The Mysterious Bell – Chapter 593
"मैंने रोका नहीं," उन्होंने कहा। "और यही मेरी सबसे बड़ी ग़लती है। मैंने सिर्फ़ अपने बारे में सोचा — कि मुझे अंगूठा नहीं लगाना है, तो मेरा क्या जाता है। पर जब मैं चुप रहा, तब ये काग़ज़ उस कमरे तक चला गया जहाँ मेरे मरीज़ लेटे हैं। इसलिए यह काग़ज़ मेरे ख़ाते में भी दर्ज है।"
रज्जो बाई, जो अभी खिड़की के पास खड़ी थी, आगे आई। उसने अपना आधा खुला बैग सीने से लगा रखा था। उसने काग़ज़ देखा और उसका हाथ रुक गया।
"ठीक यही काग़ज़," उसने धीरे से कहा। "इसी की नक़ल पंद्रह दिन पहले चंद्रेश सक्सेना के दफ़्तर में आई थी। मैंने झाड़ू लगाते हुए उसे फ़ाइल में रखते देखा था। उस पर पीतल का एक टुकड़ा भी था, छोटा सा, घंटी जैसे रंग का। और चंद्रेश बोला था — इसे किसी ऐसे हाथ से लगवाना है जो बोले नहीं।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
मैंने ठंडी होती हुई घंटी को जेब में महसूस किया और अपने पापा की तरफ़ देखा। पापा काग़ज़ पकड़े खड़े थे। उनके हाथ में वही काग़ज़ था, जिस पर उन्होंने पाँच साल पहले अँगूठा लगाया था, और उन्होंने ऐसे देखा, जैसे कोई पुराना आदमी अपना ही खोया हुआ नाम पढ़ रहा हो।
और तभी मेरी जेब में घंटी ने आख़िरी बात कही, बहुत धीमी आवाज़ में, सिर्फ़ मेरे लिए —
अब सच खुला है। पर पहिया अभी नहीं जुड़ेगा। क्योंकि यह काग़ज़ दो पापाओं के बीच है, और एक पापा वो है जो इसे लिखवाता है।
मैंने काग़ज़ अपने हाथ में लिया और कुर्सी की तरफ़ देखा। मुड़ा पहिया, जंग लगी तीलियाँ, चरचराती बॉल बियरिंग।
टिंकू ने मेरी कुहनी छुई।
"उस्ताद," उसने फुसफुसाया, "अब हम क्या करेंगे?"
मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में नहीं रखा। मैंने उसे सीधा रखा, सबके सामने, मेज़ पर, और उस पर हाथ रख दिया, जैसे कोई मोहर लगा रहा हो।
"अब हम," मैंने कहा, "पहले यह तय करेंगे कि इस काग़ज़ पर अंगूठा कौन लगवाता है — वो भी जानेंगे। और टिंकू, जब तक मैं यह जानूँ, तू इस कुर्सी को छूना मत। इसकी उम्र तेरी उम्र से दोगुनी है, और इसका गुस्सा तेरे उस्ताद से कहीं ज़्यादा।"
टिंकू ने अपनी उँगली सहलाई और कुर्सी से दो कदम पीछे हट गया।
दूर, दूसरे कमरे से माँ की आवाज़ आई, "काजल! तीन बज गए? टिफ़िन आया कि नहीं?"
और मुझे लगा कि इस पूरे अस्पताल में सबसे साफ़ और सबसे सच्ची आवाज़ वही है। बस उसे सुनने वाले अभी कम हैं।
उस शाम मुझे एक बात समझ आई जो मैंने पहले कभी ऐसे नहीं सोची थी।
रणवीर भारद्वाज मोहल्ले को ज़मीन से नहीं खरीदता।
वो उसे अँगूठों से खरीदता है।
॥
मैंने काग़ज़ उठाया। अस्पताल के गलियारे की पीली रोशनी उस पर ऐसे पड़ रही थी जैसे कोई बूढ़ा आदमी टॉर्च लेकर किसी पुराने खत को पढ़ रहा हो। काग़ज़ ज़्यादा पुराना नहीं था, पर उसकी गंध पुरानी थी — स्याही, मोहर और उस डर की गंध जो काग़ज़ों पर चुपचाप बैठ जाता है और फिर पूरे घरों में फैल जाता है।
मैंने उसे सीधा किया।
ऊपर नीली गोल मोहर थी। उसके नीचे साफ़ साफ़ लिखा था — मरीज़ और उसके परिवार को इलाज, दवा और जाँच की कोई भी कीमत नहीं देनी होगी। बीच में एक खाली जगह थी, स्याही की गोली जैसी गोल, जहाँ अंगूठा लगना बाकी था। और सबसे नीचे, छोटे अक्षरों में, एक पंक्ति — तीस दिन के अंदर।
मैंने ज़ोर से पढ़ा, ताकि सिर्फ़ मैं सुनूँ नहीं, पूरा गलियारा सुने। मेरी आवाज़ ने मेरी जेब में पड़ी छोटी फूल वाली घंटी को भी सुना होगा, क्योंकि वो मेरी छाती के पास ऐसे बैठी थी जैसे कोई बच्चा कक्षा में आख़िरी बेंच पर डरकर बैठा हो।
"तीस दिन," मैंने कहा। "मरीज़ को मुफ़्त इलाज। मुफ़्त दवा। मुफ़्त जाँच।" मैंने उँगली उस खाली गोल जगह पर रखी जहाँ मोहर नहीं, अँगूठा लगना था। "बदले में सिर्फ़ एक अंगूठा। किस चीज़ पर, ये नीचे लिखा है, क्योंकि पीछे की तरफ़ का हिस्सा किसी ने फाड़ दिया है। पर मुझे लगता है, इस काग़ज़ की नस-नस ये चिल्ला रही है कि अंगूठा अस्पताल की ज़मीन पर है।"
डॉक्टर इसरानी ने सिर और नीचा कर लिया।
मैंने काग़ज़ शाहिद की तरफ़ बढ़ाया।
"ये तेरी जेब से गिरा था," मैंने कहा। "अपना हो तो ले ले।"
शाहिद ने हाथ बढ़ाया, फिर रोक लिया। उसकी उँगलियाँ हवा में ऐसे अटक गईं जैसे कोई चीज़ पकड़ने जा रहे हों और हाथ कहे कि नहीं, इससे तो छूना भी नहीं।
"ये मेरा नहीं है," उसने कहा। "ये मुझे दिया गया था।"
"किसने दिया?"
शाहिद ने अपने पापा की तरफ़ देखा। यूसुफ़ मियाँ टूटे पहिये वाली लोहे की कुर्सी में बैठे थे। उनकी कमर टेढ़ी थी, हाथ कुर्सी की बाँह पर कपड़े से बँधे हुए से। उन्होंने हल्का सा सिर हिलाया — ऐसे जैसे बेटे को इजाज़त दे रहे हों।
"बबलू भाई ने दिया था," शाहिद ने कहा। "ग्यारह दिन पहले। साइट पर। वो मेरे पास आए, मेरा कंधा पकड़ा, और मुझे खींचकर ट्रक के पीछे ले गए जहाँ कोई नहीं देख रहा था। उन्होंने मेरी हथेली में ये काग़ज़ रखा।"
मैंने सुना। मैंने बीच में कुछ नहीं पूछा।
"उन्होंने कहा — सुन बेटा, ये काग़ज़ तेरे घर वालों को देना। तेरी माँ की इलाज की कोई कीमत नहीं लगेगी, सब मुफ़्त। तेरे पापा की दवा, उनकी जाँच, सब मुफ़्त। और तुझे साइट पर पक्की नौकरी, अगर…" शाहिद की आवाज़ अटकी। "अगर तेरे पापा का अंगूठा इस पर लग जाए।"
"और तूने क्या किया?"
"मैंने काग़ज़ जेब में रखा," शाहिद ने कहा। "मैंने पापा को कुछ नहीं बताया। मैंने सोचा कि… मैं खुद लगवा दूँगा। मैंने…" उसकी आवाज़ टूटी। "मैंने सोचा कि पापा के सो जाने के बाद, रात में, उनका हाथ पकड़कर लगवा दूँगा और वो कभी जानेंगे भी नहीं।"
यूसुफ़ मियाँ ने अपना मुँह खोला। उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई पुराना ट्रक धीरे धीरे चालू हो रहा हो।
"मैं जानता था," उन्होंने कहा। "मैं जानता था कि काग़ज़ कहाँ से आया।"
शाहिद ने आँखें बड़ी करके पापा की तरफ़ देखा।
"चार दिन पहले," यूसुफ़ मियाँ ने कहा, "सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी खुद मेरे पास आया था। स्टेशन के पास, जहाँ मैं चाय पीने जाता हूँ। वो मेरी बगल में बैठा। एक काग़ज़ निकाला। बोला — यूसुफ़ भाई, आपके बेटे की नौकरी की बात है। बस एक अंगूठा। पर अंगूठा आपका नहीं, मरीज़ की तरफ़ से आपके हाथ का।"
डॉक्टर इसरानी की तरफ़ सबकी नज़रें गईं। वो खिड़की के पास खड़े थे, पीली दीवार पर टिके, और उनका चेहरा ऐसा था जैसे कोई पुराना आदमी अपने ही हाथ देख रहा हो।
"मैंने अंगूठा नहीं लगाया," यूसुफ़ मियाँ ने कहा। "मैंने एक बार भी नहीं लगाया। पर…" वो रुके। "पर मैंने बेटे को भी नहीं रोका। मैंने काग़ज़ उसके पढ़ने के लिए दे दिया। मैंने सोचा — बेटा पढ़ेगा, समझेगा कि घर में क्या हाल है।" उनकी आवाज़ भारी हो गई। "और अगर वो खुद मना कर देगा तो… तो मेरे सर से इल्ज़ाम उतर जाएगा।"
कुछ देर सब चुप रहे। दूसरे कमरे से माँ की खाँसी आई — वो खाँसी जो किसी की जान पर बोझ होती है, जो किसी की नींद खराब करती है, पर जिसे सुनने के लिए किसी को जगाना पड़ता है।
मुझे लगा कि मुझे अब बोलना चाहिए। मैंने अपना मुँह खोला, और बोला वो जो मैंने सैकड़ों बार सोचा था, जो सच लगता था, जो मुझे मदद करता था हर बार जब कोई काग़ज़, कोई मोहर, कोई शर्त मेरे सामने आती थी।
"ऐसे काग़ज़ तो मैं रोज़ देखता हूँ," मैंने कहा। "मेरे पास से रोज़ गुज़रते हैं। किसी दुकान के लिए, किसी ठेले के लिए, किसी ज़मीन के लिए। तो तुम लोग…"
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