The Mysterious Bell589 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 589

7 min read November 5, 2026

"बेड पर लाओ," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, और उसमें वो संगीत था जो बहुत बूढ़े लोगों की आवाज़ में आ जाता है, जैसे वो हर शब्द को ज़ुबान पर तोलकर निकालते हैं।

मैंने माँ को बेड पर लिटाया। काजल ने तकिया ठीक किया। डॉक्टर माँ के पास गए, स्टेथोस्कोप के ईयरपीस लगाए और माँ की पीठ पर धीरे से हाथ रखकर कहा, "गहरी साँस लो, बहन।"

माँ ने साँस लेने की कोशिश की और खाँस पड़ीं। खाँसी अंदर से आ रही थी — गहरी, गली में पड़ी मिट्टी जैसी।

डॉक्टर ने आँखें बंद करके सुना। फिर उन्होंने दूसरी तरफ़ सुना। उनका चेहरा नहीं बदला, पर उनकी उँगलियाँ धीमी हो गईं। यही सबसे बुरा संकेत होता है — जब डॉक्टर का चेहरा नहीं बदलता और उसके हाथ धीमे हो जाते हैं।

उन्होंने स्टेथोस्कोप उतारा और गले में लटका दिया। फिर उन्होंने किनारे पर रखी कुर्सी खींची और उस पर बैठ गए। सीधे मेरी तरफ़ देखा।

"अंकुश," उन्होंने कहा।

"सर।"

"क्या तुम ईमानदारी से जवाब दोगे?"

मेरी जेब में घंटी थी। वो ठंडी थी। मुझे लगा जैसे वो जानती है कि डॉक्टर क्या पूछेंगे।

"पूछिए, सर।"

"माँ को खाँसी कब से है?"

"करीब आठ महीने से।"

"बुखार?"

"तीन-चार दिन से।"

"रात में पसीना?"

"बहुत आता है," काजल ने कहा, और उसकी आवाज़ अचानक बच्चों जैसी हो गई। "डॉक्टर साहब, कमीज़ भीग जाती है और सुबह वो धोकर गोली पर सुखा देती हैं। मैंने कई बार देखा है और मैंने कुछ नहीं किया। मैं नर्सिंग पढ़ रही हूँ और मैंने अपनी माँ को नहीं देखा।"

कमरा चुप हो गया।

डॉक्टर इसरानी ने उसकी तरफ़ ऐसे देखा जैसे वो उसे पहचानते हों — न सिर्फ़ चेहरे से, बल्कि उस डर से जो उसके चेहरे पर था।

"काजल," उन्होंने कहा। "तुमने एक चीज़ की है जो बहुत कम लोग करते हैं। तुमने सच बोला। बैठो। मेरे पास एक कुर्सी और है।"

काजल नहीं बैठी। वो खड़ी रही।

डॉक्टर ने मेरी तरफ़ देखा। "अंकुश, तुम्हारी माँ की साँस नली में सूजन बढ़ गई है। खाँसी और बुखार दोनों ऊपर चढ़े हैं। ये वही बात है जिसके बारे में मैंने तीन महीने पहले कहा था — इलाज नहीं रुकना चाहिए।"

"तो रुका क्यों?" काजल ने पूछा, और उसकी आवाज़ तेज़ हो गई।

"काजल," पापा ने कहा, पहली बार।

"नहीं पापा," वो बोली। "मैंने पूछा है। हमने दवा रोक दी थी क्योंकि पैसे थे नहीं, या क्योंकि हमें डर था कि अस्पताल कब बंद हो जाएगा? दोनों है ना? और मैं हर रोज़ डॉक्टर साहब के सामने से गुज़रती हूँ, कॉपी लेकर, किताब लेकर, और मैंने कभी ठीक से नहीं पूछा। मैंने कभी नहीं पूछा कि अस्पताल कब तक चलेगा।"

उसकी आवाज़ भर आई थी। उसने मुँह फेर लिया।

डॉक्टर इसरानी ने कुछ देर सोचा। फिर उन्होंने अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाला — मोड़ा हुआ, जिस पर उन्होंने पहले ही कुछ लिख रखा था।

"काजल," उन्होंने कहा। "मेरा स्टेथोस्कोप उठाओ।"

काजल ने पलक झपकाई। "सर?"

"उठाओ। डरो मत, वो टूटा नहीं है। टेप लगा है बस। आज से तुम मेरे साथ सुबह की गोली में आया करोगी। मैं तुम्हें अपने मरीज़ों की साँस सुनने दूँगा। नर्सिंग की किताबों में जो नहीं लिखा होता, वो यहाँ लिखा जाता है। और अंकुश —" वो मेरी तरफ़ मुड़े, "— तुम माँ को दो दिन के लिए हमारे पास छोड़ने की हिम्मत कर सकते हो?"

"सर, मैं —"

"मैंने पूछा, कर सकते हो?"

मैंने माँ की तरफ़ देखा। वो आँखें खोलकर मेरी तरफ़ देख रही थीं। उनके होंठ हिले।

"अंकुश," उन्होंने कहा। आवाज़ बहुत पतली थी, जैसे काग़ज़ के पीछे से आ रही हो। "मुझे अस्पताल का खाना नहीं चलेगा। घर का टिफ़िन चलेगा।"

मैं हँस पड़ा। मुझे नहीं पता ये हँसी कहाँ से आई। आँखें गीली थीं और हँसी आ रही थी।

"माँ," मैंने कहा, "पहले साँस ठीक, फिर दाल का हिसाब।"

"मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता," उन्होंने कहा, और आँखें बंद कर लीं, "और बात में भी नहीं। घर का टिफ़िन। बस।"

डॉक्टर इसरानी हँसे। बहुत हल्का, बहुत छोटा। जैसे किसी पुरानी तस्वीर में कोई हिल गया हो।

"ठीक है बहन," उन्होंने कहा। "टिफ़िन घर से आएगा। पर खाना तीन बजे और रात आठ बजे। वक़्त पर। मेरे यहाँ वक़्त की मिर्ची तेज़ है।"

फिर वो मेरी तरफ़ मुड़े और उनकी आवाज़ बदल गई।

"अंकुश, दो दिन भर्ती रहना पड़ेगा। दवा बदलनी है। साँस की जाँच एक और करानी है। और —" उन्होंने काग़ज़ को मेज़ पर रख दिया, "— मुझे तुमसे एक बात कहनी है, इस कमरे में नहीं। बाद में। जब माँ सो जाए।"

काजल ने स्टेथोस्कोप उठा लिया था। वो उसे हाथ में लेकर उलट-पुलट रही थी, जैसे कोई नई चीज़ मिली हो। उसने गले में लटका लिया। वो सफ़ेद कोट डॉक्टर के बगल वाले हुक पर टँगा था, पुराना, घिसा, कहीं-कहीं से सिला हुआ।

डॉक्टर ने उसकी तरफ़ इशारा किया।

"पहन लो," उन्होंने कहा। "ये मेरी बीवी का था। मेरे साइज़ का नहीं हुआ करता था। तुम्हारे काम आएगा।"

काजल ने कोट पहना। और मैंने पहली बार देखा कि वो कितनी छोटी है और उतनी ही बड़ी भी। कोट उसके घुटनों तक आ गया। उसने एक बार अपने दोनों हाथ जेब में डाले, फिर निकाले, फिर सीधी खड़ी हो गई।

"पापा," उसने कहा, "आप बाहर बैठिए। मैं परची लिखवाती हूँ।"

फिर मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखें तेज़ हो गईं।

"और तू," वो बोली। "देर क्यों की? मैंने रज्जो बाई के आने से पहले ही कहा था कि माँ की हालत खराब है। मैंने दो घंटे पहले कहा था। तू गुमटी पर बैठा किस्से सुना रहा था।"

"काजल —"

"मुझे नहीं सुनना। तू पूरी गली को जोड़ता फिरता है, और अपने घर में तेरी माँ बेड पर पड़ी रहती है। तू उस्ताद का शागिर्द है, अंकुश। उस्ताद से पूछ, राज़ कब मिले थे और देर कब हुई थी।"

वो कमरे से निकल गई। उसके कदम तेज़ थे और कोट उसके पीछे लहरा रहा था।

मैं खड़ा रह गया। बेड के पास। माँ की आँखें बंद थीं और उनकी साँस धीमी हो रही थी।

डॉक्टर इसरानी ने मेरी तरफ़ देखा। "ग़ुस्सा है," उन्होंने कहा। "अच्छा है। ग़ुस्सा होना चाहिए। जो ग़ुस्सा नहीं करता, वो सच भी नहीं बोलता।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

तभी मेरी नज़र दीवार पर गई।

बेड के ठीक ऊपर, पीली दीवार पर, एक बड़ा पोस्टर लगा था। प्लास्टिक की परत चढ़ी हुई, चमकदार। उस पर एक आदमी हाथ जोड़े खड़ा था, सफ़ेद कुर्ता, साफ़ कटा बाल, मुस्कान। नीचे मोटे अक्षरों में लिखा था — रणवीर भारद्वाज, समाजसेवी। और उसके नीचे एक और लाइन थी — नई शुरुआत, नए सपने।

"ये कब लगा?" मैंने पूछा।

डॉक्टर इसरानी ने देखा। "दो हफ़्ते पहले। भारद्वाज कंस्ट्रक्शन के आदमी आए थे। उन्होंने कहा, अस्पताल की मदद के लिए पोस्टर। मैंने मना नहीं किया।"

"आपने मना क्यों नहीं किया?"

वो कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, "क्योंकि उसी दिन उन्होंने मुझे एक काग़ज़ दिखाया था जिसमें मेरे अस्पताल के लिए अलग जगह का ज़िक्र था। बड़ी इमारत। नई खिड़कियाँ। पहली मंज़िल पर मेरे लिए कमरा।"

"और आप मान गए?"

"मैंने कोई काग़ज़ नहीं ढीला छोड़ा," उन्होंने धीरे कहा। "पर मैंने मना भी नहीं किया। और यही मेरी ग़लती थी। मैं साठ पार कर चुका हूँ, अंकुश। मैं मरने से नहीं डरता। मैं इस डर से डरता हूँ कि जब मैं यहाँ नहीं रहूँगा, तो इस दरवाज़े पर ताला लगा होगा और इस मोहल्ले का कोई आदमी अपनी बीवी को लेकर कहीं और जाएगा। कहीं दूर। जहाँ वो उसका नाम भी नहीं जानते होंगे।"

मेरी जेब में घंटी हिली।

बहुत हल्की। बस एक बार। जैसे कोई उँगली उठाकर इशारा कर रहा हो।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho