The Mysterious Bell – Chapter 517
"बैठिए," उसने फिर कहा, और इस बार आवाज़ नरम थी, जैसे कोई डॉक्टर कहे। "और ये मत सोचिए कि मैं आपसे नाराज़ हूँ। मैं आपसे नाराज़ नहीं हूँ। मैं आपसे सिर्फ़ ये पूछना चाहती थी कि आपने मुझे क्यों नहीं बताया। मैं आपकी बेटी हूँ, पापा। मैं क्या करती जाकर? चुप रह जाती? रो देती? आपको लगा कि मैं सह नहीं पाऊँगी?"
पापा ने मुँह खोला। बंद कर दिया।
फिर उन्होंने एक हाथ उठाया, जैसे कुछ कहना चाहते हों, और वो हाथ हवा में ही रुक गया, और वापस नीचे गिर गया।
मुझे लगा कि मैं उस पल कुछ कहूँ।
मुझे कुछ कहना चाहिए था।
मगर मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। मेरी जेब में काग़ज़ था, काग़ज़ पर मेरे पापा का अँगूठा था, और मेरे सामने मेरी बहन बैग उठाए खड़ी थी, और मेरे पापा हवा में हाथ उठाकर नीचे गिरा रहे थे, और पूरे घर में सिर्फ़ पंखे की आवाज़ थी।
"तू कहाँ जा रही है?" मैंने पूछा।
"मुझे पता है वो आदमी कहाँ रहता है।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"नहीं।"
"क्यों नहीं?"
"क्योंकि वो आदमी ऐसा नहीं है। वो बात करता नहीं, वो काग़ज़ चलाता है। तू वहाँ जाएगी, वो मुस्कुराएगा, चाय पिलाएगा, और तुझे लगेगा कि तू कुछ जीत गई, और बाहर निकलते वक़्त तेरे हाथ में कुछ ऐसा होगा जिस पर तेरा ही अँगूठा होगा।"
"मेरा अँगूठा?" उसने कहा। "मैं उसके सामने बैठकर कुछ नहीं लगाऊँगी। मैं सिर्फ़ खड़ी होकर पूछूँगी।"
"क्या पूछेगी?"
"यही," उसने कहा। "कि तूने मेरे पापा को क्यों रुलाया?"
कमरे में पूरी चुप्पी उतर आई।
और उस चुप्पी में मुझे एक आवाज़ सुनाई दी — एक बहुत छोटी, बहुत ठंडी आवाज़। मेरी जेब से। घंटी।
उसने कुछ नहीं कहा।
बस एक बार बजी। बहुत धीमे। जैसे किसी ने सिर्फ़ याद दिलाया हो कि मैं यहाँ हूँ।
और मुझे समझ आ गया कि मैं उस आवाज़ को नहीं रोक सकता। मैं दस अंक खर्च करके टूटने से पहले की आवाज़ सुन चुका था, और अब मैं उस आवाज़ के सामने खड़ा था, और मेरे हाथ खाली थे।
"काजल," मैंने कहा। "रुक जा। प्लीज़।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक देखा। उसकी आँखों में कुछ ऐसा तैर रहा था जो मुझे डुबो देगा।
"अंकुश," उसने कहा, "तूने कभी मुझसे ये नहीं पूछा कि मैं क्या सोचती हूँ। तूने हमेशा पूछा कि मैं क्या कर रही हूँ। कहाँ जा रही हूँ। क्या पढ़ रही हूँ। क्या खा रही हूँ।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"तू अच्छा भाई है," उसने कहा। "पर तू भी पापा जैसा है। तू सब ठीक करना चाहता है, बस पूछना नहीं चाहता।"
उसने दरवाज़े की तरफ़ कदम बढ़ाया।
मैंने रास्ता रोका। मैं दरवाज़े के सामने खड़ा हो गया।
"मुझे जाने दे।"
"नहीं।"
"अंकुश।"
"काजल, वो आदमी—"
"वो आदमी कुछ नहीं करेगा," उसने कहा। "क्योंकि आज मैं उसके सामने ऐसी बात नहीं कहूँगी जो वो काग़ज़ पर लिख सके। मैं सिर्फ़ सच कहूँगी। और सच को वो काग़ज़ नहीं बना सकता।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। वो मेरी छोटी बहन थी, जो आठ साल की उम्र में मेरी साइकिल के पीछे बैठकर स्कूल जाती थी और डर के मारे मेरी कमर में अपने दोनों हाथ लपेट लेती थी। वो पैरों की आवाज़ सुनकर डर जाती थी। वो मुझसे चॉकलेट माँगती थी और मिलने पर कहती थी, आधी तेरी, आधी मेरी।
अब वो मेरे सामने खड़ी थी, बैग कंधे पर, और उसकी आँखों में वो डर नहीं था।
"माँ," मैंने कहा, पीछे मुड़कर। "कुछ कहिए।"
माँ चूल्हे के पास खड़ी थीं। उन्होंने कड़छी नीचे रख दी। वो कुछ देर चुप रहीं। फिर उन्होंने कहा, "मैं तीन साल से यही कर रही हूँ, अंकुश। कुछ कह रही हूँ। कौन सुनता है?"
और मुझे लगा कि आज रात इस घर में सबसे ज़्यादा चोट मुझे नहीं, उनको लग रही है।
काजल ने दरवाज़े का कुंडा खोला।
"काजल," मैंने कहा, "मैं तेरे साथ चलूँगा।"
वो रुकी।
"नहीं," उसने कहा।
"मैं तेरे साथ चलूँगा," मैंने दोहराया। "तू अकेली नहीं जाएगी। मुझे पता है तू नहीं रुकेगी। ठीक है, मत रुक। पर अकेली मत जा। ये मेरी शर्त है।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"तू मेरे साथ चलेगा तो मैं कहूँगी नहीं।"
"तो मत कह।"
"फिर क्या फ़ायदा?"
"फ़ायदा ये है," मैंने कहा, "कि वहाँ खड़ा होकर तुझे ये दिखेगा कि तेरा भाई तेरे पीछे है। बाक़ी तू अपने हिसाब से कर।"
कुछ देर वो चुप खड़ी रही।
फिर उसने बैग कंधे से उतारा और उसे सोफे पर रख दिया। मगर उसने बैग खोला नहीं, चेन खुली ही छोड़ दी, जैसे वो कहे रही हो कि ये फ़ैसला अभी टला है, खत्म नहीं हुआ।
"चल," उसने कहा।
मैंने घड़ी देखी। मगर मुझे कुछ और दिख रहा था।
मुझे दिख रहा था पापा बैठे हुए — उन्होंने तार उठाया था और अब वो उसे धीरे-धीरे जोड़ रहे थे, मगर उनके हाथ काँप रहे थे, और वो काँपना मुझे छत पर सुनाई दी चौथी आवाज़ जैसा लगा, वो आदमी जो कुछ कहते-कहते रुक गया था।
"पापा," मैंने कहा।
उन्होंने सिर नहीं उठाया।
"मैं काजल के साथ जा रहा हूँ," मैंने कहा। "और लौटकर आपसे बात करूँगा। वो काग़ज़ मेज़ पर है और आप जानते हैं कौन सा काग़ज़। आप चाहें तो अभी जाकर उसे फाड़ दीजिए, मैं कुछ नहीं कहूँगा। पर जब मैं लौटूँगा तो सवाल वैसे ही रहेगा।"
पापा ने तार हाथ में पकड़े रखा।
"इस घर में सब कुछ टूटा हुआ है," मैंने धीरे से कहा। "बस मुझे अब तक पता नहीं चला था।"
और ये कहकर मैं काजल के साथ बाहर निकल गया।
गली में हवा ठंडी थी। पीपल के पत्ते हिल रहे थे। उस्ताद की दुकान के बाहर ज़ंग लगा ताला झूल रहा था। शबनम आपा की गुमटी की बत्ती बुझ चुकी थी, सिर्फ़ उनकी कुर्सियाँ वहाँ पड़ी थीं, उलटी हुई, जैसे कोई रात भर के लिए पीठ फेरकर सो गया हो।
काजल मेरे बगल में चल रही थी। हम दोनों चुप थे।
पहले मोड़ पर उसने कहा, "तू डर रहा है।"
"हाँ," मैंने कहा।
"मुझे अच्छा लगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि तू हमेशा डर नहीं रहा होता," उसने कहा। "और मुझे लगता था कि डर सिर्फ़ मुझे ही आता है।"
मैं हँस पड़ा। ऐसी हँसी जिसमें हँसी कम थी।
"काजल," मैंने कहा, "एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"अगर वहाँ कुछ ऐसा निकले जो तू सुनना नहीं चाहती, तो?"
वो कुछ कदम चुप चली। फिर बोली, "तो भी सुनूँगी। अंकुश, मैं पाँच महीने से उस दिन को जेब में लेकर घूम रही हूँ। तुझे पता है कैसा लगता है?"
"कैसा?"
"ऐसा लगता है," उसने कहा, "जैसे मैंने कोई चीज़ चुराई हो। और मैंने कुछ नहीं चुराया। मैंने सिर्फ़ देखा। मैंने सिर्फ़ अपने पापा को रोते हुए देखा, और उसके बाद से मैं ऐसे चल रही हूँ जैसे किसी की गलती मेरी हो।"
मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।
वो झिझकी नहीं। उसने अपनी उँगलियाँ मेरी उँगलियों में दबा दीं। बस एक पल के लिए। फिर छुड़ा लीं।
"चल," उसने कहा। "देर हो रही है।"
और हम चल पड़े — उस गली से, जिसका नाम साइकिलों की गली है, जहाँ हर घर में कोई चीज़ टूटी पड़ी है और हर आदमी सोचता है कि सिर्फ़ उसी के घर में टूटा है।
पीछे घर में माँ चूल्हा बंद कर रही थीं और पापा तार जोड़ रहे थे।
और मेरी जेब में घंटी ठंडी पड़ी थी, खाली, बिना अंक, बिना जवाब।
बस एक बात वो मुझे नहीं बता पाई थी, और मुझे लग रहा था कि वही सबसे ज़रूरी थी।
कि आज रात टूटने वाला काजल का भरोसा किस पर था।
मुझ पर।
या पापा पर।
या उस आदमी पर, जिसकी इमारत के बाहर उसकी बड़ी तस्वीर टँगी है, और जो हर तसवीर टँगी है, और जो हर तस्वीर में हाथ जोड़कर खड़ा रहता है।
हम घर पहुँचे तो रात ग्यारह बज चुकी थी।
दरवाज़ा खुला था। माँ चूल्हा बंद कर रही थीं, और पापा फर्श पर बैठे पंखे का तार जोड़ रहे थे। पंखा खुला पड़ा था — बीच से चक्कर निकला हुआ, तार टूटा हुआ।
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