The Mysterious Bell – Chapter 572
मैंने चुपचाप हाथ जेब में डाला और पीछे वाले कमरे की तरफ़ बढ़ा। दरवाज़ा बंद किया, बल्ब जलाया। गुनगुनाता पुराना बल्ब, जैसे हर रात अपनी ही धुन में हो।
मैंने घंटी निकाली। हथेली पर रखी।
मैंने धीरे से कहा, "बारह साल। क्या है यह?"
घंटी ने कहा, "क़ब्र पर बैठे हैं दोनों।"
मेरा हाथ रुक गया।
"क़ब्र? गली में क़ब्र?"
"पीपल के नीचे। जड़ के पास। पत्थर उठा।"
और फिर चुप।
मैंने कहा, "और कुछ?"
"जब पत्थर उठे, तब पूछना। तब मैं बोलूँगी, अभी नहीं।"
मैंने घंटी जेब में रखी और बाहर आया। सुबह काजल माँ को जाँच के लिए अस्पताल ले गई थी। घर में पापा अकेले थे, और वो भी पुराने पंखे के सामने बैठे थे जिसका तार टूटा हुआ था और जिसे वो तीन दिन से ठीक करने के बहाने छू भी नहीं रहे थे। घर आज सच में चुप था। और मैं जानता था कि यह चुप्पी बीमारी की नहीं है, यह उस चीज़ की है जो हम सब मिलकर ढो रहे हैं।
मैं गली में निकला।
मैंने बच्चों से कहा, "तुम चारों पीपल के नीचे जाओ। जड़ के पास एक पत्थर है, जो बाकी ज़मीन से थोड़ा ऊपर है और जिस पर काई जमी है। उसे उठाओ। पर ज़ोर से नहीं। जैसे कोई बुज़ुर्ग का हाथ उठा रहे हो।"
चिंटू ने कहा, "अंदर क्या है?"
"मुझे भी नहीं पता। इसीलिए तुम भेज रहा हूँ।"
वे चारों भागे। मैं धीरे-धीरे उनके पीछे गया।
पीपल की छाँव सुबह भी ठंडी होती है। पक्षी ऊपर शोर कर रहे थे और नीचे चबूतरी पर सिर्फ़ दो आदमियों की साँसें थीं।
मक़बूल चाचा इस कोने पर। सत्तर के आसपास, सफ़ेद दाढ़ी, सिर पर हल्की टोपी, हाथ में पीली तस्बीह जो उनकी उँगलियों में घूम रही थी, पर होंठ नहीं हिल रहे थे। कमर थोड़ी झुकी हुई, जैसे सालों से किसी चीज़ के नीचे दबी हो।
रामस्वरूप काका उस कोने पर। दुबले, गमछा कंधे पर, घुटने पर हाथ रखे हुए, और उनका घुटना सूजा हुआ था जो वो छुपाने की कोशिश कर रहे थे। लाठी उनके बगल में खड़ी थी, बिल्कुल सीधी, इस तरह जैसे कोई सिपाही खड़ा हो।
दोनों के बीच चबूतरी खाली थी। न सिर्फ़ जगह खाली थी, बात भी खाली थी। और जिस चबूतरी पर हर शाम पूरी गली बैठती है, वहाँ सिर्फ़ दो लोगों की चुप्पी बैठी थी और वो चुप्पी बारह साल की थी।
मैंने कहा, "चाचा, सलाम।"
मक़बूल चाचा ने सिर हिलाया। "बेटा, तू आज वक़्त से पहले आ गया।"
"आज मेरा वक़्त किसी और का है।"
काका ने मेरी तरफ़ देखा। "किसका?"
"आप दोनों का। पर आप दोनों में से कोई बोलता नहीं। इसलिए मैं सोच रहा हूँ, आज मैं उस चीज़ से पूछूँ जो बोलती है।"
तभी चिंटू की आवाज़ आई। छोटे हाथ पत्थर उठा रहे थे और रफ़ीक़ कंधा लगा रहा था।
पत्थर हटा।
नीचे मिट्टी थी, और मिट्टी में एक चीज़ गड़ी हुई थी। मिट्टी का टूटा कटोरा। आधा पत्थर के नीचे दबा, आधा बाहर। और कटोरे के बगल में एक पतली सी लकीर थी, जिसे किसी ने पत्थर के कोने पर खरोंचकर बनाया था। पाँच अक्षर।
भूरा।
मैंने कटोरा उठाया। भीतर सूखी रोटी के टुकड़े थे, जो कई साल पुराने थे और मिट्टी बन चुके थे।
मक़बूल चाचा उठ खड़े हुए। एक झटके में, जैसे कमर का दर्द कहीं भूल गए।
उनकी आवाज़ काँपी। "यह मत छेड़ो।"
रामस्वरूप काका भी खड़े हो गए। उनके हाथ लाठी पर कस गए।
उन्होंने कहा, "चाचा, बच्चों ने किया है। इन्हें मालूम नहीं।"
मक़बूल चाचा ने कहा, "मुझे मालूम है इन्हें मालूम नहीं। पर तू तो जानता है।"
और यही वो वाक्य था। बारह साल की चुप्पी में पहली दरार।
मैंने देखा, रामस्वरूप काका का चेहरा बदल गया। वो कुछ कहने को हुए, फिर रुक गए, फिर मुड़कर जाने लगे।
मैंने कहा, "काका, एक मिनट।"
वो रुके, पर पलटे नहीं।
मैंने कहा, "आज मैं आपसे कुछ पूछने नहीं आया। आज मैं आपको कुछ बताने आया हूँ।"
काका चुप रहे।
"मैंने आज सुबह अपने पापा से पूछा कि घर इतना चुप क्यों है। पापा ने कुछ नहीं कहा। पर उनका हाथ काँप रहा था। और मैं सोच रहा था, पूरी गली में हर बुज़ुर्ग के पास एक ऐसा सच है जिसे उसने अकेले ढोया है, और उस सच का वज़न उसने अपनी चुप्पी से नापा है। चाचा, आपका सच किस वज़न का है?"
मक़बूल चाचा फिर बैठ गए। धीरे से। जैसे किसी ने उनके कंधों से कोई बोझ नहीं उतारा, बल्कि और रख दिया हो।
रामस्वरूप काका भी बैठ गए। एक कदम पीछे, पर बैठ गए।
मैं बीच में बैठ गया। आज पहली बार उस चबूतरी के बीच में कोई बैठा और किसी ने नज़रें नहीं तानीं।
मैंने कहा, "चाचा, भूरा कौन था?"
बारह साल की चुप्पी उस लम्हे में इतनी भारी हो गई कि पीपल के पत्ते भी रुक गए।
मक़बूल चाचा ने होंठ हिलाए, फिर बंद कर लिए।
रामस्वरूप काका ने पहली बार उनकी तरफ़ सीधा देखा। उनकी आँखों में कुछ था जो डर नहीं था। शर्म थी।
मैंने कहा, "मैं आप दोनों से यह नहीं कहूँगा कि ग़लती किसकी है। मैं सिर्फ़ इतना कहूँगा कि चबूतरी के इस कोने से उस कोने तक जो फ़ासला है, वो दो हाथ का है। और आप दोनों उस फ़ासले को बारह साल से नाप रहे हैं। वो फ़ासला आज भी दो हाथ का ही है। बढ़ा नहीं। घटा भी नहीं। यानी वो फ़ासला कभी था ही नहीं।"
मक़बूल चाचा की आँखें भर आईं।
उन्होंने कहा, "भूरा…" और फिर रुक गए। नाम पूरा करने में उन्हें डर लग रहा था, जैसे नाम लेने से चीज़ वापस आ जाएगी और फिर से चली जाएगी।
"भूरा हमारा कुत्ता नहीं था।" उन्होंने धीरे से कहा। "गली का था। किसी का नहीं। पर सुबह चार बजे मेरे दरवाज़े पर आ जाता था, क्योंकि चार बजे मैं रोटी खाता हूँ और उसे पता था कि मेरी रोटी का आधा हिस्सा उसका है। मैं उसका इंतज़ार करता था। कभी-कभी जल्दी खा लेता था ताकि यह न लगे कि मैं उसके लिए बैठा हूँ।"
रामस्वरूप काका ने कहा, "और सुबह वो मेरे घर के बाहर दूध पीता था।"
दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।
मक़बूल चाचा ने कहा, "तुझे पता था कि वो मेरे यहाँ भी आता है?"
"पता था।" काका ने कहा। "पूरी गली को पता था। बस हम दोनों को नहीं पता था कि दूसरे को पता है।"
मैं हँसा। हल्का सा। "यही तो।"
काका ने आगे कहा, "वो गली में आने वाले हर टेम्पो के पीछे भागता था। भौंकता हुआ। हम सब हँसते थे। बच्चे उसे 'टेम्पो इंस्पेक्टर' कहते थे।"
सानिया ने धीरे से कहा, "हमें किसी ने नहीं बताया।"
मैंने कहा, "क्योंकि इन दोनों ने उसका नाम ही बंद कर दिया था।"
फिर आया वो लम्हा जिसके लिए मैं बैठा था।
रामस्वरूप काका ने लाठी दोनों हाथों से पकड़ी, जैसे उससे अपना वज़न सँभाल रहे हों, और कहा, "वो दिन… वो दिन सावन का था। दोपहर। मैं नीम के पत्ते झाड़ने के लिए लाठी लेकर निकला था। तभी गली के मुहाने से एक टेम्पो आया। तेज़। पीली पट्टी वाला। भूरा उसके पीछे भागा, जैसे रोज़ भागता था। मैंने लाठी उठाई। मैंने सोचा, इस बार मैं ड्राइवर को चेताने के लिए लाठी टेम्पो की लोहे की बॉडी पर मारूँगा। आवाज़ होगी, वो रुकेगा।"
वो रुके। उनका गला सूख रहा था। मैंने पीछे वाले कमरे से एक स्टील का गिलास पानी लाकर उनके हाथ में रखा। उन्होंने पूरा पी लिया।
फिर कहा, "लाठी टेम्पो पर नहीं पड़ी। भूरा अचानक पलटा। मेरी ही लाठी उस पर पड़ी। पीछे से। वो चीखा और सड़क पर गिरा। और उसी वक़्त टेम्पो का पहिया —"
काका ने हाथ से अपना मुँह ढक लिया। "मैंने आँखें बंद कर लीं। बस एक पल के लिए। जब खोलीं, तो सब ख़त्म था। और मेरे हाथ में लाठी थी, ऊपर उठी हुई, हवा में।"
चबूतरी पर सन्नाटा। एक बच्चा भी नहीं हिला। चिंटू के होंठ काँप रहे थे और वो किसी को नहीं बता रहा था।
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