The Mysterious Bell – Chapter 51: jodne wala mistri hissa 006 ep51-60
गाड़ी का पिछला दरवाज़ा खुला रहा और वो उतरा।
पहले उसके जूते दिखे। सफ़ेद, चमकते, इतने साफ़ कि गली की धूल को देखकर लगे कि वो खुद ही पीछे हट जाएगी। फिर सफ़ेद पायजामा दिखा, जिसकी नाली ज़मीन से बिल्कुल नहीं छू रही थी, और फिर सफ़ेद कुर्ता, जिस पर एक भी सिलवट नहीं थी।
वो पूरा उतरा।
लंबा था। मैंने सोचा था कि तस्वीरों में लंबा दिखता होगा। पर नहीं, वो सच में लंबा था, तस्वीरों से भी लंबा। कंधे चौड़े, हाथ आराम से किनारे पर टिके हुए, और सीना थोड़ा सा पीछे — जैसे अंदर से कोई कमान सीधी खींचकर रखी हो।
उसने चारों तरफ़ देखा।
बहुत धीरे देखा। जल्दबाज़ी में नहीं। जैसे कोई दुकानदार तराज़ू पर रखे हुए माल को नाप रहा हो। पीपल पर नज़र गई, चबूतरी पर गई, गुमटी पर गई, दुकानों के शटरों पर गई, और फिर छतों पर।
और फिर उसने हाथ जोड़ लिए।
सच में जोड़ लिए। दोनों हाथ, सीने के सामने, ठीक वैसे ही जैसे भारद्वाज भवन के बाहर लगी तस्वीर में जोड़े थे।
“राम-राम,” उसने कहा।
आवाज़ शांत थी। इतनी शांत कि मुझे लगा जैसे किसी ने पास में टीवी की आवाज़ धीमी कर दी हो।
“बंसी बाबा,” उसने कहा, चबूतरी के ऊपर देखकर। “रहमत बाबा।”
दोनों बुज़ुर्ग एक साथ सीधे हो गए। मैंने देखा — बंसी बाबा का हाथ जो पैंतालीस साल से कंधे पर रखने की जगह नहीं मिला था, वो आज खुद ही रहमत बाबा के कंधे की तरफ़ बढ़ गया और रुक गया।
“हाफ़िज़ साहब,” रणवीर ने कहा। “पंडित जी। इब्राहीम चाचा।”
वो नाम ले रहा था।
एक-एक नाम। बारी-बारी से। चबूतरी के हर बुज़ुर्ग का नाम, हर चेहरे पर ठीक उसकी तरफ़ देखकर। जैसे कोई परीक्षा से पहले रटा हुआ पाठ सुना रहा हो। और यही सबसे डरावनी बात थी — कि उसे सबके नाम पता थे।
मुझे तुमसे सच कहना है, अगर वो चिल्लाता, धमकाता, गली को खाली करने की बात करता, तो मुझे समझ आ जाता। शोर में आदमी का अंदाज़ा लग जाता है। पर यह आदमी चुपचाप नाम ले रहा था, और मेरी जेब में घंटी ठंडी हो रही थी, इतनी ठंडी कि मुझे अपनी जाँघ पर लगा हुआ लोहे का टुकड़ा महसूस हो रहा था।
मैंने कुछ नहीं कहा।
मैंने सिर्फ़ खड़े रहना चुना।
“शंकर भाई,” उसने कहा।
और मेरे अंदर कुछ ऐसा हुआ जो मैं शब्दों में नहीं कह सकता।
मैंने अपने पीछे देखा। पापा वहीं खड़े थे। मेरे बगल में, आधा कदम पीछे, जैसे हमेशा। हाथ के पीछे वो सफ़ेद निशान आज पहली बार मुझे इतनी दूर से भी दिख रहा था, जैसे उस रोशनी में वो खुद चमक रहा हो।
पापा ने जवाब नहीं दिया।
पर पापा ने नज़र नहीं चुराई। यह मायने रखता है। पाँच साल बाद पहली बार पापा ने उस आदमी से आँख मिलाई, और आँख नीची नहीं की।
बस यही होता है। आदमी चुप रहकर भी बहुत कुछ बोल जाता है।
“मैं झगड़ा करने नहीं आया,” रणवीर ने कहा, और उसने गली की तरफ़ हाथ फैलाया, बिल्कुल वैसे जैसे कोई मेज़बान अपने घर का दरवाज़ा दिखाता है। “मैं आज सिर्फ़ अपना मोहल्ला देखने आया हूँ। इतनी बुरी खबरें सुन रखी थीं कि मन नहीं माना। सोचा, खुद चलकर देख आऊँ।”
“बुरी खबरें?” यह शबनम आपा की आवाज़ थी, गुमटी के दरवाज़े से, लाल नोक वाली चिमटी हाथ में। “कौन सी खबरें, साहब?”
“यही कि इस गली के लोग मिलकर कुछ नहीं करते,” उसने कहा, और मुस्कुराया। “पर मैं आया और देखा — इतने सारे लोग बाहर हैं। इतने सारे दरवाज़े खुले हैं। यह तो अच्छी खबर है।”
मेरी जेब में घंटी और ठंडी हो गई।
मुझे लगा जैसे कोई मेरी जेब में बर्फ़ का टुकड़ा रखकर चला गया हो।
वो आगे बढ़ा।
एक कदम। दो कदम।
और पूरी गली ने एक साथ साँस ली।
बच्चे पीपल के नीचे खड़े थे। टिंकू सबसे आगे था, घुटने पर पट्टी, लाल कवर वाली कॉपी छाती से लगी, और आँखें किसी भी वक़्त कुछ पूछने के लिए तैयार। उसके पीछे सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू। चारों ने दरवाज़े की तरफ़ देखा — भागने का रास्ता पहले नाप लिया, फिर आगे देखा।
रणवीर ने एक भी आदमी को नहीं डराया।
उसने बस अपनी जेब से एक डिब्बा निकाला।
चमकीला डिब्बा। छोटा, गोल, ऊपर चमकती पन्नी चढ़ी हुई। उसने ढक्कन खोला तो मुझे आज तक ऐसी खुशबू नहीं आई थी उस गली में — केसर और इलायची मिली हुई, इतनी मीठी कि लगा हवा में ही शक्कर घुल गई।
“अरे, यहाँ आओ,” उसने कहा, और टिंकू की तरफ़ नहीं, बच्चों की तरफ़ देखकर हाथ बढ़ाया। “कौन है तुम लोगों में सबसे बड़ा? तुम ही लो पहले।”
टिंकू ने हाथ आगे नहीं बढ़ाया।
उसने सीधा उस डिब्बे की तरफ़ देखा और कहा, “इसमें ज़हर तो नहीं है?”
गली में जो आवाज़ आई, वो हँसी नहीं थी। दम घुटने जैसी आवाज़ थी। शबनम आपा की चिमटी हवा में रुक गई। भोला भाई ने पेचकस कसकर पकड़ लिया। दुबे अंकल की कुर्सी का पैर पुरानी ईंट पर से खिसक गया।
मैंने सोचा, अब यह चेहरा बदलेगा।
अब इस आदमी की आँखों के नीचे वो चीज़ आएगी जो हर लालची आदमी की आँखों के नीचे आती है — गुस्सा।
पर वो हँसा।
ज़ोर से हँसा। सिर पीछे करके, गले से हँसा, इतना ज़ोर से कि उसका कंधा हिला। पूरी गली ने देखा। और यह हँसी उस मुस्कान से बिल्कुल अलग थी जो तस्वीरों में थी — यह हँसी असली थी, और यही बात सबसे ज़्यादा डरावनी थी।
“ज़हर!” उसने कहा, हँसते हुए आँख पोंछकर। “सुनो, इसे कहते हैं बुद्धि। इस गली में एक बच्चा भी बिना सोचे हाथ नहीं बढ़ाता।”
फिर उसने खुद डिब्बे से एक टॉफ़ी निकाली, ऊपर की पन्नी हटाई, और सीधे अपने मुँह में डाल ली।
वो चबाता रहा। देखता रहा। टिंकू को देखता रहा।
“देखो,” उसने कहा, मुँह में टॉफ़ी रखकर, “मैं ज़िंदा हूँ। और अगर मरा तो सारी गली गवाह है।”
टिंकू ने एक सेकंड सोचा।
फिर उसने हाथ बढ़ा दिया।
रणवीर ने उसकी हथेली पर टॉफ़ी रखी और उसके सिर पर हाथ फेरा — बहुत धीरे, बहुत सहज, जैसे वो इस काम को रोज़ करता हो।
और मैंने अपनी जेब में घंटी को और ठंडा होते महसूस किया।
क्योंकि मुझे पता था — भला आदमी टॉफ़ी देता है तो बच्चे खुश होते हैं। पर ऐसा आदमी टॉफ़ी देता है तो वो बच्चों को नहीं, उनके माँ-बाप को देख रहा होता है। वो देख रहा था कि कौन सी माँ आगे आती है, कौन सी माँ पीछे हटती है, किसका हाथ काँपता है, और किसकी आँख में डर है।
बच्चे टॉफ़ी लेते गए।
गुड्डू ने ली। रफ़ीक़ ने ली। चिंटू ने दो बार हाथ बढ़ाया और दोनों बार पीछे खींच लिया, फिर तीसरी बार ली और भागकर सानिया के पीछे छिप गया।
“तुम्हारा नाम?” रणवीर ने सानिया से पूछा।
“सानिया।”
“सानिया,” उसने दोहराया, जैसे नाम याद रखने की कोशिश कर रहा हो। “अच्छा नाम है।”
और सच कहूँ? वो याद रखेगा। वो याद रखने वालों में से है। यही उसका काम है।
मैंने बीच में आना चाहा।
मैंने सोचा — अगर मैं अभी कुछ बोलूँ, तो यह आदमी मुड़कर मुझसे बात करेगा और फिर सबका ध्यान बच्चों से हट जाएगा।
इसलिए मैं चुप रहा।
“रिकॉर्ड हो रहा है?” रणवीर ने अचानक कहा, और उसकी नज़र गुमटी के उस कोने पर गई जहाँ मीरा खड़ी थी।
मीरा का कैमरा तिपाई पर था। लाल बत्ती जल रही थी। वो कैमरे के पीछे खड़ी थी, आँखें झुकाए, होंठ कसे हुए, जैसे कोई शेर के सामने खड़ा हो और बंदूक नहीं हो।
वो डरी नहीं। मुझे यह कहना है — वो डरी नहीं। उसने कैमरे को नीचे नहीं किया।
“हाँ, साहब,” मीरा ने कहा। “रिकॉर्ड हो रहा है।”
“तो अच्छा है,” रणवीर ने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई कड़वाहट नहीं थी। “रिकॉर्ड करो, बेटा। अच्छा काम दिखेगा। मेरे यहाँ जो काम होता है, वो काग़ज़ों में नहीं, लोगों के घरों में दिखता है।”
“कौन सा काम, साहब?” मीरा ने पूछा।
“अभी देख लेना,” उसने कहा। “आज नहीं तो कल।”
मैंने अपनी मुट्ठी कस ली।
मेरी जेब में घंटी बर्फ़ जैसी थी, और मुझे उसकी आवाज़ चाहिए थी। बस एक छोटी सी आवाज़। बस एक वाक्य। पर वो चुप थी। मैंने जेब में हाथ डालकर उसे छुआ — ठंडी। मैंने उसे हिलाया, बहुत धीरे, इतना धीरे कि किसी को पता न चले।
कुछ नहीं।
घंटी सिर्फ़ तब बोलती है जब वो खुद बजती है। और आज वो चुप थी।
इसका मतलब साफ़ था — तंत्र को भी नहीं पता कि इस आदमी के अंदर क्या है। या जानती थी और अभी बोलने का वक़्त नहीं था। दोनों में से कुछ भी हो, मेरे पास कुछ नहीं था।
रणवीर ने एक और टॉफ़ी निकाली और इस बार उसने बच्चों को नहीं, चबूतरी पर बैठे बुज़ुर्गों को दी।
“बाबा, यह मिठाई नहीं है, बस मुँह का स्वाद है,” उसने कहा। “आप लोगों ने इतने साल इस गली को सँभाला है। मुझे आपसे कुछ कहना है।”
चबूतरी पर खामोशी छा गई।
“मैं आपके सामने झूठ नहीं बोलूँगा,” रणवीर ने कहा, और उसका चेहरा एकदम सीधा हो गया — कोई मुस्कान नहीं, कोई मिठास नहीं, सिर्फ़ एक आदमी जो दफ़्तर में बैठा हो। “शहर बदल रहा है। ज़मीन के दाम बढ़ रहे हैं, और मैं उसके साथ बहना चाहता हूँ। पर मैं आपकी गली नहीं छीनना चाहता।”
“तो क्या चाहते हो?” यह बंसी बाबा की आवाज़ थी। पहली बार उन्होंने कुछ कहा था, और मुझे लगा जैसे पीपल का पेड़ भी झुककर सुन रहा है।
“मैं चाहता हूँ कि हम मिलकर कुछ करें,” रणवीर ने कहा। “आपकी गली, यह अस्पताल, यह स्कूल, यह दुकानें — मैं इन्हें बेहतर बनाना चाहता हूँ। नई सड़क, नया नाला, नई बत्तियाँ। और मेरी तरफ़ से कोई काग़ज़ नहीं, कोई अंगूठा नहीं। सिर्फ़ हाँ या ना।”
चबूतरी पर बैठे एक बुज़ुर्ग का हाथ उसकी तरफ़ बढ़ा — मैंने देखा, इब्राहीम चाचा थे — और फिर रुक गया।
“तो आज काग़ज़ क्यों भेजा था?” मैंने पूछा।
मेरी आवाज़ निकली। मैंने सोचा था वो काँपेगी। नहीं काँपी।
रणवीर मेरी तरफ़ मुड़ा। बहुत धीरे। जैसे कोई पुरानी किताब का पन्ना पलट रहा हो।
“कौन सा काग़ज़?” उसने पूछा।
“जो शटर के नीचे डाला गया था,” मैंने कहा। “अतिक्रमण वाला।”
“अरे, वो?” उसने हाथ हिलाकर कहा, जैसे कोई मक्खी उड़ा रहा हो। “अंकुश जी, दफ़्तर में इतने काग़ज़ होते हैं कि मुझे सबकी खबर नहीं रहती। मेरे वकील भेजते हैं। उनका काम है।”
“तो आप वकील के काम को अपना नाम नहीं देते,” मैंने कहा। “अच्छी बात है।”
वो हँसा।
“तेज़ हो,” उसने कहा। “तुम्हारी गली कहती है कि तुम्हारी ज़ुबान बाप से नहीं, माँ से आई है।”
गली हँसी। कोई ज़ोर से नहीं हँसा। बस वो हल्की हँसी जो बात को हल्का करने के लिए निकलती है। और यही उसका हथियार है — वो बात को हल्का कर देता है। वो किसी को डराता नहीं, वो डर को मज़ाक बना देता है।
“मैं आपकी दुकान तक आया हूँ,” उसने आगे बढ़ते हुए कहा, और पूरी गली उसके साथ-साथ आगे बढ़ने लगी, जैसे हवा। “आपकी दुकान कहाँ है?”
“यहीं है,” मैंने कहा। “पीपल के पीछे।”
“चलिए,” उसने कहा और अपनी सफ़ेद कुर्ते की बाँह सीधी कर ली।
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
पापा वहीं खड़े थे। उनका चेहरा किसी चीज़ पर अटका हुआ था — वो गाड़ी पर नहीं, गाड़ी के पीछे की तरफ़ देख रहे थे, जहाँ ड्राइवर खड़ा था, और उस ड्राइवर के हाथ में कुछ था। कुछ छोटा। एक काग़ज़, मोड़ा हुआ।
पापा ने मेरी तरफ़ देखा और बहुत धीरे सिर हिलाया।
मेरे पेट में ठंडा पानी भर गया।
मैंने मुड़कर उस्ताद को देखा। उस्ताद मीरा के साथ खड़े थे, चश्मा कान पर, हाथ आस्तीन में। उन्होंने मुझे देखा और बस इतना कहा, “कुछ माँगना नहीं। देना भी नहीं।”
“जी,” मैंने कहा।
“और घंटी,” उस्ताद ने धीरे से कहा। “बाज़ार में मत दिखाना।”
मैंने सिर हिलाया।
रणवीर आगे चल रहा था। गली के बीच से। उसके सफ़ेद जूते धूल में पड़ रहे थे और वो उन्हें देख भी नहीं रहा था।
शबनम आपा गुमटी के बाहर आ गईं, आगे बढ़कर, हाथों में चिमटी। उन्होंने सीधे उसका रास्ता रोका।
“साहब,” उन्होंने कहा, “चाय पिएँगे?”
गली में एक बार फिर वो खामोशी फैली।
रणवीर रुका। उसने गुमटी को देखा। फिर उस पुरानी बेंच को देखा जिस पर हम सब बैठते हैं। फिर उसकी नज़र उस कटोरी पर पड़ी जिसमें गली के लोग चाय के पैसे डालते हैं।
“चाय?” उसने कहा। “शबनम आपा की चाय। मैंने सुनी है।”
“सुनी है या पी है?” शबनम आपा ने पूछा।
“कभी बाहर भेजकर पी है,” उसने कहा। “पीते वक़्त आना नहीं हुआ।”
फिर उसने अपनी जेब से निकालकर एक नोट शबनम आपा की तरफ़ बढ़ाया। मैंने देखा कि वो नोट बड़ा था, बहुत बड़ा, इतना बड़ा कि उससे कोई तीन दिन का हिसाब फिट हो जाए।
“मैं नहीं बेचती,” शबनम आपा ने कहा।
फिर उन्होंने अपनी चिमटी उस पीतल की थाली पर पटक दी — ठन्न!
आवाज़ पूरी गली में फैल गई।
रणवीर ने हाथ वापस किया। कोई गुस्सा नहीं। वो बस हँसा और अपनी जेब में नोट डाल लिया।
“आपा, मैं खरीदने नहीं आया,” उसने कहा। “मैंने कहा — आज देखने आया हूँ।”
“तो देख लो,” शबनम आपा ने कहा। “हम कब से दिख रहे हैं, साहब, आपको दिख नहीं रहे।”
गली में पहली बार कुछ ऐसा हुआ जो डर जैसा नहीं था, बल्कि बहुत पुराने गुस्से जैसा था, और वो गुस्सा अच्छा लग रहा था। भोला भाई ने पेचकस को जेब में डाला, फिर बाहर निकाला, फिर जेब में डाला — आदमी जब डरता है ना, तो हाथ को रखने की जगह नहीं मिलती।
रणवीर आगे बढ़ा।
फिर रुका।
फिर मुड़कर पीछे देखा।
“अंकुश जी,” उसने कहा, “एक बात कहूँ?”
“कहिए।”
“आपका बोर्ड टेढ़ा लगा हुआ है,” उसने कहा। “आप इतना काम करते हैं, यह ठीक करवा लीजिए।”
गली चुप।
मुझे लगा मेरे पैर जमीन से चिपक गए हैं। एक तरफ़ मुझे गुस्सा आ रहा था और दूसरी तरफ़ हँसी — क्योंकि बात सही थी। बोर्ड सच में टेढ़ा टँगा था। मैंने तीन महीने से सोचा था कि सीधा कर दूँगा और हर बार टाल दिया था।
“ठीक कर लूँगा,” मैंने कहा। “पर पहले आप बताइए, आपको बोर्ड से क्या?”
“मुझे बोर्ड से नहीं,” उसने कहा, “मुझे उस चीज़ से है जो बोर्ड के नीचे है।”
गली ने साँस रोक ली।
वो आगे नहीं बढ़ा। वो बस वहीं खड़ा रहा, गली के बीच, और उसने अपने हाथ आराम से आगे किए।
“मैं आज तक एक बात नहीं समझा,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ में अचानक एक अलग सी चीज़ आई — जिज्ञासा। असली जिज्ञासा। “लोग मुझसे डरते हैं। यह ठीक है, मैं डरने के लायक हूँ। पर उस गली में — सॉरी, आपकी गली में — एक ऐसी दुकान है जो चीज़ें जोड़ती है। मैंने सुना है। मुझे बताया गया कि वहाँ लोग आते हैं टूटी चीज़ें लेकर, और वो चीज़ें ठीक हो जाती हैं। और अजीब बात यह है कि जब वो चीज़ें ठीक होती हैं, तो लोग भी ठीक हो जाते हैं।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
“मैंने बहुत दुकानें देखी हैं,” उसने कहा। “मैंने कारखाने देखे हैं। मैंने बाज़ार देखे हैं। पर ऐसी दुकान पहली बार सुनी है — जहाँ चीज़ें जुड़ती हैं।”
फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।
और उसकी आवाज़ वही शांत आवाज़ थी, वही आराम वाली आवाज़, पर इस बार उसमें एक नई चीज़ थी, जो मुझे अब तक समझ नहीं आई थी — भूख।
“अंकुश जी, अपनी दुकान दिखाइए। मैंने सुना है वहाँ चीज़ें अपने आप ठीक हो जाती हैं।”
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
गली पीछे खड़ी थी। सब — पापा, टिंकू, मीरा, शबनम आपा, दुबे अंकल, भोला भाई, उस्ताद, बुज़ुर्ग, बच्चे, दरवाज़ों में खड़ी औरतें।
सबने मुझे देखा।
और मेरे पीछे, मेरी ही दुकान का लकड़ी का बोर्ड, टेढ़ा टँगा हुआ, हवा में बहुत धीरे हिल रहा था।
॥
“तो?” रणवीर ने कहा। “दिखाइए ना।”
गली ने मेरी तरफ़ देखा। सबने। जैसे मैं कोई फ़ैसला लेने वाला आदमी हूँ और सब मेरे मुँह से जवाब सुनने को खड़े हैं। मेरी जेब में घंटी ठंडी पड़ी थी। बिना बजे बोलती नहीं, और मैं उसे बजाने वाला नहीं था। सामने खड़ा आदमी सफ़ेद कपड़े में था, जूते इतने साफ़ कि गली की धूल उन पर लगने से डर रही थी।
“चलिए,” मैंने कहा।
“कहाँ?”
“दुकान। आपने माँगा ना।”
वो मुस्कुराया। बहुत छोटी मुस्कान, जैसे कोई बड़ा आदमी बच्चे की बात पर मुस्कुराता है। मुझे वो मुस्कान अच्छी नहीं लगी। मुझे कोई भी चीज़ अच्छी नहीं लग रही थी उस वक़्त, पर मैं आगे बढ़ गया।
दुकान सिर्फ़ बीस कदम दूर थी। उन बीस कदमों में मैंने अपनी दुकान को पहली बार किसी और की नज़र से देखा।
टेढ़ा बोर्ड। नीचे की तरफ़ ज़ंग पकड़े हुए लोहे के कड़े। दरवाज़े पर लगी कील पर टँगा पुराना रूमाल, जिससे मैं हाथ पोंछता हूँ और जिसे धोने का वादा तीन महीने से कर रहा हूँ। अंदर से आती तेल और रबर की गंध। फ़र्श पर बिखरे छोटे पुर्ज़े, जिन्हें मैं रोज़ सोचता हूँ कि सँभाल लूँगा और रोज़ भूल जाता हूँ।
रणवीर दरवाज़े पर रुका। कद लंबा था, इसलिए उसे झुकना पड़ा। उसने बोर्ड को हाथ लगाकर थोड़ा सीधा किया, फिर हँसा।
“देखा, मैंने कहा था ना।”
“आप आज्ञा दें, अंदर आ जाएँ,” मैंने कहा। “बोर्ड ठीक करने का काम मेरा है, साहब। आपका नहीं।”
वो अंदर आया।
और मैं तुम्हें सच कहूँ, उसके अंदर आते ही दुकान बदल गई। दुकान छोटी थी, ये बात सच है। पर उस आदमी के साथ छोटी नहीं लग रही थी, बल्कि ऐसी लग रही थी जैसे किसी बड़ी चीज़ का छोटा-सा पर्दा उठ गया हो। हवा भारी हो गई। तेल की गंध कोई और गंध नहीं लग रही थी, किसी और की बनी हुई चीज़ की गंध लग रही थी। मैं जानता हूँ ये सुनने में पागलपन लगता है। पर तुम मान लो।
उसने पहले दीवार देखी।
दीवार पर औज़ार टँगे थे। पेचकस, रिंच, हथौड़ा, प्लायर, चाबियों का छल्ला, तार काटने वाला, रबर का पुराना टुकड़ा जो मैंने कभी फेंका नहीं। सब अपनी जगह पर, सब अपने हिसाब से। मेरे पापा कहते हैं कि औज़ार की जगह भूल गया तो औज़ार तुम्हें भूल जाएगा।
रणवीर ने सबसे ऊपर टँगी रिंच उतारी।
उसने हवा में घुमाया, वज़न नापा, फिर उसे ठीक वैसे ही पकड़ा जैसे मैं पकड़ता हूँ। अँगूठा ऊपर, उँगलियाँ नीचे। मैंने सोचा था कि ये आदमी औज़ार को ऐसे पकड़ेगा जैसे कोई साहब पकड़ता है, घड़ी की तरह। पर नहीं। उसने ठीक पकड़ा।
“अच्छा है,” उसने कहा।
“पुराना है, साहब।”
“पुराना अच्छा ही होता है।” उसने रिंच वापस टाँग दी, फिर बगल में टँगा पेचकस उतारा। “ये?”
“वो मेरे पापा का है।”
उसने रुककर पापा की तरफ़ देखा। पापा दरवाज़े के पास खड़े थे, हाथ जेब में, कमर झुकी हुई, चश्मा कान पर टेप से बँधा हुआ। उन्होंने रणवीर की आँख नहीं मिलाई, पर मुँह भी नहीं फेरा। बस वैसे खड़े रहे जैसे पुरानी दीवार खड़ी रहती है।
“शंकर जी,” रणवीर ने कहा, “आपके हाथ बहुत अच्छे थे। बहुत अच्छे। मुझे याद है।”
पापा ने कुछ नहीं कहा।
मेरे पेट में कुछ ऐसा हुआ जो अच्छा नहीं था। मैंने बीच में आकर कहा, “साहब, वो मेज़ पर रख दीजिए, गिर जाएगा।”
रणवीर ने पेचकस मेज़ पर रखा और अचानक मुड़कर मेरी तरफ़ देखा।
“तुम्हारे हाथ,” उसने कहा।
मैंने हाथ देखे। ग्रीस के निशान, नाखून के नीचे काली लकीरें, उँगली पर जला हुआ छोटा निशान, जो पंचर वाले टब में गरम रबर पकड़ते वक़्त लगा था।
“क्या है इनमें?”
“कुछ नहीं, साहब।”
“तुम जानते हो, आज शहर में कितने आदमी ऐसे हैं जो टूटी चीज़ देखकर उसे ठीक कर सकते हैं?” उसने कहा। “गिन लो। मैं गिन चुका हूँ। बहुत कम। और ऐसे हाथ जो टूटी चीज़ के साथ आदमी को भी ठीक कर दें — वो तो पूरे शहर में एक ही हैं।”
“आप बढ़ा-चढ़ा रहे हैं।”
“मैं बढ़ा-चढ़ा नहीं करता।” उसने मेज़ पर रखे पुराने बोल्ट को उठाया और उँगलियों में घुमाया। “मैं काम किए बिना किसी की तारीफ़ नहीं करता। यह मेरी आदत है।”
मुझे इस आदमी की बातें समझ नहीं आ रही थीं। जो आदमी मेरे पीछे पड़ा है, जो मेरी गली की ज़मीन लेना चाहता है, जिसके काग़ज़ों पर मेरे पापा ने अँगूठा लगाया — वो आदमी मेरे हाथों की तारीफ़ कर रहा था।
“साहब,” मैंने कहा, “आप आए क्यों हैं?”
वो मुस्कुराया और मेज़ के पास पड़ी स्टूल खींचकर बैठ गया। मेरी दुकान का स्टूल। मेरी दुकान में रणवीर भारद्वाज बैठा हुआ था और पूरी गली दरवाज़े के बाहर खड़ी थी, और कोई अंदर नहीं आ रहा था, और मैं अकेला उसके सामने खड़ा था।
“मैं एक बात कहने आया हूँ,” उसने कहा। “सुन लोगे?”
“सुन तो रहा हूँ।”
“तुम्हारी उम्र क्या है?”
“चौबीस।”
“चौबीस साल की उम्र में तुम यहाँ बैठकर पंचर लगाते हो,” उसने कहा। “मेरे यहाँ चौबीस साल के लड़के साइट पर पाँच-पाँच साल का तजुर्बा रखते हैं। यह ग़लत बात है, मुझे सही नहीं लगती।”
“मुझे सही लगती है।”
“क्योंकि तुम्हें पता नहीं कि सही क्या होता है।” उसने मेज़ पर बोल्ट वापस रखा। “मेरी मशीनें देखी हैं तुमने?”
“कौन सी मशीनें?”
“भारद्वाज भवन के पीछे वाला यार्ड। सीमेंट के पंप, कटर, मिक्सर, गाड़ियाँ, ग्राइंडर, दस-बारह बड़ी मशीनें, चालीस छोटी। कोई एक दिन टूटती है, तो काम तीन दिन रुकता है। तीन दिन का रुकना मेरा नुकसान नहीं है, वो उन मज़दूरों का नुकसान है जो उस दिन खाली बैठते हैं। और मेरा नुकसान तो उससे भी बड़ा होता है, पर चलो, वो बात छोड़ो।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
“स्नेह भाई नाम का एक आदमी था,” उसने कहा। “मेरा इंचार्ज। दस साल से था। पिछले महीने गुज़र गया। दिल का दौरा। अब वहाँ कोई भरोसे का आदमी नहीं है। एक लड़का है जो हिसाब जानता है, पर मशीन नहीं जानता। और एक है जो मशीन जानता है, पर ईमान नहीं जानता।”
वो रुका और मुझे देखने लगा।
“मुझे तुम्हारे जैसा आदमी चाहिए,” उसने कहा।
दुकान में एक पल के लिए बहुत शांत हो गई। मुझे अपने ही कानों पर यक़ीन नहीं हुआ।
“मैं मशीन जानता हूँ, साहब, ये आपने ठीक कहा। पर मैं अभी किसी का हरजाना नहीं बन रहा।”
“मैंने हरजाने की बात नहीं की। मैंने काम की बात की।” उसने आगे झुककर दोनों कोहनी घुटनों पर रख लिए। “महीने के पच्चीस हज़ार। बोनस अलग, जितने महीने मशीन एक दिन भी नहीं रुकी। रहने की जगह — भारद्वाज भवन के पीछे मेरे अपने फ़्लैट हैं, खाली पड़े हैं, एक तुम्हारे नाम। गाड़ी — एक छोटी गाड़ी, नई नहीं, पर अपनी।”
मेरा गला सूखने लगा।
ये वो पल था जब मुझे अपने आपसे झूठ बोलना पड़ा। मन ही मन। क्योंकि मेरे दिमाग़ में सबसे पहले जो चीज़ आई, वो ये नहीं थी कि ये आदमी मेरी गली छीन रहा है। सबसे पहले मेरे दिमाग़ में माँ आई।
माँ। उसका चेहरा, उसकी खाँसी, वो रात जब वो एक लंबी साँस भी पूरी नहीं ले पा रही थीं और काजल उनका हाथ पकड़कर बैठी थी। डॉक्टर इसरानी की दवा का काग़ज़। फ्रिज में रखी दवा, जो बिजली जाने पर खराब हो जाती है। वो दो जाँच जो की नहीं जा सकीं क्योंकि पैसे नहीं थे। माँ की हिसाब की कॉपी, जिसके पीछे सात सौ इकहत्तर रुपये का लिफ़ाफ़ा दबा है और जिसमें लिखा है — अगर जाँच में कुछ निकले तो काजल को देना, अंकुश को नहीं।
माँ मुझे क्या समझती हैं, ये मैं जानता हूँ। वो समझती हैं कि मैं नहीं सँभाल पाऊँगा। और मैं उन्हें ये बात साबित करने से बचता आया हूँ कि वो सही हैं।
और अब ये आदमी मेरे सामने बैठा था, सिर्फ़ एक वाक्य कहने की दूरी पर, कि तुम्हारी माँ का पूरा इलाज मेरे यहाँ हो जाएगा।
“साहब,” मेरी आवाज़ निकली, पर फटी हुई निकली। “आप ये सब कह रहे हैं, और मैं जानता हूँ आप मुफ़्त में कुछ नहीं देते।”
“सही जानते हो।” वो मुस्कुराया। “मैं मुफ़्त में कुछ नहीं देता। मैं काम के पैसे देता हूँ। बस।”
“तो फिर सीधी बात कीजिए।”
“सीधी बात यह है कि तुम्हारी माँ का इलाज मेरे पास बैठे डॉक्टर से होगा — नई बस्ती का अस्पताल, जहाँ पचास बिस्तर हैं और चौबीस घंटे डॉक्टर। कोई खाँसी, कोई जाँच, कोई ऑपरेशन — पूरा। पैसा तुम्हारा नहीं लगेगा।” उसने मेरी आँख में देखा। “और तुम्हारी बहन का नर्सिंग का जो कोर्स है, उसकी फ़ीस, उसकी किताबें, उसका हॉस्टल — वो भी।”
दुकान चुप थी। बाहर भी चुप्पी थी। लोग दरवाज़े पर खड़े थे और मुझे लगा कि सब सुन रहे हैं, और मुझे लगा कि सब सिर्फ़ मेरी शक्ल देख रहे हैं, ये कि मैं क्या जवाब देता हूँ।
पीछे किसी ने पैर की खड़खड़ाई की। मैंने मुड़कर देखा।
पापा।
वो वैसे ही दरवाज़े के पास खड़े थे। एक हाथ जेब में, दूसरा हाथ — यही देखने की चीज़ थी — दूसरा हाथ उन्होंने धीरे से अपनी कमर पर रख लिया था, जैसे अचानक लगा हो कि आज कमर बहुत झुकी हुई है। उनके हाथ पर सफ़ेद निशान था। वो निशान पीतल के टुकड़े को जोड़ते वक़्त पंद्रह साल पहले आया था। उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — डर नहीं, शर्म नहीं। कुछ और। जैसे कोई आदमी अपने बेटे के सामने बैठकर अपना ही पुराना काग़ज़ देख रहा हो।
और उसी वक़्त मुझे याद आया कि पाँच साल पहले इसी आदमी की मेज़ पर मेरे पापा खड़े थे, काँपते हाथों से अँगूठा लगा रहे थे, और उनके सामने कोई नहीं था। कोई नहीं पूछ रहा था कि शंकर जी, क्या तकलीफ़ है।
टिंकू दरवाज़े के पीछे से सिर निकाले खड़ा था। उसकी आँखों में वो सवाल था जो उसने कसकर पूछा नहीं, पर जो साफ़ दिख रहा था — उस्ताद, तू मान जाएगा?
मैंने एक लंबी साँस ली।
“साहब,” मैंने कहा, “आपकी बात बुरी नहीं है। आपने जो कहा, इतना तो कोई सपने में भी नहीं देखता। पर मैं नहीं आ सकता।”
उसका चेहरा नहीं बदला।
“क्यों?”
“क्योंकि ये दुकान छोटी है,” मैंने कहा, और अपनी ही आवाज़ में अचानक हल्कापन आ गया, वो हल्कापन जो मेरे अंदर बैठा हुआ है और जो मुसीबत में भी मुझे छोड़ता नहीं। “छोटी है, साहब। टेढ़ी है, टूटी है, इसका बोर्ड किसी भी दिन गिर सकता है, इसमें एक ही बल्ब है और वो भी गुनगुनाता है। पर ये मेरी है। इसे मैंने अपने हाथों से खड़ा किया है। आपके फ़्लैट में मेरा बोर्ड नहीं झूल सकता, साहब। वहाँ उसके लिए कहीं जगह नहीं है।”
रणवीर ने पल भर मेरी तरफ़ देखा, फिर हँसा।
“ये बात तुम अपने बाप से सीखे हो?” उसने पापा की तरफ़ इशारा करके कहा। “ये ‘अपनी दुकान’ वाली बात? ये सब बातें हैं, अंकुश जी। बातों से घर नहीं चलते। घर दवा से चलते हैं। किताबों की फ़ीस से चलते हैं।”
“घर भरोसे से चलते हैं, साहब।”
वो एक पल के लिए चुप हो गया।
और मुझे लगा कि मैंने इस आदमी के अंदर कहीं एक दरवाज़ा खटखटा दिया है, जो बहुत पुराना बंद पड़ा था।
“ठीक है,” वो उठ खड़ा हुआ। “मैं गुस्सा नहीं करने आया था। मैंने सोचा था, बात करूँगा। पर बात करने से कुछ ज़्यादा नहीं होता, ये मुझे पहले से पता है।”
उसने अपनी जेब से एक सफ़ेद लिफ़ाफ़ा निकाला।
बिल्कुल सफ़ेद, बिना कोई मोहर, बिना लिखा हुआ नाम। ऐसा लिफ़ाफ़ा जो किसी भी चीज़ का हो सकता है।
“इसकी ज़रूरत नहीं, साहब,” मैंने कहा।
“खोलकर देख लेना,” उसने कहा। “फिर मना करना। एक बार देख लेना। काग़ज़ भी बोलता है, अंकुश जी। और आजकल तो काग़ज़ ही बोलता है।”
उसने लिफ़ाफ़ा मेरी मेज़ पर रख दिया।
फिर वो मुड़ा और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। दरवाज़े पर उसे फिर झुकना पड़ा। उसने बोर्ड को हाथ लगाया, बिना हँसे, और बाहर निकल गया।
गली में वो रुका और एक बार पूरी गली को देखा। दाएँ से बाएँ। जैसे कोई आदमी अपना ही बाग़ देख रहा हो और सोच रहा हो कि कहाँ काटना है।
“रहमत बाबा,” उसने चबूतरी की तरफ़ कहा, “आपकी दुआ लगी रहे।”
रहमत बाबा ने जवाब नहीं दिया।
फिर रणवीर उस्ताद अली बक्श के सामने आकर रुका। उस्ताद मीरा के पास खड़े थे, मोटा चश्मा, कान पर पेंसिल।
“उस्ताद जी, तबीयत कैसी है?”
“जैसी होनी चाहिए,” उस्ताद ने कहा।
“दुकान चल रही है?”
“सिलाई चल रही है। दुकान अपने आप चलेगी।”
रणवीर हँसा और आगे बढ़ा। फिर सफ़ेद गाड़ी के पास पहुँचकर रुका, ड्राइवर ने दरवाज़ा खोला, और वो बैठने से पहले एक बार मुड़ा।
“अंकुश जी,” उसने आवाज़ ऊँची करके कहा, “जवाब जल्दी देना। मैं इंतज़ार नहीं करता। मगर तुम्हारा करूँगा।”
गाड़ी चली गई।
और गली ने साँस ली।
एक साथ। इतनी ज़ोर से कि मुझे लगा पीपल का पेड़ भी हिल गया। भोला भाई ने पेचकस निकाला, फिर जेब में डाला, फिर निकाला। शबनम आपा ने थाली उठाई और गुमटी में रख दी। मीरा ने कैमरा बंद किया और अपना माथा उस पर टिका दिया।
“उफ़,” उसने कहा।
और तभी टिंकू बोला।
“उस्ताद?”
“हाँ?”
“उस नौकरी में टॉफ़ी मुफ़्त मिलेगी क्या?”
गली हँस पड़ी।
मैं भी हँसा। सच में हँसा, वो हँसी जो डर के बाद आती है और जो डर से बड़ी होती है। शबनम आपा ने टिंकू का कान पकड़ा और कहा, “तेरे पेट में भूत बोलता है, टॉफ़ी नहीं बोलती।” टिंकू चीखा, “आपा, कान नहीं, कान के पीछे!” और गली में फिर से हँसी फैल गई।
पर मैं जानता था कि हँसी के पीछे एक चीज़ बैठी हुई थी, और वो मेरी मेज़ पर रखी थी — सफ़ेद लिफ़ाफ़ा।
पापा पहले से ही दुकान के अंदर आ गए थे। वो बिना कुछ कहे स्टूल खींचकर बैठ गए, सामने मेज़ पर लिफ़ाफ़ा पड़ा था, और वो उसे ऐसे देख रहे थे जैसे किसी जाने-पहचाने जानवर को देख रहे हों।
“पापा?”
“सुबह दस बजे क्या है?” उन्होंने पूछा।
मैं रुक गया।
“सभा है। चबूतरी पर।”
“तो इसका जवाब भी सुबह दस बजे ही माँगा जाएगा,” पापा ने धीरे से कहा। “ये आदमी गिनकर चलता है।”
वो उठे और दरवाज़ा बंद करने लगे।
“पापा, दिन है।”
“चार लोग आएँगे,” उन्होंने कहा। “इसको सिर्फ़ तीन को दिखाना है।”
तो दरवाज़ा बंद हुआ। मीरा, टिंकू, शबनम आपा, दुबे अंकल, भोला भाई अंदर। बाहर सानिया और गुड्डू पहरा देने लगे — उन दोनों को मैंने पहले कभी इतना खुश नहीं देखा, क्योंकि आख़िरकार उन्हें भी कोई असली काम मिला था।
मैंने लिफ़ाफ़ा उठाया।
हल्का था। बहुत हल्का। ऐसा हल्का जैसे अंदर कुछ न हो। मैंने किनारा फाड़ा, और मुझे लगा मेरे हाथ काँप रहे हैं और मुझे इस बात पर शर्म आई, क्योंकि जिस आदमी ने अँगूठा लगाया था उसका बेटा हूँ और मुझे काँपने की आदत नहीं है।
अंदर से दो काग़ज़ निकले।
पहला काग़ज़ मोटा था, अच्छा छपा हुआ, ऊपर नीली मोहर। भारद्वाज कंस्ट्रक्शन। नीचे बड़े अक्षरों में लिखा था — नियुक्ति पत्र। उसमें मेरा नाम था, मेरी उम्र थी, मेरे काम की लाइनें थीं, तनख्वाह थी, और सबसे नीचे लिखा था कि यह पत्र दो दिन के भीतर लौटाना है, और अगर लौटाया तो चीज़ें उसी तरह रहेंगी जैसी अब हैं।
“पढ़ो,” मीरा ने कहा।
“पढ़ रहा हूँ।”
फिर मैंने दूसरा काग़ज़ उठाया।
और मेरे हाथ रुक गए।
अगर तुमने कभी अपनी माँ की अस्पताल की फाइल नहीं देखी, तो तुम नहीं समझोगे। वो फाइल कोई किताब नहीं होती। वो एक-एक काग़ज़ पर बीमारी लिखी होती है, छोटे-छोटे अक्षरों में, और वो अक्षर पढ़ने पर कोई आवाज़ नहीं करते, पर सुनाई बहुत देते हैं।
यह उसी फाइल की नक़ल थी।
डॉक्टर इसरानी की लिखी हुई दवाएँ। दो जाँच जो की नहीं गईं, उनके काग़ज़। माँ का नाम, माँ की उम्र, माँ की खाँसी का पूरा हिसाब। और ठीक बीच में वो पीला काग़ज़ था जो मैंने अस्पताल के गलियारे में पढ़ा था — भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की नीली मोहर, मुफ़्त इलाज, तीस दिन की हद, और नीचे अँगूठे की खाली जगह।
पर यह इसी पर ख़त्म नहीं हुआ।
फाइल के साथ एक छोटी तस्वीर थी।
माँ। अस्पताल के बेड पर। पतले हाथ, आँखें बंद, साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ। तस्वीर खिड़की से खींची गई थी। बाहर से।
मेरे अंदर कुछ ठंडा हो गया।
“क्या है?” टिंकू ने पूछा। उसकी आवाज़ पतली हो गई थी।
“कुछ नहीं।”
मैं झूठ बोल रहा था और मैं जानता था, और कमरे में सब जानते थे।
और तस्वीर के नीचे, नीली स्याही से, हाथ से लिखा हुआ एक वाक्य था।
“जवाब कल सुबह दस बजे तक। जवाब से पहले मशीन नहीं चलेगी।”
मैंने वो काग़ज़ मेज़ पर रख दिया।
कमरे में कोई कुछ नहीं बोला। दुबे अंकल ने अपनी नीली कॉपी हाथ में ली और उसे खोला, फिर बंद कर दिया, जैसे कोई झूठी तसल्ली ढूँढ रहे हों। शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा और उनका मुँह कस गया, क्योंकि शबनम आपा औरत हैं और वो जानती हैं कि माँ की बात आदमी को कहाँ से काटती है।
और पापा ने वो तस्वीर उठाई।
उन्होंने बहुत देर तक देखी। फिर उन्होंने अपना चश्मा उतारा, टेप वहीं कान पर चिपका रह गया, और उन्होंने अपनी आँखें रगड़ दीं।
“इसे माँ को मत दिखाना,” उन्होंने कहा।
“नहीं दिखाऊँगा।”
“और काजल को भी नहीं।”
“नहीं दिखाऊँगा।”
पापा ने तस्वीर वापस मेज़ पर रखी, और उनके हाथ से वो फिसल गई और फ़र्श पर गिर गई। उन्होंने उसे उठाया और सीधा रख दिया, और मुझे लगा कि वही काम उन्होंने पूरी ज़िंदगी किया है — चीज़ें गिरती हैं, वो चुप्पी से उठाते हैं।
मीरा ने काग़ज़ उठाया और उसे ध्यान से पढ़ने लगी। उसके माथे पर वो सिलवटें आ गईं जो तब आती हैं जब वो कोई कमज़ोरी पकड़ लेती है।
“देखो,” उसने कहा। “तस्वीर पर तारीख़ नहीं है। और फाइल की नक़ल पर डॉक्टर के हस्ताक्षर की जगह खाली है। ये बात तुम्हें डराने के लिए है, अंकुश। दरअसल ये कोई फाइल नहीं है, यह एक चिट्ठी है।”
“फिर भी इसमें माँ के जाँच के काग़ज़ हैं,” मैंने कहा। “इतने काग़ज़ किसी के पास इकट्ठे नहीं होते। इसे किसी ने चुराया है। या किसी ने दिया है।”
दुबे अंकल ने अपनी नीली कॉपी मेज़ पर रखी।
“इसमें एक बात है जो तुम्हें देखनी चाहिए,” उन्होंने कहा। “जवाब का वक़्त सुबह दस बजे है। और सुबह दस बजे सभा है। ये दोनों अलग नहीं हैं, बेटे। ये एक ही चीज़ के दो सिरे हैं। साहब चाहता है कि कल सुबह तुम चबूतरी पर खड़े होकर यह सोचो कि माँ के इलाज का दाम क्या है।”
कमरा फिर चुप हो गया।
और तब मेरी जेब में घंटी ठंडी हुई।
बिना बजे नहीं बोलती, ये मैं जानता हूँ। पर उस वक़्त मैंने अपना हाथ उस फाइल पर रखा था और जेब में घंटी ने एक हल्की सी झुरझुरी दी, और मेरे कान में एक छोटा वाक्य आया। बस एक।
“काग़ज़ में तेरी माँ नहीं, तेरा डर लिखा है।”
मैंने हाथ खींच लिया।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। “उस्ताद, सुबह दस बजे हम चबूतरी पर जा रहे हैं ना?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके घुटने पर पट्टी बँधी थी, हाथ में लाल कॉपी, और जेब में वो माचिस की डिब्बी जिस पर उसने नोटिस की तारीख़ लिखी थी। उसका डर उसने कभी मुझसे नहीं छिपाया, और इसीलिए मुझे उससे सच बोलना पड़ता है।
“जा रहे हैं,” मैंने कहा। “और सुबह दस बजे हम वहीं होंगे। उससे पहले मैं ये लिफ़ाफ़ा वापस नहीं करूँगा। उससे पहले मैं कुछ नहीं करूँगा।”
“पर उसने लिखा है—”
“उसने बहुत कुछ लिखा है,” मैंने कहा। “उस आदमी ने अपनी तस्वीर के नीचे भी लिखवा रखा है कि वो समाजसेवी है। लिखने से सच नहीं हो जाता।”
मैंने फाइल उठाई और उसे मोड़कर अपने सीने से लगा लिया।
फिर मैंने वो तस्वीर उठाई और उसे भी उसी में रख दिया। माँ की तस्वीर मेरी जेब में थी, और घंटी भी मेरी जेब में थी, और मुझे लगा कि आज मेरी जेब में बहुत भारी चीज़ है।
दरवाज़ा खोलते वक़्त बाहर की धूप आँखों में लगी। गली में लोग खड़े थे। बच्चे पीपल पर बैठे थे। चबूतरी पर बुज़ुर्ग थे और उनमें से कोई भी जाने को तैयार नहीं था। जैसे पूरी गली ने तय कर लिया हो कि आज घर नहीं जाएँगे।
मैंने सफ़ेद लिफ़ाफ़ा अपनी जेब में डाला और बाहर देखा।
गली के मुँह पर सफ़ेद गाड़ी अभी नहीं आई थी, पर चारों जासूसों ने पहले ही खबर दे दी थी कि मोड़ पर एक गाड़ी रुकी है और उसमें कोई बैठा है और वो हमारी तरफ़ देख रहा है।
मीरा ने अपना बैग उठाया।
“अंकुश,” उसने धीरे से कहा, “एक बात पूछूँ?”
“पूछो।”
“तू एक पल के लिए मान गया था ना?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“हाँ,” मैंने कहा। “एक पल के लिए मान गया था।”
“मुझे पता है,” उसने कहा। “मैं कैमरे से देख रही थी। तेरी आँखें बदल गई थीं।”
“और फिर?”
“फिर तेरे पापा ने हाथ कमर पर रखा,” उसने कहा। “और तू ठीक हो गया।”
मैं हँसा। “तू पत्रकार है, डॉक्टर नहीं।”
“पत्रकार को सब कुछ आना चाहिए,” उसने कहा, और वो आगे बढ़ गई।
मैं दुकान के बाहर खड़ा रहा। बोर्ड ऊपर टेढ़ा टँगा था, और मैंने उसे देखकर सोचा — आज नहीं, कल सुबह के बाद। आज बोर्ड नहीं।
और मेरे दिमाग़ में एक ही बात चल रही थी। कल सुबह दस बजे चबूतरी पर सभा है। और कल सुबह दस बजे तक जवाब माँगा गया है।
दोनों एक ही वक़्त पर।
उस आदमी ने वक़्त नहीं चुना था। उसने वक़्त बनाया था।
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली और उसे हथेली में रखकर देखा। पीतल, ठंडी, चुप। उसने आज बहुत कम बोला था और जो बोला था, वो भी मेरे कान में चुभ गया था।
मैंने उसे हल्का हिलाया। बजी नहीं। मैंने फिर हिलाया। बजी नहीं।
“सुन,” मैंने धीरे से कहा, “कल सुबह दस बजे मुझे काग़ज़ का जवाब देना है या गली का?”
घंटी चुप रही।
मैंने उसे जेब में वापस रखा और लिफ़ाफ़े को सीने से लगाया, और मैंने खुद से कहा कि सुबह दस बजे, चबूतरी पर, पूरी गली के सामने, अगर कोई मुझसे पूछे कि मेरी माँ का इलाज किस चीज़ से होगा — तो मैं काग़ज़ से नहीं, गली से जवाब दूँगा।
पर उससे पहले एक रात बाकी थी।
और उस रात शहर में एक आदमी हमारे बारे में कुछ नहीं सोच रहा था। वो अपने दफ़्तर में बैठा, नीले कपड़े से ढके बक्से को देख रहा था, और मेरी माँ की फाइल की दूसरी नक़ल अपनी मेज़ पर रखे हुए था, और उसकी उँगली में काली अंगूठी थी, जो काग़ज़ पर धीरे-धीरे टिक-टिक कर रही थी।
॥
उस रात मैंने सोने की कोशिश नहीं की।
दुकान के पीछे वाले कमरे में बल्ब गुनगुना रहा था, और मैं चारपाई पर बैठा था, सामने मेज़ पर वो सफ़ेद लिफ़ाफ़ा खुला पड़ा था। मैंने उसे एक बार पूरा खोलकर देखा था, फिर बंद कर दिया था, फिर फिर खोला था। जैसे कोई बंद दरवाज़ा हो जिसे खोलने का मन न हो, पर चाबी हाथ में हो तो खोलना पड़ता है।
उसके अंदर काग़ज़ थे। बहुत सारे नहीं, गिने-चुने। पर हर काग़ज़ मेरे सीने पर पत्थर की तरह रखा हुआ था।
सबसे ऊपर वो नियुक्ति पत्र था। भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की नीली मोहर, मेरा नाम साफ़ अक्षरों में छपा हुआ, महीने का पच्चीस हज़ार, भारद्वाज भवन के पीछे वाला फ्लैट, छोटी गाड़ी, और नीचे एक लाइन — जवाब दो दिन के अंदर। लौटाने पर सब पहले जैसा।
मैंने उसे एक तरफ़ रख दिया।
उसके नीचे माँ की अस्पताल की फाइल की नक़ल थी। काग़ज़ नया था, कॉपी की गंध आ रही थी, पर उस पर कोई हस्ताक्षर नहीं था। कोई तारीख़ नहीं थी। ऊपर माँ का नाम था, उम्र, और उसके नीचे दवाओं की सूची, जाँचों की सूची। दो जाँचें जो अभी तक नहीं हुई थीं — वो भी सूची में लिखी हुई थीं, जैसे हो चुकी हों। और दवाओं के आगे लिखा था कि ये महीने भर की हैं, पर नीचे महीने का कोई हिसाब ही नहीं था।
जैसे किसी ने चुपचाप अंदर आकर माँ की बीमारी का हिसाब मेरी मेज़ पर रख दिया हो, बिना एक शब्द कहे।
और उस सबके बीच वो तस्वीर थी।
मैंने उसे उठाया। वो बाहर से खींची गई थी, खिड़की की तरफ़ से। माँ बेड पर लेटी थीं, पतले हाथ, आँखें बंद, साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ। उनके बगल में पानी का गिलास था, और गिलास के पीछे दीवार पर रणवीर का वो चमकदार पोस्टर था, जिस पर वो हाथ जोड़े खड़ा था और नीचे लिखा था — नई शुरुआत, नए सपने।
मैंने तस्वीर को उलट दिया।
नीचे का हिस्सा खाली था। कोई तारीख़ नहीं। कोई नाम नहीं। जैसे किसी ने तस्वीर खींची, और फिर भूल गया कि उस पर कुछ लिखना भी था।
पर सबसे नीचे, अलग पड़े एक छोटे काग़ज़ पर, नीली स्याही में एक ही पंक्ति लिखी थी।
जवाब कल सुबह दस बजे तक। जवाब से पहले मशीन नहीं चलेगी।
मैंने उस लाइन को तीन बार पढ़ा।
फिर मैंने लिफ़ाफ़े को मोड़कर रख दिया और घंटी जेब से निकाली। पीतल, ठंडी। मैंने उसे हथेली में रखकर देखा। वो मेरी ओर देख रही थी, बिना आँख के, बिना ज़ुबान के।
“कुछ बोल,” मैंने कहा।
चुप।
“इतना तो बोल कि ये आदमी मुझसे क्या चाहता है।”
चुप।
मैंने उसे वापस जेब में रखा और चारपाई पर लेट गया। आँखें छत पर थीं, पर सोच कहीं और थी।
माँ की तस्वीर मेरे दिमाग़ से नहीं हट रही थी। वो खिड़की के बाहर से खींची गई थी। यानी जिसने खींची, वो अंदर नहीं आया। वो दरवाज़े के बाहर खड़ा रहा, और उसने अंदर झाँका, और उसने फोटो खींची, और वो चला गया।
मानो किसी ने मेरी माँ को तस्वीर बना दिया हो, और उस तस्वीर को मेरी मेज़ पर रखकर कह दिया हो — देख, मैं तेरे घर तक पहुँच सकता हूँ।
घंटी फिर ठंडी हुई।
बजी नहीं। सिर्फ़ ठंडी हुई, जैसे कोई भीतर से धीरे से कह रहा हो कि सुन रहा हूँ, पर अभी नहीं बोलूँगा।
मैंने आँखें बंद कर लीं।
सुबह जब आँख खुली, तो बाहर अभी ठीक से उजाला भी नहीं हुआ था। पर गली में हलचल थी। मैंने दरवाज़ा खोला तो सामने सानिया खड़ी थी, हाथ में लाल कवर कॉपी, और चेहरे पर वो भाव जो बच्चों के चेहरे पर तभी आता है जब उन्होंने कुछ ऐसा देखा हो जो बड़ों ने नहीं देखा।
“उस्ताद,” उसने कहा, “रात भर मोड़ पर गाड़ी खड़ी थी।”
“कौन सी गाड़ी?”
“सफ़ेद वाली नहीं,” उसने कहा। “काली थी। छोटी। उसमें कोई बैठा था और वो कभी नहीं उतरा।”
“तूने कब देखा?”
“मैंने छत से देखा,” उसने कहा, “रात को दो बजे पानी पीने उठी थी।”
मैं हँसा। “तू पानी पीने उठी थी या गाड़ी देखने?”
“दोनों,” उसने कहा, और कॉपी खोलकर दिखाने लगी कि उसने कितने बजे क्या देखा, किस शक्ल की गाड़ी थी, कितने आदमी बैठे थे।
मैंने उसका सिर सहलाया। “तू ठीक है।”
वो मुस्कुराकर भाग गई।
मैंने दुकान का शटर उठाया ही था कि फोन बजा।
काजल का नाम आ रहा था।
मैंने उठाया।
“अंकुश,” उसकी आवाज़ दबी हुई थी, जैसे किसी कोने में खड़ी होकर बोल रही हो, “तू अस्पताल आ जा। जल्दी।”
“क्या हुआ?”
“दवा की नई खेप रुक गई है,” उसने कहा। “फार्मेसी वाला कह रहा है कि काग़ज़ में कुछ गड़बड़ है। और डॉक्टर इसरानी सुबह से मुझसे नज़र नहीं मिला रहे। मैंने दो बार बात की कोशिश की, वो काग़ज़ों में सिर डालकर बैठे रहे।”
मेरा हाथ फोन पर कस गया।
“काग़ज़ में क्या गड़बड़?”
“पता नहीं,” उसने कहा। “फार्मेसी वाले ने सिर्फ़ इतना कहा कि ऊपर से हिदायत आई है कि नई खेप जारी न की जाए जब तक काग़ज़ साफ़ न हो। अंकुश, माँ की दवा कल खत्म हो रही है।”
मैंने एक पल को आँखें बंद कर लीं।
वो काग़ज़ मेरी मेज़ पर रखा था। वो नियुक्ति पत्र मेरी मेज़ पर रखा था, और उसी वक़्त अस्पताल में माँ की दवा रुक गई थी।
मानो किसी ने दोनों तरफ़ से दरवाज़े बंद कर दिए हों।
“तू वहीं रुक,” मैंने कहा। “मैं आ रहा हूँ। दस मिनट।”
“अंकुश,” उसने कहा, आवाज़ और धीमी हो गई, “माँ को पता चल गया है।”
मैं कुछ नहीं बोला।
“मैंने नहीं बताया,” उसने कहा। “मैंने सिर्फ़ इतना कहा कि देर होगी। पर उन्हें समझ आ गया। और अब वो… वो कुछ और ही कह रही हैं।”
“क्या कह रही हैं?”
“तू आ जा,” उसने कहा। “फोन पर नहीं।”
फोन कट गया।
मैंने शटर नीचे गिराया, आधा ही, और गली की तरफ़ भागा। रास्ते में शबनम आपा की गुमटी से मीरा निकली, हाथ में कैमरा और वही फटा बैग। वो मेरे चेहरे को देखकर रुक गई।
“क्या हुआ?” उसने पूछा।
“अस्पताल,” मैंने कहा। “दवा रुक गई।”
वो एक शब्द भी नहीं बोली और मेरे पीछे चल दी।
अस्पताल पहुँचकर मैं सीधे पहली मंज़िल पर गया। माँ का बेड खिड़की के पास था। काजल बगल में खड़ी थी, हाथ में नर्सिंग की मोटी किताब दबी हुई थी, जैसे उसे बचाने के लिए लाई हो। माँ बैठी थीं, साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ, और उनके चेहरे पर वो भाव था जो मैंने शायद तीन बार ज़िंदगी में देखा था — सबसे पहली बार तब जब पापा ने दुकान बंद की थी।
मैंने दरवाज़े से अंदर झाँका।
“माँ…”
“अंदर आ,” उन्होंने कहा। आवाज़ तेज़ थी। बीमार थी, पर तेज़ थी।
मैं गया। काजल ने मेरी तरफ़ देखा, आँखों में कुछ था जो माँ के सामने नहीं कहा जा सकता था।
“बता,” माँ ने कहा। “वो काग़ज़ क्या है?”
“माँ, अभी—”
“अभी नहीं का ज़माना नहीं है,” उन्होंने कहा। “मैं बीमार हूँ, बहरी नहीं। तू सुबह से ऐसा चल रहा है जैसे किसी ने तेरे पीछे आग लगा दी हो। काजल दो बार रो चुकी है और मुझे ये कह रही है कि आँख में कुछ गिर गया। मेरी आँख में कुछ नहीं गिरा। मेरी आँख के सामने मेरा बेटा और मेरी बेटी दोनों झूठ बोल रहे हैं।”
काजल ने नीचे देखा।
मैंने सफ़ेद लिफ़ाफ़ा जेब से निकाला और माँ के सामने रख दिया।
“ये क्या है?” उन्होंने पूछा।
“वो आदमी भेजा है,” मैंने कहा। “रणवीर भारद्वाज। दुकान पर खुद आया था।”
माँ ने लिफ़ाफ़ा उठाया, खोला, नियुक्ति पत्र देखा, फिर फाइल की नक़ल देखी, फिर तस्वीर देखी। तस्वीर देखकर उनका हाथ रुक गया। उन्होंने उसे उँगली से सहलाया, जैसे अपने ही चेहरे को छू रही हों, और फिर उसे वापस रख दिया।
कमरे में एक पल के लिए कुछ भी नहीं बोला गया। सिर्फ़ बाहर से किसी मरीज़ की खाँसी आ रही थी और कहीं दूर कोई बर्तन गिर रहा था।
“अब सुन,” माँ ने कहा, और आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी ने चाकू निकाला हो, “मेरे इलाज के बदले अगर मुझसे ये कहा जाए कि झूठ बोल, या ये काग़ज़ बेच, या अपने बाप को बेच — तो मैं इलाज नहीं लूँगी।”
“माँ!” काजल ने कहा, आवाज़ भर आई।
“मैंने तेरा नाम नहीं लिया,” माँ ने कहा। “मैंने अपना नाम लिया। मैं बीमार हूँ, पागल नहीं। मुझे पता है मेरी दवा कितने की है और मेरा इलाज कितने का है। और मुझे ये भी पता है कि मेरा बेटा रात को क्यों नहीं सोता।”
“माँ, तू ऐसे मत बोल,” मैंने कहा। “कोई कुछ बेच नहीं रहा। मैंने उससे मना कर दिया है।”
“तो क्यों दवा रुकी है?”
मैं चुप हो गया।
“क्यों रुकी है?” उन्होंने फिर पूछा।
“क्योंकि वो चाहता है कि मैं हाँ कहूँ,” मैंने कहा। “दवा रोककर वो ये कह रहा है कि देख, तेरी माँ मेरे हाथ में है।”
“तो जवाब दे दे उसे,” माँ ने कहा। “जवाब दे दे कि मैं मर भी जाऊँ तो तेरा काग़ज़ नहीं छूँगी।”
“माँ—”
“मैं जानती हूँ,” उन्होंने कहा। “मुझे पता है मैं क्या कह रही हूँ। और मुझे ये भी पता है कि तू ये जवाब नहीं देगा। तू मेरी दवा के लिए सब कुछ करेगा। तू मेरा बेटा है, तू मेरे लिए मरने भी तैयार है।”
“तो फिर मुझे क्या करना चाहिए?” मेरी आवाज़ ऊँची हो गई, और मुझे पता था वो ऊँची नहीं होनी चाहिए थी, पर निकल गई। “बताओ मुझे। तुम्हें यहाँ छोड़ दूँ? यहीं, इसी बेड पर, इसी पीली दीवार के नीचे? और चला जाऊँ मोहल्ले की सभा में भाषण देने? कौन सा सच? किस सच के लिए?”
काजल ने मेरा हाथ पकड़ा।
“अंकुश, बाहर चल।”
“नहीं,” माँ ने कहा। “यहीं बात कर। यहीं, मेरे सामने। जो बात मेरी दवा की है वो मेरे पीठ पीछे नहीं होगी।”
काजल ने मेरा हाथ छोड़ दिया और अपनी किताब सीने से लगा ली।
“माँ,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ काँप रही थी, “मैं पढ़ रही हूँ नर्सिंग। मैं जानती हूँ कि ये दवा बंद हुई तो क्या होगा। तीन दिन में साँस भरने लगेगी। एक हफ़्ते में चलना मुश्किल हो जाएगा। तू कह रही है कि सच के बदले इलाज नहीं लेना। ठीक है, बहुत अच्छी बात है। पर तेरा सच कौन उठाएगा जब तू बेड से उठ नहीं पाएगी? कौन सच बोलेगा जब तेरी साँस ही नहीं बचेगी?”
कमरा फिर चुप हो गया।
माँ ने काजल की तरफ़ देखा। देर तक देखा। फिर उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
“बेटी,” उन्होंने धीरे से कहा, “मैं डरती हूँ कि तुम्हारे पापा की तरह तुम भी एक दिन मेरी दवा के लिए किसी काग़ज़ पर अंगूठा लगा दोगे।”
काजल रो पड़ी।
और उसी वक़्त मैंने देखा — पापा दरवाज़े पर खड़े थे।
कब आए, पता नहीं। उनके हाथ में एक पुराना पेचकस था और एक मैला कपड़ा। वो कुछ नहीं बोले। कमरे में आए, खिड़की के पास रखी कुर्सी पर बैठ गए, और पेचकस को कपड़े से पोंछने लगे। धीरे-धीरे। एक ही हिस्से को बार-बार।
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उन्होंने आँख नहीं मिलाई।
पर मुझे पता था कि वो सब सुन रहे थे। और मुझे ये भी पता था कि वो क्यों चुप थे। क्योंकि वो इस बहस में कुछ नहीं कह सकते थे। क्योंकि पाँच साल पहले उन्होंने ठीक यही किया था — मेरी माँ की दवा के लिए, डर के मारे, एक कोरे काग़ज़ पर अंगूठा लगा दिया था। और आज वही काग़ज़ उनके बेटे की मेज़ पर रखा था।
पापा ने पेचकस पोंछते हुए एक बार भी ऊपर नहीं देखा।
“पापा,” मैंने कहा।
“हूँ।”
“कुछ कहो।”
“क्या कहूँ?” उन्होंने पूछा, और आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी पुराने लोहे के दरवाज़े की चरमराहट हो। “मैंने पाँच साल पहले कहा था, और तुमने सुना नहीं। आज मैं चुप हूँ, तुम सुन रहे हो। ये भी ठीक है।”
फिर उन्होंने पेचकस उठाया, कुर्सी की टाँग की तरफ़ झुके, और उसे कसने लगे।
माँ ने उनकी तरफ़ देखा। देर तक।
“सुनो,” उन्होंने धीरे से कहा, “मैं जानती हूँ तुमने क्यों किया।”
पापा का हाथ रुक गया। पर वो कुछ नहीं बोले।
“पर अब और नहीं,” माँ ने कहा। “अब तुम चुप रहोगे तो ये लड़का टूट जाएगा। ये लड़का तुम्हारी चुप्पी से काँपता है, और तुम्हें पता है।”
पापा ने पेचकस नीचे रखा और सीधे हो गए।
“ठीक,” उन्होंने कहा। “मैं नहीं चुप रहूँगा। पर पहले एक बात साफ़ कर लो।”
उन्होंने मेरी ओर देखा।
“तू उस काग़ज़ के बारे में क्या सोच रहा है?” उन्होंने पूछा।
“मैं सोच रहा हूँ,” मैंने कहा, और आवाज़ धीमी हो गई, “कि उसने मुझे नौकरी नहीं दी है। उसने मुझे रस्सी दी है।”
पापा ने गर्दन हिलाई।
“हाँ,” उन्होंने कहा।
“और वो रस्सी क्या है?” मैंने पूछा, अपने ही सवाल से चौंककर।
“माँ,” पापा ने कहा। “तेरी माँ वो रस्सी है। वो उससे तुझे बाँधेगा। और तू खुद बँध जाएगा। धीरे-धीरे। पहले एक हस्ताक्षर करेगा, फिर एक काग़ज़, फिर एक कॉल पर हाँ कहेगा। और फिर एक दिन उठकर देखेगा कि उसके नाम पर कुछ ऐसा छपा है जो उसने कभी नहीं कहा।”
मैंने सिर झुका लिया।
“अब क्या करें?” मैंने पूछा।
“अब तू उससे वैसे ही लड़ेगा,” पापा ने कहा, “जैसे मैं पाँच साल पहले नहीं लड़ा। और मेरी ग़लती तेरी ढाल होगी।”
माँ ने अपना हाथ बढ़ाया और पापा का हाथ पकड़ लिया।
काजल ने अपनी आँखें पोंछ लीं और मेरी तरफ़ देखा।
“अब तू बता,” उसने कहा, “दवा का क्या करें?”
“दवा मिलेगी,” मैंने कहा। “किसी और रास्ते से।”
“कैसे?” माँ ने पूछा।
“पता नहीं,” मैंने कहा। “पर तुम चिंता मत करो।”
“ये सबसे बड़ा झूठ है जो तू आज बोला है,” माँ ने कहा, और वो पहली बार मुस्कुराईं, “कि मैं चिंता न करूँ।”
मैं हँसा और उनके पैर छुए।
पर अंदर से मैं हँस नहीं रहा था।
मैं गलियारे में निकला। मीरा वहीं खड़ी थी, दीवार से टिकी हुई। उसने कुछ नहीं पूछा। बस मेरी आँखों में देखा और समझ गई।
फिर कुछ देर बाद, जब हम सीढ़ियों के पास खड़े थे, उसने कहा —
“ये सब जो लिफ़ाफ़े में है, ये अदालत में नहीं चलेगा।”
“क्यों नहीं चलेगा?” मैंने पूछा।
“क्योंकि ये काग़ज़ है,” उसने कहा। “काग़ज़ से लोग डरते हैं, अदालत नहीं। अदालत में ये साबित करना पड़ेगा कि किसने भेजा, कब भेजा, किसने लिखा, और भेजने वाले का इरादा क्या था। कोई तारीख़ नहीं है, कोई हस्ताक्षर नहीं है, कोई मोहर नहीं है। ये सिर्फ़ एक चिट्ठी है जिसे किसी ने तेरी मेज़ पर रख दिया। और जो रखकर गया, वो अदालत में कहेगा कि मैंने तो कोई चिट्ठी भेजी ही नहीं।”
“तो ये बेकार है?”
“नहीं,” मीरा ने कहा। “ये दबाव का सबूत है। पर अदालत के लिए नहीं, गली के लिए। जब कोई किसी से डरकर काग़ज़ छोड़े, तो वो इतना तो मान रहा होता है ना कि उसके पास कोई और रास्ता नहीं है। ये चिट्ठी उसकी कमज़ोरी है, उसकी ताक़त नहीं।”
मैंने गहरी साँस ली।
“मीरा,” मैंने कहा, “तू जो इस काग़ज़ में लिखा है, वो सच है।”
“क्या?”
“मेरा डर,” मैंने कहा। “घंटी ने रात को कहा था कि काग़ज़ में मेरी माँ नहीं, मेरा डर लिखा है। और मैंने सुबह उस काग़ज़ को उठाया, और मेरा हाथ रुक गया। एक पल को मैंने सोचा — क्यों न मान लूँ? एक काग़ज़, एक हस्ताक्षर, और माँ ठीक हो जाए। और जब मैंने वो सोचा, तो मुझे पता था कि एक दिन मैं उसी सोच के साथ उठूँगा और मैं खुद को पहचान नहीं पाऊँगा।”
मीरा ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
“अब मान गया या नहीं?” उसने पूछा।
“नहीं,” मैंने कहा। “अब नहीं।”
“तो तू ठीक है,” उसने कहा। “काग़ज़ देखकर डरना ठीक है। उसे छूने से पहले रुक जाना ठीक है। पर उसे उठाना ग़लत है।”
मैंने सिर हिलाया।
“अब मैं अस्पताल के काग़ज़ात वाले कमरे में जा रहा हूँ,” मैंने कहा। “डॉक्टर इसरानी से बात करनी है।”
“काजल को बता दूँ?”
“नहीं,” मैंने कहा। “वो माँ के पास रहे। माँ अकेली नहीं रहनी चाहिए।”
मीरा ने कहा, “मैं बाहर रहूँगी। काजल को बुलाती हूँ अगर ज़रूरत हो।”
“ठीक है।”
मैं अस्पताल के उस पुराने हिस्से में गया जहाँ डॉक्टर इसरानी का कमरा था। दरवाज़ा खुला था। अंदर काग़ज़ों के ढेर थे, आधे पानी के गिलास थे, टूटे चश्मे की एक डंडी रखी थी। दीवार पर एक बिना तारीख़ वाली तस्वीर टँगी थी, जिसमें एक औरत की आँखें हँस रही थीं।
डॉक्टर इसरानी कुर्सी पर बैठे थे, हाथ में पुराना स्टेथोस्कोप, जिसकी नली पर टेप लिपटा हुआ था। मैं अंदर गया तो उन्होंने ऊपर देखा, और फिर अपनी नज़र काग़ज़ों पर गिरा दी।
“डॉक्टर साहब,” मैंने कहा।
“आओ, बेटा,” उन्होंने कहा, आवाज़ में वो गर्मी थी जो साठ के पार के लोगों की आवाज़ में होती है, पर आज वो गर्मी थोड़ी उखड़ी हुई थी।
“माँ की दवा रुक गई है।”
वो एक पल के लिए रुके। फिर उन्होंने स्टेथोस्कोप नीचे रख दिया।
“मुझे पता है,” उन्होंने कहा।
“क्यों?” मैंने पूछा।
“अस्पताल की ज़मीन का काग़ज़ अटका हुआ है,” उन्होंने कहा, और फिर चुप हो गए, जैसे बहुत कह दिया हो।
“इसका माँ की दवा से क्या रिश्ता?”
“ज़मीन का काग़ज़ अटका है, तो ऊपर वाले दफ़्तर में सब कुछ अटका है,” उन्होंने कहा। “दवा की खेप भी, नई जाँच भी, नर्सिंग के काग़ज़ भी। अब तू समझ ही गया होगा।”
मैं समझ गया था।
“आपने क्यों नहीं बताया?” मैंने पूछा।
“क्या बताता?” उन्होंने कहा, और पहली बार मेरी तरफ़ देखा। “कि मुझे तीन महीने पहले एक आदमी मिला था, सफ़ेद कुर्ते में, जिसने मुझे नई इमारत में एक कमरा, एक नर्सिंग ट्रेनिंग टीम और पैंतालीस साल की नौकरी का सपना दिखाया था? और मैंने उसे सुन लिया? मैंने मना नहीं किया? बस सिर्फ़ चुप रह गया?”
“आपने कबूल किया,” मैंने कहा। “इसी लिए तो अब चुप नहीं हैं।”
वो मुस्कुराए। पर मुस्कान में वो बात नहीं थी जो उम्र के साथ आती है। उसमें शर्म थी।
“बेटा,” उन्होंने कहा, “एक डॉक्टर को सबसे ज़्यादा डर किस बात का होता है?”
“मौत का?”
“नहीं,” उन्होंने कहा। “अपने हाथ खाली हो जाने का। जब मरीज़ आता है, तो डॉक्टर के पास दवा होती है, जाँच होती है, मशीन होती है। जब इनमें से एक भी न हो, तो डॉक्टर सिर्फ़ एक आदमी रह जाता है, जो ये कहता है कि भगवान भरोसे बैठो। और मैंने वो नहीं कहा। पैंतालीस साल में एक बार भी नहीं।”
उन्होंने काग़ज़ों के ढेर में से एक पीला काग़ज़ निकाला। वो वही काग़ज़ था जो मैंने दीवार पर लगा देखा था — भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की नीली मोहर, मुफ़्त इलाज, तीस दिन की हद, खाली अंगूठा।
“ये मेरी मेज़ पर रखा है,” उन्होंने कहा। “मैंने इसे किसी को नहीं दिखाया। यहाँ तक कि अपने आप को भी नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि अगर मैं इसे देखता, तो मुझे ये मानना पड़ता कि मैंने इस काग़ज़ से डरकर माँ की दवा रोकने में मदद की है।”
“आपने मदद की?”
“मैंने रोका नहीं,” उन्होंने कहा। “और यही मदद है।”
मैं चुप रहा।
“अब क्या?” मैंने पूछा।
“अब तू जा,” उन्होंने कहा, “और मुझे कुछ देर इस कमरे में अकेला छोड़ दे। मुझे अपने आप से एक बात कहनी है।”
“क्या बात?”
“यही,” उन्होंने कहा, “कि एक काग़ज़ ने मुझे एक बीमार औरत से ज़्यादा डरा दिया।”
मैं दरवाज़े तक गया। फिर रुका।
“डॉक्टर साहब,” मैंने कहा, “आपकी बीवी की तस्वीर है ना दीवार पर?”
वो एक पल के लिए रुके। फिर उन्होंने गर्दन हिलाई।
“वो कहती थी,” उन्होंने कहा, “कि इस अस्पताल की दीवारें पीली रहेंगी, तो लोग कम डरेंगे।”
“तो दीवार पीली रखिए,” मैंने कहा। “और काग़ज़ को दराज़ में रख दीजिए।”
वो मुस्कुराए। इस बार मुस्कान में थोड़ी देर टिकी।
मैं बाहर निकला। गलियारे में घंटी हिली, और मैं एक पल के लिए रुक गया।
मैंने उसे जेब से निकाला। अभी भी ठंडी थी। पर मेरे कान में एक आवाज़ आई, बहुत धीमी, इतनी धीमी कि जैसे कोई दूसरे कमरे से बोल रहा हो।
ये काग़ज़ नहीं है। ये कर्ज़ है।
मैंने घंटी को हथेली में बंद कर लिया।
“मुझे पता है,” मैंने धीरे से कहा।
फिर मैं सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा।
नीचे उतरकर मैंने बाहर का दरवाज़ा खोला और अस्पताल के गेट की तरफ़ चला। वहाँ बबलू खड़ा था।
मुझे देखकर वो मुस्कुराया। उस दिन वो सोने की चेन नहीं पहने था। उसके गले में कुछ भी नहीं था, और यही सबसे ज़्यादा डरावना था। जो आदमी अपना सबसे प्यारा टुकड़ा भी नहीं पहने, वो किसी और के लिए आया होता है।
“अंकुश भाई,” उसने कहा। “साहब ने ये भेजा है।”
उसने एक छोटा सफ़ेद कार्ड मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने उसे नहीं लिया। उसने मेरी मुट्ठी में रख दिया।
मैंने कार्ड खोला।
उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी, नीली स्याही से, साफ़ अक्षरों में —
आज शाम चार बजे। भारद्वाज भवन। अकेले।
तीन शब्द थे जो सबसे ज़्यादा चुभे।
अकेले।
मैंने कार्ड मोड़कर जेब में रखा और बबलू की तरफ़ देखा।
“उससे कह देना,” मैंने कहा, “कि मैं आऊँगा। पर अकेला नहीं।”
बबलू हँसा।
“साहब ने कहा था कि तू यही बोलेगा,” उसने कहा, और अपनी गाड़ी की तरफ़ बढ़ गया।
मैं अस्पताल के गेट पर खड़ा रहा। पीछे से मीरा आई और कार्ड मेरे हाथ से ले लिया।
“क्या लिखा है?” उसने पूछा।
“चार बजे भारद्वाज भवन, अकेले,” मैंने कहा।
वो देर तक कार्ड को देखती रही। फिर उसने कहा —
“तू अकेला नहीं जाएगा।”
“जानता हूँ,” मैंने कहा। “पर एक बात समझ ले। ये कार्ड मुझे देने से पहले उसने मेरी माँ की दवा रोकी है। इसका मतलब ये है कि उसने ये कार्ड दवा रोकने से पहले लिखा था।”
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
“मतलब वो जानता था कि मैं सुबह दवा रुकवाकर आऊँगा,” मैंने कहा।
“या वो जानता था कि दवा रुकेगी,” मीरा ने कहा, “और वो तुझे यहाँ बुलाकर ये कार्ड देने का इंतज़ार कर रहा था।”
मैंने सिर हिलाया।
“अब तू क्या करेगा?” उसने पूछा।
“पहले सभा,” मैंने कहा। “फिर भारद्वाज भवन।”
“दस बजे?”
“हाँ,” मैंने कहा। “दस बजे चबूतरी। गली का जवाब।”
“और चार बजे?”
“चार बजे वो मेरा जवाब सुनेगा,” मैंने कहा।
मैंने अस्पताल की पीली दीवार की तरफ़ देखा। वो दीवार अब भी खड़ी थी। ऊपर पहली मंज़िल की खिड़की से माँ दिख रही थीं, काजल उनके बगल में खड़ी थी। दोनों नीचे देख रही थीं।
मैंने हाथ उठाया।
माँ ने भी हाथ उठाया।
काजल ने भी।
और मैंने मन में ठान लिया कि सुबह दस बजे चबूतरी पर, और शाम चार बजे उस सफ़ेद इमारत में, मैं उस आदमी को यही दिखाऊँगा — कि मेरे पास एक हाथ उठाकर हवा में लहराने के लिए दो लोग हैं। और वो उसके पास नहीं हैं।
मैंने घंटी जेब में वापस रखी। वो अब भी ठंडी थी। पर इस बार ठंडक में एक बात थी जो पहले नहीं थी — सब्र।
मैंने मीरा से कहा, “चल, चबूतरी चलें। सभा की तैयारी करनी है।”
और हम चल पड़े, सफ़ेद कार्ड जेब में, काली अंगूठी वाला आदमी दूर किसी दफ़्तर में, और एक लंबी शाम बाकी।
॥
सुबह के लगभग आठ बजे थे। गली अभी पूरी तरह जागी नहीं थी। नाली के ऊपर वाला पत्थर का पुल अब भी गीला था, किसी ने रात में बाल्टी उलट दी थी। पीपल के नीचे चबूतरी खाली पड़ी थी, और उसकी एक तरफ़ बंसी बाबा की रखी हुई लाठी अब भी वहीं टिकी थी, जैसे कल की बात अभी खत्म ही नहीं हुई हो।
मैं और मीरा गली के मोड़ से अंदर आए। मीरा के कंधे पर कैमरा लटका था और हाथ में वही फटा बैग। वो चलते-चलते बोल रही थी, जैसे उसका दिमाग़ रुकता ही नहीं।
“दस बजे सभा,” उसने कहा। “माइक नहीं लगाएँगे।”
“क्यों?” मैंने पूछा।
“क्योंकि माइक से लोग डरते हैं,” उसने कहा। “माइक पर बोलने वाला आदमी भाषण देता है। माइक के बिना बोलने वाला आदमी सच बोलता है।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। ये औरत कभी-कभी ऐसी बात कह देती थी कि मुझे लगता था, इसका दिमाग़ मेरे मुँह से पहले चलता है।
“और कुर्सियाँ?” मैंने पूछा।
“चारपाइयाँ,” उसने कहा। “गली की चारपाइयाँ। कोई मंच नहीं। कोई ऊँचा नीचा नहीं। सब ज़मीन पर।”
“उस्ताद ज़मीन पर नहीं बैठेंगे,” मैंने कहा। “उनकी कमर है।”
“तो उनके लिए चबूतरी का कोना,” मीरा ने कहा। “पर बाकी सब नीचे।”
मैं हँसा।
“तूने सब सोच लिया है,” मैंने कहा।
“मैंने नहीं सोचा,” उसने कहा। “मैंने तेरी गली को देखा है। यहाँ लोग ऊँची जगह पर बैठे आदमी की बात सुनते हैं, पर मानते उसको हैं जो उनके बराबर बैठा हो।”
हम चबूतरी के पास पहुँचे। मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी वहीं थी, ठंडी, चुप। सुबह से वो एक बार भी नहीं बोली थी, और यही बात मुझे खटक रही थी। जब वो चुप रहती थी, तो मुझे लगता था कि वो कुछ सुन रही है जो मैं नहीं सुन पा रहा।
तभी पीछे से दौड़ते हुए टिंकू आया। उसके घुटने पर पट्टी आज भी वही थी, बस उस पर नई धूल जम गई थी।
“उस्ताद!” वो हाँफते हुए बोला। “चारपाइयाँ मैंने और गुड्डू ने पीपल के नीचे लगा दीं। पाँच। और सानिया ने पानी की बाल्टी और गिलास रख दिए।”
“छह चाहिए,” मैंने कहा।
“छह नहीं हैं,” टिंकू ने कहा। “पर रफ़ीक़ की अम्मी ने कहा कि उनकी चारपाई ले लो, बस उस पर पहले दो रोटियाँ सुखानी हैं।”
“कितनी देर?”
“जितनी देर में तू एक चाय पीए,” टिंकू ने कहा।
मीरा हँस पड़ी।
“ठीक है,” मैंने कहा। “रोटियाँ सूखने दो।”
टिंकू वहीं खड़ा रह गया, जैसे उसके पास कुछ और भी है पर कहने का तरीक़ा ढूँढ रहा हो। मैंने उसे देखा।
“बोल,” मैंने कहा।
“उस्ताद,” उसने धीरे से कहा, “आज चबूतरी पर बहुत लोग आएँगे?”
“पता नहीं,” मैंने सच कहा।
“अगर कम आए तो?”
मैं एक पल रुका। यही सवाल मेरे अंदर भी था, बस मैं उसे मुँह से बाहर नहीं आने देता था।
“कम आए तो भी सभा होगी,” मैंने कहा। “दो आदमी हों तो भी सभा होती है। तीन हों तो भी। सभा की जान गिनती नहीं होती, टिंकू। सभा की जान यह होती है कि जो बोला गया, वो सबने सुना।”
वो सिर हिलाकर चला गया। मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
“अच्छा जवाब दिया,” उसने कहा।
“दिया तो,” मैंने कहा, “पर खुद को भी वही समझाना पड़ रहा है।”
वो कुछ नहीं बोली। बस अपना बैग सँभालकर चबूतरी पर रख दिया।
तुम सोच रहे होगे कि सभा में ऐसा क्या बड़ा हुआ। तो सुनो, सभा में बड़ा धमाका नहीं हुआ। सभा में वो हुआ जो असली चीज़ों में होता है — लोग आए, लोग बैठे, किसी ने कुछ कहा, किसी ने कुछ नहीं कहा, और फिर सब उठकर अपने-अपने काम पर चले गए। पर उस एक घंटे में गली ने अपने आप को देख लिया था। और अपने आप को देखना कभी-कभी सबसे डरावनी चीज़ होती है।
दस बजे तक चबूतरी भर गई थी।
बंसी बाबा आए, रहमत बाबा आए, दोनों अब साथ बैठते थे, बीच में कोई दूरी नहीं छोड़ते थे। हाफ़िज़ निसार अहमद आए, पंडित ब्रजकिशोर आए, और उनके आने पर मैंने देखा कि बंसी बाबा ने अपनी जगह थोड़ी सी खिसका दी, ताकि पंडित जी को छाया मिल जाए। यह छोटी बात है, पर यही छोटी बातें गली को गली बनाती हैं।
इब्राहीम चाचा आए, अपनी तस्बीह घुमाते हुए। बृजमोहन बाबा लाठी टेककर आए और पहली बार पत्थर पर नहीं, चबूतरी पर बैठे। यह देखकर मेरा गला भर आया, पर मैंने कुछ नहीं कहा। कभी-कभी चुप रहना भी एक तरह का शुक्रिया होता है।
दुबे अंकल आए। अपनी कुर्सी उठाकर लाए, क्योंकि उन्होंने एक बार कहा था कि अपनी चीज़ पर बैठकर आदमी कम झूठ बोलता है। शबनम आपा ने गुमटी से पीतल की थाली उठाई और उस पर गिलास रखकर ले आईं, साथ में एक केतली भी।
“चाय सबके लिए,” उन्होंने कहा। “पैसा कोई नहीं देगा। आज के दिन मेरी गुमटी खुली है, बस शर्त एक है — झूठ बोलने वाले को अगली बार चाय नहीं मिलेगी।”
भीड़ में हल्की हँसी फैली।
उस्ताद अली बक्श आए, अपना मोटा चश्मा कान पर टिकाए, और चबूतरी के कोने पर बैठ गए। उन्होंने मुझे देखा और सिर हिलाया। बस इतना। पर उस सिर हिलाने में एक पूरी बात थी — चल, शुरू कर।
भोला भाई आए और उनके साथ सनी आया। सनी ने आते ही पीछे की तरफ़ देखा, जैसे कोई उसे देख रहा हो। फिर वो बैठ गया, हाथ घुटनों पर रखकर।
और सबसे पीछे, चबूतरी से थोड़ी दूर, ज़मीन पर पापा बैठे थे। किसी ने उन्हें जगह दी भी, पर उन्होंने नहीं ली। वो वहीं रहे, जहाँ से सब दिखता था, पर कोई उन्हें ज़्यादा नहीं देखता था।
मैं खड़ा हुआ। मेरे हाथ में कुछ नहीं था। न काग़ज़, न कलम। बस घंटी, जेब में।
“मैं भाषण नहीं दूँगा,” मैंने कहा। “मुझे भाषण देना नहीं आता, और सच कहूँ तो भाषण सुनने का भी मन नहीं करता। मैं सिर्फ़ तीन बातें कहूँगा और फिर तुम सब बोलो।”
किसी ने कुछ नहीं कहा। पीपल के पत्ते हिल रहे थे और उनकी आवाज़ सबसे ऊँची थी।
“पहली बात,” मैंने कहा, “ये गली किसी की जागीर नहीं है। न मेरी, न उस्ताद की, न शबनम आपा की, न उस आदमी की जो सफ़ेद गाड़ी में आया। ये गली उन लोगों की है जो यहाँ सुबह उठकर चूल्हा जलाते हैं।”
“दूसरी बात,” मैंने कहा, “हमारे पास काग़ज़ हैं। बहुत काग़ज़ हैं। नोटिस हैं, मोहर है, सूची है, अंगूठे हैं। पर मैं तुमसे यह नहीं कहूँगा कि इन काग़ज़ों से लड़ो। मैं यह कहूँगा कि अब झूठ मत बोलो। अगर तुमने कभी किसी काग़ज़ पर अंगूठा लगाया है, तो उसे आज यहाँ खड़े होकर बोल दो। काग़ज़ अपने आप हल्का हो जाएगा।”
भीड़ में सन्नाटा छा गया। कोई नहीं बोला।
फिर भोला भाई उठे। उनके हाथ अब भी काँप रहे थे, पर पहले जैसे नहीं। वो खड़े हुए और बोले —
“अंकुश भाई सच कह रहे हैं। मैंने अंगूठा लगाया था। मेरी बीवी का ऑपरेशन था, मेरे पास पैसे नहीं थे, और मुझे कोरा काग़ज़ दिया गया।”
उन्होंने कुछ और कहना चाहा, पर रुक गए। उनका बेटा सनी उठा और उनके बगल में खड़ा हो गया। और यही काफ़ी था। भोला भाई ने सनी की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़, फिर बैठ गए — पर इस बार वो अकेले नहीं बैठे थे।
उसके बाद तीन और लोग बोले। किराने वाले बूढ़े काका का बेटा उठा और बोला कि उसके बाप का नाम उस सूची से हटा दिया जाए, वरना वो खुद सबके सामने सच बोलेगा। चूड़ी वाली बाई ने कहा कि उसकी दुकान पर तीन आदमी दिन भर बैठते हैं और वो डरती है, पर आज से वो उन्हें चाय नहीं देगी। और साइकिल पुर्ज़ों वाला भाई चुपचाप पीछे बैठा रहा, एक शब्द नहीं बोला। पर वो आया था। वो बैठा था। और मेरे हिसाब से उस दिन उसका बैठना ही उसका बोलना था।
“किसी पर ज़ोर नहीं,” मैंने कहा। “जो नहीं बोल सकता, वो न बोले। पर उसके लिए जगह खाली रहेगी।”
फिर मैंने सनी की तरफ़ देखा। सनी उठा। उसकी आवाज़ भारी थी, जैसे गले से निकलने से पहले रास्ता भूल रही हो।
“दफ़्तर में एक बक्सा है,” उसने कहा। “नीले कपड़े से ढका। धूल जमी है। कोई नहीं छूता। बबलू भाई भी उसे देखकर काँपते हैं।”
“क्या है उसमें?” किसी ने पूछा।
“पता नहीं,” सनी ने कहा। “पर एक काग़ज़ पर लिखा था — दफ़्तर, बक्सा, चाबी, बीस दिन, नाम। मैंने वो चीज़ छिपा ली थी। पापा को भी नहीं दिखाई।”
उसने अपनी जेब से काग़ज़ का आधा टुकड़ा निकाला। उस पर नीली मोहर थी और नीली स्याही में वही शब्द।
“अब आप ही बताइए,” उसने कहा, “मैं चोर हूँ या गवाह?”
“तू गवाह है,” मीरा ने कहा। “और गवाह चोर नहीं होता।”
सनी ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें भर आई थीं। वो बैठ गया।
फिर उस्ताद ने अपनी आवाज़ उठाई। चार शब्द बोले, बस।
“अब घंटी दिखाने का वक़्त नहीं,” उन्होंने कहा। “अब काम का वक़्त है।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा और सिर हिलाया।
“आख़िरी बात,” मैंने कहा। “आज शाम चार बजे वो मुझे अपने दफ़्तर बुला रहा है। अकेले।”
भीड़ में हलचल हुई।
“मैं जाऊँगा,” मैंने कहा।
“अकेले?” किसी ने कहा।
“मैंने उसे कहला दिया है कि मैं अकेला नहीं आऊँगा,” मैंने कहा।
“हम सब चलेंगे?” शबनम आपा ने पूछा, और उनकी आवाज़ में इतनी रुचि थी कि मुझे हँसी आ गई।
“नहीं,” मैंने कहा। “सब नहीं। दो लोग। मैं और मीरा। बाकी तुम यहाँ रहोगे।”
“क्यों?” दुबे अंकल ने पूछा।
“क्योंकि,” मैंने कहा, “अगर मैं उसके दफ़्तर में हूँ और ये गली खाली है, तो वो अपनी शर्तें मनवा लेगा। और अगर मैं वहाँ हूँ और ये गली भरी है, तो वो मुझसे नहीं, इस गली से बात करेगा।”
कुछ देर सन्नाटा रहा। फिर बंसी बाबा ने कहा — और उनकी आवाज़ भारी थी, जैसे चालीस साल से बंद थी और आज खुल रही हो।
“बेटा,” उन्होंने कहा, “जिस दिन तू ये गली छोड़कर अकेला चला, उस दिन तू लौटकर आया। हमें लौटकर सिर्फ़ बैठना आता है।”
मैं एक पल के लिए उन्हें देखता रह गया।
“तो बैठिए,” मैंने कहा। “बैठिए और चबूतरी पर बने रहिए। जब तक मैं वहाँ हूँ, ये चबूतरी मेरी सबसे बड़ी खबर है।”
सभा इसी तरह खत्म हुई। किसी नारे के साथ नहीं। किसी ताली के साथ नहीं। लोग उठे, चारपाइयाँ समेटने लगे, शबनम आपा ने गिलास इकट्ठे किए, और रफ़ीक़ की अम्मी की चारपाई फिर उनके आँगन में लौट गई।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी अब भी ठंडी थी।
“कुछ बोल,” मैंने धीरे से कहा।
और वो बोली। इतनी धीमी कि जैसे मेरे ही सीने से आ रही हो।
तेरे पास आज एक धागा है। वो आज खींचा जाएगा। जिस सिरे से तू पकड़ेगा, वो सिरा तेरा नहीं है।
“क्या मतलब?” मैंने पूछा।
पर वो चुप हो गई। और मैं जानता था कि पूछना बेकार है।
दोपहर तीन बजे के करीब।
गली में धूप तिरछी हो चली थी। दुकान के पीछे वाले कमरे में मैंने अपने हाथ धोए। पंचर वाला टब वहीं था, उसमें पानी ठंडा नहीं था, गरम भी नहीं था, बस था। मैंने कलाई तक हाथ डाले और पानी देखता रहा। उस पानी में मेरा चेहरा दिख रहा था, और उस पर वही ग्रीस के निशान थे जो सुबह से मिटाने की कोशिश में लगे थे।
चार बजे मुझे उसके दफ़्तर में होना था। तीन सवाल मेरे साथ थे — बक्सा, चाबी, और वो काली अंगूठी।
तभी बाहर से आवाज़ आई।
पहले किसी ने कुछ फेंका। फिर कोई चिल्लाया। फिर एक आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी ने गला फाड़ दिया हो।
मैंने हाथ पोंछा और बाहर दौड़ा।
गली के मोड़ पर, पत्थर के टैंक के पास, वही मोहाने वाला पुराना नल है। वो नल जब बहता है, तो पूरी गली को पता चलता है। और आज उससे पानी ऐसे बह रहा था जैसे कोई जानबूझकर बहा रहा हो।
रमेश भाई खड़े थे, उनका मुँह लाल था और हाथ में एक उलटी बाल्टी।
“कितनी बार कहूँ?” वो चिल्ला रहे थे। “तुम्हारे बच्चे सुबह से नल खोलकर भाग जाते हैं! तीन बाल्टी भरके भी नहीं बंद करते!”
“मेरे बच्चे?” नसीम भाई सामने खड़े थे, उनकी शर्ट पर भी छींटे थे। “रमेश भाई, ये नल मैंने अपनी जेब से ठीक करवाया था। दो सौ रुपये का वॉशर, दो सौ मिस्त्री का। तुमने एक पैसा नहीं दिया!”
“और मैंने ये पक्का घेरा नहीं बनवाया तो ये नल आज तक कीचड़ में होता!” रमेश भाई ने बाल्टी नीचे पटक दी। “तुम्हें पानी की कद्र नहीं है। तुम्हारे घर में नल खुला रह जाता है और मेरे आँगन में कीचड़ भर जाता है।”
“मेरे आँगन में भी भरता है!”
“तो अपने बच्चों को सिखाओ!”
“तू मेरे बच्चों को सिखाने वाला कौन होता है?”
और फिर वो होने लगा जो गली में हर बार होता है। दो लोगों का झगड़ा धीरे-धीरे चार लोगों का हो जाता है, फिर आठ का, और फिर किसी को याद भी नहीं रहता कि पहली बात क्या थी।
एक औरत बोली, “रमेश भाई सही कह रहे हैं, कल मेरा भी आँगन भर गया था।”
दूसरे ने कहा, “नसीम भाई ने ही तो मिस्त्री को बुलाया था, हम सबने देखा।”
“देखा तो हमने यह भी है कि इस नल पर कब्ज़ा किसका है।”
“किसका कब्ज़ा? ये सरकारी नल है!”
“सरकारी चीज़ पर सबका हक़ है, पर मरम्मत का पैसा एक का!”
मैं बीच में पहुँचा। भीड़ दो हिस्सों में बँट चुकी थी, जैसे किसी ने गली के बीच चाक से लकीर खींच दी हो। मैंने हाथ उठाया।
“रुको,” मैंने कहा। “रुको, भाई, एक मिनट रुको।”
एक आवाज़ आई। पीछे से, भीड़ में से, किसी ने कहा — और उस आवाज़ में वो ज़हर था जो आज सुबह चबूतरी पर नहीं था।
“सारी गड़बड़ इसी की वजह से है।”
मैंने पीछे देखा।
“किसकी?”
“तेरी,” आवाज़ आई। “तूने साहब को गली में बुलाया। तूने उनकी गाड़ी यहाँ खड़ी करवाई। तेरे कारण आज हर आदमी के घर में सवाल है।”
कुछ लोग चुप हो गए। कुछ ने सिर हिलाया। और मैं वहीं खड़ा रह गया, क्योंकि वो आदमी सच कह रहा था, बस आधा सच कह रहा था — और आधा सच कभी-कभी पूरे झूठ से ज़्यादा भारी होता है।
मेरे अंदर से एक आवाज़ आई कि बोल, कह दे कि साहब ने मुझे बुलाया, मैंने नहीं बुलाया। बोल दे। पर मैंने मुँह नहीं खोला। क्योंकि सभा में मैंने खुद कहा था — किसी पर ज़ोर नहीं।
तभी किसी ने मेरी कमीज़ खींची। टिंकू था। उसका चेहरा लाल था और वो हाँफ रहा था, जैसे दौड़कर आया हो।
“उस्ताद,” उसने कहा। “उस्ताद!”
“बाद में, टिंकू,” मैंने कहा।
“नहीं, सुन!” उसने फिर खींचा। “नल के पास नीली शर्ट वाला आदमी ईंट रखकर गया था।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“कब?”
“थोड़ी देर पहले,” उसने कहा। “मैं छत पर था। वो आया, कुछ रखा, और चला गया। मैंने सोचा कि तेरे लिए काम की बात है।”
“कहाँ रखी?” मैंने पूछा।
“नल के नीचे,” टिंकू ने कहा। “पाइप के मुँह के पास।”
मैंने भीड़ में देखा। लोग अब भी चिल्ला रहे थे। मैंने हाथ उठाकर कहा, “टिंकू कुछ कह रहा है” — पर किसी ने नहीं सुना। रमेश भाई की आवाज़ नसीम भाई की आवाज़ पर चढ़ रही थी और दोनों के बीच एक औरत की आवाज़ घुल गई थी।
तो मैं चुपचाप नल के पास गया।
मैंने झुककर देखा।
पाइप के मुँह के नीचे, पक्के घेरे के किनारे पर, एक नई लाल ईंट रखी थी। उस पर धूल थी, पर ईंट के कोने अभी टूटे नहीं थे — ईंट कल की थी। और वो इस तरह तिरछी रखी थी कि जो पानी ऊपर से गिरे, वो सीधे नाली में न जाए, बल्कि उछलकर बाहर गली में फैले।
यानी वो ईंट पानी रोकने के लिए नहीं रखी गई थी। वो पानी फैलाने के लिए रखी गई थी।
मैंने वो ईंट उठाई। पानी का रुख बदला और सीधे नाली की तरफ़ गिरने लगा।
मैंने जेब से घंटी निकाली। मैंने उसे हथेली में लिया, और मेरे होंठ सिर्फ़ इतना बोले —
“सच क्या है?”
घंटी ठंडी थी। फिर उसमें से एक फुसफुसाहट आई, छोटी, दो टुकड़ों में।
दोनों के पास आधा सच है।
फिर, थोड़ी देर बाद।
ईंट नई है।
मैंने ईंट को ऊपर उठाया। भीड़ के कुछ लोगों ने मेरी तरफ़ देखा।
“ये ईंट किसने रखी?” मैंने पूछा।
कोई नहीं बोला।
“मैं पूछ रहा हूँ,” मैंने कहा, और अपनी आवाज़ थोड़ी ऊँची की। “ये नई ईंट पाइप के नीचे किसने रखी? किसने पानी का रुख बदला?”
भीड़ में कुछ लोग एक-दूसरे को देखने लगे। और तभी एक बच्चे की आवाज़ आई — रफ़ीक़ था, छोटा, जो हमेशा भीड़ में खो जाता है।
“नीली शर्ट वाला,” उसने कहा। “वो आया था। मैं उसे जानता नहीं।”
“कब?”
“तुम्हारे हाथ धोने से पहले,” रफ़ीक़ ने कहा।
मेरे हाथ धोने से पहले। यानी मैं जब टब पर था, ठीक तभी।
रमेश भाई ने मेरी तरफ़ देखा। उनका चेहरा अब भी लाल था, पर उनकी आवाज़ थोड़ी धीमी हुई।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “इससे क्या होता है? ईंट रखी थी तो रखी थी। बच्चे पानी बर्बाद करते हैं, ये सच है।”
“नसीम भाई ने मरम्मत करवाई थी,” मैंने कहा, “ये भी सच है।”
“तो?”
“तो,” मैंने कहा, “दोनों सच हैं। और दोनों सच होने के बाद भी तुम दोनों आमने-सामने खड़े हो। ये मेरा सवाल है।”
नसीम भाई ने अपना सिर झुका लिया।
“मुझे लगा वो मुझे ही दोष दे रहे हैं,” उन्होंने धीरे से कहा। “हर बार मुझे ही दोष देते हैं।”
“क्योंकि हर बार तुम्हारा बच्चा नल खुला छोड़ जाता है,” रमेश भाई ने कहा, पर अब उसमें वो ज़हर नहीं था।
“तो बोलने की जगह बंद करने की चीज़ लगा दो,” शबनम आपा ने कहा।
वो गुमटी से बाहर आ चुकी थीं, हाथ में वही लोहे की चिमटी, और चिमटी अभी गरम थी। वो भीड़ के बीच में आईं और उन्होंने चिमटी पीतल की थाली पर पटक दी। टन्न की आवाज़ से भीड़ एक कदम पीछे हट गई।
“अब सुनो सब,” उन्होंने कहा। “ये नल मेरी गुमटी से तीन कदम है। मैं रोज़ सुबह देखती हूँ कि कौन पानी भरता है और कौन भरकर छोड़ जाता है। आज मैंने इस नल पर नीली शर्ट वाला आदमी देखा।”
भीड़ में सन्नाटा छा गया।
“क्यों नहीं बोलीं?” रमेश भाई ने पूछा।
“क्योंकि मैं तुम दोनों को लड़ते देख रही थी,” शबनम आपा ने कहा, “और मुझे लगा कि पहले तुम दोनों थको, फिर मैं बोलूँ। पर तुम दोनों थकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।”
मीरा ने अपना कैमरा निकाल लिया था। उसने तिपाई नहीं लगाई, बस कैमरा हाथ में उठाया और लाल बत्ती जल गई।
और फिर वो हुआ जो मुझे डर था।
भीड़ का रुख मेरी तरफ़ नहीं, मीरा की तरफ़ मुड़ गया।
“कैमरा बंद करो!”
“इसे यहाँ क्यों बुलाया?”
“ये सब बाहर ले जाएगी, फिर हमारा नाम आएगा!”
“मेरा चेहरा मत लो!”
मीरा ने कैमरा नीचे नहीं किया। उसने सिर्फ़ इतना कहा —
“मैं तुम्हारा चेहरा नहीं ले रही। मैं उस ईंट को ले रही हूँ।”
और यही बात उस औरत में थी जो मुझे सबसे ज़्यादा पसंद थी। वो कभी भीड़ से नहीं डरती थी, बस भीड़ को गुस्सा दिलाने का तरीक़ा जानती थी, और आज उसने वो तरीक़ा जानबूझकर नहीं अपनाया।
दुबे अंकल अपनी कुर्सी से उठे। वो धीरे उठे, क्योंकि उनकी कमर में दर्द था, पर उठे। और वो सीधे गली के मुँह की तरफ़ देखने लगे।
मैंने भी उसी तरफ़ देखा।
गली के मुँह पर कुछ नहीं था। बस धूप थी, और धूल, और दूर सड़क पर से गुज़रती एक रिक्शा।
पर दुबे अंकल का चेहरा कह रहा था कि वहाँ कुछ है। या कुछ आने वाला है।
“दुबे अंकल?” मैंने धीरे से कहा।
“कुछ नहीं,” उन्होंने कहा। “बस देख रहा हूँ।”
वो बैठ गए, पर उन्होंने अपनी कुर्सी गली के मुँह की तरफ़ घुमा ली। यह छोटी हरकत थी, पर मैं जानता था कि दुबे अंकल बिना वजह कुछ नहीं करते।
मैंने ईंट नीचे रख दी और अपने हाथ पोंछे।
“सुनो,” मैंने कहा, और इस बार मेरी आवाज़ में वो चीज़ थी जो सभा में नहीं थी — थकान। “आज शाम चार बजे मैं उस आदमी से मिलने जा रहा हूँ। तुम सब यहाँ हो। अगर मैं शाम छह बजे तक न लौटूँ, तो ये गली अपने आप कुछ नहीं करेगी। तुम सब मिलकर कुछ करोगे।”
“क्या करेंगे?” किसी ने पूछा।
“मुझे नहीं पता,” मैंने सच कहा। “पर जब तुम सब मिलकर सोचोगे, तो पता चल जाएगा।”
मैं मुड़ा, ताकि दुकान की तरफ़ जाऊँ और अपनी कमीज़ बदल लूँ। चार बजे के लिए मेरे पास एक ही साफ़ कमीज़ थी, और वो भी उतनी ही साफ़ थी जितनी एक मिस्त्री की कमीज़ हो सकती है।
और तभी रमेश भाई ने वो कहा।
मुझे नहीं पता कि उन्होंने क्यों कहा। शायद इसलिए कि उनका गुस्सा अभी खत्म नहीं हुआ था और उसे किसी पर निकालना था। शायद इसलिए कि भीड़ में किसी ने उनके कान में कुछ कहा था। शायद सिर्फ़ इसलिए कि जब आदमी डरता है, तो वो सबसे कमज़ोर आदमी पर उँगली उठाता है।
उन्होंने उँगली उठाई। और वो उँगली मेरी तरफ़ नहीं थी।
वो पीछे की तरफ़ थी, जहाँ ज़मीन पर, चबूतरी से थोड़ी दूर, मेरे पापा बैठे थे।
“पूछो इनसे!” रमेश भाई ने कहा, और उनकी आवाज़ भीड़ के ऊपर चली गई। “पूछो इनसे कि इन्होंने किसके काग़ज़ पर अंगूठा लगाया था! जो आदमी अंगूठा लगाता है, वही गली बेचता है! बाकी सब तो बहाने हैं!”
और गली चुप हो गई।
पूरी गली। एक साथ। जैसे किसी ने आवाज़ का बटन दबा दिया हो।
मैंने पीछे देखा।
पापा जम गए थे। वो वैसे ही बैठे थे, हाथ घुटनों पर, पर उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। ऐसा सफ़ेद जैसा मैंने उनका चेहरा कभी नहीं देखा था। उनके होंठ हिले, पर कोई आवाज़ नहीं निकली। उनकी उँगलियाँ घुटनों पर कस गईं, और मैंने देखा कि उनका एक हाथ धीरे-धीरे उस जगह पर गया जहाँ उनकी कमीज़ के नीचे, बाएँ हाथ पर, वो सफ़ेद निशान है।
उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा। उन्होंने किसी की तरफ़ नहीं देखा। वो बस वहीं बैठे रहे, और लगा जैसे पूरी गली उनके ऊपर झुक आई है।
धूप अब भी वैसी ही थी। पीपल के पत्ते अब भी हिल रहे थे। पानी अब भी नाली में गिर रहा था।
पर मेरे कान में सिर्फ़ एक आवाज़ थी — घंटी की, बहुत धीमी, जैसे दूर से आ रही हो।
अब समझा? यही धागा था।
मैंने अपनी मुट्ठी कस ली। मेरी जेब में घंटी ठंडी थी, और मेरे हाथ में वो लाल ईंट अब भी भारी लग रही थी, जैसे उसका वज़न ईंट का नहीं, किसी और चीज़ का हो।
मैंने पापा की तरफ़ देखा और धीरे से कहा, इतना धीरे कि सिर्फ़ वो सुन सकें —
“पापा।”
उन्होंने सिर नहीं उठाया।
और मैं वहीं खड़ा रह गया, चार बजे से एक घंटा पहले, गली के बीच, एक ईंट हाथ में, और यह जानकर कि आज शाम उस सफ़ेद इमारत में मुझे जिस चीज़ का जवाब देना है, वो काग़ज़ नहीं है।
वो ये चुप्पी है।
॥
गली में जो सन्नाटा था, वो आवाज़ से ज़्यादा भारी था।
रमेश भाई की उँगली अब भी हवा में थी। वो उँगली काँप रही थी, पर वो नीचे नहीं आ रही थी। आदमी जब गुस्से में होता है तो उसकी उँगली उसके दिमाग़ से पहले थकती है। और यहाँ तो दिमाग़ भी थका हुआ लग रहा था।
मेरे पापा वहीं बैठे थे, ज़मीन पर, चबूतरी से थोड़ी दूर। उनका चेहरा सफ़ेद। उनका हाथ बाएँ हाथ की उस जगह पर, जहाँ कमीज़ के नीचे वो सफ़ेद निशान है।
मेरे अंदर कुछ ऐसा उठा जो बहुत दिनों से बैठा हुआ था। गुस्सा नहीं, गुस्से से भी बड़ा कुछ। जैसे कोई मेरे सीने के अंदर से मुट्ठी भरकर मेरी ज़ुबान पकड़ लेना चाहता हो और कहना चाहता हो — चिल्ला, अंकुश, चिल्ला। बोल, तेरे पापा ने अंगूठा लगाया था, हाँ लगाया था, पर तू जानता है क्यों लगाया था? तू जानता है कि उस वक़्त माँ के सिर पर क्या बीत रही थी?
और मैं चिल्ला नहीं रहा था।
मैं जानता हूँ ये कैसे होता है। गुस्सा जब आता है, तो वो दो रास्ते चुनता है। एक, तुम सामने वाले की हड्डी तोड़ देते हो। दो, तुम अपनी हड्डी अंदर तोड़ देते हो। मैंने दूसरा चुना। जीभ को दाँतों के नीचे दबाया, और उस दर्द पर ध्यान दिया।
दर्द ने मेरा दिमाग़ ठंडा कर दिया।
मैंने ईंट नीचे रखी। धीरे से। इतनी देर में मेरे हाथ पर उसकी मिट्टी की धूल जम गई थी। मैंने हथेलियाँ आपस में रगड़ीं और गली की तरफ़ देखा।
सब वहीं खड़े थे। शबनम आपा के हाथ में लोहे की चिमटी थी और उनका मुँह खुला था, जो उनके जैसी औरत के लिए बहुत बड़ी बात थी। टिंकू पीपल की जड़ से चिपका खड़ा था, आँखें बड़ी। रफ़ीक़ और सानिया मेरी दुकान के शटर के पास। मीरा का कैमरा अब भी चल रहा था, कैमरा नहीं, उसकी उँगलियाँ चल रही थीं।
दुबे अंकल अपनी कुर्सी पर बैठे थे और उन्होंने अपना सिर एक इंच भी नहीं हिलाया था।
और भीड़ के पीछे, उस्ताद अली बक्श खड़े थे। उनका मोटा चश्मा धूप में चमक रहा था और उनके होंठ एक पतली लकीर की तरह सीधे थे। उन्होंने मुझे देखा, और बहुत धीरे से सिर हिलाया।
बस, इतना ही।
कभी-कभी एक बूढ़े आदमी का एक इशारा सौ लोगों की तालियों से ज़्यादा काम कर जाता है।
मैंने अपनी कमीज़ के पल्ले से हाथ पोंछे और रमेश भाई की तरफ़ मुड़ा। मेरी आवाज़ शांत थी। शांत नहीं, शांत दिख रही थी। फ़र्क़ होता है, पर सुनने वाले को क्या फ़र्क़ पड़ता है।
“रमेश भाई,” मैंने कहा। “ये ईंट तुमने देखी?”
“कौन सी ईंट?” उन्होंने झल्लाकर कहा, पर आवाज़ पहले से हल्की थी।
“ये वाली।” मैंने उँगली से उसे दिखाया। “जो अभी मेरे हाथ में थी। नई है। लाल है। और पाइप के नीचे तिरछी रखी थी, ताकि पानी नाली की जगह गली में गिरे।”
रमेश भाई ने देखा। उनका गला हिला।
“मुझे क्या पता,” वो बोले। “मैं तो अपनी बीवी के लिए पानी भर रहा था। मुझे क्या पता कौन ईंट रखता है।”
“मुझे भी नहीं पता,” मैंने कहा। “पर एक बात पता है। ये ईंट बाहर से आई है। गली में किसी के पास नई लाल ईंट नहीं है, सिवाय उस आदमी के जो पीछे प्लॉट पर मिट्टी डाल रहा है।”
भीड़ में पहली बार हलचल हुई।
“तो झगड़ा ईंट का नहीं है,” मैंने कहा। “झगड़ा पानी का भी नहीं है। भाई, झगड़ा किसी और चीज़ का है, और वो चीज़ न तुम्हारे पास है, न नसीम भाई के पास।”
“तो किसके पास है?” रमेश भाई ने पूछा।
“उसके पास,” मैंने कहा, “जिसने ये ईंट रखवाई।”
फिर मैंने गली की तरफ़ हाथ उठाया।
“कोई नहीं जाएगा। कोई नहीं लड़ेगा। आज गली में झगड़ा नहीं बिकेगा।”
और मैं अंदर गया।
मेरी दुकान में कोने में दो स्टूल रखे थे। लोहे के नहीं, लकड़ी के, जिनके पाए घिस गए थे और जिन पर बैठने से पहले आदमी सोचता है कि कहीं ये बैठते ही न चटक जाए। उन दोनों को उठाकर बाहर लाया और दुकान के सामने, धूप में, आमने-सामने रख दिया।
पूरी गली ने देखा और मुझे लगा कि कुछ लोगों ने साँस रोक ली।
“रमेश भाई, यहाँ आइए,” मैंने कहा।
“मैं नहीं बैठूँगा,” वो बोले।
“आप बैठिए,” मैंने कहा। “बस बैठिए। मैं कुछ नहीं कहूँगा। न सीख दूँगा, न उपदेश। थोड़ी देर बस आमने-सामने बैठिए।”
“क्यों?”
“क्योंकि जब आदमी खड़ा होता है, तब उसे भीड़ दिखती है,” मैंने कहा। “बैठकर उसे सामने वाला दिखता है।”
वो झिझके। उन्होंने भीड़ की तरफ़ देखा। सब चुप थे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, मैं चुप था। फिर वो आए और बैठ गए। स्टूल ने चरचराकर कहा — बैठा, पर भारी है।
“नसीम भाई,” मैंने कहा।
नसीम भाई पहले से ही पास खड़े थे, हाथ में गीला तौलिया। वो बिना कुछ कहे आए और दूसरे स्टूल पर बैठ गए।
दोनों आमने-सामने।
बीच में कोई मेज़ नहीं, कोई काग़ज़ नहीं, कोई वकील नहीं। बस दो आदमी, दो घुटने, और उनके बीच में धूप की एक पतली पट्टी, जो पीपल की शाखाओं से छनकर आ रही थी।
मैं उनके बगल में बैठ गया। ज़मीन पर। पालथी मारकर।
और मैंने देखा कि मेरे पीछे खड़ी गली भी धीरे-धीरे बैठने लगी। पहले शबनम आपा अपनी गुमटी की बेंच पर बैठीं और चिमटी पास रख दी। फिर भोला भाई दुकान के चबूतरे पर। फिर टिंकू मेरे पीछे, ज़मीन पर। फिर वो बूढ़े काका जो सुबह चना खाते हैं। फिर दुबे अंकल, जिन्होंने अपनी कुर्सी घुमाकर मुझे देखा।
और मेरे पापा। वो नहीं हिले। वो वहीं बैठे रहे। पर उन्होंने अपना हाथ उस निशान से हटा लिया था।
“रमेश भाई,” मैंने कहा। “आप पानी भर रहे थे। रोज़ भरते हैं?”
“रोज़,” उन्होंने कहा। “सुबह।”
“रोज़ कितना?”
वो चुप हो गए।
“मैं बुरा नहीं पूछ रहा,” मैंने कहा। “मैं सिर्फ़ पूछ रहा हूँ।”
उन्होंने अपने घुटनों की तरफ़ देखा। उनके हाथों की उँगलियाँ आपस में उलझ गईं, जैसे कोई गाँठ खोलनी हो और हाथ कह रहे हों — नहीं, ये गाँठ नहीं खुलेगी।
“तीन बाल्टी,” उन्होंने कहा। “कभी चार।”
गली में कोई नहीं बोला। पर मैं जानता हूँ कि हर आदमी के दिमाग़ में एक ही सवाल घूम रहा था — दो जान के घर में तीन बाल्टी?
“हम्म,” मैंने कहा। “तीन बाल्टी। मेरे घर में माँ, पापा, काजल और मैं, चार जान, और ढाई बाल्टी।”
“मेरी बीवी को ज़्यादा पानी चाहिए,” उन्होंने कहा।
ये वाक्य उन्होंने बहुत धीरे कहा। इतना धीरे कि शायद आधी गली ने सुना, आधी ने नहीं। पर जिसने सुना, उसने कान आगे कर लिया।
“क्यों?” मैंने पूछा।
“डॉक्टर ने कहा है,” उन्होंने कहा। “किडनी में पत्थर है। दो बार दवा चली, तीसरी बार ऑपरेशन की बात हो रही है। कहते हैं पानी खूब पीए, और पानी खूब पीए तो पेशाब खुलकर आए। और पेशाब खुलकर आए तो दर्द कम हो।”
उनका गला भर आया, पर उन्होंने खाँसकर उसे दबा दिया। आदमी अपनी औरत की बीमारी बताते वक़्त ज़्यादा नहीं रोता, वो सिर्फ़ ज़्यादा खाँसता है।
“तो तीन बाल्टी,” मैंने कहा।
“तीन बाल्टी पीने के लिए नहीं हैं,” उन्होंने कहा। “दो तो नहाती है। एक पीती है। कभी उलटी हो जाती है तो चार भी।”
“और ये बात आपने किसी को नहीं बताई,” मैंने कहा।
वो चुप।
“रमेश भाई,” मैंने धीरे से कहा। “मैं जानना चाहता हूँ कि किसी को क्यों नहीं बताया। क्योंकि इस गली में अगर तुमने कहा होता कि तुम्हारी औरत बीमार है, तो शबनम आपा तुम्हें अपनी गुमटी से पानी भरने देतीं, बिना एक पैसा लिए।”
शबनम आपा ने अपनी चिमटी उठाई और फिर रख दी, जैसे कह रही हों — हाँ, देती।
“मैंने सोचा,” रमेश भाई ने कहा, और उनकी आवाज़ अब टूट रही थी, “कि सब कहेंगे — देखो, ये अपनी औरत के लिए पूरी गली का पानी पी जाता है। मैंने सोचा, कोई पूछेगा नहीं, कोई कहेगा नहीं, तो ठीक है। और… और जब भी कोई पूछता, मैं टाल देता।”
“और आज?”
“आज शर्म आई,” उन्होंने कहा। “और शर्म से मैंने झगड़ा बड़ा कर दिया। मुझे पता था गलती मेरी है। मैंने सोचा, पहले चिल्ला दूँ, फिर कोई पूछेगा तो सवाल नहीं उठाएगा।”
मैंने देखा कि नसीम भाई ने अपना गीला तौलिया घुटनों पर रख लिया और उनकी आँखें रमेश भाई पर टिक गईं।
“नसीम भाई,” मैंने कहा।
“मत पूछो,” वो बोले। “मत पूछो भाई, मुझे शर्म आ रही है।”
“मैं नहीं पूछूँगा,” मैंने कहा। “पर जो बात बाहर आ जाए, वो हल्की हो जाती है।”
वो एक पल चुप रहे। फिर उन्होंने तौलिया खोल दिया, जैसे कोई आदमी तौलिया खोलकर अपना हाथ खाली कर देता है।
“मैंने नल ठीक करवाया था,” उन्होंने कहा। “तीन महीने पहले। प्लंबर लाया, दो सौ अस्सी रुपये लगे। मैंने खुद नहीं कहा, शबनम आपा ने अपनी गुमटी की गली में सबको बता दिया।”
“बात सच है,” शबनम आपा ने कहा। “बताया था मैंने।”
“और बताने के बाद,” नसीम भाई ने कहा, “मुझे अच्छा लगा। बहुत अच्छा लगा। रमेश भाई और मैं पाँच साल से साथ उन्हीं चार फुट की गली में रहते हैं। पाँच साल में मुझे तारीफ़ की बात सिर्फ़ एक बार मिली — नल वाली। और वो भी बाहर से आई, खुद के लिए नहीं।”
उन्होंने रमेश भाई की तरफ़ देखा।
“तू पानी भरता था ये मुझे दिखता था। मैंने कभी पूछा नहीं। एक बार सुबह चार बजे देखा भी — तू छोटी बाल्टी लेकर खड़ा था, बारी नहीं आई थी, और तू चुप खड़ा था। मैंने सोचा, पूछने से कहीं ये झगड़ा खत्म हो जाए, और झगड़ा खत्म हो गया तो मेरी तारीफ़ का मतलब क्या रहेगा?”
“मैं तो सोचता था,” मैंने कहा, “कि लोग अपनी तारीफ़ के लिए लड़ते हैं। आप अपनी तारीफ़ के लिए झगड़ा बढ़ा रहे थे।”
“मूर्ख हूँ,” नसीम भाई ने कहा। “पचास साल का मूर्ख।”
और फिर दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।
वो देखना क्या था — तुम समझोगे नहीं। दो आदमी, पाँच साल की साझी दीवार से अलग, दो स्टूल पर आमने-सामने, और दोनों की आँखों में ये एहसास कि सामने वाला भी उतना ही बेवकूफ़ है।
रमेश भाई के होंठ पहले काँपे, फिर मुड़े।
नसीम भाई ने सिर झुकाया और उनके कंधे हिलने लगे।
फिर दोनों एक साथ हँसे।
वो हँसी अजीब थी। उसमें खुशी से ज़्यादा राहत थी। जैसे किसी ने बरसों से बंद पड़ी खिड़की खोल दी हो और कमरे में हवा आ गई हो, वो हवा जो पहले दरवाज़े के नीचे से सिर्फ़ करीने में आती थी।
रमेश भाई ने हाथ बढ़ाया।
नसीम भाई ने पकड़ा।
दोनों की हथेलियाँ एक साथ गीली थीं — एक बाल्टी से, एक तौलिये से — और ये शायद उस दिन की सबसे साफ़ चीज़ थी।
पीछे खड़ी गली वहीं बैठी थी, पर जैसे सबने एक साथ साँस छोड़ी हो।
और मेरी जेब में घंटी ने गुनगुनाया।
धीमा। मीठा। जैसे साइकिल की घंटी कभी किसी आँगन में बजी हो और हवा उस आवाज़ को पीछे से धकेल रही हो।
“बोल,” मैंने फुसफुसाकर कहा।
पानी नहीं बह रहा था। बात बह रही थी।
बस इतना और चुप।
और मुझे एहसास हुआ कि जेब में एक हल्की गर्माहट फैल रही है, वैसी गर्माहट जो अंदर से आती है, जल्दी से नहीं, धीरे-धीरे, जैसे शरीर में खून लौटता है।
बीस।
बीस और जुड़े।
मैंने अंदर ही अंदर हिसाब किया — दो स्टूल, दो आदमी, और एक ऐसी चीज़ जो पाँच साल से सड़ रही थी। बीस अंक। तंत्र ने बहुत नहीं दिया। पर तंत्र की बात है — वो देता ही कम है, क्योंकि उसे भरोसा होता है कि असली मज़ा देने में नहीं, कमाने में है।
“अब सुनो,” मैंने उठकर कहा, और अपनी आवाज़ में वही हल्का मज़ाक लौटा लाया जो मेरी कमीज़ की तरह मैला पर अपना था। “ये नल। इसके पाइप के नीचे जो ईंट है, वो गली में कोई फेंक नहीं रहा। कोई बाहर से आकर रख रहा है।”
“क्यों?” किसी ने पूछा।
“क्योंकि जब दो आदमी पानी पर लड़ रहे होते हैं,” मैंने कहा, “तब उनके बीच के रास्ते पर ईंट रखने वाले को कोई नहीं देखता। जो ईंट रखवाता है, उसका काम ही यही है — गली को ख़ुद पर नज़र रखने से रोक दे। हममें से कोई बाहर न देखे, हम बस एक-दूसरे को देखें।”
भोला भाई ने पीछे से कहा, “और जब हम एक-दूसरे को देखते रहेंगे, तब वो पीछे से…”
“तब वो पीछे से अपना काम करेगा,” मैंने कहा।
और तभी मुझे लगा कि मेरे पीछे कुछ हल्का-सा हिला।
मैं मुड़ा।
मेरे पापा उठ रहे थे। उठने में उन्हें वक़्त लगा — पचपन साल की कमर है, और ज़मीन से उठना उस उम्र में दो बार सोचकर किया जाता है। पर उन्होंने किसी का हाथ नहीं पकड़ा। उन्होंने ख़ुद उठना चुना।
और गली चुप हो गई। फिर से।
पर इस बार वो चुप्पी उस चुप्पी जैसी नहीं थी। इस बार सब देख रहे थे कि आदमी क्या कहेगा।
उन्होंने कमीज़ ठीक की। एक हाथ से बाल पीछे किए, जो उनकी आदत नहीं है। और फिर वो बोले — धीरे, रुक-रुक कर, जैसे हर शब्द उनके अंदर से निकलने के लिए अपनी जगह खोज रहा हो।
“अंगूठा मैंने लगाया था।”
किसी ने साँस नहीं ली।
“पाँच साल पहले। चंद्रेश के दफ़्तर में।” उन्होंने हाथ उठाकर अपनी बाईं हथेली दिखाई, जहाँ वो सफ़ेद निशान है — उस निशान पर उँगली रखी। “डर के मारे। मेरी औरत अस्पताल में थी, दवा के पैसे नहीं थे, और वहाँ कहा गया कि अंगूठा लगाओ तो इलाज शुरू। मैंने लगा दिया। मैंने अपने बेटे को नहीं बताया। पाँच साल अपने ही घर में डरकर चाय पीता रहा।”
वो रुके। और मैंने देखा कि उनकी आँखें, जो बहुत दिनों से किसी चीज़ पर टिकती नहीं थीं, इस वक़्त सामने खड़ी पूरी गली पर टिकी थीं।
“पर सुनो,” उन्होंने कहा, और इस बार उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मैंने उनमें पहले कभी नहीं सुना। “मेरा बेटा किसी की गली नहीं बेचेगा।”
कुछ लोगों ने अपनी आँखें झुका लीं।
“और मैं भी नहीं बेचूँगा,” उन्होंने कहा। “मैंने अंगूठा लगाया, ये मेरी ग़लती है। ग़लती है तो सज़ा भी मेरी। पर गली किसी की जागीर नहीं है, और ये काग़ज़ किसी की शर्त पर नहीं बिकेगा। न अंकुश के डर से, न मेरे डर से।”
एक पल पूरी गली स्तब्ध खड़ी रही।
फिर शबनम आपा ने अपनी गुमटी के पीछे मुँह घुमाया और अपनी साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछीं, ये कहकर कि “धुआँ लग गया।”
टिंकू ने अपनी नाक खींची और कहा कि यहाँ पीपल का बीज गिरा था, इसलिए।
भोला भाई ने अपनी जेब से वही फटा रूमाल निकाला और उसे सनी को दे दिया, और सनी ने उसे नहीं लिया, दोनों ने वही एक रूमाल पकड़े रखा, जैसे उसी में दोनों की आँखें सूख जाएँगी।
रमेश भाई, जो अब भी स्टूल पर बैठे थे, उठे और पापा के सामने आए।
“चाचा,” उन्होंने कहा, “मैंने सुबह ग़लत बोला।”
“सुबह मैंने भी ग़लती की थी,” पापा ने कहा। “पाँच साल पहले।”
“नहीं चाचा, आपने तो…”
“बेटा,” पापा ने कहा, और ये उनके मुँह से अजीब लगा, क्योंकि वो किसी को बेटा कहते नहीं हैं। “जो आदमी डरता है, वो ग़लती करता है। मैं डरा हुआ आदमी हूँ। पाँच साल से। बस आज पहली बार मैंने ये कह दिया।”
और फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
बस एक पल।
पर उस एक पल में जो था, वो मैं तुम्हें नहीं बता सकता। बता दूँ तो छोटा हो जाएगा।
मैंने सिर हिलाया। मैं कुछ बोल नहीं पाया। कभी-कभी बेटा अपने बाप के सामने खड़ा होता है और शब्द उसके गले में ही रह जाते हैं, और वही ठीक है।
और उसी वक़्त गली के मुँह पर कुछ हुआ।
पहले मैंने सुना — चार पहियों की वो आवाज़ जो धूल के ऊपर से आती है, जैसे कोई मोटी किताब मेज़ पर रखी गई हो।
फिर गाड़ी दिखी।
सफ़ेद। चमकदार। धीरे से आई और गली के मुँह पर, वहीं जहाँ नल है, उसके सामने रुक गई। इंजन बंद नहीं हुआ। गाड़ी ज़िंदा रही, जैसे कुत्ता पट्टे पर खड़ा हो।
खिड़की धीरे से नीचे आई।
अंदर रणवीर भारद्वाज बैठा था।
सफ़ेद कुर्ता। साफ़ कटा बाल। वो मुस्कुरा रहा था, पर उस मुस्कान में वो चीज़ नहीं थी जो कल गली में थी। कल वो नाटक था, कल वो भीड़ के लिए था। आज वो अकेला था, गाड़ी में, और उसके चेहरे पर वो मुस्कान थी जो आदमी अपने आप को दर्पण में देता है।
और उसने ताली बजाई।
धीरे-धीरे।
एक। दो। तीन।
जैसे कोई नाटक के अंत में ताली बजाता है, पर इतनी धीमी कि सिर्फ़ उसका मज़ाक समझ आए, तारीफ़ नहीं।
गली ने उसकी तरफ़ देखा। मैंने भी।
“बहुत अच्छा,” रणवीर ने कहा, और उसकी आवाज़ गाड़ी की खिड़की से बाहर आकर धूप में फैल गई। “सच में। दो स्टूल। दो आदमी। और पानी का झगड़ा… अंकुश भाई, आप तो असली कारीगर निकले।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
“पर एक बात,” उसने कहा। “आप जोड़ते बहुत अच्छे हैं। ये गली आपकी उँगलियों में आ गई है। मुझे अच्छा लगा।”
उसने खिड़की के पास अपनी उँगली टेबल पर रखी, जैसे कोई काग़ज़ दबा रहा हो जो वहाँ नहीं था।
फिर उसने पीछे मुड़कर कुछ कहा।
सफ़ेद गाड़ी का पिछला दरवाज़ा खुला और बबलू उतरा।
आज उसके गले में सोने की चेन नहीं थी। पानदान नहीं था। वो सिर्फ़ काली शर्ट में था और उसके चेहरे पर वो थकान थी जो कल रात से उतर नहीं पाई थी। वो गली में आया — धीरे, बिना घमंड के, बिना धमकी के, जैसे कोई आदमी माफ़ी माँगने आ रहा हो।
वो मेरे पास आया और रुक गया।
“अंकुश भाई,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो लहजा नहीं था जो सुबह था। “साहब कह रहे हैं…”
वो रुका। उसने एक बार पापा की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
“साहब कह रहे हैं कि आप अकेले न आएँ,” उसने कहा। “पापा के साथ आएँ। गाड़ी तक।”
पूरी गली ने सुना।
“साहब दोनों से बात करना चाहते हैं,” बबलू ने कहा। “बाप से भी। बेटे से भी।”
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
वो अब भी वहीं खड़े थे, जहाँ उन्होंने वो बात कही थी। उनका चेहरा अब सफ़ेद नहीं था। उनके हाथ अब कमीज़ के नीचे उस निशान पर नहीं थे।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आँखों में वो सवाल था जो पापा कभी ज़ुबान से नहीं पूछते — बेटा, अब क्या?
मेरी जेब में घंटी ठंडी थी, बिल्कुल ठंडी, जैसे किसी ने उसे बर्फ़ में रख दिया हो।
और फिर उसने कहा, बहुत धीमा, सिर्फ़ मेरे लिए —
अब दो नहीं। अब तीन।
मैंने गाड़ी की तरफ़ देखा। रणवीर अब भी मुस्कुरा रहा था, और उसकी उँगली अब भी उस खाली टेबल पर दबी हुई थी, जहाँ कोई काग़ज़ नहीं था।
और मुझे पहली बार लगा कि वो काग़ज़ नहीं दबा रहा था।
वो अपना हाथ रोक रहा था।
॥
पापा ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो सवाल था जो वो कभी ज़ुबान से नहीं पूछते — बेटा, अब क्या?
मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाया और उनका हाथ पकड़ लिया।
उनका हाथ ठंडा था। पर काँप नहीं रहा था।
यही फ़र्क़ था आज। पाँच साल से वो हाथ अपने आप काँपता रहा था, किसी न किसी कोने में, किसी न किसी रात में। आज नहीं काँप रहा था। जैसे उस हाथ ने जो बोझ पाँच साल से उठाया था, वो बोझ अब शब्दों में बदल चुका था और शब्द हल्के होते हैं।
“चलिए,” मैंने कहा।
“अंकुश…”
पीछे से मीरा की आवाज़ आई। वो कुछ कहना चाहती थी। शायद यह कि अकेले मत जाओ, शायद यह कि कैमरा साथ ले लो, शायद यह कि पापा को तुम्हारे पीछे खड़ा मत करो।
पर मैंने पीछे मुड़कर उसकी तरफ़ देखा। और सिर्फ़ सिर हिला दिया।
इतना सिर हिलाने में एक पूरी बात चली गई — मैं ठीक हूँ।
मीरा रुक गई। उसने कैमरा नीचे कर दिया। ये उसका सबसे बड़ा भरोसा था। जब वो कैमरा नीचे करती थी, तो मतलब वो मान रही थी कि अब जो होगा, वो रिकॉर्ड नहीं, जिया जाएगा।
और फिर हम चले।
गली चुप थी।
सच में चुप। उस गली में जहाँ सुबह पाँच बजे से रात ग्यारह बजे तक कोई न कोई चीज़ बजती रहती है — शबनम आपा की चिमटी, भोला भाई की प्रेस, उस्ताद की सिलाई मशीन, बच्चों की साइकिल की घंटी, दुबे अंकल की कुर्सी का पैर — वहाँ अचानक इतनी चुप्पी थी कि मुझे अपने ही जूतों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
धूल। मेरे जूते। उसका फ़र्श।
तीन आवाज़ें, और तीनों अलग-अलग।
मैं गाड़ी की तरफ़ बढ़ा। दस कदम रहे होंगे, शायद बारह।
पहले कदम पर मैंने टिंकू को देखा। वो मेरे पीछे आ रहा था, दो कदम पीछे, जैसे कोई छोटा कुत्ता आता है — साथ, पर पीछे। मैंने हाथ उठाकर उसे रोका। वो रुक गया, पर उसकी आँखें नहीं रुकीं।
दूसरे कदम पर दुबे अंकल। वो अपनी कुर्सी से उठकर सीधे खड़े हो गए थे। उन्होंने अपनी नीली शर्ट का कॉलर ठीक किया। पच्चीस साल की नौकरी में शायद यही आदत बची थी — जब बड़ा आदमी सामने हो, तो कॉलर ठीक कर लो।
तीसरे कदम पर उस्ताद अली बक्श। दुकान के दरवाज़े पर खड़े, हाथ में कैंची, चश्मा उतारकर कमीज़ में लटका हुआ। मुझे लगा वो कुछ कहेंगे। उन्होंने कुछ नहीं कहा। सिर्फ़ कैंची को उँगली पर घुमाया, जैसे कोई तराज़ू का पलड़ा घुमा रहा हो।
और चौथे कदम पर शबनम आपा। उनकी चिमटी हाथ में थी, पर वो पीतल की थाली पर नहीं गिरी। वो हवा में रुकी रही। पूरी गली जानती है कि शबनम आपा की चिमटी जब हवा में रुकती है, तो मतलब वो सब सुन रही है और कुछ भी नहीं छोड़ेगी।
और फिर मैं गाड़ी के पास पहुँचा।
गाड़ी में से ठंडी हवा आ रही थी।
समझ रहे हो न? गली में चालीस डिग्री की धूप थी और उस गाड़ी की खिड़की से ऐसी हवा आ रही थी जैसे किसी पहाड़ी दुकान का दरवाज़ा खुल गया हो।
और खुशबू। गाड़ी के अंदर एक खुशबू थी — ठंडी, मीठी, जैसे किसी ने मिठाई में इत्र डाल दिया हो। मुझे उस खुशबू से घबराहट हुई। मुझे अपनी दुकान की ग्रीस, पंचर वाले टब और पुराने रबर की बदबू अच्छी लगी। वो ईमानदार बदबू थी।
रणवीर भारद्वाज मुस्कुरा रहा था।
मैंने उसकी गाड़ी देखी। सफ़ेद कालीन। सफ़ेद सीट। और सीट पर एक फ़ाइल रखी थी। पीली फ़ाइल। वही फ़ाइल जो पिछली बार एक सफ़ेद लिफ़ाफ़े में मेरी मेज़ पर आई थी।
“आइए, अंकुश भाई,” उसने कहा। आवाज़ में वो मिठास थी जो पहले भी थी, पर आज उसमें एक चीज़ और थी। भूख नहीं। उत्सुकता। जैसे कोई बिल्ली चूहे को दूर से देख रही हो, और अभी पंजा नहीं मार रही, बस देख रही हो कि चूहा खुद किधर भागेगा।
“पापा भी आएँ,” उसने कहा। “डरिए मत, शंकर जी। गाड़ी में बैठने की जगह है।”
मैंने पापा की तरफ़ देखा। उन्होंने मेरा हाथ नहीं छोड़ा।
“हम यहीं खड़े हैं,” मैंने कहा। “गाड़ी की ज़रूरत नहीं।”
रणवीर हँसा। छोटी हँसी। “ठीक है। गाड़ी में आना मेरी आदत है, पर मैं मजबूरी नहीं करता।”
उसने खिड़की के पास अपनी उँगली उठाई और गली की तरफ़ इशारा किया — नल, पक्का घेरा, दो स्टूल, रमेश का गीला तौलिया, नसीम की बाल्टी।
“आज मैंने आपको गली जोड़ते देखा,” उसने कहा। “सच में। मैं गाड़ी में बैठा था, खिड़की से देख रहा था। दो स्टूल। दो आदमी। और एक ईंट।”
वो रुका। उसने अपनी उँगली हवा में घुमाई, जैसे कोई मकड़ी का जाला बना रहा हो।
“ईंट,” उसने दोहराया। “आपने वो ईंट उठाई। उसे नीचे रखा। और उस एक ईंट से दो घर बच गए। मैं क्या दूँ, अंकुश भाई? मेरे पास मशीनें हैं, सीमेंट है, काग़ज़ हैं, आदमी हैं। पर आज जो आपने किया, वो मेरे पास नहीं है।”
उसने अपनी उँगली सीट पर रखी, उस पीली फ़ाइल के ऊपर।
“यही कला मुझे अपने दफ़्तार में चाहिए।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
“मैं गंभीर हूँ,” उसने कहा। “कल मैंने आपको नौकरी की बात कही थी, और आपने मना कर दिया। मुझे बुरा लगा था। आज मैं वो बात फिर कह रहा हूँ, पर अलग तरीक़े से। अंकुश भाई, आप गली के मिस्त्री नहीं हैं। आप आदमी के मिस्त्री हैं। और ऐसे आदमी मेरे दफ़्तार में बैठें, तो मेरे सौदे आसान हो जाएँ।”
“कैसे?” मैंने पूछा। मेरी आवाज़ सुनकर मुझे खुद हैरानी हुई। वो शांत थी।
“क्योंकि जहाँ लोग लड़ते हैं, वहाँ काग़ज़ सस्ता होता है,” उसने कहा, बिल्कुल सीधे। “और आप लोगों को लड़ने से रोक देते हैं। यह मेरे लिए… कीमती है।”
उसने फ़ाइल उठाई। बहुत धीरे से, जैसे कोई फूल उठाता हो।
“माँ की फाइल,” उसने कहा। “मैंने बनवाई है। अच्छे आदमी से। जो चार्ज लेता है, चार काग़ज़ बनाता है। यहाँ छह काग़ज़ हैं। जाँचें, दवाएँ, तारीख़ें, और आगे का हिसाब।”
उसने फ़ाइल खोली। पन्ने पलटे। मैंने देखा — माँ के हाथों की तस्वीर। सफ़ेद चादर। बंद आँखें। साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ।
मेरा पेट कड़ा हो गया।
“ये सिर्फ़ काग़ज़ नहीं है,” उसने कहा। “ये हिसाब है। जो आदमी इलाज का असली हिसाब जानता है, वो रास्ता भी जानता है।”
“और आप रास्ता दे रहे हैं,” मैंने कहा।
“मैं रास्ता दे रहा हूँ,” उसने कहा। “साथ में नौकरी। महीने का पैसा। फ्लैट। गाड़ी। और माँ के इलाज का पूरा हिसाब। आपको सिर्फ़ हाँ कहना है।”
उसने फ़ाइल बंद कर दी। क्लिक की आवाज़ आई। उस क्लिक में एक चीज़ थी जो मुझे चुभी।
मैंने पापा का हाथ थोड़ा कसकर पकड़ा।
“साहब,” मैंने कहा।
“हाँ।”
“आपने अभी कहा कि जहाँ लोग लड़ते हैं, वहाँ काग़ज़ सस्ता होता है।”
“कहा।”
“तो आप यह भी जानते होंगे कि जहाँ लोगों के दर्द का हिसाब रखा जाता है, वहाँ आदमी सस्ता हो जाता है।”
रणवीर की मुस्कान हिली नहीं। पर उसकी आँखें हिलीं। बहुत थोड़ा। जैसे तेल में एक बूँद पानी गिर जाए और तुरंत मिल जाए।
“मैं लोगों के दर्द का तराज़ू नहीं बनूँगा,” मैंने कहा। “मेरे पास जो है, वो थोड़ा है। एक दुकान। दो स्टूल। एक घंटी। और एक टिंकू, जो हर बात में सवाल पूछता है।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। सीधे।
“थोड़ा है, साहब। पर मेरा है। और मेरा सबसे बड़ा हिसाब यही है कि रात को मैं अपने बिस्तर पर लेटकर सो जाता हूँ। आप सो पाते हैं?”
एक सेकंड की चुप्पी आई।
उस चुप्पी में मुझे शबनम आपा की चिमटी की आवाज़ आई — क्लिक। वो थाली पर रखी गई। जैसे किसी ने फ़ैसला सुना दिया हो।
रणवीर ने फ़ाइल अपनी तरफ़ खींच ली। “अंकुश भाई, माँ का इलाज…”
“माँ का इलाज मैं चलाऊँगा,” मैंने कहा। “और अगर उसके लिए मुझे झूठ बोलना पड़े, तो वो भी नहीं करूँगा। आज सुबह माँ ने अस्पताल में खुद मुझे यही कहा है। मेरे कहने से नहीं, अपने मुँह से।”
अब रणवीर ने गाड़ी की सीट पर हाथ रखा। मैंने देखा — उसकी उँगली में वो काली अंगूठी थी। लोहे जैसी, मोटी, बिना किसी नक्काशी के।
और उसने पापा की तरफ़ देखा।
“शंकर जी,” उसने कहा। “आप कुछ कहेंगे?”
पापा ने मेरा हाथ छोड़ा।
मेरे अंदर कुछ सिकुड़ा। डर नहीं, कुछ और। जैसे बच्चा होने पर अब्बू का हाथ छूट जाए और आपको पता न हो कि अब वो क्या करेंगे।
पापा आगे बढ़े। एक कदम। दो कदम। वो गाड़ी की खिड़की के बिल्कुल सामने आकर खड़े हो गए।
और उन्होंने उसकी आँखों में देखा।
पाँच साल बाद। आज सुबह गली में भी उन्होंने उसकी आँखों में देखा था, पर वो भीड़ में था, वहाँ कुछ छुपाया जा सकता था। यहाँ भीड़ नहीं थी। यहाँ सिर्फ़ एक खिड़की थी, और उस खिड़की के अंदर एक आदमी बैठा था जो उन्हें पाँच साल से जानता था।
और पापा ने कहा। बहुत छोटा। बहुत धीमा। पर इतना साफ़ कि गली के मुँह तक गया।
“साहब, हमारी गली में सब ठीक है।”
रणवीर रुका।
“बेटा जो करेगा, ठीक करेगा,” पापा ने कहा। “और मैं उसके साथ हूँ।”
रुक गए। बोझ उतर गया। पूरा नहीं, थोड़ा — पर इतना कि वो सीधे खड़े रह सकें। पाँच साल से जो कमर झुकी हुई थी, वो आज थोड़ी सीधी थी।
मुझे लगा रणवीर कुछ कहेगा। कोई तीखी बात, कोई हँसी, कोई उपकार का लिहाज़।
उसने कुछ नहीं कहा।
उसका चेहरा नहीं बदला। मुस्कान वहीं रही। आँखें वहीं रहीं। हाथ वहीं रहा।
पर मैंने उसकी उँगली देखी।
काली अंगूठी वाली उँगली।
वो सीट पर टिकी थी, और अचानक उसके नाखून के नीचे से एक बूँद निकली।
काली।
एक बूँद। धीरे से गिरी, सफ़ेद सीट पर। फिर दूसरी। फिर तीसरी।
धीरे-धीरे। जैसे कोई नल बूँद-बूँद टपकता हो, पर यहाँ कोई नल नहीं था।
बूँदें सीट पर गिर रही थीं और मैं देख रहा था कि वो सूख नहीं रही थीं। वो फैल नहीं रही थीं। वो बस वहीं रह रही थीं, छोटे-छोटे काले धब्बे बनकर।
गाड़ी में से आने वाली ठंडी हवा अचानक मुझे और ठंडी लगी।
मैंने पीछे मुड़कर गली को देखा। शबनम आपा ने भी वो देखा होगा? मीरा ने अपना कैमरा नीचे कर दिया था, पर उसकी आँखें गाड़ी पर थीं।
रणवीर ने अपना हाथ उठाया। उसने उन बूँदों को देखा। उसकी मुस्कान नहीं बदली। उसने अपनी जेब से एक रूमाल निकाला — सफ़ेद, इस्तेमाल न किया हुआ — और उसने बूँदों को सीट पर ही पोंछ दिया।
पोंछकर उसने रूमाल जेब में डाल लिया।
“देखिए,” उसने कहा, बहुत हल्की आवाज़ में। “गाड़ी भी कुछ छोड़ जाती है।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
“अंकुश भाई,” उसने कहा। “एक बार और सोच लीजिए। जवाब मेरे पास नहीं, उस खाली मेज़ के नीचे है। जहाँ से आपने लिफ़ाफ़ा उठाया था। जब तक वो जवाब नहीं आया, मैंने मशीन नहीं चलवाई। यह मेरा वादा है। पर वादे की भी एक तारीख़ होती है।”
उसने खिड़की उठाई।
शीशा ऊपर आया, धीरे-धीरे, जैसे कोई पर्दा गिर रहा हो। फिर गाड़ी का इंजन भरा। फिर गाड़ी आगे बढ़ी और गली के मुँह से निकलकर सड़क पर मुड़ गई।
धूल उठी। गाड़ी के पीछे से धूल उठी और वो धीरे-धीरे गली पर बैठ गई।
बबलू वहीं खड़ा रह गया।
उसने मेरी तरफ़ देखा। आज उसके गले में सोने की चेन नहीं थी। पानदान नहीं था। वो सिर्फ़ काली शर्ट में खड़ा था, और उसके हाथ में कुछ नहीं था — सिर्फ़ मुड़ी हुई उँगलियाँ।
“अंकुश भाई,” उसने कहा।
“हाँ।”
“वो आज खाली हाथ गया।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
“ये अच्छी बात नहीं है,” बबलू ने कहा।
उसकी आवाज़ में डर था, और वो डर मुझे समझ आया। बबलू जानता था कि रणवीर खाली हाथ लौटता नहीं है। खाली हाथ लौटने का मतलब यह होता है कि उसने कुछ और तैयार कर लिया है।
बबलू ने सिर हिलाया, फिर धीरे-धीरे गली की तरफ़ चल दिया। आज उसकी चाल में वो घमंड नहीं था। थका हुआ आदमी था, जो लौटकर अपनी जगह जा रहा था।
मैं गली की तरफ़ मुड़ा।
और गली ने साँस ली।
एक साथ। जैसे किसी कमरे में बहुत देर से रुका हुआ पंखा चल पड़ा हो। दुबे अंकल अपनी कुर्सी पर बैठ गए, पर पहले उन्होंने अपनी कॉलर ढीली की। शबनम आपा ने चिमटी उठाकर थाली पर मारी — एक ज़ोर की आवाज़ — और फिर उस गुमटी से आवाज़ आई, “जो भी पीना है, पी लो। आज चाय का पैसा नहीं लूँगी।”
मीरा दौड़कर आई।
“क्या कहा?” उसने पूछा। “सब खत्म हो गया? कुछ कहा उसने?”
“कुछ नहीं,” मैंने कहा। “नौकरी दी। फ़ाइल दिखाई। मैंने मना किया। पापा ने एक लाइन बोली। और वो चला गया।”
मीरा मेरी तरफ़ देखती रही। “बस?”
“बस।”
उसने धीरे से कहा, “अंकुश, जो आदमी अपना गुस्सा रोक लेता है, वो डरने वाली बात है।”
“पता है,” मैंने कहा। “इसीलिए मैं घंटी से पूछने वाला था।”
और मेरी जेब में घंटी थी। ठंडी। अब भी ठंडी।
मैंने मन में उससे कुछ पूछा — कुछ नहीं, बस एक सवाल। क्या वो सच में जा रहा है, या यहाँ से शुरू कर रहा है?
घंटी ने कुछ नहीं कहा।
और मुझे लगा — यही जवाब है।
तभी उस्ताद अली बक्श की दुकान से आवाज़ आई।
पहले टिक-टिक। उनकी सिलाई मशीन। फिर वो आवाज़ बंद हो गई। और फिर उस्ताद दुकान के दरवाज़े पर आकर खड़े हुए, और उन्होंने हाथ उठाया।
बस इतना। दो उँगलियाँ उठाईं और अंदर की तरफ़ इशारा किया।
पापा ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
“अस्पताल जाता हूँ,” उन्होंने कहा। “माँ के पास। तू आ जाना।”
“जी,” मैंने कहा।
और वो मुड़े और चल दिए। आज उनकी पीठ देखकर मुझे कुछ अजीब लगा। पाँच साल में पहली बार लगा कि वो जा रहे हैं, भाग नहीं रहे हैं।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
“उस्ताद के पास जा रहा हूँ,” मैंने कहा।
“मैं साथ…”
“नहीं। तू मीरा के पास रह। और नल की ईंट — वो ईंट मत फेंकना। कहीं रख लेना।”
टिंकू ने सिर हिलाया। और मैं उस्ताद की तरफ़ चल दिया।
उनकी दुकान के अंदर हमेशा जैसा ही माहौल था। कपड़ों की खुशबू। धूल और साबुन। लोहे की मशीन। दीवार पर लटके रंग-बिरंगे धागे। दुकान के पीछे वाला ट्रंक आज भी वैसे ही खुला रखा था।
उस्ताद कुर्सी पर बैठे थे, पर मशीन चल नहीं रही थी। उनके सामने कपड़े का एक टुकड़ा था, और उस कपड़े में सुई फँसी हुई थी।
“बैठ,” उन्होंने कहा।
मैं बैठ गया। उनकी मेज़ के सामने वाला स्टूल। वही स्टूल जिस पर बैठकर मैंने पहली बार गिरवी के काग़ज़ का ज़िक्र किया था।
उस्ताद ने मशीन के पास से सुई निकाली।
“देख,” उन्होंने कहा।
मैंने देखा।
सुई बीच से चटकी हुई थी। ऊपर से नीचे तक एक पतली दरार, बाल की तरह। और उसका नुकीला सिरा मुड़ा हुआ। यह सुई पहले अच्छी थी, यह साफ़ पता चलता था।
“पाँच साल से ये मशीन चल रही है,” उस्ताद ने कहा। “और यह पहली सुई नहीं है जो टूटी। चौदहवीं है।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
“तू सोच रहा होगा कि सुई टूटना क्या बात है। सुई टूटती है, बदल दो।” उन्होंने कपड़े को हथेली पर रखा। “पर सुई ऐसे नहीं टूटती, बेटा। सुई तब टूटती है जब कपड़ा कहीं और से खिंच रहा हो।”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
“मैं यहाँ सीता हूँ, और यहाँ से कपड़ा खिंचता है। पर असली खिंचाव कहीं और होता है। मशीन कहती है, धागा कहता है, पर जो टूटता है, वो यह छोटी सुई होती है।”
उन्होंने सुई मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
“अब तू बता,” उन्होंने कहा। “आज गली में जो जुड़ा, वो किसकी सुई पर जुड़ा?”
मैं उनकी बात समझ रहा था, पर पूरी नहीं।
“उस्ताद…”
“जहाँ एक जोड़ बनता है,” उन्होंने कहा, “वहाँ कहीं कुछ टूटने की आवाज़ भी आती है। तूने सुनी?”
“नहीं,” मैंने सच कहा।
“इसीलिए तू अभी ज़िंदा है,” उन्होंने कहा। “जो आदमी हर जोड़ के साथ तोड़ने की आवाज़ सुनने लगे, वो जल्दी बूढ़ा हो जाता है।”
उन्होंने सुई वापस मशीन के पास रखी।
“आज तूने रमेश और नसीम को जोड़ा। दो आदमी, दो गिलास पानी, और एक सच। अच्छा काम किया।”
“फिर?”
“फिर गली में कहीं कुछ टूटा,” उन्होंने कहा। “तेरे सामने नहीं टूटा। तेरे पीछे टूटा। पर टूटा।”
मैंने गली में होने वाली हर आवाज़ याद की। शबनम आपा की चिमटी। भोला भाई का शटर। रेडियो। बच्चे। कुछ और नहीं।
“क्या टूटा?” मैंने पूछा।
“मैं नहीं जानता,” उस्ताद ने कहा। “पर मुझे पता है कि टूटा है। क्योंकि मेरी मशीन आज शाम से अजीब आवाज़ कर रही है।”
उन्होंने अपनी मशीन पर हाथ रखा, जैसे किसी बीमार बच्चे के सिर पर रखते हैं।
“यह मशीन पचास साल से मेरे साथ है,” उन्होंने कहा। “जब यह गड़बड़ करती है, तो मुझे लगता है कहीं कुछ हुआ है। और आज वो कर रही है।”
फिर उन्होंने मुझसे पूछा, “घंटी ने कुछ कहा?”
“कहा,” मैंने कहा। “कहा — अब दो नहीं, अब तीन।”
उस्ताद की उँगली मशीन पर रुक गई।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और उनके चश्मे के पीछे उनकी आँखें कुछ ऐसी हुईं जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थीं। डर नहीं था। वहाँ कुछ और था। जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपने ही पुराने खेल का नतीजा सुन रहा हो।
“तीन,” उन्होंने धीरे से दोहराया।
“इसका क्या मतलब है?” मैंने पूछा।
“तीन का मतलब…” वो रुके। उन्होंने सुई उठाई, फिर रख दी। “तीन का मतलब यह नहीं कि तीन आदमी। तीन का मतलब यह भी नहीं कि तीन चीज़ें। तीन का मतलब…”
वो फिर रुके। और इस बार उन्होंने अपनी बात पूरी नहीं की।
“उस्ताद,” मैंने कहा।
“बाद में,” उन्होंने कहा। “अभी तू एक बात सुन।”
वो कुर्सी से उठे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा — और उनकी आँखें मेरी जेब पर आ गईं।
जहाँ घंटी थी।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में कड़क आई। “यह घंटी आज बाज़ार में मत ले जाना। किसी को दिखाना मत। किसी अंगूठे वाले के सामने मत निकालना।”
“क्यों?”
“क्योंकि जिस दिन यह घंटी बाज़ार में बजी,” उन्होंने कहा, “उस दिन रणवीर को पता चल जाएगा कि वह क्या ढूँढ रहा है।”
दुकान में चुप्पी आ गई।
मशीन से एक आवाज़ आई। जैसे किसी ने मशीन की एक दराज़ अंदर धकेली हो। उस्ताद ने कुछ नहीं किया।
“वो क्या ढूँढ रहा है?” मैंने पूछा।
“वही जो तेरे पास है,” उस्ताद ने कहा। “पर उसके पास है उसका टूटा हुआ साया। और जिस आदमी के पास टूटा हुआ साया हो, वो आदमी पूरी चीज़ ढूँढता है।”
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी उँगलियों में आई। ठंडी थी — पर अब इतनी नहीं। जैसे किसी ने उसे हल्का गरम कर दिया हो।
“उस्ताद,” मैंने कहा। “अगर वो ढूँढ ले तो?”
“तो क्या होगा,” उन्होंने कहा, “यह तू नहीं, गली तय करेगी।”
मैं उठा।
“जा,” उन्होंने कहा। “और सुन।”
दरवाज़े पर रुककर मैंने पीछे देखा।
“आज रात तेरी दुकान पर कोई आएगा,” उन्होंने कहा। “और वो कोई ग्राहक नहीं होगा।”
“कौन?”
“यह तो मुझे नहीं पता,” उन्होंने कहा। “पर जब आए, तो उसके जूते देखना।”
“जूते?”
“जूते,” उन्होंने कहा। “आदमी अपना चेहरा छुपा सकता है। नाम बदल सकता है। आवाज़ बदल सकता है। पर जूते नहीं बदलता। जो आदमी बार-बार नए जूते नहीं पहनता, वो कभी नहीं छुपता। और जो रोज़ चमकते जूते पहनता है, उसका रास्ता जूतों से पकड़ा जा सकता है।”
मैंने सिर हिलाया।
“और अंकुश,” उन्होंने कहा।
“जी।”
“आज गली ने जो बात सुनी — पापा की वो छोटी लाइन — उसे किसी को नहीं बताना। मीरा को भी नहीं। रैंडिया में नहीं। रिकॉर्डिंग में नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि कुछ बातें सुनकर अच्छी लगती हैं,” उन्होंने कहा। “और सुनकर अच्छी लगने वाली बातें बाज़ार में बिक जाती हैं।”
मैंने कुछ नहीं कहा। पर यह बात मुझे समझ आई। पापा की वो लाइन — “हमारी गली में सब ठीक है” — वो उपकार के लिए नहीं थी। वो उस आदमी के लिए बोली गई थी जो गली को बाज़ार समझकर आया था। और वो लाइन जितनी कम लोगों तक जाएगी, उतनी ही असरदार रहेगी।
मैं उस्ताद की दुकान से बाहर आया।
धूप ढल रही थी। गली में वो पीली-केसरिया रोशनी थी जो शाम को आती है, जब हर चीज़ थोड़ी पुरानी और थोड़ी अच्छी लगती है।
पीपल के नीचे बुज़ुर्ग बैठे थे। कुछ नए चेहरे भी थे और कुछ वही जो सुबह सभा में थे।
मैंने नल की ईंट की तरफ़ देखा। टिंकू ने उसे उठाकर पीपल की जड़ के पास रख दिया था। वो लाल ईंट वहाँ पड़ी थी, जैसे कोई गवाह जो कुछ बोल नहीं सकता, पर चला भी नहीं गया।
मैंने जेब से घंटी निकाली।
उसे हथेली पर रखा। उसका रंग पीतल का था, पर शाम की रोशनी में वो थोड़ा गहरा लग रहा था। घिसा हुआ। पुराना। मेरे दादा का। मेरे पापा का। और अब मेरा।
वो ठंडी नहीं थी। वो गुनगुनी थी। जैसे किसी ने उसे छूकर छोड़ दिया हो।
“कुछ कहना है?” मैंने धीरे से पूछा।
घंटी ने कुछ नहीं कहा।
“ठीक है,” मैंने कहा। “तब मैं चलता हूँ।”
मैंने उसे वापस जेब में रखा और दुकान की तरफ़ चल दिया।
और चलते-चलते मेरे अंदर एक बात दब गई।
उस्ताद ने कहा था कि हर जोड़ की कीमत कहीं और से कटती है। और आज दिन में हमने पानी का झगड़ा जोड़ा था, पापा ने सबके सामने सच बोला था, रमेश ने अपनी औरत की किडनी का राज़ खोला था।
इसका मतलब कोई कीमत कटी थी।
कहाँ कटी थी?
मैंने दुकान की तरफ़ देखा।
वहाँ कुछ नहीं बदला था। बोर्ड वैसे ही टेढ़ा था। शटर आधा खुला। पीछे का बल्ब गुनगुना रहा था।
पर मुझे लगा कि मेरे पीछे कोई एक आवाज़ आई।
बहुत धीमी। बहुत दूर।
जैसे किसी ने दांतों के बीच से कहा हो — अच्छा।
॥
“अच्छा।”
वो आवाज़ मेरे कान में रह गई। जैसे किसी ने बहुत दूर से, दाँतों के बीच से कहा हो और हवा उसे उठाकर मेरे पास छोड़ गई हो।
मैं गली के बीच में खड़ा था। धूप ढल चुकी थी, पीपल की छाया लंबी होकर नाली के पुल तक आ गई थी। पीछे कहीं शबनम आपा की गुमटी से चिमटी की आवाज़ आई, और उसके बाद चाय की केतली की वो धीमी सी सीटी, जो गली की साँस जैसी लगती है।
मैंने कान पर हाथ रखा।
फिर हाथ नीचे किया।
अगर घंटी कुछ कहना चाहती थी, तो वो कह चुकी थी। अब उसका काम नहीं था। अब मेरा काम था।
मैं दुकान की तरफ़ चला।
रास्ते में सोच रहा था — उस्ताद ने कहा था कि हर जोड़ की कीमत कहीं और से कटती है। आज हमने दो चीज़ें जोड़ी थीं। रमेश और नसीम का पानी। और उससे भी बड़ी चीज़ — पापा की चुप्पी।
पापा ने आज पहली बार, सबके सामने, अपनी ज़ुबान से कहा था कि उन्होंने डर के मारे अंगूठा लगाया था। पाँच साल का बोझ, एक वाक्य में, गली के सामने रख दिया था। तुम सोच रहे होगे कि ये तो अच्छी बात है। जोड़ हुआ, बोझ हल्का हुआ। तो सुनो — जोड़ की कीमत हमेशा उसी से नहीं ली जाती जो जोड़ता है। कभी-कभी कीमत किसी तीसरे के हिस्से में आती है।
और मुझे उस वक़्त नहीं पता था कि इस बार वो तीसरा कौन है।
दुकान पहुँचकर मैंने शटर पूरा उठाया।
पीछे के कमरे का बल्ब गुनगुना रहा था। औज़ारों का ट्रंक खुला पड़ा था, उस पर नई रिंच रखी थी जिसे टिंकू छूना चाहता था और मैंने छूने नहीं दिया था। मैंने टिंकू को शाम को घर भेज दिया था। उसकी माँ आज दूसरी बार गुमटी तक आई थी, और मैंने उससे कहा था कि बेटा मेरे पास है, सुबह से शाम तक, कुछ नहीं होगा।
“कुछ नहीं होगा,” मैंने अपने आप से दोहराया। और मुझे अपनी ही आवाज़ पर हँसी आई।
मैं चारपाई पर बैठ गया। जेब से घंटी निकाली, उसे सामने मेज़ पर रख दिया। पीतल का रंग, बल्ब की पीली रोशनी में, थका हुआ लग रहा था।
“उस्ताद ने कहा था,” मैंने धीरे से कहा, “कि आज रात इस दुकान पर कोई आएगा।”
घंटी चुप।
“और उसके जूते देखने हैं।”
घंटी चुप।
“तू भी,” मैंने कहा, “बड़ी देर से चुप है।”
और तभी मुझे लगा कि घंटी गुनगुनी है। बहुत हल्की। जैसे किसी ने अभी-अभी उसे हाथ में पकड़कर छोड़ दिया हो।
मैंने उसे वापस जेब में रखा और चारपाई पर लेट गया। आँखें खुली रखीं।
रात के नौ बजे गली की आवाज़ें एक-एक करके बंद होने लगीं। शटर गिरने की आवाज़ें। किसी बच्चे का रोना। टिंकू की माँ की आवाज़ — “अब सो जा, वरना कल स्कूल नहीं जाएगा।”
स्कूल।
मुझे याद आया कि मैंने टिंकू का नाम शाम की पाठशाला में लिखवाने की बात डॉक्टर इसरानी से कही थी और अभी तक फ़ॉर्म नहीं भरा था। कल भरना है। कल के बाद भी कल होता है, यह बात मैंने उस दिन सीखी थी जिस दिन घंटी ने पहली बार मुझसे बात की थी।
साढ़े नौ बजे मेरी दुकान के सामने कोई रुका।
मैं उठ बैठा।
कदम धीमे थे। जैसे कोई बूढ़ा आदमी हो या कोई ऐसा जो पूरे दिन खड़ा रहा हो।
दरवाज़े पर एक आदमी खड़ा था। दुबला, छोटा कद, कंधे झुके हुए, हाथ में एक पुरानी टॉर्च। उसके कपड़े धुले हुए थे पर पुराने थे, और पैरों में जो जूते थे, वो मैंने पहले कभी नहीं देखे जैसे।
जूते पुराने थे, पर टूटे नहीं थे। उनके तलवे कई जगह से सिले हुए थे। मोटे धागे से। सफ़ेद धागा, काले जूते पर, जैसे किसी ने अपने हाथ से, रात में बैठकर, एक-एक टाँका लगाया हो। जूते की चमड़ी घिसी हुई थी, पर साफ़ थी। उसने उन्हें अभी पोंछा था, यह उन पर पड़ी हुई धूल की उन लकीरों से पता चलता था जो पोंछने से बनती हैं।
“भाई,” उसने कहा। आवाज़ सूखी थी। “टॉर्च देख लोगे?”
“इस वक़्त?” मैंने कहा।
“दिन में तो मैं काम पर होता हूँ,” उसने कहा। “और तुम्हारी दुकान भी दिन में खुली रहती है। दोनों एक साथ नहीं मिलते।”
मैं हँस पड़ा। बात सही थी।
“अंदर आइए,” मैंने कहा।
वो अंदर आया। चारपाई पर नहीं बैठा। फ़र्श पर, दरवाज़े के पास, एक कोने में बैठ गया, जैसे उसे आदत हो किसी के घर में कोने में बैठने की।
मैंने टॉर्च ली। पुरानी पीतल की टॉर्च थी। भारी। ढक्कन खोला तो अंदर से महक आई — पुरानी बैटरी, पुरानी धूल, और कुछ और जो मुझे पहचानी लगी। जैसे उस टॉर्च के अंदर बहुत साल पहले की कोई शाम बंद हो।
“कहाँ से लाए?” मैंने पूछा।
“नए बाज़ार से,” उसने कहा। “मैं वहीं जूते पॉलिश करता हूँ। भारद्वाज भवन के सामने। सीढ़ियों के पास।”
मेरे हाथ रुक गए।
“अच्छा,” मैंने कहा, आवाज़ सामान्य रखने की कोशिश करते हुए। “तो साहब के जूते भी आप ही चमकाते हैं?”
वो हँसा। उसकी हँसी में कुछ कड़वा था।
“साहब के जूते मैं नहीं चमकाता,” उसने कहा। “साहब के जूते कोई और चमकाता है। अपना आदमी है। मैं बाहर वालों के चमकाता हूँ। जो दफ़्तर आते हैं, जो काग़ज़ लेकर आते हैं, जो हाथ जोड़कर आते हैं।”
“और साहब के जूते?”
“साहब के पास बारह जोड़े जूते हैं,” उसने कहा, जैसे कोई हिसाब बता रहा हो। “बारह महीने, बारह जोड़े। हर महीने एक नया। पर एक जोड़ा ऐसा है जो वो कभी नहीं पहनता।”
मैंने टॉर्च के अंदर झाँका। कुछ नहीं कहा। जब किसी को कुछ नहीं कहना हो, तो सबसे अच्छा तरीक़ा है कि हाथ में कुछ पकड़ लो और बहुत ध्यान से उसे देखने लगो।
“वो जोड़ा जिसके तले में लोहा लगा है,” उसने कहा। “भारी जूते। जैसे किसी पुराने ज़माने के हाकिम के। मैंने एक बार पूछा — ‘साहब, ये पहनते क्यों नहीं?’ तो वो हँसे। और बोले — ‘जो जूते पहने जाते हैं, वो घिसते हैं। जो नहीं पहने जाते, वो रखे रहते हैं।’”
मैंने सिर उठाया।
“किसके लिए रखे होते हैं?”
“यही तो,” बूढ़े ने कहा, और उसने अपने सिले हुए जूते की तरफ़ देखा। “अपने लिए तो नहीं रखे होते।”
फिर वो चुप हो गया।
मैंने टॉर्च की बैटरी निकाली, उसके सिरे साफ़ किए, स्प्रिंग को थोड़ा सीधा किया। काम दो मिनट का था। टॉर्च जल उठी। पीली रोशनी, गली के कमरे के अंधेरे में, दीवार पर एक बड़ा सा गोला बना गई।
“निकल गई,” बूढ़े ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो आश्चर्य था जो बच्चों की आवाज़ में होता है, बड़ों की नहीं।
“पैसे नहीं लूँगा,” मैंने कहा, उसके मुँह खोलने से पहले। “ये दो मिनट का काम था।”
“मैं पैसे देने नहीं आया था,” उसने कहा।
“तो?”
“मैं यह देखने आया था,” उसने कहा, “कि आज जो आदमी गली में आया था, वो सच में यहाँ से चला गया, या फिर से आएगा?”
मैं चुप हो गया।
“तुम्हारी गली में आज शाम जो हुआ,” उसने कहा, “उसकी बात सुबह हमारी सीढ़ियों तक पहुँच गई थी। और जो बात सीढ़ियों तक पहुँचती है, वो साहब तक पहुँचती है। तुमने उसको ना कह दिया, ये ठीक किया। पर वो ना सुनकर लौटने वालों में से नहीं है।”
मैंने घंटी की तरफ़ देखा। मेज़ पर पड़ी थी। चुप।
“अंकल,” मैंने कहा। “आप साहब के दफ़्तर के सामने बैठते हैं। कभी कुछ सुना है, ऐसा जो किसी को नहीं पता?”
वो थोड़ी देर मेरे चेहरे को देखता रहा। फिर उसने टॉर्च बुझा दी, जैसे अब उसकी ज़रूरत नहीं।
“सुबह आठ बजे,” उसने कहा, “एक सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी आता है। पुराने बिजलीघर के दरवाज़े पर। दो बार खटखटाता है। फिर अंदर नहीं जाता। बाहर ही खड़ा रहता है। दो मिनट। और लौट जाता है।”
“रोज़?”
“रोज़,” उसने कहा। “पिछले बीस दिन से।”
मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ। बीस दिन। वही बीस दिन जो सनी के आधे काग़ज़ पर लिखे थे।
“तुम सोच रहे होगे,” बूढ़े ने कहा, “कि इसमें क्या बड़ी बात है। बड़ी बात ये है कि उस दरवाज़े के पीछे कुछ है। और जिसके पीछे कुछ होता है, उसके आगे आदमी खड़ा होकर दो बार खटखटाता है — जैसे अंदर वाले से कह रहा हो, मैं आ गया, तुम तैयार रहो।”
वो उठा। कमर सीधी करने के लिए दोनों हाथ पीठ पर रखे। फिर दरवाज़े तक आया, और रुककर बोला —
“एक बात और।”
“जी।”
“कल सुबह सात बजे जो मशीन चलनी है,” उसने कहा, “उसको चलाने वाला आदमी मुझे कल शाम नए बाज़ार में मिला था। उसने मुझसे कहा — ‘बाबा, कल सुबह पीछे वाले प्लॉट पर आ जाना। बड़ा काम है।’”
“क्या काम?”
“उसने कहा,” बूढ़े ने कहा, “कि जो मशीन गिराती है, उसके नीचे खड़े होने से अच्छा कमाई होती है। मैंने कहा, मैं जूते चमकाता हूँ, मलबा नहीं उठाता।”
वो हँसा। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।
“पर तुम्हारी गली के लोग कल वहाँ खड़े होंगे, ये मुझे पता है। इसलिए आज मैं यहाँ आया हूँ।”
“क्यों?”
“क्योंकि,” उसने कहा, “मैं पच्चीस साल से नए बाज़ार में जूते चमका रहा हूँ। और पच्चीस साल में मैंने एक बात सीखी है। जिस आदमी के पास बारह जोड़े जूते हों, वो किसी एक जोड़े के नीचे आने वाली ज़मीन को खाली नहीं छोड़ता।”
वो चला गया।
मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा, उसे गली के मोड़ तक जाते देखता रहा। उसके जूते उस अंधेरे में भी चमक रहे थे — नहीं, चमक नहीं रहे थे, पहचाने जा रहे थे। सफ़ेद धागे के टाँके अंधेरे में भी दिखते थे।
मैंने दरवाज़ा बंद किया और घंटी उठाई।
“तूने सुना?” मैंने पूछा।
घंटी गुनगुनी थी। बहुत हल्की। जैसे कोई कहे — हाँ, सुना। पर अभी बोलने का वक़्त नहीं।
मैं चारपाई पर लेटा, और उस रात मुझे नींद नहीं आई। मेरे अंदर एक ही सवाल घूमता रहा — कि आज जोड़ की जो कीमत कटी, वो किसके हिस्से में कटी?
सुबह मुझे जवाब मिला। और जवाब मीरा थी।
सुबह साढ़े आठ बजे मीरा दुकान पर आई।
मैंने उसे देखते ही समझ लिया कि आज वो सवाल पूछने नहीं आई है। आज वो जवाब लेने आई है।
उसके बाल पहले से ज़्यादा बिखरे हुए थे। बैग कंधे से लटका हुआ था, और उसके हाथ में कैमरा ऐसे पकड़ा था जैसे कोई लाठी पकड़ता है।
“मैंने कल रात दफ़्तर फोन किया था,” उसने कहा।
“किस दफ़्तर?”
“भारद्वाज भवन,” उसने कहा। “मैंने कहा — मैं बस्ती की आवाज़ से बोल रही हूँ। मुझे साहब से बात करनी है। उन्होंने कहा, साहब व्यस्त हैं। मैंने कहा, मुझे सिर्फ़ ग्यारह बजे तक का वक़्त चाहिए। गली के मुँह पर। कैमरे के सामने।”
“और?”
“और उन्होंने कहा,” मीरा ने कहा, “साहब आएँगे।”
मैंने औज़ार वापस ट्रंक में रखा।
“मीरा,” मैंने कहा।
“मुझे पता है तू क्या कहेगा,” उसने कहा। “कि जो आदमी मुस्कुराकर आता है, उसके सामने कैमरा रखना खतरनाक है। मुझे पता है। पर सुन, मैं पाँच साल से खबरें बना रही हूँ। और पाँच साल में मैंने एक बात सीखी है — जो आदमी कैमरे से डरता नहीं, वो कैमरे के सामने ही कुछ ऐसा कह जाता है जो वो काग़ज़ों में नहीं लिखता। मुझे वही चाहिए।”
मैंने उसकी आँखों में देखा। उनमें डर था। और डर के पीछे एक चीज़ और थी, जो डर से बड़ी थी।
“ठीक है,” मैंने कहा।
वो रुक गई। “तू मना नहीं करेगा?”
“करूँगा,” मैंने कहा। “जब वक़्त आएगा। पर अभी नहीं। अभी मैं यह देखना चाहता हूँ कि तेरे कैमरे के सामने वो क्या कहता है।”
“क्यों?”
“क्योंकि,” मैंने कहा, “वो मुझसे नौकरी की बात करता है, फाइल दिखाता है, गाड़ी से उतरता है। पर मुझे यह नहीं पता कि वो अपने बारे में क्या सोचता है। और आदमी अपने बारे में सबसे ज़्यादा वहीं बोलता है, जहाँ वो सोचता है कि ये बात दूर तक जाएगी।”
टिंकू दौड़ता हुआ आया। उसके घुटने पर नई पट्टी थी, और हाथ में एक छोटी सी कॉपी।
“दीदी,” उसने कहा, “मैं कैमरा पकड़ूँगा?”
“तू तार पकड़ेगा,” मीरा ने कहा। “कैमरा मैं पकड़ूँगी।”
“तार पकड़ने में क्या बात है,” टिंकू ने कहा। “उस्ताद, आप बोलो ना।”
“तार पकड़ने वाला सबसे ज़रूरी आदमी होता है,” मैंने कहा। “अगर तार खिंच गई तो कैमरा बेकार।”
टिंकू ने वो बात ऐसे सिर हिलाकर मानी जैसे उसे ज़िंदगी का सबसे बड़ा राज़ मिल गया हो।
ठीक ग्यारह बजे, हम गली के मुँह पर खड़े थे।
नीम के पेड़ के नीचे मीरा ने तिपाई खोली और कैमरा उस पर कस दिया। लाल बत्ती जल उठी। दुबे अंकल अपनी कुर्सी घसीटकर थाने के बाहर ले आए थे, और उस कुर्सी के पैर के नीचे पुरानी ईंट का टुकड़ा रख दिया था ताकि वो हिले नहीं। शबनम आपा गुमटी के बाहर आकर खड़ी हो गईं, हाथ में चिमटी। बच्चे पीपल के नीचे जमा थे — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — और सबके चेहरे पर वो भाव था जो बच्चों के चेहरे पर तब आता है जब वो जानते हैं कि आज कुछ बड़ा होने वाला है पर कोई उन्हें बता नहीं रहा।
ग्यारह बजकर सात मिनट पर सफ़ेद गाड़ी गली के मुँह पर आकर रुकी।
ड्राइवर उतरा, दरवाज़ा खोला। रणवीर भारद्वाज उतरा।
आज भी सफ़ेद कपड़े। आज भी वही चमकते जूते। पर आज उसके हाथ में कोई फाइल नहीं थी, कोई लिफ़ाफ़ा नहीं था। सिर्फ़ एक छोटा सा पीतल का डिब्बा था, जिसे उसने उतरते ही ड्राइवर को वापस दे दिया, जैसे अब उसकी ज़रूरत नहीं।
उसने हम सबको देखा। फिर मुस्कुराया। वो मुस्कान ऐसी थी जैसे किसी ने दीवार पर सफ़ेदी कर दी हो — सब कुछ ढक जाता है, दीवार भी, दरार भी।
“मीरा बेटा,” उसने कहा। “तुम्हारी आवाज़ फोन पर भी अच्छी लगती है। सामने तो और अच्छी लग रही है।”
“साहब,” मीरा ने कहा, “ये कैमरा चालू है। जो भी बोलेंगे, रिकॉर्ड होगा।”
“चालू ही रखो,” उसने कहा। “मैं छुपाने वालों में से नहीं हूँ। मुझे तो अच्छा लगता है कि लोग मेरी बात सुनें। बैठेंगे नहीं?”
“हम खड़े ठीक हैं,” मीरा ने कहा।
“ठीक है,” उसने कहा, और वो वहीं नीम के पेड़ के नीचे खड़ा हो गया। हाथ पीछे बाँध लिए, जैसे कोई मालिक अपनी दुकान का मुआयना कर रहा हो।
मीरा ने सीधा सवाल किया।
“साहब, नूर अस्पताल की ज़मीन की नीलामी का नोटिस आया है। उस पर आपकी कंपनी की मोहर है। सच है?”
रहमत बाबा चबूतरी पर बैठे थे, उन्होंने अपनी टोपी थोड़ी ऊपर की।
“नीलामी का नोटिस सरकार भेजती है,” रणवीर ने कहा। “कंपनी नहीं। कंपनी तो खरीदने वालों की कतार में खड़ी है, बेटा। जैसे तुम बाज़ार में खड़ी होती हो, कभी टमाटर लेने, कभी धनिया।”
“आप टमाटर की बात कर रहे हैं, साहब,” मीरा ने कहा। “और यहाँ बात एक दवाखाने की हो रही है जहाँ पचास साल से लोग इलाज करा रहे हैं। आप उस ज़मीन का क्या करेंगे?”
“अस्पताल,” रणवीर ने कहा। “नया अस्पताल। नई मशीनें। साफ़ कमरे। सोचो — इस पुरानी पीली दीवार की जगह सफ़ेद दीवार, और उस पर बड़ा सा लिखा हो, ‘नई शुरुआत, नए सपने’। क्या बुरा है इसमें?”
“और डॉक्टर इसरानी?”
“डॉक्टर साहब का इलाज है,” रणवीर ने कहा, और उसकी आवाज़ में अचानक मिठास बढ़ गई, “तो उनके लिए नई इमारत में अलग कमरा। बड़ी खिड़की। धूप। मैंने खुद कहा है।”
अंकुश के तौर पर मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसकी उँगलियाँ कैमरे पर कसी हुई थीं।
“साहब,” मीरा ने कहा, “अस्पताल की ज़मीन के काग़ज़ पर मुफ़्त इलाज के बदले अंगूठा माँगा जा रहा है। और जिस काग़ज़ पर शंकर यादव का अंगूठा है, वो कहीं और से आया है। आप इसे क्या कहेंगे?”
वहाँ हवा थोड़ी रुकी।
दुबे अंकल की कुर्सी चरचराई। टिंकू ने तार पकड़ते हुए मुझे देखा।
रणवीर ने अपना रूमाल निकाला, माथा पोंछा, फिर रूमाल मोड़कर जेब में रखा। जब उसने दोबारा देखा, उसकी आँखों में वही मुस्कान थी, पर उसके नीचे कुछ ठंडा था।
“शंकर भाई मेरे पुराने जानने वाले हैं,” उसने कहा। “जब उनकी औरत बीमार थी, मैंने उन्हें पैसे दिए। तुम पूछ सकती हो — कितने? बहुत। अस्पताल का बिल, दवा, सब। मैंने एक रुपया वापस नहीं माँगा। और जिस दिन काग़ज़ आया, मैंने उनसे कहा — शंकर भाई, ये तुम्हारी मर्ज़ी है।”
“और उनकी मर्ज़ी क्या थी?”
“उन्होंने अंगूठा लगाया,” रणवीर ने कहा, और उसने बहुत धीरे, बहुत साफ़ बोला, जैसे कोई तराज़ू पर रखकर तोल रहा हो, “अपनी मर्ज़ी से।”
पीपल के नीचे किसी ने साँस ली। बंसी बाबा ने अपनी लाठी थोड़ी आगे खिसका दी।
मेरे अंदर एक आवाज़ उठी — कि मैं बीच में बोलूँ। पर मैं चुप रहा। मीरा वहाँ अपने दम पर खड़ी थी, और मैंने उसके काम में हाथ नहीं डाला। यही फ़र्क़ होता है दोस्ती और हिमायत में।
“साहब,” मीरा ने कहा, “आपने उन्हें बताया था कि काग़ज़ में क्या लिखा है?”
“काग़ज़,” रणवीर ने कहा, और उसने हाथ फैला दिए, “काग़ज़ तो बहुत होते हैं, बेटा। तुम भी हर दिन कितने काग़ज़ देखती हो। किसी में सच, किसी में आधा सच, किसी में कोई नहीं।”
“मेरे काग़ज़ में क्या है, साहब?”
“तुम्हारे काग़ज़ में,” रणवीर ने कहा, और उसने कैमरे की तरफ़ देखा, “बहुत हिम्मत है।”
फिर वो मुस्कुराया, और उस मुस्कान में कुछ ऐसा था जो मुझे नहीं भाया।
“मीरा बेटा,” उसने कहा, “मैं तुम्हारा चैनल देखता हूँ। कभी-कभी। सच कहूँ, अच्छा काम कर रही हो। पर एक बात है। तुम्हारा चैनल छोटा है। तुम्हारा कैमरा पुराना है। तुम्हारे पास आदमी नहीं हैं। मुझे पता है तुम अकेली सब करती हो — कैमरा, आवाज़, एडिटिंग, सब।”
मीरा ने कुछ नहीं कहा।
“कंपनी को विज्ञापन चाहिए,” रणवीर ने कहा। “हर बड़ी कंपनी को चाहिए। मैं तुम्हारे चैनल पर विज्ञापन दूँगा। महीने का पचास हज़ार। बीस सेकंड का। सिर्फ़ बीस सेकंड का। और एक नया कैमरा भी — तुम्हारे इस पुराने कैमरे से तो तुम्हारी आवाज़ भी पुरानी लगती है।”
वहाँ सन्नाटा हो गया।
शबनम आपा की चिमटी उनके हाथ में रुक गई। टिंकू ने तार पकड़ते हुए मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में सवाल था — कि क्या ये सच में इतना पैसा दे रहा है?
“नहीं,” मीरा ने कहा।
एक शब्द। छोटा सा।
“सोच लो,” रणवीर ने कहा।
“मैंने सोच लिया,” मीरा ने कहा। “मेरी आवाज़ बिकती नहीं, साहब।”
“बेटा,” रणवीर ने कहा, और उसकी आवाज़ अब भी मीठी थी, “हर आवाज़ की एक कीमत होती है। बस किसी को पता होती है, किसी को नहीं। तुम्हें आज नहीं पता। कल पता चलेगी।”
फिर उसने कैमरे की तरफ़ देखा और कहा —
“छोटा चैनल, बड़ी हिम्मत। मुझे अच्छा लगता है। पर बेटा, सबूत कहाँ है?”
मीरा की उँगलियाँ कैमरे पर और कस गईं।
“सबूत के बिना,” रणवीर ने कहा, “सच भी झूठ जैसा लगता है। और ऐसा लगता है, यह तुम्हें मैं नहीं बता रहा। यह तुम्हें तुम्हारा अपना काम बता रहा है। है ना?”
मीरा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
“तुमने पहले भी एक खबर की थी,” रणवीर ने कहा, बिलकुल हल्के से, जैसे कोई पुरानी बात याद करा रहा हो, “किसी टीचर की। रमा, है ना? अधूरी खबर थी। बेचारी का घर बिखर गया था। याद है तुम्हें?”
मेरा हाथ अपने आप मुड़ा।
“मैं तुम्हें दोष नहीं दे रहा,” रणवीर ने कहा। “ग़लती सबसे होती है। मैं तो बस यह कह रहा हूँ कि इस बार सोच-समझकर लिखना। क्योंकि इस बार जिसकी बात कर रही हो, वो तुमसे बड़ा नहीं, बहुत बड़ा है।”
फिर वो हम सबको देखकर हँसा। खुलकर। जैसे कोई बड़ा भाई अपने छोटे भाई-बहनों की शरारत पर हँसता है।
“अंकुश भाई,” उसने मुझसे कहा, “आपकी गली में आज भी चाय अच्छी बनती है।”
और वो मुड़ा, गाड़ी की तरफ़ चला। ड्राइवर ने दरवाज़ा खोला। उसने एक पैर गाड़ी में रखा, फिर रुककर पीछे देखा।
“मीरा बेटा,” उसने कहा, “कैमरा अच्छा है। पर जब बैटरी खत्म हो जाए, तो बता देना। मैं तुम्हें नई दे दूँगा।”
गाड़ी चली गई।
लाल बत्ती अभी जल रही थी।
मीरा ने कैमरा बंद किया, और उसके हाथ काँप रहे थे।
दुकान पर लौटकर मीरा ने कैमरे को मेज़ पर रखा और उसका छोटा सा परदा खोला।
“बैठ,” मैंने कहा।
“नहीं,” उसने कहा।
“मीरा।”
“मैं ठीक हूँ,” उसने कहा। “मैं ठीक हूँ।”
वो ठीक नहीं थी।
टिंकू दरवाज़े पर खड़ा था, हाथ में वो तार का सिरा। मैंने उसे इशारे से बाहर जाने को कहा। उसने सिर हिलाया और चला गया, पर दरवाज़े से दस कदम दूर जाकर, नाली के पुल पर बैठ गया। बच्चे कभी बड़ों की बात नहीं सुनते। वो बस वहाँ होते हैं जहाँ बात होती है।
मीरा ने रिकॉर्डिंग चलाई।
परदे पर रणवीर भारद्वाज की मुस्कान आई।
“नीलामी का नोटिस सरकार भेजती है, बेटा।”
“मैंने तुम्हारे पापा को पैसे दिए थे। एक रुपया वापस नहीं माँगा।”
“उन्होंने अंगूठा लगाया। अपनी मर्ज़ी से।”
“मैं तुम्हारे चैनल पर विज्ञापन दूँगा। महीने का पचास हज़ार।”
“छोटा चैनल, बड़ी हिम्मत। पर सबूत कहाँ है?”
मीरा ने आगे बढ़ाया। पीछे किया। फिर से चलाया।
“छोटा चैनल, बड़ी हिम्मत। पर सबूत कहाँ है?”
फिर से।
“छोटा चैनल, बड़ी हिम्मत। पर सबूत कहाँ है?”
तीसरी बार सुनते हुए मीरा ने परदा बंद कर दिया। उसकी आँखें भरी हुई थीं, पर रो नहीं रही थी। और मुझे लगा कि रोना उस वक़्त ज़्यादा आसान होता।
“कुछ नहीं है,” उसने कहा।
“क्या?”
“कुछ भी नहीं है इसमें,” उसने कहा। “एक भी धमकी नहीं। एक भी गाली नहीं। एक भी ऐसा शब्द नहीं जिसे मैं अदालत में ले जा सकूँ। सिर्फ़ मुस्कान है। सिर्फ़ ‘बेटा’ है। सिर्फ़ पैसे का ऑफ़र है। लोग इसे सुनकर कहेंगे — अरे, आदमी तो अच्छा था। लड़की ही ज़िद्दी है।”
“मीरा,” मैंने कहा।
“मुझे पता है तू क्या कहेगा,” उसने कहा। “तू कहेगा कि यही तो उसका हथियार है। मुझे पता है। सुन, मुझे सब पता है। मुझे यह भी पता है कि उसने रमा मैडम की बात क्यों उठाई।”
वो मेज़ के किनारे पर बैठ गई, और उसने कैमरा अपनी गोद में रख लिया, जैसे कोई बच्चा अपना खिलौना पकड़ता है।
“पाँच साल पहले,” उसने कहा, “मैं एक अखबार में थी। छोटी सी नौकरी थी। रिपोर्टर। मुझे एक खबर मिली — किसी स्कूल में किसी टीचर के बारे में। आधी बात थी। किसी ने कहा था, किसी ने कुछ सुना था, किसी के पास एक फोटो थी। मैंने हेडिंग लगाई। अखबार में छपी। सुबह छपी, शाम तक उस टीचर — रमा मैडम — के घर का माहौल बदल गया। पति ने बात नहीं की, बच्चों को स्कूल में सुनना पड़ा।”
उसने आँखें बंद कीं।
“और फिर मुझे पता चला,” उसने कहा, “कि जो मैंने लिखा था, वो आधा सच था। आधा सच, जो पूरे झूठ जितना नुकसान करता है। मैं उनके घर गई थी। माफ़ी माँगने। वो दरवाज़े पर आईं, मेरी तरफ़ देखा, और बोलीं — ‘बेटा, तुम माफ़ी माँगने आई हो? मैं तुमसे माफ़ी नहीं माँगूँगी। मैं तो बस यह चाहती हूँ कि तुम अगली बार, लिखने से पहले, एक रात सो जाओ। बस एक रात।’”
मीरा ने आँखें खोलीं।
“और मैंने वो रात सोई,” उसने कहा। “पर उस रात के बाद से मैंने एक भी रात ठीक से नहीं सोई। इसीलिए मैं हर छोटी खबर के पीछे पागलों की तरह भागती हूँ। इसीलिए मैं हर काग़ज़ उठाती हूँ। इसीलिए मैं किसी की बात आधी नहीं सुनती। मुझे लगता है कि अगर मैं और मेहनत करूँ, और पूरा सच लाऊँ, तो वो एक खबर धुल जाएगी।”
“धुलती है?” मैंने पूछा।
“नहीं,” उसने कहा, और वो मुस्कुराई, और उस मुस्कान में कुछ टूटा हुआ था। “नहीं धुलती। अब तो वो आदमी मुझे मेरी अपनी ग़लती से डरा रहा है। और सबसे बुरी बात क्या है, अंकुश? सबसे बुरी बात ये है कि वो सही कह रहा है। मेरे पास सबूत नहीं है। मेरे पास सिर्फ़ वो काग़ज़ है जिस पर उसकी मोहर है, वो नोटिस जिस पर सरकारी मुहर नहीं, वो लिफ़ाफ़ा जिस पर नाम नहीं। मैं इसे कैमरे पर कैसे साबित करूँ?”
मैं थोड़ी देर चुप रहा।
फिर मैं उठा, ट्रंक से पेचकस उठाया और मेज़ पर रख दिया। पेचकस का जो पुराना सिरा है न, जो घिसकर चपटा हो गया है — वही मैंने उसकी तरफ़ कर दिया।
“मीरा,” मैंने कहा, “मैं तुझे एक बात बताता हूँ, और यह बात मैंने किसी किताब से नहीं सीखी। मैंने इसे अपने हाथों से सीखा है।”
“क्या?”
“मैंने पेचकस उठाया और उसका घिसा हुआ सिरा मीरा की तरफ़ कर दिया।
“देख रही है इसे?” मैंने कहा। “यह पेचकस मेरे पापा का है। पुराना है। दो दशक से ज़्यादा पुराना। इसका सिरा घिस गया है, क्योंकि इसने हज़ारों पेंच खोले हैं। पर एक बात देख — इसका सिरा घिसा हुआ है, टूटा नहीं। क्यों? क्योंकि हर बार जब मैं इसे इस्तेमाल करता हूँ, मैं इसे सही पकड़ में रखता हूँ। मैं उसे ज़्यादा नहीं घुमाता। ठीक उतना ही घुमाता हूँ जितना पेंच माँगता है।”
मीरा ने पेचकस देखा, फिर मुझे देखा।
“तू क्या कहना चाह रहा है?”
“मैं कहना चाह रहा हूँ कि सच एक पेचस की तरह है,” मैंने कहा। “तू ज़ोर लगाकर उसे घुमाएगी, तो वो घिस जाएगा। तू उसे पूरा नहीं घुमाएगी, तो वो पकड़ेगा नहीं। तुझे ठीक उतना ही घुमाना है, जितना वो माँगता है। और अभी — अभी तेरे पास सबूत नहीं है। तो तू सबूत की तरह ज़ोर मत लगा। तू सच की तरह बोल।”
मीरा ने पेचकस उठाया।
“सच की तरह बोलूँ?”
“हाँ।”
“और अगर वो मेरी बात काट दे?”
“तो काटने दे,” मैंने कहा। “काटने वाला हर आदमी अपनी आवाज़ छोड़ जाता है। और आवाज़ भी एक सबूत होती है, मीरा। कभी-कभी सबसे बड़ा।”
वो थोड़ी देर मेरी तरफ़ देखती रही। उसका चेहरा वैसा ही था जैसा रात को होता है — थका हुआ, पर आँखों में वो चीज़ थी जो मुझे पसंद थी। ज़िद। ज़िद जो हार नहीं मानती।
“वो शाम चार बजे भारद्वाज भवन बुला रहा है,” उसने कहा। “पर तू उसके सामने नहीं जाने वाला। तू काग़ज़ का जवाब गली से देगा। तो मैं उससे एक और मुलाक़ात पर मिलूँगी।”
“कहाँ?”
“जहाँ वो अपनी मुस्कान का सबसे बड़ा शो मना रहा है,” उसने कहा। “गली के मुँह पर, कल शाम को। मुझे पता है वो आएगा। वो रोज़ आता है। वो आज भी आया था, कल भी आएगा। उसे गली के सामने खड़ा होकर अपनी तस्वीरें लगाने की आदत है, नहीं? वो अपने आप को गली पर छाप रहा है, अंकुश। वो अपनी मुस्कान से दीवार पोंछ रहा है।”
“तो तू उसे वहीं रोकेगी?”
“वहीं,” उसने कहा। “कैमरे के सामने। उसकी मुस्कान के सामने। और जब वो मुस्कुराएगा, और मैं सवाल पूछूँगी, तो उसकी मुस्कान में जो छिपा है, वो कैमरे में आ जाएगा।”
मैंने कुछ सोचा।
“मीरा,” मैंने कहा। “एक बात पहले तय कर ले।”
“क्या?”
“अगर वो तेरे चैनल पर विज्ञापन का ऑफ़र दे — और वो देगा, ऐसे आदमी हर किसी को यही देते हैं — तो तुझे पहले से तय करना होगा कि तू क्या कहेगी। क्योंकि जब वो सामने खड़ा होकर मुस्कुराते हुए पैसे की बात करेगा, तो उस वक़्त सोचने का वक़्त नहीं होता।”
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ बदला।
“तू मुझे सिखा रहा है?”
“मैं तुझे नहीं सिखा रहा,” मैंने कहा। “मैं खुद सीख रहा हूँ। और जो मैं सीखता हूँ, वो तुझे बता रहा हूँ। बस इतना।”
वो हँसी। पहली बार उस शाम।
“ठीक है,” उसने कहा। “मैं तय कर लूँगी।”
वो उठी, अपना फटा बैग उठाया और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी। फिर रुकी।
“अंकुश।”
“हूँ।”
“वो जो आवाज़ आई थी ना — ‘अच्छा’? तूने सुनी थी?”
मैंने सिर हिलाया।
“क्या लगता है, किसकी थी?”
“पता नहीं,” मैंने कहा। “पर एक बात पक्की है। जो भी था, उसने कहा ‘अच्छा’, ‘बहुत अच्छा’ नहीं कहा।”
“इसका क्या मतलब?”
“इसका मतलब ये है कि उसने कुछ देखा और मान लिया। उसने पूरा नहीं देखा। और जो आदमी पूरा नहीं देखता, वो कभी न कभी कुछ छोड़ देता है।”
मीरा ने सिर हिलाया और चली गई।
मैं अकेला रह गया। पीछे के कमरे का बल्ब गुनगुनाता रहा। मैंने दरवाज़ा बंद किया और चारपाई पर बैठ गया। जेब से घंटी निकाली। वो अब ठंडी नहीं थी — गुनगुनी थी। मैंने उसे हथेली पर रखा और देर तक देखता रहा।
“तूने ‘तीन’ कहा था,” मैंने धीरे से कहा। “दो नहीं, तीन। कल रात। आज उस्ताद भी वही कह रहे थे — मुझे गिनती में लगने से रोक रहे थे। तीन क्या है, घंटी? मैं हूँ, पापा हैं, और तीसरा?”
घंटी चुप रही।
“ठीक है,” मैंने कहा। “तू चुप रह। पर एक बात कहता चलूँ। वो शाम कोई और नहीं, मैं पूछूँगा। और तब तक तू सोच लेना कि जवाब में क्या कहना है।”
मैंने उसे तकिये के नीचे रख दिया और लेट गया।
रात भर मुझे नींद नहीं आई। मन में बार-बार वही सवाल घूमता रहा — तीन क्या है? और वो कौन था जिसके जूते देखने की बात उस्ताद ने कही थी? मैंने हर बार सोचा कि कल शाम को रणवीर की गाड़ी के नीचे उसके चमकते जूते देखे थे। सफ़ेद। इतने साफ़ कि गली की धूल उनसे अलग लगती थी। जैसे उस आदमी ने गली में पैर ही नहीं रखा, बस हवा से आया और हवा में चला गया।
शाम को जब सूरज ढलने लगा, मैं दुकान के बाहर था। मैंने ट्रंक से पुराना रिंच निकाला और उसे साफ़ करने लगा — बस हाथों को काम देना था। गली में लोग आ-जा रहे थे। पीपल के नीचे बुज़ुर्ग थे। पत्थर की चबूतरी पर कोई पुरानी बात चल रही थी। मैंने सुना — इब्राहीम चाचा और बृजमोहन बाबा आज पहली बार एक ही चबूतरी के दो सिरों पर बैठे थे। बीच में फ़ासला बहुत कम था। दो-दो हाथ का। पर चालीस साल बाद वो दो हाथ भी इतना बड़ा फ़ासला था कि कोई बोल नहीं रहा था। बस बैठे थे।
और मुझे लगा — यही तो सच है। सब टूटा नहीं है। कुछ चीज़ें चुपचाप जुड़ रही हैं।
टिंकू दौड़ता हुआ आया।
“उस्ताद! उस्ताद! सफ़ेद गाड़ी!”
मैंने रिंच रख दिया।
“कहाँ?”
“गली के मुँह पर,” उसने कहा। “पर वो रुकी नहीं। चल रही है — धीरे-धीरे। जैसे कोई गली को देख रहा हो।”
मैं उठा। दुकान का शटर पूरा नहीं खोला — आधा ही छोड़ा। मैंने मीरा को फोन किया।
“कहाँ है तू?”
“पहले ही पहुँच रही हूँ,” उसने कहा। “गली के मुँह पर हूँ। कैमरा तिपाई पर है।”
“अकेली?”
“दो लड़कों को साथ लिया है। मेरे चैनल पर काम करते हैं। हाथ में काग़ज़ हैं। बस इतना — कि अगर वो मुझे रोके, तो ये जवाब दें कि हम कुछ नहीं जानते।”
“और तू क्या कहेगी?”
“जो तय किया था,” उसने कहा। “सच की तरह।”
फोन कट गया।
मैं गली के मुँह की तरफ़ चला। पीछे से टिंकू आ रहा था। मैंने उसे रोका।
“तू पीछे रह,” मैंने कहा। “पीपल के पीछे। और अगर कुछ गड़बड़ लगे, तो घंटी बजाना।”
“अकेले?”
“अकेले नहीं,” मैंने कहा। “चारों जासूस इकट्ठे बैठना। और सानिया की कॉपी साथ रखना।”
वो दौड़कर गया।
मैं गली के मुँह पर पहुँचा तो सफ़ेद गाड़ी वहाँ खड़ी थी — थोड़ी दूर, नुक्कड़ के पास। और रणवीर भारद्वाज गाड़ी से उतर चुका था। वो गली के बोर्ड के पास खड़ा था — वही बोर्ड जिस पर साइकिल गली लिखा है, और जिसका एक कोना आज भी टेढ़ा है। उसके हाथ जुड़े हुए थे। वो उस बोर्ड को देख रहा था, जैसे कोई पुरानी तस्वीर देख रहा हो।
मीरा दस कदम दूर थी। उसका कैमरा तिपाई पर था, लाल बत्ती जल रही थी। दो लड़के दोनों तरफ़ खड़े थे, हाथ में काग़ज़।
मैं पीछे, एक दुकान के साए में रुक गया। मैंने सुना।
मीरा ने पहला सवाल किया।
“रणवीर जी,” उसने कहा, “बस्ती की आवाज़ से मीरा तिवारी। क्या मैं आपसे तीन सवाल पूछ सकती हूँ?”
रणवीर ने उसकी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वही मुस्कान आई — वही जो तस्वीरों में है। फिर उसने हाथ जोड़े।
“बेटा,” उसने कहा, “तुम मीरा हो? मैंने तुम्हारा चैनल देखा है। अच्छा काम करती हो। सच में। मुझे लगता है हमारे शहर को ऐसे ही लोगों की ज़रूरत है।”
“सवाल पूछ सकती हूँ?”
“तीन नहीं,” उसने कहा। “जितने पूछने हैं, पूछो। मेरा कोई छिपाने का मन नहीं है।”
मीरा ने कैमरे की तरफ़ देखा, फिर उसकी तरफ़।
“नूर अस्पताल की ज़मीन,” उसने कहा। “उसकी नीलामी की तारीख़ तय हो चुकी है। अस्पताल के काग़ज़ फँसे हुए हैं। आपके कंस्ट्रक्शन का नाम उस ज़मीन से जुड़ा है। सच क्या है?”
रणवीर ने हथेलियाँ जोड़कर थोड़ा ऊपर उठाया, जैसे कोई दुआ कर रहा हो।
“बेटा,” उसने कहा, “सच यह है कि मुझे उस अस्पताल से कोई मतलब नहीं है। मतलब है तो सिर्फ़ इस बात से कि वहाँ आने वाले लोगों को नई मशीनें मिलें, अच्छा इलाज मिले। वो इमारत पुरानी है। तुम खुद देख लो — टूटी खिड़कियाँ, पुरानी दीवारें। मैं तो चाहता हूँ कि वहाँ एक नई इमारत बने, जिसमें बड़ा गेट हो, बड़ी खिड़कियाँ हों, और डॉक्टर इसरानी जैसे लोगों को वो सम्मान मिले जो उनका हक़ है।”
“पर अस्पताल की ज़मीन बिक रही है,” मीरा ने कहा। “और आपका नाम उससे जुड़ा है।”
“बेटा, शहर में मेरा नाम कहाँ नहीं जुड़ा है?” उसने कहा। “मैं सड़क बनवाता हूँ, स्कूल बनवाता हूँ, मंदिर बनवाता हूँ। जहाँ काम होता है, वहाँ मेरा नाम जुड़ता है। यह बात बुरी है? या अच्छी है?”
“पापा के अंगूठे के बारे में क्या कहेंगे?”
रहा। रणवीर भारद्वाज एक पल के लिए चुप हुआ।
मैंने उसके चेहरे को देखा। मुस्कान वहीं थी। पर आँखों में कुछ हिला। बहुत थोड़ा। जैसे पानी में पत्थर नहीं, बस एक पत्ता गिरा हो।
“शंकर यादव?” उसने कहा। “पाँच साल पुरानी बात है, बेटा। काग़ज़ के काम में कभी-कभी कुछ ऐसा हो जाता है। कोई अंगूठा लगाता है, कोई हस्ताक्षर करता है। पर मैं तुमसे एक बात कहूँ — मैंने आज तक किसी से ज़बरदस्ती अंगूठा नहीं लगवाया। और जो शंकर भाई हैं, वो खुद बोल सकते हैं। उन्होंने आज सबके सामने कह दिया ना? कि उन्होंने अंगूठा लगाया? तो फिर सवाल कहाँ रहा?”
“अगर वो डर की वजह से लगाया गया हो तो?”
रणवीर ने सिर हिलाया, जैसे कोई बुज़ुर्ग बच्चे की बात सुन रहा हो।
“बेटा,” उसने कहा, “डर बहुत बड़ी चीज़ है। डर से लोग शादी कर लेते हैं, डर से लोग नौकरी छोड़ देते हैं, डर से लोग अपने बच्चों को भी कुछ कह देते हैं। अब अगर कोई पाँच साल बाद कहे कि उसने डर की वजह से अंगूठा लगाया, तो मैं क्या करूँ? उसके डर का इलाज मेरे पास नहीं है। मैं तो बस इतना कहूँगा — जो काग़ज़ है, वो सच है। और जो आदमी है, वो अब खुद सच बोल रहा है। बाकी तुम तय करो।”
मीरा ने अगला सवाल पूछा। उसकी आवाज़ थोड़ी ऊँची थी, पर काँप नहीं रही थी।
“और अस्पताल के बाहर लगा वो बोर्ड? जिस पर लिखा है कि ज़मीन भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की है और अस्पताल के काम का आख़िरी दिन?”
रणवीर ने सिर हिलाया।
“वो बोर्ड मैंने नहीं लगवाया,” उसने कहा। “मेरी कंपनी ने लगवाया। काग़ज़ी काम में कभी-कभी बोर्ड लग जाते हैं। हो सकता है वो गलती से लग गया हो। मैं आज ही हटवा दूँगा।”
“आप झूठ बोल रहे हैं?”
यह बात मीरा ने बहुत सीधे कही। सीधे, बिना झिझक। मैंने देखा कि उसके दोनों लड़के घबरा गए और एक कदम पीछे हटे।
पर रणवीर नहीं हिला।
उसने मीरा की तरफ़ देखा। और फिर वो हँसा। नीची, गुनगुनी हँसी। वो हँसी जो आदमी तब हँसता है जब कोई उसे नीचा दिखाने की कोशिश कर रहा हो और वो जानता हो कि वो नहीं होगा।
“बेटा,” उसने कहा, “तुम पत्रकार हो। तुम्हें ऐसा सवाल पूछने का हक़ है। और मुझे बुरा भी नहीं लगा। असल में मुझे अच्छा लगा। जानते हो क्यों? क्योंकि आजकल लोग सवाल नहीं पूछते। सब सिर्फ़ सुनते हैं, मान लेते हैं, और शेयर कर देते हैं। तुमने पूछा। यह अच्छी बात है।”
फिर वो थोड़ा आगे आया। एक कदम।
“पर बेटा, तुम्हें एक बात समझनी चाहिए,” उसने कहा। “सवाल पूछना एक चीज़ है। और सवाल को साबित करना दूसरी। तुमने यह पूछा कि मैं क्या झूठ बोल रहा हूँ। बहुत अच्छा। अब मैं तुमसे पूछता हूँ — तुम्हारे पास क्या है? एक काग़ज़ है, जिस पर मोहर है, पर तारीख़ नहीं। एक नोटिस है, जिस पर हस्ताक्षर है, पर गवाह नहीं। एक लिफ़ाफ़ा है, जिसमें कुछ है, पर भेजने वाले का नाम नहीं। अब तुम अदालत में क्या दिखाओगी? मोहर? मोहर तो मैं अपनी मोहर कहीं भी लगा सकता हूँ। हस्ताक्षर? हस्ताक्षर तो मेरे वकील के हैं, मेरे नहीं। और नाम? बेटा, बिना नाम का काग़ज़ काग़ज़ नहीं, कचरा है।”
मीरा चुप रही।
“तुम्हारी हिम्मत अच्छी है,” रणवीर ने कहा। “सच में। छोटा चैनल, बड़ी हिम्मत। पर एक बात है। बस्ती की आवाज़ — कितने लोग देखते हैं तुम्हारा चैनल? दो हज़ार? तीन हज़ार?”
“उससे क्या?”
“उससे यह कि मैं तुम्हारे चैनल को बड़ा कर सकता हूँ।” उसने जेब से एक कार्ड निकाला — सफ़ेद, चमकदार। “भारद्वाज कंस्ट्रक्शन अपने सारे विज्ञापन दे सकता है तुम्हारे चैनल को। अख़बार में भी जगह दिलवा सकता हूँ। तुम जैसी लड़की को छोटी गली में नहीं रुकना चाहिए। सोचो — तुम्हारी आवाज़ शहर के हर कोने तक पहुँचे। बस एक शर्त।”
“क्या शर्त?”
“सच्ची खबरें देना,” उसने कहा। “और सच साबित होने के बाद देना। झूठ, अधूरी बात, बिना सबूत के इल्ज़ाम — ये चीज़ें IAS की नहीं, बाज़ार की होती हैं। तुम बाज़ार वाली लड़की नहीं लगती।”
मीरा ने कार्ड की तरफ़ देखा। फिर रणवीर की तरफ़।
“रणवीर जी,” उसने कहा, “आपका ऑफ़र अच्छा है। पर मेरा चैनल छोटा है, और मैं उसे छोटा ही रखना चाहती हूँ। क्योंकि छोटे चैनल में हिम्मत की जगह रहती है।”
वो मुस्कुराई। यह भी पहली बार था — इस बार वो सचमुच मुस्कुराई थी।
“और सबूत की बात करें,” उसने कहा, “तो सबूत अभी नहीं है। पर सच है। और आप जानते हैं क्या? एक दिन सच को सबूत की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। उस दिन लोग खुद गवाही देंगे।”
रणवीर ने कार्ड वापस जेब में रखा। उसकी मुस्कान नहीं बदली। बस हल्की-सी पतली हुई — जैसे किसी ने उसे अंदर से खींच लिया हो।
“ठीक है, बेटा,” उसने कहा। “अपने रास्ते चलो। पर एक बात याद रखना। जो आदमी सबूत के बिना इल्ज़ाम लगाता है, वो एक दिन सबूत के बिना माफ़ी भी माँगता है। और उस दिन कोई उसकी माफ़ी नहीं सुनता।”
वो मुड़ा। फिर वो रुका और मीरा की तरफ़ वापस देखा।
“और हाँ,” उसने कहा। “तुम्हारे चैनल का नाम अच्छा है। बस्ती की आवाज़। पर बेटा, आवाज़ वो होती है जो दूर तक जाए। गली के अंदर रहने वाली आवाज़ को आवाज़ नहीं कहते। उसे बस शोर कहते हैं।”
वो गाड़ी की तरफ़ चला। दरवाज़ा खुला। वो बैठा। गाड़ी हिली और फिर चली गई।
शाम ढल गई थी। गली के मुँह पर गहरा नीला अंधेरा भर रहा था। पीपल के पत्ते हिल रहे थे। मैं दुकान के साए से निकला और मीरा की तरफ़ चला।
वो तिपाई के पास खड़ी थी। कैमरा बंद था। दोनों लड़के अपने काग़ज़ समेट रहे थे।
“देखा तूने?” मैंने कहा।
“देखा,” उसने कहा। “और सुना भी।”
“कैसा लगा?”
वो मेरी तरफ़ मुड़ी। उसकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले नहीं देखा था। कुछ ठंडा। कुछ सपाट।
“लगा कि मैं हार गई,” उसने कहा। “उसने मेरे हर सवाल का जवाब दिया, और मेरे पास हर जवाब पर कोई सवाल नहीं बचा। उसने मुझे अपना कार्ड दिया और मैंने नहीं लिया — पर वो कार्ड मेरे दिमाग़ में रह गया। और उसने यह नहीं कहा कि मैं झूठी हूँ। उसने यह कहा कि मेरे पास सबूत नहीं है। और सबसे बुरी बात — वो सही कह रहा था।”
“तो अब क्या करेगी?”
“रिकॉर्डिंग देखूँगी,” उसने कहा। “शायद कुछ मिल जाए। कोई लफ़्ज़, कोई लहजा, कुछ।”
मैंने सिर हिलाया।
“ठीक है,” मैंने कहा। “देख। और जो मिले, मुझे बता।”
वो अपने दोनों लड़कों के साथ चली गई। मैं गली के मुँह पर खड़ा रह गया।
रात आ गई।
मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में था। मेज़ पर पुराना रेडियो रखा था — वही जो एक ग्राहक ने छोड़ा था और जिसे मैंने कभी ठीक नहीं किया। मैं उसे खोल रहा था, बस हाथों को काम देने के लिए। बल्ब गुनगुनाता रहा। दरवाज़े पर दस्तक हुई।
मैंने दरवाज़ा खोला। मीरा थी। उसके हाथ में कैमरा था। चेहरा थका हुआ।
“लगातार चार बार देखा,” उसने कहा। “एक भी बार नहीं मिला।”
वो अंदर आई और चारपाई पर बैठ गई। उसने कैमरा मेज़ पर रखा।
“उसकी आवाज़ मीठी है, अंकुश। बहुत मीठी। उसने कहीं भी धमकी नहीं दी। एक बार भी नहीं। उसने मुझे ‘बेटा’ कहा, मेरे चैनल की तारीफ़ की, मुझे विज्ञापन दिया, और जब मैंने झूठ बोलने की बात कही, तो वो हँसा। हँसा! कैमरे पर! अब मैं इसे कैसे दिखाऊँ? कोई यह देखेगा तो कहेगा — देखो, कितना प्यारा आदमी है। कितनी अच्छी बातें करता है। पत्रकार लड़की उस पर चिल्ला रही है और वो मुस्कुराकर जवाब दे रहा है।”
मैंने रेडियो का पेंचकस रख दिया।
“मीरा,” मैंने कहा। “तूने उसकी मुस्कान देखी?”
“देखी।”
“उसकी आँखें देखी?”
“क्या मतलब?”
“जब उसने कहा कि मैं चाहता हूँ नई मशीनें मिलें, तब उसकी आँखें देखी? जब उसने कहा कि मैं तो चाहता हूँ डॉक्टर इसरानी को सम्मान मिले, तब उसने कहाँ देखा?”
मीरा ने कैमरा उठाया, वीडियो चलाया, फिर पॉज़ किया।
“वो… वो तिपाई की तरफ़ देख रहा था,” उसने धीरे से कहा। “वो कैमरे में देख रहा था।”
“हाँ,” मैंने कहा। “जब वो इंसान की बात करता है, तो कैमरे में देखता है। और जब वो अपनी बात करता है — जब उसने कहा कि मेरा कोई छिपाने का मन नहीं है — तब कहाँ देखा?”
मीरा ने आगे बढ़ाया। पॉज़ किया।
“मेरी तरफ़,” उसने कहा। “सीधे मेरी आँखों में।”
“यही तो है,” मैंने कहा। “वो जो आदमी कैमरे में देखकर बोलता है, वो अभिनय कर रहा होता है। और जो आदमी आँख में देखकर बोलता है, वो मान रहा होता है कि सामने वाला उसे कभी पकड़ नहीं पाएगा। वो तुझे कमज़ोर समझ रहा है, मीरा। यही उसकी सबसे बड़ी गलती है।”
मीरा देर तक चुप रही। फिर उसने कैमरा बंद किया और सिर नीचे कर लिया।
“अंकुश,” उसने कहा, “तू जानता है मुझे क्या डर लग रहा है?”
“क्या?”
“मुझे डर लग रहा है कि मैं फिर वही करने वाली हूँ,” उसने कहा। “वही जो पाँच साल पहले किया था। मैं सच के बिना बोलूँगी, मेरी बात आधी होगी, और किसी का घर टूट जाएगा। आज उसने मेरे सामने रमा मैडम की बात नहीं उठाई, पर मुझे पता है वो जानता है। वो जानता है कि मैं क्या हूँ। वो मेरे ही डर से मुझे चुप करवा रहा है।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“मीरा,” मैंने कहा, “मुझे एक बात बता। पाँच साल पहले तूने जो लिखा था, वो तेरी गलती थी?”
“हाँ।”
“और तूने उसके बाद क्या किया?”
“माफ़ी माँगी।”
“और फिर क्या किया?”
“सीखा।”
“तो लिखती क्यों नहीं रही जो लिखना है? छोड़ते क्यों नहीं? तेरी गलती नहीं थी, तेरा सबक़ है। और जिसने सबक़ नहीं सीखा, वो कभी सही नहीं लिखेगा। पर तूने सीखा। तो क्या तू उस डर के कारण रुक जाएगी, जो वो बेच रहा है? उस डर के कारण, जो तेरे ही हाथों से बना है और जिसे वो अब तेरी तरफ़ मोड़ रहा है?”
मीरा ने सिर उठाया।
“अंकुश।”
“हाँ।”
“मेरा एक एडिटर था। पहली नौकरी में। सालेम साहब। बहुत कड़क आदमी थे। वो कहते थे — मीरा, तेरे हाथ काँपते हैं जब तू सच बोलती है। और जिसके हाथ काँपते हैं, उसका लिखा कभी नहीं टिकता।”
“और अब?”
“अब मेरे हाथ काम करते हैं,” उसने कहा। “पर आज वो खड़ा था सामने, और मुझे लगा कि मेरे हाथ फिर काँप रहे हैं।”
“काँपने दे,” मैंने कहा। “काँपते हैं तो सही कर काम। मेरे हाथ भी काँपते हैं — जब मैं पहली बार पापा के संदूक की चाबी लेता हूँ, तब भी काँपते हैं। पर टूटी साइकिल ठीक करना रुक नहीं जाता। तू भी रुक मत।”
वो मुस्कुराई। बहुत थोड़ा।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैंने सिर उठाया। इतनी रात को कौन?
“रुक,” मीरा ने धीरे से कहा और उसने कैमरा उठा लिया।
मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। मैंने दरवाज़ा खोला।
सामने बबलू पांडे खड़ा था।
वो कल की तरह नहीं था। न सोने की चेन, न पानदान, न कोई आदमी साथ। सिर्फ़ मोटे शरीर में एक आदमी, जिसका चेहरा पसीने से गीला था। उसकी साँस तेज़ थी। वो गली में घूमकर आया था — दुकान के पीछे की तरफ़ से, इसलिए किसी ने उसे देखा नहीं।
उसके हाथ में एक काग़ज़ था। मुड़ा हुआ। मुड़ा हुआ, थोड़ा गीला, जैसे किसी ने उसे मुट्ठी में भींचकर रखा हो।
“बबलू भाई,” मैंने कहा। “आप इस तरफ़ से?”
“कुछ मत पूछ,” उसने कहा। उसकी आवाज़ कर्कश थी, फटी हुई। “ले ले।”
वो काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। फिर उसने देखा कि मेरे पीछे मीरा खड़ी है। उसकी नज़र मीरा पर पड़ी, फिर उसने काग़ज़ मेरे हाथ में थमा दिया। मेरे हाथ से मीरा के हाथ में चला गया। मैंने उसके हाथ में देखा — काग़ज़ पर रेखाएँ थीं। नीली स्याही। एक तरफ़ नोटिस की शक्ल में कुछ छपा था।
मीरा ने काग़ज़ खोला। उसका चेहरा बदला।
“बबलू भाई, यह क्या है?” मैंने कहा।
“कोई काग़ज़,” उसने कहा। “कुछ ज़रूरी नहीं। बस — इसे अच्छे से देख लो। मैंने यह नहीं छुआ।”
वो पीछे हटा। फिर वो रुका।
“और बेटा,” उसने कहा। “सुबह दस बजे की बात तुझे याद है?”
“हाँ।”
“जवाब देने की ज़रूरत नहीं है,” उसने कहा। “साहब ने आज से दस बजे वाला जवाब हटा दिया है। नई बात हो गई है।”
“नई बात?”
“कुछ नहीं,” वो फिर पलटने लगा। “कुछ नहीं। बस — मैं यहाँ आया नहीं। मैं यहाँ आया नहीं, समझा?”
वो पीछे के अंधेरे में ग़ायब हो गया।
मैंने दरवाज़ा बंद किया और पलटा। मीरा ने काग़ज़ फैलाया। उसका चेहरा सफ़ेद था।
“क्या है?” मैंने पूछा।
“यह नोटिस है,” उसने कहा। “मेरे खिलाफ़।”
“कैसा नोटिस?”
उसने पढ़ा।
“बस्ती की आवाज़ नाम के चैनल पर प्रसारित कथित खबरों की सत्यता के संबंध में,” वो पढ़ने लगी, “हमें शिकायत मिली है कि चैनल संचालिका मीरा तिवारी द्वारा भारद्वाज कंस्ट्रक्शन, इसके स्वामी, और शहर के गणमान्य लोगों के विरुद्ध असत्य, भ्रामक, और मानहानि करने वाली सामग्री प्रसारित की जा रही है। तीन दिन के भीतर स्पष्टीकरण प्रस्तुत करना अनिवार्य है। असफल होने पर न्यायालय में उपयुक्त दवा की जाएगी।”
वो रुकी।
“अंकुश, इस पर तीन लोगों के हस्ताक्षर हैं। और नीचे यह देख — भारद्वाज कंस्ट्रक्शन।”
“काग़ज़ बताओ,” मैंने कहा। “जल्दी।”
“हस्ताक्षर हैं — चंद्रेश सक्सेना। और नीचे — बबलू पांडे।”
मैं थोड़ी देर खड़ा रहा।
“तीन दिन?”
“तीन दिन,” उसने कहा। “और यह काग़ज़… यह काग़ज़ कोई डाक से नहीं आया। बबलू लाया है। रात में। पीछे की तरफ़ से। छुपकर। अंकुश, यह कोर्ट का नोटिस नहीं है। यह धमकी है।”
मैंने हाथ आगे बढ़ाया। उसने काग़ज़ मेरे हाथ में दिया। मैंने उसे उलटा किया। पीछे कुछ छपा था — अपना नाम-पता, कंपनी की मोहर — नीली।
“मीरा।”
“हूँ?”
“इस पर मोहर ताज़ा है,” मैंने कहा। “स्याही उँगली पर लग रही है।”
वो मेरी तरफ़ देखने लगी।
“मतलब?”
“मतलब यह कि यह आज छपा है,” मैंने कहा। “आज शाम को। जब रणवीर तुझसे गली के मुँह पर मिला था — उसी वक़्त यह काग़ज़ बन रहा था। वो तेरे सामने मुस्कुरा रहा था और पीछे यह छप रहा था।”
मीरा ने साँस ली। गहरी। फिर वो चारपाई पर बैठ गई। उसके हाथ से कैमरा फिसल गया और चारपाई पर गिरा।
“अंकुश,” उसने कहा। “अब मुझे क्या करना चाहिए?”
“क्या करना चाहिए?” मैंने कहा। “मुझे तो यह भी नहीं पता कि मैं क्या करूँ।”
“तू ही तो हर बार कुछ बोलता है,” उसने कहा। “अब बोल।”
मैंने घंटी निकाली। वो ठंडी थी। पर जैसे ही मेरी उँगली ने उसे छुआ, वो थोड़ा गरम हुई। जैसे किसी ने अंदर से एक छोटी-सी आँच जला दी हो।
“मीरा,” मैंने कहा। “तीन दिन की बात है। तीन दिन में हम क्या जोड़ सकते हैं?”
“जोड़?”
“हाँ। क्योंकि यह काग़ज़ तेरा नहीं, हमारा है। वो तुझे सिर्फ़ इसलिए दिखा रहा है कि तू अकेली पड़ जाए। जब कोई अकेला होता है, तो उसके हाथ काँपते हैं। तूने खुद कहा — सालेम साहब यही कहते थे।”
मीरा कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने सिर हिलाया।
“तीन दिन में?” उसने कहा। “हम क्या जोड़ सकते हैं?”
“एक-एक बात जोड़ेंगे,” मैंने कहा। “पहले यह बताऊँ कोई सिर्फ़ तेरे पास था जो कोई और नहीं जानता — उसकी शिकायत किसने की, यह लिखा है?”
“कहीं नहीं,” उसने कहा। “शिकायतकर्ता का नाम बिल्कुल नहीं है।”
“तो फिर तीन दिन की धमकी किसकी है?”
“सिर्फ़ हस्ताक्षर,” उसने कहा। “चंद्रेश सक्सेना। और बबलू पांडे।”
“तो बबलू का हस्ताक्षर है?” मैंने कहा। “बबलू ने आज रात खुद यह काग़ज़ तुझे दिया है। अपने हाथ से।”
मीरा ने काग़ज़ पर फिर देखा।
“तो क्या वो…”
“वो डर गया है,” मैंने कहा। “वो अंदर से काँप रहा है। और जो आदमी काँपता है, वो एक दिन बोलता है। हमें बस उस दिन का इंतज़ार करना है।”
वो चुप रही।
मैंने घंटी हथेली पर रखी। वो और गरम हुई। मैंने उसे कान के पास लाया — पर वो कुछ बोली नहीं। बस गुनगुनी रही, जैसे कोई साँस भर रहा हो।
तभी मीरा का फोन बजा।
वो चौंकी। उसने जेब से फोन निकाला। स्क्रीन चमकी। उसने देखा और उसका चेहरा बदल गया।
“कौन है?” मैंने पूछा।
“सालेम साहब,” उसने धीरे से कहा। “मेरे पुराने एडिटर।”
“उठा।”
उसने फोन कान पर रखा।
“हैलो? सालेम साहब?”
मैंने देखा कि उसकी आँखें फैल गईं। उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने फोन थोड़ा दूर किया ताकि मैं भी सुन सकूँ। पुरानी आवाज़ थी — कर्कश, थोड़ी थकी हुई, जैसे बहुत देर से किसी ने बहुत कुछ पी रखा हो।
“मीरा, बेटी,” वो बोल रहे थे। “मैंने सुना है तू उलझ गई है।”
“कौन सा उलझना, साहब?”
“वो ही उलझना,” उन्होंने कहा। “जो मैंने तुझे बहुत पहले बता दिया था। बेटी, बात मान ले। तेरे पास सालेम का फोन आया है — यह अच्छी बात नहीं है। तू बोल दे उनसे कि तेरी उम्र ही नहीं है इस मामले की।”
“मैं काकी नहीं हूँ, सालेम साहब,” मीरा ने कहा। “मुझे कैसे मान लेना है?”
“बेटी, सुन।”
वो कुछ देर चुप रहे। मैंने सुना कि उन्होंने साँस ली, फिर एक शब्द यहाँ, एक वहाँ — जैसे कोई बेचैन हो।
“मुझे बुलाया गया है,” उन्होंने कहा। “आज शाम। मुझसे कहा गया कि तेरी खबर को रोकूँ। और मैंने साफ़ मना कर दिया। मैंने कहा — मीरा जो लिखेगी, वो उसका काम है। पर फिर मुझे बताया गया कि तेरे खिलाफ़ नोटिस जा रहा है।”
“तो?”
“तो अभी मेरे पास एक फोन आया है,” उन्होंने धीरे से कहा। “उस आदमी का। वो कह रहा है कि इस बार बचने का रास्ता सिर्फ़ साहब के पास है।”
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसके हाथ फिर काँप रहे थे।
“क्या कहा उसने?” उसने पूछा।
सालेम साहब की आवाज़ और नीची हो गई।
“उसने कहा कि अगर मैं तुझे नहीं रोक पाया,” उन्होंने कहा, “तो जो पाँच साल पहले रमा मैडम के साथ हुआ, वो अब छोटा करके बताया जाएगा। और अब यह मेरी ग़लती नहीं है, मीरा। मैं सिर्फ़ एक बात कह रहा हूँ — साहब फोन पर आए थे। मुझसे बात की। और मुझे तेरी फाइलें वापस करनी हैं।”
फोन कट गया।
मीरा के हाथ से फोन नीचे गिरा। उसने कैमरा उठाने की कोशिश की, पर उठा नहीं पाई। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
“अंकुश,” उसने कहा। “उसने सालेम साहब को फोन किया।”
“सुना मैंने,” मैंने कहा।
“और कहा कि बचने का रास्ता सिर्फ़ उनके पास है।”
“हाँ।”
“तो इसका मतलब — मैं अब भी घूम कर वहीं आ गई?”
मैंने घंटी मेज़ पर रख दी। वो ठंडी नहीं थी, गुनगुनी थी। मैंने उसकी तरफ़ देखा। शायद वो कुछ कहे। पर वो चुप रही। हो सकता है उसके पास भी कुछ नहीं था।
मैं मीरा के सामने बैठ गया।
“मीरा,” मैंने कहा। “रास्ता अभी भी सिर्फ़ उसके पास है, मुझे पता है। पर सुन। हम सब एक-एक काग़ज़ तोड़ेंगे। धीरे-धीरे। हम उसे हर बार एक ही सवाल देंगे — ‘सबूत कहाँ है?’ और वो हर बार हँसेगा। पर वो हँसेगा ज़्यादा देर नहीं। क्योंकि जो आदमी सबूत की बात करता है, वो सबूत छुपाने में भी लगा होता है। और सबूत छुपाने वाले लोग एक दिन सबूत के नीचे लेट जाते हैं।”
“तू इतना कैसे कह सकता है?”
“क्योंकि मेरे पास तीन दिन हैं,” मैंने कहा। “और मेरे पास घंटी है। और मेरे पास गली है। तेरे पास क्या है?”
वो देर तक मेरी तरफ़ देखती रही।
“मेरे पास कैमरा है,” उसने कहा। “और मेरे पास अंकल सालेम साहब का फोन है।”
“क्या फोन रिकॉर्ड होता है?”
“हाँ,” उसने कहा। “मैंने तो नहीं सोचा था, पर फोन अपने आप रिकॉर्ड करता है।”
मैं मुस्कुराया।
“तो देख,” मैंने कहा। “जब वो काग़ज़ बनवा रहा था, तब वो नहीं जानता था कि उसकी बात रिकॉर्ड होगी। आज रात सालेम साहब की बात रिकॉर्ड हो गई। कल कोई और बात होगी। धीरे-धीरे हमारा काम होगा। और उसका हर बार नया हाथ फँसेगा।”
वो उठी। मैंने देखा कि वो जाने से पहले एक बार रुकी।
“अंकुश,” उसने कहा।
“हाँ?”
“आज रात अगर तू नहीं होता, तो मैं कहीं और होती। किसी और के पास। और शायद — शायद मैं उनकी बात मान लेती।”
“कोई नहीं मानता,” मैंने कहा। “डर सबको लगता है, पर मानता कोई नहीं।”
वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी। उसने दरवाज़ा खोला। बाहर रात थी। गली में चुप्पी थी। बस एक दूर कुत्ता भौंक रहा था, और पीपल के पत्ते धीरे-धीरे हिल रहे थे।
वो रुकी और पलटी।
“तीन दिन,” उसने कहा।
“तीन दिन,” मैंने कहा।
वो गई।
मैं अकेला रह गया।
मैंने काग़ज़ फिर उठाया। मैंने उस पर मीरा का नाम पढ़ा, चंद्रेश सक्सेना का हस्ताक्षर देखा, और नीचे बबलू पांडे का नाम। यह नोटिस कोई काग़ज़ नहीं था। यह शुरुआत थी।
मैंने घंटी उठाई। वो अब ठंडी नहीं थी। वो गुनगुनी थी, और मुझे लगा कि उसका रंग भी थोड़ा गहरा है — जैसे शाम की रोशनी में गर्म पीतल।
“घंटी,” मैंने धीरे से कहा। “तीन दिन में हमें क्या जोड़ना है?”
घंटी चुप रही।
“कुछ तो कह,” मैंने कहा। “तू चुप रहेगी, तो मैं क्या करूँगा?”
फिर भी चुप।
मैंने उसे वापस जेब में रखा। चारपाई पर लेटा। छत की तरफ़ देखा। छत पर पुरानी दरारें थीं। बल्ब गुनगुनाता रहा।
और तभी, बहुत धीमे से, जैसे दूर किसी कुएँ से आवाज़ आए, मैंने एक शब्द सुना।
बस एक शब्द।
मैं उठकर बैठ गया। जेब से घंटी निकाली।
“तूने कहा?”
घंटी चुप थी।
पर मैंने सुना था। ठीक से सुना था। और वो शब्द मेरे दिमाग़ में चुभ गया, जैसे कोई सुई कपड़े में फँस जाए।
शब्द था — “जूते।”
मैं चारपाई पर वापस बैठ गया। हाथों में घंटी थी। मैंने उसे मुँह के पास लाया।
“जूते?” मैंने कहा। “तू मुझे जूते बता रही है? उस्ताद ने भी कहा था — आज रात दुकान पर आने वाले के जूते देखना।”
घंटी चुप रही।
मैंने दुकान के दरवाज़े की तरफ़ देखा। वो बंद था। फिर मैंने खिड़की की तरफ़ देखा। उस पर पुरानी चटाई टँगी थी। मैं उठा, चटाई हटाई, और बाहर झाँका।
गली में अंधेरा था। पीपल एक बड़ा काला साया बनकर खड़ा था। चबूतरी ख़ाली थी।
पर दूर, गली के मुँह की तरफ़, जहाँ बिजली की एक पुरानी खंभा है, वहाँ एक आदमी खड़ा था।
मैंने आँखें सिकोड़ीं। वो चल नहीं रहा था। बस खड़ा था। और उसके जूते… उसके जूते सफ़ेद थे।
मैंने घंटी को ममैंने घंटी को मुँह के पास लाया और धीरे से कहा, "अब क्या? वो आदमी कौन है?"
घंटी ने कुछ नहीं कहा। बस एक गुनगुनाहट, जैसे दूर कोई पुराना तार खिंचकर छूट जाए।
मैंने चटाई वापस टाँगी और दुकान का दरवाज़ा खोलकर बाहर कदम रखा। रात की हवा में वो हल्की सी नमी थी जो बारिश से पहले आती है। पीपल के पत्ते हिल रहे थे, पर मुझे हवा महसूस नहीं हुई।
वो आदमी वहीं खड़ा था। बिजली के पुराने खंभे के नीचे। उसके जूते सफ़ेद थे — बिल्कुल सफ़ेद, जैसे अभी पोंछकर आया हो। पर गली की धूल भी उन पर नहीं लगी थी। यही सबसे अजीब बात थी। गली में कोई आए, और उसके जूते साफ़ रहें — यह उस गली में नामुमकिन था जिसमें आधे घरों के बाहर नाली बहती है।
मैं धीरे-धीरे उसकी तरफ़ बढ़ा।
"भाई साहब," मैंने कहा। "इतनी रात को कोई दुकान ढूँढ रहे हैं? दुकान तो बंद है।"
वो मुड़ा।
उसका चेहरा छिपा हुआ था — पीले पुराने बल्ब की रोशनी नीचे पड़ रही थी और उसका चेहरा ऊपर अंधेरे में था। पर उसकी आवाज़ साफ़ थी। बहुत साफ़। जैसे किसी ने आवाज़ को तराश कर रखा हो।
"बंद नहीं है," उसने कहा। "तुम्हारी दुकान कभी बंद नहीं होती।"
मैंने कदम रोक दिए। "आप कौन हैं?"
"एक ग्राहक," उसने कहा। "पर मेरी चीज़ जैसी कोई चीज़ तुम ठीक नहीं कर सकते।"
"तो फिर क्यों आए?"
वो हँसा। छोटी, ठंडी हँसी। "देखने आया कि तुम कैसे आदमी हो।"
"देख लिया?"
"देख लिया," उसने कहा। "तुम्हारे दादा जैसे हो। वो भी बात-बात में मुँह लगा देते थे।"
मेरी रीढ़ में एक ठंडी सुई चुभी। दादा का नाम। रात को। इस अंधेरे में।
"आप मेरे दादा को जानते थे?" मैंने पूछा।
वो पीछे हटा। धीरे-धीरे। जैसे कोई साया खिसकता हो।
"जानता था," उसने कहा। "पच्चीस साल पहले जानता था। अब भी जानता हूँ।"
वो मुड़ा और चलने लगा।
"रुकिए," मैंने कहा। "आपका नाम?"
वो नहीं रुका। पर जाते-जाते उसने एक बात कही, जो मेरे दिल में एक कील की तरह गड़ गई।
"नाम से क्या होता है," उसने कहा। "तुम उस चीज़ को देखो जो मैं पीछे छोड़ रहा हूँ।"
वो अंधेरे में घुल गया। मैं वहीं खड़ा रह गया, साँस रोककर, कान खड़े किए, पर गली चुप थी। सिर्फ़ दूर एक कुत्ते के रोने की आवाज़ आई।
मैं पलटा और अपने कदमों के नीचे देखा।
वहाँ, मिट्टी पर, एक छोटी सी चीज़ पड़ी थी।
वो एक टिकट था। पुराना, पीला, फटा हुआ टिकट। जैसे कोई ट्रेन का टिकट हो या सिनेमा हॉल का। और उस टिकट पर स्याही से लिखा था — तारीख़। आज की नहीं, पच्चीस साल पहले की।
मैंने टिकट उठाया। उस पर एक पुरानी मुहर थी — बमुश्किल पढ़ी जा सकती थी — पर एक बात साफ़ थी। नीचे कोने में एक छोटा सा नाम छपा था। और वो नाम था — "अस्पताल।"
मैंने टिकट जेब में रखा और घंटी को बाहर निकाला।
"अब बोल," मैंने कहा। "कौन था वो?"
घंटी चुप रही।
"तू जानती है," मैंने कहा। "तूने मुझे जूतों की तरफ़ भेजा। तू जानती थी वो आएगा।"
फिर भी चुप।
"ठीक है," मैंने कहा। "तू नहीं बोलेगी, तो मैं खुद ढूँढ लूँगा।"
और मैं अंदर आ गया। दरवाज़ा बंद किया। पर उस रात मैं सो नहीं पाया। चारपाई पर लेटा रहा और छत की दरारें गिनता रहा। वो टिकट, वो सफ़ेद जूते, वो आवाज़ — सब मेरे सिर में घूमते रहे।
सुबह जब मैंने आँख खोली, तो बाहर पीली धूप फैल चुकी थी, और दरवाज़े पर मीरा खड़ी थी। उसका बाल बिखरा हुआ था। आँखों के नीचे कालापन था। कैमरा उसके हाथ में था, पर वो हिल रहा था — जैसे हाथ काँप रहा हो।
"अंकुश," उसने कहा। "मैंने रात भर सोचा।"
"अंदर आ," मैंने कहा।
वो अंदर आई। पीछे वाले कमरे की चारपाई पर बैठ गई। कैमरा सामने मेज़ पर रख दिया। फिर उसने अपना बैग खोला और वो काग़ज़ निकाला — जो कल रात आया था। जिस पर उसका नाम था, चंद्रेश का हस्ताक्षर और बबलू का नाम।
"तीन दिन की मोहलत है," उसने कहा। "तीन दिन में जवाब देना है, वरना मान लिया जाएगा कि मैंने और मेरे चैनल ने मानहानि की, झूठी खबर छापी, और मेरे खिलाफ़ कार्रवाई होगी।"
"तू अब इससे डर रही है?" मैंने पूछा।
"डर नहीं रही," उसने कहा। "गुस्सा आ रहा है।"
"तो?"
"तो मैं आज रणवीर को रोकूँगी," उसने कहा। "गली के मुँह पर। जब वो गुज़रे, मैं उससे सीधे पूछूँगी। कैमरा चालू रहेगा। उसकी हर मुस्कान, हर शब्द रिकॉर्ड होगा। अगर वो धमकी देगा, सबूत होगा। अगर वो मीठी बात करेगा, तो एक-एक सवाल से उसे ऐसे घेरूँगी कि सच खुद बाहर आ जाए।"
मैंने उसे देखा। उसकी आँखों में वो दम था जो रात की नींद खो चुके लोगों की आँखों में होता है। पर उसके हाथ अब भी काँप रहे थे।
"अकेली जाएगी?" मैंने पूछा।
"तू साथ चल," उसने कहा।
"चलूँगा," मैंने कहा। "पर एक बात सुन।"
"क्या?"
"रणवीर बोलने में तुझसे तेज़ है," मैंने कहा। "उसने मुझे भी बात-बात में बाँध लिया था। तू जब सवाल पूछे, तो जवाब सुनने के बाद रुकना मत। तू अगला सवाल तुरंत पूछ। जैसे कोई दीवार तोड़ते वक़्त पहला हथौड़ा ज़रूरी होता है, और बीच में रुक गए, तो दीवार वापस जुड़ जाती है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तू कैसे जानता है कि मैं रुक जाऊँगी?"
"क्योंकि तू इंसान है," मैंने कहा। "और वो उसी का फ़ायदा उठाएगा।"
वो थोड़ी देर चुप रही। फिर उसने सिर हिलाया।
"ठीक है," उसने कहा। "मैं नहीं रुकूँगी।"
उसने कैमरा उठाया। सेटिंग देखी। बैटरी देखी। फिर उसने एक गहरी साँस ली।
"चल," उसने कहा।
हम बाहर आए।
गली में सुबह का काम चल रहा था। शबनम आपा गुमटी पर चाय के लिए पानी चढ़ा रही थीं। उस्ताद की मशीन की टिक-टिक आज भी कुछ अजीब ही सुनाई दी। पीपल के नीचे दो बुज़ुर्ग बैठे थे और एक बच्चा पतंग की डोर खींच रहा था।
हम गली के मुँह पर पहुँचे और वहाँ खड़े हो गए। मीरा ने अपना कैमरा तैयार किया और उसे सामने ताने रखा।
"अंकुश," उसने कहा। "जब वो गाड़ी से उतरेगा, मैं सीधे उसकी आँखों में देखूँगी। तू पीछे खड़ा रह।"
"पीछे क्यों?"
"क्योंकि वो तुझसे नहीं, खुद से बात करने पर मजबूर होगा," उसने कहा।
मुझे यह बात समझ आई। रणवीर के सामने मेरा होना उसके लिए ढाल था — वो मुझे "बेटा" कहकर, "अंकुश जी" कहकर बात घुमा देता। पर मीरा के सामने, जो अपनी चैनल चलाती है, जिसके हाथ में कैमरा है — वो नहीं घुमा सकता।
हमें ज़्यादा देर नहीं रुकनी पड़ी।
सुबह के पौने दस बजे, गली के मुँह पर सफ़ेद गाड़ी आई। वही सफ़ेद, चमकती गाड़ी। खिड़की खुली। रणवीर भारद्वाज अंदर बैठा था, सफ़ेद कपड़े में, धूप में उसका चश्मा चमक रहा था।
मीरा आगे बढ़ी।
उसने कैमरा उठाया। उँगली से रिकॉर्ड का बटन दबाया।
गाड़ी रुकी। रणवीर ने काँच नीचे किया और मीरा को देखा। उसके चेहरे पर वही मुस्कान थी जो भारद्वाज भवन के बाहर की तस्वीर में थी — हाथ जोड़े हुए, आँखों में शांति, जैसे वो किसी मंदिर से लौट रहा हो।
"अरे," उसने कहा। "बस्ती की आवाज़, मीरा जी। इतनी सुबह? क्या बात है?"
"रणवीर जी," मीरा ने कहा। "तीन सवाल हैं।"
"पूछिए," उसने कहा। "पूछिए। पर एक बात कहूँ — मेरे किसी भी जवाब से अगर आपका चैनल बढ़े, तो मुझे खुशी होगी। मुझे तो लगता है छोटे चैनल भी बड़ों की आवाज़ होते हैं।"
मैंने मीरा के कंधों को देखा। उसने सीधा देखना नहीं छोड़ा।
"पहला सवाल," उसने कहा। "नूर अस्पताल की ज़मीन। उसकी नीलामी का नोटिस आया है। उसमें भारद्वाज कंस्ट्रक्शन का नाम है। सच क्या है?"
रणवीर ने वही मुस्कान बनाए रखी।
"मीरा जी," उसने कहा, "उस अस्पताल में एक्स-रे की मशीन पच्चीस साल पुरानी है। जिस रात मुझे वहाँ जाने का मौका मिला, मैंने देखा कि डॉक्टर इसरानी एक ही बल्ब के नीचे दो मरीज़ देख रहे हैं। मुझे तकलीफ़ हुई। मैंने सोचा — क्यों न वहाँ नई मशीनें हों, नए बेड हों, नई छत हो। ज़मीन का सवाल नहीं है, मीरा जी। इरादे का सवाल है।"
"तो ज़मीन किसके नाम होगी?"
"ज़मीन तो सरकार की होती है, बेटा," उसने कहा। "मैं तो सिर्फ़ निवेशक हूँ। अस्पताल बनेगा, मरीज़ को फ़ायदा होगा, और जिस दिन वो बनेगा, उस दिन आपका चैनल भी वहाँ कवरेज करेगा।"
"दूसरा सवाल," मीरा ने कहा। "पाँच साल पहले शंकर यादव ने आपके दफ़्तर में एक काग़ज़ पर अंगूठा लगाया था। वो काग़ज़ क्या था?"
रणवीर की मुस्कान एक पल के लिए हिली। बहुत हल्की। पर मैंने देखा — और मैंने सोचा कि मीरा ने भी देखा होगा। उसने मानो माथे पर हाथ फेरा, जैसे कोई पुरानी बात याद आ गई हो।
"शंकर भाई मेरे पुराने परिचित हैं," उसने कहा। "बहुत इज़्ज़तदार आदमी हैं। अंगूठा उनसे मैंने माँगा था — उस ज़मीन के काग़ज़ पर नहीं, बल्कि एक मदद के काग़ज़ पर। मुझे लगा था कि उन्हें उस वक़्त मदद की ज़रूरत है। और आज मुझे लगता है कि मैंने सही किया। इंसान की मदद करने में कोई अंगूठा छोटा नहीं होता, मीरा जी।"
"तीसरा सवाल," मीरा ने कहा। "आपने अंकुश को नौकरी का ऑफ़र दिया। अस्पताल की फाइल दिखाई। यह मदद है या दबाव?"
रणवीर ने गाड़ी की सीट पर पीछे झुककर देखा। फिर उसकी नज़र मुझ तक पहुँची। बहुत प्यार से, जैसे कोई चाचा भतीजे को देखता हो।
"दबाव?" उसने कहा। "मीरा जी, मैंने उस लड़के को उसकी काबिलियत पर ऑफ़र दिया था। मैं तो यह भी कहता हूँ कि अगर वो मेरे साथ चले, तो उसकी माँ को सबसे अच्छा इलाज मिलेगा। और आपके चैनल को भी मैं कुछ देना चाहता हूँ — विज्ञापन, थोड़ा बहुत सहयोग। ताकि आपकी भी मेहनत बेकार न जाए।"
मीरा ने कैमरा थोड़ा नीचे किया।
"नहीं चाहिए," उसने कहा।
"क्या नहीं?"
"न विज्ञापन," मीरा ने कहा। "न सहयोग। मुझे अपनी मेहनत बेकार जाने की आदत है, रणवीर जी।"
रणवीर हँसा। उसकी हँसी में कोई कड़वाहट नहीं थी। बिल्कुल साफ़, बिल्कुल मीठी।
"मीरा जी," उसने कहा। "छोटा चैनल, बड़ी हिम्मत। मुझे ऐसे लोग पसंद हैं। पर एक सवाल मेरी तरफ़ से भी।"
"पूछिए।"
"सबूत कहाँ है?"
मीरा चुप हो गई।
"आप कह रही हैं कि मैंने शंकर भाई से अंगूठा लिया। कह रही हैं कि ज़मीन मेरी है। कह रही हैं कि नई इमारत है। पर वो काग़ज़ कहाँ है जिस पर यह सब लिखा हो? वो टेप कहाँ है जिसमें मैंने यह कहा हो? आपका कैमरा तो चल रहा है, मीरा जी। इसमें अभी सिर्फ़ यह है कि मैं एक अस्पताल के लिए मशीनें देने की बात कर रहा हूँ। यह बात आप किसी दिन भी टीवी पर लगा देंगी, तो लोग क्या कहेंगे? यह कहेंगे कि यह आदमी तो अच्छा है।"
उसने गाड़ी की तरफ़ इशारा किया।
"सच बोलने के लिए सबूत नहीं, हिम्मत चाहिए होती है," मीरा ने कहा।
"हिम्मत तो बहुत है आपमें," रणवीर बोला। "पर हिम्मत से किसी अदालत में मुकदमा नहीं जीता जाता। वहाँ काग़ज़ चाहिए। और मेरे पास काग़ज़ हैं। बहुत सारे काग़ज़।"
उसकी नज़र मीरा के हाथ में थमे काग़ज़ पर पड़ी — वो नोटिस जो कल रात आया था।
"वैसे," उसने कहा, "आपको तीन दिन की मोहलत मिली है। मेरी तरफ़ से सलाह है — इन तीन दिनों में आप अपने चैनल की टाइमलाइन साफ़ कर लें। यही अच्छा रहेगा।"
गाड़ी का शीशा ऊपर चढ़ा।
गाड़ी चली गई।
मीरा वहीं खड़ी रह गई। कैमरा अभी भी चालू था। उसकी उँगली रिकॉर्ड के बटन पर थी।
"मीरा," मैंने धीरे से कहा।
उसने कुछ नहीं कहा।
"मीरा," मैंने फिर कहा।
उसने कैमरा बंद किया। फिर गली की तरफ़ मुड़ी और चलने लगी। मैं उसके पीछे-पीछे चला।
वो सीधी मेरी दुकान के पीछे वाले कमरे में गई। चारपाई पर बैठी। कैमरा मेज़ पर रखा। फिर उसने उसे खोला और वीडियो चलाया।
पूरा वीडियो।
मैं पीछे खड़ा रहा।
सफ़ेद कपड़े। मुस्कान। "बेटा" शब्द। "इज़्ज़तदार आदमी।" "मदद की ज़रूरत।" "निवेशक।" "मशीनें।" "छोटा चैनल, बड़ी हिम्मत।"
मीरा ने वीडियो फिर चलाया। फिर चलाया। तीन बार। चार बार। हर बार उसकी आँखें उसी मुस्कान पर टिकती रहीं।
उसने अपना सिर नीचे किया।
"कुछ नहीं है," उसने कहा। "एक भी धमकी नहीं। एक भी ऐसी बात नहीं जिसे मैं अदालत में ले जा सकूँ। वो सिर्फ़ मुस्कुराया और मैं उसे पकड़ नहीं पाई।"
"तूने सवाल तो अच्छे पूछे," मैंने कहा।
"सवाल अच्छे थे," उसने कहा। "पर जवाब भी तो अच्छे थे। मैंने काग़ज़ माँगा? नहीं। मैंने उससे पूछा कि काग़ज़ दिखाइए? नहीं। मैंने सिर्फ़ आरोप लगाए और अपने हाथ में कैमरा पकड़े रही और सोचती रही कि वो पकड़ा जाएगा। पर वो बड़ा आदमी है। वो पकड़ा नहीं जाता। वो सिर्फ़ मुस्कुराता है।"
उसने कैमरा मेज़ पर पटक दिया। ज़ोर से।
"यही मेरी ग़लती है," उसने कहा। "हमेशा रही है।"
"क्या?"
वो चुप रही। मुझे लगा कि वो नहीं बोलेगी। पर फिर उसने बात की — धीमी आवाज़ में, जैसे किसी बीमार की तरह।
"पाँच साल पहले," उसने कहा, "मैं एक अख़बार में थी। छोटी रिपोर्टर। एक टीचर थी — रमा मैडम। उसके बारे में मुझे किसी ने कुछ बताया। मैंने सुना और सुना और बिना पूरी जाँच किए एक खबर छाप दी। आधी सच। आधी झूठ। मेरे पास सबूत था — बस एक काग़ज़ का टुकड़ा जो किसी अजनबी ने फेंका था।"
वो रुकी।
"उस खबर से उसका घर टूट गया। उसका मर्द चला गया। उसके बच्चे को स्कूल से लोगों ने निकाल दिया। और मैं?"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"मुझे पदोन्नति मिली," उसने कहा। "मुझे अपना चैनल बनाने के लिए उसी खबर का नाम काम आया। 'बस्ती की आवाज़' — यह नाम भी उसी दिन पड़ा। मेरी आवाज़ जिसने एक घर तोड़ा।"
मुझे ध्यान आया — माँ की हिसाब की कॉपी। मई कभी उसकी आवाज़ में यह नहीं सुनी थी। यह कमरे की हवा में पहली बार आ रही थी।
"उसके बाद से," उसने कहा, "मैं हर छोटी खबर के पीछे पागलों की तरह भागती हूँ। मैं सोचती हूँ कि अगर मैं हर खबर पकड़ लूँगी, तो शायद किसी दिन मैं अपना वो आधा सच भी पूरा कर सकूँगी। पर नहीं। आज फिर… आज फिर मैंने आधा सच पकड़ा और पूरा खो दिया।"
वो फ़र्श पर बैठ गई।
मैं कुछ देर चुप रहा।
फिर मैंने उसके सामने चारपाई पर बैठकर कहा, "मीरा।"
"क्या?"
"आज तूने झूठ नहीं बोला," मैंने कहा। "आज तूने सिर्फ़ वो पूछा जो तेरे पास था। सवाल अधूरे रह गए। पर झूठ नहीं बोला। और सच बोलने के लिए सबूत ज़रूरी नहीं होता — सच बोलने के लिए हिम्मत ज़रूरी होती है, और वो तेरे पास है।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"पर उस आदमी ने सही कहा," उसने कहा। "हिम्मत से अदालत नहीं जीती जाती।"
"अदालत शायद न जीती जाए," मैंने कहा। "पर गली जीती जाती है। और गली अदालत से बड़ी होती है, मीरा। गली में एक बात जो चार दीवारों में बोली जाती है, वो एक दिन छत उठाकर बाहर आ जाती है। तेरा कैमरा सिर्फ़ सबूत नहीं है। तेरा कैमरा गली का कान भी है। जब रणवीर मुस्कुरा रहा था, तेरा कैमरा चालू था — और उसका मुँह उसमें दिख रहा है। वो मुँह जो 'मदद' कह रहा है, वो 'दबाव' कह रहा है, इसे गली अगर एक बार सुन ले, तो वो अकेली अदालत में जाने की ज़रूरत नहीं रहेगी।"
उसने कोई जवाब नहीं दिया।
तभी बाहर दुकान की तरफ़ से किसी के जूतों की आवाज़ आई। भारी आवाज़। मैं उठा और दरवाज़े से बाहर झाँका।
बबलू पांडे खड़ा था। आज फिर चेन पहनी हुई थी। पानदान भी वापस आ चुका था। पर उसका चेहरा आज कुछ और था। जैसे रात भर सोया हो और उठकर आ गया हो। घमंड वापस आया था।
वो हमारी तरफ़ बढ़ा। उसके हाथ में एक काग़ज़ था — मुड़ा हुआ, मोटा।
"मीरा जी," उसने कहा, आवाज़ में वही पुरानी चबाती हुई लय। "साहब ने कहा था कि आपको अलग से कुछ देना है।"
उसने काग़ज़ मीरा के हाथ में थमा दिया।
मीरा ने उसे खोला।
मैं पीछे से पढ़ नहीं पा रहा था। पर मीरा का चेहरा सफ़ेद हो गया। फिर धीरे-धीरे लाल होने लगा। उसने काग़ज़ ऊपर उठाया, और उसकी आवाज़ तेज़ थी।
"यह क्या है?" उसने कहा।
"नोटिस," बबलू ने कहा। "आपकी नहीं। हमारी तरफ़ से। यही जवाब है साहब का, मीरा जी। यह काग़ज़ अब आपके खिलाफ़ है। आपने अपने चैनल पर झूठी खबर छापी — रणवीर भारद्वाज जैसे इज़्ज़तदार आदमी के खिलाफ़। अब अदालत जाएगा। और साहब का वकील चंद्रेश सक्सेना साहब खुद इस केस को लड़ेंगे।"
मीरा ने काग़ज़ पढ़ा। मैंने उसके हाथ से लिया। काग़ज़ पर वही सब लिखा था जो कल रात आए काग़ज़ पर था — पर आज यह कुछ और था। इसमें यह भी लिखा था कि आरोपी अगर तीन दिन में सार्वजनिक रूप से माफ़ी नहीं माँगती, तो उसके चैनल को बंद करवाने की कार्रवाई की जाएगी। साथ में हर्जाने की बात भी थी — इतनी रकम जो सुनकर मीरा की आँखें छत की दरारों पर टिक गईं।
बबलू मुस्कुराया।
"वैसे," उसने कहा, "साहब ने एक और बात कही थी। कहा कि मीरा जी को यह भी बता देना कि अगर वो चाहें, तो काग़ज़ को… रास्ते में पड़ा मिला कह सकते हैं। सब कुछ ठीक हो सकता है।"
"क्या मतलब?" मीरा ने कहा।
"मतलब," बबलू ने कहा, "कि तीन दिन बहुत होते हैं। एक आदमी को खुद सुलझाने के लिए।"
वो पलटा और चला गया।
मीरा वहीं बैठी रह गई। उसके हाथ में काग़ज़ था और उसकी आँखें उस काग़ज़ पर थीं, पर वो पढ़ नहीं रही थी। वो कहीं और थी। शायद पाँच साल पीछे, किसी अख़बार के दफ़्तर में, किसी आधे सच के साथ।
मैंने उसके सामने घुटने टेके।
"मीरा," मैंने कहा।
उसने मुझे देखा।
"आज तक जो हुआ," मैंने कहा, "वो हो गया। अब तेरे पास यह काग़ज़ है।"
"हाँ," उसने कहा। "यह काग़ज़ मेरे खिलाफ़ है।"
"नहीं," मैंने कहा। "यह काग़ज़ एक दीवार है जो उसने खड़ी की है। और दीवार के पीछे वो खुद छिपा है। तू अगर इस दीवार से डर गई, तो वो जीत जाएगा।"
"तो क्या करूँ? काग़ज़ फाड़ दूँ?"
"काग़ज़ मत फाड़," मैंने कहा। "काग़ज़ फाड़ने से कुछ नहीं होता। गली के सामने खड़े होकर बोल कि यह काग़ज़ आया है। कह कि तुझ पर झूठी खबर का इल्ज़ाम है। कह कि तेरे पास सबूत नहीं, तो क्या हुआ — तेरे पास मुँह है, और वो काफ़ी है।"
"अगर मैं हार गई?"
"तो भी बोल। हार उसको कहते हैं जो चुप हो जाए। तू चुप नहीं होगी।"
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही।
फिर उसने धीरे से काग़ज़ मोड़ा, अपने बैग में रखा, और खड़ी हो गई।
"मैं जा रही हूँ," उसने कहा।
"कहाँ?"
"अपने दफ़्तर," उसने कहा। "कुछ पुराने काग़ज़ देखने हैं।"
वो चली गई।
मैं दुकान के बाहर आया। पीपल के नीचे धूप फैल रही थी। शबनम आपा गुमटी पर कुछ बोल रही थीं, पर आवाज़ मेरे कान तक साफ़ नहीं पहुँच रही थी। मैंने घंटी जेब से निकाली।
"अब बोल," मैंने कहा। "क्या हम सही कर रहे हैं?"
घंटी गुनगुनी थी। पर चुप थी।
"तू हमेशा चुप क्यों रहती है जब सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है?" मैंने कहा।
और तभी — बहुत धीमे से — घंटी ने एक शब्द कहा।
"सुन।"
"क्या सुनूँ?"
वो फिर चुप हो गई।
मैंने सिर उठाया।
और मुझे सुना — दूर से, किसी कमरे के अंदर से, एक फोन की घंटी बज रही थी। मीरा का फोन। वो अपने दफ़्तर में नहीं पहुँची थी — वो शायद अभी भी गली के मोड़ पर थी, बैग से फोन निकाल रही थी।
मैं तेज़ी से वहाँ पहुँचा।
मीरा ने फोन उठाया। उसका चेहरा देखकर मैं समझ गया कि कॉल किसकी है।
"रमेश भाई?" उसने कहा। "नहीं। नहीं। मैं अभी आ रही हूँ।"
वो फोन काटने लगी, फिर रुकी। उसने फोन फिर कान पर लगाया। उसकी आँखें बड़ी हो गईं। उसने देखा — सीधे मेरी तरफ़।
"कौन?" मैंने पूछा।
उसने फोन जेब में रखा।
"मेरा पुराना एडिटर," उसने धीरे से कहा। "पाँच साल वाला। जिसके साथ मैं उस रमा मैडम की खबर छापी थी।"
"क्या कहा उसने?"
वो कुछ देर चुप रही। गली में कुछ बच्चे खेल रहे थे — उनकी आवाज़ें आ रही थीं। पीपल के पत्तों में एक गौरैया चहचहा रही थी।
"वो कह रहा था," मीरा ने कहा, "कि उसे मेरी हालत का पता चला। कि नोटिस की खबर उसे मिल गई।"
"तो?"
"तो वो कह रहा था," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ एक अजीब सी ठंडक में आ गई, "कि इस बार बचने का रास्ता सिर्फ़ साहब के पास है।"
हम दोनों चुप हो गए।
फिर मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।मीरा ने फोन जेब में रखा और कुछ देर वैसे ही खड़ी रही।
मैंने देखा कि उसके हाथ में कैमरा था, पर उँगलियाँ ढीली थीं, जैसे वो कैमरा नहीं, कोई भारी पत्थर पकड़े हो।
"मीरा," मैंने कहा।
"हाँ?"
"तू डर गई।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर हँसी। वो हँसी जो लोग तब हँसते हैं जब उनके अंदर कुछ काँप रहा हो और वो उसे छुपाने के लिए हँस देते हैं।
"मैं डरती नहीं हूँ," उसने कहा।
"मैंने कहा नहीं कि तू डरती है," मैंने कहा। "मैंने कहा कि तू डर गई। दोनों में फ़र्क़ है। डरना आदत है, डर जाना हालत है।"
वो चुप हो गई।
गली के मुँह पर एक ठेला गुज़रा — सब्ज़ी वाला, जो रोज़ शाम इसी वक़्त निकलता है। उसकी घंटी की आवाज़ आई, फिर चली गई।
"मेरा एडिटर," मीरा ने कहा, "पाँच साल से मुझसे नहीं बोला था। आज बोला। और पहली बात यही कही कि बचने का रास्ता साहब के पास है।"
"उसने यह क्यों कहा?"
"क्योंकि उसे पता है," मीरा ने कहा, "कि अगर रणवीर भारद्वाज किसी पत्रकार पर हाथ डाले, तो उस पत्रकार के पास दो ही रास्ते बचते हैं। या तो वो साहब की हो जाए, या वो खत्म हो जाए।"
मैंने घंटी जेब में महसूस की। ठंडी नहीं थी।
"वो खत्म करेगा?" मैंने पूछा।
"मेरे पास एक चैनल है," मीरा ने कहा। "बीस हज़ार लोग देखते हैं। मेरे पास एक कैमरा है, एक फटा बैग है, और एक कमरा है जिसका किराया मैं हर महीने सोचकर देती हूँ। खत्म करने के लिए इतना ही काफ़ी है।"
"तो?"
"तो मैं उससे सीधा पूछूँगी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"किससे?"
"रणवीर भारद्वाज से," उसने कहा। "कैमरे के सामने। अस्पताल की ज़मीन पर। नीलामी पर। पापा के अंगूठे पर।"
"और तू सोचती है वो जवाब देगा?"
"मैं सोचती हूँ," मीरा ने कहा, "कि वो जवाब नहीं देगा। वो मुस्कुराएगा। और उसकी मुस्कान, अगर मैं ठीक से कैमरे में ले लूँ, तो वो मुस्कान उसके खिलाफ़ सबसे बड़ा सबूत बन जाएगी।"
मैंने कुछ देर सोचा।
"तूने उसकी मुस्कान देखी है?" मैंने पूछा।
"रोज़ देखती हूँ," उसने कहा। "हर पोस्टर पर। पर पोस्टर की मुस्कान और आमने-सामने की मुस्कान में फ़र्क़ होता है।"
"क्या फ़र्क़?"
"पोस्टर पर वो मुस्कुराता है," मीरा ने कहा, "क्योंकि कैमरा उसे देख रहा है। सामने जब मुस्कुराएगा, तब पता चलेगा कि वो कैमरे को देखकर मुस्कुरा रहा है या मुझे।"
मुझे यह बात ठीक लगी।
"ठीक है," मैंने कहा। "तो तू कब पूछेगी?"
"आज।"
"आज कैसे? वो तो भारद्वाज भवन में बैठा होगा।"
मीरा ने अपना फोन निकाला।
"मैं उसके दफ़्तर फोन करूँगी," उसने कहा। "मैं कहूँगी कि मैं एक पत्रकार हूँ और मुझे अस्पताल की ज़मीन के बारे में कुछ सवाल पूछने हैं। वो मुझे दफ़्तर बुलाएगा। मैं जाऊँगी।"
"नहीं," मैंने कहा।
"क्यों नहीं?"
"क्योंकि उसके दफ़्तर में तेरे पीछे कोई रिकॉर्डिंग करेगा," मैंने कहा। "और जब तू सवाल पूछेगी, तो वो तुझे ऐसा घुमाएगा कि तेरी रिकॉर्डिंग में तू ही गुनहगार लगेगी।"
मीरा ने फोन नीचे किया।
"तो क्या करें?"
"उससे यहाँ बुला," मैंने कहा।
"यहाँ?"
"गली के मुँह पर," मैंने कहा। "जहाँ सब देख रहे हों। जहाँ उसकी गाड़ी खड़ी हो और उसकी मुस्कान किसी दफ़्तर की कुर्सी पर न बैठे, खुली गली में बैठे।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ आई जो मैंने पहले भी कुछ लोगों की आँखों में देखी थी — डर और ज़िद, दोनों एक साथ।
"वो आएगा?" उसने पूछा।
"आएगा," मैंने कहा। "क्योंकि वो जानता है कि गली उसे देख रही है। और उसे गली के सामने न आने से ज़्यादा डर किसी चीज़ का नहीं है।"
मीरा ने फोन उठाया और नंबर मिलाया।
उसने दो मिनट बात की। बहुत ठंडी आवाज़ में। "जी, मैं मीरा तिवारी बोल रही हूँ, बस्ती की आवाज़ से। मुझे अस्पताल की ज़मीन पर कुछ सवाल पूछने हैं… जी… जी… नहीं, दफ़्तर नहीं। मैं गली के मुँह पर हूँ… अगर आप आज शाम यहाँ से गुज़रें, तो मैं दो मिनट ले लूँगी।"
वो रुकी। सुनी। फिर उसका चेहरा बदला।
"जी," उसने कहा। "जी, ठीक है।"
उसने फोन काटा।
"क्या कहा?" मैंने पूछा।
"उसने कहा," मीरा ने धीरे से कहा, "कि वो गली के मुँह से खुद गुज़रेगा। कहा कि उसने सुना है कि गली में एक नया पत्रकार निकला है जो बिना माइक के सवाल पूछता है। और उसने कहा कि वो उस पत्रकार से मिलने खुद आएगा।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा हुआ।
"उसने 'नया पत्रकार' कहा?"
"हाँ।"
"वो तुझे जानता है," मैंने कहा। "वो तेरा नाम जानता है। वो तेरा चैनल जानता है। वो यह भी जानता है कि तू किसके साथ खड़ी है।"
मीरा ने कंधे उचकाए।
"तो जानता हो," उसने कहा।
मैंने घंटी जेब से निकाली। उसे हथेली पर रखा।
"कुछ कह," मैंने धीरे से कहा।
घंटी चुप रही।
"अच्छा," मैंने कहा। "तेरा भी यही तरीक़ा है। जब सबसे ज़्यादा ज़रूरत हो, तब चुप।"
मैंने उसे वापस जेब में रखा।
"चल," मीरा ने कहा। "मुझे कैमरा तैयार करना है।"
हम दुकान पर लौटे। मीरा ने अपना बैग खोला और उसमें से तिपाई निकाली। वो तिपाई थोड़ी टेढ़ी थी — एक पैर का रबर गायब था, उसकी जगह कपड़ा लिपटा था।
टिंकू पीछे से आया।
"दीदी," उसने कहा, "आज मैं कैमरा पकड़ूँगा?"
"नहीं," मीरा ने कहा।
"प्लीज़।"
"टिंकू," मीरा ने कहा, "आज कैमरा ऐसे आदमी के सामने जाएगा जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी कैमरों के सामने मुस्कुराकर काटी है। अगर तेरे हाथ में कैमरा आया और वो एक बार तेरी तरफ़ देखकर मुस्कुरा दिया, तो तेरे हाथ काँपेंगे।"
"नहीं काँपेंगे।"
"काँपेंगे," मीरा ने कहा। "मेरे भी काँपते हैं। और मैं पाँच साल से यही कर रही हूँ।"
टिंकू ने कुछ नहीं कहा। पर वो वहीं खड़ा रहा। जैसे उसे पता था कि उसका काम अभी आएगा।
शबनम आपा गुमटी से आईं। हाथ में दो गिलास चाय थी।
"पी लो," उन्होंने कहा। "गला सूखा होगा।"
मीरा ने गिलास लिया।
"आपा," मैंने कहा, "आज शाम उसकी गाड़ी गली के मुँह पर रुकेगी।"
शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तो?"
"तो गुमटी खुली रहे," मैंने कहा। "और आप बाहर बेंच पर बैठिए।"
"मैं क्यों बैठूँ?"
"क्योंकि जब वो गाड़ी से उतरेगा," मैंने कहा, "तो उसकी नज़र सबसे पहले उन लोगों पर जाएगी जो उसके सामने खड़े हैं। और जो लोग पीछे बैठे हैं, उन्हें वो देखेगा ही नहीं।"
शबनम आपा ने कुछ देर सोचा। फिर उन्होंने चिमटी उठाई और पीतल की थाली पर धीरे से रख दी।
"मैं बैठूँगी," उन्होंने कहा। "और मैं उसकी गाड़ी का नंबर भी याद रखूँगी।"
"क्यों?"
"क्योंकि," उन्होंने कहा, "जिस दिन यह सब खत्म होगा, उस दिन मैं उस नंबर के आगे एक लाइन लिखूँगी।"
मैं हँसा।
"आपा," मैंने कहा, "आप पत्रकार होनी चाहिए थीं।"
"मैं क्या हूँ," उन्होंने कहा, "यह गली जानती है।"
वो चली गईं।
थोड़ी देर बाद उस्ताद अली बक्श आए। वो धीरे चलते हैं — हर क़दम पर लाठी रखते हैं, जैसे ज़मीन उनकी हो और वो उससे पूछकर आगे बढ़ रहे हों।
"उस्ताद," मैंने कहा। "आपको परेशान कर दिया।"
"मैं बैठा था," उन्होंने कहा। "परेशान नहीं, बैठा था।"
वो मेरी दुकान के पास रखी बेंच पर बैठे।
"बोल," उन्होंने कहा।
मीरा ने उन्हें सब कुछ बताया — एडिटर का फोन, रणवीर का बुलावा, कैमरे का सवाल।
उस्ताद ने सब सुना। फिर उन्होंने अपना चश्मा उतारा, उसे कुर्ते से पोंछा और वापस लगाया।
"कैमरा रखना," उन्होंने कहा।
"जी?"
"कैमरा रखना," उन्होंने दोहराया। "पर उसकी गाड़ी पर मत करना। उसकी तरफ़ मत करना। सीधे उसके पीछे खड़े आदमी पर करना।"
मीरा रुक गई।
"पीछे कौन खड़ा होगा?"
"मुझे नहीं पता," उस्ताद ने कहा। "पर जब कोई बड़ा आदमी गाड़ी से उतरता है, गली में घुसता है, तो उसके पीछे हमेशा कोई एक आदमी होता है जो उससे भी ज़्यादा डरता है। और डरे हुए आदमी का चेहरा कैमरे में सबसे सच बोलता है।"
मीरा ने उनकी तरफ़ देखा।
"आपको यह सब कैसे पता?" उसने पूछा।
"मैंने पचास साल दुकान चलाई है," उस्ताद ने कहा। "मैंने उस दौरान हज़ार कपड़े नापे हैं, हज़ार आदमी नापे हैं। और जो आदमी नापना जानता है, वो हाँकना भी जान जाता है।"
फिर वो उठे।
"अंकुश," उन्होंने कहा।
"जी।"
"जब वो बोले," उन्होंने कहा, "तू बीच में मत बोलना।"
"क्यों?"
"क्योंकि वो तुझसे बोलवाना चाहता है," उन्होंने कहा। "वो तुझे अंदर खींचेगा, तेरी बात को मोड़ेगा, और फिर कहेगा कि देखो, यह लड़का गुस्से में है, इसकी बात में दम नहीं। तू चुप रहेगा, तो वो डरेगा। चुप्पी की आदत नहीं है उसे।"
मैंने सिर हिलाया।
"और एक बात," उन्होंने कहा। "जब वो जाने लगे, तो उसकी गाड़ी नहीं देखना। उसके जूते देखना।"
"जूते?"
"आज सुबह गली में जो आया," उस्ताद ने कहा, "उसके जूते बहुत साफ़ थे। इतने साफ़ कि गली की धूल उनसे अलग लग रही थी। आज शाम को वो बाहर नहीं उतरेगा। वो गाड़ी से ही बोलेगा।"
उन्होंने लाठी उठाई।
"तब उसके जूते कैसे देखूँ?" मैंने पूछा।
उस्ताद मुस्कुराए। बहुत धीमे से। जैसे यह सवाल उन्हें पसंद आया।
"वो उतरेगा," उन्होंने कहा। "क्योंकि वो जानता है कि अगर वो गाड़ी से नहीं उतरा, तो गली कहेगी कि डर गया। और यह बात वो बर्दाश्त नहीं कर सकता।"
वो चले गए।
शाम ढल रही थी। गली में वो पीली रोशनी फैल रही थी जो हर शाम आती है — जब पत्थर भी थोड़ा नरम लगता है और दुकानों के शटरों की आवाज़ भी थोड़ी धीमी।
मीरा ने कैमरा तिपाई पर लगाया।
"चल," उसने कहा। "गली के मुँह पर।"
हम चले।
दुबे अंकल अपनी कुर्सी पर बैठे थे। उनकी नीली शर्ट। उनका पुराना रूमाल। जब हम गुज़रे, उन्होंने कुर्सी से हाथ उठाया।
"मैं यहीं हूँ," उन्होंने कहा। "अगर कुछ हो, तो पीछे मत देखना।"
मैंने सिर हिलाया।
गली के मुँह पर पीपल की छाया थी। मीरा ने तिपाई खड़ी की। कैमरा सेट किया। उसने एक बार कैमरे के छेद में देखा, फिर पीछे हटकर मुझे देखा।
"अंकुश," उसने कहा।
"हाँ।"
"अगर मैं सवाल पूछते वक़्त रुक जाऊँ," उसने कहा, "तो तू मेरी तरफ़ मत देखना।"
"क्यों?"
"क्योंकि जब तू मेरी तरफ़ देखेगा," उसने कहा, "तो मुझे लगेगा कि तू सोच रहा है कि मैं गलत बोल रही हूँ। और मैं रुक जाऊँगी।"
मैंने सिर हिलाया।
"मैं नहीं देखूँगा," मैंने कहा। "मैं उसके जूते देखूँगा।"
वो हँसी। पहली बार आज उसकी हँसी में कुछ असली था।
धूप और नीचे आई। गली के मुँह पर एक लंबी परछाई आई, फिर चली गई। किसी बच्चे की गेंद आई और पत्थर से टकराकर लौट गई।
और फिर गाड़ी आई।
सफ़ेद। चमकदार। इतनी बड़ी कि गली के मुँह पर वो फँसी-सी लग रही थी, जैसे किसी ने समंदर का जहाज़ नाले में डाल दिया हो।
गाड़ी रुकी।
दो सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।
फिर पीछे का दरवाज़ा खुला और रणवीर भारद्वाज उतरा।
सफ़ेद कपड़े। साफ़ कटा बाल। हाथ जोड़कर वो गली की तरफ़ मुड़ा।
और उसने मुस्कुराकर कहा, "राम राम।"
पीपल के नीचे कुछ लोगों ने सिर हिलाया। कोई बोला नहीं।
रणवीर ने मेरी तरफ़ देखा। मुझे। फिर मीरा की तरफ़। और फिर उसके चेहरे पर वो भाव आया जो लोग तब लाते हैं जब उन्हें किसी चीज़ की उम्मीद नहीं थी और वो चीज़ सामने मिल गई।
"तो यह है वो पत्रकार," उसने कहा। "जो बिना माइक के सवाल पूछती है।"
मीरा ने कैमरा उठाया।
"जी," उसने कहा। "और यह कैमरा है। आपको दिक्कत होगी?"
रणवीर हँसा।
"मुझे कैमरे से क्या दिक्कत होगी, बेटा," उसने कहा। "मैं तो रोज़ कैमरों के सामने रहता हूँ। मेरी तस्वीरें गली-गली में लगी हैं। कैमरा मेरा घर है।"
"तो घर में आइए," मीरा ने कहा।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी। बहुत ठंडी।
मीरा ने पहला सवाल पूछा। उसकी आवाज़ साफ़ थी। एक भी काँप नहीं।
"अस्पताल की ज़मीन पर नीलामी का नोटिस आया है," उसने कहा। "उस पर चंद्रेश सक्सेना के हस्ताक्षर हैं। आप उन्हें जानते हैं?"
रणवीर मुस्कुराया।
"चंद्रेश मेरा वकील है," उसने कहा। "वकील हस्ताक्षर करते हैं। यह उनका काम है।"
"तो ज़मीन आपको चाहिए?"
"मुझे ज़मीन नहीं चाहिए," रणवीर ने कहा। "मुझे शहर चाहिए। और शहर को अस्पताल चाहिए। नया अस्पताल। बड़ा अस्पताल। जिसमें नई मशीनें हों, नए बेड हों, और ऐसे डॉक्टर हों जो सत्तर साल की उम्र में भी लाठी टेककर मरीज़ न देखें।"
उसने हाथ जोड़े। जैसे किसी सभा में भाषण दे रहा हो।
"मैं नूर अस्पताल को बंद नहीं कर रहा," उसने कहा। "मैं उसे बेहतर बना रहा हूँ। पुरानी दीवारें गिरेंगी, नई बनेंगी। और उस नई इमारत में डॉक्टर इसरानी के नाम का एक वार्ड होगा। उनकी बीवी के नाम का भी।"
मीरा ने कैमरा थोड़ा और ऊपर किया।
"और जो लोग इस ज़मीन पर रहते हैं?" उसने पूछा। "गली, बाज़ार, पीछे की झुग्गी?"
"उनके लिए नए फ्लैट," रणवीर ने कहा। "सबको। एक-एक को। मैं किसी को बाहर नहीं फेंकूँगा।"
"कितने में?"
"क्या?"
"नए फ्लैट कितने में देंगे?"
रणवीर ने एक पल रुककर उसका चेहरा देखा।
"बेटा," उसने कहा, "यह मोल-भाव मेरे पास नहीं होता। यह सब दफ़्तर में तय होता है। तुम मेरे दफ़्तर आ जाओ, फ़ाइल लेकर बैठो, पूरी डिटेल में बात होगी। चाय पिलाऊँगा।"
"मैं दफ़्तर नहीं आऊँगी," मीरा ने कहा। "मैं यहीं पूछ रही हूँ। और आप अभी हाँ या ना बोलिए।"
गली में एक भी आवाज़ नहीं थी।
शबनम आपा बेंच पर बैठी थीं। उनकी चिमटी हाथ में थी। उन्होंने उसे नीचे नहीं रखा।
रज्जो बाई अपनी बाल्टी लेकर नल के पास खड़ी थीं और बाल्टी झुकी हुई थी, पानी गिर रहा था, पर वो उसे रोक नहीं रही थीं।
भोला भाई अपनी दुकान के शटर के पास खड़े थे, हाथ में पेचकस।
टिंकू साइकिल के पीछे खड़ा था। उसने अपनी जेब में हाथ डाला था। मुझे पता था उसकी जेब में क्या है।
रणवीर ने एक गहरी साँस ली।
"अच्छा," उसने कहा। "तुम पूछो। मैं बोलूँगा। पर पहले तुम यह बताओ — तुम्हें इन सब बातों में इतनी दिलचस्पी क्यों है? तुम गली की लड़की नहीं हो। तुम्हारा घर यहाँ नहीं है।"
"मेरा चैनल का नाम है बस्ती की आवाज़," मीरा ने कहा। "बस्ती मेरा घर है।"
"अच्छा," रणवीर ने कहा। "तो तुम बस्ती की आवाज़ हो। पर बस्ती तो चुप है। मैंने किसी को कुछ कहते नहीं सुना।"
उसने गली की तरफ़ हाथ फैलाया।
"इस गली में कोई नहीं बोलता," उसने कहा। "इस गली में लोग चुप रहते हैं। अगर किसी को तकलीफ़ होती, तो वो मेरे पास आता। पर कोई नहीं आया। कोई नहीं आएगा। क्योंकि मैं किसी का बुरा नहीं कर रहा। मैं तो इनकी ज़मीन के पैसे भी दे रहा हूँ।"
मीरा ने कैमरा नीचे किया।
"आपने नूर अस्पताल में मुफ़्त इलाज का काग़ज़ भेजा," उसने कहा। "उस पर अस्पताल की ज़मीन के बदले अंगूठा माँगा गया है। वो क्या था?"
रणवीर ने बिना हिले जवाब दिया।
"वो सहायता थी," उसने कहा। "डॉक्टर इसरानी के पास पैसा नहीं है। मैंने सोचा, क्यों न कुछ सहायता की जाए। ज़मीन के काग़ज़ तो कानूनी रूप से सिर्फ़ ज़मीन के हस्तांतरण के लिए होते हैं। अगर कोई नहीं अंगूठा लगाता, तो कोई नुकसान नहीं होता। मैं किसी का अंगूठा छीनकर नहीं लगवाता।"
"किसी और से लगवाते हैं?" मीरा ने पूछा।
रणवीर एक पल रुका। यह उसका पहला रुकना था।
फिर उसने मुस्कुराकर कहा, "तुम बहुत तेज़ हो, बेटा। छोटा चैनल और बड़ी हिम्मत।"
"आपने मेरा सवाल नहीं सुना।"
"मैंने सुना," रणवीर ने कहा। "पर जवाब देने से पहले मैं तुमसे एक बात कहना चाहता हूँ।"
उसने एक कदम आगे बढ़ाया।
"मैं सोचता हूँ," उसने कहा, "कि तुम एक अच्छी पत्रकार हो। और अच्छी पत्रकार को पैसा नहीं मिलता। तुम्हें पता है क्या मिलता है? तीन हज़ार व्यू। दस कमेंट। और एक रात की नींद जो हमेशा टूटी रहती है।"
उसने अपनी जेब से एक कार्ड निकाला। सफ़ेद। बिना मोहर, बिना नाम। सिर्फ़ एक फोन नंबर।
"मेरे पास बस्ती के बाहर एक चैनल है," उसने कहा। "छोटा चैनल है। पर उस पर विज्ञापन चलते हैं। जो कंपनी मेरी हो, उसका विज्ञापन उस चैनल पर जाएगा। साल में अठारह लाख। तुम्हारा चैनल भी मेरे साथ चलेगा। तुम्हें स्टूडियो मिलेगा, कैमरा मिलेगा, टीम मिलेगी। और सबसे बड़ी बात — तुम्हें कोई डरा नहीं सकेगा।"
मीरा ने कार्ड देखा।
"अठारह लाख," उसने कहा।
"और ज़रूरत हो तो बीस," रणवीर ने कहा।
गली चुप थी।
मीरा ने कार्ड नहीं लिया।
"मेरा चैनल बिकाऊ नहीं है," उसने कहा।
"मैं तुम्हारा चैनल नहीं खरीद रहा," रणवीर ने कहा। "मैं उसे बड़ा कर रहा हूँ।"
"आप मेरे सवालों का दाम लगा रहे हैं," मीरा ने कहा। "और मैं अपने सवालों को बेचती नहीं।"
रणवीर ने कार्ड वापस जेब में रखा। कोई गुस्सा नहीं। कोई झुँझलाहट नहीं। बस वही मुस्कान।
"ठीक है," उसने कहा। "तो अब मेरी बारी।"
वो मीरा के करीब आया। एक कदम। कैमरा उनके बीच था।
"तुमने तीन सवाल पूछे," उसने कहा। "मैंने तीनों के जवाब दिए। अब मैं एक सवाल पूछूँगा। तुम्हारे पास इस सब का सबूत कहाँ है?"
मीरा रुकी।
"सबूत?" उसने कहा।
"हाँ," रणवीर ने कहा। "तुम कहती हो कि मैंने ज़मीन के काग़ज़ भेजे। कौन से काग़ज़? किसने देखे? कहाँ हैं? तुम कहती हो कि मैंने अंगूठा माँगा। किसका अंगूठा? कौन लगाया? किसके सामने लगा? तुम कहती हो कि अस्पताल बंद हो रहा है। पर अस्पताल खुला है। डॉक्टर बैठे हैं। मरीज़ आ रहे हैं।"
उसने हाथ फैलाए।
"मीरा जी," उसने कहा, "मैं तुम्हारी नीयत पर शक नहीं करता। पर दुनिया नीयत से नहीं चलती। दुनिया काग़ज़ से चलती है। और तुम्हारे पास काग़ज़ नहीं है।"
मीरा ने कैमरा पकड़ा। उसकी उँगलियाँ सफ़ेद हो रही थीं।
"मेरे पास गवाह हैं," उसने कहा। "इस गली में लोग हैं जो बोल सकते हैं।"
"कौन?" रणवीर ने कहा। "यह गली?"
उसने पीछे मुड़कर देखा।
"यह गली जब बोलती है," उसने धीरे से कहा, "तो मैं सुनता हूँ। पर यह गली चुप है। और चुप गली का कोई सबूत नहीं होता।"
मीरा कुछ नहीं बोली।
रणवीर ने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश बेटा," उसने कहा। "तुम्हारे पास कुछ कहना है?"
मैं चुप रहा।
मैंने उसके जूते देखे।
सफ़ेद। चमकते। गली की धूल उन पर नहीं थी। एक भी कण नहीं। जैसे वो उतरकर ज़मीन पर पैर नहीं रखता, ज़मीन उसके नीचे आ जाती है।
"तुम्हारी दुकान का काग़ज़," रणवीर ने कहा, "अभी भी मेरे दफ़्तर में पड़ा है। सोच लो।"
फिर वो मुड़ा।
"कोई और सवाल?" उसने कहा।
मीरा चुप रही।
रणवीर ने हाथ जोड़े।
"तो राम राम," उसने कहा। "और हाँ — अगली बार जब कैमरा लाओ, तो बैटरी चेक कर लेना। तुम्हारे कैमरे की लाल बत्ती दो मिनट पहले बुझ गई थी।"
वो गाड़ी की तरफ़ चला।
मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ।
मीरा ने कैमरा उठाकर देखा। उसकी लाल बत्ती बुझी हुई थी। उसने बटन दबाया — बैटरी खत्म।
रणवीर गाड़ी में बैठा। खिड़की खुली। उसने मीरा की तरफ़ देखकर हाथ हिलाया। फिर गाड़ी चली गई।
गली में कुछ देर तक कोई नहीं बोला।
फिर शबनम आपा उठीं। उन्होंने अपनी चिमटी थाली पर रखी और उसकी आवाज़ ऐसी गई कि मानो कुछ टूटा हो।
"अब बोलो," उन्होंने कहा।
मीरा ने कैमरा बंद किया।
"क्या बोलूँ, आपा," उसने कहा। "मेरे पास कुछ नहीं है।"
मैं उसके पास गया।
"कैसे कुछ नहीं है?" मैंने कहा। "तीन सवाल पूछे, तीनों के जवाब मिले।"
"कौन से जवाब?" उसने कहा। "उसने मुझे जवाब नहीं दिए। उसने मुझे लेक्चर दिया। और उसका लेक्चर मेरे कैमरे में भी नहीं है, क्योंकि मेरी बैटरी खत्म थी।"
"तो दोबारा रिकॉर्ड कर।"
"क्या?" उसने कहा। "मैं क्या रिकॉर्ड करूँ? उसकी मुस्कान? जिसका कोई सबूत नहीं? जिसे कोई अदालत नहीं मानेगी?"
वो तिपाई की तरफ़ बढ़ी, फिर रुकी। उसने तिपाई को खोला, पर कैमरा उतारते वक़्त उसके हाथ काँपे और कैमरा उसकी पकड़ से छूट गया।
मैंने आगे बढ़कर उसे पकड़ा।
वो मेरे हाथ में था।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें भरी हुई थीं।
"पाँच साल पहले," उसने कहा। "पाँच साल पहले मेरे पास भी ऐसा ही एक काग़ज़ आया था। रमा मैडम के बारे में। मेरे पास आधा सच था। बाकी आधा मैंने मान लिया। और मैंने वो खबर छाप दी। और रमा मैडम का घर टूट गया।"
मैंने कैमरा उसे वापस दिया।
"मीरा," मैंने कहा।
"मुझे पता है तू क्या कहेगा," उसने कहा। "तू कहेगा कि यह अलग है। रमा मैडम वाला काग़ज़ एक आदमी ने दिया था, और यहाँ मैं खुद देखकर बोल रही हूँ। पर अंकुश, बात एक ही है। बात सबूत की है। और आज मेरे पास सबूत नहीं है।"
"सबूत नहीं है," मैंने कहा, "तो क्या?"
"तो मैं कुछ नहीं कर सकती।"
"तू गलत बोल रही है," मैंने कहा।
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"सुन," मैंने कहा। "पाँच साल पहले तेरे पास आधा सच था और तूने उसे पूरा बना दिया। वो ग़लती थी। पर आज तेरे पास क्या है? तेरे पास आधा सच भी नहीं है। तेरे पास सबसे बड़ी चीज़ है — तूने वो सवाल पूछे, जो पूरी गली पूछना चाहती थी और नहीं पूछ सकी।"
उसने कुछ नहीं कहा।
"सबूत न होने का मतलब यह नहीं," मैंने कहा, "कि सच नहीं है। सबूत न होने का मतलब सिर्फ़ यह है कि तेरे पास सबूत नहीं है।"
उसने अपनी आँखें पोंछीं। फिर उसने अपना कैमरा उठाया और बैटरी निकाली।
"मैं इसे चार्ज करने जा रही हूँ," उसने कहा। "और कल, सुबह छह बजे, मैं उसके दफ़्तर के बाहर खड़ी होऊँगी।"
"यह ठीक नहीं है।"
"मुझे पता है।"
"पर मैं तुझे रोकूँगा नहीं," मैंने कहा।
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"क्यों?"
"क्योंकि," मैंने कहा, "जिस दिन कोई सच बोलने से रुक जाता है, उस दिन झूठ जीत जाता है। और आज तूने उससे सीधा सवाल किया। यह भी एक तरह का सबूत है। गली ने सुना। गली ने देखा।"
उसने सिर हिलाया। फिर चली गई।
मैं गली के मुँह पर अकेला खड़ा रहा।
घंटी जेब से निकाली। उसे हथेली पर रखा।
"अब बोल," मैंने कहा। "हम आगे क्या करें?"
घंटी गुनगुनी थी।
"तू जानती है," मैंने कहा, "मुझे सबूत नहीं चाहिए। मुझे सिर्फ़ एक बात चाहिए — कि मेरी गली में कोई अकेला न लड़े।"
घंटी ने कुछ नहीं कहा।
"अच्छा," मैंने कहा। "तू भी चुप।"
मैंने उसे वापस जेब में रखा और पीपल के नीचे चला आया।
वहाँ बंसी बाबा बैठे थे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर अपने हाथ की तरफ़। उनके हाथ में एक पुराना फ्रेम था — आधा।
"बेटा," उन्होंने कहा। "बैठ।"
मैं बैठ गया।
"जो आज हुआ," उन्होंने कहा, "वो मैंने देखा।"
"जी।"
"वो आदमी तुमसे नहीं डरता," बंसी बाबा ने कहा। "वो तुम्हारे चैनल से नहीं डरता। वो किसी चीज़ से नहीं डरता।"
"तो किससे डरता है?"
बंसी बाबा ने फ्रेम को हाथ में घुमाया। उसका आधा हिस्सा टूटा हुआ था। उसकी उँगली टूटे हुए किनारे पर रुकी।
"वो हमसे डरता है," उन्होंने कहा। "उस गली से जिसमें लोग मिलकर बैठते हैं। उस गली से जिसमें कोई अकेला नहीं है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"तुम्हारी दुकान के बोर्ड पर जो नाम लिखा है," उन्होंने कहा, "वो तुम्हारे पापा का नहीं, उससे पहले वाले का है। और तुम्हें पता है, उस आदमी ने उस गली में कितने लोगों को जोड़ा था?"
"नहीं।"
"मुझे भी नहीं पता," उन्होंने कहा। "पर मैं इतना जानता हूँ कि उस गली में कोई अकेला नहीं मरा।"
वो उठे।
"और अंकुश," उन्होंने कहा। "मेरा फ्रेम अधूरा है। उसका दूसरा हिस्सा किसी और के पास है। मुझे नहीं पता किसके पास। पर जब मिलेगा, तब तुम्हें बुलाऊँगा।"
"क्यों?"
बंसी बाबा मुस्कुराए।
"क्योंकि तुम वो लड़का हो," उन्होंने कहा, "जो टूटी चीज़ें जोड़ता है।"
वो चले गए।
मैंने उनकी आवाज़ को जेब में रखा, जैसे लोग पैसे रखते हैं।
अंधेरा हो रहा था। पीपल के पत्तों में हवा चल रही थी और चबूतरी पर कुछ पुराने सिक्के जैसी आवाज़ आई — जैसे कोई खेल खेल रहा हो।
मैंने घंटी निकाली।
और इस बार, बिना मेरे कुछ पूछे, घंटी ने कहा, "आज रात।"
"क्या आज रात?"
"जूते," उसने कहा।
"किसके?"
घंटी ने कहा, "तेरी दुकान पर आएगा।"
मैं उठा। मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे।
मैं दुकान की तरफ़ चला।
शाम सात बजे के करीब थी। शटर आधा खुला था। पीछे का कमरा अंधेरा था। बल्ब गुनगुना रहा था।
मैं अंदर गया। औज़ारों का ट्रंक खुला था। नई रिंच वहीं पड़ी थी।
मैं चारपाई पर बैठ गया।
और मैं इंतज़ार करने लगा।
इंतज़ार करते हुए मैंने सोचा — आज दिन में हमने बहुत कुछ जोड़ा था। रमेश और नसीम। पापा का सच। मीरा का सवाल। और जिस चीज़ की कीमत कटी, वो मुझे नहीं दिखी।
पर उस्ताद ने कहा था — कीमत कहीं कटती है।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी।
फिर मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा।
बाहर गली में कोई था।
और उसके जूते मैं देख नहीं सकता था, क्योंकि वो अंधेरे में खड़ा था।
पर उसकी एक आवाज़ आई — धीमी, किसी अधेड़ आदमी की आवाज़।
"अंकुश जी," उसने कहा। "घंटी वाले मालिक तो आप हैं ना?"
मैं उठा।
मैंने घंटी जेब में महसूस की।
और घंटी ने कहा, बहुत धीमे से, "देख।"
॥
मैं दरवाज़े की सलाखों तक गया।
बाहर अंधेरा था, पर गली के मोड़ पर लगी पुरानी बत्ती की पीली रोशनी उसके पैरों तक आ रही थी। जूते पुराने थे, सिले हुए, और तलवे पर सूखी मिट्टी जमी थी, जैसे वो चलकर नहीं, खुदाई करके आया हो।
"अंकुश जी," उसने फिर कहा। "सुन रहे हैं या दरवाज़ा बंद कर देंगे?"
"सुन रहा हूँ," मैंने कहा। "पर पहले ये बताइए, आप खड़े हैं या आपका साया खड़ा है? क्योंकि आपके जूते तो यहाँ तक चलकर आए हैं, और आवाज़ कहीं पीछे से आ रही है।"
वो हँसा। सूखी हँसी थी, जैसे पुराने हैंडपंप से आख़िरी बूँद निकलती है।
"मैं खुद हूँ," उसने कहा। "बस आदमी थोड़ा घिस गया है।"
"घिसे आदमी रात को किसी की दुकान पर नहीं आते," मैंने कहा। "वो घर जाकर सोते हैं।"
"मुझे नींद नहीं आती।"
"तो डॉक्टर के पास जाइए।"
"डॉक्टर के पास जाने के लिए हिम्मत चाहिए," उसने कहा। "और मेरी हिम्मत सिर्फ़ दरवाज़े खटखटाने तक बची है।"
मैं चुप हो गया। मेरी जेब में घंटी ठंडी थी, ठंडी पर ज़िंदा। जैसे कोई चुपचाप सुन रहा हो।
"मैं रणवीर साहब का आदमी हूँ," उसने धीमे से कहा। "पर साहब को मेरा नाम नहीं पता।"
"इतना बड़ा साहब और अपने आदमी का नाम नहीं जानता?"
"साहब को नाम से क्या?" उसने कहा। "साहब को काम से है।"
फिर वो थोड़ा आगे आया। रोशनी उसके चेहरे तक नहीं पहुँची, सिर्फ़ उसकी ठुड्डी तक आई। ठुड्डी पर दो दिन की सफ़ेद दाढ़ी थी। उम्र पचास के आसपास लगी।
"बीस दिन से," उसने कहा, "मैं रोज़ सुबह आठ बजे पुराने बिजलीघर के बंद दरवाज़े पर दो बार खटखटाता हूँ। दो बार। और दो मिनट खड़ा रहता हूँ।"
"कौन खोलता है?"
"कोई नहीं।"
"तो फिर रोज़ क्यों जाते हैं?"
"क्योंकि साहब कभी नहीं पूछते कि दरवाज़ा खुला या नहीं," उसने कहा। "साहब सिर्फ़ पूछते हैं, गए थे?"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"और आज रात?" मैंने पूछा। "आज रात साहब ने क्या पूछा?"
"साहब ने कहा, जा, उस लड़के से मिल। डरा दे। बोल दे कि दुकान जाएगी, बाप की नौकरी जाएगी, माँ की दवा जाएगी।"
"और आपने?"
"मैंने सोचा, पहले देख तो लूँ कि लड़का कैसा है," उसने कहा। "डराने से पहले आदमी को देखना चाहिए।"
"तो देख लिया। कैसा हूँ?"
उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा।
"तुम अंधेरे में भी खुश लग रहे हो," उसने कहा। "ऐसे आदमी को डराना मुश्किल है।"
फिर उसने अपनी जेब में हाथ डाला और एक पल के लिए रुका।
"आज मैंने एक काम खुद किया," वो बोला। "जो साहब ने नहीं कहा था।"
"क्या?"
"मैं तुम्हें सिर्फ़ सामान देने आया था।" उसने मिट्टी की तरफ़ देखा, जहाँ कुछ पड़ा था। "पर वो हाथ से गिर गया।"
"क्या गिरा?"
"जो बीस दिन से मेरी जेब में था," उसने कहा। "मैं उसे फेंकने की हिम्मत नहीं कर पाया था। आज जब तुमने मुझे पहचान लिया, तो हाथ खुल गया।"
"आपने मुझे कब पहचाना?"
"जब तुमने दरवाज़ा खोला," उसने कहा। "साहब को पता है कि तुम कौन हो। अब मुझे भी पता है।"
मैंने नीचे झुककर देखा। मिट्टी पर वो पीला टिकट पड़ा था, जो मुझे पहले मिला था। पच्चीस साल पुरानी तारीख़, कोने में अस्पताल लिखा।
"ये आपका है?" मैंने पूछा।
"ये मेरा नहीं," उसने कहा। "ये उस दरवाज़े के नीचे से निकला था। बीस दिन पहले। जिस दिन मैं पहली बार खटखटाने गया था।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"मतलब दरवाज़े के उस पार कोई है," मैंने कहा।
"कोई है," उसने कहा। "और वो सुनता है। मुझे यक़ीन है, वो सुनता है।"
"तो फिर खोलता क्यों नहीं?"
"क्योंकि वो किसी और का इंतज़ार कर रहा है," उसने कहा। "मेरा नहीं।"
वो पीछे हटा।
"एक बात और," उसने कहा। "आप जो काग़ज़ पर अंगूठा नहीं लगा रहे ना, साहब उस काग़ज़ को अपनी तिजोरी में नहीं रखते। वो उसको किसी और को दे देते हैं।"
"किसको?"
"जो साहब से भी ऊपर है," उसने कहा। "और वो काग़ज़ पर अंगूठा नहीं माँगता। वो नाम माँगता है।"
"नाम?"
"हाँ।" उसकी आवाज़ और धीमी हो गई। "उसकी उँगली में काली अंगूठी है। और साहब, साहब उसके आगे हाथ जोड़ते हैं।"
मैंने साँस रोक ली।
"आपने उसे देखा है?"
"मैंने सिर्फ़ उँगली देखी है," उसने कहा। "गाड़ी की खिड़की से, एक बार। बस उँगली। साहब जब उससे बात करते हैं, तो खिड़की बंद रहती है।"
फिर वो मुड़ा।
"मुझे अब जाना होगा," उसने कहा। "सुबह फिर खटखटाने जाना है।"
"आप जाएँगे?" मैंने पूछा। "आज भी?"
"आज भी," उसने कहा। "आदमी को एक काम मिल जाए तो वो उसी को पकड़कर जीता है। मेरे पास यही एक काम बचा है।"
वो अंधेरे में घुल गया। उसके जूतों की आवाज़ भी नहीं आई। सिर्फ़ धूल में उसके पैरों के निशान बचे थे, जो हवा धीरे-धीरे मिटा रही थी।
मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा।
फिर घंटी ने कहा, "जूते देख लिए?"
"देख लिए," मैंने कहा।
"वो डरा हुआ है," घंटी ने कहा।
"मुझे भी लगा।"
"नहीं," घंटी ने कहा। "वो डरा हुआ है, पर उस डर के पीछे कुछ और है। वो अपने फ़ायदे के लिए नहीं डरा है।"
"तो?"
"वो उस दरवाज़े से डरता है," घंटी ने कहा। "और जो आदमी किसी दरवाज़े से डरता है, वो उसे रोज़ खटखटाने जाता है। सोच, क्यों?"
मैंने सोचा। और मुझे जवाब नहीं मिला।
घंटी चुप हो गई।
मैंने टिकट उठाया, उसे अपनी जेब में रखा, और दरवाज़ा बंद कर दिया।
उस रात मैंने आँखें बंद कीं, पर नींद नहीं आई। मेरे कान में बार-बार एक ही लाइन घूम रही थी — साहब उस काग़ज़ को किसी और को दे देते हैं, जो नाम माँगता है।
सुबह मुझे नींद से नहीं, आवाज़ ने उठाया।
ड्रिल की आवाज़।
मैं उठा, मुँह धोया, शटर उठाया, और सामने देखा।
गली के मुँह पर दो आदमी खड़े थे। एक के हाथ में पीतल का नया नल चमक रहा था, दूसरा सीमेंट का थैला खोल रहा था। उनके पीछे एक बड़ा बोर्ड टेक लगाकर खड़ा कर दिया गया था, जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा था — मुफ़्त स्वास्थ्य जाँच शिविर। नीचे छोटी लाइन में — मुफ़्त दवा, मुफ़्त जाँच, बड़े अस्पताल के डॉक्टर।
और उस बोर्ड के ऊपर रणवीर भारद्वाज की तस्वीर थी, हाथ जोड़े हुए।
मैंने पहचान लिया। वो एक आदमी वही था जो बबलू के साथ नाप लेने आया था, कमल जैसे चेहरे वाला, जो ज़मीन में कील ठोंक रहा था।
"अंकुश भाई!" उसने दूर से ही हाथ हिलाया, जैसे हम पुराने दोस्त हों। "इधर आओ, देखो साहब का तोहफ़ा।"
मैं धीरे-धीरे चला।
रमेश भाई पहले से वहीं खड़े थे। उनकी आँखों में अजीब सी चमक थी। नसीम भाई दूसरी तरफ़ खड़े थे, हाथ में वही गीला तौलिया।
"देखो," कमल चेहरे वाले ने कहा, "पुराना नल कब से टपक रहा था। साहब ने कहा, गली के लोगों को पता भी नहीं चलेगा, नल बदल जाएगा। पीतल का, टिकाऊ, बीस साल की गारंटी।"
"पैसे?" रमेश ने पूछा, हालाँकि जवाब उन्हें पता था।
"पैसे किस बात के?" वो हँसा। "साहब कहते हैं, गली की औरतें रोज़ तीन बाल्टी पानी ढोती हैं। ये साहब को अच्छा नहीं लगता।"
मैंने रमेश भाई की तरफ़ देखा। उनका चेहरा लाल हो गया। मुझे पता था — उनकी औरत की किडनी में पत्थर है, और वो रोज़ तीन बाल्टी भरते हैं। ये बात उन्होंने दो दिन पहले सबके सामने कही थी।
उन्हीं दो दिन में रणवीर के आदमी को ये भी पता चल गया कि किसके घर में कितनी बाल्टी उठती है।
"मुफ़्त में नल लग रहा है," नसीम भाई ने धीमे से कहा। "तो लगने दो।"
"नसीम भाई," मैंने कहा, "आपने तो अभी पिछले महीने दो सौ अस्सी रुपये लगाकर नल ठीक कराया था। याद है? तीन महीने की तारीफ़ वाली बात भी हुई थी।"
वो चुप हो गया। उसने गीला तौलिया घुटनों पर रख लिया।
"और ये जाँच वाला बोर्ड?" मैंने पूछा। "कल से?"
"कल सुबह दस बजे से," कमल चेहरे वाले ने कहा। "डॉक्टर आएँगे, मशीन आएगी, दवा मुफ़्त। किसी को कुछ नहीं देना है।"
"अंगूठा भी नहीं?"
उसकी मुस्कान एक पल के लिए रुकी। फिर वो और चौड़ी हो गई।
"अंकुश भाई," उसने कहा, "आप बड़े मज़ाकिया हो।"
"मैं मज़ाकिया नहीं हूँ," मैंने कहा। "मैं सिर्फ़ सस्ता हूँ। मेरा मज़ाक भी पैसा नहीं लेता।"
तभी शबनम आपा की आवाज़ आई। वो अपनी गुमटी से निकली, हाथ में लोहे की चिमटी, और सीधे उस बोर्ड के सामने आकर खड़ी हो गई।
"मुफ़्त का नल," उसने कहा, "और मुफ़्त की दवा। दोनों बड़ी प्यारी चीज़ें हैं।"
"बिल्कुल, आपा जी," कमल चेहरे वाला मुस्कुराया।
"पर सुन लो," शबनम आपा ने कहा, "मुफ़्त की चीज़ में डोर बँधी होती है। और डोर का दूसरा सिरा हमेशा किसी की मुट्ठी में रहता है। आज नल मुफ़्त है, कल पानी का दाम पूछा जाएगा। आज दवा मुफ़्त है, कल उस दवा के बदले कोई और चीज़ माँगी जाएगी।"
"आपा जी, आप बहुत शक करती हैं।"
"मैं शक नहीं करती," शबनम आपा ने कहा। "मैं हिसाब रखती हूँ। और मेरा हिसाब कभी गलत नहीं निकला।"
वो मुड़कर गुमटी में चली गई। चिमटी थाली पर पड़ी, टन की आवाज़ आई।
कमल चेहरे वाला हँसता रहा, पर उसकी हँसी अब पहले जैसी नहीं थी।
——
आठ बजे के आसपास सानिया दौड़ती हुई आई।
"अंकुश भैया!" वो हाँफ रही थी। "आज वो आदमी नहीं आया।"
"कौन?"
"वही जो रोज़ सुबह आठ बजे बिजलीघर का दरवाज़ा खटखटाता है," उसने कहा। "गुड्डू रोज़ देखता है। आज वो गया, दो मिनट खड़ा रहा, और वो आदमी आया ही नहीं।"
मेरा पेट ठंडा हो गया।
"क्या मतलब आया नहीं?"
"मतलब आया नहीं," सानिया ने कहा। "दरवाज़ा बंद था, कोई खटखटाने वाला नहीं था। गुड्डू ने कहा कि ज़रूर कुछ गड़बड़ है।"
मैंने कुछ नहीं कहा। पर अंदर से मैं जान गया था कि गड़बड़ है। वो आदमी रात को मुझसे मिला था। और आज सुबह वो अपनी जगह पर नहीं आया।
किसी ने उसे रोक दिया था। या किसी ने उसे हटा दिया था।
——
दस बजे के करीब मैं पीछे की छत पर चढ़ गया। मेरे हाथ में पुराना डायनमो था, जिसे मैं वैसे ही खोल-बंद कर रहा था, जैसे कोई काम कर रहा हो। पर मेरी आँखें गुमटी की तरफ़ थीं।
बबलू आया था।
वो आज अलग लग रहा था। सोने की चेन नहीं थी, पानदान नहीं था। बस एक पीली काग़ज़ की थैली थी हाथ में। वो गुमटी की बेंच पर बैठ गया और चाय माँगी।
फिर उसने थैली खोली।
अंदर से वैसी ही टॉफ़ी निकली, जैसी रणवीर उस दिन लाया था। केसर और इलायची की खुशबू इतनी तेज़ थी कि मुझे छत तक आ गई।
बच्चे वहीं खेल रहे थे। चारों — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू।
"आओ, आओ," बबलू ने कहा, बड़ी मीठी आवाज़ में। "टॉफ़ी लो।"
चिंटू सबसे छोटा था। वो सीधे आगे बढ़ गया।
"क्या बोलते हो?" उसने कहा।
"अरे, साहब की टॉफ़ी है," बबलू ने कहा। "मैं तो तुम्हारा ही भला चाहता हूँ।"
उसने चारों को एक-एक टॉफ़ी दी। चिंटू ने तुरंत काग़ज़ खोलकर मुँह में डाल दी। रफ़ीक़ ने पहले सूँघी, फिर खाई। गुड्डू ने जेब में रख ली। सानिया ने हाथ में पकड़ी रही।
"और बताओ," बबलू ने कहा, "अंकुश भैया कैसे हैं?"
"अच्छे हैं," सानिया ने कहा।
"अच्छे हैं?" बबलू ने सिर हिलाया। "मुझे सुना है, वो रात को ठीक से सोते नहीं।"
"सोते हैं," गुड्डू ने कहा।
"अच्छा।" बबलू ने चाय का घूँट लिया। "और वो घंटी? अब भी रखते हैं पास?"
मैंने छत पर अपनी उँगलियाँ रोक लीं।
सानिया ने कहा, "कौन सी घंटी?"
"अरे, वही जो उनकी साइकिल पर है।"
"उनकी साइकिल पर तो घंटी नहीं है," सानिया ने बड़ी मासूमियत से कहा। "साइकिल ही पुरानी है, एक तो पहिया नहीं है।"
बबलू का चेहरा थोड़ा नरम हुआ। उसे लगा कि वो बच्चों से सच निकाल रहा है।
"अच्छा," उसने कहा। "और उनके पापा रात को क्या करते हैं?"
"सोते हैं," रफ़ीक़ ने कहा।
"बस सोते हैं?"
"और खाँसते हैं," चिंटू ने कहा, मुँह में टॉफ़ी दबाकर।
बबलू ने धैर्य से सिर हिलाया।
"सुनो," उसने कहा, "मैं तुम्हें अपनी बात सीधी बताता हूँ। साहब बहुत बड़े आदमी हैं। जो उनका काम करता है, उसका स्कूल का खर्चा, उसकी माँ की दवा, सब साहब उठा लेते हैं। तुम चारों मेरे भरोसे के लड़के लगते हो।"
"हमें क्या करना है?" सानिया ने पूछा।
"बस देखना है," बबलू ने कहा। "रात को तुम्हारे अंकुश भैया के पास कोई आता है क्या? कोई बड़ा आदमी, कोई गाड़ी वाला?"
"नहीं," सानिया ने कहा।
"कोई नहीं आता?"
"कोई नहीं आता," सानिया ने कहा। "बस उस्ताद आते हैं, और शबनम आपा चाय दे जाती है।"
बबलू की आँखों में थोड़ी झुँझलाहट आई। फिर वो मुस्कुराया।
"अच्छा," उसने कहा। "अब मैं जाता हूँ। टॉफ़ी खत्म हो जाए तो मुझे बता देना।"
वो उठा और गाड़ी की तरफ़ बढ़ा।
तभी टिंकू आया।
वो दौड़ता नहीं था। वो ऐसे चल रहा था जैसे कोई बड़ा आदमी सोच-समझकर चलता है। उसके हाथ में आधी पेंसिल थी।
उसने सानिया की तरफ़ देखा, और सानिया ने आँख से कुछ इशारा किया। मुझे छत से ये सब साफ़ दिख रहा था।
टिंकू बबलू के पास गया।
"अंकल," उसने कहा।
"हाँ बेटा।"
"आप टॉफ़ी बाँट रहे थे?"
"हाँ, तुम्हें भी देता हूँ।"
"नहीं," टिंकू ने कहा। "मेरे पास कुछ है।"
उसने जेब से टॉफ़ी का वो चमकीला काग़ज़ निकाला, जो उसने कहीं से खोला था और जिस पर उसने पेंसिल से दबाकर कुछ लिखा था। फिर उसने उसे दो बार मोड़ा और बबलू की तरफ़ बढ़ा दिया।
"ये क्या है?" बबलू ने पूछा।
"ये मिला था," टिंकू ने कहा, "अंकुश भैया की दुकान के पीछे। कचरे वाली जगह पर। मैंने सोचा, आपको दे दूँ, क्योंकि आप साहब के आदमी हो।"
बबलू ने काग़ज़ खोला। उसने आँखें सिकोड़कर देखा। उसके होंठ हिल रहे थे, जैसे वो पढ़ रहा हो, पर धीरे। मुझे लगा उसे पूरा पढ़ना नहीं आता।
"ये क्या लिखा है?" उसने अपने साथ खड़े एक आदमी से पूछा।
वो आदमी पास आया, काग़ज़ पढ़ा, और उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।
"लिखा है," उसने कहा, "आज रात ग्यारह बजे, पीछे के रास्ते से, बोरी बाँधकर निकलेंगे। घंटी डर के मारे दुकान में तकिये के नीचे छोड़ देंगे। सुबह की गाड़ी पकड़ेंगे।"
बबलू एक पल के लिए चुप रहा।
फिर वो हँसा। इस बार हँसी सच्ची थी, खुली हुई, जैसे किसी ने उसके सीने से पत्थर उतार दिया हो।
"देखा?" उसने अपने आदमी से कहा। "मैं कहता था ना, लड़का डर गया है। सारी बहादुरी दिन की होती है। रात को सब अपने-अपने डर के साथ अकेले होते हैं।"
उसने काग़ज़ को बड़े मज़बूत हाथों से दो बार मोड़ा और अपनी जेब में रख लिया।
"तुम अच्छा लड़का है," उसने टिंकू के सिर पर हाथ रखा। "कल से मेरे पास आ जाना। तुम्हारे लिए भी कुछ काम निकलेगा।"
टिंकू ने सिर हिलाया।
बबलू गाड़ी की तरफ़ बढ़ा। रास्ते में उसने अपना फ़ोन निकाला। बात दो मिनट की हुई। फिर उसने वही काग़ज़ अपनी जेब से निकालकर ध्यान से देखा, और गाड़ी में बैठते वक़्त उसे आगे बैठे एक आदमी को पकड़ा दिया।
गाड़ी चली गई।
मैं छत पर बैठा रहा।
मेरे हाथ काँप नहीं रहे थे। पर अंदर कुछ ऐसा हिल रहा था जो काँपने से भी ज़्यादा खतरनाक था।
मुझे गुस्सा आ रहा था। और मुझे ये भी समझ नहीं आ रहा था कि मैं किस पर गुस्सा हूँ — बच्चों पर, या खुद पर।
——
चारों बच्चे दोपहर में दुकान पर आए। सब एक साथ, हँसते हुए, एक-दूसरे को धकेलते हुए।
"भैया!" चिंटू ने कहा। "आपने सुना नहीं? हमने बबलू को ऐसा फँसाया!"
"बैठो," मैंने कहा। "पहले पानी पियो।"
"भैया, टिंकू ने तो कमाल कर दिया," रफ़ीक़ ने कहा। "वो काग़ज़ पर उसने लिख दिया कि आप रात को भाग रहे हैं।"
"मैंने देखा था," मैंने कहा।
सब चुप हो गए।
"आपने देखा था?" सानिया ने पूछा।
"मैं पीछे की छत पर था," मैंने कहा। "और मैंने सब देखा। तुमने मुँह बनाया, गुड्डू ने टॉफ़ी जेब में रखी, चिंटू ने तुरंत खाई। और टिंकू आया, पेंसिल लेकर, जैसे कोई वकील आता है।"
टिंकू ने अपनी नाक ऊपर कर ली।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तुमने क्या लिखा था?"
"वो सब पढ़ लिया उसने," टिंकू ने कहा।
"मुझे दोहराकर सुनाओ।"
टिंकू ने आँखें नीची कर लीं।
"लिखा था," उसने कहा, "आज रात ग्यारह बजे, पीछे के रास्ते से, बोरी बाँधकर निकलेंगे। और घंटी दुकान में तकिये के नीचे छोड़ देंगे।"
मैंने कुछ देर कुछ नहीं कहा।
हँसी मेरे मुँह तक आई, पर रुक गई। क्योंकि उसी वक़्त मुझे समझ आया — ये मज़ाक नहीं था।
"टिंकू," मैंने कहा, "तुम्हें पता है तुमने क्या किया?"
"मज़ाक किया," उसने कहा। "वो बबलू है ना, उसके साथ मज़ाक ही ठीक है।"
"उसने वो काग़ज़ अपनी जेब में नहीं रखा," मैंने कहा। "उसने उसे आगे बैठे आदमी को दिया। वो काग़ज़ गाड़ी से गया है।"
मेरी आवाज़ धीमी हो गई।
"और उस काग़ज़ में लिखा है," मैंने कहा, "कि घंटी रात को दुकान में अकेली रहेगी।"
मेरे हाथ से पानी का गिलास मेज़ पर रखा गया। टिंकू का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"भैया," उसने कहा, "मैंने सोचा नहीं था।"
"नहीं सोचा था," मैंने कहा। "और यही सबसे बड़ी बात है। कभी ऐसा झूठ मत लिखना जो तुम्हारे किसी अपने पर मुसीबत ले आए। झूठ को हमेशा पता होता है कि उसे कहाँ गिरना है।"
टिंकू की आँखें भर आईं। उसने तुरंत हाथ से आँख पोंछी, क्योंकि वो रोता नहीं था।
फिर सानिया बोली, "तो हम क्या करें, भैया?"
"एक काम करें," मैंने कहा। "वो झूठ सच बन जाए।"
"कैसे?"
"अगर उन्हें लगता है कि मैं रात को भागूँगा," मैंने कहा, "तो वो ग्यारह बजे कोई आदमी भेजेंगे। वो आदमी दुकान में घुसेगा। और दुकान में उसे घंटी नहीं मिलेगी।"
"तो घंटी कहाँ होगी?" गुड्डू ने पूछा।
मैंने अपनी जेब पर हाथ रखा।
"अपने मालिक के पास," मैंने कहा।
बच्चों ने मेरी जेब की तरफ़ देखा। चारों के चेहरे पर वो भाव आया जो बड़े लोगों के चेहरे पर आता है जब उन्हें कोई राज़ बताया जाता है। मुझे हँसी आई।
"अब सुनो," मैंने कहा। "ये बात किसी को नहीं। शबनम आपा को छोड़कर। उन्हें पता होना चाहिए, क्योंकि उनकी गुमटी से दुकान दिखती है।"
"और उस्ताद को?" सानिया ने पूछा।
"उस्ताद को तो सब पता है," मैंने कहा। "उन्हें बताने की ज़रूरत ही नहीं।"
बच्चे हँसे। हँसी देर तक रही।
और उसी हँसी में मुझे वो डर भी महसूस हुआ जो मेरे अंदर पिछली रात से बैठा था। ये बच्चे अब खेल में आ गए थे। और जिस खेल में बबलू जैसे लोग चलते हैं, वहाँ बच्चों के घुटनों की कोई कीमत नहीं होती।
मैंने गुड्डू का कंधा पकड़ा।
"गुड्ड…डू," मैंने कहा, "तुम्हारी उम्र क्या है?"
"ग्यारह," उसने कहा।
"और तुमने आज कितनी बार झूठ बोला?"
उसने सोचा। "पता नहीं। दो बार। तीन बार।"
"तो अब एक और बोलना है। पर ये झूठ ऐसा होगा जो तुम्हें याद रहेगा। और याद रखना — झूठ बोलने के बाद सच बोलने की आदत डालनी पड़ती है, वरना मुँह खराब हो जाता है।"
चारों हँसे। फिर गंभीर हो गए।
"सुनो," मैंने कहा। "कल सुबह से तुम लोग बाज़ार जाओगे। बबलू तुम्हें बुलाएगा। वो तुमसे कुछ पूछेगा। और तुम उसे यह बताओगे कि मैं रात को डर गया हूँ।"
"पर भैया," सानिया ने कहा, "वो सच मान लेगा तो?"
"मानेगा," मैंने कहा। "क्योंकि वो मानना ही चाहता है। जो आदमी दूसरों को डरा-डरा के चलता है, वो सबसे पहले यही मानता है कि सब डरते हैं।"
"और अगर वो टॉफी दे?" चिंटू ने पूछा।
"ले लेना," मैंने कहा।
"पर भैया, टॉफी तो उसकी तरफ़ से होगी।"
"टॉफी टॉफी होती है," मैंने कहा। "तुम उसका मुँह नहीं खा रहे। तुम उसका हाथ देख रहे हो। और हाथ से ज़्यादा ज़रूरी है — जो काग़ज़ उसके हाथ में है, वो कहाँ जाता है।"
टिंकू ने आँखें मलीं। "भैया, एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"अगर वो मुझे टॉफी दे और मैं उसके काग़ज़ पर कुछ लिख दूँ, तो वो पढ़ेगा कैसे? वो तो पढ़ना नहीं जानता, न?"
मैं मुस्कुराया।
"टिंकू," मैंने कहा, "वो खुद नहीं पढ़ेगा। वो उसे साहब को भेजेगा। और साहब पढ़ेगा। तो हमें साहब से बात करनी है, बबलू से नहीं।"
टिंकू की आँखें चमकीं। मुझे लगा कि इस लड़के में कहीं ज़्यादा दिमाग़ है, बस जगह नहीं मिली।
"ठीक है," मैंने कहा। "अब जाओ। सो जाओ। कल सुबह आठ बजे दुकान पर मिलो। और हाँ — ये बात अपनी माँ को भी मत बताना, वरना वो डर जाएँगी और फिर सारी गली को बताएँगी।"
"और शबनम आपा को?" रफ़ीक़ ने पूछा।
"उन्हें मैं खुद बताऊँगा," मैंने कहा।
बच्चे गए। गली में उनके पैरों की आवाज़ गई, फिर दरवाज़ों के बंद होने की आवाज़ आई, फिर सब चुप।
मैं अकेला बैठा रहा।
चारपाई पर बैठकर मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा। शटर आधा खुला था। बाहर अंधेरा था और हवा में वो गंध थी जो बारिश से पहले आती है — मिट्टी की, धूल की, किसी पुरानी चीज़ की।
मैंने घंटी निकाली।
"अब बता," मैंने कहा। "अब तू क्या कहती है?"
घंटी चुप रही।
"सुन," मैंने कहा। "अगर मैं ये झूठ फैलाऊँगा, तो क्या तेरे नियम में कोई गड़बड़ है? मैं झूठ बोलने वाला नहीं हूँ, मैं बच्चों से बुलवा रहा हूँ।"
घंटी फिर भी चुप।
"अच्छा," मैंने कहा। "तू चुप ही रह। मुझे तेरी आदत है।"
और मैं लेट गया।
रात भर मैंने तीन बार आँख खोली। एक बार दरवाज़े पर आवाज़ आई — कोई बिल्ली थी। एक बार पीपल की पत्तियाँ चलीं। और एक बार, मुझे लगा कि रास्ते में कोई खड़ा है, पर खिड़की से देखा तो सिर्फ़ कुत्ता था, जो मेरी गली का ही था और मेरी ही तरह रात को जाग रहा था।
सुबह छह बजे मैं उठा।
मैंने मुँह धोया और दुकान का शटर उठाया। बाहर आसमान में वो रंग था जो सिर्फ़ भोपाल में सुबह के वक़्त दिखता है — हल्का पीला, नीला और थोड़ा-सा गुलाबी।
पीपल के नीचे चबूतरी पर एक बुज़ुर्ग बैठे थे, जो रोज़ आते थे, पर मैंने उन्हें कभी नहीं देखा था। मुझे लगा कि उन्हें मैंने कहीं देखा है, कहीं सुना है, पर याद नहीं आया।
मैंने दुकान के बाहर साइकिल रखी। एक पहिया सीधा करके आवाज़ आई, तो दो पुराने अंकल आए और बोले — "अंकुश, ज़रा हमारी साइकिल भी देख लेना।"
मैंने सिर हिलाया।
पर उससे पहले कि मैं कुछ कहता, गली के मुँह पर शोर हुआ।
दो टेम्पो रुके। एक लाल ट्रक रुका। और उनमें से तीन आदमी उतरे — एक आदमी जिसके हाथ में लोहे का ताला और चाबी थी, दो आदमी जिनके हाथ में बंडल थे। और उनके साथ एक आदमी था जो सफ़ेद कुर्ता पहने था और जिसके हाथ में एक मोटा काग़ज़ था।
वो सीधे नल के पास आए।
"सुनिए, सुनिए," सफ़ेद कुर्ते वाले ने आवाज़ दी। "गली के लिए नया नल। पक्का पानी। साफ़ पानी। सरकारी योजना। मुफ़्त।"
लोग दरवाज़ों से निकलने लगे।
"मुफ़्त?" किसी ने कहा।
"मुफ़्त," उसने कहा। "बस एक काग़ज़ पर अंगूठा।"
मेरे कान खड़े हो गए।
मैंने हाथ में रिंच पकड़ी और दुकान के बाहर आकर खड़ा हो गया।
"और आप," उस आदमी ने मेरी तरफ़ देखकर कहा, "अंकुश भाई, आपकी दुकान भी इस योजना में है। आपकी दुकान के लिए नया काउंटर, नया शटर, नया बोर्ड। बस एक अंगूठा।"
"और एक दिन," मैंने कहा। "लिख के दो — कितने दिन में?"
वो हँसा।
"दो दिन में," उसने कहा।
"अच्छा," मैंने कहा। "और ये नया नल कहाँ लगेगा?"
"यहीं। इसी जगह। पुराने नल की जगह।"
"और पुराने नल का क्या होगा?"
"वो हटा दिया जाएगा।"
"और उस पुराने नल के नीचे जो पत्थर का टैंक है," मैंने कहा, "वो भी हटेगा?"
वो एक पल रुका।
"वो," उसने कहा, "वो देखा जाएगा।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा — रमेश भाई अपने दरवाज़े पर खड़े थे और उनकी बीवी पीछे खड़ी थी, जो पानी की बाल्टी उठाए हुए थी।
"रमेश भाई," मैंने कहा, "आपको नया नल चाहिए?"
वो कुछ नहीं बोले।
"आपकी बीवी को दिन में तीन बाल्टी पानी चाहिए," मैंने कहा। "अगर नया नल लगाने के लिए पुराना नल हटेगा और नया नल दो हफ़्ते बाद आएगा, तो इन दो हफ़्ते में पानी कहाँ से आएगा?"
रमेश भाई ने मुँह खोला, फिर बंद कर दिया।
सफ़ेद कुर्ते वाले ने काग़ज़ आगे किया।
"आप सोचिए," उसने कहा। "सोचने में कुछ नहीं जाता।"
"पर अंगूठा लगाने में जाता है," मैंने कहा।
लोग हँसे। कुछ लोगों ने हँसी में सिर हिलाया। सफ़ेद कुर्ते वाले ने काग़ज़ समेटा और अगली गली की तरफ़ चल दिया।
उसके जाने के बाद रमेश भाई मेरे पास आए।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "मैं झगड़ा नहीं कर रहा। मैं सिर्फ़ पूछ रहा हूँ — अगर सच में नया नल आए, तो?"
"तो अच्छी बात है," मैंने कहा। "पर पहले ये पूछो कि काग़ज़ में क्या लिखा है। ये जो लोग मुफ़्त की बात करते हैं, ये मुफ़्त में कुछ नहीं देते। ये सिर्फ़ उधार देते हैं और उधार की तारीख़ वो खुद लिखते हैं।"
रमेश भाई ने सिर हिलाया, पर उनकी आँखों में वो लालच था जो हर आदमी की आँखों में होता है जब उसे मुफ़्त की बात सुनाई देती है। मैंने कुछ और नहीं कहा। क्योंकि जिसे समझाना हो, उसे एक बार कहना काफ़ी होता है।
फिर दिन चढ़ा।
नौ बजे के करीब बच्चे आए। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — चारों दुकान के बाहर खड़े थे और उनके चेहरों पर वो हँसी थी जो बच्चों के चेहरे पर तब आती है जब उन्होंने कुछ ऐसा किया हो जो बड़ों ने कहा हो पर बड़ों से छुपाया हो।
"भैया," सानिया ने कहा, "हमने कर दिया।"
"क्या किया?"
"बबलू ने हमें बुलाया," गुड्डू ने कहा। "पीपल के पीछे वाली गली में। टॉफ़ी दी। केसर वाली। बड़ी वाली। और पूछा — अंकुश भैया कैसे हैं? डर गए हैं? रात को कहाँ थे?"
"और तुमने क्या कहा?"
"मैंने कहा," चिंटू ने कहा, "कि भैया रात को दुकान में अकेले थे और घंटी को सीने से लगाए बैठे थे।"
"अरे," मैंने कहा।
"नहीं भैया," सानिया ने कहा, "वो मैंने कहा था कि घंटी को हाथ में पकड़े थे, सीने से नहीं। चिंटू गलत बोल रहा है।"
मैं हँसा।
"और फिर?" मैंने पूछा।
"फिर बबलू ने पूछा, 'भागेगा?'" रफ़ीक़ ने कहा। "तो हम चारों ने एक साथ सिर हिलाया। और मैंने कहा — 'बहुत डर गया है। रात को बार-बार उठकर दरवाज़ा देख रहा था।'"
"और टिंकू कहाँ है?"
"वो आ रहा है," सानिया ने कहा। "वो काग़ज़ पर कुछ लिख रहा था।"
तभी टिंकू आया। वो दौड़ा हुआ आया और उसकी साँस फूल रही थी और उसके हाथ में टॉफ़ी का काग़ज़ था — वही चमकदार सफ़ेद पन्नी, जिस पर कुछ लिखा हुआ था।
"भैया," उसने कहा, "देखो।"
मैंने काग़ज़ पढ़ा। टिंकू ने अपने बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था — "अंकुश भैया रात को डर के मारे गली छोड़कर जाने की सोच रहे हैं। दुकान में सामान भी बाँध रहे थे। पापा ने मना किया तो रोए। घंटी साथ ले जाने की बात कर रहे हैं। हमने सुना है।"
मैंने पढ़ा और एक पल के लिए मेरी साँस रुकी।
"टिंकू," मैंने कहा, "ये तूने लिखा?"
"हाँ भैया," उसने कहा। "पर ये झूठ है।"
"ये सिर्फ़ झूठ नहीं है," मैंने कहा। "ये झूठ का जाल है। इसे पढ़कर कोई भी मान लेगा कि मैं रात को भाग रहा हूँ। और अगर कोई मान ले कि मैं भाग रहा हूँ, तो वो रात को मेरी दुकान खाली पाकर कहेगा — 'देखा, हमने कहा था ना।'"
"तो फिर?" सानिया ने कहा।
"तो फिर," मैंने कहा, "हम उन्हें वही देंगे जो वो माँग रहे हैं। एक खाली दुकान। एक भागता हुआ आदमी।"
मैंने टिंकू के कंधे पर हाथ रखा।
"ये काग़ज़ तूने बबलू को दिया?"
"हाँ भैया। उसने लिया। पढ़ा नहीं, पर अपने आदमी को दिया और बोला — 'साहब को भेज।'"
"अच्छा," मैंने कहा।
"और भैया," टिंकू ने कहा, "उसने हँसकर कहा — 'अब तो ये लड़का गया।' और उसके मुँह में पान था, भैया। पान की पीक गिरी और वो हँसा।"
मैंने घंटी जेब में महसूस की। वो गर्म थी। गर्म, और थोड़ी काँपती हुई।
"अच्छा किया," मैंने कहा। "अब सुनो, ये काग़ज़ मेरे पास रहेगा।"
मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रख लिया।
"भैया," गुड्डू ने कहा, "अगर वो रात को आए और दुकान खाली मिले, तो?"
"तो," मैंने कहा, "वो वापस जाएगा और कहेगा — 'वो भाग गया।' और जिस दिन कोई यह मान लेगा कि गली में एक लड़का डरकर भाग गया, उस दिन गली डर जाएगी।"
"तो फिर हम क्या करें?" चिंटू ने कहा।
"हम उन्हें वो दुकान दिखाएँगे," मैंने कहा, "जो भागी हुई है। पर हम उन्हें वो गली नहीं दिखाएँगे जो डरी हुई है।"
चारों बच्चे मेरी तरफ़ देख रहे थे। उनकी आँखों में समझ भी थी और उत्साह भी।
"अब जाओ," मैंने कहा। "और अगर बबलू फिर टॉफ़ी दे, तो ले लेना।"
"और अगर वो फिर कुछ पूछे?" रफ़ीक़ ने कहा।
"कुछ नई बात बताना। कहना — भैया ने रात को अपना बैग भी बाँध लिया है।"
"ये झूठ है ना?"
"हाँ," मैंने कहा। "झूठ है। और यही तो काम का है।"
बच्चे हँसते हुए गए।
फिर शबनम आपा आईं। उनके हाथ में थाली थी और उस थाली में दो कटोरी चाय थी, दो समोसे थे और एक कटोरी में पानी। उन्होंने थाली मेरी मेज़ पर रखी।
"खा," उन्होंने कहा।
"आपा," मैंने कहा, "मैंने कुछ नहीं माँगा।"
"मैंने भी नहीं पूछा," उन्होंने कहा। "खा।"
मैंने समोसा उठाया और एक कौर लिया। फिर मैंने उन्हें सब बताया — टॉफ़ी, बबलू, टिंकू का काग़ज़, सफ़ेद कुर्ते वाले का मुफ़्त नल। शबनम आपा चुप सुनती रहीं। उन्होंने एक बार भी बीच में नहीं रोका।
जब मैं खत्म हुआ, तो उन्होंने कटोरी उठाई और एक घूँट चाय पी। फिर उन्होंने कहा — "मुफ़्त का नल और मुफ़्त की टॉफ़ी, दोनों में एक ही डोर बँधी होती है।"
"मतलब?"
"मतलब ये," उन्होंने कहा, "कि जो चीज़ मुफ़्त में मिलती है, उसका दाम कहीं और से कटता है। जिस जगह कटता है, वहाँ तुम होते हो। तुम्हें पता नहीं चलता कि कब कटा।"
उन्होंने कटोरी नीचे रखी।
"और बबलू," उन्होंने कहा, "वो टॉफ़ी देकर तुम्हारी खबर पूछ रहा है। यानी अब वो डरा हुआ है। जो आदमी डरता है, वो बच्चों से पूछता है।"
"और साहब?"
"साहब," शबनम आपा ने कहा, "साहब बच्चों से नहीं पूछता। साहब बच्चों को खरीदता है।"
तभी मुझे याद आया — उस सुबह सफ़ेद कुर्ते वाले ने कहा था कि बच्चों के लिए मुफ़्त जाँच शिविर लगेगा। पीपल के नीचे। ठीक उसी जगह पर जहाँ बच्चे खेलते थे।
"आपा," मैंने कहा, "आज शाम को पीपल के नीचे एक शिविर लगेगा। मुफ़्त जाँच।"
शबनम आपा ने थाली उठाई।
"तो जाना," उन्होंने कहा। "और देखना कि वहाँ कौन बैठता है।"
"आप नहीं चलेंगी?"
"मैं अपनी गुमटी से देख लूँगी," उन्होंने कहा। "मेरी आँखें दूर से भी तेज़ हैं।"
वो चली गईं।
दोपहर बजी। मैंने दो साइकिलें ठीक कीं। एक पंचर कराया। एक ब्रेक ठीक किया। और हर बार जब मैं औज़ार उठाता, तो मेरा हाथ एक पल रुक जाता — जैसे कुछ भूल रहा हूँ। जैसे कोई चीज़ अनदेखी है।
शाम पाँच बजे पीपल के नीचे शिविर लगा।
दो सफ़ेद तंबू थे। एक मेज़ थी जिस पर दवाओं के डिब्बे थे और एक कुर्सी थी जिस पर एक आदमी बैठा था — सफ़ेद कोट पहने हुए, और उसके गले में स्टेथोस्कोप था। उसके साथ दो लड़के थे जिनके हाथ में काग़ज़ों के बंडल थे।
बच्चों की लाइन लग गई। बुज़ुर्ग आए। कुछ औरतें आईं।
मैं दूर खड़ा था। मैंने देखा कि वो डॉक्टर किसी को भी जाँचता नहीं था। वो सिर्फ़ हाथ पकड़ता, नाड़ी देखता, और फिर काग़ज़ पर कुछ लिखकर दे देता। और हर काग़ज़ के साथ एक पर्ची देता — "दवा मुफ़्त, दुकान भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की।"
मैंने देखा कि सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू लाइन में खड़े थे। और उनके साथ बबलू खड़ा था, और वो उन्हें कुछ बोल रहा था, और बच्चे सिर हिला रहे थे।
मैंने देखा कि बबलू ने सानिया के हाथ में एक चमकदार चीज़ रखी — टॉफ़ी। फिर गुड्डू के हाथ में। फिर रफ़ीक़ के। फिर चिंटू के।
और फिर बबलू ने सानिया के कान में कुछ कहा।
मैंने देखा कि सानिया ने सिर हिलाया। और फिर बच्चे हँसकर वहाँ से चले आए। हँसते हुए। हँसते हुए वो मेरी दुकान की तरफ़ आ रहे थे।
वो मेरे पास आए।
"भैया," सानिया ने कहा, "बबलू ने हमें बताया कि कल सुबह आपका क्या होगा।"
"अच्छा," मैंने कहा। "क्या होगा?"
"कहा कि कल सुबह दस बजे साहब गली में आएँगे और आपकी दुकान पर मुहर लगेगी।"
मैंने सिर हिलाया।
"और टॉफ़ी में ज़हर नहीं था?" मैंने पूछा।
"नहीं," चिंटू ने कहा। "मैंने पहले टॉफ़ी खाई, फिर सोचा, और फिर बबलू से कहा — 'अंकल, ज़रा पहले आप खा लो।' तो वो हँसा और उसने खुद खाई।"
मैं हँसा।
"टिंकू ने भी पूछा था," मैंने कहा।
फिर रफ़ीक़ बोला, "भैया, बबलू ने हमें ये भी कहा — 'अगर तुम्हारे भैया को कुछ पता चले तो मुझे बताना। मैं तुम्हें सौ रुपये दूँगा।'"
"और तुमने क्या कहा?"
"मैंने कहा," सानिया ने कहा, "कि भैया के पास कोई काग़ज़ आया तो हम बताएँगे।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"बताओगे?"
"बताएँगे," गुड्डू ने कहा। "पर गलत काग़ज़।"
मैं ज़ोर से हँसा। इतना ज़ोर से कि उस्ताद की दुकान से आवाज़ आई — "अंकुश, दुकान पर हँसी ठीक नहीं लगती।"
मैंने माफ़ी माँगने के लिए सिर हिलाया।
बच्चे गए।
शाम छह बजे के करीब रणवीर आया। इस बार कोई सफ़ेद गाड़ी नहीं थी। वो पैदल आया। सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद पाजामा, सफ़ेद जूते। उसके साथ एक आदमी था जिसके हाथ में एक छोटी पोटली थी — मिठाई की पोटली।
वो सीधे शबनम आपा की गुमटी पर आया और बेंच पर बैठ गया।
"एक चाय," उसने कहा। "और सबके लिए।"
शबनम आपा ने चाय बनाई और उसके सामने रखी। उसने पैसे दिए।
अंकुश ने दूर से देखा।
रणवीर बैठा रहा। एक-एक करके लोग आने लगे। बंसी बाबा आए। रहमत बाबा आए। हाफ़िज़ निसार अहमद आए। पंडित ब्रजकिशोर आए। भोला भाई आए। दुबे अंकल नहीं आए, क्योंकि उन्हें थाने पर बैठना था।
रणवीर ने सबके सामने हाथ जोड़े।
"मैं जानता हूँ," उसने कहा, "कि कुछ लोग मेरे बारे में बुरा सोचते हैं। और सोचना बुरा नहीं है। गलती मेरी है कि मैं कभी बैठकर बात नहीं कर पाया।"
उसने चाय का कप उठाया।
"कल सुबह दस बजे," उसने कहा, "मैं खुद इस गली में आऊँगा। यहीं इस चबूतरी पर बैठूँगा। और सबकी बात सुनूँगा। कोई काग़ज़ नहीं, कोई अंगूठा नहीं, कोई वकील नहीं। सिर्फ़ बात।"
लोग एक-दूसरे की तरफ़ देखने लगे। कुछ लोगों के चेहरों पर आस थी।
फिर रणवीर ने चाय के कप को नीचे रखा और अपनी गर्दन घुमाई — और उसने सीधे मेरी दुकान की तरफ़ देखा।
मैं दुकान के बाहर खड़ा था, हाथ में रिंच थी।
रणवीर ने मुस्कुराकर कहा — "और अंकुश भाई, कल मैं आपकी दुकान पर बैठकर चाय पिऊँगा। उस घंटी के साथ। वो जो आपकी साइकिल पर लगी है।"
उसकी आवाज़ में कोई धमकी नहीं थी। कोई गुस्सा नहीं था। सिर्फ़ एक साफ़, ठंडी बात थी, जैसे कोई तारीख़ बता रहा हो।
और मेरी जेब में घंटी काँपी।
बिना बजे।
बिना हिले।
बस काँपी।
और उसने धीमी आवाज़ में कहा — "अब वह तेरी घंटी का नाम जानता है।"
॥
रात नौ बजे के करीब दुकान के पीछे वाला कमरा भर गया था। कमरा छोटा है, तुम जानते हो। इतना छोटा कि जब पाँच लोग बैठते हैं तो छठे को खड़ा होना पड़ता है, और जब छह बैठ जाते हैं तो औज़ारों का ट्रंक खुद बिस्तर बन जाता है। लोहे की अलमारी के ऊपर पुराना बल्ब गुनगुनाता रहता है, जैसे कोई बूढ़ा आदमी नींद में कोई पुरानी तान गा रहा हो। दीवार पर सालों की ग्रीस ने ऐसे निशान छोड़े हैं जैसे किसी ने उँगली डुबोकर कोई नक्शा बना दिया हो।
मैंने ट्रंक पर एक पुराना अख़बार बिछाया और उस पर चार कटोरे रख दिए। शबनम आपा ने बाहर से चाय लाकर दी थी, पर उन्होंने कहा था कि आज चाय के पैसे नहीं लेने, आज चाय खर्चे में है।
पहले आए उस्ताद अली बक्श। उन्होंने दरवाज़े पर खड़े होकर पूरे कमरे को देखा, जैसे तराज़ू से तोल रहे हों, फिर अंदर आकर ट्रंक के कोने पर बैठ गए। उनका मोटा चश्मा आज भी कान पर पेंसिल के साथ टँगा था।
फिर आए दुबे अंकल। नीली शर्ट, पुरानी कुर्सी से उतरकर आए थे, और हाथ में एक पीला लिफ़ाफ़ा था जिसे उन्होंने अपनी जेब के सबसे अंदर रखा हुआ था, पर लिफ़ाफ़े का कोना थोड़ा बाहर झाँक रहा था, जैसे खुद कह रहा हो — मैं यहाँ हूँ, मुझे कल खोलना।
फिर मीरा आई। उसके बाल आज और भी बेतरतब थे, कैमरा कंधे पर, बैग फटा हुआ, और आँखों में वो चमक जो सिर्फ़ तब आती है जब कोई दिन भर कुछ ढूँढता रहा हो और कुछ न मिला हो।
फिर टिंकू। वो आया तो सीधा मेरे पास आकर बैठ गया और उसने मेरे हाथ से पेचकस ले लिया, जैसे वो अब उसका हक़ हो।
फिर भोला भाई आए। उनके हाथ अब काँपते नहीं थे। यही सबसे बड़ी बात थी। एक हफ़्ते पहले तक ये आदमी काग़ज़ पर अंगूठा लगाकर काँपता था, आज ये अपनी दुकान का शटर खुद उठाते हैं और चाय खुद लाते हैं।
शबनम आपा सबसे आख़िर में आईं, क्योंकि उन्होंने गुमटी बंद करनी थी। आते ही उन्होंने दरवाज़े पर खड़े होकर कहा, "ये कमरा है या डिब्बा? इसमें तो साँस नहीं आएगी।"
"आपा, आप बैठिए," मैंने कहा। "साँस मैं लूँगा, आप बस बोलिए।"
"बहाना मत बनाओ," उन्होंने कहा और ट्रंक पर बैठ गईं। "कल सुबह दस बजे सबको कुछ न कुछ बोलना पड़ेगा। मैं पहले बोलूँगी। मुझे किसी का मुँह देखकर नहीं बोलना।"
काजल दरवाज़े के पास खड़ी थी। वो माँ के पास से आई थी, अस्पताल से। उसके हाथ में नर्सिंग की किताब थी और आँखें लाल थीं।
"माँ कैसी है?" मैंने पूछा।
"सो गई हैं," काजल ने कहा। "पर सोने से पहले उन्होंने एक बात कही।"
"क्या?"
"कहा — 'काजल, कल जो भी हो, अंकुश के पीछे खड़ी रहना। और अगर किसी ने कहे कि तुम्हारी माँ की दवा के लिए काग़ज़ पर अंगूठा लगाओ, तो उस आदमी के मुँह पर थूक देना।'"
कमरे में एक पल के लिए चुप्पी छा गई। फिर भोला भाई हँसे, धीरे से, और वो हँसी छूत की तरह सब तक पहुँच गई।
"माँ का डायलॉग है," मैंने कहा। "दाल में पानी नहीं, और बात में भी नहीं।"
पापा सबसे आख़िर में आए। वो दरवाज़े पर खड़े रहे, फिर अंदर आकर चारपाई के किनारे बैठ गए। उनके हाथ में आज कोई औज़ार नहीं था। यही सबसे अजीब बात थी। पचपन साल के आदमी के हाथ खाली देखकर लगा जैसे किसी की जेब से कोई चीज़ गिर गई हो।
मैंने चाय उनके आगे रखी। उन्होंने कप उठाया, फिर नीचे रख दिया।
और फिर उन्होंने वो कहा जो मैंने उनके मुँह से पहले कभी नहीं सुना था।
"मैं डरता हूँ," पापा ने कहा।
कमरे में कोई नहीं हिला।
"मैं पाँच साल से डरता हूँ। उस दिन से डरता हूँ जिस दिन मैंने उस दफ़्तर में अंगूठा लगाया था। शुरू में मुझे लगा कि डर उतर जाएगा। वो नहीं उतरा। वो रोज़ सुबह मेरे साथ उठता है और रात मेरे साथ सोता है। मैंने सोचा था कि चुप रहने से डर कम होगा। चुप रहने से डर बढ़ता है। हर चुप्पी उसे एक ईंट देती है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं आज भी डरता हूँ," उन्होंने कहा। "पर अब छिपूँगा नहीं। कल सुबह मैं उसी चबूतरी पर खड़ा होकर वो सब बोलूँगा जो मैंने पाँच साल अपने अंदर दबाया है। और अगर उसके बाद भी डर रहे, तो डर रहे। मैं उसके साथ ज़िंदा रह लूँगा, पर उसके पीछे नहीं छिपूँगा।"
मैं उठा। मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनका हाथ सूखा था, खुरदुरा था, और उसमें वो सारे औज़ार थे जो उन्होंने ज़िंदगी भर पकड़े थे, और एक काग़ज़ भी था जिस पर उन्होंने अंगूठा लगाया था।
"पापा," मैंने कहा। "सच अब अकेले नहीं बोला जाएगा।"
उन्होंने सिर हिलाया। कुछ नहीं कहा। मुझे लगा वो नहीं कह पाए। फिर उन्होंने मेरा हाथ दबाया, बस एक बार, हल्का सा, और मैंने समझ लिया।
तुम सोच रहे होगे कि ये सब भावुक बातें क्यों कर रहे हैं जब कल लड़ाई है। तो सुनो, मैंने सीखा है कि लड़ाई से पहले की रात ही असली लड़ाई होती है। सुबह तो हाथ काम करते हैं, रात में दिल काम करता है।
फिर मीरा ने अपना बैग खोला और उसमें से काग़ज़ निकाले।
"मैं सीधी बात करती हूँ," उसने कहा। "कल के लिए मेरे पास कुछ नहीं है।"
"कुछ नहीं मतलब?" भोला भाई ने पूछा।
"मतलब, लिखित सबूत नहीं है। नीलामी की सूची है, पर उस पर सरकारी मुहर नहीं है और गवाह की जगह खाली है। भोला भाई का अतिक्रमण नोटिस है, उसका यही हाल है। सनी का आधा काग़ज़ है, वो आधा है, पूरा नहीं। पाँच साल पुराने अंगूठे वाले काग़ज़ की नक़ल है, पर वो पापा के अंगूठे को साबित करती है, रणवीर की साज़िश को नहीं। और उस आदमी के ऊपर काली अंगूठी वाला कोई, उसका तो नाम भी नहीं है। मेरे पास एक मानहानि का नोटिस है जिस पर शिकायतकर्ता का नाम नहीं है। ये सब ऐसा है जैसे किसी ने एक चीज़ को चार टुकड़ों में तोड़कर दिया हो और कहे — जोड़कर दिखाओ।"
"तो कल सभा का फ़ायदा क्या?" काजल ने पूछा।
दुबे अंकल ने अपनी नीली शर्ट के बटन बंद किए, जैसे कोई बैठक से पहले तैयार हो रहा हो।
"फ़ायदा यह है," उन्होंने कहा, "कि कल सबूत काग़ज़ से नहीं, लोगों के मुँह से निकलेगा।"
वो सीधे बैठे। उनकी आवाज़ चौक की शाम जैसी धीमी थी।
"मैं पच्चीस साल थाने में बैठा हूँ। मैंने हज़ारों काग़ज़ देखे। एक बात सीखी — काग़ज़ किसी को बुरा नहीं बनाता, काग़ज़ सिर्फ़ गवाह होता है। असली गवाह आदमी होता है। अगर कल गली में तीन आदमी खड़े होकर अपनी बात कह दें, तो तीन काग़ज़ से ज़्यादा हो जाते हैं। क्योंकि काग़ज़ को कोई फाड़ सकता है, आदमी का मुँह नहीं फाड़ सकता। वो फाड़ेगा तो और बोलेगा।"
उन्होंने जेब से वो पीला लिफ़ाफ़ा निकाला और ट्रंक पर रख दिया।
"ये काग़ज़ मैं कल खोलूँगा। मेरे पास है। और मैंने इसे पच्चीस साल अपनी निजी कॉपी में लिखकर रखा है। कल सभा में मैं वो लाइन पढ़कर सुनाऊँगा जो मैंने पच्चीस साल पहले लिखी थी, और वो किसी लड़ाई की नहीं, सिर्फ़ एक आदमी के आने की है। फिर देखते हैं, कौन कैसे मुकरता है।"
उस्ताद अली बक्श ने तब तक कुछ नहीं कहा था। वो बैठे थे, आँखें आधी बंद, जैसे सुन रहे हों कि बाहर की गली क्या कह रही है।
फिर उन्होंने आँखें खोलीं।
"एक बात," उन्होंने कहा। "मेरी बात बुरी लगे तो बुरी लगे, पर सुन लो।"
सब चुप हो गए।
"कल उस सभा में पहले तुम कुछ मत माँगना। न माफ़ी, न सफ़ाई, न कोई काग़ज़ वापस। जो पहले माँगता है, वो कमज़ोर दिखता है। और उस आदमी को यही चाहिए — कि तुम माँगने वाले बन जाओ और वो देने वाला। जिस दिन वो देने वाला बन गया, उस दिन गली उसकी हो जाएगी।"
"और?" मीरा ने पूछा।
"और साहब से कुछ देना भी मत लेना। न चाय, न मिठाई, न दवा, न माफ़ी, न कोई काग़ज़ का टुकड़ा। मुफ़्त की चीज़ में डोर बँधी होती है, ये मैंने शबनम आपा से सीखा है।"
शबनम आपा ने चिमटी मेज़ पर रखी और कहा, "मुझसे सीखा है या नहीं, पर बात सही है। मैं पैंतीस साल से गुमटी चला रही हूँ, मुझे पता है करज़ा कैसे चढ़ता है। पहले पैसा माफ़, फिर बात माफ़, फिर सब माफ़, और आख़िर में तेरी गुमटी भी माफ़।"
उस्ताद ने सिर हिलाया।
"तीसरी बात," उन्होंने कहा। "घंटी।"
मेरा हाथ अपने आप जेब पर चला गया।
"उस्ताद, ये तो मैं जानता हूँ। घंटी बाज़ार में नहीं दिखानी।"
"नहीं, ये नई बात है," उन्होंने कहा और ट्रंक पर झुककर आगे आए। "कल अगर वो तुम्हारी दुकान पर आकर बैठता है और चाय माँगता है, तो उसे चाय देने से पहले अपने दोनों हाथ मेज़ पर रखना। खुल्ले। खाली। उसको दिखने देना कि तुम्हारे हाथ में कुछ नहीं है।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो आदमी छिपाकर बैठता है, वो हारता है। और जो खुलकर बैठता है, उससे बात करने में दूसरे को डर लगता है।"
मैंने सिर हिलाया। पर मेरे अंदर एक कोना था जो कह रहा था कि उस्ताद कुछ और भी जानते हैं और नहीं कह रहे। मैंने पूछा नहीं। मैंने सीखा है कि उस्ताद से दो बार पूछने पर भी जवाब नहीं मिलता, और वो जवाब कभी न कभी खुद आ जाता है, ठीक उस वक़्त जब तुम उसके लिए तैयार नहीं होते।
तभी टिंकू बोला।
वो अब तक चुप बैठा था, पेचकस घुमा रहा था, और मुझे लगा था कि वो सो रहा है। पर नहीं।
"उस्ताद," उसने कहा, "मेरे पास एक तरकीब है।"
"बोल," मैंने कहा।
"घंटी मोज़े में छिपा दो।"
कमरे में एक पल चुप्पी रही। फिर भोला भाई हँसे, फिर काजल, फिर मीरा ने अपना हाथ मुँह पर रखा।
"मोज़े में?" मैंने पूछा।
"हाँ," टिंकू ने बिल्कुल गंभीर चेहरे से कहा। "जुराब पहनकर रखो। कोई नहीं देखेगा। और अगर कोई पूछे कि घंटी कहाँ है, तो कह देना — पैर में है।"
शबनम आपा ने चिमटी उठाई और उसे हवा में घुमाया।
"टिंकू," उन्होंने कहा, "घंटी मोज़े में नहीं रखनी चाहिए।"
"तो कहाँ?"
"हिम्मत में।"
कमरा हँसी से भर गया। भोला भाई इतने हँसे कि उनकी आँख से पानी आ गया और उन्होंने कहा कि ये हँसी उनके घर में पिछले तीन महीने से नहीं आई थी। दुबे अंकल ने कहा कि अगर थाने में इतनी हँसी होती तो वर्दी उतारने का मन न करता। उस्ताद ने कुछ नहीं कहा, पर उनके चश्मे के पीछे आँखें हँस रही थीं। और मैंने देखा कि पापा भी मुस्कुराए, थोड़ा सा, दाँत नहीं दिखे, बस होंठ हिले, और मेरे लिए वो पूरे दिन की सबसे बड़ी बात थी।
हँसी के बाद मीरा ने अपना कैमरा मेज़ पर रखा।
"अब मेरी बात सुनो," उसने कहा। "कल सभा में मैं कैमरा सामने रखकर रिकॉर्ड करूँगी। नहीं, पहले मत बोलो। मैं जानती हूँ कि वो फिर बैटरी का बहाना बनाएगा। इसीलिए मैंने दो बैटरी रखी हैं, और एक पुराना फ़ोन भी, जो बिना रुके रिकॉर्ड करेगा। वो फ़ोन मेरी जेब में रहेगा। मगर सुनो — रिकॉर्डिंग सबूत है, कहानी नहीं। और मैं आज तुम सबके सामने एक बात कबूल करती हूँ।"
सब उसकी तरफ़ देखने लगे।
"पाँच साल पहले मैंने रमा मैडम के बारे में एक खबर छापी थी जो आधी सच थी। मैंने वो खबर इसलिए छापी क्योंकि मुझे लगा कि मैं सच बोल रही हूँ। पर सच बोलना और पूरा सच बोलना, दो अलग चीज़ें हैं। मैंने पूरा सच नहीं देखा था। उस दिन उस घर में जो टूटा, वो मेरे नाम से टूटा।"
उसने अपनी उँगली मेज़ पर रखी।
"मैं वो गलती कल नहीं दोहराऊँगी। कल मैं एक भी बात बढ़ाकर नहीं बोलूँगी, एक भी बात घटाकर नहीं बोलूँगी। जो दिखेगा, वही बोलूँगी।"
"मीरा," मैंने कहा, "इसी बात के लिए तो तुम्हें गली में सबसे ज़्यादा गुस्सा आता है।"
उसने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे कुछ तोड़ना चाह रही हो, फिर हँस पड़ी।
"तेरी वजह से," उसने कहा। "तू मुझे हर वक़्त क़िस्से में घसीट लेता है।"
तभी दरवाज़े के बाहर खुटका हुआ। सानिया और गुड्डू और रफ़ीक़ और चिंटू — चारों दरवाज़े पर जमे थे, और सानिया के हाथ में अपनी लाल कवर वाली कॉपी थी। वो कॉपी जिसमें गली स्कूल की बच्ची ट्रकों की तारीख़, वक़्त और शक्ल लिखती है, जैसे कोई बूढ़ा सिपाही हो।
"भैया, हमें भी कल का काम बताओ," सानिया ने कहा।
"तुम लोग स्कूल जाओगे," मैंने कहा।
"भैया," गुड्डू ने कहा, "आप ऐसा मत बोलो। हमने तुम्हारे लिए गलत काग़ज़ दिया था।"
"एक नहीं, दो बार," चिंटू ने कहा।
मैंने उन्हें अंदर बुलाया। चारों कमरे में घुस गए,चारपाई पर बैठ गए, चिंटू ट्रंक पर। मैंने उन्हें देखा। इनकी उम्र में मैं साइकिल के पहिये में तीलियाँ डालकर बैठा रहता था और ये चारों एक ऐसी लड़ाई में उतर रहे थे जिसमें बड़े भी काँप रहे थे।
"कल का काम सबसे ज़रूरी है," मैंने कहा। "और सुनो, किसी को अकेले कुछ नहीं करना। कोई सड़क पर नहीं जाएगा, कोई गाड़ी के पास नहीं जाएगा। सिर्फ़ आँख, सिर्फ़ कान।"
"क्या देखना है?" रफ़ीक़ ने पूछा।
"चार चीज़ें," मैंने कहा। "पहली, कौन सफ़ेद गाड़ी से उतरता है और कौन पैदल आता है। दूसरी, कौन अंदर आता है और कौन बाहर खड़ा रह जाता है। तीसरी, सभा से पहले कौन किससे अलग बात करने जाता है — ये सबसे ज़रूरी है। और चौथी, उस आदमी के जूते।"
"जूते?" सानिया ने पूछा और कॉपी में पेंसिल से लिखने लगी।
"हाँ। जो सफ़ेद गाड़ी से आएगा, उसके जूते सबसे पहले देखना। मुझे उनकी तले की सिलाई चाहिए।"
"क्यों?" टिंकू ने पूछा।
"क्योंकि एक जोड़ी ऐसी है जिसके तले में लोहा है," मैंने कहा। "और वो जोड़ा कभी पहना नहीं जाता।"
सानिया ने सिर हिलाया। उसकी कॉपी में मैंने देखा कि चार तारीख़ें पहले से लिखी हैं, हर तारीख़ के आगे वक़्त और चार शब्द।
"कल सुबह आठ बजे," सानिया ने कहा, "हम नल के पास बैठेंगे। चिंटू मुफ़्त दवा वाले तंबू के पास। रफ़ीक़ गली के मुँह पर। गुड्डू छत पर।"
"छत पर क्यों?"
"क्योंकि छत से सब दिखता है," गुड्डू ने कहा, "और छत से किसी को नहीं दिखता कि हम देख रहे हैं।"
मैं उनकी तरफ़ देखता रह गया।
उस्ताद ने ट्रंक पर हाथ रखकर कहा, "इस गली की सबसे तेज़ आँख ये चारों हैं। मुझे पचास साल का अनुभव है, और मैं कहता हूँ — कल अगर कुछ पकड़ा जाएगा तो इनके कारण।"
चारों के चेहरे गर्व से चमक उठे। चिंटू ने ट्रंक पर खड़े होकर सलाम किया और मैंने उसे नीचे उतारा।
फिर सब गए। मीरा सबसे आख़िर में गई, और दरवाज़े पर रुककर उसने कहा, "अंकुश, एक बात।"
"बोलो।"
"कल सुबह छह बजे मैं उसके दफ़्तर के बाहर खड़ी रहूँगी।"
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे देखना है कि कोई ऐसा आता है या नहीं जो उससे भी ऊपर हो।"
मैंने कुछ देर उसे देखा।
"मीरा," मैंने कहा, "तुम अकेली मत जाना।"
"मैं अकेली जाऊँगी," उसने कहा। "पर ये बता — कल तू सभा में सबसे पहले क्या बोलेगा?"
"मैं नहीं जानता," मैंने कहा। "सच कहूँ तो मुझे डर है कि कहीं मैं गलत बोलकर सब बिगाड़ न दूँ।"
उसने मेरी तरफ़ देखा और थोड़ा मुस्कुराई।
"तू पहली बार सच बोला," उसने कहा और चली गई।
दरवाज़ा बंद होने के बाद कमरा खाली लगा। कमरा जब खाली होता है तब उसमें पुराने औज़ारों की गंध तेज़ हो जाती है। मैं चारपाई पर बैठ गया। मैंने ट्रंक से रोटी का टिफ़िन निकाला — माँ ने सुबह रखा था, मैंने खाया नहीं था। अब ठंडा हो चुका था। मैंने खोला और खाने लगा। ठंडी रोटी और आलू। तुम सोचोगे कि इतनी बड़ी रात में आदमी खाता क्यों है। पता नहीं। भूख नहीं लगी थी। बस मुँह में कुछ चाहिए था, ताकि अंदर का डर थोड़ा चुप हो जाए।
फिर मैंने गले से वो पुरानी चाबी निकाली। पापा ने पंद्रह सोलह साल की उम्र में दी थी और कभी नहीं बताया कि किस चीज़ की है। अब मैं जानता हूँ कि ये उस बंद दरवाज़े की है जो घर में है और जो अब तक नहीं खुला। मैंने चाबी को हथेली में दबाया। मुझे लगा चाबी थोड़ी गरम है। शायद मेरी कल्पना।
मैंने जेब से घंटी निकाली। पीतल का रंग अब पहले जैसा नहीं, बस वैसा ही है जैसा तुम्हारी दादी के पुराने डिब्बे का होता है। मैंने उसे हल्का बजाया।
टन।
बहुत धीमी आवाज़। दुकान के पीछे, खाली कमरे में, वो आवाज़ किसी की साँस जैसी लगी।
"कल क्या होगा?" मैंने पूछा।
चुप्पी।
फिर आवाज़ आई, धीमी, टुकड़ों में, जैसे कोई पुराना रेडियो स्टेशन पकड़ रहा हो।
"जवाब काग़ज़ में नहीं।"
"तो कहाँ है?"
"तेरे पास।"
मैंने माथा खुजाया।
"घंटी, तू हमेशा ऐसा करती है। सीधी बात कर। कल सभा में क्या करना है?"
लंबी चुप्पी। इतनी लंबी कि मुझे लगा वो चली गई।
फिर उसने कहा, "जो देगा, वो लेगा भी।"
"मतलब?"
"जो देगा…"
वो दोहराया और चुप हो गई।
मैंने सिर हिलाया। मुझे समझ आ गई कि उस्ताद की चेतावनी और घंटी की बात एक ही चीज़ की दो तरफ़ हैं। रणवीर कल कुछ देने आएगा। और जो देता है, वो सामने वाले से कुछ लेता है। चाहे वो काग़ज़ हो, चाय हो, माफ़ी हो, या इलाज।
मैंने फिर पूछा, "और अंक?"
"एक सौ अठ्ठावन," उसने कहा, और फिर, जैसे अपने आप से, "बची उम्र।"
मैं हँसा।
"तू जब 'बची उम्र' बोलती है," मैंने कहा, "तो लगता है कोई डॉक्टर हो जिसके पास मरीज़ भी नहीं और कुर्सी भी नहीं।"
घंटी चुप रह गई। पर चुप होने से पहले उसमें एक हल्की सी गूँज बची रह गई, जैसे हँसी हो, बहुत दूर की।
रात ग्यारह बजे मैंने दुकान का बाहरी शटर उठाकर आधा गिराया और चारपाई पर लेट गया। नींद नहीं आई। मैं छत पर गया। दुकान के पीछे की छोटी छत, आधी ईंट आधी टीन, जहाँ से पूरी गली दिखती है। पीपल, पत्थर की चबूतरी, उस्ताद की दुकान, शबनम आपा की गुमटी की बंद लालटेन। सब सो रहे थे। सिर्फ़ दुबे अंकल की कुर्सी खाली पड़ी थी और उसके नीचे वो पुरानी ईंट का टुकड़ा था जिससे उन्होंने कुर्सी का हिलना बंद किया था।
मैंने आसमान देखा। मुझे कुछ नहीं दिखा, बस अंधेरा और थोड़ी धूल। मैंने सोचा कि कल सुबह पूरी गली एक साथ खड़ी होगी, और मुझे पता नहीं कि मैं उसमें कौन हूँ। मैं साइकिल मरम्मत करने वाला लड़का हूँ। मेरे हाथ में ग्रीस है, मेरी जेब में घंटी है, और मेरे पीछे एक गली है। यही मेरी पूरी ताक़त है। कोई जादू नहीं, कोई गाड़ी नहीं, कोई दफ़्तर नहीं। बस गली।
और मुझे पहली बार लगा कि यही काफ़ी है।
सुबह मैं साढ़े सात बजे उठा, क्योंकि नींद टूटी तो एक बात मुँह में थी और उसे बाहर निकालना ज़रूरी था। मैंने टब में हाथ धोया, चेहरा धोया, ट्रंक पर रखी नई रिंच उठाई और बिना सोचे शटर पूरा उठा दिया। गली में हवा थी, पीपल की पत्तियाँ सूखी थीं, दूर किसी ने नल खोला और पानी ईंटों पर गिरा। सब सामान्य था, और यही सबसे असामान्य बात थी।
आठ बजे बच्चे तितर-बितर हो गए। सानिया नल के पास बैठ गई, कुछ दूर, बांस की डोर लेकर जैसे पतंग ठीक कर रही हो। चिंटू और रफ़ीक़ दो टोकरियों के बीच, गुड्डू छत पर। मीरा छह बजे ही उसके दफ़्तर के बाहर खड़ी हो चुकी थी और मुझे उसका फ़ोन आया था, एक ही लाइन में — "बाहर खड़ी हूँ, कुछ नहीं दिखा, आगे देखती हूँ।"
पौने नौ बजे मैंने पापा को चाय दी। उन्होंने आज चश्मा ठीक से पहना था, कान पर टेप बदल दिया था, और सफ़ेद कुर्ता पहना था। वो कोई औज़ार नहीं लाए थे। यही उनका हथियार था।
"पापा," मैंने कहा, "आज दोपहर तक सब खत्म हो जाएगा।"
"कुछ खत्म नहीं होता," उन्होंने कहा। "कुछ जुड़ता है, कुछ टूटता है।"
मैं कुछ कहने ही वाला था कि गली के मुँह की तरफ़ से आवाज़ आई। धीमी आवाज़। किसी ने सड़क पर पत्थर से छोटी सी हलचल मचाई थी।
और फिर मैंने वो सफ़ेद गाड़ी देखी।
वो गली के मुँह पर नहीं रुकी। वो इस बार अंदर आई। धीरे, बिल्कुल धीरे, जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीढ़ी उतर रहा हो। गली इतनी चौड़ी नहीं है कि गाड़ी आराम से आए, पर वो आई। उसके पहिये नाली के पत्थर के पुल को पार करके चरचराए और फिर वो अंकुश की दुकान के सामने रुकी, सीधी मेरे बोर्ड के नीचे, जो टेढ़ा टँगा है।
सानिया ने नल के पास उठकर पानी की बाल्टी छोड़ दी। दूर से मैंने देखा कि उसने कुछ लिखना शुरू किया। छत पर गुड्डू अपना सिर नीचे झुकाकर देख रहा था।
गाड़ी का दरवाज़ा खुला।
रणवीर भारद्वाज अकेला उतरा।
आज उसके साथ कोई नहीं था। न बबलू, न वकील, न कोई चुपचाप खड़ा आदमी। सिर्फ़ वो। सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद पाजामा। सफ़ेद चमकते जूते सड़क की धूल में पड़े और लगा जैसे धूल को उनसे शर्म आ गई हो। उसने अपने आगे का बटन बंद किया और गाड़ी की छत पर हल्का हाथ रखकर मेरी तरफ़ देखा।
फिर वो आया।
धीरे-धीरे, बिना जल्दी। दुकान की तीन सीढ़ियाँ उतरीं — चरचराती लकड़ी, आधी टूटी। वो उतरा और मेरे सामने खड़ा हो गया।
"सुबह की चाय?" उसने कहा।
उसकी आवाज़ शांत थी। कुछ ज़्यादा ही शांत, जैसे पिछली रात खुद उसने भी सो नहीं, ऐसी शांत।
"आपने कहा था चार बजे," मैंने कहा। "अब नौ से पहले कैसे?"
"समय बदल गया," उसने कहा।
"आपका या मेरा?"
उसने कोई जवाब नहीं दिया। उसने आसपास देखा — मेरी दुकान, टंकी, औज़ारों का ट्रंक, मेज़ पर रखा पुराना रेडियो, दीवार पर टँगी चेन। फिर उसकी नज़र पीपल की तरफ़ गई, जहाँ आज कुछ देर बाद दस बजे पूरी गली जुटनी थी, और वहाँ अभी खाली चबूतरी पड़ी थी, जैसे कोई खुला मंच बिना खिलाड़ी के।
"अंदर चलें?" उसने कहा।
मैंने बाहर देखा। पापा दरवाज़े के पीछे खड़े थे। मैंने उनकी तरफ़ देखा। उन्होंने बहुत हल्का सिर हिलाया — मतलब, चलो। बच्चों ने और मीरा ने जो कहा था, सब मेरे दिमाग़ में एक साथ चल रहा था। सफ़ेद गाड़ी से अकेला उतरा। कोई बाहर नहीं छोड़ा। यानी इस बार वो कुछ और लेकर आया है। शायद कोई डर नहीं, कोई धमकी नहीं। शायद एक बात।
मैं दुकान के अंदर गया। उसने अंदर कदम रखा। फिर वो मेज़ के सामने रुका और मुड़कर मेरी तरफ़ देखा।
और तब उसने वो कहा जिसके लिए मैं तैयार नहीं था।
"सभा से पहले तुमसे अकेले बात करनी है," उसने कहा। "और यह बात सिर्फ़ तुम्हारे कान की है।"
मैंने गले से चाबी को छुआ। मेरी जेब में घंटी ने हल्का सा कंपन किया, जैसे किसी ने सोते हुए करवट ली हो। और मैंने रणवीर भारद्वाज की आँखों में देखा — वहाँ न मुस्कान थी, न भूख, न गुस्सा। सिर्फ़ एक चीज़ थी, और वो थी थकान।
बड़ी, पुरानी, अंदर तक उतरी हुई थकान।
॥
"अंदर आइए," मैंने कहा और खुद पहले अंदर गया।
दुकान के अंदर वैसी ही हवा थी जैसी रोज़ होती है — ग्रीस की, पुराने रबर की, और उस चाय की जो सुबह टिंकू बनाकर भूल जाता है। कोने में औज़ारों का ट्रंक खुला पड़ा था। दीवार पर चेन टँगी थी, जिसकी कड़ियाँ हवा से भी नहीं हिलतीं। मेज़ पर पुराना रेडियो था, वही जो एक ग्राहक छोड़ गया था और जिसे मैंने एक दिन गुस्से में पटककर तोड़ दिया था। उसका एक कोना अब भी टूटा पड़ा है। मैंने उसे नहीं जोड़ा। कभी-कभी लगता है कुछ चीज़ें टूटी ही रहनी चाहिए, ताकि आदमी को याद रहे कि गुस्सा क्या करवाता है।
रणवीर भारद्वाज अंदर आया और रुक गया। उसने पूरी दुकान को एक बार में देखा, धीरे-धीरे, जैसे कोई काग़ज़ पढ़ रहा हो। फिर उसने अपना हाथ बढ़ाया और ट्रंक से एक रिंच उठाई।
"ये नई है," उसने कहा।
"हाँ," मैंने कहा। "कल ही आई है।"
"महँगी होगी।"
"महीने भर की कमाई से आई है।"
उसने रिंच को उँगलियों में घुमाया, जैसे कोई पुराना सिक्का घुमाता है। फिर उसने उसे वापस उसी जगह रख दिया, बिल्कुल सीधा, जैसे हमेशा वहीं रहती थी। उसके बाद उसने पेचकस उठाया, फिर प्लायर, फिर छोटा हथौड़ा। हर औज़ार को छूकर वापस रख दिया। जैसे कोई अजायबघर में चल रहा हो और सोच रहा हो कि कौन सी चीज़ कितने की है।
"तेरे औज़ार साफ़ हैं," उसने कहा। "और तेरी मेज़ पर धूल नहीं है। ये दो चीज़ें बताती हैं कि आदमी काम से प्यार करता है, न कि पैसे से।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"मुझे तेरा हुनर पसंद है, अंकुश," उसने कहा और मेज़ पर हाथ रखकर मेरी तरफ़ देखा। "सच में पसंद है। तू पच्चीस साल का भी नहीं है और तेरे हाथ ऐसे हैं जैसे पचास साल का कारीगर हो। ये हुनर बेकार पड़ा है इस गली में।"
"हुनर बेकार नहीं पड़ा," मैंने कहा। "यहाँ लोग साइकिल लाते हैं, मैं ठीक करता हूँ, वो जाते हैं। बस यही है।"
"बस यही है?" उसने अपना सिर थोड़ा झुकाया। "हुनर की भी एक कीमत होती है, अंकुश। और तू उसे खुद तय नहीं कर रहा। कोई और तय कर रहा है। वो आदमी जो तेरे दरवाज़े के बाहर खड़ा है और तुझे कहता है कि भैया टूट गया है। आज वही तय करता है कि तेरे हाथ कितने का हैं।"
"आप ठीक कह रहे हैं," मैंने कहा। "पर मेरे हाथ किसी कीमत में नहीं बिके, इसीलिए उनकी कीमत है।"
उसने हल्की सी हँसी दी। ऐसी हँसी जिसमें मज़ाक नहीं, सिर्फ़ आदत थी।
फिर उसने अपना दायाँ हाथ उठाया और मैंने देखा — उसकी छोटी उँगली में वो काली अंगूठी थी। पत्थर जैसी काली, बिना कोई नक्काशी। उसने उँगली मेज़ के किनारे पर टिकाई और उसके नाखून के नीचे से एक काली बूँद फ़र्श पर गिरी। छोटी, ऐसी जैसे स्याही हो। उसने जेब से सफ़ेद रूमाल निकाला और ज़मीन पर रखकर उसे पैर से दबा दिया, जैसे चीज़ को नहीं, बात को छिपा रहा हो।
"अंकुश," वो बोला और उसकी आवाज़ का ढंग बदल गया — अब वहाँ वो बड़े साहब वाली मिठास नहीं थी। "मैं तुझे एक बात बताने आया हूँ, और तू ये बात अच्छे से सुन ले। मुझे पता है कि तेरे पापा ने पाँच साल पहले मेरे काग़ज़ों पर अंगूठा लगाया था।"
मेरे अंदर कुछ ऐसा हुआ जैसे साइकिल की चेन अचानक खिंच जाए। मैंने हाथ मेज़ के नीचे रख लिया, ताकि वो देख न सके कि मुट्ठी बँध गई है।
"मुझे पता है," वो बोला, "कि कैसे लगाया था। मुझे तारीख़ भी पता है, कमरा भी पता है, वो मेज़ भी पता है जिस पर काग़ज़ों का ढेर था। मुझे ये भी पता है कि उस काग़ज़ पर सिर्फ़ तेरे पापा का नाम नहीं था। उस पर तेरा नाम भी था, अंकुश।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
"और आज दस बजे," उसने धीरे से कहा, "जब तेरे पापा पीपल की चबूतरी पर खड़े होकर ये बात खुद बोलेंगे, तो पूरी गली को ये भी पता चलेगा कि उस काग़ज़ पर दो नाम थे, और दोनों में से एक पर अंगूठा नहीं लगा। बाकी लोग खुद सोच लेंगे कि क्यों नहीं लगा। किसी को कुछ कहना नहीं पड़ेगा। गली खुद बात बना लेगी। आज शाम तेरे पापा को कोई सीधा नहीं देखेगा, और तेरी दुकान पर कोई साइकिल नहीं लाएगा। और तू जानता है ये सबसे बड़ी बात क्या है? मुझे कुछ करना ही नहीं पड़ेगा। सच खुद अपना काम कर देगा।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। वहाँ कोई चमक नहीं थी। वो अपनी बात को इस तरह कह रहा था जैसे कोई किसान मौसम बता रहा हो।
और मेरे अंदर कुछ ऐसा उठा कि एक पल को लगा कि मैं मेज़ उठाकर पटक दूँ। हाथ काँप रहा था। गले में चाबी अचानक भारी लगने लगी। मुझे वो रात याद आई जब मैंने वो रेडियो तोड़ा था — कितना आसान था, बस एक झटका और चीज़ टुकड़े-टुकड़े। और कितना मुश्किल था बाद में उसे उस ग्राहक के सामने खड़े होकर झेलना।
मैंने एक लंबी साँस ली। उसने सुना। वो बैठा नहीं, खड़ा रहा और मेरी तरफ़ देखता रहा।
"जो सच है," मैंने कहा और मेरी आवाज़ मेरे कानों में भी सपाट लगी, "वो आज दस बजे पापा खुद बोलेंगे। मैं उनके लिए नहीं बोलूँगा, और आपके लिए भी नहीं बोलूँगा। न उसे छिपाया जाएगा, न उसे मीठा बनाकर परोसा जाएगा। जो हुआ, हुआ। गली को जो सोचना है, सोचे। पर मैं आपको एक बात साफ़ बता दूँ, भाई साहब — गली में जो आदमी सच छिपाकर बैठा है, वो मेरे पापा नहीं हैं।"
उसके चेहरे पर कुछ हिला नहीं।
"बहुत अच्छा," उसने कहा। "सच बोलने वाले बहुत पैदा होते हैं, अंकुश। ज़िंदा रहने वाले कम होते हैं।"
उसने कुर्सी खींची और बैठ गया, ऐसे जैसे ये उसकी दुकान हो। फिर उसने मेज़ पर अपनी दोनों हाथें खोलकर रख दीं, हथेलियाँ नीचे की तरफ़।
"एक चाय हो जाए," उसने कहा।
मुझे उस्ताद की तीन शर्तें याद आईं। पहली — पहले कुछ माँगना नहीं। दूसरी — साहब से कुछ लेना नहीं। तीसरी — चाय देने से पहले दोनों हाथ खुले मेज़ पर रखना।
मैंने पीछे वाले कमरे से स्टोव निकाला, केतली चढ़ाई और अपने दोनों हाथ मेज़ पर खोलकर रख दिए — बिल्कुल उसके सामने, बिल्कुल उसकी तरह। हथेलियाँ नीचे, उँगलियाँ अलग-अलग, कोई मुट्ठी नहीं, कोई छिपी चीज़ नहीं।
वो मेरे हाथों को देखने लगा। फिर बोला, "कितने साल से ये ग्रीस इन पर है?"
"सोलह की उम्र से।"
"और कोई चीज़ नहीं पकड़ी?"
"पकड़ी थी," मैंने कहा। "एक बार एक रेडियो पटका था। उस दिन के बाद से सिर्फ़ औज़ार पकड़ता हूँ।"
उसने सिर हिलाया। चाय आई, मैंने उसके सामने रख दी और अपने हाथ फिर मेज़ पर रख दिए। उसने चाय उठाई भी नहीं। वो सिर्फ़ भाप को देखता रहा, जैसे उस भाप में कोई पुरानी तस्वीर दिख रही हो।
"तू सोच रहा होगा कि मैं आया क्यों," उसने कहा।
"सोच रहा हूँ कि आप आए क्यों," मैंने कहा।
"क्योंकि सभा में बैठने से पहले मुझे एक आदमी से एक बात कहनी है जो मुझे पसंद है," उसने कहा। "और तू वो आदमी है। तुझमें एक बात है जो मुझमें नहीं थी। तेरे पास एक ज़िद है। मेरे पास भी थी। तीस साल की उम्र में मैंने एक कमरे में बैठकर तय किया था कि मैं इस शहर में एक इमारत बनाऊँगा जिसके नीचे मेरा नाम होगा। और आज इस शहर में चालीस और इमारतें हैं, और मुझे किसी की छत याद नहीं।"
उसकी आवाज़ में वो थकान थी जो सुबह उसकी आँखों में दिखी थी। मैंने सोचा, आदमी अगर इतना बड़ा हो जाए कि अपनी ही छतें याद न रखे, तो वो किसके लिए बड़ा हो रहा है।
"अब आख़िरी सौदा," उसने कहा और सीधा मेरी तरफ़ देखा। "एक ही बार। आज दस बजे से पहले। तू मुझे वो घंटी दे दे जो तेरी जेब में है। बस घंटी। कोई काग़ज़ नहीं, कोई शिकायत नहीं, कोई गवाह नहीं। मुझे सिर्फ़ वो चाहिए।"
दुकान में पंखा धीरे चल रहा था और मुझे लगा जैसे आवाज़ें सब चली गई हों।
"बदले में," वो बोला, "जो भी है तेरे सामने, सब मैं हटा दूँगा। अस्पताल बच जाएगा। बेचने की बात खत्म। पीछे का प्लॉट खाली रहेगा। तेरी माँ का इलाज पूरा — जो जाँच बाकी है, जो दवा बाकी है, जो डॉक्टर बाहर से बुलाना पड़े, सब मेरे खाते पर। तेरे पापा के नाम पर जो कोई काग़ज़ है, वो मैं खुद जलाकर तेरे सामने राख कर दूँगा। और ये दुकान — ये पुरानी टपरिया नहीं, नई। पक्की, दो मंज़िल की, ऊपर तेरा कमरा, नीचे तेरा काम। अपने नाम पर। बिना किसी का अंगूठा, बिना किसी का हस्ताक्षर।"
उसने रुककर मेरी आँखें देखीं।
"सिर्फ़ एक घंटी के बदले," उसने कहा। "जो तेरी नहीं है। जो तेरे दादा की थी। जो तेरे पापा की थी। जो एक दिन किसी और की भी रहेगी। तू उसे अपनी क्यों समझ रहा है?"
मैंने अपने हाथ मेज़ पर रखे रखे देखे। उन पर ग्रीस के पुराने निशान थे। मैंने सोचा — अगर मैं हाँ कह दूँ, तो माँ की जाँच कल ही हो जाएगी। काजल को रोना नहीं पड़ेगा। पापा को दस बजे चबूतरी पर खड़े होकर कुछ बोलना नहीं पड़ेगा। पूरी गली को कुछ सहना नहीं पड़ेगा। एक घंटी। बस एक छोटी सी पीतल की चीज़।
और उसी वक़्त मेरी जेब में घंटी बिल्कुल चुप थी। न हिली, न बोली। जैसे वो भी सुनना चाहती हो कि मैं क्या कहता हूँ।
"भाई साहब," मैंने कहा और अपनी आवाज़ जितनी नरम हो सकती थी, उतनी नरम रखी। "आपने बहुत अच्छा सौदा रखा है। इतना अच्छा कि अगर मैं ईमानदार न होता, तो हाथ बढ़ा देता।"
"तो हाथ बढ़ा दे।"
"नहीं," मैंने कहा।
उसके चेहरे पर मुस्कान वही रही। मुझे लगा वो मुस्कुराहट उसके चेहरे पर चिपकी हुई है, जैसे दीवार पर कोई पुराना पोस्टर — नीचे से दीवार गल गई हो, पर पोस्टर हटता नहीं।
"ये घंटी बिकने की चीज़ नहीं है," मैंने कहा। "ये मेरे पास इसलिए नहीं है कि मैं इसे संभालकर रखूँ। ये मेरे पास इसलिए है कि लोग अपना दर्द लेकर आते हैं और ये सुनती है। जिस दिन मैं इसे किसी सौदे में लगा दूँगा, उस दिन इससे सिर्फ़ आवाज़ निकलेगी, बात नहीं। और आपको सच बता दूँ — मैं अपनी माँ के इलाज के लिए, अपने पापा की इज़्ज़त के लिए, और इस गली के हर उस आदमी के दर्द के लिए, जिसने मुझ पर भरोसा किया है, किसी से एक पैसा भी नहीं लूँगा। न आपसे, न किसी और से।"
"तो तेरी माँ की दवा?"
"दवा का इंतज़ाम मैं करूँगा," मैंने कहा। "कर्ज़ लेकर, काम करके, जो भी हो। पर जिस हाथ से मैं दवा लाऊँगा, वो हाथ साफ़ रहेगा। जिस दिन मैं अपनी माँ को ये कहने लगूँ कि तेरा इलाज इस शर्त पर हुआ कि मैं किसी का दर्द बेच आया, उस दिन मेरी माँ मुझे अपने पास नहीं बैठने देगी। और मुझे पता है वो ऐसा करेगी, क्योंकि उसने मुझे यही सिखाया है।"
रणवीर भारद्वाज एक पल चुप रहा।
फिर उसने चाय उठाई। एक घूँट लिया। बहुत छोटा घूँट। और मैंने देखा कि उसके हाथ में कंपन नहीं था, कुछ भी नहीं था — जैसे उसने अंदर ही अंदर कोई दरवाज़ा बंद कर दिया हो।
"अच्छी चाय है," उसने कहा। "तेरी माँ की चाय जैसी। मैंने एक बार पंद्रह साल पहले तेरे घर की चाय पी थी। तेरे पापा ने बनाई थी। उसमें अदरक ज़्यादा थी।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
वो उठा। कुर्सी पीछे सरकी और चरचराई। उसने अपना कुर्ता सीधा किया और मुझे देखने लगा — और अब उसकी आँखों में वो मुस्कान नहीं थी, बस ठंडक थी। साफ़, सपाट, किसी पत्थर की तरह। ऐसी ठंडक जो कुछ कहती नहीं, बस रहती है।
"मैं दस बजे चबूतरी पर बैठूँगा," उसने कहा। "मैं वादा निभाता हूँ। जैसा मैंने कहा था — कोई काग़ज़ नहीं, कोई अंगूठा नहीं, कोई वकील नहीं। तू भी आ।"
वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। फिर रुका। जैसे कुछ और कहना बाकी हो। उसने मुड़कर मेरी तरफ़ देखा — और उसकी नज़र मेरी जेब पर गई। सिर्फ़ एक पल। फिर वो बोला, "तेरी घंटी की आवाज़ बहुत पुरानी है, अंकुश। मैंने वो आवाज़ पच्चीस साल पहले सुनी थी। बिल्कुल किसी पुराने कर्ज़ की तरह बजती है। और कर्ज़ वो नहीं चुकाते जो लेते हैं। कर्ज़ वो चुकाते हैं जो उसमें फँस जाते हैं।"
फिर वो निकला।
मैं दरवाज़े तक गया।
बाहर गली में लोग खड़े थे। शबनम आपा अपनी गुमटी के बाहर, हाथ में चिमटी पकड़े। भोला भाई अपनी दुकान की पटिया से टेक लगाए। मीरा कोने पर, कैमरा नीचे लटकाए, आँखें सीधी गाड़ी पर। बबलू गाड़ी के पास खड़ा था, और उसके हाथ में आज पानदान नहीं था — वो उँगलियाँ मसल रहा था। चारों जासूस एक-एक कोने पर, बिल्कुल वैसे जैसे मैंने उन्हें काम दिया था।
रणवीर गाड़ी तक पैदल गया। रास्ते में उसने शबनम आपा की तरफ़ देखा और हल्का सिर झुकाया, जैसे कोई पुराना ग्राहक गुमटी वाले को सलाम करता हो। शबनम आपा ने चिमटी उठाई भी नहीं। वो उसे इस तरह देख रही थीं जैसे कोई भड़की हुई चीज़ देख रही हों।
गाड़ी का दरवाज़ा खुला। वो बैठा। खिड़की से उसने मेरी तरफ़ देखा। बस एक बार। और फिर गाड़ी पीछे हटी, नाली के पुल पर चढ़ी, और गली के मुँह की तरफ़ मुड़ गई।
रफ़ीक़ ने गली के मुँह से दौड़कर आकर कहा, "उस्ताद, गाड़ी में कोई और नहीं था। ड्राइवर भी नहीं था। खुद ही चला गया।"
मैंने सिर हिलाया। मेरे पीछे पापा दरवाज़े पर खड़े थे। उन्होंने कुछ नहीं पूछा। सिर्फ़ मेरे चेहरे को देखा और बोले, "अंदर आ।"
मैं अंदर आया। और तभी —
टिंग।
घंटी बजी।
एक बार। साफ़। तेज़। अपने आप।
मेरे दोनों हाथ बिल्कुल मेज़ पर रखे थे। मैंने उन्हें उठते देखा। मेरी जेब में कोई हाथ नहीं था। पीछे वाले कमरे की तरफ़ से टिंकू निकला — उसका चेहरा सफ़ेद था और उसकी आवाज़ फँसी हुई थी।
"उस्ताद," उसने कहा। "उस्ताद, हाथ तो जेब में था ही नहीं। मैं देख रहा था। आपके दोनों हाथ मेज़ पर थे।"
"मैं जानता हूँ," मैंने कहा।
"तो फिर किसने बजाई?"
पापा ने दरवाज़ा बंद किया। धीरे, बिना आवाज़। उन्होंने पीछे वाले बल्ब की तरफ़ देखा और फिर मेरी जेब की तरफ़।
मैंने जेब में हाथ डाला और घंटी बाहर निकाली। वो मेरी हथेली पर ठंडी थी — इतनी ठंडी कि एक पल को लगा कि किसी ने उसे बर्फ में रखा था। उसका रंग गहरा था, फूल खुदा हुआ था, और उसकी सतह पर उँगली रखने पर एक झुरझुरी उँगली से सीधे कंधे तक गई।
और फिर घंटी बोली।
उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी। इतनी धीमी कि जैसे कहीं दूर किसी बंद कमरे से आ रही हो। पर हर शब्द साफ़ था।
"यह कर्ज़ तुम्हारा नहीं है। यह तुम्हारे दादा का है।"
मैंने घंटी को दोनों हाथों में पकड़ लिया।
"और कर्ज़दार," घंटी ने कहा, "आज गली में आया है।"
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