The Mysterious Bell – Chapter 555
"नहीं। पर उसके हाथ में जो चीज़ थी, वो मैंने देखी।" चिंटू ने समोसे का आख़िरी हिस्सा निगला और आगे झुका। "फ़ोन के अलावा। उसके हाथ में एक काग़ज़ था, उस्ताद। मोड़ा हुआ। और वो उसे बार-बार खोलकर देख रहा था, जैसे कोई माँ बच्चे की तस्वीर देखती हो।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा उतर गया।
"कौन सा काग़ज़ था वो?"
"अंधेरा था, उस्ताद। मैं इतना ही बता सकता हूँ कि उस काग़ज़ पर ऊपर की तरफ़ कुछ लिखा था, और नीचे एक लाल चीज़ चिपकी थी। लाल। जैसे किसी ने हाथ से लाल स्याही की बूँद लगाई हो।"
मैंने सानिया की तरफ़ देखा। सानिया ने अपनी कॉपी के पन्ने उलटकर कुछ दिखाया।
"और उस्ताद," उसने कहा, "छह ट्रक में से चार तो आठ बजे तक आ गए थे। बाकी दो रात नौ बजे के बाद आए। उन दोनों में एक अलग बात थी — उन्होंने मिट्टी प्लॉट के बीच में नहीं डाली, बल्कि एक तरफ़ ज़मीन पर बड़ा गड्ढा खोदने लगे। मिट्टी से ऊपर भरने की जगह वो नीचे खोद रहे थे।"
"तूने किससे पूछा?"
"मैंने नहीं पूछा," सानिया ने निर्दोष चेहरा बनाया। "मैंने सिर्फ़ देखा। मैं तो पीपल पर बैठी थी, अपनी चप्पल उतारकर, जैसे कोई फ़िल्म में छिपी नायिका होती है।"
चारों बच्चे मेरी तरफ़ देखने लगे। मैंने सोचा।
"सानिया," मैंने कहा, "ये गड्ढा कहाँ खोद रहे थे?"
"प्लॉट के उस कोने में, जहाँ से नूर अस्पताल की पिछली दीवार दिखती है।"
मेरे पीछे शबनम आपा ने समोसे की कढ़ाही को ज़ोर से रखा। लोहे की चिमटी चटकी।
"अरे बाप रे," वो बोलीं। "सारी गली की ज़मीन चाटने आए हैं। अस्पताल की दीवार से सटकर गड्ढा। अब समझ में आया कि सफ़ेद कुर्ते वाले लोग रोज़ सुबह चौक से लेकर अस्पताल तक क्यों पैदल घूमते हैं।"
"आपको दिखते हैं?" मैंने पूछा।
"मुझे सब दिखता है," शबनम आपा ने कहा। "चाय वाली को सब दिखता है। वो जो समोसे खाते हैं, वो सोचते हैं कि हम सिर्फ़ समोसे गिनते हैं।" उन्होंने चिमटी उठाई। "हम लोग भी गिनते हैं।"
मैं मुस्कुराया। "आपा, आपकी इसी खूबी के लिए तो गली आपको नहीं छोड़ती।"
"छोड़ना तो दूर," उन्होंने कहा। "अब बात कर तो सही। इन बच्चों ने मेहनत की है। कुछ करने का?"
मैंने सोचा।
"कुछ करने से पहले," मैंने कहा, "मुझे ये जानना है कि उनका अगला कदम क्या है।"
सानिया ने तुरंत कहा, "अगला कदम ये है कि कोई ट्रक आए तो हम तुरंत खबर लाएँ। हमें सिर्फ़ ये बताना है कि किस वक़्त, कितने ट्रक, और कौन उतरा।" उसने अपनी कॉपी दिखाई। "देखिए, मैंने तीन कॉलम बनाए हैं। एक — वक़्त। दो — ट्रक की शक्ल। तीन — अंदर कौन बैठा था।"
मैंने कॉपी देखी। तीन कॉलम सच में थे। नीचे एक चौथा बना रहा था जिस पर लिखा था — "कोई पहचान दिखी तो।"
"तू कितनी बड़ी हो गई है," मैंने कहा।
"उस्ताद," उसने कहा, "मैं चौदह साल की हूँ, बड़ी नहीं हुई। पर इतना पता है कि जो मिट्टी समोसे के पैसे से ज़्यादा तेज़ी से गिर रही है, वो प्लॉट नहीं, गली भर रही है।"
शबनम आपा ने एक लंबी साँस ली। "बच्चे बड़े हो गए," उन्होंने कहा। "अब इनके सवालों का जवाब सिर्फ़ तू दे सकता है।"
फिर गुड्डू ने कुछ याद किया। "अरे हाँ, उस्ताद। पीपल के नीचे दो बुज़ुर्ग पिछले चालीस साल से बैठे हैं।"
"पिछले चालीस साल?" मैंने कहा। "मुझे तो लगता था वहाँ बंसी बाबा और रहमत बाबा थे।"
"वो अब मिल गए हैं," चिंटू ने कहा। "वो बात पुरानी हो गई। अब वहाँ दो नए बैठे हैं। एक किनारे पर, दूसरा दूसरे किनारे पर। दोनों के बीच में पूरा पीपल।"
"और वो बात नहीं करते?"
"उस्ताद," रफ़ीक़ ने कहा, "ये बात ही नहीं करते। पर रोज़ शाम को दोनों आते हैं। एक पूरब से, एक पश्चिम से। एक अपनी लाठी रखता है, दूसरा अपना रूमाल। फिर बैठते हैं। और चाय!"
"चाय?"
"हाँ," सानिया ने कहा। "और यही सबसे बड़ी बात है। दोनों एक-दूसरे को देखते भी नहीं। पर शबनम आपा की गुमटी से हर शाम दो कटोरी चाय जाती है, एक पूरब वाले के पास, एक पश्चिम वाले के पास। और चाय का पैसा दोनों के कटोरे में से आधा-आधा आता है।"
मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा। वो चिमटी से समोसा उठा रही थीं। रुकीं।
"हाँ," उन्होंने कहा। "चालीस साल से।"
"आपने कभी पूछा नहीं?"
"मैंने पूछा था," उन्होंने कहा। "बहुत पहले। जवाब मिला था कि ये दोनों उस्ताद हैं। संगीत वाले उस्ताद। एक हारमोनियम बजाता है, दूसरा तबला। और मुझे बताया गया कि संगीत वाले लोग बोलते कम हैं, सुनते ज़्यादा हैं।"
"लेकिन ये चालीस साल से?"
शबनम आपा ने चिमटी कड़ाही पर रखी।
"मैं सिर्फ़ चाय वाली हूँ," उन्होंने कहा। "मैं इतना नहीं जानती कि दोनों के बीच क्या हुआ था। पर मैं इतना जानती हूँ कि एक शाम जब ऊपर बादल थे और मैंने उन दोनों को एक-दूसरे की तरफ़ देखते देखा — मैंने अपने हाथ से चाय ज़्यादा गरम बना दी थी। क्योंकि मुझे लगा कि अगर चाय ज़्यादा गरम होगी, तो शायद उन्हें ज़ुबान मिल जाएगी।"
मैं कुछ देर चुप बैठा रहा।
"कौन हैं वो?"
"एक का नाम उस्ताद तुफ़ैल है," सानिया ने कहा। "पूरब वाला। सफ़ेद दाढ़ी, एक आँख कमज़ोर, हाथ में लाठी। दूसरा मास्टर प्यारेलाल — पश्चिम वाला। पतला, मोटा चश्मा, चश्मे के हैंडल पर काले धागे से टेप लिपटा हुआ है।"
"और आपने कभी नहीं सुना कि इनका झगड़ा किस बात का था?"
"सुना था," गुड्डू ने कहा, "पर सुना है, देखा नहीं। मेरी दादी बताती थीं कि एक शादी में दोनों साथ बजाते थे। बहुत पुरानी बात है। उस शादी में कुछ हुआ था। क्या हुआ, ये कोई नहीं बताता।"
मैं उठ खड़ा हुआ।
"कहाँ जा रहे हो?" शबनम आपा ने पूछा।
"पीपल के नीचे," मैंने कहा। "चाय पीने।"
"अभी सुबह के दस बजे हैं। वो दोनों दोपहर के बाद आते हैं।"
"तो मैं उनसे मिलने जाऊँगा," मैंने कहा। "किसी के घर। मुझे पता है ऐसे लोगों को कहाँ ढूँढना चाहिए।"
—
उस्ताद तुफ़ैल का घर पीपल के पूरब वाली गली में था। एक छोटा सा कमरा, बाहर आँगन, और आँगन में सुखी हुई मिर्च की लाल लड़ियाँ टँगी थीं। दरवाज़े पर मैंने दस्तक दी।
"कौन?"
"अंकुश। साइकिल वाला।"
कुछ देर चुप्पी।
"अंदर आ।"
मैंने दरवाज़ा खोला। कमरे में धूल की गंध थी, पुराने तेल की गंध थी, और एक तीसरी गंध थी जो मुझे पहचान नहीं आई। बाद में समझ आया — वो हारमोनियम की गंध थी। पुराने लकड़ी की, पुराने रीड की, जिस पर सालों से कोई हाथ नहीं फिरा।
कमरे के कोने में एक हारमोनियम रखा था। ढका हुआ था, एक सफ़ेद पुराने कपड़े से, जिस पर पीले धब्बे पड़ गए थे।
उस्ताद तुफ़ैल चारपाई पर बैठे थे। सफ़ेद दाढ़ी, जिसे कंघी नहीं की गई थी। एक आँख पर पुराना सा पर्दा, और हाथ में वो लाठी जिसके साथ सानिया ने कहा था वो रोज़ आता है।
"बैठ," उन्होंने कहा।
मैं बैठ गया। ज़मीन पर, उनके पैरों के पास। मुझे लगा कि ऐसे आदमी के सामने कुर्सी पर नहीं बैठना चाहिए।
"तू वही है," उन्होंने कहा, "जो पीपल के नीचे बुज़ुर्गों को मिलाता है?"
"ऐसा ही कहते हैं लोग।"
"मुझे नहीं मिला।"
"आप मिलने नहीं आ रहे," मैंने कहा।
उन्होंने लाठी की नोक ज़मीन पर रखी।
"मैं आता हूँ," उन्होंने कहा। "रोज़।"
"मिलने के लिए?"
"उस पेड़ को देखने।"
"और वो दूसरे?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"तू सीधा बोलता है," उन्होंने कहा। "यही अच्छा है। पर सीधा बोलने वाले को सीधा जवाब नहीं मिलता।"
"तो टेढ़ा पूछूँ?"
वो मुस्कुराए। बहुत हल्का। मुश्किल से होंठ हिले।
"तुझे क्या जानना है?"
"चालीस साल पहले क्या हुआ था?"
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