The Mysterious Bell – Chapter 586
दरवाज़ा खुला और वो अंदर आई।
पहले उसके पैर दिखे — घिसी हुई चप्पल, किनारे से फटी, और एड़ी पर धूल की पतली लकीर। फिर सफ़ेद दुपट्टा, जो कंधों पर ठीक से बैठा भी नहीं था, जैसे रास्ते में हवा ने उसे बार-बार खींचा हो। हाथ में छोटा सा बैग, जिसका ज़िप आधा खुला था और उसमें से एक किनारा किसी काग़ज़ का बाहर झाँक रहा था।
उसने दुकान में आकर एक बार चारों तरफ़ देखा। दीवार पर टँगे पुराने औज़ार, कोने में पड़ा पंचर वाला टब, मेज़ पर रखी छोटी फूल वाली घंटी, और मेरे हाथ में ग्रीस के निशान।
फिर वो बोली, "तुम शंकर के बेटे हो।"
यह सवाल नहीं था। यह पहचान थी।
"जी," मैंने कहा। "हूँ तो। कभी-कभी खुद भी सोचता हूँ कि हूँ या नहीं।"
वो नहीं हँसी।
मैंने स्टूल आगे खींच दिया। "बैठिए। चाय आपा की गुमटी से मँगवा लूँ? वो अभी पहला दीया जला रही हैं, पहली चाय का स्वाद ही अलग होता है।"
"नहीं।" उसने स्टूल पर बैठते हुए कहा। "बैठूँगी, पर चाय नहीं। मुझे ज़्यादा देर नहीं रुकना।"
"कहिए।"
उसने बैग को गोद में रखा और दोनों हाथ उस पर रख दिए, जैसे कोई चीज़ उड़ न जाए। फिर उसने सीधे मेरी आँखों में देखा।
"मेरा नाम रज्जो बाई है। मैं चंद्रेश सक्सेना के दफ़्तर में झाड़ू लगाती हूँ। सुबह छह बजे से रात नौ बजे तक। पंद्रह साल से।"
मेरी जेब में घंटी हल्की गरम हुई। मैंने उसे नहीं निकाला। पर मैंने महसूस किया।
"उनका दफ़्तर नए बाज़ार में है," रज्जो बाई ने कहा। "दूसरी मंज़िल। सीढ़ी चढ़ते ही बाईं तरफ़। कमरे में हमेशा काग़ज़ों का ढेर रहता है, इतना ढेर कि कभी-कभी मुझे झाड़ू लगाने की जगह नहीं मिलती। मैं काग़ज़ उठाकर एक तरफ़ रख देती हूँ, और वो कहते हैं — रज्जो, तू मेरे काग़ज़ की दुश्मन है।"
"और आप कहती होंगी — साहब, धूल के काग़ज़ से ज़्यादा बड़ी दुश्मन है।"
इस बार भी वो नहीं हँसी। उसने सिर्फ़ अपने बैग की ज़िप को बंद किया, फिर खोला, फिर बंद किया।
"एक रात की बात है," वो बोली, और उसकी आवाज़ पतली हो गई। "मुझे देर हो गई थी। बारिश आ रही थी। मैंने सोचा, ऊपर के कमरे में आख़िरी बार झाड़ू लगा दूँ, फिर घर। मैं सीढ़ी पर चढ़ी तो देखा कि दफ़्तर का दरवाज़ा पूरा खुला है और अंदर बत्ती जल रही है।"
उसने रुककर साँस ली।
"दो आदमी बैठे थे। एक साहब — चंद्रेश। सफ़ेद कुर्ता, सामने काली फ़ाइल। और दूसरे तुम्हारे पापा।"
मैंने कोई मज़ाक नहीं किया। इस बार मेरे अंदर का वो हिस्सा भी चुप हो गया जो हर बात में हँसी ढूँढता है।
"मैं दरवाज़े के बाहर ही रुक गई," रज्जो बाई ने कहा। "झाड़ू हाथ में थी। मैं अंदर नहीं गई। मैंने सोचा, साहब बात कर रहे हैं, बाद में आ जाऊँगी। पर फिर मैंने तुम्हारे पापा का हाथ देखा।"
वो चुप हो गई।
"कैसा हाथ?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ भी अब पतली थी।
"काँप रहा था।" उसने अपना हाथ उठाकर दिखाया। "ऐसे। जैसे बुखार में हो। वो काग़ज़ पर हाथ नहीं रख पा रहे थे। काग़ज़ सामने था, और उनका हाथ उस पर जाता था, फिर लौट आता था, फिर जाता था।"
मेरा गला सूख गया। "और चंद्रेश?"
"वो मुस्कुरा रहे थे।" रज्जो बाई ने कहा, और उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जैसे वो अब भी उस मुस्कान को देख रही हो। "बहुत प्यार से बोले — बेटा, अंगूठा लगाओ। इलाज का इंतज़ार मत करो। औरत का इलाज रुकता नहीं, औरत का इलाज पैसे माँगता है। जब तक तुम सोचोगे, दवा महँगी हो जाएगी।"
मेरे हाथ मेज़ पर रखे थे। मैंने उन्हें नीचे कर लिया, क्योंकि वो काँप रहे थे।
"फिर?" मैंने कहा।
"फिर तुम्हारे पापा ने कुछ कहा।" रज्जो बाई ने आँखें नीची कर लीं। "बहुत धीमे। मैं सब नहीं सुना, पर एक बात सुन ली। उन्होंने कहा — मेरा बेटा…"
वो रुकी।
"मेरा बेटा क्या कहेगा," रज्जो बाई ने कहा। "बस इतना। और चंद्रेश हँसे और बोले — बेटे को क्या बताना? बेटे बड़े होकर अपने बाप का सच नहीं ढूँढते। उन्हें बस यह दिखता है कि बाप ने क्या दिया। तुम उसे दुकान दे देना। बाकी वो भूल जाएगा।"
उस कमरे में हवा थी। दुकान के बाहर शाम थी, शबनम आपा की गुमटी से चाय की भाप उठ रही थी, बच्चे पीपल के नीचे कुछ खेल रहे थे। पर मुझे उस वक़्त लगा कि सब कुछ बहुत दूर है। जैसे मैं दुकान में नहीं, उस दूसरी मंज़िल के दरवाज़े के बाहर खड़ा हूँ, और अंदर मेरे पापा का हाथ काँप रहा है।
"अंगूठा किसने लगाया?" मैंने पूछा।
रज्जो बाई ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो डर था जो इंसान के चेहरे पर तब आता है जब वो कोई बात पहली बार ज़ोर से बोल रहा हो।
"तुम्हारे पापा नहीं लगा पाए," उसने कहा। "उनका हाथ इतना काँप रहा था कि स्याही की डिब्बी उनके हाथ से छूट गई और फ़र्श पर लाल दाग़ बन गया। मैंने वो दाग़ सुबह रगड़-रगड़कर साफ़ किया था।"
वो रुकी।
"फिर चंद्रेश ने खुद उनकी कलाई पकड़ी," रज्जो बाई ने कहा। "और उनका अंगूठा दबाकर काग़ज़ पर लगा दिया। दो बार। पहली बार ठीक से नहीं लगा, तो दोबारा। और मुस्कुराते रहे।"
दुकान में बहुत देर तक कोई आवाज़ नहीं हुई।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी गरम थी। मैंने उसे बाहर निकाला, हथेली पर रखा। और घंटी ने कहा, बहुत धीमे, बहुत छोटा —
"गवाह डरी हुई है।"
मैंने रज्जो बाई की तरफ़ देखा। उसके होंठ हिल रहे थे, जैसे वो कुछ और कहना चाहती हो और शब्द जुड़ नहीं रहे हों।
"और?" मैंने घंटी से पूछा।
"सच अधूरा है," घंटी ने कहा। "आधा बोला, आधा पी लिया।"
मैंने घंटी जेब में रख दी और कुर्सी खींचकर उसके सामने बैठ गया, इतना करीब कि मेरे घुटने उसके घुटनों तक पहुँचें।
"रज्जो बाई," मैंने कहा। "एक बात बताइए। जो अब तक छुपाया है, वो क्या है? क्योंकि मैं आपसे झूठ नहीं बोलूँगा — मुझे इस सच की ज़रूरत है। और आपको भी लग रहा है, तभी इस वक़्त तक आप यहाँ तक आई हैं।"
वो एकदम रो पड़ी।
बिना आवाज़ के, बिना कंधे हिलाए। बस आँखों से पानी गिरता रहा और वो उसे पोंछने की कोशिश भी नहीं कर रही थी।
"उस कमरे में एक तीसरा आदमी भी था," उसने कहा।
मेरी रीढ़ ठंडी हो गई।
"कोने में बैठा था। अंधेरे में। मैंने उसका चेहरा नहीं देखा। सिर्फ़ उसके जूते देखे — चमकते हुए, बहुत साफ़। और उसके हाथ में एक काग़ज़ था, जिस पर नीचे कोई लाल निशान था।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। लाल निशान। बच्चे भी कह चुके थे — सफ़ेद गाड़ी में बैठे आदमी के हाथ में लाल निशान वाला काग़ज़।
"उसने क्या कहा?" मैंने पूछा।
"बस एक बात।" रज्जो बाई ने आँखें पोंछीं। "उसने कहा — घंटी का क्या? और चंद्रेश ने जवाब दिया — घंटी बाद में। पहले अंगूठा।"
मेरे अंदर कुछ ऐसा हिला जो मैंने पहले महसूस नहीं किया था। दुकान से पीछे वाले कमरे में, लोहे की अलमारी के ऊपर, एक पुरानी चीज़ रखी थी — उस्ताद की छोटी फूल वाली घंटी। और मेरे गले में पापा की दी हुई पुरानी चाबी थी। इतने सालों तक मुझे यही पता नहीं था कि घंटी क्या है, और उस रात पंद्रह साल पहले ये लोग घंटी के बारे में बात कर रहे थे।
"रज्जो बाई," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में मज़ाक का एक किनारा अपने आप आ गया, क्योंकि मैं डर में हँसी ढूँढ लेता हूँ, यही मेरी बीमारी है, "आप झाड़ू वाली हैं न? तो फिर इस शहर के काग़ज़ भी ज़रा साफ़ कर दीजिए। बहुत धूल जमी है इन पर।"
मुझे लगा वो हँसेगी। मुझे लगा वो कहेगी — चल हट, बड़ी मज़ाक आ रही है।
पर वो नहीं हँसी।
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