The Mysterious Bell – Chapter 605
मैंने अपनी उँगलियाँ ट्रंक पर रखी। ग्रीस का पुराना निशान अब भी वहीं था, और उसी के बगल में एक छोटा सा स्थान खाली था, जहाँ से उस्ताद की छोटी फूल वाली घंटी आज सुबह हटाई गई थी।
"अच्छा," मैंने कहा। "तो दो सौ अठाईस से सत्तर काट।"
"एक सौ अठ्ठावन बचेंगे," घंटी बोली, और इस बार उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जैसे… कुछ ऐसा जैसे कोई हिसाब लिखने वाला कलम उठाने से पहले एक बार रुक जाए।
"बता पूरी बात," मैंने कहा। "परत खोलने में क्या होगा? मैं क्या देखूँगा? कोई इंसान, या कोई जगह?"
"तू उस चीज़ का आख़िरी सच्चा लम्हा देखेगा," घंटी बोली। "जो चीज़ जिसके हाथ से टूटी, उसी का हाथ दिखेगा। और जो आदमी उसे जोड़ने आया, उसका चेहरा भी। ये परत वैसी नहीं जैसी तूने कभी देखी है। यहाँ तू सिर्फ़ देखेगा नहीं। यहाँ तू अंदर खड़ा होगा।"
मैंने आँखें मींच लीं।
फिर खोली।
"हाँ," मैंने कहा। "खोल।"
घंटी ठंडी हुई।
अब मुझे पता चल गया था कि ये ठंड क्या होती है। ये डर की नहीं होती। ये उस तरह की ठंड होती है जैसे हाथ को ज़ंग लगी रॉड पर रखने से होती है, और जैसे ही तुम उसे छोड़ते हो, तुम्हारी हथेली पर ज़ंग की एक पतली लकीर बन जाती है।
मैंने जेब से पट्टी निकाली।
उसे दोनों हाथों से पकड़ा, और उसे दो पल देखा — वो नाम, जो मैंने अब तक कभी अपने कान से नहीं सुना था, केवल मिट्टी में पढ़ा था। जगदीश यादव। साइकिल। और नीचे वो छेद, जिसमें मेरी चाबी तीन चौथाई तक गई थी।
मैंने पट्टी को माथे से लगाया।
और एक ही साँस में बल्ब का गुनगुनाना बंद हो गया।
पहले सन्नाटा आया। ऐसा सन्नाटा जैसे कमरे में हवा भी साँस रोककर खड़ी हो गई हो।
फिर गंध आई। लकड़ी की, टिन की, गरम लोहे की, और उसके ऊपर एक पतली-सी, मीठी ज़ंग की गंध जो तेल में मिली हुई हो।
और फिर मैं वहाँ था।
मैं अपनी दुकान में नहीं था। मैं पुराने बाज़ार के पीछे खड़ा था, बिजलीघर से पहले मुड़ने वाली गली में, उसी जगह जहाँ उस्ताद अली बक्श की पुरानी दुकान है — नीला दरवाज़ा, उतरता रंग, और पीछे का छोटा कमरा जहाँ आज भी काली साइकिल कपड़े से ढकी पड़ी है।
पर यहाँ कुछ और था। एक ही बार देखकर मैं पहचान गया।
सामने लोहे के बड़े बक्सों की कतार थी, धूल से ढकी, जिन पर ट्रकों की तरह कोई मोहर लगी थी। दुकान का बोर्ड टेढ़ा टँगा था। छत आधी टिन की थी, आधी ईंट की। और दुकान के बाहर, एक लकड़ी के मेज़ पर, एक काग़ज़ रखा था — एक मोटा काग़ज़, जिसकी ऊपर की शीट पर नीली स्याही में कुछ लिखा था और नीचे एक लाल स्याही का गोल निशान, अंगूठे के आकार का।
मैंने मेज़ के पास कदम बढ़ाया और तब जाकर देखा कि वहाँ चार आदमी खड़े हैं।
पहला — लंबा, दुबला, कंधों पर झुका हुआ, सफ़ेद कुर्ता, और हाथ में लकड़ी का एक बक्सा। उसकी उँगलियाँ मेज़ की तरफ़ नहीं, दरवाज़े की तरफ़ थीं, जैसे वो हर वक़्त भागने का रास्ता तय कर रहा हो। ये इलियास थे। मैंने उन्हें पहचान लिया — आज से पच्चीस साल पहले का चेहरा, पर वही आँखें, वही वो हल्की-सी काँपती ठुड्डी जो आज गुमटी की मेज़ पर बैठकर भी काँप रही थी।
दूसरा — बैठा हुआ, चश्मा नाक पर, सफ़ेद दाढ़ी नहीं, बस काली-सफ़ेद दाढ़ी का शुरुआती हिस्सा। कान पर पेंसिल। हाथ में पीतल की एक घंटी, जिस पर फूल खुदा था। उस्ताद अली बक्श, जवान, और उस वक़्त भी चुप।
तीसरा — मैंने उसे देखा और मेरा सिर घूम गया। एक आदमी, जिसके जूते बहुत चमक रहे थे। बाकी सब धूल में थे और इसके जूते चमक रहे थे — जैसे ये घर से चलकर नहीं, गाड़ी से उतरकर आया हो। इसके हाथ में एक मोटा काग़ज़ था, जिसके कोने पर लाल निशान था। इसकी उँगली उस काग़ज़ पर ऐसे रखी थी जैसे कोई ताश का पत्ता छिपा रहा हो।
और चौथा—
मैंने अपनी साँस रोक ली।
चौथा जवान था — बहुत जवान। बाल साफ़ कटे हुए, सफ़ेद कमीज़, कमर पर बेल्ट, और चेहरे पर वो मुस्कान जो मैंने पोस्टरों पर देखी थी। रणवीर भारद्वाज। पर यहाँ, इस जगह पर, इस टिन की छत के नीचे, वो मुस्कुरा रहा था — और उसकी मुस्कान में कुछ था जो मुझे बर्फ़ की तरह चुभा।
कमरे में हवा भी नहीं हिल रही थी, पर मुझे ठंड लग रही थी।
उस्ताद ने घंटी मेज़ पर रखी और काग़ज़ की तरफ़ इशारा किया।
"सुन लो," उस्ताद ने कहा। आवाज़ आज जितनी धीमी नहीं थी, पर उतनी ही भारी। "ये काग़ज़ जो है, इसमें दुकान का नाम लिखा है। गिरवी का काग़ज़ है। पैसा मिलेगा, दुकान रहेगी, बाद में छुड़ा लेना।"
इलियास ने कुछ कहना चाहा। उनके होंठ हिले, फिर रुक गए।
तीसरा आदमी बोला। उसकी आवाज़ में एक अजीब चीज़ थी — जैसे कोई बहुत सलीके से मीठा बोल रहा हो।
"अंगूठा यहाँ," उसने कहा, और उँगली रख दी। "नीचे तारीख़। और गवाह की जगह।"
और तब मैंने वो हाथ देखा।
मेज़ के दूसरी तरफ़ से एक हाथ आया। मोटा हाथ, हथेली चौड़ी, उँगलियाँ छोटी और मज़बूत, और कलाई पर चमड़े का एक पुराना धागा बँधा हुआ।
लाल स्याही की डिब्बी खुली। इलियास ने उसे आगे बढ़ाया। हाथ काँप रहा था — इलियास का हाथ नहीं, वो दूसरा।
वो हाथ अंगूठे को स्याही में डुबाने ही वाला था कि उसके मालिक ने कुछ कहा।
"मैं अंगूठा लगा रहा हूँ," आवाज़ आई। "पर एक बात साफ़ कर लो। मेरा नाम इस काग़ज़ पर ऐसे नहीं आएगा कि मेरा बेटा इसे कभी पढ़े और मुझसे नज़र न मिला सके।"
मैं जम गया।
वो आवाज़।
वो आवाज़ मैंने पूरी ज़िंदगी सुनी थी — छोटे वाक्यों में, रसोई में, अँधेरे में, हमेशा से एक कदम पीछे खड़ी।
ये मेरे दादा थे। जगदीश यादव।
उनका चेहरा मैंने केवल तस्वीरों में नहीं, किसी ने बताया भी नहीं था। पर जब वो इस तरह बोले, मुझे कोई पहचान चाहिए ही नहीं थी। मुझे लगा जैसे पापा के चेहरे से बीस साल उतार दिए गए हों और सामने खड़ा कर दिया हो।
"लगाओ," तीसरे आदमी ने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में मिठास कम थी, जल्दी ज़्यादा।
दादा ने अंगूठा स्याही में डुबाया और काग़ज़ पर लगा दिया।
लाल निशान बन गया। उसने हाथ पीछे खींच लिया, और मैंने देखा कि उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं, और वो काँपती उँगलियाँ उन्होंने जल्दी से कुर्ते में छिपा लीं, जैसे बच्चा कोई चोरी की चीज़ जेब में छिपाता है।
उस्ताद ने काग़ज़ उठाया। देखा। सिर हिलाया, और फिर बोले, "गवाह में मेरा नाम।"
"नहीं," तीसरे आदमी ने कहा। "गवाह मैं भरूँगा। तुम बैठो।"
इलियास ने आगे कदम बढ़ाया।
"नहीं," इलियास ने कहा, और इस बार उनकी आवाज़ में वो डर नहीं था जो पच्चीस साल बाद गुमटी की मेज़ पर था। कुछ और था। "गवाह तुम नहीं। गवाह वो जो यहाँ का है।"
और तब वही हुआ जो मुझे देखना था और जिसे देखने के लिए मैं तैयार नहीं था।
उस्ताद ने मेज़ से घंटी उठाई — वो पीतल की, फूल वाली घंटी। उसे अपनी हथेली में रखा, और उसे इलियास की तरफ़ बढ़ाया।
और तीसरे आदमी का हाथ आगे आया।
उसने घंटी उस्ताद के हाथ से नहीं छीनी।
उसने घंटी को उस्ताद के हाथ में ही ऐसे पकड़ा जैसे कोई डॉक्टर घाव को दबाता है — दो उँगलियाँ ऊपर, अंगूठा नीचे।
और एक ही झटके में घंटी का ऊपरी हिस्सा अलग हो गया।
चट।
ऐसी आवाज़ नहीं जैसे लोहा टूटता है। ऐसी आवाज़ जैसे किसी के दाँत अंदर से टूट रहे हों।
उस्ताद की हथेली में घंटी का आधा हिस्सा रह गया, और नीचे मेज़ पर एक चमकता टुकड़ा गिरा और लुढ़ककर रुक गया।
और उस टुकड़े से एक आवाज़ आई।
नहीं — आवाज़ नहीं। कुछ और। जैसे घंटी जो बजने से पहले हवा में एक झुरझुरी बनाती है, वो झुरझुरी टूट गई और मेज़ पर गिर गई।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno