The Mysterious Bell – Chapter 602
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "एक बात पूछूँ?"
"पूछो।"
"आपने कहा था कि माँ ने आपको कोई बात बताई है।"
वो रुके। उन्होंने काग़ज़ों के ढेर को उँगली से एक तरफ़ सरकाया, फिर दूसरी तरफ़, जैसे उन्हें कुछ ढूँढना हो और पता हो कि नहीं मिलेगा।
"सात सौ इकहत्तर रुपये," उन्होंने कहा। "लिफ़ाफ़े में। माँ ने मुझे रात में बताया, जब वार्ड में सब सो गए थे। उन्होंने कहा — डॉक्टर साहब, जाँच में कुछ निकले तो वो पैसे काम आएँगे।"
मेरा गला सूख गया।
"मुझे नहीं बताया," मैंने कहा। "उन्होंने आपको बताया, मुझे नहीं।"
"हाँ।"
"क्यों?"
डॉक्टर साहब ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें थकी हुई थीं, पर टालने वाली नहीं।
"क्योंकि उन्होंने कहा — ये पैसे काजल को देना, अंकुश को नहीं। और मैंने पूछा क्यों, तो वो बोलीं — क्योंकि अंकुश इन पैसों को लेकर कुछ और बेच देगा, और मैं ये नहीं चाहती।"
कमरे में चुप्पी बैठ गई। काजल ने मेरी तरफ़ नहीं देखा। वो दीवार पर टँगी तस्वीर की तरफ़ देखती रही।
मैं मुस्कुराया। मुझे मुस्कुराना पड़ता है, जब कुछ लगता है। ये मेरी आदत है, और ये आदत मेरे साथ बड़ी हुई है, माँ के हाथ की रोटी की तरह।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "ये भी तो देखिए। माँ मुझे तीन महीने से कह रही हैं कि मैं तेरी दुकान का हिसाब देख, और वो खुद मेरे पीछे काग़ज़ छिपाकर डॉक्टर को दे रही हैं। वाह। क्या परिवार है। मेरी बहन सफ़ेद कोट पहनकर मुझे घूर रही है, मेरी माँ डॉक्टर से मेरी निंदा कर रही है, और मेरे पापा घर पर बैठे हैं — वो चुप हैं, लेकिन उनका चुप रहना भी एक तरह की राय है।"
डॉक्टर साहब हँसे। इस बार हँसी सच्ची थी।
"बेटा," उन्होंने कहा, "तेरी माँ ने मुझे भी एक बात कही थी।"
"क्या?"
"उन्होंने कहा — मेरे बेटे की ज़ुबान के नीचे एक और आदमी बैठा है, जो हँसी में सब दबा देता है। उसे लगता है कि अगर वो हँसेगा नहीं, तो सब रो पड़ेंगे।"
मैं कुर्सी पर सीधा बैठ गया।
"ये माँ ने कहा?"
"हाँ। और उन्होंने यह भी कहा — उससे मत बोलना कि मैंने कहा है।"
"तो आप बोल रहे हैं।"
"क्योंकि मैं डॉक्टर हूँ, भगवान नहीं," उन्होंने कहा, "और मेरे पास इस वक़्त माँ को ठीक करने की दवा है, तुझे ठीक करने की नहीं।"
काजल ने तब कहा — "डॉक्टर साहब, वो लिफ़ाफ़ा?"
"वो मैंने खुद नहीं छुआ," उन्होंने कहा। "जब माँ ने बताया, मैंने कहा कि ये तुम्हारा है, तुम्हीं रखो। वो लिफ़ाफ़ा उनकी कॉपी के पीछे है। और मेरी बात साफ़ है — वो काजल को दिया जाएगा। जिस दिन ज़रूरत पड़ेगी, काजल के हाथ में जाएगा।"
काजल ने एक बार मेरी तरफ़ देखा, फिर तुरंत नज़र नीचे कर ली।
"क्यों?" मैंने पूछा। "मैं बड़ा हूँ, मैं कमाता हूँ —"
"नहीं, तू बड़ा नहीं है," काजल ने कहा। "तू सबसे बड़ा दिखता है। तेरे सिर पर सबसे ज़्यादा बोझ है और तू सबसे ज़्यादा मज़ाक करता है। माँ ने गलत नहीं किया।"
मैंने हाथ उठाकर हार मान ली।
"ठीक है," मैंने कहा। "ठीक है। मैं हार गया। पर एक बात सुन लो।"
"क्या?"
"वो सात सौ इकहत्तर रुपये मैं नहीं खाऊँगा।"
"कौन कह रहा है तू खाएगा," काजल ने कहा। "तू वो नहीं खा सकता। तू तो अपनी दुकान के पैसे भी नहीं खाता — वो सीधे टिंकू की पेंसिल और मेरी किताबों में चले जाते हैं।"
डॉक्टर साहब हँसे, और हँसते हुए उन्होंने पानी का गिलास उठाया, हिलाया, फिर रख दिया।
मैंने हल्का सा मज़ाक करने की सोची। मुझे नहीं पता क्यों, पर जब भी कमरा भारी होता है, मेरी ज़ुबान हल्का करने पर उतर आती है।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "आपकी घड़ी भी मेरे यहाँ से ठीक हुई थी। याद है? पिछली बार। इसलिए बिल में थोड़ी छूट चलेगी। दो-चार रुपये नहीं, थोड़ी अच्छी छूट।"
काजल ने मुझे घूरा। वो घूरना उसने माँ से सीखा है — आँखों से, बिना पलक झपकाए, जैसे दीवार पर कील ठोंक रही हो।
डॉक्टर साहब ने कहा, "छूट चलेगी।"
"सच?"
"हाँ। पर एक शर्त पर।"
"बोलिए।"
"तेरे हाथ में जो चाबी है, उसे आज रात ताले में लगाने से पहले सोच लेना कि उस ताले के पीछे क्या है।"
मैं रुक गया।
"आपको कैसे पता कि ये चाबी किसी ताले की है?" मैंने पूछा।
डॉक्टर साहब ने तस्वीर की तरफ़ देखा।
"क्योंकि मेरी बीवी के पास भी एक चाबी थी," उन्होंने कहा, "और वो कहती थी कि जिस ताले की चाबी गले में लटकती है, वो ताला कभी पूरा बंद नहीं होता।"
और मेरी जेब में घंटी चुप रही।
न ठंडी हुई, न गरम। न कुछ बोली।
मैंने जेब में हाथ डालकर उसे छुआ। वो बस पड़ी थी। जैसे किसी ने उसे अभी उठाया ही न हो।
मुझे ये चुप्पी सबसे ज़्यादा डराती है। घंटी जब बोलती है, तब भी डर लगता है, पर जब वो चुप हो जाती है, तब ऐसा लगता है कि कोई मेरे कंधे के पीछे खड़ा है और जानबूझकर साँस नहीं ले रहा।
मैं उठा, कमरे में दो कदम चला और खिड़की के पास पहुँचा। बाहर अस्पताल का गेट दिख रहा था, नीम का पेड़, और उसके नीचे पान की पीक का पुराना निशान।
और तभी मेरी नज़र दीवार पर पड़ी।
वही पोस्टर। चमकदार, नया, पीली दीवार पर चिपकाया हुआ। रणवीर भारद्वाज हाथ जोड़े, सफ़ेद कपड़े, साफ़ कटा हुआ चेहरा, और नीचे बड़े अक्षरों में लिखा था — नई शुरुआत, नए सपने।
मैंने काजल की तरफ़ देखा।
"ये कब लगा?"
काजल ने कंधे उठाए।
डॉक्टर साहब ने कहा, "मैंने नहीं लगाया।"
"किसी ने लगाया तो होगा।"
"हाँ," उन्होंने कहा। "पर मुझे नहीं पता किसने। तीन दिन पहले जब मैं सुबह आया, ये यहीं लगा मिला। और उसी सुबह —"
वो रुके।
"उसी सुबह क्या?"
"उसी सुबह पीछे के प्लॉट में गड्ढा खुदा मिला।"
मैंने खिड़की के काँच में अपना चेहरा देखा।
"कितना बड़ा गड्ढा?"
"उतना बड़ा नहीं," डॉक्टर ने कहा। "पर उसकी जगह ऐसी थी कि मुझे रात को नींद नहीं आई।"
"कहाँ?"
डॉक्टर साहब उठे। उन्होंने कुर्सी पीछे खिसकाई, और उसकी टाँग फर्श पर चरचराई। फिर वो खिड़की के पास आए, मेरे बगल में खड़े हुए, और उन्होंने उँगली बाहर की तरफ़ की।
"देख," उन्होंने कहा, "अस्पताल की पिछली दीवार के ठीक उस कोने में, जहाँ से ईंटें उखड़ी हुई हैं। जहाँ से बरसात का पानी रिसता है।"
मैंने देखा।
नीचे पीछे के प्लॉट में मिट्टी का ढेर पड़ा था। मिट्टी गीली थी, हाल की थी, और उसके इर्द-गिर्द ईंटें रखी थीं।
"वहाँ तो पहले से ही ढेर था," मैंने कहा।
"हाँ, था," उन्होंने कहा। "पर ये ढेर उस ढेर से अलग है। ये दीवार के नीचे से निकली मिट्टी है, ऊपर से नहीं आई।"
काजल मेरे पास आ गई। उसने भी बाहर झाँका।
"डॉक्टर साहब," उसने कहा, "आपने किसी से पूछा नहीं?"
"पूछा," उन्होंने कहा। "चौकीदार से पूछा। वो कहता है कि रात को उसे कुछ सुनाई नहीं दिया। वो कहता है कि उस रात उसे नींद की गोली की तरह नींद आई थी — अपने आप।"
"अपने आप," मैंने धीरे से दोहराया।
"तीस साल में वो आदमी कभी अपने आप नहीं सोया," डॉक्टर ने कहा। "हमेशा वो दो बजे उठकर चारों तरफ़ एक चक्कर लगाता है। उस रात नहीं लगाया।"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और घंटी को बाहर निकाला। लोग कहते हैं कि घंटी बजाने से कुछ होता है। मेरे लिए बजाने की ज़रूरत नहीं थी। मैंने बस उसे हथेली में पकड़ा और उँगली उसके ठंडे पीतल पर रख दी।
कुछ नहीं हुआ।
और यही सबसे बड़ी बात थी।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "आप ऊपर रहिए। मैं नीचे जाता हूँ।"
"अंकुश —"
"आप मना मत कीजिए," मैंने कहा। "आपने खुद कहा था कि पोस्टर लगने देना भी उसी हिसाब का हिस्सा है। तो ये भी उसी हिसाब का हिस्सा है।"
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