The Mysterious Bell – Chapter 564
"नबी और श्यामलाल?" उन्होंने कहा। "मैंने उन्हें बीस साल से ऐसे ही देखा है। मुझे लगा हमेशा से ऐसे ही रहे होंगे।"
"नहीं, आपा," सानिया ने कहा। "मेरी दादी कहती थीं। वो दोनों कभी एक साथ ठेला चलाते थे। सुबह से रात तक। एक ही ठेले पर चाय और बिस्किट। और फिर एक दिन ठेला बंद हो गया। दादी कहती थीं — उस दिन के बाद दोनों ने एक-दूसरे को देखना बंद कर दिया।"
"क्यों?" मैंने पूछा।
"दादी को भी नहीं पता था," सानिया ने कहा। "बस इतना कहती थीं कि एक डिब्बा गायब हो गया था।"
"डिब्बा?"
"पैसों का डिब्बा।"
मैं थोड़ा आगे झुका।
तुम सोच रहे होगे कि एक डिब्बे का क्या है — औरत दादी के ज़ुबान से निकली बात, साठ साल पुरानी। पर सुनो, गली में डिब्बे सिर्फ़ पैसे नहीं रखते। डिब्बे झगड़े भी रखते हैं। और जो डिब्बा चोरी हो, वो ताउम्र चोरी नहीं रहता, वो ताउम्र एक सवाल बन जाता है। और सवाल जिसके सिर पर टिक जाए, उसका जीना मुश्किल हो जाता है।
"गुड्डू," मैंने कहा।
गुड्डू सीधा बैठ गया, जैसे स्कूल में उस्ताद ने नाम पुकारा हो।
"तू उनके सबसे नज़दीक बैठता है। कल क्या हुआ था?"
"कल कुछ नहीं," गुड्डू ने कहा। "आज सुबह हुआ। श्यामलाल काका आए और बैठते हुए बोले — ये चबूतरी ठंडी है। और नबी चाचा ने कहा — ठंडी नहीं है, तुम्हारी नज़र में ठंडी है।"
"फिर?"
"फिर दोनों चुप हो गए। दो घंटे। मैंने गिना।"
"रफ़ीक़?"
"बाद में नबी चाचा ने अपनी तस्बीह उठाई और तस्बीह की एक गोली चबूतरी पर गिर गई, वो मेरे पास आई। मैंने उन्हें देने के लिए उठाया, तो श्यामलाल काका ने कहा — रख दे वहीं, वो अपनी चीज़ें खुद उठाते हैं। और नबी चाचा ने सुना और कुछ नहीं बोले।"
"चिंटू?"
चिंटू सबसे छोटा है। उसने उत्साह से कहा, "मैंने एक बात देखी!"
"बता।"
"श्यामलाल काका की छड़ी का नीचे वाला रबर घिसा हुआ है। और जब वो उठे, तो उन्होंने छड़ी नबी चाचा की तरफ़ रखी — नहीं, मतलब, ज़मीन पर। और नबी चाचा ने छड़ी उठाकर अपनी तरफ़ रख दी, जैसे कहीं गिर न जाए। दोनों ने एक-दूसरे को नहीं देखा। पर दोनों को पता था।"
मैंने चारों को देखा।
शबनम आपा ने चाय के चार और गिलास रखे। कोई नहीं बोला।
"तो सुनो," मैंने कहा। "मुझे तुम चारों से एक काम चाहिए। आज शाम तक नबी चाचा के घर के पास जाना है और पता करना है कि उनका कोई बेटा, भतीजा, कोई जो उस वक़्त का हो, क्या कहता है। पूछना ऐसे — जैसे बच्चे पूछते हैं। बड़ों की तरह मत पूछना।"
"मैं पूछता हूँ," सानिया ने कहा।
"और सुबह आठ बजे गुमटी पर मिलना। नौ नहीं। आठ। अपनी कॉपी लाना। जो कोई भी बोले, लिखना। जो कोई भी कुछ छुपाए, वो भी लिखना।"
चारों उठ गए, जैसे कोई सेना हो।
शबनम आपा ने उनके पीछे देखा और फिर मेरी तरफ़ आईं।
"अंकुश," उन्होंने धीरे से कहा। "ये गली का काम है। तू इसमें बच्चों को क्यों ला रहा है?"
"क्योंकि आपा," मैंने कहा, "आज सुबह मुझे पता चला कि मैं अकेले कुछ नहीं कर सकता। और मुझे इसका आदी होना पड़ेगा। जल्दी।"
शबनम आपा मेरी तरफ़ देखती रहीं।
"तू बदल रहा है," उन्होंने कहा। "पर सुन। बदलना अच्छा है, बस उतना ही बदलना जितना संभाल सके।"
मैं गुमटी से उठा और पीपल के नीचे चला।
मंज़ूर चाचा और बसंत काका जा चुके थे। अब चबूतरी पर दो लोग बैठे थे — एक सिरा, एक आदमी, सफ़ेद टोपी, पीली तस्बीह, होंठ हिलते हुए; दूसरा सिरा, दूसरा आदमी, गमछा, छड़ी, आँखें बंद।
और बीच में, दोनों के बीच, चबूतरी का वो हिस्सा खाली था जो सबसे ज़्यादा बोल रहा था।
मैं उनके बीच नहीं बैठा।
मैं पीपल के तने के पास जाकर खड़ा हो गया। हाथ जेब में। घंटी छू रहा था।
"नबी चाचा," मैंने कहा।
नबी चाचा ने तस्बीह पर अंगूठा रोका। फिर मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें धुँधली थीं, पर तेज़।
"बोल बेटे।"
"मुझे आपसे एक बात पूछनी है। और अगर आप बुरा मानें, तो अभी माफ़ी।"
"पूछ।"
"आपने श्यामलाल काका से आख़िरी बार कब बात की थी?"
चबूतरी पर चुप्पी पसर गई।
श्यामलाल काका की आँखें खुलीं। वो मेरी तरफ़ नहीं देखा। पीपल की जड़ की तरफ़ देखता रहा।
"बेटे," नबी चाचा ने कहा, "तू वो सवाल पूछ रहा है जो इस चबूतरी पर पचास साल से बैठा है और किसी ने नहीं पूछा।"
"तो आज पूछ लीजिए।"
"क्या पूछूँ?"
"मैं नहीं जानता। पर आप जानते हैं। और वो भी जानते हैं।" मैंने श्यामलाल काका की तरफ़ देखा। "काका?"
श्यामलाल काका ने छड़ी को हाथ में घुमाया।
"बच्चा है," उन्होंने कहा। "जाने दे।"
"मैं बच्चा नहीं हूँ, काका," मैंने कहा। "मैं चौबीस साल का हूँ। और मैं तीन दिन से उसी चीज़ पर चल रहा हूँ जिसके बारे में चबूतरी पर बैठे आदमी पचास साल से चुप हैं।"
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया।
"अब सुनिए। मैं आपको अभी कुछ बताता हूँ, और ये मेरी गवाही है। आज से तीन दिन पहले, इसी चबूतरी पर, बंसी बाबा और रहमत बाबा ने एक फ्रेम का टुकड़ा मिलाकर एक तस्वीर जोड़ी। वो तस्वीर चालीस साल पहले टूटी थी। उस दिन दोनों ने अपनी चुप्पी को पचास साल पुरानी कर दिया और अब दोनों गले मिल चुके हैं।"
दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।
"कल, हाफ़िज़ निसार अहमद और पंडित ब्रजकिशोर वहीं बैठे, और उन्होंने मूँड़े की ज़ंग लगी कील निकालकर चालीस साल पुरानी बात कह दी। उसके नीचे जो काग़ज़ मिला, वो उनके बापों का हिसाब था।"
मैंने साँस ली।
"और आज सुबह मंज़ूर चाचा और बसंत काका ने एक कटोरा जोड़ा जो कोई भूल गया था।"
नबी चाचा की तस्बीह का अंगूठा रुक गया।
"तू कहना क्या चाहता है?" उन्होंने कहा।
"मैं कहना चाहता हूँ," मैंने कहा, "कि इस गली में चुप रहना आसान है। पर चुप रहने की कीमत अब गिनी जा रही है। और अगर मैं उस कीमत को नहीं गिनूँगा, तो कोई दूसरा गिनेगा। बस, यही कहना है।"
श्यामलाल काका ने छड़ी चबूतरी पर रखी।
"तू ठीक कहता है," उन्होंने कहा। "पर तेरे पास दो शब्द हैं जो इस चबूतरी के नीचे दबे पड़े हैं। और मैं तुझे दो शब्द का जवाब नहीं दूँगा।"
"तो पूरे दो शब्द?" मैंने कहा। "काका, मैं आपके ज़ुबान से पूरी कहानी नहीं चाहता। मैं सिर्फ़ इतना चाहता हूँ कि आप एक बार बोलें। बाकी चीज़ें वक़्त खोलेगा।"
"क्या बोलूँ?"
"वो जो आपने पचास साल से नहीं बोला।"
श्यामलाल काका चुप हुए।
फिर उन्होंने अपनी जेब से एक रूमाल निकाला। भीगा रूमाल। और गला पोंछा।
"पचास साल पहले," उन्होंने कहा, "हम दोनों का एक ठेला था। चाय, बिस्किट, कभी पान। नबी ठेले पर बैठता, मैं दूध लाता। हमारी शामें एक साथ होती थीं, और रातें — रातों को हम एक ही बेंच पर सोते थे।"
नबी चाचा ने आँखें खोल लीं।
"एक दिन मेरे बड़े बेटे को बुखार आया," श्यामलाल काका ने कहा। "तेज़ बुखार। डॉक्टर ने दवा लिखी थी, और दवा के पैसे उस दिन नहीं थे। मैंने ठेले के डिब्बे से आधे पैसे निकाले। मैंने सोचा था, अगले हफ़्ते रख दूँगा।"
मैंने साँस रोक ली।
"उस शाम नबी ने डिब्बा खोला," श्यामलाल काका ने कहा, "और चुप हो गया। उसने मुझसे नहीं पूछा। एक बार भी नहीं पूछा। पर उसने ऐसी नज़र से देखा कि मैं जवाब नहीं दे पाया। मुझे लगा कि जो अच्छा दोस्त होता है, वो पूछता नहीं। फिर मैंने भी चुप रहना चुना। दोनों चुप रहे। और चुप्पी पचास साल बढ़ती गई।"
मैंने नबी चाचा की तरफ़ देखा।
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