The Mysterious Bell – Chapter 491: jodne wala mistri hissa 050 ep491-500
मैदान में वो हाथ अब भी उठा हुआ था।
रणवीर का पत्थर वाला हाथ। जिसमें कुछ पल पहले एक ईंट थी, जो चटक चुकी थी। अब उसकी उँगलियाँ हवा में बंद थीं — खाली, कसी हुई, जैसे किसी अदृश्य गर्दन को पकड़ रही हों और छोड़ने का नाम न ले रही हों।
पर मैं उसकी तरफ़ नहीं देख रहा था।
मेज़ पर दोनों ताले पड़े थे। टूटे हुए। एक का ढक्कन मुड़ा हुआ, दूसरे की कुंडी बीच से चटकी हुई। वो अब ठंडे नहीं थे। मैंने उन्हें छुआ भी नहीं था, पर दूर से ही लग रहा था जैसे मेज़ की लकड़ी उनके नीचे धीरे-धीरे गुनगुना रही हो।
हवा में अब भी कपूर की गंध तैर रही थी।
और उस गंध के नीचे, बहुत हल्का, एक और बदबू थी। जले काग़ज़ की। बाईस साल पुरानी राख की, जो आज पूरे मैदान में बिखर गई थी।
मुझे लगा था सब मेरी तरफ़ देखेंगे कि मैं उस उठे हुए हाथ की तरफ़ जाऊँगा। कि मैं रणवीर के सामने जाकर खड़ा होऊँगा। कि मैं कुछ कहूँगा — कोई तीखी बात, कोई जवाब।
पर मैंने कुछ नहीं किया।
मैं धीरे-धीरे मुड़ा।
और मेरी नज़र पापा पर पड़ी।
वो मेज़ के दूसरे किनारे पर खड़े थे। रणवीर के बगल से हटकर, थोड़ा पीछे, धूल में। उनकी कमीज़ की आस्तीन चढ़ी हुई थी, हाथों पर मिट्टी लगी थी, और टेप से बँधा वो चश्मा नाक पर तिरछा हो गया था। उनके बालों में धूल थी। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जिसे मैंने पहले कभी इतने साफ़ नहीं देखा था।
डर।
नहीं, डर नहीं। डर तो वो बाईस साल से ढो रहे थे। ये कुछ और था। ये शर्म थी। एक ऐसी शर्म जो आदमी को ज़मीन में गाड़ देती है और ऊपर से पत्थर रख देती है।
वो हिल नहीं रहे थे।
वो बस खड़े थे। एक हाथ से मेज़ का कोना पकड़े हुए, जैसे अगर वो छोड़ दें तो ज़मीन उन्हें खा जाएगी।
मेरे पैर अपने आप चले।
मैंने टिंकू का हाथ छोड़ा, जो अभी भी मेरी कमीज़ का कोना पकड़े हुआ था। मैंने उस तरफ़ देखा भी नहीं जहाँ काजल खड़ी थी, न माँ की तरफ़, न उस्ताद की तरफ़। मैं सीधा पापा के सामने गया।
और वहीं, भरी भीड़ के बीच, उन सैकड़ों काग़ज़ों के बीच, उन दीयों के बीच जो अब आधे बुझ चुके थे, और उन सैकड़ों आँखों के सामने जो मुझे देख रही थीं —
मैं घुटनों के बल बैठ गया।
मेरे घुटनों के नीचे धूल थी। सूखी, गरम, हल्की। मेरी जीन्स पर धूल लग गई। मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ा।
भीड़ में एक साथ साँसें रुकीं।
फिर फुसफुसाहट उठी।
“अरे ये क्या कर रहा है…”
“पागल हो गया है लड़का…”
“ये कैसा तमाशा है भाई…”
“उठ तो! सब देख रहे हैं!”
कोई औरत बोली, “ये अपने बाप के सामने क्यों बैठ गया?”
कोई बोला, “ये माफ़ी माँग रहा है क्या?”
और फिर एक बूढ़ी आवाज़ आई, जो शायद सबसे सच्ची थी — “नहीं, ये माफ़ी नहीं माँग रहा। ये कुछ और कर रहा है।”
मेरे पीछे टिंकू ने धीरे से कहा, “भाई…”
मैंने उसकी तरफ़ देखा भी नहीं।
मैंने अपने दोनों हाथ बढ़ाए और पापा का दाहिना हाथ अपनी हथेली में ले लिया।
उनका हाथ गरम था। बहुत गरम। और काँप रहा था, बहुत हल्का, इतना हल्का कि दूर से कोई नहीं देख सकता था। पर मैं देख सकता था। मैं उनकी हथेली की एक-एक नस पहचानता था। वो नसें जिन्होंने मेरी साइकिल की चेन सालों तक जोड़ी थी।
उनकी हथेली पर एक छोटा सा घाव था। नया। आज सुबह का। नींव के पत्थर से।
“पापा,” मैंने कहा।
मेरी आवाज़ बैठी हुई थी। मुझे लगा वो निकलेगी नहीं। पर निकली।
“उठ, बेटा,” उन्होंने कहा। आवाज़ बहुत धीमी थी। “सब देख रहे हैं।”
“देखने दो।”
“अंकुश…”
“पापा, मेरी तरफ़ देखो।”
उन्होंने देखा।
उनकी आँखों में पानी था। वो पानी बह नहीं रहा था। वो बस किनारे तक आकर रुक गया था, जैसे बाईस साल से आदत पड़ गई हो कि आँसू भी बहने से पहले पूछते हैं।
और मैंने उनका हाथ और कसकर पकड़ लिया।
“पापा,” मैंने कहा, “इतना बोझ अकेले क्यों उठाया?”
वो चुप रहे।
“कौन सा बोझ?” उन्होंने पूछा, ऐसे जैसे सच में नहीं जानते हों।
“बाईस साल का।”
मेरी आवाज़ अब काँप रही थी। मैं रोक नहीं रहा था। मुझे रोकना भी नहीं था।
“एक अंगूठे का बोझ, पापा। एक अंगूठे का। तुमने उसे उस काग़ज़ पर लगाया और फिर उसे अपने अंदर ले लिया, और इतने साल उसे अकेले ढोया। मुझे क्यों नहीं बताया?”
“तू छोटा था।”
“मैं छोटा था तब,” मैंने कहा। “पर कल? पिछले साल? बीस साल से? मैं कब बड़ा होता, पापा? तुम्हारी नज़र में मैं कब बड़ा होता?”
उनका हाथ मेरी पकड़ में हिला।
“मुझे लगा…” उन्होंने कहा, और फिर रुक गए।
“क्या लगा?”
“मुझे लगा कि अगर तुझे पता चला तो…” उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। “तो तू मुझे कायर कहेगा।”
मुझे लगा मेरे सीने में कुछ टूट गया। पर वो टूटना दर्द वाला नहीं था। वो टूटना उस तरह का था जैसे कोई पुरानी ज़ंग लगी चीज़ आख़िरकार चटक जाए और अंदर की साफ़ धातु दिख जाए।
“पापा,” मैंने कहा, “मैं तुम्हारा बेटा हूँ। तुम्हारा जज नहीं हूँ।”
पीछे से कोई आवाज़ आई। कड़ी। चीखती हुई।
“अंकुश! अंकुश, मैं तुमसे बात कर रहा हूँ! सुनता है तू?”
रणवीर था।
वो अपना उठा हुआ हाथ नीचे कर चुका था। अब वो मेज़ के उस तरफ़ खड़ा था, कमीज़ का कालर खुला, बाल बिखरे, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ और था — बेचैनी।
“अंकुश!” वो फिर चिल्लाया। “कल दो बजे! तूने सुना नहीं? मैं तुझे बुला रहा हूँ!”
पर मैदान में कोई उसकी तरफ़ नहीं देख रहा था।
हज़ार लोग खड़े थे, और एक भी आदमी उसकी तरफ़ नहीं देख रहा था।
रमेश उसके पास आया। उसने रणवीर के कंधे पर हाथ रखा और धीरे से कहा, “साहब, चलिए।”
रणवीर ने उसका हाथ झटक दिया। वो फिर मेरी तरफ़ देखा, एक पल, दो पल। फिर उसने अपना हाथ नीचे किया, मुड़ा, और सफ़ेद गाड़ी की तरफ़ चल दिया। उसकी धमकती हुई हीलें धूल में गहरे निशान छोड़ती गईं।
गाड़ी का दरवाज़ा खुला। बंद हुआ।
फिर इंजन।
फिर रोशनी।
और फिर वो चला गया।
माँ मेज़ के उस पार खड़ी थीं।
काजल का हाथ उनकी कमर पर था। माँ की उँगलियाँ काँप रही थीं — वो उँगलियाँ जो रोज़ सुबह पाँच बजे चूल्हा जलाती थीं, जो हिसाब की कॉपी पर सीधी लकीरें खींचती थीं, जो मेरे बाल बचपन में बेतरतीब होने पर सीधे करती थीं।
उन्होंने मुँह खोला। कुछ कहने के लिए। फिर बंद कर दिया।
वो रो रही थीं, पर आवाज़ नहीं कर रही थीं।
और मुझे पता था वो क्यों रो रही थीं। वो इसलिए नहीं रो रही थीं कि पापा ने अंगूठा लगाया था। वो इसलिए रो रही थीं कि उन्होंने बाईस साल उस अंगूठे को अपने पति के सीने में छिपा देखा था और खुद चुप रही थीं। वो इसलिए रो रही थीं कि जो सज़ा उन्होंने खुद को दी थी, वो आज भरी भीड़ के सामने खुल गई थी।
मैंने पापा का हाथ नहीं छोड़ा।
“पापा,” मैंने कहा, “तुम्हें कब लगा कि मैं तुम्हें कायर कहूँगा?”
“पहले दिन से,” उन्होंने कहा।
“क्यों?”
“क्योंकि मैं खुद को कायर कहता था,” उन्होंने कहा। “रोज़ सुबह आईने में देखता था और कहता था — शंकर, तू डरपोक है। तूने अपने बेटे की दुकान, अपनी बीवी का इलाज, सब कुछ एक काग़ज़ के नीचे दबा दिया। और तू आज तक उसे उठाकर फेंक भी नहीं पाया।”
उनकी आवाज़ टूटने लगी।
“इतना तो कर सकता था,” उन्होंने कहा। “एक बार तेरे सामने आकर कह सकता था। पर मैंने सोचा… मैंने सोचा कि अगर मैंने कह दिया, तो तू मेरी तरफ़ देखेगा भी नहीं।”
“पापा।”
“और मुझसे ये नहीं सहा गया,” उन्होंने कहा। “ये नहीं सहा गया कि मेरा बेटा मेरी तरफ़ ऐसे देखे जैसे किसी अजनबी को देखता है।”
मेरी आँखें जल रही थीं। मैंने उन्हें पोंछा भी नहीं।
“पापा, याद है मुझे?” मैंने कहा। “जब मैं पाँच साल का था। तुम मुझे दुकान पर ले गए थे। मैंने साइकिल की चेन उल्टी लगा दी थी। फिर मैं डर गया कि तुम डाँटोगे।”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
“तुम हँसे थे,” मैंने कहा। “ज़ोर से हँसे थे। तुमने कहा था — बेटा, चेन उल्टी भी चले तो गाड़ी पीछे जाती है। और मुझे लगा मैंने कुछ बड़ा सीख लिया है।”
पापा की आँखों से पानी बह गया।
“उस दिन तुम हँसे थे पापा,” मैंने कहा। “तो आज क्यों भूल गए?”
“अंकुश…”
“तुमने सोचा कि मैं तुम्हें कायर कहूँगा। पर तुम्हें पता है सच क्या है? कायर वो नहीं जो डरता है, पापा। कायर वो है जो डर के आगे बेटे को देखना छोड़ दे।”
मेरी आवाज़ भर्रा गई।
“और तुमने मुझे बाईस साल देखना नहीं छोड़ा। तुम रोज़ सुबह मेरी साइकिल की हवा देखते रहे। तुम रोज़ रात दुकान का शटर खुद चेक करते रहे। तुमने एक बार भी मुझसे कहा होता कि बेटा, आज तू आराम कर, मैं दुकान संभाल लेता हूँ… पर तुमने कभी नहीं कहा। क्योंकि तुम्हें लगता था कि अगर तुमने दुकान संभाली, तो लोग कहेंगे कि तुमने मेरा हक़ लिया है।”
पापा ने धीरे से कहा, “मैंने सोचा था कि मैंने पहले ही बहुत कुछ लिया है।”
“तुमने कुछ नहीं लिया,” मैंने कहा। “तुम हमेशा से देते आए हो। बस एक बार लेना भूल गए। मदद लेना।”
पीछे से आवाज़ आई। शबनम आपा की।
“अरे, सब वहीं खड़े हो क्या? किसी ने पानी दिया इस आदमी को? अरे उठाओ इनको!”
और फिर भीड़ हिली।
पहले धीरे। फिर तेज़।
कोई आगे आया। कोई पीछे हटा। एक बूढ़ी औरत ने अपना दुपट्टा नोचकर पापा के हाथ पर बाँध दिया, जहाँ घाव था। किसी ने पानी का गिलास बढ़ाया। शबनम आपा आईं और मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोलीं, “उठ बेटा। तेरे पापा को बैठने दे।”
मैं उठा।
मैंने पापा को उठाया। वो मेरे कंधे पर झुक गए, बहुत हल्का, जैसे एक बूढ़ा आदमी नहीं, एक पूरी उम्र का डर झुक गया हो।
उस्ताद पास आए। उन्होंने पापा के दूसरे हाथ पर हाथ रखा। उनकी आँखें भी गीली थीं।
“शंकर,” उन्होंने कहा, “तूने आज वो किया जो मैं पचास साल से नहीं कर पाया।”
पापा ने उनकी तरफ़ देखा।
“तूने अपने बेटे से डर के बारे में बात की,” उस्ताद ने कहा। “मैंने अपने भाई से नहीं की। इसीलिए वो आज भी मुझसे बोलता है, और मैं आज भी नहीं बोल पाता।”
कमला अम्मा अपनी लाठी के सहारे वहीं खड़ी थीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनका सिर बहुत हल्का हिला, जैसे कोई बूढ़ी औरत किसी चीज़ को मन ही मन सही कह रही हो।
गोविंद भाई दूर, एक दीये के पास बैठे हुए थे। उनका चश्मा अब भी टेप से बँधा था, पर टेप खुल गई थी और चश्मा नाक पर तिरछा लटक रहा था। वो रो रहे थे, चुपचाप, एक काग़ज़ हाथ में पकड़े।
मीरा का कैमरा ज़मीन पर पड़ा था। लाल बत्ती बुझ चुकी थी।
सक्सेना दूर, उसी मेज़ के नीचे ज़मीन पर बैठे हुए थे। उनका सफ़ेद कुर्ता धूल में लग गया था। उन्होंने मुझे देखा, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मुझे पहले कभी किसी काग़ज़ में नहीं दिखा था।
शर्म।
असली शर्म।
पापा को मैंने मेज़ के पास बने एक पत्थर के पास बैठाया। वो कुछ कहना चाहते थे, पर मैंने उनके हाथ पर हाथ रख दिया।
“पापा, एक बात और पूछनी है।”
“पूछ।”
“वो अंगूठा,” मैंने कहा। “उस काग़ज़ पर। जो तुमने लगाया।”
वो चुप रहे।
“उस पर मेरा नाम भी था?”
पापा की आँखें बंद हो गईं। बहुत देर तक बंद रहीं। फिर खुलीं।
“हाँ,” उन्होंने कहा। “तू उस काग़ज़ पर मेरे साथ लिखा था। तेरा नाम, फिर मेरा नाम। पहली लाइन तेरी थी। और मैंने सिर्फ़ अपना अंगूठा लगाया।”
मेरे सीने में कुछ और टूटा।
“तो मेरी लाइन आज भी खाली है?”
“हाँ।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“तो कल,” मैंने कहा, “हम दोनों जाएँगे। और उस खाली लाइन पर हम दोनों लिखेंगे।”
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
“क्या लिखेंगे?”
“वो जो सच है,” मैंने कहा। “कि तुमने डर के मारे अंगूठा लगाया। और मैंने बाईस साल उस डर को पहचाना नहीं।”
तभी मेरी जेब से आवाज़ आई।
घंटी।
बहुत धीमी। बहुत थकी हुई। जैसे किसी बूढ़े आदमी ने आधी नींद में करवट बदली हो।
“अब,” उसने कहा।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी — बहुत ठंडी, पर बर्फ़ जैसी नहीं। बस ऐसी, जैसे उसने बहुत सारी बातें कहकर खुद को ख़ाली कर लिया हो।
“अब क्या?” मैंने धीरे से पूछा।
“अब बोलेंगे नहीं,” उसने कहा। “अब सुनेंगे।”
मैंने घंटी को जेब में वापस रख दिया।
मैदान में अब भी लोग खड़े थे। सैकड़ों। कुछ बैठ गए थे धूल में। कुछ एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए थे। दीये अब तेज़ जल रहे थे, क्योंकि हवा थम गई थी।
टिंकू मेरे पास आया। उसकी आँखें लाल थीं।
“भाई,” उसने कहा।
“हाँ।”
“तुमने रणवीर से बात क्यों नहीं की? वो बुला रहा था।”
“क्योंकि,” मैंने कहा, “आज पहली बार मुझे समझ आया कि असली लड़ाई किससे है।”
“किससे?”
“उस डर से,” मैंने कहा। “जिसने पापा को बाईस साल चुप करा दिया। जिसने उस्ताद को पचास साल अपने भाई से दूर रखा। जिसने माँ को अपने ही घर में अजनबी बना दिया।”
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
“और उस डर को कैसे हराएँगे?”
“उसी तरह,” मैंने कहा। “जैसे आज हुआ।”
माँ मेरे पास आईं। काजल उनका हाथ पकड़े हुई थी।
“अंकुश,” माँ ने कहा। उनकी आवाज़ सूखी थी।
“हाँ, माँ।”
“जो तूने आज किया…” उन्होंने रुककर साँस ली। “वो तेरे पापा के लिए नहीं था।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“वो तेरे लिए था,” उन्होंने कहा। “तूने खुद को ये बताया कि तू अपने पापा को कायर नहीं कहेगा। क्योंकि तू खुद बाईस साल से डर रहा था कि कहीं वो सच में कायर न निकलें।”
मैं चुप रहा। क्योंकि वो सच कह रही थीं।
“और अब?” मैंने पूछा।
“अब तू जान गया,” उन्होंने कहा। “वो कायर नहीं हैं। वो बस थके हुए हैं।”
उन्होंने मेरा माथा चूमा। बहुत जल्दी। जैसे सबके सामने करने में शर्म आ रही हो, पर करना ज़रूरी हो।
उस रात मैदान खाली होने में बहुत देर लगी।
लोग जाते-जाते रुकते थे। कोई मेरे पास आकर कुछ कहता था, कोई कुछ नहीं कहता था, बस हाथ पकड़कर चला जाता था। एक बूढ़े आदमी ने मेरे सिर पर हाथ रखा और बोले, “बेटा, आज तेरे पापा ने वो कह दिया जो मैं अपने बेटे से नहीं कह पाया।”
मैंने उनका हाथ पकड़ लिया।
जब सब चले गए, तो मैदान में सिर्फ़ हम लोग बचे — मैं, पापा, माँ, काजल, टिंकू, उस्ताद, मीरा, शबनम आपा, रज़िया, और कुछ बच्चे जो सो गए थे चारपाइयों पर।
मेज़ पर दोनों टाले अब भी पड़े थे।
मैंने उन्हें उठाया। एक हाथ में एक।
वो गरम थे। हल्के गरम।
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
“क्या हुआ?” उन्होंने पूछा।
“ये ताले,” मैंने कहा। “अब भी गरम हैं।”
“तो?”
“तो इसका मतलब,” मैंने कहा, “अभी हिसाब पूरा नहीं हुआ।”
उस्ताद ने आगे आकर उन तालों को देखा। उन्होंने एक उँगली से छुआ।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “ये ताले अब सिर्फ़ ताले नहीं हैं।”
“तो क्या हैं?”
“ये दो आदमियों का सच हैं,” उन्होंने कहा। “जो आज खुल गया, पर बंद नहीं हुआ।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“मतलब?”
“मतलब,” उस्ताद ने कहा, “कि जो सच आज खुला, उसे अभी पूरा खुलना है। और उसका आख़िरी हिस्सा…”
वो रुक गए।
“कहाँ है?” मैंने पूछा।
उस्ताद ने अपनी आँखें नीची कर लीं।
“तेरे पापा के पास,” उन्होंने कहा।
मैं पलटा।
पापा अपनी जेब में हाथ डाले खड़े थे। उनकी उँगलियाँ किसी चीज़ पर थीं। वो मेरी तरफ़ देख रहे थे, और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो आज से पहले कभी नहीं थी।
फैसला।
“पापा?” मैंने कहा।
उन्होंने जेब से हाथ निकाला। उनकी हथेली में एक छोटा सा पीला लिफ़ाफ़ा था, जो किनारों से फूला हुआ था, जैसे बहुत सालों से मुड़ा हुआ हो।
“ये,” उन्होंने कहा, “वो चीज़ है जो मैंने आज तक किसी को नहीं दिखाई।”
“क्या है?”
“अभी नहीं,” उन्होंने कहा। “कल। दो बजे से पहले।”
“क्यों?”
“क्योंकि,” उन्होंने कहा, “अगर रणवीर को ये पहले मिल गया, तो तेरे पास कुछ नहीं बचेगा।”
मैंने वो लिफ़ाफ़ा उनसे लिया नहीं।
मैंने सिर्फ़ उनका हाथ पकड़ा और कहा, “पापा, आज रात हम साथ हैं।”
“साथ हैं,” उन्होंने कहा।
“और कल?”
“कल,” पापा ने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार आज मज़बूत लगी, “कल जो होगा, वो सबके सामने होगा।”
मैं मुड़ा।
मेरी जेब में घंटी अब भी ठंडी थी।
मैंने उसे बाहर निकाला। दीये की रोशनी में वो पीली दिख रही थी, पर किनारों से थोड़ी काली।
“कुछ कहना है?” मैंने पूछा।
घंटी चुप रही।
फिर, बहुत धीमे, जैसे कोई बहुत दूर से बोल रहा हो, उसने कहा, “अंकुश।”
“हाँ।”
“तेरे पापा ने आज जो किया, वो मरम्मत नहीं थी।”
“तो क्या था?”
“कच्चा माल था,” घंटी ने कहा। “अब असली जोड़ शुरू होगा।”
“कब?”
“कल,” घंटी ने कहा। “जब तू उस दफ़्तार में जाएगा।”
और फिर चुप हो गई।
मैंने वो दोनों ताले अपनी जेब में रखे। पापा के साथ गाड़ी तक चला। माँ और काजल पीछे थीं।
गली के मोड़ पर मैंने पलटकर देखा।
मैदान अब खाली था। बस दीयों की रोशनी बची थी, और वो मेज़, जिस पर सैकड़ों काग़ज़ अब भी पड़े थे।
हवा ने एक काग़ज़ उठाया और वो उड़कर मेरे पैरों के पास आ गया।
मैंने उसे उठाया।
उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी, हाथ से लिखी, नीली स्याही में —
“जो आज बोला, वो कल भी बोलेगा।”
मैंने वो काग़ज़ पापा की तरफ़ बढ़ाया। उन्होंने देखा, फिर मेरी तरफ़ देखा।
“रख ले,” उन्होंने कहा। “ये तेरी कमाई है।”
घर पहुँचकर मैं सीधा दुकान के पीछे वाले कमरे में गया। चारपाई पर बैठा, दीये की रोशनी में, वो दोनों ताले सामने रखे।
वो अब भी गरम थे।
मैंने उन्हें देखा, बहुत देर। फिर मेरी नज़र ताले के ऊपर के दो लकीर-बिंदु निशान पर पड़ी — वो निशान जो मैंने पहले चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर देखा था, घंटी के छल्ले पर देखा था, मंसूर के पीले काग़ज़ पर देखा था।
वही निशान। हर जगह।
जैसे कोई एक आदमी बरसों से शहर में घूम रहा हो और हर जगह अपना निशान छोड़ रहा हो।
और अभी तक वो किसी को दिखा नहीं।
मैंने घंटी जेब से निकाली।
“एक बात पूछूँ?” मैंने कहा।
“पूछ।”
“वो तीसरा आदमी,” मैंने कहा। “जिसकी बात कमला अम्मा ने कही।”
“हाँ।”
“वो कौन है?”
घंटी बहुत देर चुप रही।
फिर बोली, “कल दो बजे, तेरे पापा जो लिफ़ाफ़ा लाए हैं ना…”
“हाँ?”
“वो लिफ़ाफ़ा,” घंटी ने कहा, “उसी के हाथ का है।”
मेरे हाथ से घंटी छूट गई।
चारपाई पर गिरी, एक बार टनकारी, और फिर चुप।
मैं बाहर आया।
पापा आँगन में बैठे थे, चटाई पर। उनके सामने वो पीला लिफ़ाफ़ा रखा था। वो उसे नहीं खोल रहे थे, बस उसे देख रहे थे।
मैं उनके पास बैठ गया।
“पापा।”
“हाँ।”
“वो लिफ़ाफ़ा,” मैंने कहा। “किसका है?”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
बहुत देर तक देखा। फिर उन्होंने उसे उठाया और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
“मैं नहीं जानता,” उन्होंने कहा। “मुझे सिर्फ़ इतना पता है कि वो बाईस साल पहले मुझे उस आदमी ने दिया था जिसने मुझे रणवीर के पास ले जाया था।”
मैंने लिफ़ाफ़ा हाथ में लिया।
वो हल्का था। बहुत हल्का। जैसे अंदर कुछ भी न हो।
“और उस आदमी का नाम?”
पापा ने आसमान की तरफ़ देखा। आज रात आसमान साफ़ था। तारे दिख रहे थे।
“मैंने उससे नाम नहीं पूछा,” उन्होंने कहा। “वो मुझे उलटी तरफ़ से मिला था। पीछे से। और जब मैं पलटा, तो वो जा चुका था।”
“तुमने उसकी शक्ल देखी?”
“बस एक बार,” पापा ने कहा। “और वो शक्ल मुझे आज भी याद है।”
“कैसी?”
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
और फिर उन्होंने वो कहा जो इस पूरे एपिसोड का सबसे भारी सच था।
“मेरी अपनी शक्ल जैसी,” उन्होंने कहा। “बिल्कुल मेरी जैसी। पर उम्र में थोड़ा बड़ा।”
आँगन में सन्नाटा छा गया।
काजल दरवाज़े पर खड़ी थी। उसने सब सुना। उसका हाथ मुँह पर चला गया।
माँ सीढ़ी पर बैठी थीं। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे उन्हें ये बात पहले से पता थी और अब बस उसका बोला जाना बाकी था।
और मेरे पीछे, अंधेरे में, किसी ने धीरे से पैर की आहट दी।
मैं पलटा।
गली के मुँह पर कोई खड़ा था। काली परछाईं। चेहरा नहीं दिख रहा था। बस एक हाथ में कुछ था जो दीये की रोशनी में हल्का चमका।
पीतल।
और फिर वो मुड़ा और अंधेरे में ग़ायब हो गया।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
“पापा,” मैंने कहा, “तुम्हारा कोई भाई है?”
पापा की आँखों में वो पानी वापस आ गया।
“था,” उन्होंने कहा। “एक था। बड़ा। शंकरलाल।”
“और?”
“और,” पापा ने कहा, “वो मर गया। पचास साल पहले। आग में।”
मैंने उनके हाथ पर हाथ रखा।
“पापा,” मैंने कहा, “आज मैंने तुमसे जो पूछा, वो तुमने सच बोलकर जवाब दिया। बहुत हिम्मत लगी होगी।”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
“पर अब एक और हिम्मत करनी है,” मैंने कहा।
“क्या?”
“अगर वो मरा नहीं है,” मैंने कहा, “तो कल हम उसे ढूँढेंगे। और अगर वो सच में तुम्हारा भाई है…”
मैं रुका।
“तो?” उन्होंने पूछा।
“तो हम उससे पूछेंगे,” मैंने कहा, “कि पचास साल से वो क्यों छिपा है।”
पापा चुप थे।
बहुत देर चुप थे।
फिर उन्होंने धीरे से, इतने धीमे कि मुझे सुनने के लिए झुकना पड़ा, कहा —
“डर था कि बेटा मुझे कायर न कह दे… और वही डर मेरी चुप्पी बन गया।”
मैंने उनका हाथ और कसकर पकड़ लिया।
“पापा,” मैंने कहा, “आज तुमने वो कह दिया जो तुमने बाईस साल किसी को नहीं कहा। ये कायर का नहीं, हिम्मत वाले का काम है।”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था, पर इस बार वो रुका नहीं। बह गया।
और मैंने उनका हाथ कसकर पकड़े रखा।
॥
पापा का हाथ मेरे हाथ में था।
उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर पकड़ कसी हुई थी। जैसे किसी डूबते आदमी ने रस्सी पकड़ी हो। मैंने उन्हें छोड़ा नहीं। आँगन में चटाई पर हम दोनों बैठे थे। सामने वो पीला लिफ़ाफ़ा रखा था, जो बाईस साल से पापा के सीने पर बोझ बनकर लटका था।
पापा ने एक लंबी साँस ली।
“बेटा,” उन्होंने कहा, “तूने आज पूछा कि मैंने अंगूठा क्यों लगाया।”
मैं चुप रहा।
“मैं तुझे वो पूरी बात बताता हूँ,” उन्होंने कहा। “बाईस साल पहले की बात है। तेरी माँ अस्पताल में थीं। डॉक्टर ने कहा था कि इलाज लंबा चलेगा। पैसा चाहिए था। बहुत चाहिए था।”
उनकी आवाज़ धीमी हो गई।
“मैंने कहीं से उधार लेने की कोशिश की। सबने हाथ खड़े कर दिए। कोई बोला, यादव जी, हमारे पास भी बच्चे हैं। कोई बोला, पहले पुराना हिसाब साफ़ करो। मैं घर आया। तेरी माँ की दवा की पर्ची जेब में थी। काजल छोटी थी। तू सात-आठ साल का था।”
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
“तू उस वक़्त दुकान पर बैठा था। पुरानी साइकिल की चेन साफ़ कर रहा था। तेरे हाथ में ग्रीस लगी थी। तूने मुझसे पूछा था — पापा, माँ कब आएँगी? और मैं तुझे जवाब नहीं दे पाया था।”
मेरा गला भर आया। मैंने उनका हाथ और कसकर पकड़ लिया।
“उसी शाम एक आदमी आया,” पापा ने कहा। “सफ़ेद कुर्ता पहने हुए। हाथ में काग़ज़ों का बंडल। बोला, यादव जी, साहब आपकी मदद करना चाहते हैं। बस एक अंगूठा चाहिए। मैंने काग़ज़ देखे। उन पर तेरा नाम पहले लिखा था।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“मेरा नाम?”
“हाँ,” पापा ने कहा। “तेरा नाम। अंकुश यादव। और उसके नीचे मेरा नाम। दोनों की जगह बनी थी। उन्होंने कहा कि एक ही अंगूठा लगेगा। मैंने कहा कि बेटे का नाम हटा दो। मैंने गिड़गिड़ाकर कहा। उन्होंने हँसकर कहा — ठीक है, तुम्हारा अंगूठा लगा दो।”
पापा की आवाज़ टूटने लगी।
“मैंने अंगूठा लगा दिया,” उन्होंने कहा। “उस रात मैं अस्पताल गया। तेरी माँ को देखा। उनका हाथ पतला था। साँस भारी थी। मैंने सोचा कि अगर ये अंगूठा उन्हें बचा सकता है, तो लग जाने दो। पर बेटा…”
वो रुके।
“लगाने के बाद,” उन्होंने धीमे से कहा, “मैं अपने हाथ को देख नहीं पाया। मुझे लगा कि मेरा अंगूठा काला हो गया है। मैंने उसे छुपाना शुरू किया। रात को सोते वक़्त हाथ तकिये के नीचे दबा देता था। कभी मुट्ठी बंद करके बैठता था। कभी जेब में हाथ डालकर चलता था। तेरी माँ पूछती थीं — हाथ में क्या है? मैं कह देता था, कुछ नहीं।”
मैं कुछ नहीं बोला।
“बाईस साल,” पापा ने कहा। “बाईस साल मैंने वो अंगूठा छुपाया। हर रात। हर सुबह। जब तू दुकान पर बड़ा हो रहा था, मैं तेरे सामने हाथ नहीं खोलता था। जब काजल स्कूल से आती थी, मैं उसके सामने हाथ पीठ के पीछे रख लेता था। मुझे लगता था कि अगर तुमने देख लिया, तो तुम पूछोगे — पापा, ये क्या है? और मैं जवाब नहीं दे पाऊँगा।”
उन्होंने अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाया। उँगलियाँ फैलाईं। अंगूठा सामने आया। उस पर कोई निशान नहीं था। बस पुरानी झुर्रियाँ थीं। पर पापा उसे ऐसे देख रहे थे जैसे उस पर कोई दाग़ हो।
“ये अंगूठा,” उन्होंने कहा, “मेरे लिए काग़ज़ का टुकड़ा नहीं है। ये वो डर है जो मैंने अपने हाथ में पकड़ रखा है।”
मैंने उनका हाथ धीरे से अपनी तरफ़ खींचा।
“पापा,” मैंने कहा।
वो मेरी तरफ़ देखने लगे।
“तुमने आज मुझसे जो पूछा,” उन्होंने कहा, “वो सच बोलकर मैंने अपना डर तोड़ा है। पर बेटा, मुझे एक बात और कहनी है।”
“कहो।”
“मैं तुझे अकेला नहीं छोड़ना चाहता था,” उन्होंने कहा। “पर मैं खुद इतना टूट गया था कि तुझसे हाथ बँटाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।”
मैंने उनकी आँखों में देखा।
“पापा,” मैंने कहा, “अब मैं कुछ कहूँ?”
“कह।”
“मैं भी डरता था,” मैंने कहा।
पापा चुप हो गए।
“मैं अंदर से डरता था कि मैं ये घर नहीं बचा पाऊँगा,” मैंने कहा। “मैंने कभी किसी को नहीं बताया। मैंने सोचा कि अगर मैं सब कुछ अकेले करूँगा, तो अगर कुछ टूटा, तो सिर्फ़ मेरा ही दोष होगा। मैं किसी को दोष नहीं देना चाहता था। इसलिए मैंने सबको दूर रखा।”
पापा मेरी तरफ़ देख रहे थे।
“मैं तुमसे नाराज़ था,” मैंने कहा। “पर सच ये है कि मैं खुद से नाराज़ था। मुझे लगता था कि मैं तुम्हारी चुप्पी का बोझ उठा रहा हूँ। पर आज समझ आया कि तुम भी वही बोझ उठा रहे थे।”
पापा का हाथ मेरे हाथ में काँपा।
“तूने आज मुझे कायर नहीं कहा,” उन्होंने कहा।
“क्यों कहूँगा?” मैंने कहा। “तुमने बाईस साल एक डर को सीने में रखकर सबका घर चलाया। कायर वो होता है जो डर को दूसरों पर थोप देता है। तुमने उसे अपने अंदर रखा। पर अब उसे बाहर निकालने का वक़्त है।”
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था।
“मैं तुम्हारा बेटा हूँ,” मैंने कहा। “मैं तुम्हारे साथ हूँ।”
उन्होंने मेरा सिर अपने सीने से लगा लिया। मैंने उनके कंधे पर अपना माथा रख दिया। आँगन में सिर्फ़ दीये की लौ की आवाज़ बची थी। बहुत धीमी। फिर भी सुनाई दे रही थी, जैसे कोई बहुत दूर से साँस ले रहा हो।
कुछ देर बाद मैंने उन्हें उठाया।
“चलो,” मैंने कहा। “मैदान में लोग अब भी खड़े हैं। और मंसूर चाचा का ताला वहीं मेज़ पर है।”
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
“तू ठीक है?”
“नहीं,” मैंने सच कहा। “पर जाना ज़रूरी है।”
हम आँगन से निकले। गली में दीये अब भी जल रहे थे। कुछ बुझ चुके थे। उनकी बाती से अब भी हल्का धुआँ उठ रहा था। मैंने पापा का हाथ नहीं छोड़ा।
मैदान में पहुँचे तो भीड़ अब भी खड़ी थी। कोई बैठा था, कोई खड़ा। बच्चे चबूतरी के किनारे बैठे थे। शबनम आपा गुमटी की तरफ़ देख रही थीं। रज़िया उनके पास खड़ी थी। उस्ताद अपनी पीतल की कैंची हाथ में लिए खड़े थे। मीरा ने कैमरा अभी तक उठाया नहीं था। वो ज़मीन पर रखा था, लाल बत्ती बंद।
लोगों ने हमें आते देखा। किसी ने कुछ नहीं पूछा। बस रास्ता छोड़ दिया।
मैं पापा को लेकर उस लंबी मेज़ तक गया। मेज़ पर सैकड़ों काग़ज़ पड़े थे। सबसे ऊपर शंकरलाल यादव का नाम था। और उसके नीचे, एक कोने में, मंसूर चाचा का टूटा काला ताला रखा था। उसके बगल में दूसरा टाला, जो रणवीर ने दिया था।
मैं रुक गया।
मेरी जेब में घंटी थी। वो चुप थी। पर मुझे लगा जैसे वो साँस ले रही है।
“पापा,” मैंने कहा। “आज जो तुमने कहा, वो किसी ने सुना?”
पापा ने भीड़ की तरफ़ देखा।
“नहीं,” उन्होंने कहा। “पर जो मैंने आज कहा, वो अब मेरे अंदर नहीं है।”
मैंने उनका हाथ पकड़े रखा।
और तभी मुझे कुछ महसूस हुआ।
मेज़ पर पड़ा मंसूर का टाला गरम हो रहा था। मैंने उसे छुआ नहीं था। पर मैं उसकी गरमाहट हवा में सुन सकता था। जैसे किसी पुरानी लोहे की चीज़ ने साँस ली हो।
“पापा,” मैंने धीमे से कहा।
उन्होंने भी देखा।
ताले के जोड़ से पीली रोशनी की एक पतली लकीर निकली। बाल जितनी पतली। जैसे दो टूटे हिस्सों के बीच से किसी ने रोशनी की सुई डाल दी हो।
उस्ताद की उँगलियाँ खुल गईं। उनकी पीतल की कैंची बीच में ही रुक गई। वो कैंची को भूल गए। मैंने उन्हें ऐसा पहले कभी नहीं देखा था। उनका मुँह आधा खुला था। आँखें ताले पर जमी थीं।
मीरा का हाथ कैमरे की तरफ़ उठा और बीच में ही रुक गया। उसने कैमरा नहीं उठाया। बस देखती रही।
भीड़ में फुसफुसाहट नहीं हुई। कोई चिल्लाया नहीं। कोई पीछे नहीं हटा। सब जैसे उस पीली लकीर को देख रहे थे।
पापा ने दोनों हाथों से मेरा सिर पकड़ लिया।
मैं चौंका।
उन्होंने मेरा सिर अपनी तरफ़ खींचा। उनके हाथ ठंडे थे, पर उनकी पकड़ मज़बूत थी। उन्होंने मेरी आँखों में देखा।
“बेटा,” उन्होंने कहा।
उनकी आवाज़ भरी हुई थी।
“मैंने बाईस साल तुझे गले नहीं लगाया,” उन्होंने कहा। “जब तू छोटा था, मैंने सोचा कि गले लगाने के लिए मेरे हाथ साफ़ होने चाहिए। फिर तू बड़ा हो गया। मैंने सोचा, अब देर हो गई।”
उनकी आँखों से पानी बहने लगा।
और इस बार उन्होंने मुँह नहीं छुपाया। न हाथ। न रूमाल। वो भरी भीड़ के सामने रो रहे थे। गली के लोग देख रहे थे। बच्चे देख रहे थे। उस्ताद देख रहे थे। शबनम आपा देख रही थीं। माँ दरवाज़े के पास खड़ी थी, काजल का हाथ पकड़े।
पापा ने मेरा सिर अपने सीने से लगा लिया।
“माफ़ कर दे,” उन्होंने कहा।
मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
“पापा,” मैंने कहा। “माफ़ी काग़ज़ पर नहीं लिखी जाती। वो सीने से लगाकर दी जाती है।”
उन्होंने मुझे और कसकर पकड़ लिया।
भीड़ में किसी औरत ने सिसकना शुरू किया। फिर किसी बूढ़े ने अपना चश्मा उतारा। बच्चों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया।
मैंने पापा के सीने पर अपना माथा टिकाए रखा। उनकी कमीज़ पर मेरे आँसू गिरे। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरा। बहुत धीरे। जैसे सालों की धूल हटा रहे हों।
और तभी —
ताले के भीतर से हँसी आई।
बहुत धीमी। बहुत पुरानी। जैसे किसी बंद कमरे से आती हो। पर साफ़। इतनी साफ़ कि मैदान में खड़े हर आदमी ने सुना।
वो हँसी मेरे कानों में घुसी और सीधे मेरी रीढ़ तक उतर गई।
मैंने पापा से अपना सिर अलग किया।
“ये…” मैंने कहा।
पापा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया था।
“ये हँसी,” उन्होंने धीमे से कहा।
वो हँसी फिर आई। इस बार थोड़ी लंबी। जैसे कोई अपनी ही किसी पुरानी बात को याद करके हँस रहा हो।
मैंने उसे पहचानने की कोशिश की।
बहुत जानी-पहचानी लगी।
मुझे लगा जैसे मैंने ये हँसी बहुत पहले सुनी है। बहुत साल पहले। जब मैं छोटा था। तब भी कभी रात में उठकर मैंने सोचा था कि घर में कोई हँस रहा है। पर जब आँख खोली, तो सिर्फ़ पंखे की आवाज़ थी।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।
घंटी गरम थी।
बर्फ़ जैसी नहीं। आग जैसी नहीं। बस इतनी गरम कि मेरी हथेली जलने लगी।
मैंने उसे बाहर निकाला।
घंटी मेरे हाथ में काँप रही थी। उससे कोई आवाज़ नहीं आई। न “हाँ”, न “नहीं”, न कोई चेतावनी। सिर्फ़ गरमाहट।
वो हँसी फिर आई।
इस बार हँसी के साथ एक शब्द भी आया। बहुत दबा हुआ। जैसे किसी ने बहुत सालों बाद बोला हो।
“…बेटा…”
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
पापा ने मेरा हाथ पकड़ा।
“अंकुश,” उन्होंने कहा।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
उनकी आँखों में वो पानी अब भी था। पर उसके पीछे डर भी था।
“ये हँसी,” पापा ने कहा, “मैंने बाईस साल पहले सुनी थी।”
“कहाँ?”
पापा ने ताले की तरफ़ देखा।
“उस रात,” उन्होंने कहा। “जिस रात मैंने अंगूठा लगाया था।”
मैदान में हवा रुक गई।
दीयों की लौ एक साथ झुकी और फिर सीधी हो गई।
मंसूर का टूटा ताला मेज़ पर पड़ा था। उसके जोड़ से पीली रोशनी की लकीर अब भी निकल रही थी। और उसके भीतर से कोई हँस रहा था।
मैंने घंटी को उस ताले की तरफ़ बढ़ाया।
घंटी की गरमाहट मेरी हथेली से बढ़कर मेरी बाँह तक चली गई।
और ताले के भीतर से वो हँसी फिर आई।
इस बार मुझे लगा कि वो हँसी मेरी अपनी आवाज़ में है। बस बहुत पुरानी। बहुत थकी हुई। जैसे किसी ने बहुत साल पहले मेरी आवाज़ चुरा ली हो और अब उसे मेरे सामने लौटा रहा हो।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
“पापा,” मैंने कहा, “ये ताले में कौन है?”
पापा की आँखों से आँसू गिरते रहे।
“मुझे नहीं पता, बेटा,” उन्होंने कहा। “पर मुझे लगता है कि ये वो आदमी है जिसने मुझे अपनी शक्ल दी थी। और जिसकी शक्ल मेरी है।”
वो हँसी फिर आई।
और घंटी मेरे हाथ में इतनी गरम हो गई कि मेरी उँगलियाँ खुल गईं। घंटी मेज़ पर गिरी। उसने एक हल्की आवाज़ की, जैसे किसी ने बहुत दूर से आह भरी हो।
फिर सब चुप हो गया।
ताले से पीली लकीर गायब हो गई।
हवा में फिर कपूर की गंध आई।
और मैदान में खड़े सैकड़ों लोगों के बीच, सिर्फ़ एक आवाज़ बची —
मेरे पापा की।
“मैं डरता हूँ, बेटा,” उन्होंने कहा। “पर अब अकेला नहीं।”
मैंने उनका हाथ फिर पकड़ लिया।
“नहीं, पापा,” मैंने कहा। “अब अकेला नहीं।”
और मैंने मेज़ पर पड़ी घंटी उठाई। वो फिर ठंडी थी। बिल्कुल ठंडी। जैसे उसने अभी-अभी कोई बहुत भारी बात सह ली हो।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
“कल दो बजे,” मैंने कहा। “रणवीर के दफ़्तार। और उससे पहले, वो खाली लाइन।”
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
“वो लाइन,” उन्होंने कहा।
“हाँ,” मैंने कहा। “जिस पर पहले मेरा नाम लिखा था। अब उस पर सच लिखा जाएगा।”
पापा ने धीरे से सिर हिलाया।
और मैदान में पहली बार ऐसा लगा कि सन्नाटा डर से नहीं, थोड़ी राहत से है।
पर मेरे अंदर एक सवाल अब भी काँटे की तरह धँसा था।
वो हँसी किसकी थी?
और वो मेरी आवाज़ में क्यों हँसी थी?
मैंने घंटी को अपनी जेब में रखा। उसकी सतह अब भी हल्की गरम थी।
मैंने मंसूर का टूटा ताला उठाया।
उसे अपनी हथेली पर रखा।
और मैंने धीमे से उससे कहा —
“तेरे अंदर जो भी है, सुन ले। कल मैं उसे ढूँढूँगा।”
ताला चुप रहा।
पर मेरी हथेली पर उसकी सतह एक बार फिर काँपी। जैसे किसी ने अंदर से हामी भरी हो।
और पीपल के नीचे जलते आख़िरी दीये की लौ ने एक बार झुककर फिर सीधा होना छोड़ दिया।
वो धीरे-धीरे बुझने लगी।
मैंने पापा का हाथ पकड़ा।
“चलो,” मैंने कहा। “घर चलें। कल बहुत काम है।”
पापा मेरे साथ चले।
और हमारे पीछे, मैदान में, ताले की गरमाहट अब भी हवा में तैर रही थी — जैसे कोई बहुत पुराना दरवाज़ा अभी बंद हुआ हो।
पर बंद होकर भी वो चुप नहीं था।
वो अंदर से हँस रहा था।
॥
ताले की हँसी रुकी नहीं।
वो मेरी ही आवाज़ में थी, पर उसमें एक पुरानी हवा भरी थी — जैसे कोई बहुत साल बंद कमरे का दरवाज़ा खोलकर बाहर निकले और पहली साँस में घर की गंध भर ले।
मैंने घंटी दोबारा हाथ में ली। वो फिर गरम हो गई। मेरी हथेली से वो गरमाहट कलाई तक गई और फिर बाँह तक।
और ताले के जोड़ से निकली पीली रोशनी पतली लकीर से फैलने लगी।
मैदान में सैकड़ों लोग खड़े थे। माँ, काजल, पापा, उस्ताद, मीरा, शबनम आपा, टिंकू — सब। पर मुझे उस वक़्त कोई नहीं दिखा।
मुझे सिर्फ़ एक छत दिखी।
पुरानी छत। आधी ईंट, आधी टीन। उस पर रस्सी बँधी थी और रस्सी पर कपड़े सूख रहे थे — सफ़ेद, नीला, लाल — हवा में पतंग की तरह।
और उस छत के नीचे, हमारी गली में, एक साइकिल थी।
लाल साइकिल। छोटी। हैंडल पर एक पीतल की घंटी, जिसकी चमक अभी गई नहीं थी।
उस पर एक बच्चा बैठा था। दुबला। घुटने पर फटी पैंट। बाल बेतराब। दोनों हाथ हैंडल पर ऐसे कसे हुए, जैसे किसी ने उसे ज़िंदगी से बाँध दिया हो।
मैं उसे पहचानता हूँ।
वो मैं हूँ।
आठ साल का। या सात का। जितना भी था।
पीछे एक आदमी खड़ा है, जो साइकिल की पिछली सीट पकड़े है। मैं उसकी कलाई देखता हूँ — मोटी, काम से काली, नाखूनों में ग्रीस।
पापा हैं। जवान पापा। दाढ़ी में सफ़ेद बाल अभी नहीं आए। कमर अभी सीधी है।
“चला, चला,” पापा कह रहे हैं। “पैडल दबा। देख मेरी तरफ़ मत, सामने देख।”
मैं पैडल दबाता हूँ। साइकिल एक हाथ आगे जाती है, फिर दूसरा, फिर तिरछी होने लगती है।
“पापा, पकड़े रहना!”
“पकड़ा है। दबा।”
मैं दबाता हूँ। साइकिल हवा में तैरने लगती है। गली की धूल मेरे पैरों के नीचे से उड़कर आगे जाती है। पीपल का पेड़ मेरी तरफ़ दौड़ता लगता है।
और तभी पापा कहते हैं — “अब तू खुद चला।”
मैं घबराकर पीछे देखता हूँ।
और देखता हूँ कि पापा दो कदम पीछे खड़े हैं। हाथ खाली। हवा में।
“पापा!”
साइकिल लड़खड़ाती है। हैंडल मेरे हाथ में मछली की तरह फिसलता है। सामने नाली का पत्थर का पुल आता है और मेरी आँखों के सामने धूल उलटी घूमती है।
धड़ाम।
मैं ज़मीन पर हूँ। साइकिल मेरे ऊपर नहीं, बगल में पड़ी है। उसका पहिया अभी भी धीरे-धीरे घूम रहा है — जैसे हँस रहा हो।
मेरे घुटने पर से खून की पतली लकीर आ रही है। धूल उस पर चिपक रही है।
और मैं रोने लगता हूँ।
ज़ोर से। बहुत ज़ोर से। नाक बहने लगती है, आवाज़ फटने लगती है, हाथ मुट्ठी बन जाते हैं। ऐसे रोना जैसे दुनिया का सबसे बड़ा नुक़सान हो गया हो।
और ऊपर, छत पर, माँ खड़ी हँस रही हैं।
“अरे!” वो पड़ोस की आंटी को दिखाकर कहती हैं। “देख, मेरा ये लड़का कभी रोता ही नहीं। आज इसे क्या हो गया?”
माँ के हाथ में गीला कपड़ा है। वो हँसते हुए भी कपड़ा निचोड़ रही है, और उनकी आँखें मेरे घुटने पर हैं — बस मुँह से कह रही हैं कि ये कुछ नहीं है, क्योंकि अगर उन्होंने डर दिखाया तो मैं और ज़ोर से रोऊँगा।
और मैं और ज़ोर से रोता हूँ।
पापा साइकिल उठाकर किनारे करते हैं। फिर मेरे पास आकर घुटनों के बल बैठ जाते हैं।
वो जल्दी में नहीं हैं। वो बहुत आराम से बैठते हैं, जैसे आज उनके पास पूरी दुनिया का वक़्त हो।
“देख,” वो कहते हैं और मेरा घुटना अपनी मुट्ठी से पोंछते हैं। “कुछ नहीं हुआ।”
“दर्द हो रहा है,” मैं नाक में बोलता हूँ।
“होना चाहिए,” पापा कहते हैं। “गिरेगा तो दर्द होगा।”
फिर वो रुकते हैं। और मेरी आँखों में देखते हैं।
“एक बात सुन,” वो कहते हैं। “अकेले उठना सीख। ये ज़रूरी है। जो आदमी गिरकर अकेले नहीं उठ सकता, वो आगे नहीं जाता।”
मैं सुबकता हूँ।
“पर,” पापा कहते हैं और मेरा हाथ अपनी हथेली में ले लेते हैं, “हाथ पकड़ना भी मत भूलना।”
“किसका हाथ?”
“किसी का भी,” पापा कहते हैं। “जो तेरे पास खड़ा हो। बाप का, माँ का, भाई का, दोस्त का। कोई न मिले तो गली में खड़े किसी आदमी का।”
वो मेरे घुटने पर अपना रूमाल बाँधते हैं।
“अकेले उठने वाला आदमी,” वो धीरे से कहते हैं, “कभी-कभी बहुत ऊँचा चला जाता है। पर वहाँ पहुँचकर उसे बताने वाला कोई नहीं होता कि मैं पहुँच गया।”
मैं सुबकते हुए सिर हिलाता हूँ।
और तभी माँ छत से चिल्लाती हैं — “खेलूराम की दुकान से एक और रूमाल ले आना! ये सब बर्बाद कर देगा।”
पापा हँसते हैं।
मैं भी हँसता हूँ। नाक बहती हुई, घुटना जलता हुआ, और मैं हँसता हूँ।
रोशनी धीमी होने लगी।
छत धुँधली हुई। कपड़े हवा में घूमकर गायब हो गए। पापा का जवान चेहरा धूल की तरह बिखर गया।
और मैं मैदान में लौट आया।
मेरे घुटने पर अब भी एक पुराना निशान है। मैंने उसे सालों से नहीं देखा था।
मेरी आँखें खुली थीं। मैदान में सन्नाटा था। सब मेरी तरफ़ देख रहे थे।
पापा मेरी बाँह पकड़े खड़े थे — बूढ़े पापा, झुकी कमर वाले, टेप से बँधे चश्मे वाले।
“अंकुश?” उन्होंने धीरे से कहा। “कहाँ गया था तू?”
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“पापा,” मैंने कहा, “आपने मुझे एक बात बचपन में बताई थी।”
“कौन सी?”
“अकेले उठना सीख। पर हाथ पकड़ना भी मत भूलना।”
पापा के चेहरे पर कुछ बदला। जैसे किसी ने उनके हाथ से एक बहुत पुरानी चीज़ वापस उनकी हथेली पर रख दी हो।
“तुझे याद है?” उन्होंने कहा।
“नहीं,” मैंने कहा। “मैं भूल गया था। बहुत साल भूला रहा।”
मैंने मैदान में चारों तरफ़ देखा — माँ, काजल, उस्ताद, मीरा, टिंकू, शबनम आपा, रज़िया, गोविंद भाई, बबलू — सब मेरी तरफ़ देख रहे थे।
“मैं सालों से यही कर रहा था,” मैंने कहा। “सब अकेले उठाने की ज़िद पर उतर आया था। घर, दुकान, माँ का इलाज, पापा का डर, गली का हिसाब। जैसे अगर मैंने किसी से हाथ माँगा, तो मेरी कोई चीज़ छिन जाएगी।”
माँ ने कुछ कहना चाहा, पर मैंने हाथ उठाकर रोका।
“अब नहीं,” मैंने कहा। “अब उठाना भी है, और हाथ भी पकड़ना है। दोनों।”
टिंकू ने पीछे से कहा, “उस्ताद, ये अच्छी बात बोली आपने।”
भीड़ में हल्की हँसी फैली — वो हँसी जो डर के बाद आती है, जब किसी को लगता है कि अब साँस लेना ठीक है।
उसी वक़्त मेरी हथेली में ताला ठंडा पड़ने लगा।
बहुत ठंडा। जैसे पानी में पड़ा पत्थर।
मैंने उसे देखा।
उसकी पीली लकीर धीमी होकर बुझ गई। और फिर ताला — जो बीस हाथों से भी नहीं खुलता उसकी कहानी थी — मेरी हथेली पर दो हिस्सों में अलग हो गया।
टूटकर नहीं। जुड़ाई पर से दो टुकड़े ऐसे अलग हुए, जैसे किसी ने बहुत आराम से दो पलकें खोली हों। ऊपर का हिस्सा, नीचे का हिस्सा।
दोनों के अंदर खोखलापन था। और उस खोखलेपन में — मैंने ध्यान से देखा — किसी भी तरफ़ कोई चीज़ नहीं थी। न काग़ज़, न पैसा, न कील।
सिर्फ़ खोखलापन।
और उस खोखलेपन की दीवार पर एक बहुत महीन-सी लकीर बनी थी, जो घंटी की जीभ के आकार की थी। बिल्कुल वैसी, जैसे किसी ने उँगली से पीतल में दबाकर छाप छोड़ी हो।
कपूर की गंध फिर आई। इस बार हल्की। इतनी हल्की कि लगा किसी ने बहुत दूर किसी कमरे में कपूर जलाया है।
“अरे,” उस्ताद ने मेरे कंधे के पास से कहा। “ये तो… ये तो खुला।”
“टूटा नहीं,” मैंने कहा। “खुला।”
“ताले की तीन शर्तें थीं,” उस्ताद ने कहा। “हर शर्त में एक हाथ। पर तीन हाथ लगने के बाद भी ताला बोलता था। बोलने के बाद खुलता है।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“आपने पहले क्यों नहीं बताया?”
“क्योंकि मुझे याद नहीं था,” उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ में कोई बहाना नहीं था, सिर्फ़ एक थकी हुई सच्चाई। “पचास साल में आदमी बहुत चीज़ें भूल जाता है। ताले ज़्यादा याद रखते हैं।”
मैंने ताले के दोनों हिस्से मेज़ पर रखे।
दोनों टुकड़ों ने मेज़ पर रखे जाते ही एक हल्की आवाज़ की — ‘टन’ और ‘टन’। जैसे दो घंटियाँ जिनकी आवाज़ कोई नहीं सुनता।
और उसी वक़्त दूर से एक आवाज़ आई।
एक चटक।
लंबी। मोटी। ऐसी, जैसे कोई बहुत पुरानी लकड़ी का चौखटा, जिसे बीस साल से कोई नहीं छू रहा, अचानक बीच से चटक जाए।
आवाज़ बिजलीघर की तरफ़ से आई।
पूरा मैदान एक साथ उस तरफ़ मुड़ा।
मीरा ने अपना कैमरा उठाया। “वहाँ कुछ हुआ है।”
“कुछ नहीं हुआ,” चंद्रेश सक्सेना ने धूल में बैठे-बैठे कहा, पर उनकी आवाज़ में वो मिठास अब नहीं थी। “रात है। कोई दरवाज़ा गिरा होगा।”
“सर,” मीरा ने कहा, “उस तरफ़ कोई दरवाज़ा नहीं है।”
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
“बिजलीघर,” उन्होंने कहा। “वो छह बक्से।”
मेरी जेब में घंटी एक बार फिर हिली। पर इस बार वो गरम नहीं हुई। बस एक बार हिली, जैसे कोई बूढ़ा आदमी सिर ऊपर उठाकर कहे — “आ गया।”
मैंने भीड़ में रणवीर को ढूँढा।
वो मेज़ से कुछ कदम दूर खड़ा था। उसकी जेब में हाथ था। उसका चेहरा वही शांत, वही विनम्र, पर कोई चीज़ गड़बड़ थी। वो अपने होंठ नहीं हिला रहा था, और जो आदमी सोच में डूबा हो, उसके होंठ नहीं हिलते।
फिर उसने अपनी जेब से हाथ निकाला।
और अपनी हथेली देखी।
मैं दूर था, पर मैंने देखा।
उसकी हथेली पर वो नीली लकीर थी, जो मेज़ पर पटके जाने के बाद उभरी थी। मोटी, ज़ख्म जैसी।
अब वो लकीर फीकी पड़ रही थी। ऐसे, जैसे किसी ने रात के रंग से उसे धीरे-धीरे पोंछना शुरू कर दिया हो। जहाँ सबसे मोटी थी, वहाँ से शुरू होकर। अब सिर्फ़ आधी बची थी — सीधी नहीं, टूटी हुई। जैसे किसी ने किसी का नाम काट दिया हो।
रणवीर ने अपनी हथेली पलटी। फिर दूसरी तरफ़ की।
फिर उसने अपना हाथ कुर्ते की आस्तीन से रगड़ा, धीरे-धीरे नहीं — ज़ोर से।
लकीर बदली नहीं।
वो आधी थी।
रणवीर ने सिर उठाकर मेरी तरफ़ देखा — और उसकी आँखों में वो चीज़ नहीं थी जो बाईस साल से थी। न हिसाब, न शरारत, न बड़प्पन।
डर थी।
सीधी, बच्चों जैसी डर, जो सर पकड़ लेती है।
और रणवीर भारद्वाज — जिसने अपनी ज़ुबान से लोगों की ज़मीनें हड़पी थीं, जिसने अपने ही डर से मिलने की हिम्मत नहीं की थी, जिसने बबलू के काँपते हाथ से अंगूठा लिया था — रणवीर भारद्वाज ने एक कदम पीछे हटते हुए कहा —
“ये नहीं हो सकता।”
उसकी आवाज़ सुनकर भीड़ में एक लहर दौड़ी।
“साहब को क्या हो गया?” सानिया की माँ ने कहा।
“साहब का हाथ देखो,” रफ़ीक़ बोला। “भाई, साहब का हाथ काला हो रहा है।”
“काला नहीं,” मीरा ने कैमरे के साथ आगे बढ़ते हुए कहा। “फीका हो रहा है।”
और जैसे ही मीरा का कैमरा आगे बढ़ा, भीड़ में एक और आवाज़ उठी — धीमी, काँपती, शक भरी — वही मोबाइल वाले हरी शर्ट के आदमी की।
“ये सब नाटक है,” उसने कहा। “साहब भी मिले हुए हैं।”
पर उसकी आवाज़ किसी ने नहीं उठाई।
क्योंकि उस वक़्त भीड़ में कुछ और हो रहा था।
लोग एक-दूसरे को देख रहे थे।
चुपचाप। बिना किसी सवाल के।
माँ ने काजल की तरफ़ देखा और काजल ने माँ की तरफ़। शबनम आपा ने रज़िया के कंधे पर हाथ रखा और रज़िया ने उनका हाथ पकड़ लिया। उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा और मैंने उनकी तरफ़। पापा ने मेरी बाँह पकड़ रखी थी, और अब उनकी पकड़ ढीली हो गई थी — जैसे किसी ने कहा हो, अब तू छोड़ भी सकता है, मैं गिरूँगा नहीं।
कोई नहीं बोला। पर मुझे साफ़ लगा कि भीड़ से एक बोझ उतरा है।
ऐसा बोझ, जो लोग सालों से उठाए हुए थे और उन्हें पता ही नहीं था कि वो उनके कंधों पर है। माँ का डर, पापा का डर, गोविंद भाई का काम, नसीमा बाई का तराज़ू, रमेश भाई की बाल्टी, शबनम आपा की चूल्हा, बच्चों का स्कूल — सब किसी एक लंबी रस्सी से बँधे थे, और उस रस्सी की गाँठ किसी के हाथ में थी।
अब वो गाँठ ढीली पड़ गई थी।
“उस्ताद,” मैंने धीरे से कहा। “बिजलीघर के बक्से। जबसे आपने छठे बक्से की बात बताई थी, वो अलग दिखता था।”
“हाँ,” उस्ताद ने कहा। “और अब वो चटक गया।”
“क्या मतलब?”
“मतलब,” उस्ताद ने कहा और उनकी आवाज़ बहुत धीमी हो गई, “कि जो बक्से में बंद था, वो बक्से से नहीं, अपने-आप से टूट रहा है।”
मैंने रणवीर की तरफ़ देखा।
वो अब भी अपनी हथेली देख रहा था। उसने अपना रूमाल निकाला — वही सफ़ेद, जिससे उसने सफ़ेद सीट पर काली बूँदें पोंछी थीं — और हथेली पर रगड़ा।
लकीर नहीं गई।
फिर उसने वो रूमाल जेब में डाला और पीछे मुड़कर अपने आदमियों की तरफ़ देखा।
पर उसके आदमी — जो अब तक उसके पीछे साये की तरह खड़े रहते थे — उस वक़्त एक कदम दूर खड़े थे।
मैंने देखा। ठीक से देखा।
और यही चीज़ थी जो रणवीर भारद्वाज को सबसे ज़्यादा डराती है — यह नहीं कि उसका हाथ जल रहा है, यह कि उसके पीछे खड़े आदमी अब उससे सटे नहीं हैं।
“रमेश,” रणवीर ने कहा। “गाड़ी लाओ।”
रमेश — वही ड्राइवर, जिसकी कलाई पर लाल धागा था — एक पल रुका, और फिर गाड़ी की तरफ़ चला।
पर वो रुका था।
एक पल।
और उस एक पल में मैंने रणवीर के चेहरे पर वो चीज़ देखी, जो मैंने बाईस साल के डर में पापा के चेहरे पर देखी थी — यह अहसास कि जिस चीज़ पर तुम सबसे ज़्यादा टिके थे, वो तुम्हें नहीं संभाल रही।
मैंने मेज़ पर पड़े ताले के दोनों हिस्सों को उठाया।
दोनों हल्के थे। इतने हल्के, जैसे अंदर से खाली कर दिए गए हों। मैंने उन्हें अपनी जेब के पास रखा — एक हिस्सा दाहिनी जेब में, दूसरा बाईं जेब में।
घंटी ने मेरी जेब के अंदर एक हल्की सी आवाज़ की। मैंने हाथ जेब पर रखकर महसूस किया — वो ठंडी थी, पर खाली नहीं। जैसे किसी चीज़ का इंतज़ार कर रही हो।
तभी टिंकू ने मेरी कमीज़ खींची।
“उस्ताद,” उसने फुसफुसाकर कहा, “वो बूढ़ा। वो लकड़ी के जूते वाला।”
मैंने उसकी आँखों की दिशा में देखा।
वो बूढ़ा मुँह से कुछ नहीं बोल रहा था। वो हाथ में एक पीली कॉपी पकड़े खड़ा था — वही कॉपी, जो सफ़ेद कुर्ते वाले अजनबी ने मैदान में दिखाई थी।
और वो बूढ़ा मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुरा रहा था।
धीरे-धीरे। बिना दाँत दिखाए।
ऐसी मुस्कान, जो किसी खुशी से नहीं आती — किसी चीज़ के पूरा होने से आती है।
मेरी जेब में घंटी हिली। और मुझे लगा जैसे किसी ने धीरे से कहा हो — “अब आगे।”
पर मैंने उसे अनसुना नहीं किया।
मैंने पापा का हाथ पकड़ा और भीड़ से कहा — “आज रात सब घर जाएँ। कल दो बजे से पहले सब कुछ तय होगा। और उससे पहले, वो खाली लाइन।”
माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
“बेटा,” उन्होंने कहा। “उस लाइन पर तेरा नाम लिखा जाएगा, तो काग़ज़ किसके नाम पर होगा?”
“किसी के नाम पर नहीं, माँ,” मैंने कहा। “जिस चीज़ पर सबका नाम हो, उस पर किसी एक का नाम नहीं होता।”
माँ ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने कुछ ऐसा कहा जो मैंने उनसे पहले कभी नहीं सुना था —
“तो कल लिखते वक़्त,” उन्होंने कहा, “मेरा नाम भी लिख लेना। मैं भी उस लाइन में शामिल हूँ।”
काजल ने माँ की तरफ़ देखा और उसकी आँखें भर आईं।
मैंने सिर हिलाया।
और फिर मैंने एक बार बिजलीघर की तरफ़ देखा — जहाँ से वो चटक आई थी — और सोचा, कल अगर मैं वहाँ गया, तो मुझे छह बक्सों के सामने सच बोलना पड़ेगा। बिना झूठ, बिना बहाने।
मेरी जेब में घंटी गरम नहीं हुई।
पर उसने मुझे रोका भी नहीं।
कभी-कभी चुप्पी भी हामी होती है।
॥
चुभन फिर आई।
वो ठंडी सुई जैसी चुभन — जो रीढ़ से शुरू होकर सीधे सिर तक जाती है। मैंने कंधे सिकोड़े। पापा का हाथ मेरे हाथ में था, और उनकी उँगलियाँ एक बार फिर काँपीं, फिर रुक गईं।
मैंने चारों तरफ़ देखा। मैदान में दीये अब भी जल रहे थे, पर उनकी लौएँ एक तरफ़ झुकी हुई थीं — जैसे हवा में किसी ने बहुत धीरे से साँस ली हो।
सामने, दस कदम दूर, वो बूढ़ा खड़ा था। लकड़ी के जूते। हाथ में पीली कॉपी। मुँह पर वही धीमी मुस्कान — न दाँत, न खुशी, बस किसी चीज़ के पूरा होने का इंतज़ार।
उसने कुछ नहीं कहा।
उसकी जगह हवा ने कहा।
“शबनम ने रज़िया को पंद्रह साल अपने घर में नौकर की तरह रखा।”
आवाज़ मैदान के बाएँ कोने से आई। फिर दाएँ से। फिर पीछे से। जैसे किसी ने एक ही बात को कई मुँहों से बोल दिया हो, और हर मुँह का अपना अलग स्वर हो।
“पंद्रह साल! और अब एक हरी चूड़ी में सब भूल गई?”
मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा।
वो मेज़ के पास खड़ी थीं। उनका मुँह एक पल के लिए सफ़ेद पड़ा। फिर उन्होंने अपनी गुमटी वाली आदत से हाथ कमर पर रखा — पर इस बार हाथ कमर तक पहुँचा ही नहीं। वो रुक गया।
रज़िया उनके बगल में थी। पतली, सिर पर पुरानी चादर, और कलाई पर वो हरी चूड़ी — जो दो टुकड़ों से आज ही पूरी हुई थी।
शबनम आपा ने रज़िया का हाथ पकड़ा। और मैदान के बीच में खड़ी हो गईं।
“हाँ,” उन्होंने कहा। “यह हुआ था।”
भीड़ में सन्नाटा।
“मैंने पंद्रह साल तक अपनी बहन को अपने ही घर में पराया रखा। मैंने उसको कसमों से बाँधा, बातों से बाँधा, और जब वो बाहर निकली तो मैंने कहा — जा, अब मत आना।”
उनकी आवाज़ थोड़ी काँपी, पर टूटी नहीं।
“हाँ, मैंने यह किया। और आज मैं इसका हिसाब देती हूँ। मुझे माफ़ी चाहिए — अपनी बहन से, और उस माँ से जिसके गेट पर मैंने दूध की कटोरी लौटाई थी।”
रज़िया ने धीरे से कहा, “आपा, मत…”
“नहीं,” शबनम आपा ने कहा। “सुनने वाले सुन रहे हैं। जो सच सबके सामने बोला जाता है, वही सच होता है। बाक़ी सब बहाना।”
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी। पर जैसे ही शबनम आपा ने आख़िरी शब्द कहा, उस पर एक हल्की गरमाहट आई — बहुत हल्की, बस इतनी कि मुझे यक़ीन हो जाए कि वो सुन रही है।
हवा में चुभन थोड़ी पतली हुई।
फिर वो फिर उठी।
“गोविंद ने शंकर यादव का अंगूठा क्यों लिया? किस हक़ से? चार हज़ार रुपये के लिए?”
यह आवाज़ पीछे से आई — वहाँ से जहाँ गोविंद भाई खड़े थे।
गोविंद भाई का चश्मा नाक पर फिसला हुआ था। उनके हाथ में वो पुरानी फाइल थी, जिसे उन्होंने मैदान में सबके सामने खोली थी। उनके हाथ काँप रहे थे — आदत से नहीं, डर से भी नहीं। किसी और चीज़ से।
उन्होंने फाइल बगल में दबाई और आगे आए।
“मैं उस रात वहाँ था,” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि आगे की पंक्ति वालों को सुनने के लिए झुकना पड़ा। “मैंने शंकर जी को कुर्सी पकड़कर खड़े देखा। उनके हाथ में कलम रखी थी, और कलम काँप रही थी। मैंने कहा था — शंकर जी, देर मत कीजिए।”
उन्होंने रुककर साँस ली।
“मैंने उनको जल्दी कराई। मैंने उनका हाथ पकड़कर नीचे नहीं दबाया, पर मेरी आवाज़ ने दबाया।”
भीड़ में कोई बोला, “तो फिर तुमने क्यों किया?”
गोविंद भाई ने सीधा उस आवाज़ की तरफ़ देखा — भले उन्हें चेहरा नहीं दिखा।
“क्योंकि मेरी बेटी का स्कूल का पैसा बाक़ी था,” उन्होंने कहा। “और मैंने सोचा — यह काम मेरा नहीं, मेरे ऊपर का है। मैंने भगवान को दोष देकर अपने हाथ धो लिए।”
फिर उन्होंने अपनी फाइल उठाई और ऊपर की तरफ़ दिखाई।
“मुझे माफ़ी मिली या नहीं, यह मुझे नहीं पता। पर मैं हिसाब चुकाऊँगा। एक-एक रुपया। और अगर रुपया नहीं बन पाया, तो मैं अपनी बेटी के पैरों में बैठकर कहूँगा कि तेरे पापा ने एक बार हाथ बेचा था, और वो अब वापस ले रहे हैं।”
उनकी आवाज़ आख़िर में टूट गई।
पापा ने मेरा हाथ दबाया और आगे बढ़े।
“गोविंद भाई,” उन्होंने कहा। “अंगूठा मैंने लगाया था। आपने सिर्फ़ मेरा हाथ पकड़ा था। हाथ मेरा था। बोझ भी मेरा।”
गोविंद भाई ने पापा की तरफ़ देखा और फिर धीरे से सिर झुका लिया।
चुभन थोड़ी और पतली हुई।
उसी वक़्त हवा ने फिर कहा —
“और हरिप्रसाद? पच्चीस साल चुप रहा। एक लड़के को झूठा इल्ज़ाम लगाया और मुँह नहीं खोला।”
मैंने हरिप्रसाद की तरफ़ देखा।
वो मेज़ के किनारे खड़ा था। उसकी जले हुए हाथ की आधी उँगली अब भी रजिस्टर के ऊपर रखी थी, जैसे उसने उससे हाथ नहीं उठाया हो।
वो सीधा खड़ा हुआ।
“हाँ,” उसने कहा। “मैं चुप रहा। पच्चीस साल। मैंने उस लड़के के बाप को रोते देखा और मैंने अपना मुँह नहीं खोला, क्योंकि मुझे डर था कि मेरी भी उँगली कटी है — और कटी उँगली वाले आदमी की बात कौन सुनता है?”
उसने अपनी आधी उँगली ऊपर उठाई।
“यह उँगली आज सबके सामने है। इसके बाद अगर मैंने किसी को चुप कराया, तो यह दूसरी उँगली भी मुझसे ज़्यादा ईमानदार होगी।”
भीड़ में कोई हँसा। पहले धीरे। फिर कुछ और लोग हँसे। गोविंद भाई ने भी होंठ काटकर हँसी रोकी।
और मैंने महसूस किया — चुभन शब्दों की नहीं रह गई थी। वो बस हवा में टिकी थी, और हर बार जब कोई खड़ा होकर कहता था “हाँ, यह हुआ था”, वो एक परत और पतली हो जाती थी।
उस्ताद ने मेरी तरफ़ मुड़कर धीरे से कहा, “बेटा, यह बातें वही उछाल रहा है जो सच हैं। इसलिए इनका डर अलग है।”
“कैसा डर, उस्ताद?”
“झूठ का डर होता है कि पकड़ा जाएगा। सच का डर यह होता है कि सबके सामने कह दिया जाएगा, और फिर तुम वही रह जाओगे — कुछ भी नहीं।”
मैंने सिर हिलाया।
“तो phrasing,” मैंने कहा, “कुछ नहीं से बेहतर है।”
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराए — वैसी मुस्कान, जो सत्तर साल की है और जिसमें शब्द कम, टाँका ज़्यादा है।
हवा ने फिर आवाज़ उठाई।
“उस्ताद ने अपने भाई इलियास को पचास साल खोया। कोई पूछे — क्यों? किसने कहा था उसको कि भाई ने काग़ज़ बदला?”
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। फिर भीड़ की तरफ़।
“मैंने नहीं पूछा,” उन्होंने कहा, और उनका मुँह सख़्त था। “मैंने सुना और मान लिया। मैंने अपने भाई से एक बार भी नहीं कहा कि इलियास, तू बता, तूने क्या किया। मैंने दुकान बंद कर ली, और उस कमरे के पीछे अपना ही ताला लगा दिया।”
उन्होंने मशीन की तरफ़ देखा — जो मैदान में लाई गई थी, सफ़ेद कपड़े से ढकी, पर जिससे आज कोई चीज़ बनवानी नहीं थी।
“पचास साल में मैंने एक चीज़ सीखी,” उन्होंने कहा। “पहली सिलाई अच्छी होती है, दूसरी टेढ़ी, तीसरी और टेढ़ी। पर टाँका लगता रहता है। मैंने पचास साल टाँका नहीं लगाया। यही मेरा पाप है।”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
“और यह पाप सिर्फ़ मेरा है। इलियास का नहीं।”
भीड़ में कोई बोला, “तो अब क्या?”
“अब?” उस्ताद ने कहा। “अब मैं अपने भाई से पहली बात पूछूँगा। जब मिलेगा।”
और मैंने देखा — उनकी आवाज़ में वो पहली बार कुछ ऐसा था, जो बच्चों के सामने कही गई बात जैसा लगा — कमज़ोर और सच्चा, एक साथ।
चुभन उतनी ही पतली हो गई।
कपूर की महक आने लगी। धीमे से। जैसे कोई पुराने संदूक से कपड़े निकाल रहा हो।
फिर हवा ने कहा —
“मीरा ने रमा मैडम के घर को तोड़ा।”
मीरा मेरे पास खड़ी थी। उसका कैमरा उतार दिया गया था, और वो दोनों हाथों में उसे सीने से लगाए थी, जैसे लड़की गुड़िया लगाती है।
वो आगे आई।
“हाँ,” उसने कहा। “मैंने तोड़ा।”
उसने मुँह से एक लंबी साँस निकाली।
“मैं पाँच साल पहले एक खबर लेकर आई थी। आधी बात थी। मैंने छाप दी। उसके बाद रमा मैडम के घर में जो हुआ, वो किसी को नहीं बताना चाहिए।”
वो रुकी।
“पर मैं बताती हूँ। उसका घर टूटा। उसकी बेटी ने स्कूल बदला। और उसका पति चुपचाप चला गया, और वो सिर्फ़ इसलिए गया कि मैंने उसकी पत्नी का नाम अख़बार में छाप दिया था।”
भीड़ में कोई बोला, “तो अब यह सब खोलकर क्या होगा?”
मीरा ने उसकी तरफ़ देखा।
“कुछ नहीं,” उसने कहा। “कुछ नहीं होगा। काग़ज़ वापस नहीं आएगा। बेटी का स्कूल वापस नहीं आएगा। पर मैं अब अपने आप को माफ़ी देने की जगह… माफ़ी की माँग करना सीख रही हूँ।”
उसने माइक उठाया, जो अब भी मेज़ पर पड़ा था।
“यह चालू है। जो भी सुन रहा है, सुन ले — मैं अपनी ग़लती कबूल करती हूँ।”
फिर उसने माइक नीचे रख दिया।
मैंने अपनी जेब में घंटी महसूस की। वो गरम हो रही थी, धीरे-धीरे, जैसे किसी ने उसे अंगारे पर रख दिया हो।
फिर हवा ने फिर कहा —
“और रणवीर? उसने अपनी माँ की आख़िरी बात छिपाई।”
रणवीर उस वक़्त भी मैदान में था। उसका चेहरा पसीने से भीगा था, और उसकी हथेली पर वो नीली लकीर अब आधी और फीकी थी। उसके आदमी अब भी उससे दूर खड़े थे।
वो नहीं बोला।
हवा ने फिर वही बात दोहराई, इस बार ज़्यादा तेज़ आवाज़ में।
फिर वो उसकी तरफ़ मुड़ी — जैसे कोई बच्चा गुस्से में अपने सबसे पुराने दोस्त का नाम चिल्लाता है।
“बोल, रणवीर। बोल न।”
रणवीर ने एक हाथ उठाया — जैसे हवा को रोकना चाहता हो — पर हाथ काँप रहा था।
“मैंने क्या छिपाया?” उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठास नहीं थी, जो अब तक उसकी ढाल रही थी।
हवा ने कहा, “तेरी माँ ने आख़िरी बार क्या कहा था?”
रणवीर रुका।
एक पल। दो पल।
फिर बबलू — जो अब तक चुप खड़ा था — उसने धीरे से कहा, “साहब… बोल दीजिए। यहाँ सब अपनी बात बोल रहे हैं।”
रणवीर ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ ऐसा था, जो मुझे पहले नहीं दिखा था — गुस्सा नहीं, थकान।
“मेरी माँ ने कहा था,” रणवीर ने कहा, “कि जब तू बड़ा हो जाए, तो मुझे मत भूलना।”
वो रुका।
“और मैंने उसे भुला दिया। मैंने याद रखा उसका कर्ज़, उसका मकान, उसकी बात। पर उसे नहीं याद रखा।”
उसने अपना रूमाल निकाला। वही सफ़ेद।
“मैंने सोचा था — बड़ा आदमी बनूँगा, तो माँ को सब कुछ दे दूँगा। पर बड़ा आदमी बनने के बाद मैंने उसे याद नहीं किया। मैंने सिर्फ़ याद रखा कि मैंने क्या-क्या खोया।”
भीड़ में कोई हँसा — वो हँसी नहीं थी, खाँसी जैसी थी जो गले में अटक जाए।
“हाँ,” रणवीर ने कहा, और उसकी आवाज़ अब बैठ गई थी। “यह हुआ था। और मैं अभी भी माफ़ी नहीं माँग रहा — क्योंकि माँ मर चुकी है, और मरे हुए से माफ़ी नहीं माँगी जाती। मैं सिर्फ़ यह कह रहा हूँ कि जो किया, वो मैंने किया। किसी और ने नहीं।”
चुभन उस पल और पतली हो गई।
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली। वो गरम थी — बर्फ़ जैसी नहीं, चूल्हे से उतरी कड़ाही जैसी। मैंने उसे हथेली पर रखा और उसने एक बार हल्की सी आवाज़ दी, बिना बजे।
जैसे कह रही हो — अब देख।
हवा ने आख़िरी बार आवाज़ उठाई। पर इस बार वो पहले जैसी नहीं थी। इसमें दम नहीं था। जैसे कोई बूढ़ा, जो सारी कहानियाँ सुना चुका हो, आख़िरी कहानी सुनाते-सुनाते थक गया हो।
“शबनम आपा ने रज़िया को पंद्रह साल बेकार में नीचा दिखाया…”
शबनम आपा ने कहा, “हाँ, दिखाया। और आज से नहीं।”
“गोविंद ने शंकर का अंगूठा लिया…”
गोविंद भाई ने कहा, “हाँ, लिया। और अब हिसाब दूँगा।”
“हरिप्रसाद चुप रहा…”
हरिप्रसाद ने कहा, “हाँ, रहा। और अब नहीं रहेगा।”
“उस्ताद मुँह नहीं खोला…”
उस्ताद ने कहा, “नहीं खोला। और अब खोलेगा।”
“मीरा…”
“हाँ,” मीरा ने कहा।
“रमा मैडम…”
रमा मैडम, जो अब तक मेज़ के पास बैठी थीं, वो उठीं — धीरे, लाठी के सहारे — और बोलीं, “पाँच साल मैंने माफ़ी से मुँह छिपाया। मुझे माफ़ी चाहिए या नहीं — यह अब मेरे हाथ में नहीं। पर मैं कहती हूँ — यह हुआ था। और मैंने माफ़ किया।”
फिर वो मीरा की तरफ़ मुड़ीं।
“मीरा,” उन्होंने कहा, “मैंने तुझे पाँच साल पहले माफ़ कर दिया था। मुझे पता नहीं था कि तू अब तक खुद को माफ़ नहीं कर पाई।”
मीरा की आँखें भर आईं।
“मैडम…”
“चुप,” रमा मैडम ने कहा। “चुप रहना तो पाँच साल तक सीख लिया। अब बोलना सीख।”
मैदान में पहली बार कुछ ऐसा हुआ जो घंटी से नहीं, किसी इंसान से आया। शबनम आपा ने रज़िया का हाथ और ज़ोर से पकड़ा। गोविंद भाई ने अपना चश्मा ठीक किया। काजल ने माँ की तरफ़ देखा, और माँ ने धीरे से उसका हाथ थपथपाया।
और तभी मैंने वो देखा।
थी — नहीं थी। जा रही थी।
हवा में जो चुभन अब तक रीढ़ में सुई की तरह टिकी थी, वो अब धीरे-धीरे खिंच रही थी — जैसे कोई तार हो, जिसे कोई पीछे खींच रहा हो। मैंने अपना कंधा झटका। सिर फिर भी भारी था। पर सुई नहीं थी।
कपूर की महक तेज़ हो गई।
लोगों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।
“कपूर?” किसी ने कहा।
“कपूर जैसी महक,” किसी और ने कहा।
“नहीं, यह… यह तो वैसी ही महक है जैसी हमारे बाबा के संदूक में थी।”
मैंने पापा की तरफ़ देखा। उन्होंने धीरे से सिर हिलाया।
“कपूर,” उन्होंने कहा। “पुराने कपड़ों में रखते थे।”
मैंने एक लंबी साँस ली।
और तभी पीछे से — बिजलीघर की तरफ़ से — एक लंबी चटक आई।
पहली चटक के बाद जो दूसरी आई थी, वो लकड़ी की चौखट जैसी थी।
यह तीसरी थी।
और इस बार आवाज़ के साथ एक झटका भी आया — ज़मीन के नीचे से, पैरों के तलवों तक।
भीड़ में कुछ लोग झुक गए। दीये हिले। दो बुझ गए।
और रणवीर — रणवीर ने अपने सीने पर हाथ रखा और झुक गया।
उसकी साँस फूली हुई थी। उसने एक घुटने पर हाथ टिकाया।
मैं दौड़कर उसके पास गया — नहीं, मुझे नहीं पता क्यों। मेरे पैरों ने खुद चले। पापा मेरे पीछे आए।
“रणवीर,” मैंने कहा। “साँस लो। धीरे।”
उसने अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था। नहीं, पसीना था। दोनों एक जैसे लगते हैं — पर आज वो पसीना था।
“मुझे कुछ नहीं हुआ,” उसने कहा। “बस… सीने में जैसे कुछ बैठ गया।”
“तो बैठा रहने दो,” पापा ने कहा, और उनकी आवाज़ सख़्त थी।
रणवीर ने उनकी तरफ़ देखा।
कुछ नहीं बोला।
और मैंने अपनी जेब में घंटी को गरम होते महसूस किया — इतनी गरम कि मुझे हाथ जलने का डर हुआ। मैंने घंटी बाहर निकाली।
वो मेरी हथेली पर चमक रही थी — नीली नहीं, पीली, धीमी, जैसे दूध में हल्दी घोली हो।
और उसने एक बार बजा।
एक बार।
पर उसकी आवाज़ में जो भराव था, वो पहले कभी नहीं सुना था — जैसे पीतल ने पूरा एक साँस लेकर बजा हो, आधा नहीं।
“अब जो बचा है, वो तेरे हाथ में है,” घंटी ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहले जैसी रूखी-रूखी लय नहीं थी। थोड़ी नरम थी। थोड़ी — कैसे कहूँ — भरी हुई।
मैंने घंटी को हथेली में बंद कर लिया।
और फिर वो हुआ।
रणवीर की जेब से कुछ गिरा। धातु की आवाज़ नहीं आई। काग़ज़ की भी नहीं।
एक टूटा हुआ काला टुकड़ा ज़मीन पर पड़ा — छोटा, अधजला, जैसे कोई पुरानी किताब का कोना हो, या किसी ताले की जली हुई पीठ।
मैंने उसे उठाना चाहा।
मेरे हाथ ने छुआ।
और वो राख बन गया।
पूरा नहीं — बस उतना, जितना छूआ। फिर हवा ने उसे उड़ा दिया — धूल की तरह, आटे की तरह, किसी पुरानी स्मृति की तरह।
रणवीर ने अपनी जेब की तरफ़ देखा।
उसका चेहरा एक पल के लिए ऐसा हुआ, जैसे किसी ने उसके हाथ से चाबी निकाल ली हो।
“क्या था वो?” मैंने पूछा।
वो नहीं बोला।
उसने अपनी हथेली देखी। नीली लकीर… लकीर तो अब भी थी, पर बहुत फीकी। जैसे पेंसिल से खींची गई रेखा, जिसे कोई रबर से मिटा रहा हो।
और मैदान की हवा साफ़ हो गई।
सच में साफ़।
वो चुभन — पूरी तरह गई।
लोगों ने साँस ली। किसी ने ज़ोर से। किसी ने धीमे। एक बच्चा रो पड़ा, और उसकी माँ ने उसे सीने से लगाया।
बूढ़ा — वो लकड़ी के जूतों वाला बूढ़ा — अब भी वहीं खड़ा था।
उसने अपनी पीली कॉपी धीरे से बंद की।
फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।
न मुस्कुराया, न सिर हिलाया। बस देखा।
और फिर वो मुड़कर चल दिया — बिना आवाज़, बिना जल्दी, जैसे कोई पुराना कर्ज़दार अपना हिसाब रखकर जा रहा हो।
मैंने उसे रोकना चाहा। पैर उठे। पर उस्ताद ने मेरा कंधा पकड़ लिया।
“मत जा,” उन्होंने कहा। “अभी नहीं।”
“कौन है वो, उस्ताद?”
“जो है, वो कल खुद बताएगा,” उन्होंने कहा। “आज रात तेरे पास और काम हैं।”
उन्होंने मेरी जेब की तरफ़ देखा — जहाँ मंसूर के ताले के दोनों हिस्से थे।
“और उससे पहले,” उन्होंने कहा, “उस खाली लाइन को भरना है।”
मैंने सिर हिलाया।
मैंने एक बार पूरे मैदान को देखा।
माँ काजल के सहारे खड़ी थी, और उनके हाथ में वो पुरानी पीली कॉपी थी — माँ की हिसाब की कॉपी — जिसे उन्होंने आज किसी से नहीं छीनवाया।
पापा मेरे बगल में खड़े थे, और उनका हाथ मेरे कंधे पर था।
शबनम आपा और रज़िया एक साथ खड़ी थीं — दोनों की कलाइयों पर हरी चूड़ी, और दोनों की आँखों में वही पानी, जो सुलह का होता है।
गोविंद भाई अपनी फाइल सीने से लगाए खड़े थे।
हरिप्रसाद अपनी आधी उँगली आसमान की तरफ़ उठाए हुए खड़ा था — जैसे किसी को सलाम कर रहा हो।
मीरा कैमरा उठा रही थी — पर इस बार उसने प्रसारण नहीं चालू किया। उसने बस उसे सीने से लगाया।
उस्ताद अपनी सिलाई मशीन के पास खड़े थे और उनकी उँगली सफ़ेद कपड़े पर थी, जिसे उन्होंने आज ही ढका था।
टिंकू मेरी कमीज़ पकड़े खड़ा था, और उसकी आँखों में वो सवाल था, जो तेरह साल की उम्र में सबसे ज़्यादा होता है — अब क्या?
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और मंसूर के ताले का दाहिना हिस्सा निकाला।
वो ठंडा था।
मैंने उसे वापस रखा।
फिर मैंने भीड़ की तरफ़ देखा और कहा —
“आज रात सब घर जाएँ। कल दो बजे से पहले हम उस लाइन पर नाम लिखेंगे। और उससे पहले…”
मैं रुका।
“उससे पहले, उस पुराने बिजलीघर में जाकर छह बक्सों से बात करनी है।”
भीड़ में कोई बोला, “अकेले?”
मैंने कहा, “नहीं। पूरी गली के साथ।”
और मैंने अपनी जेब में घंटी को एक बार फिर महसूस किया।
वो गरम नहीं थी।
पर खाली भी नहीं थी।
जैसे किसी ने उसमें एक छोटी सी साँस भर दी हो, और कह दिया हो — अब चल।
मैंने पापा का हाथ और ज़ोर से पकड़ा।
और हम मैदान से बाहर निकले।
॥
हम मैदान की आख़िरी सीढ़ी तक पहुँचे ही थे कि पीछे से आवाज़ आई।
पहले किसी के जूते की चरमराहट। फिर कंधों के टकराने की आवाज़। फिर वो आवाज़, जो मैंने बाईस साल में कभी इतनी जल्दबाज़ नहीं सुनी थी।
“रास्ता छोड़ो।”
रणवीर की आवाज़ थी।
मैं पलटा।
वो भीड़ को चीरकर पीछे की तरफ़ जाने की कोशिश कर रहा था। उसके दोनों आदमी उसके आगे-पीछे थे, पर भीड़ ऐसी नहीं थी जो रास्ता दे दे। आज भीड़ किसी की नहीं थी। आज भीड़ अपनी थी।
उसकी नीली शर्ट की आस्तीन चढ़ी हुई थी। सफ़ेद पैंट पर धूल थी। जूतों की चमक पूरी तरह खत्म हो चुकी थी और यही सबसे बड़ी बात थी — रणवीर भारद्वाज के जूते पहली बार गली की धूल में रंग गए थे।
पापा ने मेरा कंधा छोड़ा और मेरे आगे आ गए।
“पापा, नहीं…”
“रुक,” पापा ने कहा। बस इतना। एक शब्द।
और मैं रुक गया। क्योंकि आज पापा की आवाज़ में वो चीज़ थी जो बाईस साल से नहीं थी — वक़्त।
तभी सामने से हरिप्रसाद आगे आए।
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
उन्होंने बस अपना हाथ उठाया — वही हाथ, जिसकी एक उँगली आधी थी। उसी आधी उँगली को उन्होंने सीधा रणवीर के सामने कर दिया।
और रणवीर के पैर जैसे ज़मीन से चिपक गए।
“ये उँगली तेरे बाप की नहीं है, रणवीर,” हरिप्रसाद ने कहा। आवाज़ धीमी थी, बिल्कुल धीमी, पर मैदान के आख़िरी कोने तक पहुँची। “ये उस रात की है जब तूने कहा था कि हरिया चाचा, तुम आराम करो, मैं सब सँभाल लूँगा।”
रणवीर ने कुछ कहना चाहा।
हरिप्रसाद ने उँगली आगे बढ़ा दी — बस आधा इंच। और रणवीर चुप हो गया।
“बोलने की जगह नहीं है अब,” हरिप्रसाद ने कहा। “आज काग़ज़ बोलेंगे।”
उसी वक़्त गोविंद भाई आगे आए।
उनके हाथ काँप रहे थे — वो हाथ जो आज तक सिर्फ़ अंगूठे दबाने के लिए उठे थे। पर इस बार वो काँपते हुए भी फैले हुए थे। दोनों हाथ फैलाकर उन्होंने रास्ता रोक लिया।
“बस,” गोविंद भाई ने कहा। उनकी आवाज़ टूट रही थी, पर रुकी नहीं। “बाईस साल में मैंने आपके लिए बहुत काग़ज़ लिखे। अब एक बार मेरी लिखी बात सुन लीजिए। आज आप नहीं जाएँगे।”
रणवीर की आँखें छोटी हुईं।
“गोविंद,” उसने कहा। बस नाम। वैसे ही, जैसे किसी पुराने औज़ार को पुकारते हैं।
“गोविंद भाई,” गोविंद भाई ने कहा। “आज से।”
और भीड़ में से किसी ने ताली बजाई।
फिर सबसे आगे बबलू आया।
वो अपनी नकली सोने की चेन हाथ में लिए था — वही टूटी चेन, जिसे उसने आज सबके सामने तोड़ा था। उसने चेन को जेब में ठूँसा और रणवीर के सामने खड़ा हो गया।
“साहब,” उसने कहा। “मैं सालों आपके पीछे चला। आप कहते थे, बबलू, तू मेरा हाथ है। आज मैं अपना हाथ बन गया।”
रಣವीर ने उसे देखा।
उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहली बार देखी — हैरानी। असली हैरानी। वो हैरानी जो किसी किताबी काग़ज़ से नहीं आती, किसी इंसान से आती है।
“बबलू,” रणवीर ने धीमे कहा। “तेरे बच्चे हैं।”
“हैं,” बबलू ने कहा। “और आज पहली बार मुझे अपने बच्चों के सामने शर्म नहीं आ रही।”
तभी मेरे बगल में एक छोटी सी आवाज़ आई।
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मैंने पलटकर देखा।
मीरा ने अपना कैमरा फिर से उठा लिया था। लाल बत्ती जल रही थी। उसने कैमरा सीने से लगाया था, अब कंधे पर रखा था — और उसकी नज़र सिर्फ़ एक इंसान पर थी।
“मैंने कहा था, आज पूरा सच,” मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं था। बस एक फ़ैसला था। “मेरा दाग़ आज खुल गया। अब आपका नंबर है।”
रणवीर ने कैमरे की तरफ़ देखा।
वो पहले भी कई बार कैमरे में देख चुका था — टीवी पर, अख़बार में, मंच पर। पर आज पहली बार उसने कैमरे से आँख नहीं मिलाई। उसने आँख फेर ली।
यही सबसे बड़ी हार थी उसकी।
उसी वक़्त शालिनी आगे आईं।
वो पीली फाइल सीने से लगाए खड़ी थीं — वही फाइल, जिसे उन्होंने रात भर सँभाला था, जिसे उन्होंने थाने भी पहुँचाया था, जिसके लिए उन्होंने अपने पापा के प्रेस की नींव तक खोद डाली थी।
वो मेज़ के पास गईं।
वो लंबी मेज़, जिस पर सैकड़ों काग़ज़ रखे थे, जिसके सबसे ऊपर शंकरलाल यादव का नाम था।
शालिनी ने फाइल खोली और मेज़ पर रख दी।
और फिर वो चीज़ हुई जो मैं कभी नहीं भूलूँगा।
भीड़ में से एक आदमी आया। बूढ़ा था, झुका हुआ, हाथ में एक पुरानी कॉपी। उसने मेज़ से एक काग़ज़ उठाया, उसे अपनी आँखों के सामने लाया, फिर भीड़ की तरफ़ उठाकर कहा —
“यह मेरा है।”
भीड़ खामोश हुई।
“और मैंने यह नहीं बेचा,” उसने कहा।
फिर दूसरा आदमी आया। फिर तीसरा। फिर एक औरत। फिर एक लड़का, जिसकी उम्र शायद सोलह की थी और जिसके हाथ में अपने बाप की पगड़ी थी।
एक-एक करके लोग मेज़ के पास आने लगे और हर काग़ज़ के पीछे एक इंसान खड़ा हो गया।
“यह मेरी दुकान है। मैंने नहीं बेची।”
“यह मेरा प्लॉट है। मेरे बाप का था।”
“यह मेरे नाम की रसीद है, और मैंने कभी अंगूठा नहीं लगाया।”
“यह मेरे बेटे के नाम की ज़मीन है।”
“यह मेरी माँ के इलाज का काग़ज़ है, और उसमें मेरी मर्ज़ी नहीं पूछी गई।”
मैंने यह सब सुना और मेरे भीतर कुछ अनजाना सा बैठ गया।
मैंने घंटी के बिना भी जान लिया — आज जो जोड़ा जा रहा है, वो किसी ताले से नहीं, खुद लोगों से जुड़ रहा है।
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
पापा की आँखों में पानी था। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस एक हाथ मेरे सिर पर रखा।
“बेटा,” उन्होंने कहा। “आज तेरे पास जो है, वो मेरे पास नहीं था।”
“क्या, पापा?”
“लोग,” उन्होंने कहा। “खड़े होने के लिए जगह।”
उसी वक़्त आसमान में एक लंबी सीटी बजी।
दुबे अंकल।
वो अपनी कुर्सी से उठे थे — वो पुरानी लकड़ी की कुर्सी, जिसे उन्होंने आज स्कूल के गेट से मैदान तक उठवाया था — और उनके मुँह में सीटी थी।
वो सीटी जो पच्चीस साल की गश्त में बजती थी। वो सीटी, जिसे सुनकर चोर भागते थे। वो सीटी, जो आज किसी चोर के लिए नहीं, किसी ठेकेदार के लिए बज रही थी।
और फिर मैदान के मुँह पर पीली रोशनी फैल गई।
थाने की गाड़ी आ रही थी। उसकी लाइट इस तरह घूम रही थी कि पूरा मैदान एक पल में पीला, दूसरे पल में अंधेरा हो जाता था।
गाड़ी से दरोगा उतरे — वही दरोगा, जिसने मेरी दुकान पर पीला नोटिस चिपकाया था, जिसने कहा था कि उसे सिर्फ़ मुहर पूछने का हक़ है।
पर इस बार वो अकेले नहीं थे।
उनके पीछे दो और आदमी थे। और उनके पीछे एक और गाड़ी थी — सफ़ेद, बिना किसी निशान के। उसमें से कोई नहीं उतरा।
दरोगा ने मेज़ को देखा।
फिर काग़ज़ों के पीछे खड़े लोगों को देखा।
फिर शालिनी की फाइल को देखा।
फिर रणवीर को।
और उन्होंने माथा पोंछा।
“सबूत?” उन्होंने धीमे पूछा — किसी से नहीं, जैसे खुद से।
शालिनी ने फाइल आगे बढ़ा दी।
“यह लीजिए,” उन्होंने कहा। “अंदर पूरा हिसाब है, असली काग़ज़, खाता, और भवानी प्रसाद का बयान।”
“भवानी प्रसाद?” दरोगा ने हैरानी से पूछा। “वो तीस साल से भारद्वाज का हिसाब रखता है…”
“रखता था,” शालिनी ने कहा। “आज से नहीं।”
दरोगा ने फाइल खोली।
पन्ने पलटे।
और भीड़ सन्न थी।
फिर दरोगा ने सिर हिलाया — बस एक बार, धीमे से।
वो मुड़े और उन्होंने रणवीर की तरफ़ देखा।
“भारद्वाज साहब,” उन्होंने कहा। “दफ़्तार चलिए।”
रणवीर हँसा।
एक छोटी सी हँसी — वो हँसी जो आदमी तब हँसता है जब उसके पास और कुछ न बचे और वो सबके सामने याद दिलाना चाहे कि वो भी कभी हँसा करता था।
“दरोगा जी,” उसने कहा। “आप यह काग़ज़ अपने बेटे के स्कूल की फ़ीस से लेकर आए हैं या दिल्ली से?”
“साहब,” दरोगा ने कहा। आवाज़ बिल्कुल सपाट। “मेरी नौकरी, मेरे बिस्तर और मेरे तकिये के नीचे वाली पिस्तौल — तीनों सरकार की हैं। आपकी नहीं।”
किसी ने मैदान में इस तरह जवाब नहीं सुना था।
मैंने दुबे अंकल की तरफ़ देखा। वो अपनी कुर्सी पर बैठे थे, और उनकी आँखें रणवीर पर थीं — पच्चीस साल पुरानी गश्त जैसी आँखें।
तभी डॉक्टर इसरानी आगे आए।
अपनी पुरानी छड़ी टिकाकर, अपना टेप बँधा चश्मा सीधा करके, और उसी धीमी चाल से जो उन्होंने साठ साल के ओपीडी में सीखी थी।
वो मेज़ तक आए।
उन्होंने एक काग़ज़ उठाया — वही पुराना शर्तनामा, सात अंगूठों वाला, या उसकी नकल — और उसे रणवीर के सामने रख दिया।
“यह अस्पताल की ज़मीन है,” उन्होंने कहा। आवाज़ धीमी थी, पर मैदान में हर बच्चे ने सुनी। “इस पर शर्त है। यह ज़मीन न तो बिक सकती है, न बंधक रखी जा सकती है। और आज मैं यह सबके सामने कहता हूँ…”
उन्होंने रुककर भीड़ की तरफ़ देखा।
“…इस अस्पताल की ज़मीन पर कोई नई इमारत नहीं बनेगी। न आज, न कल। और जब तक मेरे हाथ में स्टेथोस्कोप है, जब तक गली में एक भी मरीज़ साँस ले रहा है, एक भी ऐसा काग़ज़ इस दीवार पर नहीं टँगेगा जिसमें अंगूठा माँगा जाए।”
भीड़ में किसी ने रो दिया।
और मैंने माँ की तरफ़ देखा।
माँ काजल के सहारे खड़ी थीं। उनके हाथ में वो पुरानी पीली कॉपी थी। उन्होंने धीरे से अपना सिर काजल के कंधे पर रख दिया।
बस इतना।
न कोई भाषण। न कोई नारा। बस एक बीमार माँ, जिसने अपने बेटे की जीत देखी, और उस बीमारी के बोझ से जो उसके कंधों पर थी, एक पल के लिए सिर झुका दिया।
काजल ने अपनी बाँह माँ की कमर पर कस दी।
और मैंने अपना मुँह दूसरी तरफ़ कर लिया, क्योंकि मैं रो रहा था और मुझे यह किसी को नहीं दिखाना था।
टिंकू ने मेरी कमीज़ खींची।
“उस्ताद,” उसने धीमे कहा। “आप रो रहे हैं।”
“नहीं,” मैंने कहा। “धूल गई है आँख में।”
“आपकी आँखें सूखी हैं।”
“तो तू इतना मत देख।”
उसने मुस्कुराकर आँखें नीची कर लीं।
तभी मैंने चंद्रेश को देखा।
वो उस सफ़ेद गाड़ी से उतरा था — वो गाड़ी जिसमें कोई नहीं था — और इस तरह आ रहा था जैसे उसे कोई हवा चला रही हो। सफ़ेद कुर्ता। मुस्कान। फाइल। और वो आवाज़ जो हर आदमी को बेटा कहती थी।
“दरोगा जी,” उसने कहा। “कोई जल्दबाज़ी नहीं। मैं वकील हूँ, मैं अपने…”
“चंद्रेश सक्सेना,” दुबे अंकल ने कहा। उन्होंने कुर्सी से उठे बिना कहा। “आपका नाम भी उस फाइल में है।”
चंद्रेश की मुस्कान एक पल के लिए रुकी।
फिर वो फिर मुस्कुराया — पर वो पहली मुस्कान नहीं थी।
“मेरा नाम हर जगह है, अंकल जी,” उसने कहा। “मैं वकील हूँ।”
“तो अब अदालत में होगा,” दुबे अंकल ने कहा। “वहीं तय कीजिए।”
और उन्होंने हाथ हिलाया — बस एक बार, दो सिपाहियों के लिए।
शालिनी ने फाइल दरोगा को सौंप दी और पीछे हट गईं।
गोविंद भाई ने अपना बैग खोलकर सारी रसीदें मेज़ पर रख दीं — हिसाब की वो सारी पुरानी पर्चियाँ, जिन्हें वो बाईस साल से अपने बटुए में छिपाए घूम रहे थे।
“यह सब मेरा है,” गोविंद भाई ने कहा। “मैंने यह लिखा। मैंने गवाही दी। और आज मैं इन सबके सामने कहता हूँ — जो मैंने किया, गलत किया।”
उनके हाथ अब भी काँप रहे थे, पर अब वो काँपते हुए भी सीधे थे।
दरोगा ने रणवीर की तरफ़ हाथ बढ़ाया।
“चलिए।”
रणवीर ने एक पल मेरी तरफ़ देखा।
और फिर उसने वो किया जो मुझे उम्मीद नहीं थी।
उसने मुस्कुराया।
आख़िरी बार।
पूरी मुस्कान — वो मुस्कान जो उसने त्योहारों पर बाँटी थी, कंबल बाँटते वक़्त बाँटी थी, टीवी पर बाँटी थी। वो वाली मुस्कान, जिससे पूरी गली कभी पीछे हट जाती थी।
मैंने साँस रोक ली।
और पूरे मैदान ने कुछ नहीं किया।
कोई पीछे नहीं हटा।
सानिया अपनी माँ के साथ खड़ी रही। गुड्डू ने अपना बल्ला कस लिया। रफ़ीक़ ने अपना टूटा चश्मा सीधा किया। चिंटू ने अपनी चप्पल पहन ली।
बूढ़े काका, जो किराने की दुकान चलाते थे, अपनी लाठी पर झुके खड़े रहे और कुछ नहीं बोले।
नसीमा बाई ने अपना दुपट्टा सीधा किया।
भोला भाई ने अपनी दुकान का रेडियो बंद कर दिया।
और उस मुस्कान का कोई असर नहीं हुआ।
रणवीर की मुस्कान धीरे-धीरे पिघल गई। जैसे कोई लिखाई पानी में गिर जाए। उसने आख़िरी बार आँखें ऊपर उठाईं — पीपल की तरफ़, मैदान की तरफ़, छतों की तरफ़, जहाँ से लोग झाँक रहे थे।
फिर वो चुपचाप गाड़ी की तरफ़ चला।
चंद्रेश उसके पीछे-पीछे।
दरवाज़ा खुला। दोनों बैठे।
दरोगा ने आख़िरी बार मेरी तरफ़ देखा।
“अंकुश यादव,” उन्होंने कहा। “कल दो बजे से पहले अपनी दुकान का लाइसेंस और काग़ज़ दफ़्तार लाइए। साफ़-सुथरा।”
मैंने सिर हिलाया।
“दरोगा जी,” मैंने कहा, “एक बात पूछूँ?”
“पूछो।”
“आप आज यहाँ अकेले क्यों आए?”
वो हँसे — पहली बार। पूरे पच्चीस साल की गश्त की थकान के बाद, पहली बार।
“अकेले नहीं आया,” उन्होंने कहा। “पूरी गली के साथ आया हूँ। बस गाड़ी में बैठा हूँ।”
और वो गाड़ी में बैठ गए।
गाड़ी की पीली लाइट एक बार और मैदान पर घूमी, फिर धीमे-धीमे दूर जाने लगी।
मैं vahीं खड़ा रह गया।
देखता रहा।
देखता रहा।
जब तक गाड़ी गली के मोड़ पर मुड़कर गायब नहीं हो गई, तब तक मैंने साँस नहीं ली।
फिर मैंने पलटकर पूरा मैदान देखा।
धीरे-धीरे लोग जाने लगे थे।
पहले बुज़ुर्ग उठे — धीमे, एक-दूसरे का हाथ पकड़कर, कुछ बोले बिना। वही बुज़ुर्ग जो पीपल की चबूतरी पर सालों से एक-दूसरे से नहीं बोले थे और आज शाम एक साथ बैठे थे, जैसे कुछ नहीं हुआ हो।
फिर औरतें उठीं। माँ की तरफ़ देखकर, सिर हिलाकर, चुपचाप।
फिर बच्चे — और बच्चे ही वो लोग थे जो इस पूरी शाम को सबसे तेज़ी से समझ रहे थे। सानिया अपनी माँ के हाथ में हाथ डाले जा रही थी। गुड्डू अपना बल्ला कंधे पर रखे जा रहा था। रफ़ीक़ अपना टूटा चश्मा जेब में डाल रहा था। चिंटू अपनी चप्पल ठीक कर रहा था।
टिंकू मेरे पास आया।
“उस्ताद,” उसने कहा। “कल दो बजे से पहले… मतलब आज रात?”
“हाँ,” मैंने कहा। “आज रात।”
“और बिजलीघर?”
“वहाँ भी आज रात।”
उसने सिर हिलाया। फिर उसने कुछ सोचा और कहा — “पूरी गली के साथ?”
“पूरी गली के साथ।”
“तो मैं सबको बता दूँ?”
“बता दे,” मैंने कहा। “पर सच बताना। डर मत फैलाना।”
उसने मुस्कुराकर कहा, “मैं जासूस हूँ, उस्ताद। मैं डर नहीं फैलाता, मैं खबर फैलाता हूँ।”
और वो दौड़कर चला गया।
मैं माँ के पास गया।
काजल ने मुझे देखा और अपना सहारा छोड़कर एक कदम पीछे हट गई, ताकि मैं माँ के सामने खड़ा हो सकूँ।
“माँ,” मैंने कहा।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चमक नहीं थी जो लोग जीत के बाद दिखाते हैं। एक और चीज़ थी — थकान का एक अलग रूप। जैसे किसी ने आख़िरकार कह दिया हो कि जिस चीज़ से वो बाईस साल डरती थी, वो सामने आ गई, और अब जाने का वक़्त है।
“अंकुश,” उन्होंने कहा। “आज रात तू बिजलीघर जाएगा?”
“हाँ।”
“और उससे पहले?”
“काग़ज़ पर नाम लिखूँगा। पापा के साथ।”
उन्होंने पीली कॉपी अपने सीने से लगा ली।
“इसमें मेरा नाम भी है,” उन्होंने कहा। “देख लेना। मेरा नाम नीचे है — पूरे हिसाब के सबसे नीचे। और जब तू उस खाली लाइन पर लिखे, तो मेरा नाम भी ऊपर कर देना।”
“माँ…”
“मैंने बाईस साल चुप रहकर बहुत कुछ छिपाया,” उन्होंने कहा। “अब नहीं छिपाऊँगी।”
काजल ने मेरी तरफ़ देखा।
“मैं माँ को घर ले जा रही हूँ,” उसने कहा। “डॉक्टर इसरानी ने आज रात आराम बोला है। तू जब लौटे, तो सीधे ताले के पास आना।”
“काजल…”
“क्या?”
“आज तूने बहुत कुछ सँभाला है।”
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो पानी था जो उसने आज कई बार रोका था।
“मैं तेरी बहन हूँ,” उसने कहा। “यह मेरा काम है।”
और मैंने उसका सिर चूम लिया।
माँ को काजल के साथ जाते देखकर मेरे भीतर कुछ ढीला हुआ — कुछ वो, जिसे मैंने बहुत मज़बूती से बाँधा हुआ था। डर। डर कि माँ नहीं रहेगी। डर कि मैं पापा को नहीं बचा पाऊँगा। डर कि मैं अकेला रह जाऊँगा।
वो डर आज पूरी तरह नहीं गया। पर वो हिला ज़रूर। और हिलना ही काफ़ी था।
उस्ताद मेरे पास आए।
“कल के लिए,” उन्होंने कहा।
“क्या?”
“दो बजे। दफ़्तार।”
“मैं जाऊँ?”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने अपनी सिलाई की मशीन पर हाथ रखा — वही मशीन, जिसे उन्होंने आज ढका था, और आज शाम फिर से खोला था।
“जाएगा,” उन्होंने कहा। “पर पहले, मेरे साथ कहीं चल।”
“कहाँ?”
“पुराने बाज़ार में। नीम वाली गली में। चूल्हे वाले घर में।”
“रणवीर ने कहा था कि कोई वहाँ न जाए…”
“रणवीर गया,” उस्ताद ने कहा। “और आँगन में उसका ताला पड़ा है। अब मेरी बारी है।”
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
पापा ने सिर हिलाया।
“आज रात,” वो बोले। “कोई घर नहीं सोएगा।”
मैंने सिर हिलाया।
तभी अंधेरे में एक और आवाज़ आई।
“अंकुश भाई।”
रमेश भाई थे। वो डरते हुए आ रहे थे, जैसे हर कदम पर माफ़ी माँग रहे हों।
“कहिए, रमेश भाई।”
“वो नल वाली बात…” उन्होंने घुटने टेकने की कोशिश की।
मैंने उन्हें रोका।
“रमेश भाई,” मैंने कहा। “नल जोड़ने के लिए दो इंसान चाहिए। आप हैं, मैं हूँ। बस इतना काफ़ी है।”
वो खड़े रह गए। उनके होंठ काँपे। फिर उन्होंने कुछ नहीं कहा — बस हाथ जोड़ा और चले गए।
भोला भाई अपनी दुकान की तरफ़ जा रहे थे। उन्होंने मुड़कर कहा — “अंकुश, कल सुबह मैं अपने बेटे को तेरे पास भेजूँगा। सीखेगा।”
“क्यों?”
“क्योंकि यहाँ कुछ सीखने को है,” उन्होंने कहा।
और उनका रेडियो फिर बजने लगा — भोला भाई की दुकान का रेडियो, जिसे उन्होंने आज शाम किसी और गाने पर चला छोड़ा।
नसीमा बाई आँचल से आँसू पोंछ रही थीं। उनके बेटे साजिद ने मेरी तरफ़ देखा और फिर अपना सिर झुका दिया।
हरिप्रसाद बमुश्किल चल पा रहे थे। उनके बेटे ने उनका हाथ पकड़ा। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और अपनी आधी उँगली फिर ऊपर उठाई — इस बार आसमान की तरफ़ नहीं, मेरी तरफ़।
“सीख ले,” उन्होंने कहा। “उँगली नहीं रहती। नाम रहता है।”
और वो चले गए।
शबनम आपा और रज़िया मेरे पास आईं।
“अंकुश,” शबनम आपा ने कहा। “कल पूरी गली की चाय मेरी।”
“आपका चूल्हा बंद था।”
“आज रात फिर जल गया,” उन्होंने कहा। “चूल्हे ऐसे ही तो चलते हैं। एक दिन बंद, दूसरे दिन ज़िंदा।”
रज़िया ने अपनी कलाई दिखाई। हरी चूड़ी चमक रही थी।
“यह पंद्रह साल बाद मिली है,” उन्होंने कहा। “पहले पंद्रह साल की चूड़ी मुझे याद थी, अब ये मिल गई।”
मैंने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया।
फिर मैंने मीरा को देखा।
वो कैमरा उतार रही थी। धीरे से।
मैं उसके पास गया।
“कैसे रहे?” मैंने पूछा।
“पूरा आया,” उसने कहा। “एक भी फ्रेम नहीं छूटा।”
“तुमने मुझे आज एक बात कही थी, दोपहर को।”
उसने मेरी तरफ़ देखा।
“मैंने कहा था कि मैं अब आख़िरी बार अपने कैमरे से किसी को नहीं बचाऊँगी,” उसने कहा। “और आज मैंने पहली बार अपने कैमरे से सच बचाया।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
वो भी कुछ नहीं बोली।
हम दोनों एक पल वहीं खड़े रहे, मैदान के बीच, बुझते हुए दीयों के बीच, और उसी पल मुझे लगा कि मीरा तिवारी से कहीं ज़्यादा अच्छी दोस्त मुझे कभी नहीं मिलेगी।
पापा मेरे बगल में आए।
उनके हाथ में वो पुराना पीला फूला लिफ़ाफ़ा था।
“यह कल दो बजे से पहले खुलेगा,” उन्होंने कहा।
“कहाँ, पापा?”
उन्होंने मेज़ की तरफ़ देखा — उस लंबी मेज़ की तरफ़, जिस पर अब भी सैकड़ों काग़ज़ रखे थे, और जिनके पीछे कोई नहीं खड़ा था।
“यहीं,” उन्होंने कहा। “इसी मेज़ पर। उसी खाली लाइन के साथ।”
इतने में बबलू ने अपना स्कूटर स्टार्ट किया — पर फिर बंद कर दिया।
वो मैदान के बीच अकेला खड़ा था। स्कूटर के साथ। और उसकी आँखों में वो सवाल था जो उसने आज कई बार पूछा था पर मुझे कभी नहीं पूछा।
मैं उसके पास गया।
“कुछ पूछना है?”
“अंकुश,” उसने कहा। “मेरी बेटी की शादी है अगले साल।”
“मैं जानता हूँ।”
“लोग आएँगे?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“बबलू भाई,” मैंने कहा, “आज आपने जो किया, उसके बाद गली में कोई नहीं कहेगा कि आप कभी साहब के आदमी थे।”
उसकी आँखें भर आईं।
“साले,” उसने कहा, “तू मुझे रुलाने की कोशिश कर रहा है।”
और मैं हँस पड़ा। वो भी हँसा। पहली बार वो हँसा — बिना पान, बिना चेन, बिना डर।
फिर वो स्कूटर पर बैठा और चला गया।
मैं पलटकर मैदान को आख़िरी बार देखने लगा।
अब मैदान खाली था। दीये बुझ रहे थे — कुछ बुझ चुके थे, कुछ की लौ अभी टिमटिमा रही थी। पीपल के पत्तों में हवा थी, जिसकी आवाज़ किसी पुराने आदमी की साँस जैसी थी।
और वो लंबी मेज़ अब भी वहाँ खड़ी थी — खाली, पर हवा में हिलते काग़ज़ों के साथ।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।
ताले के दोनों हिस्से अभी भी वहीं थे। और घंटी भी — जो अब गरम नहीं थी, पर खाली भी नहीं थी।
टिंकू दौड़कर लौटा।
“उस्ताद!”
“क्या हुआ?”
“सबको बता दिया। भोला भाई, नसीमा आपा, किशनलाल काका, रमेश भाई, सानिया की अम्मी, गुड्डू के पापा…” उसने साँस लेने के लिए रुका, “…और वो तीन बुज़ुर्ग भी जो आज सुबह पीपल पर बैठे थे।”
मैं एक पल रुक गया।
“कौन तीन बुज़ुर्ग?”
“जो सुबह आए थे। जो कुछ नहीं बोले। जिन्होंने भूरा लिफ़ाफ़ा छोड़ा था।”
मेरी रीढ़ में एक ठंडी लकीर उतरी।
उन तीन बुज़ुर्गों का ज़िक्र कहानी में कई बार आया था, पर वो कोई नहीं थे जिन्हें मैं जानता था। और अब टिंकू कह रहा था कि वो आज रात भी मैदान में थे — शायद आख़िरी तक।
मैंने इधर-उधर देखा, पर वो कहीं नहीं दिखे।
“उनका क्या नाम था, टिंकू?”
“पता नहीं,” उसने कहा। “बस इतना कहा कि वो बिजलीघर आएँगे।”
मेरे भीतर कुछ हिला।
फिर मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ देख रहे थे, और उनके चेहरे पर एक अजीब-सी शांति थी।
“उस्ताद,” मैंने कहा।
“पता है,” उन्होंने कहा। “मैंने उन्हें देखा था।”
“कौन हैं?”
“जब वक़्त आएगा, खुद बता देंगे। आज रात बिजलीघर आएँगे — यही काफ़ी है।”
मैंने सिर हिलाया।
फिर मैंने एक बार घड़ी की तरफ़ देखा — पर घड़ी नहीं थी। मेरे पास घड़ी नहीं थी। पर मुझे लगा कि रात अब गहरी हो रही है।
“पापा,” मैंने कहा।
“हाँ?”
“आप घर जाइए। माँ के पास।”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा — कोई सवाल नहीं, कोई हिचक नहीं। बस एक बात।
“तू अकेला नहीं जाएगा।”
“अकेला नहीं हूँ, पापा। पूरी गली है।”
उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “बाईस साल पहले मैंने एक काग़ज़ पर अंगूठा लगाया था, क्योंकि मैं डरा हुआ था। आज मैं तेरे साथ बिजलीघर नहीं आ पाऊँगा, क्योंकि मैं वहाँ जाकर उस रात को फिर जीने से डरता हूँ। पर अगर कभी वहाँ किसी को मेरी ज़रूरत हो, तो पहली बार मैं डरकर भी पहुँचूँगा।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
बस उनका हाथ पकड़ा और माथे पर रख लिया।
फिर वो चले गए।
उस्ताद मेरे बगल में खड़े थे।
“अब?” मैंने पूछा।
“अब,” उन्होंने कहा, “हम तीन चीज़ों से शुरुआत करेंगे। पहली — मंसूर चाचा का दूसरा ताला। दूसरी — तेरी खाली लाइन। तीसरी — उन छह बक्सों से बात।”
“क्रम?”
उन्होंने अपनी उँगली उठाई — वही मोटी, कामकाजी उँगली, जिस पर पेंसिल का निशान हमेशा रहता था।
“क्रम में नहीं,” उन्होंने कहा। “ोयुक्त बात नहीं है। आज रात यह तीनों साथ चलेंगी।”
मैं हँसा।
“उस्ताद, यह आपको कब से आता है?”
“अब से,” उन्होंने कहा।
चलते-चलते मैंने एक बार अपनी जेब से घंटी निकाली।
अंधेरे में वो मटमैली दिख रही थी — वही पुरानी पीतल, वही फूल का निशान, वही निशान जो मुझे दादा की याद दिलाता था।
मैंने उसे हल्का हिलाया।
वो ठंडी थी।
पर अंदर से एक बहुत छोटी सी आवाज़ आई — जैसे किसी ने नींद में कुछ कहा हो और फिर खुद चौंककर चुप हो गया हो।
मैंने उसे कान से लगाया।
कुछ नहीं।
मैंने हिलाया फिर।
कुछ नहीं।
तो फिर मैंने उसे जेब में रख दिया और चल दिया।
रात की हवा में गली धीरे-धीरे सो रही थी।
पर मुझे पता था — यह नींद कुछ समय की थी।
क्योंकि तभी, चलते-चलते, बिल्कुल अचानक, मेरी जेब में घंटी बजी।
एक बार।
छोटी सी।
और बहुत धीमे से घंटी ने कहा —
"एक और बाकी है।"
मैं ठिठक गया।
“क्या?” मैंने धीमे पूछा।
वो फिर चुप।
“कौन सा?”
वो फिर चुप।
“उस्ताद,” मैंने कहा, “घंटी कुछ कह रही है।”
उन्होंने चलते-चलते मेरी तरफ़ देखा।
“क्या?”
“एक और बाकी है।”
उनके कदम रुक गए।
उन्होंने मेरी जेब की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। फिर ऊपर आसमान की तरफ़।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “सुन ले। आज जो हुआ, वो सिर्फ़ शुरुआत है।”
“किसकी?”
“जो जोड़ता है, उसकी,” उन्होंने कहा। “और उससे पहले… जो अभी तक टूटा हुआ है।”
मैंने अपनी जेब में घंटी को फिर महसूस किया।
वो फिर से ठंडी हो चुकी थी।
पर भीतर — कहीं गहरे में — मुझे लगा कि उसने एक और साँस भर ली है। और अब उस साँस में एक नाम है। एक आदमी का नाम, जिसका चेहरा मैं अभी नहीं जानता।
मैंने उस्ताद का हाथ पकड़ा और हम नीम वाली गली की तरफ़ बढ़ गए।
और पीछे, मैदान में, आख़िरी दीया भी बुझ गया।
॥
नीम वाली गली का मोड़ आते-आते रात और गहरी हो गई थी।
उस्ताद के कदम भारी थे, पर चलने की रफ़्तार अचानक कम नहीं हुई थी। कदम धीमे नहीं, चुप हो गए थे।
गली में एक भी बत्ती नहीं जल रही थी। दोनों तरफ़ के मकानों की खिड़कियाँ बंद थीं, दरवाज़ों पर ताले लगे थे। कोई किसी दहलीज़ से झाँक नहीं रहा था।
“उस्ताद,” मैंने धीरे कहा, “यहाँ तो कोई भी नहीं दिख रहा।”
“कोई देखना नहीं है,” उन्होंने कहा। “नीला दरवाज़ा देखना है।”
पर नीले दरवाज़े तक पहुँचने से पहले ही उन्होंने मेरा हाथ रोक लिया।
“अंकुश।”
“हाँ?”
“सुन।”
मैंने सुना।
कुछ नहीं।
“कुछ नहीं है, उस्ताद।”
“बिल्कुल कुछ नहीं है, बेटा,” उन्होंने कहा। “यही तो सबसे बड़ी बात है। इस गली में आज भी सब कुछ बंद है। सब सोए हैं। पर रणवीर का घर आज बंद नहीं है। उसकी गाड़ी मैदान से निकलते वक़्त भी मोड़ पर आकर रुकी थी।”
“क्यों रुकी?”
“सोचने के लिए,” उन्होंने कहा। “उसने कुछ सोचा। और जो आदमी रात में सोचता है, वो सुबह कोई बड़ी चीज़ करता है।”
मैंने घंटी जेब में महसूस की।
“उस्ताद,” मैंने कहा, “अगर इस घर में अभी वो दूसरा ताला है, तो आज रात खोल लें। किसी भी तरह।”
उन्होंने सिर हिलाया। फिर मेरी तरफ़ देखा — ऐसा, जैसे कोई पुराना रास्ता याद कर रहे हों।
“नहीं,” उन्होंने कहा। “आज रात हम इस दरवाज़े को नहीं छुएँगे। जो ताला रणवीर ने मैदान में खड़े होकर छोड़ा था, वो दरवाज़ा मेरे बिना नहीं खुलेगा। और जो दरवाज़ा खुलेगा, उसके पीछे जो है — वो मेरे भाई का सच है। इसे मैं अंधेरे में नहीं, सबके सामने खोलूँगा।”
“पर आपने ही कहा था — तीन काम।”
“तीन काम में से एक काम रात का था,” उन्होंने कहा। “वो रात हमने जी लिया। बाकी दो सुबह के हैं।”
मैं चुप हो गया।
फिर मैंने पूछा, “घंटी ने कहा — एक और बाकी है। किसकी बात है, उस्ताद?”
उन्होंने बिल्कुल हल्की आवाज़ में कहा, “अगर मुझे सही याद है, तो तेरे पास, मेरे पास नहीं।”
हम लौट पड़े।
लौटते वक़्त मैंने पीछे देखा।
नीम वाली गली एक खुले मुँह जैसी खड़ी थी, और उसके भीतर कुछ नहीं था।
पर वो मुँह खुला था — बंद नहीं।
बस खुला।
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साइकिल गली में पहुँचे तो रात के दो बज चुके थे।
और गली सोई नहीं थी।
नहीं सोई थी — पूरी गली जाग रही थी।
पीपल के नीचे दीये बुझ चुके थे, पर उसके आस-पास के दरवाज़ों से पीली रोशनी आ रही थी। किसी ने खिड़की खोली थी, किसी ने दहलीज़ पर पानी की बाल्टी रख छोड़ी थी — जैसे अभी सफ़ाई के बाद किसी ने सब बाहर डाल दिया हो।
शबनम आपा की गुमटी के बाहर बेंच भरी पड़ी थी।
कोई खड़ा था, कोई बैठा था, कोई चाय के प्याले हाथ में लिए चुपचाप उन लोगों को देख रहा था जो अभी भी मैदान से लौट रहे थे।
शबनम आपा की आवाज़ आ रही थी — “अरे, वो कटोरी नहीं, वो थाली है। बोलो किसको चाहिए? सात प्याले और, रज़िया आटे वाला डिब्बा ला।”
ज़्यादा समोसे थे। कम प्याले।
अब प्याले भी ख़त्म होने लगे थे।
चिंटू दौड़कर आया — “शबनम आपा, अब तो प्याला नहीं बचा।”
“तो कटोरी में दे दूँगी। कटोरी भी तो भगवान का बर्तन है,” शबनम आपा ने कहा। “रज़िया, कटोरी निकाल।”
“दीदी, मैंने तो पहले ही कह दिया था — सात प्याले कम हैं।”
“तेरे सात के सात बरस बाद, आज तू फिर साथ खड़ी है,” शबनम आपा ने कहा, और रज़िया की आँख भर आई — पर वो हँसी भी।
गुमटी में भीड़ बढ़ रही थी।
मैंने दूर से देखा — गोविंद भाई बेंच के एक कोने पर बैठे थे। उनके हाथ में एक प्याला था।
मैं रुक गया।
क्योंकि गोविंद भाई अपना प्याला पकड़े हुए थे — अपने ही हाथ से।
और उनका हाथ नहीं काँप रहा था।
मैं उनके पास गया।
“गोविंद भाई।”
उन्होंने ऊपर देखा। उनके चश्मे पर अब भी टेप बँधा था, पर टेप हिल नहीं रहा था।
“अंकुश बेटा,” उन्होंने कहा। “बैठ।”
“आपका हाथ —”
“मैं जानता हूँ,” उन्होंने कहा। “आज तीन लोगों ने मुझसे यही कहा। शालिनी बेटी ने भी। मीरा बेटी ने भी। अब मैं खुद देख रहा हूँ। पच्चीस साल में पहली बार।”
“क्या हुआ इसमें?”
“कुछ नहीं हुआ,” उन्होंने कहा। “बस आज मैंने अपना नाम अपने मुँह से बोला। मेरा नाम गोविंद है। गोविंद भाई। मैंने नाम किसी काग़ज़ पर नहीं लिखा, मैंने बोला था। और जब इंसान अपना नाम खुद बोलता है, तो हाथ नहीं काँपता।”
वो मुस्कुराए।
“पर वो मुश्किल था, बेटा। पच्चीस साल बाद। मुझे लगा था, बोलते वक़्त मेरी आवाज़ रुक जाएगी। पर नहीं रुकी। पता है क्या — आवाज़ पहले बोलती है, डर बाद में आता है।”
“और अब?”
“अब डर आया है,” उन्होंने कहा। “पर आवाज़ अंदर है। डर बाहर है। अब डर बाहर रहेगा।”
उन्होंने चाय का घूँट भरा।
“अंकुश,” उन्होंने धीरे कहा, “एक बात कहूँ?”
“कहिए।”
“जो काग़ज़ मैंने तेरे पापा का लिया था — वो आज पूरी गली ने देखा। पर जो सबसे ज़्यादा नहीं देखा गया — वो यह है कि मेरे पास भी एक काग़ज़ था। मेरे ही नाम का।”
मैं रुक गया।
“क्या?”
“मैंने कभी किसी को नहीं बताया। मेरा भी एक काग़ज़ था — बीस साल पहले। मेरी दुकान का। मैंने भी अपना अंगूठा लगा दिया था।”
“गोविंद भाई —”
“नहीं, सुन,” उन्होंने कहा। “पच्चीस साल से मैं तेरे पापा की तरफ़ देखता था और सोचता था — कमज़ोर आदमी। आज पता चला, मैं उनसे कमज़ोर था। मैंने सिर्फ़ अंगूठा नहीं लगाया था, बेटा। मैंने अपनी दुकान का हिसाब भी लिखा था — झूठ का हिसाब।”
मैं उनके सामने बैठ गया।
“अब?”
“अब जो भी है,” उन्होंने कहा, “सच्चा है। मेरी दुकान चली गई, मेरी बही सही सलामत है।”
उन्होंने प्याला मेज़ पर रखा।
और उस वक़्त, मैंने देखा — उनका हाथ काँपा।
नहीं। काँपा नहीं।
उसे — इतना हल्का हिला, जितना किसी हाथ को नहीं हिलना चाहिए था।
पर मैंने देखा — वो हाथ प्याले पर टिका हुआ था, जैसे किसी ने उसे प्याले से बाँध दिया हो।
और मैं मुस्कुरा दिया।
“अपना हाथ क्यों नहीं पकड़ रहे, गोविंद भाई?” मैंने पूछा।
“क्योंकि अब इसे मेरी ज़रूरत नहीं,” उन्होंने कहा।
उस रात, गोविंद भाई ने पहली बार अपना प्याला ख़ुद उठाया, ख़ुद मुँह तक ले गए, और ख़ुद पिया — बिना किसी का सहारा।
और शबनम आपा गुमटी से बाहर निकलीं, उनके पास आईं, और उन्होंने उनके कंधे पर हाथ रखा।
कोई कुछ नहीं बोला।
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बच्चों की टोली एक कोने में बैठी थी।
टिंकू के पास एक पुरानी कॉपी थी, और वो उसमें कुछ ऐसा लिख रहा था जैसे कोई बड़ा मुँह लगा लिखता है — पूरा ध्यान, पूरी तल्लीनता।
सानिया बीच-बीच में झाँकती और टोकती।
“अरे, वो नहीं — पहले मैदान का पहला सच लिख।”
“पहला सच?” रफ़ीक़ ने कहा। “पहला सच यही था कि हमारे पापा ने सबके सामने माफ़ी माँगी।”
“नहीं!” चिंटू बोला। “पहला सच तो यह था कि शबनम आपा ने रज़िया आपा को पूरी चूड़ी पहनाई।”
“वो सच नहीं, खुशी है,” टिंकू ने कहा।
“खुशी भी सच होती है,” सानिया ने कहा।
“हाँ, पर काग़ज़ में पहले वो लिखते हैं जिससे कोई डरता है,” टिंकू ने कहा। “और हमें यह लिखना है कि हमें किस चीज़ से डर लगा।”
गुड्डू ने धीरे कहा, “मुझे तो तब डर लगा जब चुभन आई थी।”
“तो वही पहले लिख,” टिंकू ने कहा। “यह रिपोर्ट है — जासूसी रिपोर्ट। इसमें पहले डर, फिर सच, फिर नाम।”
उसने पहली लाइन लिखी —
“रात आठ बजे — सुई जैसी चुभन। सबने कान पकड़े। एक दीया बुझा।”
फिर दूसरी —
“रात आठ बजकर पंद्रह मिनट — गोविंद भाई ने सबके सामने अपना नाम बोला। पहली बार नाम सुना। गोविंद भाई का हाथ नहीं काँपा।”
तीसरी —
“रात नौ बजे — हरिप्रसाद ने अपनी आधी उँगली मेज़ पर रखी। कोई हँसा नहीं।”
चौथी —
“रात साढ़े नौ — माँ बोली, चौदह हज़ार दो सौ रुपये चुकाएँगी, पर ईमान नहीं।”
और पाँचवीं —
“सबसे बड़ा सच — हमारे पापा ने भी सबके सामने माफ़ी माँगी।”
टिंकू ने कलम रोकी।
“यह अच्छा है,” उसने कहा। “पर इसमें एक सच और जोड़ना है।”
“कौन सा?” सानिया ने पूछा।
“यह — कि हम भी वहाँ थे।”
“क्यों?”
“क्योंकि हमें भी याद रखना है,” उसने कहा। “बड़े लोग भूल जाते हैं। बच्चे नहीं भूलते।”
उसने आख़िरी लाइन लिखी —
“जासूस — टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू। यह रिपोर्ट रखी जाएगी। जब बड़े भूलें, हम याद दिलाएँगे।”
सानिया ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“टिंकू,” उसने धीरे कहा, “तू अच्छा जासूस है।”
“गिलहरी कह,” टिंकू ने कहा।
सब हँस पड़े।
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उसी वक़्त शबनम आपा ने गुमटी से आवाज़ लगाई, “चिंटू! इधर आ। तूने समोसे गिने थे?”
“हाँ, आपा। चालीस।”
“अब गिन।”
उन्होंने थाली आगे बढ़ाई।
चिंटू ने गिना — “एक, दो, तीन, चार…”
वो रुका।
“आपा, सोलह।”
“अरे, चालीस में से सोलह? चौबीस कहाँ गए?”
“मैंने गिने नहीं थे,” चिंटू ने कहा। “मैंने खाए थे।”
गुमटी में ठहाका लग गया।
शबनम आपा ने चिमटी उठाई — “चिंटू!”
“आपा — गलती से।”
“गिनकर गलती होती है? गिनती में गलती होती है? उसको गिनना कहते हैं, चिंटू — गिनना।”
पूरी गुमटी हँस रही थी।
टिंकू बीच में खड़ा होकर रणवीर की तरह मुँह बनाने लगा — सफ़ेद कुर्ता कोई नहीं था, पर वो अपने कंधे सीधे करके, आँखें आधी बंद करके, बड़ी मुस्कान के साथ हाथों को जोड़कर ऐसे खड़ा हो गया जैसे कोई बड़ा नेता खड़ा होता है।
“मेरे प्यारे बच्चों!” वो बोला, “मैं आपका अपना रणवीर भारद्वाज…”
गुमटी में एक साथ चार आवाज़ें आईं —
“बैठ जा!”
“हट!”
“ओए!”
और शबनम आपा ने अपनी चिमटी उठाई।
टपक।
टिंकू के सिर पर हल्की टपकी पड़ी।
“आपा!” टिंकू ने सिर सहलाया।
“अगली बार,” शबनम आपा ने कहा, “उस आदमी की नकल मत करना। उसका नाम भी इस गली में मुँह से मत निकालना। वो नाम है या नहीं — बाद में बताऊँगी।”
“आपा, प्याला ख़त्म।”
“फिर भर लाऊँगी। पर आज रात गली में कोई प्यासा नहीं सोएगा।”
और उन्होंने पीछे मुड़कर रज़िया की तरफ़ देखा — और दोनों बहनों ने एक-दूसरे को देखकर आँखों से ही कुछ कहा।
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मैं गुमटी से उठा और दुकान की तरफ़ बढ़ा।
टिंकू मेरे पीछे आया।
“उस्ताद,” उसने कहा, “मैं भी आऊँ?”
“आज नहीं,” मैंने कहा। “आज मुझे अकेले बैठना है।”
“पर उस्ताद —”
“कल तुझे बुलाऊँगा,” मैंने कहा। “पर आज तेरे लिए एक काम है।”
“क्या?”
“यहाँ रह,” मैंने कहा। “लोग आ रहे हैं। उन्हें बताना — जो आज मैदान में था, वो हमारा है। जो नहीं था, उससे हम कल बात करेंगे।”
उसने सिर हिलाया।
“उस्ताद।”
“हाँ।”
“आप ठीक हो?”
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“नहीं,” मैंने कहा। “पर हो जाऊँगा।”
वो मुस्कुराया और दौड़कर गुमटी की तरफ़ लौट गया।
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दुकान के पीछे वाला कमरा लौटकर बैठा तो बल्ब फिर गुनगुना रहा था — वही पुराना, पीला, थका हुआ।
मैंने औज़ारों का ट्रंक खोला।
मैंने दोनों ताले बाहर निकाले।
पहला — मंसूर का, दो खोखले हिस्सों में खुला, एक महीन लकीर भीतर।
दूसरा — चूल्हे वाले घर से आया, चाबी के बिना वाला काला चौकोर, कपड़े में लिपटा, पीठ पर वही दो लकीर-बिंदु निशान।
मैंने दोनों को अपने सामने मेज़ पर रखा।
और मैंने देखा — दोनों ठंडे नहीं हैं।
हल्के गरम हैं।
जैसे अभी कुछ बोलेंगे।
जैसे अभी किसी बात का इंतज़ार कर रहे हैं।
मैंने अपना हाथ उन पर हल्का रखा।
फिर मैंने घंटी निकाली।
वो जेब में ठंडी थी। पर जब मैंने उसे तालों के बीच रखा — वो थोड़ी गरम हो गई।
“घंटी,” मैंने धीरे कहा।
कोई जवाब नहीं।
“घंटी, सुन।”
कुछ नहीं।
फिर मैंने घंटी को हल्का बजाया।
वो बजी — पर आवाज़ नहीं आई। बस हल्की झनक जैसी हवा में रह गई।
और फिर — बहुत धीमे — घंटी ने कहा:
“अब तू बोलेगा, मैं सुनूँगी।”
मैं मुस्कुराया।
“कमाल है,” मैंने कहा। “अब तक तू बोलती थी, मैं सुनता था।”
“अब बदल रहा है,” घंटी ने कहा।
“क्या बदल रहा है?”
वो चुप हो गई।
मैंने घंटी हाथ में पकड़कर सोचा — आज जो हुआ, वो कहाँ जाएगा? सब कहाँ दर्ज होगा?
मैंने अपनी कॉपी खोली — वही नई कॉपी, जिसमें माँ का नाम सबसे पहले लिखा है।
पहला पन्ना।
मैंने लिखा —
“आज गली ने मिलकर माँ का इलाज बचाया। आज पापा ने अपना डर कबूला। आज गोविंद भाई का हाथ नहीं काँपा। आज हरिप्रसाद ने अपनी अधूरी उँगली दिखाई। आज शबनम ने रज़िया की चूड़ी पूरी की। आज बबलू ने चेन उतारी। आज दुबे अंकल की सीटी पर पुलिस भी सच के साथ आई।”
फिर एक ख़ाली लकीर छोड़कर नीचे लिखा —
“कल दो बजे — खाली लाइन भरनी है। उससे पहले — छह बक्सों से बात।”
मैंने कलम रखी।
दरवाज़े पर धीमी आवाज़ आई।
मैंने सिर उठाया — बल्कि ऐसा कहूँ, मैंने कान उठाए।
यह माँ थीं।
वो दरवाज़े पर खड़ी थीं — साड़ी का पल्लू कमर में, हाथ में एक छोटी काग़ज़ की पर्ची, आँखें थोड़ी भारी।
“माँ?”
“पाँच मिनट बैठ सकती हूँ?”
“बैठिए।”
वो चारपाई के किनारे बैठीं। मैंने उनके लिए पानी का गिलास भरा। उन्होंने एक घूँट पिया, फिर पर्ची मेज़ पर रखी।
“यह क्या है?” मैंने पूछा।
“दवा की पर्ची,” उन्होंने कहा।
“फिर से?”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “दस दिन की दवा है। और दस दिन में पाँच दिन की नहीं, चार दिन की है। मैंने गिन लिया है।”
“माँ —”
“रुक। सुन। आज तूने बहुत सुना। आज सुनने की तेरी बारी थी। यह मेरी बात है। मैंने दस साल से यह कॉपी संभाली है, और आज मैंने पहली बार सच गिना है। चार दिन की दवा बची है। उसके बाद —”
“माँ, मैं करूँगा कुछ।”
“क्या?”
मैं चुप हो गया।
“अंकुश,” उन्होंने धीरे कहा, “मैं तुझे डराना नहीं चाहती। पर मैं झूठ भी नहीं बोलूँगी, क्योंकि झूठ बोलकर मैंने पाईस साल नहीं गुज़ारे हैं।”
“आपने चुप्पी गुज़ारी है।”
“हाँ,” उन्होंने कहा। “वो अलग बात है।”
उन्होंने पर्ची उठाई।
“चार दिन,” उन्होंने कहा। “मैं चार दिन में तेरे हाथ और गली के हाथ से ज़्यादा नहीं माँगूँगी। पर एक बात — जब तू कल दो बजे दफ़्तार जाए, मेरा नाम उस खाली लाइन पर सबसे ऊपर लिख।”
“क्यों?”
“क्योंकि जब वो काग़ज़ बोलेगा,” उन्होंने कहा, “तो सबसे ऊपर एक माँ का नाम हो — दबा हुआ, छुपाया हुआ, मजबूरी में अंगूठा लगाने वाला।”
मैं उनके हाथ पकड़कर बैठा रहा।
“माँ।”
“हाँ?”
“अगर आज रात कुछ चाहिए — कुछ भी —”
“सिर्फ़ एक बात,” उन्होंने कहा। “कल दफ़्तार के बाद, जब लौटे, मेरे पास बैठकर सारी बात बताना। कुछ न छिपाना।”
“नहीं छिपाऊँगा।”
वो उठीं।
“मैं काजल के पास जा रही हूँ,” उन्होंने कहा। “वो आज बहुत रोई है। पर किसी को नहीं बताया।”
मैंने सिर हिलाया।
वो जाने लगीं, फिर रुकीं।
“अंकुश।”
“हाँ।”
“आज मैदान में, जब तूने घुटने पर बैठकर पापा का हाथ पकड़ा — माँ ने पहली बार देखा कि तेरे पापा सच में तेरे पापा हैं। बाईस साल से मुझे लगता था, वो तेरे सामने सिर्फ़ चुप्पी हैं।”
“अब?”
“अब मुझे लगता है,” उन्होंने कहा, “वो तेरे सामने एक आदमी हैं।”
वो चली गईं।
मैं कमरे में अकेला रह गया।
और ताले — मेज़ पर।
हल्के गरम।
मैंने एक पल सोचा।
कुछ देर बाद मैंने घंटी उठाई और उसे कान से लगाया।
कुछ नहीं।
मैंने घंटी नीचे रखी, बल्ब बुझाया और चारपाई पर लेट गया।
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रात के तीन बज रहे थे, जब दरवाज़े पर तीन धीमी दस्तकें पड़ीं।
धीमी।
बहुत धीमी।
जैसे किसी ने दो अंगुलियों से दरवाज़े को छुआ हो।
मैं उठ बैठा।
काजल की आवाज़ नहीं — काजल सो रही थी।
माँ की आवाज़ नहीं — माँ तकिया पर थीं।
पापा? नहीं — पापा घर में थे।
मैं उठा। दरवाज़े तक गया।
मैंने घंटी जेब से निकाली।
वो — गरम थी।
बहुत गरम नहीं, पर गरम।
जैसे किसी ने उसे हाथ लगाया हो।
मैंने कुंडी खिसकाई।
दरवाज़ा खुला।
बाहर एक बूढ़ा खड़ा था।
लंबा, दुबला, झुका हुआ। सिर पर सफ़ेद टोपी, सफ़ेद दाढ़ी। हाथ में एक लाठी — पर वो लाठी किसी सहारे के लिए नहीं, किसी चीज़ को टटोलने के लिए थी। उसकी आँखें भारी थीं, धुँधली — जैसे बरसों से सूरज का इंतज़ार कर रही हों।
पर उन आँखों में एक चमक थी। वो चमक — पीतल जैसी।
मैंने देखा।
उसके हाथ में एक छोटा पीला काग़ज़ था — बहुत पुराना, बहुत मुड़ा हुआ। उस पर वही दो लकीरें थीं, वही बिंदु।
मेरे भीतर कुछ कस गया।
“आप कौन हैं?” मैंने पूछा।
उसने कुछ नहीं कहा।
उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
नहीं — उसने ऐसे हाथ आगे बढ़ाया, जैसे कोई माँग रहा हो।
और फिर उसने कहा — धीमी, धँसी हुई, बहुत पुरानी आवाज़ में, बिलकुल शांति से, बिना गुस्सा, बिना डर, बिना फ़िल्मी दम —
“वो आधी जीभ मेरी है, और मैं उसे वापस लेने आया हूँ।”
मेरी जेब में घंटी चुप थी।
बिल्कुल चुप।
और मैं जानता था — वो चुप नहीं थी।
वो इंतज़ार कर रही थी।
मैंने उस बूढ़े की तरफ़ देखा — और उसके चेहरे पर, उसकी झुर्रियों में, उसकी आँखों की चमक में, मुझे किसी की शक्ल दिखी।
किसी ऐसे की, जिसे मैं जानता हूँ।
पर मैं उसे पहचान नहीं पा रहा था।
॥
मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा। मेरा हाथ कुंडी पर था और पैर दहलीज़ पर।
बाहर वो बूढ़ा खड़ा था, जैसे दीवार से टिका हुआ कोई पुराना पोस्टर हो, जिसे हवा ने किनारे से उखाड़ दिया हो और कोई चिपकाने न आया हो।
उसकी सफ़ेद टोपी सिर पर ठीक से नहीं थी। दाढ़ी छोटी थी, कहीं-कहीं से पीली पड़ी हुई। लाठी का निचला सिरा ज़मीन पर टिका था, पर उसकी पकड़ ढीली थी — जैसे लाठी उसका सहारा न हो, बस उसके साथ चलने की आदत हो।
“आपने क्या कहा?” मैंने फिर पूछा।
उसने वही किया। हाथ आगे बढ़ाया। हथेली खुली।
और उस हथेली पर वो पीला काग़ज़ रखा था — इतना पुराना कि उसका रंग अब पीला नहीं, हल्का भूरा हो चुका था। मुड़ा हुआ, कई बार मुड़ा हुआ। किनारों से इतना घिसा कि लगता था किसी ने सालों उसे जेब में रखकर हर रोज़ एक बार निकालकर देखा है।
और उस काग़ज़ पर, ऊपर की तरफ़, वही निशान था।
दो लकीरें। बीच में एक बिंदु।
वही। चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर। उस्ताद की घंटी के छल्ले पर। मंसूर चाचा के ताले पर। डॉक्टर इसरानी के रजिस्टर के आख़िरी पन्ने पर। और अब — इस बूढ़े की हथेली पर।
मेरे भीतर कुछ कस गया। पेट से छाती तक एक डोरी खिंची।
“आप कौन हैं?” मैंने तीसरी बार पूछा, और इस बार आवाज़ में वो नरमी नहीं थी जो पहले थी।
उसने उत्तर नहीं दिया।
उसने बस हाथ वैसे ही आगे रखा, और फिर धीरे से कहा — इतनी धीमी आवाज़ में कि लगा आवाज़ उसके गले से नहीं, किसी पुराने संदूक के भीतर से आ रही है —
“वो आधी जीभ मेरी है। और मैं उसे वापस लेने आया हूँ।”
मेरी जेब में घंटी चुप थी।
बिल्कुल चुप।
न गरम। न ठंडी। न आवाज़। सिर्फ़ चुप्पी — वो चुप्पी जो किसी के बोलने से पहले आती है।
मैंने एक कदम पीछे रखा और उसे ठीक से देखा।
उसकी आँखें भारी थीं। धुँधली। पर उनमें एक चमक थी — पीतल जैसी, हल्की, पुरानी।
और उस चेहरे में कुछ था।
कुछ जाना-पहचाना।
मैं उसे पकड़ नहीं पा रहा था। जैसे ज़ुबान पर नाम आकर रुक जाए।
मैं मुड़ा और गली की तरफ़ देखा। शबनम आपा की गुमटी पर लालटेन अब भी जल रही थी। दूर कहीं एक कुत्ता भौंका और फिर चुप हो गया। गली सो रही थी, पर उस सोने में भी वो जागरण था जो आज रात किसी को नींद नहीं लेने दे रहा था।
“उस्ताद!” मैंने आवाज़ दी। ज़ोर से नहीं, पर इतनी कि दुकान के पीछे वाले कमरे तक पहुँच जाए।
कोई जवाब नहीं।
“उस्ताद अली बक्श!”
इस बार आवाज़ तेज़ हुई।
दुकान के भीतर से लकड़ी के स्टूल के सरकने की आवाज़ आई। फिर पैरों की। फिर दरवाज़े का कुंडा खुला और उस्ताद बाहर आए — हाफ़्ते में एक बार ऐसा होता है कि वो रात में बैठकर पुराने कपड़े की मरम्मत करते हैं, और आज वही रात थी। उनके एक हाथ में कैंची थी, दूसरे में कुछ सफ़ेद धागा।
“क्या हुआ?” उन्होंने कहा। “रात के तीन बजे —”
और फिर उनकी नज़र उस बूढ़े पर पड़ी।
कैंची उनके हाथ से गिरी।
धातु की आवाज़ ने गली की चुप्पी को दो हिस्सों में काट दिया।
उस्ताद वहीं रुक गए। उनका मुँह खुला रह गया। उनकी आँखों के पीछे जो पचास साल की सफ़ेदी थी, वो एक पल में हिल गई।
“इलियास…?”
आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे यक़ीन नहीं हुआ कि उस्ताद ने वो नाम बोला है।
बूढ़े ने सिर उठाया।
“भाई,” उसने कहा।
और उस्ताद की टाँगें जैसे अपना काम भूल गईं। वो दरवाज़े के पास पड़े पत्थर पर बैठ गए — नहीं, गिरे। उनका हाथ दीवार पर लगा और वो वहीं सरककर बैठ गए।
“तू…” उस्ताद का गला रुँध गया। “तू मरा हुआ था।”
“मैं मरा नहीं था, भाई,” इलियास ने कहा। “मैं चुप मरा हुआ था।”
मैंने बीच में आकर उन्हें अंदर लाया। बाहर खड़े रहना ठीक नहीं था। गली की दीवारों के भी कान होते हैं, और आज रात हमें कोई कान नहीं चाहिए था।
कमरे में लोहे की अलमारी, औज़ारों का ट्रंक, चारपाई और एक गुनगुनाता पुराना बल्ब था। मैंने इलियास को स्टूल पर बैठाया। उस्ताद उसके सामने चारपाई के किनारे पर बैठे।
उनके हाथ काँप रहे थे। वो कैंची उठाने की कोशिश भी नहीं कर रहे थे।
मैंने पानी लाकर इलियास के आगे रखा। उसने गिलास नहीं छुआ।
“पहले ये बता,” उस्ताद ने कहा। “कहाँ था?”
“बाहर,” इलियास ने कहा। “जबलपुर। फिर नागपुर। फिर दो जगह और। जहाँ कोई मुझे न पहचाने। जहाँ कोई यह न पूछे कि तेरा भाई अली बक्श कहाँ है।”
“पचास साल?”
“पचास साल।”
उस्ताद ने एक गहरी साँस ली। “और आज?”
“आज हिसाब पूरा करने आया हूँ,” इलियास ने कहा। “उससे पहले भी आना था। बहुत बार।”
मैं दरवाज़े के पास खड़ा रहा। मैंने पूछा, “काग़ज़ बदलने का इल्ज़ाम?”
इलियास ने मेरी तरफ़ देखा।
“तुम अंकुश हो?”
“हाँ।”
“पापा शंकर के बेटे?”
“हाँ।”
उसने सिर हिलाया, जैसे किसी पुराने हिसाब में एक लाइन और जुड़ गई हो।
“इल्ज़ाम झूठा था,” उसने कहा। “मैंने कोई काग़ज़ नहीं बदला। न साझा हिसाब का, न किसी का। जो आदमी बाज़ार में फैलाया, वो सफ़ेद कुर्ते और नए जूते वाला था। उस वक़्त हम सबने उसे बाहर का सौदागर समझा। अब समझता हूँ — वो बाहर का नहीं था। वो बाहर से आया ज़रूर था, पर उसका काम बाहर का नहीं था।”
“मतलब?” मैंने कहा।
“मतलब ये कि उस आदमी ने बाज़ार में इलियास का नाम जलाया,” उस्ताद ने धीमे से कहा। “और मैंने पचास साल उस जले नाम के साथ अपना घर बंद रखा।”
“तूने तो मुझसे एक बार भी नहीं पूछा, भाई,” इलियास ने कहा।
“पूछता तो तू कहता?”
“कहता! मैं रोज़ तेरे दरवाज़े के सामने से नहीं गुज़रा, पर मैं रोज़ यह सोचता रहा कि काश कोई पूछ ले।”
उस्ताद ने सिर झुका लिया।
“अब सीधी बात कर,” इलियास ने कहा, और उसकी आवाज़ में एक अजीब सी सख़्ती आ गई। “मैं पचास साल की बातें सुनाने नहीं आया। मैं एक सच बोलने आया हूँ। और उस सच की वजह से मुझे पचास साल की सज़ा मिली है। अब सज़ा खत्म।”
उसने अपनी लाठी को दीवार के साथ टिकाया।
“मैंने आधी जीभ उतारी थी,” उसने कहा।
कमरे में हवा रुक गई।
मेरे हाथ में जो पानी का गिलास था, वो मेरी पकड़ में काँपा।
“क्या?” मैंने कहा।
“घंटी की आधी जीभ,” इलियास ने कहा। “वो जो तेरी घंटी में जीभ है। उसका आधा हिस्सा। मैंने उसे उतारा था। खुद अपने हाथों से।”
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा — ऐसे देखा जैसे कोई पुराना आदमी किसी और पुराने आदमी के चेहरे पर अपना बीता बचपन ढूँढ रहा हो।
“तूने…” उस्ताद की आवाज़ फट गई। “तूने हमारी घंटी को —”
“बाईस साल पहले,” इलियास ने कहा। “एक आदमी आया था मेरे पास। उस वक़्त वो जवान था। बोलने में मीठा, चलने में सीधा, और आँखों में — आँखों में वो भूख थी जो कभी नहीं मिटती।”
“रणवीर,” मैंने कहा।
“उसने तेरा नाम नहीं लिया था,” इलियास ने कहा। “उसने किसी का नाम नहीं लिया था। उसने सिर्फ़ एक चीज़ माँगी — जीभ का आधा हिस्सा — और बदले में मुझे एक काग़ज़ दिखाया। मेरे नाम का। जिसमें लिखा था कि मैंने पाठशाला की दुकान की साझा रकम नहीं चुकाई और मैंने काग़ज़ बदले।”
“वो इल्ज़ाम झूठा था!” उस्ताद ने कहा।
“झूठा था,” इलियास ने कहा। “पर जब कोई आदमी तेरे नाम का झूठा काग़ज़ तेरी मेज़ पर रख दे, तो तू उससे क्या माँगता है? उस काग़ज़ को वापस। उसने कहा — काग़ज़ तेरा, बदले में जीभ।”
“और तूने दे दी,” मैंने कहा।
मेरी आवाज़ में जो था, वो मैं नहीं छुपा पाया।
इलियास ने मेरी आँखों में देखा। उसने नज़र नहीं चुराई।
“हाँ,” उसने कहा। “दे दी।”
मैं बीच में आ गया।
“आपने आधी जीभ उस आदमी को दे दी,” मैंने कहा, “और आप हमें सालों ये तमाशा देखने दिया? आपको पता था कि घंटी हमारे घर में है? आपको पता था कि पापा ने अंगूठा लगाया? आपको पता था कि पूरी गली —”
“अंकुश,” उस्ताद ने कहा।
“नहीं, उस्ताद, आज मैं बोलूँगा,” मैंने कहा। मैं इलियास के सामने झुक गया — ज़्यादा पास नहीं, पर इतना पास कि मेरी हर बात सीधे उसके चेहरे पर गिरे। “आप जानते थे कि वो जीभ किस घंटी की है। आप जानते थे कि उसका आधा हिस्सा किसके हाथ में है। आप पचास साल से ज़िंदा थे — एक बार आ जाते। एक बार दरवाज़े पर आकर बोल देते, भाई, वो मेरा किया हुआ है।”
“डरता था,” इलियास ने कहा।
“डर?”
“अंकुश,” उस्ताद ने फिर कहा, और इस बार उनकी आवाज़ में एक चेतावनी थी। पर इलियास ने हाथ उठाकर उन्हें रोक दिया।
“रहने दे, भाई,” उसने कहा। “ये लड़का सही कह रहा है। मुझे इसे सुनना चाहिए।”
वो मेरी तरफ़ मुड़ा।
“सुन ले,” उसने कहा। “मैं डरता था। भाई के दरवाज़े पर जाने से डरता था — ये तुझे अजीब लगेगा। एक आदमी जिसने अपने बड़े भाई से ज़िंदगी भर सब कुछ पाया, वो उसके दरवाज़े पर जाने से क्यों डरेगा?”
वो रुका। उसकी छाती ऊपर-नीचे हुई।
“क्योंकि मैंने उसकी चीज़ बेची थी,” उसने कहा। “और जो आदमी भाई की चीज़ बेच दे, वो भाई के सामने खड़े होने से डरता है। मैंने खुद से कहा — अगर सच बोलूँगा तो वो पूछेगा क्यों किया। और मेरे पास जवाब नहीं था। मेरे पास सिर्फ़ वो काग़ज़ था जिसे उस आदमी ने मुझे दिया था। और वो काग़ज़ भी मैंने डर के मारे जला दिया, ताकि कोई पूछे नहीं कि ये क्या है।”
“और उस काग़ज़ के बदले क्या मिला?” मैंने पूछा।
“कुछ नहीं,” इलियास ने कहा। “मिला तो सिर्फ़ डर। सालों डर। मैं शहर बदलता रहा, कमरा बदलता रहा, नाम तक नहीं बदला — क्योंकि नाम बदलने से लगता कि मैंने सच में कुछ किया है। मैंने बस अपनी ज़ुबान बदली। बोलना कम कर दिया।”
उसने अपनी उँगलियाँ देखीं। उनमें कुछ नहीं था।
“पचास साल तक मैंने एक ही काम किया,” उसने कहा। “छोटी-छोटी मरम्मत। पीतल के बर्तन ठीक करना। ताले के अंदर फँसी चीज़ें निकालना। मैंने कभी उस शहर में दुकान नहीं की जहाँ भाई था। मैंने कभी किसी ऐसे आदमी से बात नहीं की जो नीम वाली गली जाता था।”
“फिर आज क्यों आया?” उस्ताद ने पूछा।
“क्योंकि आज उस आदमी के बेटे ने सबके सामने रख दिया,” इलियास ने कहा। “मैं यहाँ नहीं था, पर मैंने सुना। उसका एक आदमी मेरे कमरे तक खबर लेकर आया — कि रणवीर ने मैदान में अपनी माँ की बात कबूल कर ली। मैंने वो खबर सुनी और वो काग़ज़ जेब से निकाला जो पचास साल से रखा था। और मैंने पहली बार सोचा — अगर वो आदमी अपनी माँ के सामने झुक सकता है, तो मैं अपने भाई के सामने क्यों नहीं।”
उस्ताद ने अपना चश्मा उतारा। उन्होंने उसे पोंछा, पर पोंछने की ज़रूरत नहीं थी।
“इलियास,” उस्ताद ने कहा।
“हाँ, भाई।”
“तूने वो आधी जीभ अब तक रखी है?”
इलियास ने जेब में हाथ डाला।
“रखी है,” उसने कहा। “पचास साल में — बाईस साल में — नहीं बेची, न फेंकी, न किसी को दी। मैंने उसे कपड़े में लपेटकर रखा और हर छह महीने में एक बार खोलकर देखा कि वो अभी भी है।”
“क्यों देखता था?”
“क्योंकि मुझे लगता था कि जिस दिन वो नहीं दिखेगी, उस दिन मैं मर जाऊँगा,” इलियास ने कहा। “और मैं नहीं मरना चाहता था। मुझे इंतज़ार करना था। बस यह पता नहीं था कि किसका।”
अब उस्ताद उठे। उन्होंने अपनी दुकान के पीछे का दरवाज़ा खोला। उनके कमरे में बहुत कम चीज़ें पहले से कम थीं, अब और कम लगीं। उन्होंने ट्रंक खोला, उसमें से कुछ निकाला।
एक पुरानी सिलाई की पेटी।
लकड़ी की। छोटी। ढक्कन पर पीतल की दो पट्टियाँ। किनारों से पहले रंग जाता रह गया था, पर ऊपर की लकड़ी पर एक फूल खुदा था — छोटा, आधा घिसा — जैसे किसी ने अपने हाथों से धीरे-धीरे बनाया हो, बिना जल्दी।
उस्ताद उसे लेकर इलियास के सामने आए।
“इसे पहचानता है?”
इलियास ने पेटी को देखा। उसका हाथ धीरे से उठा। उसने ढक्कन पर उँगली रखी और उस फूल पर रगड़ते हुए कुछ देर वहीं रुक गया।
“मैंने बनाई थी,” उसने कहा।
“हाँ,” उस्ताद ने कहा।
“तेरी माँ के लिए।”
“हाँ।”
“और उसने इसे रखा?”
“उसने इसे पचास साल रखा,” उस्ताद ने कहा। “और जिस दिन वो गई, उस दिन भी उसका हाथ इसी पर था।”
इलियास की आवाज़ वहीं फट गई।
वो सीधा बैठ गया। उसने अपने दोनों हाथ पेटी पर रखे — जैसे कोई अपने ही बनाए हुए घर में लौटकर दरवाज़ा पकड़ता है। उसकी आँखों से पानी आया, पर वो रोया नहीं। उसने आँखें बंद कर लीं और होंठ हिलते रहे, बिना आवाज़ के — कुछ माँग रहा था, कुछ कह रहा था, या शायद किसी को बता रहा था कि मैं लौट आया हूँ।
उस्ताद ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
पचास साल में पहली बार।
मैं दरवाज़े की तरफ़ मुड़ गया। यह मेरा देखने का दृश्य नहीं था।
बाहर गली की हवा ठंडी थी। शबनम आपा की लालटेन अब भी जल रही थी। कहीं दूर पीपल की पत्तियाँ हिलीं, और मुझे लगा कि पूरी गली साँस रोके इस कमरे की तरफ़ कान लगाए बैठी है।
मैं जब लौटा, इलियास का चेहरा थोड़ा शांत था। पेटी उसकी गोद में थी। उस्ताद उसके पास ही बैठे थे।
“अब वो दूसरी बात,” मैंने कहा।
दोनों मेरी तरफ़ देखने लगे।
“आप कह रहे थे जीभ आपकी है,” मैंने कहा। “और आप इसे वापस लेने आए हैं। पर आपने ये नहीं बताया कि आपने ये क्यों कहा — कि वो जीभ आपकी है। जीभ तो घंटी की थी।”
इलियास ने मेरी तरफ़ देखा और पहली बार उसके चेहरे पर कुछ और दिखा। थकान नहीं। हार नहीं।
शायद शर्म।
“वो घंटी मेरे हाथ से गुज़री थी,” उसने कहा। “मैंने उसे छुआ था। मैंने उसका आधा हिस्सा उस आदमी को दिया था। और उस दिन के बाद — मुझे लगता है उस आधे हिस्से का कोई हिस्सा मेरे भीतर रह गया। जो मैंने आज तक नहीं निकाला।”
“मतलब?”
“मतलब ये कि अब वो मेरी नहीं है,” इलियास ने कहा। “कभी थी। पर बाईस साल तक मैंने उसे अपना मानकर अपने भीतर रखा। अब मैं उसे उसकी जगह लौटाने आया हूँ।”
वो फिर अपनी जेब में गया।
इस बार उसने धीरे से एक छोटा कपड़े का बंडल निकाला। मैला खादी, कोनों से पीला पड़ा हुआ। उसने उसे अपनी गोद पर रखा, गाँठ खोली, कपड़ा खोला।
भीतर एक पीतल का टुकड़ा था।
आधी जीभ।
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली। वो मेरी हथेली पर ठंडी थी।
फिर उस्ताद ने कैंची उठाई — वो गिरी हुई कैंची — और उसे इलियास की तरफ़ नहीं, अपनी मेज़ की तरफ़ नहीं, बस हाथ में पकड़े रखा। जैसे उनके हाथ को किसी चीज़ की ज़रूरत थी जो उनकी अपनी हो।
“इलियास,” उस्ताद ने कहा। “तू इतने साल चुप क्यों रहा?”
“कह दिया न — डरता था।”
“नहीं,” उस्ताद ने कहा। “ये बात सही नहीं है। आदमी डरकर शहर बदलता है। आदमी डरकर दुकान बंद करता है। पर आदमी डरकर पचास साल अपने भाई की गली की तरफ़ नहीं देखता — जबकि उसका भाई दो गलियों की दूरी पर रोज़ सुबह मशीन चलाता हो, और वो मशीन की टिक-टिक रात में भी सुनाई देती हो — ये डर नहीं है।”
इलियास की आँखें भर आईं।
“ये शर्म है,” उस्ताद ने कहा। “डर की नहीं — अपने ही किए की शर्म। ये अलग चीज़ है।”
इलियास ने अपना सिर झुका लिया।
“हाँ,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूटी। “शर्म। मैं शर्माता था, भाई। मैं सोचता था कि तू उस रात के बाद से अपनी दुकान में बैठकर रोज़ एक बार उस पाठशाला को याद करता होगा जो जल गई थी। और मैं — मैं उस जलने में पचास साल से शामिल था। तू मुझे देखता तो क्या सोचता? तू मुझे देखता और सोचता — यही है जिसने सब जलाया।”
“मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा,” उस्ताद ने कहा।
“तूने सोचा नहीं, पर मैंने सोचा कि तूने सोचा,” इलियास ने कहा। “यही मेरी सज़ा थी। पचास साल तक अपने ही भाई की सोच बनाकर उससे डरता रहा।”
उस्ताद कुछ देर चुप रहे।
फिर उन्होंने घुटनों पर हाथ रखा और धीरे से कहा, “तू मुझे बताता तो मैं क्या कर लेता?”
इलियास ने सिर उठाया।
“बता, इलियास। अगर तू बाईस साल पहले उस रात आकर कहता — भाई, मैंने उस आदमी को जीभ दे दी — तो मैं क्या करता?”
“गुस्सा करता।”
“करता,” उस्ताद ने कहा। “मैं गुस्सा करता। मैं दो दिन तुझसे नहीं बोलता। पर तीसरे दिन मैं तेरे दरवाज़े पर आकर बैठता और तुझसे कहता — अब बता, इसको ठीक कैसे करें।”
इलियास की आँखों से पानी बहा।
“तेरे दरवाज़े पर आने से तू डरता था,” उस्ताद ने कहा। “और मैं तेरे दरवाज़े पर न आने से मर रहा था। मैं पचास साल तुझे एक जले हुए शहर में ढूँढता रहा। मैंने अपने ऊपर बोझ रखा — कि मैंने भाई को बचाया नहीं। कि मैं उस रात उससे पहले पहुँचा नहीं। और तू — तू पचास साल मुझसे दूर रहकर मेरी सज़ा बढ़ाता रहा।”
“अब आया हूँ,” इलियास ने कहा।
“देर से।”
“देर से,” इलियास ने कहा। “पर आया हूँ।”
मैंने कुछ देर उन्हें देखा। मेरा गुस्सा अभी गया नहीं था। गुस्सा ऐसे नहीं जाता। गुस्सा एक घुटने पर बैठकर गले लगाने से भी नहीं जाता। गुस्सा वहीं रहता है, कोने में, और इंतज़ार करता है कि कब कोई उसे वाजिब सवाल पूछे।
मैंने पूछा —
“आपको पता था कि घंटी पापा के घर में है?”
इलियास ने मेरी आँखों में देखा।
“नहीं,” उसने कहा। “मुझे पता था कि घंटी उन हाथों में है जिन्होंने उसे छुपाया। पर मुझे नहीं पता था कि वो हाथ अपने घर में किस चीज़ को घुटनों पर रखकर पाल रहे हैं।”
“और जब पता चला — बाईस साल पहले, जब रणवीर ने घंटी खरीदनी शुरू की, जब मोहल्ले में अंगूठे पड़ने लगे — तब?”
“तब भी डरता रहा,” इलियास ने कहा।
“आप एक आदमी के डर से पूरी गली को बहने दे रहे थे?”
इलियास ने अपना हाथ उठाया और मैं चुप हो गया।
“सुन,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ में अब वो सफ़ेद दाढ़ी वाली दीनता नहीं थी — कुछ और था। कुछ सीधा। “तू मुझसे ये मत पूछ कि मैंने क्यों नहीं रोका। मैं नहीं रोका। मैं एक कायर आदमी हूँ जो अपने भाई के दरवाज़े तक नहीं जा सका। मैं ये सच तेरे सामने रख रहा हूँ, छुपा नहीं रहा। मुझसे ये उम्मीद मत रख कि मैं अपना मुँह ढककर या अपनी पीठ पीछे करके खड़ा हो जाऊँगा। मैं यही आया हूँ — जो किया, उसके साथ।”
उसका हाथ वापस गोद में आया।
“अब तेरी बारी,” उसने कहा। “तू मुझे जो कहना है कह दे। मैं सुनूँगा। पर एक बार में कह दे। बाद में सिर्फ़ हिसाब।”
मैंने देखा — उसकी हथेलियाँ खुली थीं। वो मुझसे कुछ नहीं छिपा रहा था। वो बैठा था, मेरे सामने, और मेरे जवाब का इंतज़ार कर रहा था।
और मुझे अचानक याद आया कि सिर्फ़ कुछ घंटे पहले मैं खुद उसी मैदान में घुटनों पर बैठा था, और पापा के हाथ पकड़कर उनसे कह रहा था — बोलिए। सब बोलिए।
तब मुझे लगा था कि सच बोलने का हक़ सिर्फ़ सुनने वाले को है।
अब पता चल रहा था कि सच बोलने वाले को भी कोई हक़ चाहिए — बस बैठकर सुने जाने का।
“मुझे आपसे कोई सवाल नहीं पूछना,” मैंने कहा।
इलियास ने मेरी तरफ़ देखा।
“पर एक बात कहूँगा,” मैंने कहा। “आपने आधी जीभ दी। मुझे नहीं पता कि उस वक़्त आपके पास क्या रास्ता था। मैं यह नहीं कहूँगा कि आपको नहीं देनी चाहिए थी — मैं उस रात आपके जूते नहीं पहने हुए थे। पर आज जो आप कर रहे हैं — वो अच्छा है। और अच्छा काम भी हिसाब माँगता है। कल दो बजे जब वो काग़ज़ बोलेगा, तो उसमें आपका नाम भी बोलेगा।”
इलियास ने धीरे से सिर हिलाया।
“बोलेगा,” उसने कहा। “और यही मुझे चाहिए।”
अब उस्ताद उठे। उन्होंने अपनी मशीन के पास की दराज़ खोली और उसमें से एक छोटी सी चीज़ निकाली — एक कपड़ा, और उस कपड़े में कुछ।
“ये ले,” उन्होंने कहा, और इलियास के हाथ में रखा। “तेरे लिए बाईस साल से रखा है। सोचता था कि अगर तू कभी लौटे तो पहले पहन ले।”
इलियास ने कपड़ा खोला। एक सिला हुआ कुर्ता था। सफ़ेद। सादा। किनारों पर नीला धागा।
इलियास ने कुर्ते को अपनी छाती से लगाया और उस पर अपना चेहरा रख दिया।
और इस बार वो रोया। बिना आवाज़। बस कंधे हिलते रहे।
मैं दरवाज़े के बाहर आ गया। मैंने दोनों हाथ दहलीज़ के पत्थर पर रखे और आसमान की तरफ़ देखा। सुबह होने में अभी देर थी।
गुमटी की लालटेन बुझ गई थी। कहीं किसी ने खाँसा। गली की हवा में वो गंध थी जो आज सारे दिन मेरे साथ चल रही थी — कपूर की नहीं, और कुछ। धूल की। पुराने काग़ज़ की। पुराने हाथों की।
जब मैं लौटा, इलियास ने सफ़ेद कुर्ता पहन लिया था। उसके ऊपर उसकी सफ़ेद दाढ़ी और भी सफ़ेद लग रही थी। वो अब बूढ़ा नहीं लग रहा था। वो थका हुआ लग रहा था — और थकान और बुढ़ापा दो अलग चीज़ें हैं।
उसने अपने कपड़े के बंडल से वो पीतल का टुकड़ा उठाया।
“अंकुश,” उसने कहा।
मैं उसके पास आया।
उसने आधी जीभ अपनी हथेली पर रखी और मुझे दिखाया।
पीतल का पतला, टेढ़ा टुकड़ा। न ज़्यादा भारी, न ज़्यादा चमकदार। किनारे पर एक छोटा सा छेद, जैसे उसे किसी कील पर टाँगा जाता रहा हो। और उस पर वो फूल — वही फूल जो मेरी घंटी पर है, पर यहाँ आधा।
मैंने अपनी घंटी उठाई और उसके बगल रखी।
दोनों में फ़र्क था। घंटी के भीतर जगह थी — खाली, अधूरी। और ये टुकड़ा — ये उसी खाली जगह का आकार लिए हुए था।
“ये ठंडा क्यों है?” मैंने पूछा।
इलियास ने मेरी तरफ़ देखा।
“क्योंकि बाईस साल से ये किसी भी चीज़ से नहीं जुड़ा,” उसने कहा। “ये मेरी जेब में पड़ा रहा। मैंने इसे कभी उस घंटी के पास नहीं रखा, कभी साथ नहीं बजाया। ये अलग रहा। और अलग रहकर ये — ये सिर्फ़ लोहा बन गया। देख, इसमें वो बात नहीं बची।”
“फिर इसे क्या करना है?”
इलियास ने अपनी हथेली मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
और धीरे से कहा —
“अब इसे तुम ही पूरा करो। मैंने तो इससे सिर्फ़ अपना हिसाब लिया था।”
॥
आधी जीभ मेरी हथेली पर रखी थी और मुझे लग रहा था कि मैंने किसी की आधी साँस पकड़ ली हो।
पीतल का वो पतला टुकड़ा हल्का था, पर हथेली पर ऐसा बैठा था जैसे कोई पुराना बोझ हो। किनारे पर छोटा सा छेद, ऊपर आधा फूल, और बीच में वो जगह जहाँ कुछ टूटकर अलग हुआ था।
मैंने उसे मेज़ पर रखा। मेज़ के दूसरी तरफ़ मेरी घंटी रखी थी — वही पीतल की, जिसने पिछले कुछ दिनों में मुझे इतनी बातें बताई थीं कि मुझे अपनी ही गली नई लगने लगी थी।
मैंने घंटी को आधी जीभ के पास सरकाया।
दूरी बहुत कम थी। दो उँगली से भी कम। पर उस कम जगह में एक पूरा पचास साल भरा हुआ था।
जैसे ही दोनों एक-दूसरे के पास आए, मेज़ पर हल्की सी टक-टक हुई।
टक। टक। टक।
ऐसी आवाज़ नहीं जैसे धातु धातु से टकराई हो। ऐसी आवाज़ जैसे किसी ने दूर से किसी बंद दरवाज़े पर उँगली रखी हो और उसे खटखटाना सीख रहा हो।
और फिर घंटी हिली।
मैंने उसे छुआ नहीं था। मैंने हाथ पीछे कर लिया था। मेज़ भी सपाट थी, कोई कंपन नहीं। पर घंटी अपनी जगह पर ज़रा-सी हिली — धीरे, बहुत धीरे। जैसे कोई सोता हुआ आदमी करवट ले।
“उस्ताद,” मैंने धीरे से कहा। “ये हिल रही है।”
उस्ताद मेरे पीछे खड़े थे। उन्होंने अपना मोटा चश्मा सीधा किया और झुककर देखा।
“हिल रही है,” उन्होंने कहा। “पर बज नहीं रही। ये बोलने की जगह साँस ले रही है।”
इलियास सामने बैठा था। सफ़ेद कुर्ता पहने हुए। कुर्ते के किनारों पर नीला धागा था और उसका चेहरा ऐसा था जैसे कोई बहुत लंबी सड़क चलकर आया हो और अब उसे यक़ीन नहीं हो रहा कि वो घर पहुँच गया है।
मैंने आधी जीभ उठाई और घंटी के भीतर की तरफ़ देखा। वहाँ वो खाली जगह थी जिसे मैंने कभी ध्यान से नहीं देखा था। अब देखा तो लगा कि वो खाली नहीं है — वो इंतज़ार कर रही है।
“इसका आकार इसी से मिलता है,” मैंने कहा।
“मिलता होगा,” उस्ताद ने कहा। “पर आकार से कुछ नहीं होता। जोड़ने के लिए हाथ चाहिए।”
उन्होंने मेज़ पर पड़े मंसूर के दोनों ताले उठाए। वही जुड़वाँ ताले जो मेरी हथेली में खुलकर गिरे थे। और उनके बगल में वो काला चौकोर ताला रखा था, जिस पर वही दो लकीरें और बिंदु बना था और जिसमें चाबी का छेद ही नहीं था।
उस्ताद ने घंटी के फूल पर उँगली रखी। फिर ताले के निशान पर रखी।
“देख,” उन्होंने कहा। “यहाँ फूल की पंखुड़ी जिस तरह मुड़ी है, वैसी ही मुड़ी है ताले के निशान में। यहाँ लकीर जिस कोण से चली है, उसी कोण से यहाँ चली है। मैंने पचास साल से इन चीज़ों को छुआ नहीं, पर अब छू रहा हूँ तो लगता है कि मेरी उँगली को पता है।”
“मतलब ये सब एक ही आदमी के बनाए हैं?” मैंने पूछा।
“मंसूर ने ताले जोड़े,” उस्ताद ने कहा। “पर ताले पर जो निशान है, वो मंसूर का नहीं। वो उस हाथ का है जिसने घंटी पर ये फूल खोदा। मंसूर की दुकान पर मैंने एक पुरानी पीतल की पट्टी देखी थी — उस पर भी यही फूल था। उसने कहा था कि ये पट्टी उसके उस्ताद की है। और उसका उस्ताद वही था जिसने मेरी माँ की सिलाई की पेटी बनाई थी।”
“तो एक ही कारीगर,” मैंने कहा।
“एक ही हाथ,” उस्ताद ने कहा। “और एक ही आदमी ने तेरी घंटी बनाई। ये काग़ज़ का हिसाब नहीं, तेरे हाथ का हिसाब है। इसे जोड़ने के लिए दो हाथों का सच चाहिए — काग़ज़ का नहीं।”
इलियास ने धीरे से सिर उठाया।
“दो हाथ?” उसने कहा।
“दो हाथ,” उस्ताद ने कहा। “एक उसका जिसने तोड़ा, एक उसका जिसने सहा।”
मैंने इलियास की तरफ़ देखा।
वो अपनी हथेली मेरी तरफ़ बढ़ाए हुए था — अभी भी। जैसे उसने आधी जीभ मुझे दे दी हो और अब उसका हाथ वापस नहीं आ रहा हो।
“इलियास चाचा,” मैंने कहा।
वो मेरी तरफ़ देखने लगा।
“आपने बाईस साल पहले एक काम किया था,” मैंने कहा। “आपने चुप रहकर, डरकर, शर्म में आधी जीभ रणवीर को दे दी थी। सच कहूँ तो उस रात आपने सिर्फ़ जीभ नहीं दी थी — आपने अपना नाम भी दे दिया था। अपना हिस्सा दे दिया था। अपने भाई को भी दे दिया था।”
इलियास का हाथ ज़रा हिला।
“अब एक काम करना,” मैंने कहा। “वो ही करना, पर उल्टा। जो आपने रणवीर के लिए किया था, वो आप वापस लेने के लिए करो। आपने चुप रहकर आधी जीभ दी थी। अब बोलकर उसे वापस लो।”
इलियास का चेहरा उतर गया।
वो सीधे मेरी तरफ़ देखने लगा और उसकी आँखों में वो डर आ गया जो बूढ़े लोगों की आँखों में बच्चों जैसा लगता है। वो अपने कुर्ते के किनारे को उँगली में लपेटने लगा।
“बेटा,” उसने कहा। “तू जानता नहीं। मैं पचास साल बाहर रहा। मैं जबलपुर में मज़दूरी करता रहा, नागपुर में दुकानों के बाहर बैठा रहा, दो और जगहों में मैंने अपना नाम भी नहीं बताया। मैंने अपना पूरा बचपन वहीं छोड़ दिया जहाँ ये घंटी थी। अब मैं लौटा हूँ। मैं अपने भाई के सामने खड़ा हूँ — पचास साल बाद। और सबसे ज़्यादा डर मुझे अपनी ही गली से लग रहा है।”
“गली क्या करेगी?” मैंने पूछा।
“गली ज़िंदा नहीं छोड़ेगी,” उसने कहा। “पचास साल पहले यही गली मुझे देखती थी तो कहती थी — यही है जिसने काग़ज़ बदला। अब मैं वापस आया हूँ, तो गली पूछेगी — कहाँ था? क्यों भागा? क्यों अपने भाई को अकेला छोड़ा? तूने तो अपनी माँ तक को नहीं बचाया। गली का सवाल काग़ज़ से बड़ा होता है, बेटा। गली का सवाल अंगूठे से बड़ा होता है।”
“आपकी गली आपको डरा रही है,” मैंने कहा।
“हाँ,” उसने कहा। “और मैं पचास साल से इसे सह रहा हूँ।”
तब उस्ताद ने उसका कंधा पकड़ा।
उनका हाथ इलियास के कंधे पर ऐसे बैठा जैसे बहुत सारी चीज़ें थाम ली हों। उन्होंने धीरे से कहा —
“इलियास।”
इलियास ने उनकी तरफ़ देखा।
“माफ़ी माँगना तेरा काम है,” उस्ताद ने कहा। “माफ़ करना उनका काम है। तू बस सच बोल। बाकी मत सोच। सोचने बैठेगा तो वही करेगा जो आज तक किया — और तेरे पास और पचास साल नहीं हैं।”
इलियास हँसा भी और उसकी आँखें भर भी आईं।
“आप मुझे डाँट रहे हैं,” उसने कहा।
“हाँ,” उस्ताद ने कहा। “पचास साल बाद भी मुझे तेरी आवाज़ में वो लड़का सुनाई देता है — वो जो हमेशा पीछे खड़ा होकर मेरी मशीन की टिक-टिक सुनता रहता था। अब खड़ा है तो बोल भी।”
मैंने घंटी उठाई और आधी जीभ उसके पास रखी।
“आप हाथ रखिए,” मैंने कहा।
इलियास ने दोनों हाथ बढ़ाए। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। मैंने भी अपने दोनों हाथ उनके ऊपर रखे। घंटी और आधी जीभ के बीच मेरी हथेली थी।
फिर एक टक-टक हुई। फिर दो। फिर एक लंबी, पतली सी आवाज़ आई — जैसे किसी ने दाँत से होंठ दबाया हो।
घंटी गरम हुई।
“उस्ताद!” मैंने कहा। “ये गरम हो रही है।”
“हाँ,” उन्होंने कहा। “पर बज नहीं रही।”
“क्यों?”
“क्योंकि अभी दो नहीं हैं,” उस्ताद ने कहा। “अभी भी दो लोगों का सच है। इसे और हाथ चाहिए। देख — ये माँग रही है।”
मैंने घंटी को देखा। उसकी सतह पर मेरी उँगली की लकीरों के साथ एक नई महीन रेखा उभर रही थी। ऐसी रेखा जो पहले नहीं थी।
फिर घंटी धीरे से बोली।
सिर्फ़ दो शब्द।
“सबके हाथ।”
इलियास ने पीछे झटका लिया। उस्ताद ने उसे थाम लिया।
“ये बोली,” इलियास ने कहा। “ये बोली!”
“बोली,” उस्ताद ने कहा। “पर बजी नहीं। मतलब अभी पूरी नहीं है।”
“सबके हाथ का क्या मतलब?” मैंने पूछा।
“मतलब तेरे हाथ और मेरे हाथ से कुछ नहीं होगा,” उस्ताद ने कहा। “ये घंटी अकेले इंसान की चीज़ नहीं रही। कभी थी। अब नहीं। अब इसे पूरी गली का सच चाहिए। जिसने तोड़ा, जिसने सहा, जिसने देखा, जिसने छुपाया — सबका। पाँच साल का कच्चा सच और पचास साल का पका सच — दोनों साथ लगेंगे तभी ये जुड़ेगी।”
मैंने घंटी को मेज़ पर रखा। मेरे हाथ अभी भी हल्के जल रहे थे।
इलियास ने अपना हथेली पर फूँक मारी।
“मुझे लगा था आज रात सब खत्म हो जाएगा,” उसने कहा।
“नहीं,” मैंने कहा। “आज रात सिर्फ़ शुरुआत है।”
तभी खिड़की के बाहर से टिंकू की आवाज़ आई।
“उस्ताद!”
मैंने खिड़की की तरफ़ देखा। टिंकू बाहर दीवार पर चढ़ा खड़ा था, एक हाथ में उसका बने हुए कार्डबोर्ड का माइक था और आँखें बड़ी।
“मैदान की तरफ़ से गाड़ी की रोशनी आ रही है!” वो चिल्लाया। “बड़ी रोशनी! सीधी हमारी गली की तरफ़ आ रही है!”
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने इलियास की तरफ़। इलियास ने मेरी तरफ़।
कोई तीनों को एक-दूसरे से कुछ कहना नहीं पड़ा।
मैंने घंटी उठाई। आधी जीभ मेरी जेब में डाली। दोनों ताले और काला ताला मैंने जल्दी से उस पुराने पीले कपड़े में लपेटे और उसी मेज़ पर छोड़ दिया, जहाँ माँ की हिसाब की कॉपी खुली थी। औज़ार वहीं पड़े रह गए — मेरी रिंच, मेरा पेचकस, टेप वाला हथौड़ा। दुकान के भीतर का बल्ब गुनगुना रहा था, जैसे उसे भी नींद टूट गई हो।
हम दरवाज़े से बाहर निकले।
गली में रोशनी आ रही थी।
नई बस्ती की तरफ़ से सड़क बड़ी है, और उसी सड़क से एक-दो नहीं, तीन गाड़ियाँ आ रही थीं। उनकी आगे की बत्तियाँ पीपल के तने पर पड़ रही थीं और पत्ते चाँदी जैसे दिख रहे थे।
“कौन है?” उस्ताद ने कहा।
“देखते हैं,” मैंने कहा।
इलियास ने धीरे से कदम पीछे किया।
“अब रुको,” मैंने कहा। “आप भागे तो मैं आपसे कुछ नहीं कहूँगा, पर आज रात आपको भागना नहीं है।”
“मैं भाग नहीं रहा,” उसने कहा। “मैं बस………. बैठने की जगह देख रहा हूँ।”
मैं हँस दिया। बिना वजह। ऐसी हँसी आ जाती है जब कुछ और करने का हक़ न बचे।
गाड़ियाँ गली के मुँह पर रुकीं। पहली गाड़ी से रणवीर उतरा। दूसरी से चंद्रेश सक्सेना। तीसरी से दो आदमी जिन्हें मैंने पहले नहीं देखा था और एक लंबा आदमी सफ़ेद कुर्ते में, जिसके हाथ में एक बंद मोटी फाइल थी।
रणवीर आज रात अलग लग रहा था। फिर भी वही था। वही सफ़ेद कपड़े। वही हाथ जोड़ने की आदत। पर उसके चेहरे से वो चमक गई थी। गाड़ी की रोशनी में उसका चेहरा सपाट लग रहा था, जैसे किसी ने किसी पेंटिंग से रंग उतार दिए हों।
“इतनी रात को आने का कोई नया हिसाब होगा,” मैंने कहा। “क्योंकि पुराना तो हम सब बैठकर देख चुके हैं।”
रणवीर मुस्कुराया।
“उस्ताद,” उसने कहा, उस्ताद अली बक्श की तरफ़ देखकर। “एक बात है।”
उस्ताद ने अपना चश्मा सीधा किया।
“बोल,” उन्होंने कहा।
“मैं आपके भाई को लेने आया हूँ,” रणवीर ने कहा।
इलियास का कंधा काँपा।
उस्ताद आगे बढ़े। इलियास उनके पीछे आया। रणवीर ने उन दोनों को देखा और उसके चेहरे पर वो पुरानी मुस्कान आई जो खोने की मुस्कान होती है।
“इलियास चाचा,” रणवीर ने कहा। “आप लौटे।”
“मैं लौटा,” इलियास ने कहा। सपाट आवाज़।
“मैंने आपको ढूँढा था,” रणवीर ने कहा।
“क्यों?”
“क्योंकि आपके पास वो चीज़ है जो बाकी सबको जोड़ती है,” रणवीर ने कहा। “मेरे पास आधी थी। आपके पास आधी थी। सोचिए — हम दोनों मिल जाएँ तो पूरी हो जाए।”
इलियास ने आगे कदम बढ़ाया।
मुझे लगा वो कुछ ऐसा कहेगा जो हम सबको सुनना चाहिए। पर वो सिर्फ़ इतना कहा —
“तुमने मुझे बाईस साल पहले भी यही कहा था।”
रणवीर हँसा।
“और आपने मान लिया था,” उसने कहा।
“हाँ,” इलियास ने कहा। “मैंने मान लिया था।!”
एक पल के लिए गली में सिर्फ़ पीपल की पत्तियों की आवाज़ रही।
फिर इलियास ने अपना कुर्ता सीधा किया — वो सफ़ेद कुर्ता जो उस्ताद ने उसके लिए सिलकर रखा था — और रणवीर के सामने खड़ा हो गया।
“मैं तुम्हारे साथ नहीं आऊँगा,” इलियास ने कहा। “और ये आधी जीभ मेरी नहीं है अब। मैंने ये अंकुश को दी है। मेरा हिसाब अब उसी के पास है। तू उससे माँग。 !”
रणवीर की मुस्कान ज़रा घटी। उसने मेरी तरफ़ देखा।
“अंकुश,” उसने कहा। “कल दो बजे, मेरा दफ़्तार। मैंने तुझे साफ़ कहा था। अब साफ़ सुन ले। ये जो कुछ हो रहा है — ये सिर्फ़ काग़ज़ नहीं है। ये मोहल्ला है। मोहल्ला रोटी से चलता है। और रोटी का हिसाब पैसे से। तेरे पास पैसा नहीं है। तेरे पास घंटी है। घंटी से कोई बच्चा बड़ा नहीं होता।”
“आप सही कह रहे हैं,” मैंने कहा। “घंटी से कोई बड़ा नहीं होता। इसीलिए तो मैं आपसे लड़ नहीं रहा। मैं लोगों को जोड़ रहा हूँ। आप काग़ज़ को। अंत में जो ज़्यादा टिकेगा, वही जीतेगा।”
अब उस लंबे सफ़ेद कुर्ते वाले आदमी ने आगे कदम बढ़ाया। वही जिसे रणवीर आज मैदान में सर कह रहा था। वह हँसा और मेरे पास आया।
“तुम अंकुश हो?” उसने कहा।
“हाँ,” मैंने कहा। “और आप कौन हैं?”
उसने मोटी फाइल खोली। उसमें सब कुछ था — काग़ज़, तारीख़ें और एक लंबी सूची। उसने मेरी तरफ़ एक पन्ना बढ़ाया।
“मैं वो हूँ,” उसने कहा, “जिसने यह बनाया।”
मैंने पन्ना पढ़ा। माँ की बेड वाली तस्वीर। इलाज का हिसाब। और नीचे एक लाइन — पंद्रह दिन।
“पंद्रह दिन में क्या?” मैंने पूछा।
“पंद्रह दिन में अस्पताल की ज़मीन का काग़ज़ मंज़ूर होगा,” उसने कहा। “और उसके बाद तेरी माँ का इलाज इसमें से होगा या नहीं — ये बात उस वक़्त तय होगी, जब मैं बैठूँगा।”
मैंने पन्ना वापस किया।
“तो अभी मैं क्या करूँ?” मैंने पूछा। “डरूँ? आप यही चाहते हैं ना? आप चाहते हैं कि मैं आज रात सो न सकूँ और कल आपके पास आ जाऊँ।”
उसने मुस्कुराकर सिर हिलाया।
“तू समझता है,” उसने कहा। “अच्छा है।”
“मैं समझता हूँ,” मैंने कहा। “पर एक बात समझ लीजिए। आप काग़ज़ से लड़ते हैं। मैं भरोसे से लड़ता हूँ। आपके पास धन है, वकील हैं, तारीख़ें हैं। मेरे पास एक घंटी है, एक आधी जीभ, और आपके ही शब्दों में — एक मोहल्ला जो रोटी से चलता है।”
रणवीर ने एक पल मेरी तरफ़ देखा।
फिर उसने उस लंबे आदमी की तरफ़ देखा और कुछ कहा। वो आदमी मुस्कुराया और अपनी फाइल बंद करके गाड़ी की तरफ़ चला गया।
रणवीर गाड़ी की तरफ़ बढ़ा, फिर रुका।
“अंकुश,” उसने कहा। “कल दो बजे। मेरे दफ़्तार। और अगर तू नहीं आया, तो उस दिन के बाद तेरा नाम किसी काग़ज़ पर नहीं होगा। याद रखना — मैं नाम मिटाता नहीं, नाम काटता हूँ।”
“जानता हूँ,” मैंने कहा। “दरोगा बता गए थे। कटा हुआ नाम हमेशा दिखता रहता है।”
रणवीर हँसा। फिर गाड़ी में बैठा और तीनों गाड़ियाँ मुड़कर चली गईं।
उनकी रोशनी जाते ही गली में अंधेरा वापस आ गया। पीपल की पत्तियाँ फिर वैसी ही लगीं। जैसे कुछ हुआ ही न हो।
उस्ताद ने एक लंबी साँस ली।
“इलियास,” उन्होंने कहा। “तूने आज पहली बार उससे ना कही।”
“मैंने कही,” इलियास ने कहा।
“अब घर चल,” उस्ताद ने कहा। “अब तेरा काम काग़ज़ नहीं है। तेरा काम बोलना है। कल सुबह सबके सामने।”
हम लौटकर दुकान के पीछे वाले कमरे में आए।
मैंने घंटी मेज़ पर रखी। मैंने आधी जीभ उसके पास रखी।
फिर मैंने दोनों हाथ मेज़ पर रखे और उस्ताद से कहा —
“उस्ताद, अभी जो हुआ — आपने कहा कि दो हाथों का सच चाहिए। तो ये बात काग़ज़ के बिना नहीं होगी?”
उस्ताद ने अपनी पुरानी कुर्सी पर बैठकर कहा —
“काग़ज़ के बिना ही होगी। काग़ज़ तो उनका हथियार है। हमारा हथियार हमारा हाथ है। देख, मंसूर ने ताले बनाए, पर उसने ताले के साथ क्या कहा था — दो हाथों से बंद ताला एक हाथ से नहीं खुलेगा। ऐसा ही घंटी के साथ है। तूने अकेले पूरी गली के सच को हाथ नहीं लगाया। तूने सबको बोलने की जगह दी। अब तेरी जगह पूरी गली के पास है।”
“तो कल सुबह?” मैंने पूछा।
“कल सुबह सब बोलेंगे,” उस्ताद ने कहा। “न सिर्फ़ तेरे दो बजे वाले काग़ज़ पर। मैं कहता हूँ, सुबह होते ही पीपल पर सबको बुला। जो नहीं आएगा, उसके घर तक जाएँगे। तेरी माँ की दवा चार दिन की है ना? चार दिन में काफ़ी कुछ हो सकता है।”
“और कल दो बजे?” मैंने पूछा।
“कल दो बजे हम दफ़्तार जाएँगे,” उस्ताद ने कहा। “पर बिना काग़ज़। सिर्फ़ अपने नाम के साथ।”
तभी मैंने घंटी को फिर उठाया।
वो अब भी हल्की गरम थी। जैसे अभी-अभी किसी ने उसे छोड़ा हो।
और फिर, जैसे ही मैंने आधी जीभ को उसके भीतर के खाली हिस्से के पास रखा, घंटी हिली। बहुत धीरे। जैसे कोई सोया हुआ आदमी सपने में करवट बदलता है।
“उस्ताद,” मैंने धीरे से कहा। “ये कुछ कह रही है।”
“क्या कह रही है?” उन्होंने पूछा।
“मुझे पूरा समझ नहीं आ रहा,” मैंने कहा। “पर जैसे — जैसे ये कह रही है कि अभी नहीं।”
और तभी घंटी ने धीरे से, बहुत धीरे से, दो शब्द कहे —
“मैदान। सबके हाथ।”
मैंने घंटी को मुट्ठी में बंद किया।
बाहर से गाड़ी की तेज़ रोशनी दुकान के टेढ़े बोर्ड पर पड़ी और बोर्ड की आकृति दीवार पर काली होकर नाचने लगी। लगा कि बोर्ड भी पूछ रहा है — अब क्या होगा?
मैंने घंटी जेब में रखी। मैंने आधी जीभ कुर्ते के अंदर वाली जेब में रखी। मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
“अभी रुकिए,” मैंने कहा। “जो रोशनी आई, वो वापस जा रही है। पर उसने रास्ता देख लिया है।”
“कौन सा रास्ता?” उस्ताद ने पूछा।
“हमारे घर का,” मैंने कहा।
इलियास ने अपना कुर्ता और कस लिया।
“मैं सुबह तक यहीं रहूँगा,” उसने कहा। “भागूँगा नहीं। पर एक बात कहता हूँ — सुबह जब सब उठेंगे, तू पहले मुझे बोलने दे। फिर बाकी जो बोले।”
“क्यों?” मैंने पूछा।
“क्योंकि जो सबसे पहले बोलेगा,” इलियास ने कहा, “उसके बाद बोलने वाले को सहारा मिलेगा। और मैं पचास साल से सहारे पर जी रहा हूँ — अब एक बार सहारा बनना है।”
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“ठीक है,” मैंने कहा। “सुबह सबसे पहले आप बोलेंगे।”
तभी खिड़की के बाहर फिर टिंकू की आवाज़ आई, इस बार ज़रा हँसी में —
“उस्ताद! वो गाड़ी वापस गई। पर रोशनी अभी भी गली के मुँह पर खड़ी है। कोई और है।”
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने अपना चश्मा उतारा और पोंछा।
“जो भी है,” उन्होंने कहा, “सुबह होते ही सबको पीपल पर पहले आना है। और किसी को कुछ मत बताओ, पर सबको बुला लो।”
मैंने सिर हिलाया। मैंने घंटी को जेब में महसूस किया। वो अब भी हल्की गरम थी। जैसे कोई साँस अभी भी भीतर चल रही हो और रुकने का नाम न ले रही हो।
और उस रात, पूरी गली में सिर्फ़ एक ही आवाज़ गूँजती रही — धीमी, दबी, पर साफ़।
“मैदान। सबके हाथ।”
॥
रोशनी गली के मुँह पर खड़ी थी, और जब मैं दुकान के बाहर आया तो देखा कि वो रोशनी किसी गाड़ी की नहीं थी। वो एक आदमी के हाथ में पकड़ी टॉर्च की थी। और वो आदमी खुद रमेश था।
रमेश। रणवीर का वही ड्राइवर, जो बारह साल उसकी गाड़ी चलाता रहा, जिसकी कलाई पर लाल धागा बँधा था, जिसने सभा में एक पल के लिए रुककर रणवीर की तरफ़ देखा था।
वो अकेला खड़ा था। गाड़ी नहीं थी। कोई साथी नहीं था। सिर्फ़ एक टॉर्च, एक मोटा पीला लिफ़ाफ़ा, और आँखों में वो डर जो सुबह तक सोने नहीं देता।
“रमेश भाई?” मैंने कहा। “इतनी रात?”
वो आगे आया। उसके जूते धूल में चरमराए। उसने टॉर्च नीचे की, ज़मीन पर, जैसे रोशनी किसी की आँख में न पड़े।
“अंकुश भाई,” उसने कहा, “मुझे साहब ने भेजा है। कहा है कि इस वक़्त जाकर उस लड़के को मैदान पर बुला लाओ। अकेले आए।”
“अकेले?” मैंने कहा।
“हाँ। और ये लिफ़ाफ़ा दे देना।”
उसने लिफ़ाफ़ा बढ़ाया। मैंने नहीं लिया। उस्ताद ने पीछे से आकर मेरे कंधे पर हाथ रखा।
“पहले बताओ,” उस्ताद ने कहा, “तुम्हारे साहब इस वक़्त मैदान पर क्यों हैं?”
रमेश का गला सूखा था। वो बोला तो आवाज़ किसी पुराने रेडियो की तरह आई।
“वो सुबह से वहीं हैं। सभा के बाद से गाड़ी में बैठे थे, फिर उतर गए। अब मेज़ के पास खड़े हैं। उन्होंने सारे काग़ज़ मेज़ पर रखवा दिए हैं। और वो सलाहकार साहब… वो गाड़ी के पास ही खड़े हैं, अंदर नहीं आ रहे।”
“सलाहकार साहब कोई कुछ कह रहे हैं?” मैंने पूछा।
“कुछ नहीं,” रमेश ने कहा। “बस खड़े हैं। हाथ जेब में। और साहब से कभी-कभी उनकी तरफ़ देखते हैं, जैसे उन्हें भी इंतज़ार हो कि साहब कब हारें।”
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उस्ताद ने बहुत धीरे सिर हिलाया। वो सिर हिलाना किसी सवाल का जवाब नहीं था, चेतावनी थी।
“ठीक है,” मैंने कहा। “हम चलते हैं। पर एक बात, रमेश भाई।”
“हाँ?”
“तुम उस गाड़ी के साथ बारह साल से हो। तुम्हें पता है साहब क्या हैं?”
रमेश ने नीचे देखा। फिर उसने अपनी कलाई का लाल धागा छुआ।
“मुझे पता है,” उसने कहा। “पर मेरी बेटी की शादी अगले महीने है। और मैं अभी भी उनकी गाड़ी चलाता हूँ।”
“तो आज रात गाड़ी मत चलाओ,” मैंने कहा। “आज रात पैदल चलो। पैदल चलने वाले का कोई मालिक नहीं होता।”
रमेश एक पल रुका। फिर उसने टॉर्च बंद कर दी।
और वो हमारे साथ चल पड़ा।
पीपल के नीचे का मैदान रात में किसी और दुनिया जैसा लग रहा था। सुबह की भीड़ का कोई निशान नहीं। सिर्फ़ वो लंबी मेज़, जिस पर सैकड़ों काग़ज़ पड़े थे, और मेज़ के पीछे एक लालटेन जल रही थी, जिसकी लौ बहुत छोटी थी।
मेज़ के पास रणवीर खड़ा था।
आज उसने सफ़ेद कुर्ता नहीं पहना था। आज वो सिर्फ़ एक सादी शर्ट में था, आस्तीन चढ़ी हुई, और पहली बार उसके कपड़ों पर धूल दिख रही थी। चमकते जूते अब चमकते नहीं थे। मैदान की मिट्टी उन पर जम गई थी।
गाड़ी दस कदम पीछे खड़ी थी। और गाड़ी के दरवाज़े के पास, हाथ जेब में, वो लंबा सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी खड़ा था। वही, जिसे रणवीर “सर” कहता था। उसका चेहरा अंधेरे में था, पर उसकी आकृति इतनी सीधी थी कि लगा कोई पुराना खंभा खड़ा हो।
“आ गए,” रणवीर ने कहा।
“तुम बुला रहे थे,” मैंने कहा।
“हाँ।” उसने मेज़ पर हाथ रखा। “बैठो।”
“मैं खड़ा ठीक हूँ।”
रमेश पीछे रुक गया। उस्ताद मेरे बगल में खड़े रहे। इलियास उस्ताद के दूसरी तरफ़ खड़ा था, कुर्ता कसा हुआ, हाथ जोड़े हुए — न प्रणाम में, बस अपने आप को थामने के लिए।
रणवीर ने मेज़ पर पड़ा एक मोटा काग़ज़ उठाया।
“यह देखो,” उसने कहा। “यह ज़मीन का काग़ज़ है। पुराना। असली। इस पर मेरा नाम है।”
“हमने यह काग़ज़ सैकड़ों बार देखा है,” मैंने कहा।
“नहीं,” उसने कहा। “तुमने सिर्फ़ उसकी नक़ल देखी है। यह असली है। और इस पर लिखा है कि यह ज़मीन ख़ाली पड़ी थी, जब मेरे पिता ने इसे लिया। बिना किसी अंगूठे के। बिना किसी शर्त के।”
उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने नहीं लिया।
“तो?” मैंने कहा।
“तो यह सोचो,” उसने कहा। “जिस ज़मीन पर तुम्हारी गली है, उस ज़मीन के काग़ज़ मेरे पास हैं। और उस ज़मीन के नीचे से एक पुरानी पीतल की घंटी निकली थी, जो आज तुम्हारी जेब में है। यानी वो घंटी मेरी ज़मीन की है।”
मैं एक पल चुप रहा।
फिर मैं हँस पड़ा।
सच में हँसा। इस कदर कि उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
“रणवीर साहब,” मैंने कहा, “आपने आज पूरा दिन काग़ज़ों के साथ बिताया, और अब भी यही सोच रहे हैं कि घंटी ज़मीन से आती है।”
“तो कहाँ से आती है?” उसने पूछा।
“साँस से,” मैंने कहा।
“क्या?”
“साँस से,” मैंने दोहराया। “यह घंटी किसी की ज़मीन से नहीं चलती। यह इस गली की साँस से चलती है। जिस दिन गली चुप हुई, यह चुप हो गई। और जिस दिन गली बोली, इसने आवाज़ दी। और आज मैं आपको साफ़ बता दूँ — आज इस घंटी पर हाथ रखने वाला हर इंसान इसका मालिक है। आपको छोड़कर। क्योंकि आप आज तक इस पर हाथ नहीं रख पाए।”
रणवीर का चेहरा पत्थर जैसा हो गया।
“तुम बहुत शब्द सीख गए हो,” उसने कहा।
“शब्द नहीं साहब, हिसाब सीखा है,” मैंने कहा। “आपने जो सिखाया, वो ठीक से सीखा। आप हर चीज़ को काग़ज़ पर तोलते हैं। तो आज मैं भी तोलूँ?”
मैंने अपना हाथ जेब में डाला। घंटी मेरी उँगलियों में पड़ी। वो गरम थी।
और मैंने उसे बाहर निकाला।
रात में घंटी की पीतल की चमक किसी दीये से कम नहीं लगी। रणवीर ने देखा, और उसकी आँखों में एक पल के लिए वो भूख दिखी जो बीस साल से छिपी थी।
“यह मेरी है,” उसने कहा।
“छोड़ दो,” मैंने कहा।
“यह मेरी है,” उसने दोहराया, और आवाज़ तेज़ हुई।
“छोड़ दो!”
मेरी आवाज़ मैदान में फैल गई।
और उसी वक़्त मुझे पीछे की तरफ़ पैरों की आवाज़ सुनाई दी।
पहले एक। फिर तीन। फिर दस।
मैंने पलटकर देखा।
गली से लोग आ रहे थे। धीरे-धीरे, जैसे गहरे पानी में कदम रखते हुए। आगे-आगे टिंकू और सानिया और गुड्डू और रफ़ीक़ और चिंटू — बच्चों की टोली, जो किसी फ़ौज की तरह नहीं, बस किसी उत्सव की तरह आ रहे थे।
और उनके पीछे — शबनम आपा और रज़िया, दोनों के हाथों में कुछ नहीं, बस बहनें।
उनके पीछे गोविंद भाई, चश्मा टेप से सही किए हुए, हाथ में चाय का गिलास नहीं, सिर्फ़ हाथ।
उनके पीछे भोला भाई, अपनी बेटी आरज़ू का हाथ पकड़े।
उनके पीछे नसीमा बाई, मोला काका, किशनलाल काका, रमेश भाई की बीवी, हबीब चाचा, सुनीता दीदी और उसका बेटा राहुल।
दस, बीस, पचास।
“क्या हो रहा है ये?” रणवीर ने कहा।
“आपने सभा बुलाई थी,” मैंने कहा। “यह गली ने बुलाई है।”
रणवीर ने रमेश की तरफ़ देखा।
“मैंने तुम्हें सिर्फ़ इसको लाने को कहा था!” वह चीखा।
रमेश एक कदम आगे आया। उसने टॉर्च फेंक दी। उसने कलाई का लाल धागा खोला और जमीन पर गिरा दिया।
“साहब,” रमेश ने कहा, “मैंने माँ की दवा के लिए, बेटी की शादी के लिए, बारह साल आपकी गाड़ी चलाई। पर आज आपने जो किया, वो गाड़ी के पहियों से भी नहीं कटेगा। आपने मेरे बच्चों के सामने मुझे झूठा बनाया। अब मैं पैदल हूँ। और पैदल आदमी को कोई गिरा नहीं सकता।”
भीड़ में धीरे-धीरे फुसफुसाहट फैलने लगी।
और तभी इलियास आगे आया।
वो मेज़ के सामने आया, मेरे और रणवीर के बीच, और उसने घुटनों को थोड़ा लचक होने दिया, जैसे पचास साल का सफ़र एक ही जगह पर खड़े होकर काटा हो।
उसने भीड़ की तरफ़ देखा।
“भाइयों, बहनों,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ सूखी थी पर साफ़। “मेरा नाम इलियास है। मैं उस्ताद अली बक्श का छोटा भाई हूँ। पचास साल से लोग मुझे मरा हुआ मानते थे। आज मरा हुआ आदमी आपके सामने खड़ा है।”
भीड़ चुप हो गई।
“बाईस साल पहले,” इलियास ने कहा, “इस गली के लोगों ने एक घंटी बनाई थी। नहीं, घंटी नहीं बनाई थी। घंटी मिली थी। पुरानी, बिना जीभ की, बिना नाम की। और जब गली के बुज़ुर्गों ने उसे बजाया, तो वो बजी। बिना जीभ के बजी। और उसने बातें कहीं। और सबने सुना।”
कुछ लोगों ने सिर हिलाया। कुछ ने नीचे देखा।
“उस घंटी में कोई जादू नहीं था,” इलियास ने कहा। “उसमें गली थी। जिस दिन गली में किसी का कोई टूटा रिश्ता जुड़ता, घंटी की जीभ खुद-ब-खुद सीधी हो जाती। उसे कोई हाथ लगाता, तो वो गरम हो जाती। और जो लोग उसे हाथ से देखते, उनके दिल की बात उस पर उभर आती।”
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उस्ताद ने आँखें बंद कर लीं। उनके होंठ हिल रहे थे, जैसे पचास साल का हिसाब मन में जोड़ रहे हों।
“और फिर मैं आया,” इलियास ने कहा।
या फिर उसने कहा — मैं आया — ऐसा कि पूरा मैदान साँस लेना भूल गया।
“मेरी बीवी बीमार थी,” इलियास ने कहा। “दवा के पैसे नहीं थे। भाई की दुकान से कुछ हटाया नहीं था, पर हटाने की नीयत पैदा हो गई थी। और उस नीयत को एक आवाज़ ने पकड़ लिया। मीठी आवाज़। एक सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी मेरे पास आया और उसने कहा — इलियास भाई, इस घंटी की जीभ मेरे हवाले कर दो, तुम्हारी बीवी का इलाज मेरी ज़िम्मेदारी।”
भीड़ में कोई औरत सिसक उठी।
“मैंने नहीं पूछा कि क्यों,” इलियास ने कहा। “मैंने यह भी नहीं पूछा कि तुम इसे क्यों चाहते हो। मैंने बस एक सवाल पूछा — कब तक? और उसने कहा — एक रात में। मैंने वो रात मान ली।”
उसने मेरी तरफ़ देखा।
“अंकुश, घंटी की आधी जीभ आज तेरी जेब में है। वो उस रात मैंने निकाली थी। सोचा था, आधी जीभ का कोई मोल नहीं। बिना जीभ वाली घंटी भी चुप हो जाएगी, कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। पर वो फ़र्क पड़ा। उस रात से घंटी की आवाज़ फीकी पड़ गई। गली के लोग जुड़ने लगे, पर जल्दी तोड़ने भी लगे। और उसी रात के बाद से —”
उसने रुककर साँस ली।
“उसी रात के बाद से इस गली में हर जोड़ धीमा हो गया। हर माफ़ी में देर होने लगी। हर रिश्ते के बीच एक आवाज़ फुसफुसाने लगी — बाद में करेंगे। आज नहीं। कल। मैं उसी को बीस साल से सुनता रहा। मरने के लिए दूसरे शहर चला गया, पर वो आवाज़ मेरे साथ चली।”
अब उसने रणवीर की तरफ़ देखा।
“और आज मैं आपसे एक बात कहता हूँ,” इलियास ने कहा। “आपने मुझे पैसा दिया था, पर आपने मुझे यह नहीं बताया कि आप मेरी गली को बीस साल के लिए चुप करा रहे हैं। यह मेरी ग़लती है, यह मैंने स्वीकार किया। पर आपकी ग़लती कहाँ जाएगी?”
रणवीर ने होंठ हिलाए, पर आवाज़ नहीं निकली।
और तभी एक बूढ़ी औरत भीड़ से आगे आई। सत्तर से ऊपर, सफ़ेद बाल, संदूक से निकली साड़ी, और हाथ में कुछ नहीं। उसने अपना हाथ उठाया, जैसे इलियास को मारेगी।
“तूने हमारी गली को बेच दिया!” वो चीखी।
इलियास ने अपनी आँखें नहीं बंद कीं। उसने सिर नीचे किया और हाथ पीछे कर लिए।
मैदान में साँस थम गई।
फिर उस्ताद आगे आए।
वो अपने भाई के बगल में खड़े हुए, वैसे ही जैसे पचास साल पहले खड़े होंगे। उन्होंने अपना हाथ बूढ़ी औरत की तरफ़ बढ़ाया, धीरे से, अपनी उँगलियाँ खोलकर, जैसे कोई बर्तन का गिरता हुआ ढक्कन पकड़ता हो।
“बहन जी,” उस्ताद ने कहा, “हाथ मेरे भाई पर उठा। यह मेरा भाई है। इसकी ग़लती की सज़ा आज पचास साल बाद मैं खुद भुगत रहा हूँ। मैंने इसे मरा हुआ मान लिया था, क्योंकि मुझे यह मानने में आराम था। अगर मैंने उस रात इससे एक सवाल पूछ लिया होता, तो यह गली बीस साल जल्दी जुड़ जाती।”
बूढ़ी औरत का हाथ नीचे आ गया।
“बस इतना कह देती हूँ,” उसने कहा, “कि जो आज सच बोला है, उसका अंगूठा किसी काग़ज़ पर न लगे।”
भीड़ में तालियाँ नहीं बजीं। गली में तालियाँ पहेली के बाद बजती हैं, सच के बाद नहीं। सच के बाद सन्नाटा होता है, और फिर धीरे-धीरे लोग एक-दूसरे की तरफ़ देखते हैं, और पहली बार लगता है कि यह सन्नाटा भी एक आवाज़ है।
मैंने घंटी उठाई।
“उस्ताद,” मैंने धीरे से कहा, “आधी जीभ।”
उस्ताद ने इलियास की तरफ़ देखा। इलियास ने अपनी जेब से कुछ निकाला। वो कुछ एक छोटी पोटली में लिपटा था — मैला कपड़ा, पीला धागा। उसने मेरे हाथ पर रख दिया।
“यह उस रात से मेरे पास थी,” इलियास ने कहा। “मैं इसे फेंक नहीं पाया। हर बार फेंकने जाता, तो लगता कोई भीतर से रोक रहा है।”
मैंने पोटली खोली।
यह अब भी पीतल ही थी। बहुत छोटी। बाल जितनी पतली, पर घंटी की भीतरी बनावट में एकदम फिट हो जाने वाली। मैंने उसे घंटी के भीतर के खाली हिस्से के पास लाया, और मेरे हाथ काँप रहे थे।
“उस्ताद,” मैंने कहा, “मैं यह अकेले नहीं जोड़ूँगा।”
उस्ताद ने मेरे हाथ पर हाथ रखा।
“तू ठीक कहता है,” उन्होंने कहा। “यह अकेले का काम नहीं।”
उन्होंने भीड़ की तरफ़ देखा।
“भाइयों, बहनों,” उन्होंने कहा। “मेरे पास पचास साल का हिसाब है, और उसका सबसे भारी सच यह है — यह घंटी एक हाथ से नहीं जुड़ती। दो हाथों से भी नहीं। इसे गली के हाथ चाहिए। जो भी इस गली में रहता है, जो भी इस गली से पानी पीता है, जो भी इस गली से बीमार हुआ, जो भी इस गली में ठीक हुआ, जो भी इस गली में रोया और फिर हँसा — सबके हाथ।”
पहले किसी ने हाथ नहीं बढ़ाया।
फिर गोविंद भाई आगे आए।
वो मेरे सामने आकर खड़े हुए। उनके हाथ काँप रहे थे, पर वो काँपना आज पहली बार कमज़ोरी नहीं लग रहा था। उन्होंने अपना हाथ घंटी पर रखा और उनकी हथेली पीतल से चिपक गई, जैसे कोई पुराना दोस्त दोस्त को पहचान लेता है।
“मैंने इस गली को काग़ज़ों पर बेचा,” गोविंद भाई ने कहा, और उनकी आवाज़ टूटी। “मुझे माफ़ कर दो।”
और उनके बाद भोला भाई आए, अपनी बेटी आरज़ू का हाथ अलग करके, खुद अकेले। उन्होंने हाथ नहीं रखा। उन्होंने पहले घुटने टेके।
“मैंने चुप रहकर अपनी बेटी की दवा बचाई,” उन्होंने कहा। “आज से वो दवा नहीं लूँगा। गली की दवा पहले।”
शबनम आपा आईं और उन्होंने अपनी चिमटी जमीन पर रखी।
“मैंने अपनी बहन से पंद्रह साल बात नहीं की,” उन्होंने कहा। “आज से यह चिमटी गुमटी में नहीं रहेगी, जब तक मेरी बहन के हाथ में न आए।”
रज़िया हँस पड़ीं, और वो हँसी इतनी छोटी थी कि लगा किसी बच्चे ने पहली बार आँख खोली हो।
फिर नसीमा बाई आईं। फिर किशनलाल काका। फिर रमेश भाई की बीवी, जिनकी किडनी में पत्थर था और जिन्होंने बाल्टी उठाकर कहा कि आज से पानी का हिसाब हम खुद रखेंगे।
फिर हबीब चाचा। फिर सुनीता दीदी और राहुल। फिर मोला काका। फिर वो बूढ़ी औरत जिसने इलियास पर हाथ उठाया था — उसने खुद अपना हाथ घंटी पर रखा और फिर इलियास के कंधे पर भी।
एक-एक करके हाथ बढ़ते गए। दस, पचास, सौ। बच्चे अपनी छोटी हथेलियाँ रख रहे थे, और हर नई हथेली पर घंटी की चमक कुछ और बढ़ रही थी।
मैंने मेज़ पर पड़े काग़ज़ों की तरफ़ देखा। और मुझे कुछ अजीब दिखा — जैसे हर काग़ज़ के पीछे कोई खड़ा हो। कोई आदमी, कोई औरत, कोई बूढ़ा, कोई बच्चा। सब चुप। पर वो चुप्पी काग़ज़ों की नहीं, लोगों की थी।
वो किसी और दुनिया के नहीं थे। वो उसी गली के थे जो आज मुझे दिखाई दे रहे थे — वो सब जिनके नाम किसी काग़ज़ पर लिखे गए, और जिन्होंने कभी अंगूठा नहीं लगाया।
अब मेरे हाथ में घंटी थी, और मेरी हथेली पर आधी जीभ। और उस्ताद का हाथ मेरे हाथ के ऊपर।
“अब जोड़,” उस्ताद ने धीरे कहा।
मैंने जोड़ी।
एक पल के लिए पूरा मैदान सन्न हुआ, और फिर घंटी बजी। पर यह कोई साधारण आवाज़ नहीं थी। यह पीतल की नहीं लग रही थी। यह किसी पुराने मंदिर की घंटी जैसी थी, जिसे कोई पचास साल बाद पहली बार छूता हो। वो आवाज़ मेरे कानों से सीधे सीने में उतरी, और सीने से पैरों तक, और पैरों से ज़मीन में। वो मैदान के पार गई, पीपल से टकराकर लौटी, और फिर तालाब तक।
तालाब की तरफ़ से हवा आई। उसमें पानी की गंध थी और उसमें वो महक थी जो बारिश के बाद आती है। मैदान में खड़े लोगों के चेहरे बदल गए।
रमेश ने अपने कानों को नहीं छुआ।
रणवीर ने छुए।
उसने दोनों हाथ अपने कानों पर रख लिए, और उसका चेहरा ऐसा हुआ जैसे कोई बहुत गहरे पानी में चला गया हो। और फिर मैंने देखा — उठाया हुआ पत्थर छूट गया। वो पत्थर जिसे वो आख़िरी बार उठाने आया था, या जिसे वो मेज़ पर से उठाकर मेरी तरफ़ फेंकने आया था — याद नहीं कब उसने उठाया। वो पत्थर उसके हाथ से गिरा और उसकी उँगली से छूटकर मिट्टी में लुढ़क गया।
तभी उसकी हथेली पर वो नीली लकीर दिखी।
वो जल रही थी। सच में जल रही थी — जैसे किसी ने उसकी हथेली पर खींचकर आग लगा दी हो। रणवीर ने हाथ पीछे खींचा, और उसके होंठों से कोई शब्द नहीं निकला, सिर्फ़ आवाज़ निकली, एक लंबी, दबी हुई, जैसे कोई भीतर से चीख रहा हो।
मैंने उसकी तरफ़ एक कदम बढ़ाया।
“रणवीर,” मैंने कहा।
अब भी उसके कान बंद थे। वो मुझे सुन नहीं रहा था। पर फिर भी उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं और उनमें नफ़रत नहीं थी — डर था।
“आज तुमने बहुत जोड़ लिया,” उसने धीरे कहा, जैसे खुद से कह रहा हो।
“अभी तो शुरू किया है,” मैंने कहा।
रणवीर ने हाथ नीचे किए।
और तभी मेज़ पर पड़े काग़ज़ों के पीछे की परछाइयाँ हिलने लगीं।
मैंने देखा — किशनलाल काका के काग़ज़ के पीछे एक औरत खड़ी थी, जो उनकी बीवी थी, जो दो साल पहले चल बसी थी और जिसके नाम कुछ नहीं लिखा गया। भोला भाई के काग़ज़ के पीछे एक बूढ़ा खड़ा था, जो उनके पिता थे। नसीमा बाई के काग़ज़ के पीछे एक जवान लड़का — उनका बेटा साजिद — जो दो काग़ज़ों पर दो बार अंगूठा लगा चुका था और अब सामने खड़ा था, काँपता हुआ, और उसने अपना हाथ उठाया।
“ये मेरा है,” साजिद ने कहा। “और मैंने इसे नहीं बेचा।”
एक-एक करके लोग आगे आने लगे। हर काग़ज़ के पीछे खड़ा आदमी अपना नाम बोलता, अपना हिसाब बताता — और फिर अपना काग़ज़ उठाकर अपने सीने से लगाता।
“यह रमेश कुमार भार्गव का है, और मैंने इसे नहीं बेचा।”
“यह भोला प्रसाद का है, और मैंने इसे नहीं बेचा।”
“यह उस्ताद अली बक्श की दुकान का है, और मैंने इसे नहीं बेचा।”
“यह नूर अस्पताल की ज़मीन का है, और यह किसी के बाप की नहीं, इस गली की है।”
और फिर आख़िरी काग़ज़ — जो सबसे ऊपर था, जिस पर शंकरलाल यादव का नाम लिखा था — वो मेरे पापा ने उठाया।
वो भीड़ में से आए थे, बिना किसी को बताए। उन्होंने काग़ज़ उठाया और उसे सीने से लगाया। उनकी आँखें भरी थीं, पर आवाज़ साफ़ थी।
“यह शंकर यादव का नाम है,” उन्होंने कहा। “और इस पर अंगूठा मेरा है। पर मैंने इसे नहीं बेचा। मैंने इसे डर में दिया था। और डर को अंगूठा नहीं कहते। डर को डर कहते हैं।”
उन्होंने काग़ज़ को आधा फाड़ दिया, फिर पूरा। और फिर उसकी छोटी-छोटी परतें हवा में उड़ गईं।
उस वक़्त गाड़ी के दरवाज़े पर खड़े उस लंबे सफ़ेद कुर्ते वाले आदमी ने पहली बार हिलना शुरू किया। उसने अपना हाथ जेब से निकाला, और मैंने देखा कि उसकी उँगली पर कुछ नहीं था। न काली अंगूठी, न कोई छल्ला। सिर्फ़ एक लंबी सफ़ेद उँगली, जो अंधेरे में लकड़ी जैसी लग रही थी।
उसने रणवीर की तरफ़ देखा।
“साहब,” उसने कहा, “अब हम चलें।”
रणवीर ने उसे देखा।
“तुम?” उसने कहा।
“मैं,” उसने कहा। “अब देर हो रही है।”
और रणवीर हँसा। पर वो हँसी पहली बार किसी बात पर नहीं, खुद पर थी।
“बीस साल मैंने तुम्हारी सुनी,” रणवीर ने कहा, “और आज तुम हमें ‘साहब’ कहकर छोड़ रहे हो?”
“मैं तो सिर्फ़ सलाह देता हूँ,” उसने कहा। “सलाह देने वाले को साथ नहीं जाना पड़ता।”
वो गाड़ी में बैठ गया। गाड़ी स्टार्ट हुई और गली के मुँह की तरफ़ मुड़ गई।
रणवीर खड़ा रह गया।
और उसी वक़्त पीछे से जीप आई।
दुबे अंकल जीप से उतरे, पीछे दो सिपाही, और आगे दरोगा।
“रणवीर भारद्वाज,” दरोगा ने कहा। आवाज़ में कोई तमाशा नहीं था। “आपके ख़िलाफ़ ज़मीन के काग़ज़ों में गड़बड़ी, अस्पताल की ज़मीन पर ज़बरदस्ती का मामला और स्कूल में आग के आरोप हैं। चंद्रेश सक्सेना के ख़िलाफ़ भी वही शिकायत है। आप दोनों साथ चलिए।”
चंद्रेश कब आया, मुझे पता नहीं चला। वो गाड़ी की छाया में खड़ा था, सफ़ेद कुर्ता उतारकर, सिर्फ़ एक सादी कमीज़ में। उसके हाथ में कोई फाइल नहीं थी। पहली बार।
“मैं इस गली का नहीं हूँ,” चंद्रेश ने कहा, जैसे किसी को सफ़ाई दे रहा हो।
“अब नहीं रहेंगे,” दरोगा ने कहा।
रणवीर को जीप की तरफ़ ले जाया जाने लगा।
और मैंने देखा — उसकी हथेली फिर चमकी। उसकी नीली लकीर जीप की लाल बत्ती में और साफ़ दिखी।
मैं एक कदम आगे गया।
“रणवीर,” मैंने कहा।
वो रुका।
“वो लकीर क्या है?”
उसने अपना हाथ देखा। फिर उसने देखा, और पहली बार उसकी आँखों में कुछ और था — वो नहीं जो अक्सर था। वो शायद डर नहीं था। वो शायद सच था।
“पता नहीं,” उसने कहा। “कभी ज़्यादा जलती है, कभी कम। पहली बार जब जली, तो मैं बारह साल का था। मेरे पिता की दुकान जल गई थी। और मैंने उस रात एक घंटी के टूटे हिस्से को जला हुआ पीतल समझकर जेब में रख लिया था। मैंने कभी उसे बेचा नहीं। कभी फेंका नहीं। और तब से ये लकीर है।”
मैं कुछ नहीं बोला।
“आज तुमने बहुत जोड़ लिया,” उसने कहा, और इस बार वो मुस्कुराया। पर वो मुस्कान नहीं थी, कोई पुरानी आदत थी, जो अब बेकार हो चुकी थी। “अब इसे सँभालकर रखना। और याद रखना — जो जोड़ता है, वहीं सबसे पहले जलता है।”
वो जीप में बैठ गया।
जीप के पीछे का शीशा फ़ौरन ऊपर नहीं चढ़ा। रणवीर हमारी तरफ़ देख रहा था। और शीशे में उसकी हथेली की नीली लकीर अब भी ज़िंदा दिख रही थी — धीरे-धीरे, जैसे कोई आग जले और न पता चले।
जीप चली गई।
और फिर मैदान में सन्नाटा छा गया — पर वो सन्नाटा डर का नहीं था। वो सन्नाटा उस तरह का था जो किसी लंबी बीमारी के बाद पहली सुबह में होता है, जब आदमी जागकर देखता है कि सूरज अब भी निकलता है।
मैंने घंटी को जेब में रखा। वो अब ठंडी नहीं थी। वो हल्की गरम थी, पर पहली बार उस गरमाहट में डर नहीं था। वो गरमाहट किसी अपने के हाथ जैसी थी।
उस्ताद मेरे पास आए।
“अब घर चल,” उन्होंने कहा। “और सुनो — कल सुबह जो होगा, उसके भी दो हाथ होंगे।”
“कौन से?” मैंने पूछा।
“पहला हाथ तेरा,” उन्होंने कहा, “और दूसरा तेरी गली का।”
मैं मुस्कुराया।
और उस वक़्त मैंने घंटी को जेब में रखते हुए अंदर से आवाज़ आती सुनी। पर वो अब भी पूरी नहीं थी। वो आधी थी।
“डर मत,” घंटी ने कहा। “अभी और एक जोड़ बाकी है।”
मैं रुक गया।
“कौन सा जोड़?” मैंने पूछा।
पर घंटी चुप हो गई।
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चमक लौट आई थी जो सुबह तक बुझी थी। इलियास मेरे पीछे खड़ा था और अपने आँसू बिना पोंछे खड़ा था। शबनम आपा रज़िया का हाथ पकड़े खड़ी थीं और रज़िया की हरी चूड़ी आज रात पूरी लग रही थी।
तभी पीपल की डाल पर कुछ फड़फड़ाया — कोई पक्षी, या हवा — और एक पत्ता गिरा। वो सूखा था, पर उस पर कुछ लिखा नहीं था।
मैंने उसे उठाया। मैंने उसे उंगलियों में घुमाया, और पत्ते की पीठ पर एक छोटा सा निशान था — दो लकीरें और बीच में एक बिंदु।
मैंने उस्ताद को दिखाया।
“यह क्या है?” मैंने पूछा।
उस्ताद ने उसे देखा। फिर उन्होंने पीपल की डाल की तरफ़ देखा, और उनका चेहरा बदल गया।
“यह किसी काग़ज़ पर बना नहीं है,” उन्होंने कहा। “यह पेड़ पर है।”
“मतलब?” मैंने पूछा।
“मतलब,” उस्ताद ने धीरे से कहा, “कि अब यह निशान सिर्फ़ यादों में नहीं, इस गली की जड़ों में भी है। और जब निशान जड़ों तक पहुँच जाए, तो फिर कोई उसे काट नहीं सकता।”
मैंने पत्ता जेब में रखा।
और जब मैं घर की तरफ़ चला, तो मेरे पीछे पूरी गली चल रही थी — कोई अपनी दुकान की तरफ़, कोई अपने घर की तरफ़, कोई गुमटी की तरफ़। और वो चलना पहली बार ऐसा लगा जैसे कोई गली अभी-अभी जागी हो।
और मैंने आख़िरी बार पलटकर मैदान देखा — लंबी मेज़ खाली थी। काग़ज़ नहीं थे। हर काग़ज़ अपने इंसान के साथ चला गया था। सिर्फ़ लालटेन जल रही थी, और उसकी लौ धीरे-धीरे छोटी हो रही थी।
और उसी वक़्त घंटी ने आख़िरी बार उस रात कुछ कहा। बहुत धीरे, बहुत छोटा, पर साफ़।
“अब घर जा। माँ जाग रही है।”
मैं दौड़ पड़ा।
॥
मैं दौड़ा। साँस फूल रही थी, चप्पलें उतर जाती थीं पर मैं रुका नहीं। गली के मोड़ पर पत्थर की चबूतरी थी, वहाँ कोई बैठा नहीं था। पीपल का पत्ता जेब में था और घंटी भी, और दोनों एक साथ हल्के-हल्के गरम थे, जैसे दो बुज़ुर्ग हाथ थके हुए आदमी के कंधे पर रख दिए गए हों।
घर का दरवाज़ा खुला था। आँगन में बल्ब जल रहा था और उसकी पीली रोशनी में माँ चारपाई पर बैठी थीं। काजल उनके पास बैठी थी, हाथ में पानी का गिलास, और माँ का दुपट्टा कंधे से खिसका हुआ था।
मुझे देखते ही माँ ने कुछ नहीं पूछा। बस हाथ बढ़ाया।
मैं उनके पास बैठ गया।
“सब ठीक?” उन्होंने पूछा।
“सब ठीक,” मैंने कहा।
“काग़ज़?”
“सब अपने-अपने आदमी के पास,” मैंने कहा। “मेज़ खाली है।”
माँ ने आँखें बंद कर लीं। कुछ देर ऐसे ही बैठी रहीं, जैसे कोई बहुत भारी बोरी सिर से उतर गई हो और शरीर अभी उस वज़न के बिना अच्छे से खड़ा न हो पा रहा हो।
“और रणवीर?” काजल ने धीरे से पूछा।
“दरोगा ले गए,” मैंने कहा। “चंद्रेश भी साथ है।”
“और वो सफ़ेद कुर्ते वाला?”
मैं चुप रहा।
“बोल ना,” काजल ने कहा।
“भाग गया,” मैंने कहा। “पर उसने एक बात कही, जो मुझे अंदर तक चुभ गई।”
“क्या?”
“कि वो सिर्फ़ सलाह देता है।”
माँ ने आँखें खोलीं। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो बीमारी में भी नहीं बुझी थी — हिसाब की आँख।
“जो सिर्फ़ सलाह देता है,” उन्होंने कहा, “वही सबसे ज़्यादा लेता है।”
मैंने सिर हिलाया। माँ ने मेरा सिर पकड़कर अपने माथे से लगाया। उनका माथा गरम था। बुखार का गरम नहीं, थकान का।
“अब सो जा,” उन्होंने कहा। “कल दो बजे दफ़्तार जाना है।”
“आप भी सोइए।”
“मैं सोई तो अपने बेटे के हाथ में घंटी देखकर ही सोऊँगी,” उन्होंने कहा और हल्का मुस्कुराईं। “देख, ये जो मैंने कहा, ये किसी कहानी की लाइन नहीं है। ये बस मेरी बात है।”
मैं हँस पड़ा। बहुत दिनों बाद ऐसे हँसा जब हँसी के पीछे कुछ छिपाना नहीं था।
वो रात बाकी रातों से अलग थी। गली में कोई शोर नहीं था, पर सन्नाटा भी नहीं था। दूर गुमटी की तरफ़ से किसी के बर्तन की आवाज़ आ रही थी, और कहीं कोई बच्चा सपने में कुछ बड़बड़ा रहा था। मैं चारपाई पर लेटा और मैंने घंटी को तकिये के नीचे नहीं, अपनी मुट्ठी में रखा।
घंटी चुप थी। पर उस चुप्पी में डर नहीं था। वो चुप्पी उस तरह की थी जैसे कोई थका हुआ आदमी सामने बैठकर आँखों से यह कह रहा हो — अब तू बोल, मैं सुनता हूँ।
सुबह मैं उठा तो घंटी मेरी मुट्ठी में ठंडी थी और मेरी उँगलियों पर हल्का हरा निशान छूट गया था, जैसे पीपल का कोई बहुत छोटा पत्ता रात भर मेरे हाथ में रहा हो।
और फिर वक़्त ने अपनी चाल बदल दी।
वही चाल जो इंसान के हाथ से फिसलती है और अचानक कहीं और पहुँचा देती है। मैंने उसे रोका नहीं।
सुनो, मैं तुम्हें वो दिन नहीं सुनाऊँगा जिस दिन दफ़्तार गया। वो दिन सूखा था — काग़ज़, मुहर, दो हस्ताक्षर, और एक बाबू जिसने मेरा नाम तीन बार गलत लिखा। वो दिन न तुम्हारे काम का है, न मेरे। मैं तुम्हें उस सुबह पर ले चलता हूँ जो मुझे आज भी रोज़ जगाती है।
कुछ हफ़्ते बाद की सुबह।
मैं दुकान का शटर उठाता हूँ और मुझे लगता है कि मैं किसी और शहर में आ गया हूँ।
गली वही है। पीपल वही है। चबूतरी वही है। पर कुछ बदला है और वो बदलाव आवाज़ों में है।
पहले सुबह की गली में एक डर होता था — कि आज किसकी दुकान का शटर आधा गिरा मिलेगा, किसके घर पर कौन सा काग़ज़ आएगा। अब वो डर नहीं है। अब सुबह की गली में सिर्फ़ सुबह है — कोई बाल्टी भर रहा है, कोई झाड़ू लगा रहा है, कोई बच्चा जूता ढूँढ रहा है।
और अस्पताल के पीछे वाली जगह।
वहाँ अब बोरियाँ नहीं हैं। वो बीस बोरी सीमेंट, वो मशीन, वो ट्रक — सब उठ गए हैं। ज़मीन पर अब भी उनके निशान हैं, चौकोर गड्ढे और टायर की लकीरें, पर उनके ऊपर मिट्टी डाल दी गई है। और उस मिट्टी में अब छोटे-छोटे पौधे लग रहे हैं।
मुझे हँसी आती है जब मैं सोचता हूँ कि जिस जगह पर नई इमारत बननी थी, वहाँ अब एक बगीचा बन रहा है। रणवीर के सपने में उस जगह पर काँच की दीवारें थीं। अब वहाँ मिट्टी है, और मिट्टी में उँगली डालने पर वो गीली है।
इस काम की सबसे बड़ी मज़ेदार बात यह है कि बगीचा किसी ने बनाया नहीं। वो अपने आप बना।
पहले किसी ने गमला रख दिया — किसने, पता नहीं। फिर कोई किसी और का गमला पानी देने लगा। फिर बच्चों ने एक पौधा लगाया, और उस्ताद ने कहा कि इसकी जड़ के पास ईंट का घेरा बनाओ, वरना पानी फैल जाएगा। फिर डॉक्टर इसरानी ने अस्पताल की खिड़की से देखकर कहा कि जो पौधा दिखे, उसे रोज़ एक गिलास। बस।
आज उस जगह पर दो दर्जन से ज़्यादा गमले हैं। एक कैरी का, एक नीम का, दो तुलसी के, एक जिसका नाम किसी को नहीं पता — कहते हैं वो भोला भाई की बीवी की बगिया से आया है, और वो पौधा सबसे ज़्यादा दवा जैसा दिखता है।
माँ का हिस्सा इस बगीचे में सबसे पहला था, और मुझे यह बताने में शर्म नहीं आती कि उन्होंने उस पहले गमले में मेरा नाम लिखकर रख दिया था, जब मैं सो रहा था। जब मैं जागा और देखा, तो मैंने कहा — माँ, ये क्या है? और उन्होंने कहा — अगर वो पौधा मर गया तो तेरा नाम मिटा देंगे, इसलिए सँभालकर रखना।
मैंने कहा, “आपने तो दबाव डाल दिया।” और वो हँसकर बोलीं, “अब तू इतना बड़ा काम कर रहा है, तो एक पौधा नहीं सँभाल सकता?”
वो पौधा ज़िंदा है। मैं रोज़ उसे देखता हूँ। और मैं तुम्हें सच बता रहा हूँ — उसे देखकर मुझे कभी-कभी वैसा ही लगता है जैसे घंटी बजने पर होता था। बस इसमें कोई आवाज़ नहीं आती।
अच्छा, माँ की बात। सीधी बात।
माँ पूरी तरह ठीक नहीं हैं। मैं तुमसे यह साफ़ कह रहा हूँ, क्योंकि ऐसी कहानियों में लोग कह देते हैं कि सब ठीक हो गया, और यह झूठ होता है। उनका इलाज चल रहा है। दवा चल रही है। महीने में एक बार जाँच है। थोड़ी देर चलने पर साँस फूलती है, और मौसम बदलने पर खाँसी आ जाती है।
पर वो बेहतर हैं। और यही मेरे लिए बहुत है।
डॉक्टर इसरानी आज सुबह आए। वही पुराना टेप लिपटा स्टेथोस्कोप, वही चश्मा जो नाक पर फिसलता है, वही आदत जाँचने के बाद कुछ देर चुप बैठने की।
वो उस स्टेथोस्कोप को कान से उतारकर उसे हथेली में लपेट रहे थे, जैसे कोई पुरानी नसीहत समेट रहा हो।
“सुशीला जी,” उन्होंने कहा, “सीने की आवाज़ पहले से साफ़ है।”
“तो ठीक हो गई?” काजल ने बड़ी आँखों से पूछा। काजल नर्सिंग पढ़ रही है, यह जानती है कि यह सवाल ऐसे नहीं पूछा जाता, पर घर में डॉक्टर हो तो सवाल बच्चों जैसे ही निकलते हैं।
डॉक्टर इसरानी हँसे। उनकी हँसी में उम्र की धूल थी और आँखों में पुरानी गर्मी।
“बेटी, ठीक होने का जवाब दवा नहीं देती,” उन्होंने कहा। “जवाब वक़्त देता है, और वक़्त को हम कभी जल्दी नहीं करा सकते। दवा चलती रहेगी। जाँच हर महीने। और हाँ — मन बढ़िया रहे, यह तुम सबका काम है। मेरा काम दवा का है, तुम्हारा काम इसे हँसाने का।”
माँ ने उनकी तरफ़ देखकर कहा, “डॉक्टर जी, आप इतना बता गए, मुझे लगता है यही काफ़ी है।”
“क्या काफ़ी है?” डॉक्टर ने पूछा।
“यही कि नौ बजे की सुई फिर देखनी है,” माँ ने कहा। “मुझे लगता था यह नहीं दिखेगी।”
मैंने अपना मुँह दुकान की तरफ़ घुमा लिया, क्योंकि उस वक़्त मेरा चेहरा किसी को दिखाने लायक नहीं था।
डॉक्टर इसरानी उठे। दरवाज़े पर रुककर उन्होंने कहा, “एक बात कहूँ?”
“कहिए,” मैंने कहा।
“अब वो काग़ज़ उस दीवार पर नहीं टँगेगा,” उन्होंने कहा, “जिस पर अंगूठे का निशान था। मैंने उस दीवार को खुरचकर फिर पीला पुतवा दिया है। और जानते हो, पीली दीवार पर एक दरार थी न — पोस्टर के किनारे से नीचे जाती हुई?”
“जी,” मैंने कहा।
“वो पुताई के नीचे आ गई है,” उन्होंने कहा। “और मेरी बीवी कहती थी, पीली दीवार पर दरार कभी नहीं दिखनी चाहिए। अब नहीं दिखती।”
वो चले गए।
काजल ने मेरी तरफ़ देखा और बोली, “आप रो रहे हैं?”
“नहीं,” मैंने कहा। “चूना है।”
“कहाँ?”
“आँख में।”
“क्या बात कर रहे हैं, आप तो दीवार को ही नहीं छू रहे।”
“तो फिर हवा में है,” मैंने कहा। “तेरी नर्सिंग की किताब में लिखा होगा कि हवा में चूना हो सकता है।”
वो हँस पड़ी। और माँ भी हँसीं। और उस हँसी में मुझे घंटी की आवाज़ जैसी कोई गूँज सुनाई दी, पर घंटी उस वक़्त मेरी जेब में चुप थी। कभी-कभी आदमी को कुछ ऐसा सुनाई देता है जो बजता नहीं। उसे पुरानी आदत कहो या नई समझ।
अब गुमटी की तरफ़ चलो।
शबनम आपा और रज़िया अब मिलकर गुमटी चलाती हैं। मुझे यह कहने में मज़ा आता है कि गुमटी अब नाम से नहीं, नामों से चलती है — मतलब, दोनों बहनें सामने खड़ी रहती हैं, एक चिमटी संभालती है और दूसरी प्याली।
रज़िया शुरू में बाहर आने से घबराती थीं। पंद्रह साल का डर सिर्फ़ दरवाज़े पर नहीं, आदमी के अंदर भी होता है। पहले दिन वो गुमटी के पीछे खड़ी रहीं, बर्तन धोती रहीं। दूसरे दिन शबनम आपा ने उन्हें चिमटी पकड़ा दी।
“मैं पकड़ूँ?” रज़िया ने कहा।
“तू नहीं तो कौन?” शबनम आपा ने कहा। “मैं पचास बरस चिमटी पकड़ चुकी हूँ। अब जलाने का नंबर तेरा है।”
अब क्या है कि शाम को गली का सबसे ज़्यादा हँसी वाला शोर गुमटी से आता है। और एक नई आदत पड़ गई है, जिसका हिसाब गली के लोग बड़े प्यार से रखते हैं — दिन की पहली चाय की प्याली। वो किसी को पिलाई नहीं जाती।
शबनम आपा उसे गुमटी से बाहर लाती हैं, और पीपल की तरफ़ उठाकर फेंक देती हैं।
पहली बार देखकर मैंने पूछा था, “आपा, ये क्या है? चाय की बर्बादी?”
“यह भी कोई पूछने की बात है?” उन्होंने कहा। “यह मैं पीपल को देती हूँ, क्योंकि उसने चालीस साल मेरी चुप्पी सही है। और हाँ, मैं उसे चाय नहीं दे रही। मैं उसे बता रही हूँ कि आज भी चूल्हा जल गया।”
“तो चाय क्यों?”
“क्योंकि चूल्हा जलने की खबर के साथ कुछ चढ़ाना पड़ता है,” उन्होंने कहा। “समोसा ज़्यादा पड़ता तो महँगा सौदा हो जाता।”
रज़िया उनके पीछे हँसती रहीं।
इस गली की एक और बात — आज किसी के घर में चूल्हा जलता है तो कोई बिना पूछे आ जाता है, और किसी के घर में चूल्हा नहीं जलता तो कोई बिना पूछे खाना रख जाता है। मुझे यह नया नहीं लगता। मुझे यह पुराना याद आता है, जब माँ का टिफ़िन सिर्फ़ हमारा था। अब माँ का टिफ़िन चलता है — दो नहीं, तीन थालियाँ — और उसमें गली का हिस्सा भी होता है। काजल कहती है कि माँ का हिसाब अब उलटा चलता है — खर्चा ज़्यादा और मुनाफ़ा ज़्यादा। पहले मैं उसे नहीं समझा। फिर समझा। मुनाफ़ा पैसों में नहीं, थालियों में है।
अब ज़रा उस कोने पर चलो जहाँ गोविंद भाई बैठते हैं।
जोड़ स्कूल के दाईं तरफ़, दीवार के सहारे, एक पुरानी मेज़ है। वहाँ गोविंद भाई बैठते हैं। वही गोविंद भाई, जिनका चश्मा कान पर टेप से बँधा था और हाथ काँपते थे। अब चश्मा उन्होंने नया ले लिया है — नया भी पुराने जैसा ही है, पर कान पर टेप नहीं है। और हाथ।
मैं तुमसे सीधे कहता हूँ — मुझे सबसे ज़्यादा फ़र्क़ उनके हाथों में दिखता है। वो अब रजिस्टर पर सीधे टिकते हैं। पहले वो ऐसे काँपते थे जैसे काग़ज़ उनसे टकरा रहा हो। अब वो ऐसे चलते हैं जैसे काग़ज़ उनका हो।
उनकी मेज़ पर एक छोटा बोर्ड है जो उन्होंने खुद लिखा है — “हिसाब। सबका हिसाब। कोई काग़ज़ छिपाकर नहीं।”
“गोविंद भाई,” मैंने आज सुबह कहा, “आपकी मेज़ पर तो कुछ भी नहीं है।”
“कल होगी,” उन्होंने कहा। “आज लोग ईमानदार हैं। ईमानदारी में हिसाब कम रहता है, इसलिए कॉपी खाली है।”
“तो आप बैठे क्यों हैं?”
वो रुके। फिर उन्होंने अपना चश्मा उतारा और उसे अपनी कमीज़ से पोंछकर पहना, और पोंछते वक़्त उनका हाथ एक पल रुका।
“मैं इसलिए बैठा हूँ,” उन्होंने कहा, “क्योंकि बाईस बरस में पहली बार मुझे कोई ऐसा आदमी दिखे जिसे हिसाब के लिए मेरे पास कोई काग़ज़ न देना पड़े।”
“ये कैसी बात है?”
“मुझे पता है यह कैसी बात है,” उन्होंने कहा। “पर मैं इसे बार-बार सुनना चाहता हूँ। इसलिए मैं यहाँ बैठता हूँ। जो आदमी ईमानदारी से आता है, वो देखता है कि मेज़ खाली है, और मुस्कुरा देता है। और मैं उस मुस्कान का हिसाब किसी काग़ज़ पर नहीं लिखता। उसे मैं अपने अंदर लिख लेता हूँ।”
मैं कुछ नहीं बोला।
“और एक बात सुन ले, बेटा,” उन्होंने कहा। “मैंने बाईस साल पापा का अंगूठा लिया। उस अंगूठे ने उनकी चुप्पी ली और मेरी नींद। अब मैं रोज़ चार बजे उठता हूँ। पर यह उठना वो नहीं है — यह उठना शर्म का नहीं है। यह उठना उस हिसाब का है जो चुक गया।”
“आप अब भी चार बजे उठते हैं?”
“हाँ,” उन्होंने कहा। “इसलिए नहीं कि नींद नहीं आती। इसलिए कि अब चार बजे मैं घर के बाहर देखता हूँ और देखता हूँ कि गली जाग रही है। पहले यह नज़ारा देखने के लिए मुझे डरना पड़ता था। अब सिर्फ़ आँख खोलनी पड़ती है।”
अब दुकान।
मैंने दुकान का बोर्ड बदला है। पुराना बोर्ड, जिस पर लकड़ी के टुकड़े टेढ़े टँगे थे और जिस पर ग्रीस के निशान थे, उसे मैंने उतारकर पीछे वाले कमरे में रख दिया है। उसे फेंका नहीं है। कुछ चीज़ें फेंकने के लिए नहीं होतीं, वो दीवार पर लगाने के लिए होती हैं, याद की तरह।
नया बोर्ड इलियास भाई ने हमारे लिए बनाया है। वो अब हमारे घर आ गए हैं — नहीं, घर नहीं, वो हमारे घर के पास रहते हैं, उस्ताद की दुकान के पीछे के कमरे में, और वो रोज़ सुबह उस्ताद के साथ चाय पीते हैं, और मैं तुम्हें बता दूँ — पचास साल की चुप्पी के बाद दो भाइयों का चाय पीना ऐसा लगता है जैसे कोई किताब पचासवें पन्ने से आगे खुली हो।
बोर्ड पर दो शब्द हैं। बस दो।
जोड़ स्कूल।
मैंने उस पर अपना नाम नहीं लिखा। मैंने उस पर कुछ भी नहीं लिखा कि “साइकिल मरम्मत” या “टूटी चीज़ें ठीक होंगी”। इलियास भाई ने पूछा था, “कुछ और लिखना है?”
मैंने कहा, “जोड़ स्कूल। और नीचे छोटे अक्षरों में — टूटा लाओ।”
“रिश्ता भी?” उन्होंने पूछा।
“रिश्ता भी,” मैंने कहा।
बोर्ड लगा तो पहले दिन ही दो लोग आए। एक चाचा जी आए जिनकी साइकिल का पहिया आठ साल से घर की छत पर पड़ा था, और एक औरत जो अपने पति के पुराने रेडियो को ठीक कराना चाहती थीं।
“रेडियो ठीक नहीं होगा,” मैंने कहा, “पर उसे चलाने की कोशिश कर सकते हैं।”
“यही तो मेरे पति कहते थे,” वो बोलीं। “चलाने की कोशिश।”
और मुझे उस वक़्त समझ आया कि दुकान का नाम बदलने से दुकान नहीं बदली। दुकान का काम बदल गया, उसका नाम बाद में बदला।
टिंकू।
वो अब स्कूल जाता है। मैंने तुम्हें यह सीधे बता दिया। पूरा दिन नहीं, पर जाता है। सुबह जाता है, दोपहर को लौटता है, और लौटते ही सीधे दुकान पर आ जाता है — कभी बस्ता पटककर, कभी बस्ता उठाए ही खड़ा हो जाता है, जैसे भूल गया हो कि उसे रखना है।
उसकी वर्दी की शर्ट अब भी बड़ी है, क्योंकि उसकी माँ ने अगले साल के हिसाब से सिलवाई थी। और उसका एक जूता अब भी ज़्यादा घिसा है, क्योंकि वो चलने में एक पैर से ज़्यादा ज़ोर लगाता है।
आज वो लौटा तो उसके हाथ में एक काग़ज़ था।
“उस्ताद,” उसने कहा, “मास्टर जी ने कहा कि मेरा नाम कटा नहीं है।”
“तो?”
“तो क्या मैं कल से दो घंटे बाद में आ सकता हूँ? क्योंकि एक दोस्त को पहिए की तीलियाँ सीखनी हैं और वो स्कूल के बाद ही आ सकता है।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी जेब से चॉक निकल रही थी। उसके घुटने पर नई पट्टी थी, क्योंकि गली के बच्चों के घुटने कभी पुरानी पट्टी से नहीं चलते।
“आ सकता है,” मैंने कहा। “पर एक शर्त है।”
“क्या?”
“जो दोस्त सीख रहा है, उससे पहले तू सीखेगा नहीं,” मैंने कहा। “तू उसे अपने हाथ से करके दिखाएगा, और वो करेगा। तेरे हाथ उसके हाथ पर नहीं होंगे।”
वो सोचने लगा। फिर बोला, “मतलब मैं पकड़ूँगा नहीं?”
“नहीं।”
“तो फिर वो गिरेगा तो?”
“गिरेगा,” मैंने कहा। “और उठेगा। और यही सबसे ज़रूरी सबक है।”
टिंकू ने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा और बस्ता उठाया। फिर रुककर बोला, “उस्ताद, एक बात पूछूँ?”
“पूछ।”
“आपने मुझे कभी नहीं बताया कि आप पहली बार साइकिल ठीक करते वक़्त रोए थे या नहीं।”
मैं हँसा। “यह किसने बताया?”
“माँ ने।”
“मैं रोया नहीं था। मेरा हाथ फिसला था।”
“उस्ताद, आप झूठ बोल रहे हैं।”
“हाँ,” मैंने कहा। “पर यह पहली बार है कि किसी ने मुझे पकड़ा।”
वो हँसते हुए चला गया।
अब वो दीवार, जिसकी बात मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है।
जोड़ स्कूल की बाहर वाली दीवार है — पीली, उखड़ी, जिस पर कभी कोई पोस्टर नहीं टँगा। उस पर बच्चों ने अपने हाथ से पहला नियम लिखा है। सफ़ेद चॉक से, और ऊपर से किसी ने पेंसिल से गाढ़ा कर दिया है, ताकि बारिश में मिटे नहीं।
लिखा है —
कोई भी काम अकेले नहीं करना।
और उसके नीचे सबके नाम हैं। टिंकू के अक्षर टेढ़े हैं, सानिया के सीधे, गुड्डू ने अपने नाम के आगे एक छोटा तारा बनाया है, रफ़ीक़ ने अपने नाम को गोल घेरे में लिखा है, और चिंटू का नाम सबसे नीचे है क्योंकि उसने कहा था कि जो सबसे नीचे लिखा होता है, उसे सबसे ज़्यादा याद रखा जाता है।
और नामों के नीचे एक और लाइन है, जो किसी बच्चे की लिखाई में नहीं है। उस्ताद की लिखाई भी नहीं है। माँ की भी नहीं।
वो लाइन है — “जो अकेले चलेगा, वो रास्ता भूल जाएगा। जो साथ चलेगा, उसका रास्ता खुद बनेगा।”
मैंने पूछा कि यह किसने लिखा। किसी ने नहीं बताया। सानिया ने कहा कि उसने नहीं लिखा, गुड्डू ने कहा कि वो तो सो रहा था, चिंटू ने कहा कि वो समोसा खा रहा था। मुझे शक है कि इलियास भाई ने लिखा, पर वो मुस्कुराकर टाल देते हैं।
अच्छा, अब वो काग़ज़।
मेरी दुकान के पीछे वाले कमरे में, औज़ारों के ट्रंक के ऊपर, एक छोटी दराज़ है। उसमें मैंने एक काग़ज़ रखा है। उस पर मैंने अपने हाथ से लिखा है, और उस काग़ज़ पर एक और चीज़ लिखी है — वो बात जो इलियास भाई ने कही थी जब वो लौटे थे।
मैं तुम्हें याद दिला दूँ — इलियास भाई ने कहा था कि बाईस साल पहले जिस मीठी आवाज़ वाले आदमी ने उनसे आधी जीभ ली, वो कोई और नहीं, बल्कि वही सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी था, जिसे रणवीर “सर” कहता है। और उस आदमी के बारे में इलियास भाई ने एक बात कही थी, जो सबसे ज़्यादा डरावनी थी।
उन्होंने कहा था — “उस आदमी ने मुझसे जीभ लेते वक़्त मेरी तरफ़ नहीं देखा था। उसने सिर्फ़ यह कहा था कि तुम्हारे भाई ने तुम्हें घर से निकाल दिया, और तुम उसकी शक्ल भूल जाओगे।”
यह बात मैंने उस काग़ज़ पर उतारी है। नीचे मैंने लिखा है — “यह अगली बार सब मिलकर खोलेंगे।”
काग़ज़ पर मैंने एक और चीज़ भी लिखी है, जो मुझे रोज़ रात याद आती है, और जो मैं तुम्हें भी बताना चाहता हूँ। मैंने लिखा है — “जिसने इतनी चीज़ें तोड़ीं, वो एक नाम भी तोड़ना भूल गया।”
मतलब — उस आदमी का नाम था, और वो नाम भूल गया था। और जो अपना नाम भूल जाता है, वो किसी का घर नहीं छीनता, वो हर घर को एक जैसा काग़ज़ समझने लगता है।
जो काम रह गया है, उसे मैं कब खोलूँगा, यह मैंने तय नहीं किया। पर उस दराज़ का काग़ज़ जानता है कि उसे अकेले नहीं खोलना है।
अब शाम।
यह मेरा सबसे पसंदीदा हिस्सा है, क्योंकि इसमें कुछ नहीं होता। और सबसे ज़्यादा कुछ इसमें होता है।
शाम को छह बजे गली अपना रंग बदलती है। दिन का ग्रीस और धूल का रंग हट जाता है, चूल्हे का धुआँ उठता है, और हवा में कुछ तला-भुना आ जाता है। शबनम आपा की गुमटी पर रोशनी जलती है और उसकी पीली लौ में पूरी गली दिखती है।
मैं शटर गिराता हूँ। घंटी साइकिल के हैंडल पर है। साइकिल निकालता हूँ।
जंग लगी साइकिल। वही जो मैंने मेले में कबाड़ी बूढ़े से ली थी। अब उस पर जंग नहीं है। पर उस पर जो जंग नहीं है, वो जंग मेरे हाथों पर है, ग्रीस की तरह, और यही ठीक है। मुझे जंग लगी साइकिल वाला लड़का ही रहना है। अगर यह साफ़ हो गई तो मैं किसी काम का नहीं।
मैं साइकिल पर बैठता हूँ। गली के मोड़ की तरफ़ निकलता हूँ।
और फिर मैं घंटी बजाता हूँ।
हर बार की तरह। हल्का सा। बस एक बार। जैसे किसी बुज़ुर्ग को याद दिलाना हो कि मैं अभी ज़िंदा हूँ।
और इस बार तंत्र आता है।
मैं कहता हूँ आता है, क्योंकि वो चीज़ अब भी आती है। पर वो पहले जैसी नहीं है। पहले जब वो बोलती थी, तो आवाज़ कान के अंदर आकर दीवार बन जाती थी, जैसे किसी पुराने कमरे में आवाज़ गूँजे। अब वो आवाज़ गली की आवाज़ों के बीच से आती है — किसी के हँसने के बाद, किसी बर्तन की खनक के बाद, किसी बच्चे के भागने के बाद। जैसे वो गली में से होकर आ रही हो।
“अंकुश,” वो कहता है।
“हाँ,” मैं कहता हूँ।
“अब तुम्हारा काम मुझसे नहीं, लोगों से चलेगा,” वो कहता है। उसकी आवाज़ में वो रूखापन नहीं है जो पहले था। और भावुकता भी नहीं है। बस एक थकी हुई सफ़ाई है, जैसे किसी ने बहुत लंबा हिसाब चुकाया हो।
मैं रुक जाता हूँ। साइकिल खड़ी करता हूँ।
“तू कह रहा है कि तेरा काम खत्म?” मैं पूछता हूँ।
“मेरा काम नहीं था,” वो कहता है। “मैं सिर्फ़ गिनती रखता था। तुमने गिनती से आगे देखना सीख लिया। अब मेरी ज़रूरत कहाँ रही?”
मेरे अंदर कुछ ऐसा हिलता है जो मैं नाम नहीं दे सकता। मैं जानता हूँ यह आख़िरी बार है। मैं जानता हूँ।
“एक बात पूछूँ?” मैं कहता हूँ।
“पूछो।”
“तू कभी अपना नाम नहीं बताया,” मैं कहता हूँ। “मैंने तुझे हमेशा जोड़ तंत्र कहा। तेरा कोई नाम है?”
वो चुप रहता है। और उस चुप्पी में मैं सुनता हूँ कि उसका नाम वो चीज़ है जो मुझे नहीं बताया जा सकता, क्योंकि उसे कोई नाम दिया ही नहीं गया था। उसे किसी ने बनाया नहीं था। उसे किसी ने तोड़ा था।
“नाम की ज़रूरत नहीं,” वो आख़िर में कहता है। “जिसको लोग पुकार लें, वो नाम रखता है। अपने लोगों को पुकारना। बस।”
मैं हँस पड़ता हूँ। सच में हँसता हूँ। पेट से।
“ठीक है,” मैं कहता हूँ। “तू आराम कर।”
और मैं साइकिल आगे बढ़ा देता हूँ।
पीछे घंटी की आवाज़ धीमी होने लगती है। पर वो ऐसे धीमी नहीं होती जैसे कोई चीज़ खत्म हो रही हो। वो ऐसे धीमी होती है जैसे कोई चीज़ दूसरी चीज़ों में घुल रही हो — गुमटी में पानी की खदबद में, किसी के बर्तन धोने में, उस्ताद की मशीन की टिक-टिक में, बच्चों के पतंग वाली चिल्लाहट में, माँ के टिफ़िन की ढक्कन की खटक में।
और उसके बाद मुझे पता नहीं चलता कि घंटी कहाँ खत्म हुई और गली कहाँ शुरू।
मैं गली में चलता हूँ। मैं धीरे चलाता हूँ, क्योंकि जल्दी करने का कोई काम नहीं है। रोज़ जल्दी करता था, और मुझे पता है अब मुझे जल्दी नहीं करनी है।
मैं उस्ताद की दुकान के सामने से गुज़रता हूँ। दुकान के अंदर पुरानी सिलाई मशीन की टिक-टिक है। उस्ताद सिलाई कर रहे हैं और इलियास भाई उनके सामने बैठे हैं, और उनका चेहरा उस पीली रोशनी में बिल्कुल वैसा दिखता है जैसा किसी बच्चे का चेहरा होता है जिसे लौटकर कोई पुरानी चीज़ मिल गई हो।
गुमटी के पास रज़िया प्याली धो रही हैं और शबनम आपा किसी को डाँट रही हैं — पर वो डाँट अब किसी ऐसे को है जो उन्हें छेड़ रहा है, चाय के पैसे छोड़कर भाग रहा है। कटोरी में पैसा गिरता है और शबनम आपा उसे गिनती हैं और कहती हैं, “दो रुपये कम हैं, अगली बार पूरे लाना।” और वो लड़का हँसता है।
चबूतरी पर बुज़ुर्ग बैठे हैं। बंसी बाबा और रहमत बाबा आज एक ही तरफ़ बैठे हैं, कंधे से कंधा लगाकर, और उनके बीच में एक चाय का प्याला है। इब्राहीम चाचा अपनी तस्बीह घुमा रहे हैं और बृजमोहन बाबा अपनी लाठी के सहारे बैठे हैं, और मुझे लगता है कि उन दोनों की चुप्पी के चालीस साल आज एक-दूसरे से बातें कर रहे हैं।
मैं उन्हें देखकर अपने आप मुस्कुरा देता हूँ।
और फिर मैं गली के मोड़ की तरफ़ जाता हूँ, जहाँ से दूसरी गली शुरू होती है, जहाँ से स्कूल की छत दिखती है और जहाँ से अस्पताल की नई बगिया का किनारा।
और वहीं मुझे कोई पुकारता है।
“अंकुश यादव!”
आवाज़ अनजानी है। मर्द की है, पर बूढ़ी नहीं। मैं साइकिल रोकता हूँ। ब्रेक की तार चरचराती है, क्योंकि वो कभी ठीक नहीं की। मैं पलटता हूँ।
मोड़ पर एक आदमी खड़ा है।
उम्र पचास के आसपास होगी। कद मझोला। कपड़े सादे हैं और साफ़ हैं, पर वो ऐसे साफ़ हैं जैसे किसी ने उन्हें आज सुबह ही धोया हो, नए कपड़ों जैसे नहीं। उसके हाथ में एक चीज़ है। एक घड़ी।
टूटी घड़ी।
वो उसे दोनों हाथों से पकड़े खड़ा है, जैसे कोई पकड़े हुए हो किसी चिड़िया को जो उड़ जाने का डर दे रही हो। घड़ी का चमड़े का पट्टा टूटा हुआ है, काँच पर बाल जैसी दरार है, और उसके काँटे रुके हुए हैं।
वो मेरी तरफ़ देखता है।
मैं घंटी की तरफ़ नहीं देखता। मैं उसकी तरफ़ देखता हूँ।
“आपने मुझे पुकारा?” मैं पूछता हूँ।
“अंकुश यादव,” वो कहता है, और मेरा नाम फिर बोलता है, इस बार धीमे से, जैसे पहचान रहा हो। “तुम वही हो।”
“मैं वही हूँ,” मैं कहता हूँ। “अब आप कौन हैं?”
वो कुछ नहीं कहता। बस घड़ी आगे बढ़ा देता है।
मैं साइकिल से उतरता हूँ। साइकिल को स्टैंड पर लगाता हूँ। मैं उसके पास जाता हूँ और घड़ी की तरफ़ देखता हूँ।
“घड़ी ठीक करवानी है?” मैं पूछता हूँ।
“हाँ,” वो कहता है।
“काफ़ी पुरानी है।”
“बहुत पुरानी है। दो दिन से बंद है।”
मैं उसकी तरफ़ देखता हूँ। उसकी आँखों में कुछ है जो डर नहीं है। कुछ और है — कुछ ऐसा जो इंतज़ार का बहुत लंबा हो चुका है और अब थक गया है।
“दो दिन?” मैं कहता हूँ। “घड़ी बंद होने की तारीख़ भी आदमी को याद रहती है।”
वो हल्का मुस्कुराता है। वो मुस्कान पुरानी है, पर किसी की नकल जैसी नहीं लगती। जैसे कोई बरसों बाद मुस्कुराया हो, और याद न हो कि कैसे मुस्कुराते हैं।
“मेरे बाप की घड़ी है,” वो कहता है। “वो इसे नहीं ठीक करवाते। उन्होंने कहा कर दिया था कि जब रुके, तो समझ लेना कि वक़्त यहीं रुका है।”
“और आपने आज इसे ठीक करवाने की सोची?”
“मैंने सोची नहीं,” वो कहता है। “मुझे रास्ता भेज दिया गया।”
“कौन?”
वो मेरी आँखों में देखता है। फिर वो अपना हाथ उठाता है — धीरे से, बिना झटके — और अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाता है, जैसे मुझे कुछ दिखाना हो। उसकी हथेली पर कुछ नहीं है। बस उँगलियों के जोड़ पर एक बहुत हल्का, पीला सा निशान है, जो पुरानी जले हुए निशान जैसा लगता है।
और मुझे यह कहने की ज़रूरत नहीं कि मेरे अंदर घंटी नहीं बजी। घंटी चुप रही। और मुझे समझ आ गया कि यह आख़िरी बात है जो घंटी ने कही थी — “अब तुम्हारा काम मुझसे नहीं, लोगों से चलेगा”। असली बात यही थी।
मैं घड़ी लेता हूँ। मैं उसे उलटता-पलटता हूँ। पट्टा टूटा है, काँच में दरार है, पर सबसे बड़ी बात — उसके काँटे रुके हुए हैं और उसका छोटा काँटा दस पर अटका है।
“लाइए,” मैं कहता हूँ। “देखते हैं क्या टूटा है।”
वो नहीं हँसता, पर उसकी आँखें हल्की हो जाती हैं।
“तुम जानते हो मैं कौन हूँ?” वो पूछता है।
“नहीं,” मैं सच कहता हूँ। “पर आपने मुझे नाम से पुकारा। इसका मतलब आप मुझे जानते हैं। और जो मुझे जानता है और नाम से पुकारता है, वो आम आदमी नहीं होता।”
वो कुछ देर मुझे देखता रहता है।
“मुझे तुम्हारे पास एक काम से आना था,” वो कहता है।
“क्या काम?”
“तुम्हारे पास एक काग़ज़ है,” वो कहता है। “किसी दराज़ में। जिस पर इलियास की बात लिखी है।”
मेरा हाथ रुक जाता है। घड़ी मेरी हथेली में है और उसका पीतल ठंडा है, एकदम ठंडा, बर्फ जैसा।
“आपको यह कैसे पता?” मैं पूछता हूँ।
“क्योंकि,” वो कहता है, “वो काग़ज़ मेरे पास भी है। और मेरे वाले काग़ज़ पर इलियास की वो बात नहीं लिखी है। मेरे वाले पर लिखा है कि तीसरा आदमी कौन था।”
सड़क पर से कोई साइकिल घंटी बजाकर निकल जाता है। दूर कहीं बच्चा हँसता है। गुमटी से शबनम आपा की आवाज़ आती है — “एक और चाय!” और सब कुछ इतना सामान्य है कि मुझे अपने कानों पर शक होने लगता है।
“आप कौन हैं?” मैं दोबारा पूछता हूँ। इस बार आवाज़ में वो हल्कापन नहीं है।
वो मेरी ओर हाथ बढ़ाता है — नहीं, घड़ी की ओर — और अपनी उँगली घड़ी के टूटे काँच पर रखता है।
“मैं वो आदमी हूँ,” वो कहता है, “जो बाईस साल पहले तुम्हारे पापा को उलटी तरफ़ से मिला था।”
मैं साँस लेना भूल जाता हूँ।
“और मैं,” वो कहता है, “वो आदमी हूँ जिसे तुम्हारे पापा ने अपना बड़ा भाई समझा।”
और तभी दूर, बहुत दूर, जैसे पुराने बिजलीघर के छह बक्सों वाली तरफ़ से, एक आवाज़ आती है — धीमी, चटकने जैसी, पर बहुत छोटी।
मैं घड़ी को हथेली में कसकर पकड़ लेता हूँ।
“अंदर चलिए,” मैं कहता हूँ। “चाय पीते हैं। और फिर आप वो बताइए जो आप बताने आए हैं।”
वो सिर हिलाता है।
मैं साइकिल का हैंडल पकड़कर मुड़ता हूँ, और मेरे पीछे वो चलता है, और मुझे लगता है कि आज गली में जो नया हुआ है, वो किसी काग़ज़ पर नहीं लिखा जाएगा।
कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जो सिर्फ़ चलकर ही पता चलती हैं।
और हम चले।
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