The Mysterious Bell – Chapter 599
वो पीला था। हाथ से लिखा हुआ नहीं था — छपा हुआ था, पर उसकी छपाई ऐसी थी जैसे मशीन ने बहुत जल्दी में छापा हो। कुछ शब्द धुँधले, कुछ जगह स्याही फैली हुई, और किनारे पर एक कोना फटा हुआ — जैसे किसी ने जल्दी में खींचकर निकाला हो।
मैंने उसे धूप की तरफ़ उठाया।
और जो मैंने देखा, उससे मेरे हाथ ठंडे हो गए।
ऊपर भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की नीली मोहर थी। नीचे बहुत छोटे अक्षरों में कुछ लिखा था। पर मेरी नज़र पहले उस शब्द पर गई जो उस काग़ज़ के बीच में बड़ा छपा था, और वो शब्द था — "साइकिल गली"।
और उसके नीचे, बहुत छोटे अक्षरों में — "पुराना बोर्ड वाली दुकान"।
मैंने आँखें सिकोड़कर पढ़ा। शब्द फटे हुए थे, पर जोड़कर पढ़े जा सकते थे।
"दुकान का पुराना नाम — शंकर यादव और बेटे।"
मैं वहीं खड़ा रह गया। धूप, सड़क, नीम का पेड़, दूर कहीं ट्रक का हॉर्न — सब दूर हो गया। सिर्फ़ वो एक लाइन बची — "शंकर यादव और बेटे।"
मेरा नाम काग़ज़ में था।
पर वो मेरा नाम नहीं था।
वो "बेटे" था।
दो अक्षर। ब, े, ट, े। बस। कोई पूरा नाम नहीं, कोई उम्र नहीं, कोई अंगूठा नहीं। सिर्फ़ "और बेटे"।
और मेरे हाथ काँपने लगे, क्योंकि अब मुझे समझ आ रहा था कि घंटी ने यह क्यों कहा कि मेरे हिस्से की लाइन खाली छोड़ दी गई थी।
पापा ने दुकान का नाम उस काग़ज़ पर डाला था, और उसमें बेटे का हिस्सा ऐसा लिखा था कि उस पर अंगूठा लगे बिना काग़ज़ पूरा न हो। और पापा ने वो अंगूठा नहीं लगवाया। उन्होंने अपना लगाया — और मेरा हिस्सा खाली छोड़ दिया।
मतलब — उन्होंने मुझे उस काग़ज़ से बाहर रखा। जानबूझकर। जैसे कोई आदमी अपने बेटे को जलते घर से बाहर धकेल दे और ख़ुद अंदर बंद हो जाए।
"बेटा?" रज्जो बाई ने कहा। "क्या हुआ? तेरा रंग उड़ गया।"
"रज्जो बाई," मैंने कहा, "ये काग़ज़ तुमने कब उठाया था?"
"पाँच साल पहले," उन्होंने कहा। "उस रात के बाद, जब तेरे पापा का अंगूठा लिया गया था। मैंने सोचा, अगर कल को कोई पूछे कि क्या हुआ था, तो मेरे पास कुछ होना चाहिए। मैं पढ़ी नहीं हूँ। पर मैं जानती हूँ कि काग़ज़ कितना भारी होता है।"
"तुमने इसे किसी को दिखाया?"
"किसी को नहीं," उन्होंने कहा। "पंद्रह साल झाड़ू लगाते हुए इतना तो सीख ही लिया कि कौन सी चीज़ फर्श पर रहनी चाहिए और कौन सी जेब में।"
मैंने वो काग़ज़ मोड़ा और अपनी जेब में रखा।
"ये सबूत नहीं है," मैंने कहा। "ये नक़ल है। असली काग़ज़ उनके पास है।"
"तो?"
"तो," मैंने कहा, "ये नक़ल मुझे बता रही है कि वो असली काग़ज़ किस बारे में है। और मुझे ये भी बता रही है कि मेरे पापा ने मुझे किस चीज़ से बचाया है।"
मैंने एक गहरी साँस ली।
और फिर मैं मुड़ा, और अंदर चला।
शाहिद और यूसुफ़ मियाँ दोनों मेरी तरफ़ देख रहे थे। यूसुफ़ मियाँ बिस्तर पर थे, आधे लेटे, आधे उठे। उनकी साँस की आवाज़ कमरे में सबसे तेज़ चीज़ थी — जैसे कोई पुराना पंखा चल रहा हो, जिसकी बेल्ट ढीली हो गई हो।
"शाहिद," मैंने कहा। "अंदर आ।"
"उस्ताद, पापा ठीक नहीं हैं, उन्हें आराम—"
"अंदर आ," मैंने दोहराया। "और तू भी," मैंने यूसुफ़ मियाँ से कहा। "बस बैठे रहिए। लेटिए मत।"
डॉक्टर इसरानी दरवाज़े पर आए। उनके हाथ में वही पुराना स्टेथोस्कोप था, जिसकी नली पर टेप लिपटा हुआ था। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "मैं जानता हूँ तू क्या करने आया है। पर मैं तुझे बता दूँ — ये कमरा अस्पताल का है। यहाँ मरीज़ की साँस पहले है।"
"मैं भी यही कर रहा हूँ," मैंने कहा।
"क्या?"
"यूसुफ़ मियाँ की साँस रुकी हुई है," मैंने कहा। "दवा उसे रोक नहीं पा रही, क्योंकि असली रुकावट दवा वाली जगह पर नहीं है। वो यहाँ है।" मैंने शाहिद की तरफ़ और फिर यूसुफ़ मियाँ की तरफ़ देखा। "इन दोनों के बीच।"
डॉक्टर इसरानी कुछ कहने को हुए, फिर रुक गए।
"तू डॉक्टर नहीं है," उन्होंने धीरे से कहा।
"नहीं हूँ," मैंने कहा। "मैं मिस्त्री हूँ। और मिस्त्री का काम यही है — जहाँ से आवाज़ आ रही हो, उसे ढूँढ़ना।"
मैंने शाहिद की तरफ़ देखा।
"शाहिद, तेरे पापा की कुर्सी का पहिया टूटा है। मैं उसे ठीक कर सकता हूँ। मेरे पास औज़ार है, मेरे पास तेल है, मेरे पास वो छोटी बॉल बियरिंग भी है जो मुझे पिछले हफ़्ते टिंकू ने दी थी और जिसे मैंने अब तक किसी काम में नहीं लगाया।"
शाहिद ने सिर हिलाया। उसकी आँखों में उम्मीद आई।
"पर," मैंने कहा, "पहिया नहीं। पहले तुम दोनों की आवाज़ जुड़ेगी।"
कमरा चुप हो गया।
"क्या मतलब?" शाहिद ने कहा।
"मतलब ये कि अगर मैं आज ये पहिया लगा भी दूँ, तो कल फिर टूट जाएगा," मैंने कहा। "क्योंकि तू और तेरे पापा — तुम दोनों की आवाज़ें अभी अलग-अलग कमरों में रह रही हैं, एक ही कमरे में होकर भी।"
शाहिद ने हाथ जेब में डाले। फिर निकाले। फिर माथा पोंछा।
"उस्ताद," उसने कहा, "मैंने कुछ नहीं किया।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"मैंने सच में कुछ नहीं किया," उसने कहा, और उसकी आवाज़ थोड़ी ऊँची हो गई। "मैं तो बस काग़ज़ लेकर आया था। मुझे क्या पता था कि इसमें क्या लिखा है? मैं तो पढ़ भी नहीं पाया पूरा। मैंने सिर्फ़ सोचा कि पापा का इलाज मुफ़्त हो जाएगा, पैसे नहीं लगेंगे, और मेरी नौकरी भी पक्की हो जाएगी। बस इतना। बस इतना सोचा था मैंने।"
"और अब?"
"अब क्या?"
"अब क्या सोच रहा है?"
शाहिद ने नीचे देखा।
"अब मुझे डर लग रहा है," उसने कहा।
"किससे?"
"इससे कि पापा ठीक हो गए तो पता चलेगा कि मैंने क्या किया," उसने कहा। "और अगर ठीक नहीं हुए तो… तो भी पता चलेगा। दोनों तरफ़ मैं फँसा हूँ।"
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"शाहिद," मैंने कहा, "मैं तुझे एक बात बता दूँ। आज मैं झूठ नहीं बोलूँगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैं अभी मरम्मत कर रहा हूँ," मैंने कहा। "और जो आदमी मरम्मत करता है, वो मरम्मत के वक़्त झूठ नहीं बोल सकता। मेरे लिए ये नियम है। अगर मैंने झूठ बोला, तो मेरा सारा हिसाब शून्य हो जाएगा। इसलिए मैं तुझे सच बताऊँगा, चाहे वो कड़वा हो।"
शाहिद ने आँखें उठाईं।
"तो… तो क्या मेरे पापा बचेंगे?"
मेरा गला सूखा।
यही वो सवाल है, जिससे मैं हमेशा डरता हूँ। हर वो आदमी जो किसी बीमार के पास बैठा हो, यही सवाल पूछता है — और सच ये है कि कोई भी, जिसके हाथ में औज़ार हो, या स्टेथोस्कोप हो, या घंटी हो, उसका जवाब नहीं दे सकता।
"नहीं," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अपनी ही कानों में अजनबी लगी। "मुझे यक़ीन नहीं है।"
शाहिद की आँखें भर आईं।
"पर मैं ये भी नहीं कहूँगा कि वो नहीं बचेंगे," मैंने कहा। "क्योंकि मुझे वो भी नहीं पता। और जो मुझे नहीं पता, उसे मैं बोलकर अपने हाथ ख़राब नहीं करूँगा।"
"तो फिर आप क्या जानते हैं?"
"मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ," मैंने कहा, "कि तेरे पापा की साँस आज सुबह से दो बार भारी हुई है। और दोनों बार ऐसा तब हुआ जब तेरी माँ की बात आई, या तेरी नौकरी की बात आई।"
डॉक्टर इसरानी ने धीरे से सिर हिलाया। उन्होंने पहली बार कुछ नहीं कहा। बस देखते रहे।
"और अब," मैंने कहा, "तू मुझे बता — तुझे अपने पापा से क्या डर लगता है?"
शाहिद ने मुँह खोला, बंद किया।
"मैं नहीं—"
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