग़ज़ — सलीम की जेब में था। और उस रात चला गया।"

मेरे मुँह से एक शब्द नहीं निकला।

"उस रात के बाद," उन्होंने कहा, "डॉक्टर साहब के सामने कुछ काग़ज़ मिला। कोई काग़ज़ी काम, कोई हिसाब। डॉक्टर साहब ने सोचा कि वो अस्पताल का हिसाब है। उन्होंने उसे खाते में रख दिया।"

"डॉक्टर साहब को पता नहीं?"

"नहीं," उन्होंने कहा। "वो तब से आज तक नहीं जानते कि उस रात सलीम की जेब में क्या था। उन्होंने सिर्फ़ एक काग़ज़ देखा, वो भी अधूरा। उन्हें लगा कि वो काग़ज़ अस्पताल की ज़मीन का हिस्सा है, क्योंकि ऊपर मेरी मुहर थी।"

"तो असली काग़ज़ —"

"असली काग़ज़ शंकर यादव के पास है," उन्होंने कहा।

कमरे में चुप्पी छा गई।

मैं स्टूल पर जम गया। मेरे कान में एक हल्की सी गूँज थी, जैसे दूर कहीं कोई घंटी बजी हो और फिर धीमी हो गई हो।

"बी," मैंने धीरे से कहा, "यह आप मुझे कब से बता रही थीं?"

"मैं कब से बताना चाहती थी," उन्होंने कहा। "पर तेरे पापा ने कहा था कि जब तक तेरा बेटा खुद न पूछे, यह काग़ज़ किसी को नहीं दिखाएँगे।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"यह —" मैंने कहा। "यह पापा ने कहा था?"

"हाँ।" उन्होंने कहा। "उस रात। सलीम के जाने के बाद। जब सब लौट गए, तो तेरे पापा यहाँ आए। उन्होंने मेरे पैर पकड़ लिए और रोए। मैंने उन्हें उठाया। उन्होंने कहा — भाभी, आज मैंने डर के आगे घुटने टेके हैं। यह मेरा दोष है।"

वो रुकीं।

"मैंने कहा — नहीं, यह तेरा दोष नहीं है। यह उस आदमी का दोष है जिसने तेरी डर पर कब्ज़ा किया।"

"और फिर?"

"फिर उन्होंने कहा कि वो उस आदमी को सबक सिखाएँगे। मैंने कहा कि सबक सिखाने की उम्र नहीं रही, अब बच्चे हैं — अंकुश, काजल। वो रोए। मैंने उनसे वादा लिया — अगर वो कभी इस काग़ज़ की बात किसी से करें, तो सिर्फ़ उस वक़्त करें जब अंकुश खुद उनसे पूछे। उससे पहले नहीं। क्योंकि अगर अंकुश एक बार काग़ज़ देखे और वो गलत हाथों में चला जाए, तो सलीम की मेहनत पर पानी फिर जाएगा। और मैंने कहा — शंकर, तुम यह काग़ज़ छुपाओ, पर कभी इसे अपने फ़ायदे के लिए मत इस्तेमाल करना।"

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