The Mysterious Bell537 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 537

6 min read November 5, 2026

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें भरी हुई थीं।

"क्योंकि चबूतरी पर वो बैठता है। मैं उसके सामने नहीं बैठ सकता। मगर उसकी चबूतरी से इतनी दूर भी नहीं बैठ सकता कि वो दिखे न।"

"बाबा, ये बात आज चबूतरी पर जाकर कहनी पड़ेगी।"

"नहीं।" उन्होंने सिर हिलाया। "वो नहीं सुनेगा।"

"वो सुनेगा," मैंने कहा। "मैं अभी उसके पास जा रहा हूँ। और मैं उससे कहूँगा कि एक बूढ़ा आदमी चालीस साल से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।"

उनकी आँखें फैल गईं।

"अंकुश, तू —"

"बाबा, आप मेरे साथ चलिए।"

वो उठे। लाठी पकड़ी। काँप रहे थे।

जब हम चबूतरी की तरफ़ बढ़ रहे थे, शबनम आपा की गुमटी के पीछे से चार सिर उभरे। सानिया ने मुझे इशारा किया — "सब तैयार है, भैया।"

मैंने उन चारों को आँख से धन्यवाद कहा।

इब्राहीम चाचा चबूतरी के अपने सिरे पर बैठे थे। सफ़ेद कुर्ता, गले में तस्बीह, हाथ में रुमाल। उन्होंने बृजमोहन बाबा को देखा।

दोनों रुक गए।

दोनों के बीच चार कदम का फ़ासला और चालीस साल का सन्नाटा।

मैं बीच में खड़ा था।

"चाचा," मैंने कहा। "बृजमोहन बाबा आपसे कुछ कहना चाहते हैं।"

इब्राहीम चाचा का चेहरा सख़्त हो गया। उन्होंने रुमाल मोड़ा।

"मुझसे नहीं कहना। जो कहना है, अपने आप से कहो।"

बृजमोहन बाबा पीछे हटने लगे। मैंने उनका हाथ नहीं छोड़ा।

"चाचा, एक बात मैं कहूँ?"

"तू कौन है?"

"मैं शंकर यादव का बेटा हूँ।"

इब्राहीम चाचा ने मेरी तरफ़ देखा।

"वो जो साइकिलों वाली दुकान चलाता था?"

"हाँ।"

"वो तो अब नहीं दिखता।"

"वो घर पर है। पंद्रह साल से चुप है। उसने एक ग़लती की थी — बड़ी ग़लती। कल रात मेरे सामने कबूल की।"

इब्राहीम चाचा कुछ नहीं बोले।

"चाचा, चालीस साल पहले आपने बृजमोहन बाबा पर एक इल्ज़ाम लगाया। क्या वो सच था?"

मेरी आवाज़ धीमी हो गई।

"आप जानते थे, है न? आपको पता था कि अस्सी रुपये उनकी बीवी की दवा में लगे थे।"

इब्राहीम चाचा का चेहरा पत्थर हो गया।

"किसने कहा तुझसे?"

"किसी ने नहीं कहा। मैं बस देख रहा था।" मैंने कहा। "आप हर शाम चबूतरी पर आते हैं। उस पत्थर की तरफ़ नहीं देखते — मगर उस पत्थर की जगह ठीक आपकी आँखों के सामने है। चालीस साल से आपने वो जगह नहीं बदली।"

उनकी आँखें भर आईं।

"मैं उस रात अस्पताल के बाहर गुज़रा था," उन्होंने धीरे से कहा। "वो अपनी बीवी को गोद में लेकर भाग रहा था। मैंने देखा।"

"और?"

"और मुझे समझ आ गया।" उनका गला रुँध गया। "मैं अगली सुबह उसके घर गया। मैंने सोचा — वो खुद कहेगा। मैंने सोचा — अगर वो मुझे भाई मानता है, तो कहेगा। उसने नहीं कहा। मैंने पूछा, पैसे कहाँ गए? वो चुप रहा।"

"चाचा —"

"मैंने सोचा — ये आदमी मुझे भाई नहीं मानता। चालीस साल से यही सोचता हूँ।" उन्होंने रुमाल से आँखें पोंछीं। "मैं हर शाम यहाँ बैठता हूँ, बृजमोहन। बस तुझे देखने के लिए। तेरे पत्थर पर नहीं जाता — क्योंकि तू आएगा तो मुझसे बोलेगा नहीं। मुझे पता है। तू भी ज़िद्दी है।"

बृजमोहन बाबा काँप रहे थे।

"इब्राहीम," उन्होंने कहा। आवाज़ टूट रही थी। "मेरे पास एक लिफ़ाफ़ा भी है।"

मैं चौंका।

"क्या?"

उन्होंने जेब में हाथ डाला। फिर एक पुराना, मैला, मोड़ा हुआ लिफ़ाफ़ा निकाला।

"इसमें इकतालीस रुपये हैं। पूरे इकतालीस। चालीस साल में जोड़े — आधा-आधा रुपया, एक-एक रुपया। अस्सी में से इकतालीस, उसका ब्याज। बाकी नहीं जुड़े।"

इब्राहीम चाचा उनकी तरफ़ देखते रहे।

"तूने ये लिफ़ाफ़ा चालीस साल अपनी जेब में रखा?"

"हाँ। हर रोज़ सोचता था — आज दे दूँ। हर रोज़ आते-आते हिम्मत टूट जाती थी।"

इब्राहीम चाचा उठे। वो बृजमोहन बाबा के सामने आए। वो लिफ़ाफ़ा लिया। उन्होंने उसे अपनी दोनों हथेलियों में रखा। और फिर फेंक दिया — हवा में नहीं, बल्कि एक धक्के से, दूर।

लिफ़ाफ़ा उड़कर पत्थर के पास गिरा।

"मैंने कोई पैसा नहीं माँगा," इब्राहीम चाचा ने कहा। उनकी आवाज़ टूट रही थी। "मैंने तुझसे एक बात माँगी थी — कि तू मुझे बता दे। बस इतना। मैंने पूरे चालीस साल यही माँगा।"

"इब्राहीम —"

"तूने कहा भी नहीं।" उन्होंने अपनी आवाज़ दबाई। "बता तो देता। मैं तेरा भाई हूँ। किसी और की बीवी नहीं, तेरी बीवी। मैं बचा देता। यूसुफ़ का दाख़िला — अगले साल हो जाता। मगर तूने मुझे बताया भी नहीं।"

बृजमोहन बाबा फूट-फूटकर रोने लगे।

"मैं डरा हुआ था," उन्होंने कहा। "मैं डरा हुआ था, इब्राहीम।"

फिर इब्राहीम चाचा ने उनका हाथ पकड़ा। उन्होंने अपना रुमाल निकाला और बृजमोहन बाबा का चेहरा पोंछा।

"चुप कर।"

"मैं —"

"चुप कर।" उन्होंने बृजमोहन बाबा का सिर अपने कंधे पर रख दिया। "चालीस साल बाद बोला है, तो अब यहीं बैठ।"

मैं पीछे हट गया। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू गुमटी के पीछे से बाहर आ गए थे और आँखें मल रहे थे। रफ़ीक़ ने अपना हाथ सानिया के कंधे पर रखा।

मेरी जेब में घंटी ठंडी हुई — और फिर बजी।

एक बार। छोटी सी। दो बार। तीन बार।

और फिर उसकी आवाज़ आई। धीमी। साफ़।

"अठारह अंक।"

मैंने साँस ली।

कुल तीस।

मैं वहीं बैठ गया, पीपल के नीचे, ज़मीन पर। और मैंने आसमान की तरफ़ देखा।

तभी — उस्ताद की दुकान से सिलाई मशीन की आवाज़ आ रही थी। टिक… टिक… टिक…

और वो अचानक बंद हो गई।

मैंने पीछे देखा।

उस्ताद अली बक्श अपनी दुकान के दरवाज़े पर खड़े थे। उनका चश्मा हिल रहा था। वो हमारी तरफ़ नहीं देख रहे थे। वो हवा में कुछ सुन रहे थे।

वो धीरे-धीरे गली के बीच आए। रुक गए।

"ये क्या बजा?" उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी।

मैंने जेब से हाथ हटाया।

"कुछ नहीं, उस्ताद।"

"कुछ नहीं नहीं होता, अंकुश।" वो मेरी तरफ़ आए। उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा। "घंटी बजी। मैंने सुनी। पचास साल बाद इतनी साफ़ सुनी कि कान में दर्द हो गया।"

उनकी आँखें चबूतरी की तरफ़ गईं। वहाँ दो बूढ़े आदमी एक-दूसरे का हाथ पकड़कर बैठे थे।

उस्ताद कुछ देर देखते रहे।

"आज तेरे हाथ में पहला बड़ा जोड़ पूरा हुआ," उन्होंने कहा। "मुझे पता है। घंटी ने बता दिया।"

तभी — मैंने पाया कि गली के मोहाने से मीरा आ रही थी।

आज उसके कंधे पर वही फटा बैग था, हाथ में कैमरा। वो जल्दी-जल्दी चल रही थी जैसे कोई खबर उसके तलवों में बैठी हो।

"अंकुश!"

मैंने सीधा देखा।

"तू ये क्या कर रहा है?"

"मीरा —"

"तू इन बुज़ुर्गों को तमाशा बना रहा है।" उसकी आवाज़ ऊँची थी। "कल दो बुज़ुर्गों को रुलाया। आज दो और को। कल किसी और को रुलाएगा। किसके लिए? किसके फ़ायदे के लिए? तेरे पास इन आँसुओं का कोई सबूत है? मैंने अपनी आँखों से देखा — तूने उन दोनों को गले लगवा दिया, और उसी वक़्त तेरी जेब से कुछ बजा। कुछ बज रहा है तेरी जेब में।"

चारों बच्चे जम गए।

"मीरा, सुन —"

"मैं सुन रही हूँ।" उसने कहा। "मैं तुझ पर इल्ज़ाम लगा रही हूँ — कि तू इन बुज़ुर्गों को इस्तेमाल कर रहा है। पाँच साल पहले मैंने एक आधा सच छापकर मास्टर जी का घर बिखेर दिया था। मैं दोबारा नहीं करूँगी। और तुझे भी नहीं करने दूँगी।"

वो सीधे अपने बैग से निकल आई। मेरे पीछे वो दुकान की तरफ़ चल पड़ी।

"मीरा!" मैंने पीछे से आवाज़ दी। "मीरा, रुक।"

वो नहीं रुकी। हम दुकान के सामने पहुँच गए। टिंकू दरवाज़े पर खड़ा था, और उसकी आँखें फैली हुई थीं।

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