The Mysterious Bell – Chapter 461: jodne wala mistri hissa 047 ep461-470
बत्तियाँ बुझीं।
तीसरी बार झपकने के बाद वो लौटीं ही नहीं। गुमटी की पीली बत्ती, स्कूल की दूर वाली ट्यूबलाइट, अस्पताल के गेट पर जलता बड़ा बल्ब, गली के मुँह पर लगे खंभे की रोशनी, पीपल के नीचे बच्चों के हाथ की टॉर्च — सब एक साँस में बुझ गए।
और अंधेरा आया।
वो अंधेरा नहीं था जो रात में आता है। वो अंधेरा था जो किसी बंद कमरे से निकलकर पूरी गली पर चादर की तरह गिर जाता है। इतना घना कि अपनी ही उँगली दिखाई न दे। इतना भारी कि कानों में अपनी धड़कन सुनाई दे।
किसी ने चीख मारी। फिर एक औरत ने अपने बच्चे का नाम पुकारा। किसी ने "अरे, टॉर्च जलाओ" कहा। किसी ने "तार कट गया" कहा। किसी ने कहा कि बिजलीघर में कुछ हुआ है, वहाँ से आवाज़ आ रही है।
मैंने जेब में हाथ डाला।
घंटी वहीं थी।
मैंने उसे हथेली में निकाला। बर्फ़ जैसी ठंडी। एकदम चुप। ना कोई कंपन, ना कोई गुनगुनाहट। जैसे कोई बच्चा डरकर मुँह छिपा लेता है, वैसे वो मेरी हथेली में बैठी थी।
"बोल," मैंने धीरे कहा। "अब क्या है?"
कुछ नहीं।
"अरे, अभी तो कहा था कि वो खुद आ रहा है। अब आया तो चुप क्यों?"
घंटी ने जवाब नहीं दिया।
मैंने उसे मुँह से लगाया। ठंडी। मैंने हिलाया। आवाज़ नहीं। मैंने माथे पर रखा। सिर्फ़ धातु की ठंडक।
अंदर से एक डर उठा, छोटा सा — जैसे किसी ने दरवाज़ा खोलकर फिर बंद कर दिया हो। मगर मैंने उसे मुँह पर नहीं आने दिया।
"माँ," मैंने आवाज़ दी। "माँ, तुम वहीं हो?"
"हाँ," माँ की आवाज़ आई, कमज़ोर, पर साफ़। "कुर्सी पर हूँ। तेरे पापा का हाथ पकड़ा हुआ है।"
"चलो, ठीक है। किसी को हिलना नहीं है।"
"अंकुश," पापा की आवाज़ आई, धीमी और भारी। "गली में औरतें, बच्चे खड़े हैं। पहले उनका दरवाज़ा पक्का करो।"
ये पापा थे। बत्तीस साल की चुप्पी के बाद दो लाइन बोले थे, और पहली लाइन बेटे के लिए नहीं, गली के लिए थी।
मुझे मज़ा भी आया और गुस्सा भी।
"देखा," मैंने पापा की तरफ़ अंधेरे में हाथ बढ़ाया। "इतने साल चुप रहकर भी अंदर से आप ऐसे ही रहे। ठीक है, सुनो सब!"
मैंने आवाज़ ऊपर उठाई।
"जो अपने घर के दरवाज़े के पास खड़ा है, वो वहीं रहे। अंदर जाकर मोमबत्ती, लालटेन, जो हाथ लगे जलाओ। जो बाहर आया, अपनी औरत, अपने बच्चे का हाथ पकड़े। कोई अकेले भागने की कोशिश करेगा तो मैं उसका नाम अपनी कॉपी में लिखूँगा — अंकुश की कॉपी में, वही जिसमें सबका हिसाब है।"
किसी ने हल्की हँसी दी।
अंधेरे में हँसी आती है तो मालूम होता है कि डर फिर भी मरा नहीं ہے।
टिंकू की आवाज़ आई — "टिंकू — यानी मैं — यहाँ हूँ।"
"और बाक़ी सेना?"
"गिलहरी भी," सानिया बोली।
"तोता भी," गुड्डू बोला।
"चूहा," चिंटू ने कहा। "अच्छा चूहा।"
"और चिड़िया," रफ़ीक़ ने कहा।
"बहुत बढ़िया," मैंने कहा। "अब जल्दी करो — दुकान के पीछे छत पर मोमबत्तियों का डिब्बा रखा है, उसमें दादा के ज़माने की मोमबत्तियाँ हैं, पीली पड़ी हैं, पर जलेंगी। टिंकू, चाबी तेरे मोज़े में है।"
"उस्ताद, आप?"
"यहाँ," उस्ताद की आवाज़ आई। बिल्कुल शांत, जैसे कुछ हुआ ही न हो। "मेरे हाथ में मशीन का कपड़ा है। मशीन तकिया-सी खड़ी है। किसी ने छुई नहीं।"
"अच्छा है। शबनम आपा?"
"गुमटी के पीछे हूँ," शबनम आपा की भारी आवाज़ आई। "चूल्हा बंद है, पर तीन लालटेनें जल रही हैं। मेरे पास रखी हैं। बोलो, कहाँ लगाऊँ?"
"पीपल के नीचे और अस्पताल की तरफ़ जाने वाले रास्ते पर।"
"ठीक।"
मीरा ने अंधेरे में कहा, "मेरा कैमरा बंद हो गया। बैटरी बची है, एक ही है।"
"बचाकर रखो," मैंने कहा। "जो आज रात होगा, वो कल के काग़ज़ से ज़्यादा बोलेगा।"
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया और ठोकर खाकर रुका।
वही मेज़ थी — जिस पर काजल ने दो थर्मस रखे थे, शालिनी ने फाइल रखी थी, गोविंद भाई बैठे थे। मैंने हाथ बढ़ाया। उँगलियों को कुछ छुआ।
काग़ज़।
मैंने उसे उठाया। मोटा, चिकना, स्याही की गंध वाला काग़ज़। तभी पीछे से लालटेन की पीली रोशनी आई — शबनम आपा गुमटी के पीछे से लालटेन लेकर आ रही थीं।
रोशनी पड़ी तो मैंने देखा।
गली की दीवार पर, उस्ताद की दुकान के शटर पर, गुमटी के पीछे की पीली दीवार पर, स्कूल की दीवार पर — जहाँ भी जगह मिली, सफ़ेद पर्चे चिपके हुए थे।
एक जैसे। बिल्कुल एक जैसे। मशीन से छपे हुए, टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में नहीं, बल्कि साफ़ टाइप किए हुए। ऊपर कोई मुहर नहीं, कोई नाम नहीं, कोई तारीख़ नहीं।
मैंने एक पर्चा उतारा। पढ़ा।
"मैंने पढ़ा," मैंने धीरे कहा। फिर ज़ोर से, "सब सुनो। ये पर्चा कहता है कि कल सुबह से नूर अस्पताल के मरीज़ों को बाहर निकाल दिया जाएगा। ज़मीन का काग़ज़ कल सुबह तक पूरा न हुआ तो मरीज़ों को कहीं और भेजना होगा।"
गली में सन्नाटा छा गया।
फिर एक आवाज़ आई — वो बूढ़ी औरत जो अपने पोते का इलाज कराने आई थी, "मेरा पोता वहाँ है! वो बुखार में है!"
"मेरी बहू!" किसी और ने कहा। "तीन महीने से वहीं है!"
"हम कहाँ जाएँगे?"
"ये किसने चिपकाया?"
"अभी तो कोई नहीं था — अभी तो हम सब यहीं खड़े थे, किसी ने चिपकाया भी तो नहीं!"
वो आख़िरी बात सही थी। और वही सबसे डरावनी थी।
मैंने लालटेन की रोशनी में पर्चे को पलटा। पीछे कुछ नहीं। सिर्फ़ एक चीज़ थी — नीचे की तरफ़, बहुत छोटे अक्षरों में, लाल स्याही में लिखी एक लाइन।
मैंने उसे पढ़ा।
और मेरे हाथ से लालटेन लेने वाली शबनम आपा ने मेरा चेहरा देखकर कहा, "क्या लिखा है?"
मैंने जवाब नहीं दिया। मैंने पर्चा मोड़ा और जेब में रख लिया।
"अंकुश?" शालिनी ने कहा।
"अभी नहीं," मैंने कहा।
"क्या लिखा है?"
"मैंने कहा, अभी नहीं।"
तभी काजल की आवाज़ आई। वो मेज़ के पास से ही घूमकर दौड़ पड़ी थी — थर्मस हाथ में, जैसे उसे फेंकना भी हो और पकड़ना भी।
"अंकुश!" वो चीखी। "अस्पताल में सब बाहर आ गए हैं!"
"कौन सब?"
"मरीज़ों के परिवार! सब — सब डर गए हैं। कोई कह रहा है कि इमारत गिर जाएगी, कोई कह रहा है कि काग़ज़ रद्द हो गया। एक औरत रो रही है, बच्चे को गोद में लेकर बैठी है। डॉक्टर इसरानी सबको संभाल रहे हैं, पर उनका हाथ काँप रहा है, अंकुश। मैंने उन्होंने पहली बार देखा कि वो… वो भी डर रहे हैं।"
मैंने अपनी माँ की तरफ़ देखा। पापा का हाथ उनके कंधे पर था। माँ लालटेन की रोशनी में बैठी थीं, चेहरा पीला, गिलास अब भी हाथ में।
"माँ," मैंने कहा। "मैं अस्पताल जा रहा हूँ।"
"जा," माँ ने बिना एक पल रुके कहा। "और सुन — मरीज़ों की सबसे पहले बिस्तर नहीं, तकिया संभालना। मरीज़ को याद रहता है कि उसके सिर के नीचे कुछ था या नहीं।"
मैं एक पल के लिए रुक गया।
"आप," मैंने धीरे कहा, "इस वक़्त भी पाकशाला की बात कर रही हो।"
"पाकशाला नहीं," माँ ने कहा। "इंसान की बात कर रही हूँ। तीन महीने से जो वहाँ लेटा है, उसका सब कुछ उसी बिस्तर पर है। अगर वो उठाकर बाहर फेंक दिया गया तो ज़िंदा रहकर भी मरा हुआ लगेगा।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं साथ चलूँगा," पापा ने कहा। "एक काम का आदमी हूँ। दो बिस्तर खुद उठा लूँगा।"
"नहीं," मैंने कहा। "आप यहीं रहिए। माँ के साथ। आपकी आज शाम की सबसे बड़ी ताक़त यही है — कि आप इनके पास खड़े हैं। अस्पताल में आप नहीं, मैं चाहिए।"
पापा ने एक पल सोचा, फिर सिर हिलाया। उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा। हाथ भारी था, पर उसमें वो चीज़ थी जो बत्तीस साल से नहीं थी — दबाव।
"बेटा," पापा बोले, "जो भी उन पर्चों पर लिखा है, उसे गली से नहीं छिपाना। जिस बात से तुम डरते हो, वही बात सबको सबसे पहले बतानी चाहिए।"
मैंने उनका हाथ हटाया नहीं। बस ऐसे खड़ा रहा।
"अच्छा," मैंने कहा। "पर शर्त है — माँ को कोई नहीं छोड़ेगा।"
"मैं हूँ," पापा ने कहा।
"काजल, तू भी यहीं रह।"
"नहीं," काजल ने कहा। "मैं नर्स हूँ।"
"तू ट्रेनी है।"
"ट्रेनी को भी तीन महीने हो गए," काजल ने आँखें पोंछकर कहा। "और आज मरीज़ मेरे ही वार्ड के हैं।"
मैंने उसके चेहरे को लालटेन की रोशनी में देखा। उसकी आँखें लाल थीं, नाक भीगी थी, पर ज़ुबान सीधी थी।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर मेरे इशारे पर निकलेगी।"
"पहले इशारा आता था," काजल ने कहा। "अब मैं बड़ी हो गई हूँ।"
"बड़ी हो गई है तो इशारा भी बड़ा हो गया है," मैंने कहा। "चल।"
हम निकले। पीछे — शबनम आपा लालटेन लेकर, मीरा कैमरा लटकाए, शालिनी फाइल दबाए, गोविंद भाई अपना बयान सीने से लगाए, उस्ताद कुछ सोचते हुए, और बच्चों की टोली सबसे आगे — टिंकू के हाथ में लंबी लकड़ी, जैसे कोई रास्ता टटोलने की छड़ी हो।
बबलू पीछे रह गया था। मैंने मुड़कर देखा। वो अंधेरे में खड़ा था, एक हाथ जेब पर।
"तू आ रहा है?" मैंने पूछा।
"आऊँ?" उसकी आवाज़ अजीब थी। "मुझे कौन बुला रहा है?"
"अब कोई नहीं बुला रहा," मैंने कहा। "आ जा।"
वो एक पल रुका, फिर चल पड़ा। बड़ी-बड़ी बातें नहीं की। बस चल पड़ा।
गली के मुँह पर पहुँचे तो देखा — सड़क के खंभों की बत्तियाँ भी बुझी थीं। पूरा इलाक़ा अंधेरे में था। सिर्फ़ दूर, नई बस्ती की तरफ़, कुछ बत्तियाँ जल रही थीं, जैसे दो अलग शहर हों — एक जहाँ सब जल रहा है, और एक जहाँ सब बुझा है।
"देखा?" मैंने मीरा से कहा। "उनके यहाँ बत्ती है। हमारे यहाँ नहीं। और ये इत्तेफ़ाक़ नहीं है।"
"तो क्या?" मीरा ने कहा।
"तो ये कि आज रात जो होना है, वो हमारे अंधेरे में होना चाहिए।"
अस्पताल के गेट पर पहुँचे तो भीड़ थी। चारपाइयाँ, बोरियाँ, बच्चे, बूढ़े। कोई खड़ा था, कोई बैठा। एक औरत अपनी गोद में बच्चा लिए बैठी थी और बच्चा सो रहा था, जैसे दुनिया में कुछ हुआ ही न हो।
डॉक्टर इसरानी बरामदे में खड़े थे। हाथ में पीतल के स्टैंड वाली मोमबत्ती। उनके चेहरे पर वो पुरानी शांति थी, पर उसके नीचे कुछ काँप रहा था।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, आगे बढ़कर।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "तुम आ गए।"
"क्या हुआ?"
"जो देख रहे हो," उन्होंने कहा। "मैंने सबको समझाया — इमारत गिरने वाली नहीं है। पीली दीवार है, पुरानी है, पर पत्थर की है और पत्थर जल्दी नहीं गिरता। इन्होंने सुना नहीं।"
"किसने कहा कि गिरेगी?"
डॉक्टर इसरानी ने अपने पीछे वाली दीवार की तरफ़ इशारा किया।
मैंने देखा। वहाँ भी सफ़ेद पर्चा चिपका था — एक नहीं, दो। एक पर्चे पर वो लिखा था जो गली में था। और दूसरे पर कुछ और।
"दूसरे पर क्या है?" मैंने पूछा।
"पढ़ो," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "पर पहले बैठ जाओ।"
"मैं खड़ा हूँ ठीक।"
"ये मैं नहीं तुम्हारे लिए कह रहा," डॉक्टर ने कहा। "अपनी माँ के लिए कह रहा हूँ। जो बात उनके बेटे के पैरों को हिला सकती है, वो उनकी कुर्सी को भी हिलाएगी।"
मैंने काजल की तरफ़ देखा। काजल ने लालटेन पकड़ी थी। मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। टिंकू ने अपनी लकड़ी उठाई।
मैंने पर्चा उतारा। लालटेन की रोशनी में पढ़ा।
अंदर से कुछ हुआ। जैसे कोई मेरी ही छत से प्लास्टर निकाल दे।
मैंने पर्चा गोद में धकेल लिया।
"शालिनी," मैंने कहा। "ये तेरे पास जाएगा।"
"क्या है?"
"पढ़ लेना।"
"नहीं, तुम बोलो।"
"कल सुबह सम्मान समारोह होने दे," मैंने धीरे कहा, "उसके बाद अस्पताल का काग़ज़ किसी को नहीं मिलेगा। सब काग़ज़ एक जगह जमा कर दिए जाएँगे। और जो कल सभा में अस्पताल के बारे में बोलेगा —"
मैं रुक गया।
"क्या?" काजल ने कहा।
"उसका अस्पताल से नाता हमेशा के लिए छूट जाएगा।"
काजल ने थर्मस ज़मीन पर रख दिया और दोनों हाथ मुँह पर रख लिए।
गली में एक बूढ़ी औरत रो पड़ी। वो अपने पोते का हाथ पकड़े खड़ी थी।
डॉक्टर इसरानी ने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं डॉक्टर हूँ," उन्होंने कहा। "गली का नहीं, इस अस्पताल का। ये ज़मीन मेरे नाम पर है, मेरे पीछे मेरी बीवी का नाम हुआ करता था, और उसने इसकी एक ही शर्त रखी थी — दीवारें पीली रहें। बस। इससे ज़्यादा उसने कुछ नहीं माँगा।"
वो रुके। मोमबत्ती की लौ काँपी।
"अगर बताते ही सब चला जाएगा," उन्होंने कहा, "तो कहने का क्या मतलब?"
मैंने उनके कंधे पर हाथ रखा।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा। "ये बात बोलने से नहीं, चुप रहने से हुई है। नहीं बोलेंगे तो भी ज़मीन चली जाएगी। बस एक शर्त में — कि हमने मुँह नहीं खोला।"
डॉक्टर इसरानी ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने मोमबत्ती की लौ देखी, जैसे उससे कुछ पूछ रहे हों।
"मेरी बीवी कहती थी," वो बोले, "कि पीली दीवार पर सच जल्दी दिखता है।"
"तो दिखाइए," मैंने कहा। "आज रात।"
इससे पहले कि वो कुछ कहते, बच्चों की टोली दौड़ती हुई आई। सानिया आगे थी, हाथ में अपनी लाल कवर वाली कॉपी।
"दुकान के पीछे!" सानिया हाँफती थी। "तीन और पर्चे चिपके हैं। पीछे वाली गली में! और वहाँ एक आदमी खड़ा था — सफ़ेद कुर्ता, हाथ में पोटली। रफ़ीक़ ने देखा।"
रफ़ीक़ ने सिर हिलाया, हाँफते हुए। "वो हमें देखकर नहीं भागा। बस मुड़ा और लालटेन की तरफ़ हाथ में पोटली दिखा दी।"
"क्या दिखाया?"
"पोटली," रफ़ीक़ ने कहा। "जिसमें कुछ चमक रहा था।"
मैंने घंटी जेब से निकाली। वो अभी भी ठंडी थी। ठंडी और चुप।
"अरे," मैंने धीरे कहा, "तू थोड़ा तो बोल। सिर्फ़ चुप मत बैठ।"
कुछ नहीं।
मैंने गुमटी की लालटेन उठाई, अस्पताल के पीछे की तरफ़ देखा। वहाँ से पिछली दीवार की तरफ़ जाने वाला सूखी नाली का रास्ता जाता है, फिर टूटी बाउंड्री, फिर लोहे का फाटक।
"मीरा," मैंने कहा। "कैमरा चालू कर।"
"बैटरी?"
"एक ही है, तो एक ही जगह लगाओ।"
उसने कैमरा चालू किया। लाल बत्ती जली, छोटी सी, और भीड़ में कोई भी उसे देख नहीं पा रहा था।
"तुम सब यहीं रुको," मैंने कहा। "मैं और टिंकू पीछे देखकर आते हैं।"
"मैं भी," काजल ने कहा।
"काजल।"
"मैं वार्ड की नर्स हूँ," काजल ने कहा। "और मैंने अब तक तीन महीने में एक बात सीखी है — मरीज़ को मौत से नहीं, अकेलेपन से डर लगता है। वहाँ भीतर लोग डर से बैठे हैं, और मैं यहाँ तुम्हारे पीछे-पीछे घूमूँ, ये नहीं होगा।"
मैं उसे देखता रहा।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर मेरे आगे नहीं।"
"तुम्हारे बराबर।"
"पीछे।"
"बराबर।"
"काजल।"
"अंकुश।"
हम दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। मुझे हँसी आई। अंदर से कोई चीज़ फूट रही थी — वो वाली जो डर के साथ आती है और फिर पता चलता है कि वो डर नहीं, बहुत पुराना गुस्सा था।
"चल," मैंने कहा।
पीछे वाली गली में पहुँचे तो हवा ठंडी थी। अस्पताल की पिछली दीवार से सटकर बहुत पुरानी नाली सूखी पड़ी थी, जिसमें सिर्फ़ पत्थर और काई थी। दीवार के ऊपर से पीछे का प्लॉट दिखता था — जहाँ दो दिन बाद सुबह सात बजे मशीन आनी थी, और जहाँ अब भी कुछ ईंटें और सीमेंट की बोरियाँ पड़ी थीं।
दीवार पर चार पर्चे चिपके थे। तीन एक जैसे, और चौथा कुछ अलग — उस पर लाल स्याही में कुछ लिखा था।
मैंने चौथा पर्चा उतारा। लालटेन नीचे रखकर पढ़ा।
"काजल," मैंने कहा। "आ।"
वो पास आई। लालटेन पकड़ी। मैंने पढ़ा।
सिर्फ़ एक लाइन थी, लाल स्याही में, बड़े अक्षरों में। सीधी, सपाट, जैसे किसी ने काग़ज़ पर नहीं, दीवार पर खींच दी हो।
"जो कल मैदान में बोलेगा, उसका अस्पताल से नाता हमेशा के लिए छूट जाएगा।"
काजल ने देखा। उसकी साँस रुक गई।
"ये," उसने धीरे कहा, "ये सिर्फ़ तुम्हारे लिए है।"
"नहीं," मैंने कहा।
"कैसे?"
"ये हर उस आदमी के लिए है जो कल मैदान में सच बोलेगा," मैंने कहा। "पापा, माँ, गोविंद भाई, तू, डॉक्टर इसरानी — सबके लिए। पर लिखने वाले ने ये मान लिया है कि मैदान में सिर्फ़ एक ही आदमी बोलेगा। मैं।"
"तो?"
"तो लिखने वाले ने अपनी सबसे बड़ी गलती कर दी," मैंने कहा। "उसने मान लिया कि मैं अकेला आया हूँ।"
मैंने पर्चा मोड़ा।
"टिंकू," मैंने कहा। "ये पर्चा तेरे पास जाएगा। अपनी कॉपी में लिख — तारीख़, वक़्त, जगह, किस दीवार पर।"
"हाँ उस्ताद," टिंकू ने कहा और पर्चा अपने बस्ते में रख लिया, जैसे कोई खज़ाना रखता हो।
"अब वापस चलो," मैंने कहा।
हम लौटे। अस्पताल के गेट पर भीड़ अब भी थी। माँ की कुर्सी वहीं थी — पापा ने उसे अपनी तरफ़ खींच लिया था, जैसे भीड़ से बचाने के लिए। माँ ने मुझे देखा।
"क्या मिला?" उन्होंने पूछा।
"एक लाइन," मैंने कहा। "एक लाइन और एक डर।"
"कैसी लाइन?"
"जो कहती है कि सच बोलने पर अस्पताल छूट जाएगा।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने वो गिलास, जो अब भी उनके हाथ में था, मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"पानी पी," उन्होंने कहा।
"माँ।"
"पहले पानी पी," माँ ने कहा। "फिर तेरे उस सवाल का जवाब दूँगी जो तेरे चेहरे पर लिखा है।"
मैंने पानी पिया।
"अब सुन," माँ ने कहा। "ये अस्पताल मेरे नाम पर नहीं है। न तेरे पापा के नाम पर, न तेरे नाम पर। ये उस डॉक्टर के नाम पर है जो इसका चौकीदार है, और उस ज़मीन के सात आदमियों के नाम पर, जिन्होंने इसके लिए अंगूठा लगाया था। मेरा इलाज यहाँ चलता है, तो नाता है — और अगर ये ज़मीन बिक गई, तो मेरा इलाज कहीं और चलेगा। पर जिस आदमी ने ये लाइन लिखी है, वो चाहता है कि मैं सोचूँ — मेरी दवा अस्पताल से जुड़ी है, इसलिए मेरा बेटा चुप रहे।"
वो रुकीं। उनका हाथ काँपा, पर आवाज़ नहीं।
"मैं तुझे बताती हूँ," माँ ने कहा। "मेरी दवा अस्पताल से जुड़ी है। पर मेरा बेटा सच से जुड़ा है। दवा बंद हो गई तो कुछ दिन और मिलेंगे। सच बंद हो गया तो कुछ भी नहीं बचेगा।"
पापा ने उनका कंधा दबाया।
मैंने माँ के हाथ से गिलास लिया और उसे मेज़ पर रख दिया। फिर मैं भीड़ की तरफ़ मुड़ा।
"सब सुनो!" मैंने आवाज़ उठाई।
भीड़ धीरे-धीरे चुप हुई।
"आज शाम सात बजे की सभा," मैंने कहा, "अब भी है। जगह वही। कोई कुर्सी नहीं चाहिए। कोई मंच नहीं चाहिए। पीपल के नीचे ज़मीन बराबर है।"
किसी ने कहा, "पर बत्ती नहीं है।"
"बत्ती नहीं है," मैंने कहा, "तो लालटेन जलाओ। तीन जलेंगी तो पाँच जलेंगी। आज रात पूरी गली में एक ही बात जलेगी — और वो बात घंटी से नहीं, मुँह से जलेगी।"
तभी मेरे कान में आवाज़ आई।
बहुत हल्की। बहुत दूर से। जैसे कोई पीतल के बंद कमरे के भीतर से बोल रहा हो।
"अब तूने मुझसे नहीं पूछा," घंटी ने धीरे कहा।
मैं रुक गया।
मैंने जेब से घंटी निकाली। वो अब भी ठंडी थी, पर उस पर एक नई लकीर उभर आई थी — पहले वाली दो लकीरों के नीचे, तीसरी। पतली। जैसे किसी ने मेरे सच बोलने पर उसे अपने आप खींच दिया हो।
"पूछ रहा हूँ," मैंने धीरे कहा। "क्या है?"
घंटी ने तीन शब्द कहे।
"वो अंदर है।"
"कौन?"
"वो।"
"कहाँ?"
घंटी चुप हो गई।
मैंने चारों तरफ़ देखा। भीड़ थी, चेहरे थे, लालटेन थीं, अस्पताल की पीली दीवार थी, और उस दीवार पर सफ़ेद पर्चे चिपके थे।
और उसी पल मुझे लगा — जैसे दीवारों पर चिपके सारे पर्चे एक साथ मेरी तरफ़ मुड़कर देख रहे हों।
मैंने मुट्ठी में घंटी दबाई।
"काजल," मैंने कहा। "मरीज़ अंदर हैं?"
"हाँ," काजल ने कहा।
"कोई आज नया आया? कोई अजनबी? कोई सफ़ेद कुर्ता?"
काजल ने आँखें बड़ी कीं।
"अंदर तो बहुत लोग हैं," उसने कहा। "पर एक आदमी है — पाँचवें बेड के पास, जो किसी का मरीज़ नहीं है। वो बैठा है और कोई काग़ज़ पढ़ रहा है। मैंने उसे दो बार देखा। वो मुस्कुराया।"
मेरी रीढ़ से एक सुई सी गई।
"कैसे?"
"ऐसे," काजल ने कहा, "जैसे वो हमें पहले से जानता हो।"
मैंने डॉक्टर इसरानी की तरफ़ देखा। वो भी मेरी तरफ़ देख रहे थे। उनके हाथ में अब भी मोमबत्ती थी, और मोमबत्ती की लौ उनके चेहरे पर एक ऐसी परछाईं डाल रही थी जो अब तक नहीं दिखी थी।
"अंकुश," डॉक्टर ने कहा। "तुम इंतज़ार कर रहे थे कि वो आएगा। अब वो आ गया।"
"क्या आप जानते हैं?" मैंने पूछा।
"मैं नाम नहीं जानता," डॉक्टर ने कहा। "पर एक बात जानता हूँ। मेरी बीवी कहती थी कि जब कोई चीज़ बहुत ज़्यादा जल्दी हो जाए, तो उसके पीछे कोई पुराना हाथ होता है। आज सुबह से जो हो रहा है — पर्चे, अंधेरा, गुनगुनाहट, सब — ये एक ही हाथ है।"
मैंने पर्चा जेब से निकाला। मोड़ा हुआ, हल्का। मैंने उसे खोला।
फिर, सबसे नीचे, उस लाल लाइन के ठीक नीचे, मैंने एक और चीज़ देखी — जो पहली नज़र में दिखी ही नहीं थी। छोटी, नीली स्याही में, पेंसिल से खींची गई दो लकीरें और बीच में एक बिंदु।
वही निशान।
मैंने घंटी को हथेली में दबाया।
"अच्छा," मैंने धीरे कहा, जैसे कोई अपने ही कान में बोल रहा हो। "तो तू भी आ गया।"
और घंटी, पहली बार उस रात, गरम हुई।
बहुत ज़रा सी। इतनी कि मेरी उँगलियों में हल्की गुदगुदी हुई। जैसे कोई जवाब नहीं दे रहा हो, बस साँस भर रहा हो।
मैंने घंटी को वापस जेब में रखा और पापा की तरफ़ देखा।
"पापा," मैंने कहा। "अब मैं आपसे एक बात पूछूँगा।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। माँ ने भी।
"वो बात," मैंने कहा, "जो माँ ने कहा था — सच बोलने से पहले पापा से वो बात पूछो जो कभी नहीं पूछी।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"पूछ," उन्होंने कहा।
मैंने काग़ज़ जेब में रखा। भीड़ की तरफ़ देखा। फिर पापा की तरफ़।
"आपने बाईस साल पहले," मैंने कहा, "अगर आपको यक़ीन होता कि मैं — मैं, आपका बेटा — आपके साथ खड़ा रहूँगा, तो क्या आप वो अंगूठा लगाते?"
पापा ने एक पल कुछ नहीं कहा।
फिर उन्होंने माँ का हाथ छोड़ा। मेरी तरफ़ आए। मेरे दोनों कंधे पकड़े। और इतनी धीमी आवाज़ में बोले कि सिर्फ़ मैंने सुना।
"नहीं," उन्होंने कहा। "और यही मेरा सबसे बड़ा सच है।"
मैंने सिर हिलाया। फिर मुड़कर अस्पताल के अंधेरे गलियारे की तरफ़ देखा, जहाँ काजल के मुताबिक़ पाँचवें बेड के पास कोई बैठा था, काग़ज़ पढ़ रहा था, और मुस्कुरा रहा था।
"अच्छा," मैंने धीरे कहा। "तो अब अंदर चलें।"
और मेरे पीछे पूरी गली चल पड़ी।
॥
अंधेरा ऐसा था कि पहले तो मुझे अपना ही हाथ नहीं दिखा। सिर्फ़ काजल की टॉर्च की पतली रोशनी थी, जो फ़र्श पर एक डरती हुई लकीर की तरह आगे बढ़ रही थी। और उस लकीर के आगे, गलियारे में, इंसान बैठे थे।
कोई बिस्तर पर नहीं था। सब उठकर नीचे आ गए थे। एक बुज़ुर्ग औरत दीवार से टिककर बैठी थी, सिर पर पुरानी सूती चादर, और उसकी गोद में ज़ंग लगा एक छोटा लोहे का बक्सा था — वही बक्सा जिसमें बारह औज़ार थे, और एक नाम भी था जो उसके पति के साथ अस्पताल से चला गया था। उसके पास ही एक बूढ़ा आदमी बेंच पर इस तरह बैठा था जैसे कोई अपना ही घर छोड़कर सड़क पर आ गया हो — हाथ घुटनों पर, आँखें ज़मीन पर।
और एक कोने में, चारपाई के पास, एक औरत अपने बच्चे को सीने से चिपकाए बैठी थी। बच्चा रो नहीं रहा था। बच्चा सिर्फ़ काँप रहा था। और वो औरत रो रही थी — बिना आवाज़, इस तरह जैसे अंदर ही अंदर कोई चीज़ टूट रही हो और उसे किसी को सुनाई न देना हो।
मैं रुका।
पीले वार्ड के दरवाज़े पर सील बंद सफ़ेद पट्टी अब भी लटक रही थी, और उस पर दो नीली मुहरें थीं। पट्टी हवा में ज़रा सी हिल रही थी, और हर हिलने पर ऐसा लगता था जैसे कोई उँगली उठाकर चुप रहने का इशारा कर रहा हो।
"डॉक्टर साहब," मैंने धीरे कहा।
डॉक्टर इसरानी मोमबत्ती लिए गलियारे के बीच में खड़े थे। उनका सफ़ेद कोट पसीने से चिपका हुआ था और चश्मा नाक पर फिसला हुआ। उन्होंने मोमबत्ती एक बेंच पर रखी और हाथ उठाकर सबकी तरफ़ देखा।
"सुनो," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ पहले कभी इतनी पुरानी नहीं सुनाई दी थी। "सब सुनो। जो लोग मेरी आवाज़ सुन सकते हैं, वो बाक़ी सबको बता दें।"
गलियारे में धीरे-धीरे सिर उठे।
"मैं तीस साल से इस अस्पताल में हूँ," डॉक्टर ने कहा। "और मैं आज तुम सबसे एक बात कहता हूँ, और ये मेरी आख़िरी बात नहीं है, इसलिए ध्यान से सुनो — बिना अदालत के आदेश, इस अस्पताल से एक भी मरीज़ बाहर नहीं जाएगा। ज़मीन का काग़ज़ कोई भी बनवा ले, जितनी भी मुहरें लगा ले, पर मरीज़ को बाहर करने का हक़ सिर्फ़ अदालत को है। और वो काग़ज़ अभी नहीं है। आज रात, तुम सब यहीं रहोगे। मेरे पास जितनी दवा है, सब पहले इन बिस्तरों पर लगेगी।"
एक बूढ़ी औरत ने, जो दीवार से टिकी बैठी थी, सिर उठाया।
"डॉक्टर साहब," उसने कहा, "काग़ज़ तो हमें समझ नहीं आता। हमें इतना बताओ — सुबह ज़िंदा मिलेंगे या नहीं?"
डॉक्टर इसरानी ने उसकी तरफ़ देखा। मैंने देखा कि उनका जबड़ा कसा, फिर ढीला हुआ।
"सुबह तुम ज़िंदा मिलोगे," उन्होंने कहा। "क्योंकि मैं ज़िंदा रहूँगा।"
बच्चे को सीने से चिपकाए औरत ने उस वक़्त अपना मुँह खोला। उसकी आवाज़ इतनी टूटी थी जैसे किसी ने फीते से बाँध दी हो।
"मेरा बच्चा," उसने कहा, "दो दिन से बुखार में है। पर्ची पर लिखा है कि दवा की नई खेप काग़ज़ साफ़ होने तक रुकी है। डॉक्टर साहब, मैं पर्ची को दोष नहीं देती। मैं सिर्फ़ ये पूछती हूँ — मेरे बच्चे का नाम किस काग़ज़ में लिखा है? किसके अंगूठे के नीचे?"
गलियारे में चुप्पी बैठ गई। ऐसी चुप्पी जो चीख़ से ज़्यादा तेज़ होती है।
मैं आगे बढ़ा। उस औरत के पास घुटने के बल बैठ गया। बच्चे का सिर छुआ — गरम था, पर जलता नहीं था। उसकी साँस छोटी थी, पर चल रही थी।
"आपका नाम?" मैंने पूछा।
"शबीना," उसने कहा।
"शबीना आपा," मैंने कहा, "आपका बच्चा इस रात इस अस्पताल से बाहर नहीं जाएगा। और आपका नाम — सुन लीजिए — आज रात के बाद किसी अंगूठे के नीचे नहीं, किसी काग़ज़ के ऊपर लिखा होगा। मैं उसे वहाँ लिखवाऊँगा जहाँ से कोई मिटा न सके।"
वो मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने कुछ नहीं कहा। पर उसने मेरा हाथ नहीं छोड़ा।
काजल गेट की तरफ़ गई थी। मैंने पीछे मुड़कर देखा तो वो दीवार से चिपके उस सफ़ेद पर्चे के सामने खड़ी थी, और उसका हाथ उसे फाड़ने के लिए उठा हुआ था। उसके होंठ काँप रहे थे। काजल डरती नहीं। काजल तब भी नहीं डरी जब मंच पर सब हँस रहे थे। पर आज उसके हाथ में गुस्सा था, और गुस्सा डर से ज़्यादा ख़तरनाक होता है।
"काजल," मैंने कहा। "मत।"
"ये काग़ज़ —" उसने दाँत भींचकर कहा, "ये काग़ज़ मरीज़ों को डराने के लिए चिपका है। इसे यहाँ रहने का कोई हक़ नहीं।"
"इसलिए नहीं," मैंने कहा, और उसके पास जाकर उसका हाथ नीचे किया। "इसलिए नहीं फाड़ना कि इसमें डर लिखा है। इसलिए नहीं फाड़ना कि अगर तूने इसे फाड़ा, तो कल कोई पूछेगा — सबूत कहाँ है? और हमारे पास कुछ नहीं होगा।"
काजल ने मेरी तरफ़ देखा।
"सबूत?"
"हाँ," मैंने कहा। "ये काग़ज़ हमारे ख़िलाफ़ नहीं, हमारे लिए है। इसमें लिखा है — कल सुबह तक ज़मीन का काग़ज़ पूरा न हुआ तो मरीज़ बाहर। सुन, काजल — मरीज़ को बाहर करने का हक़ किसी ठेकेदार को नहीं, अदालत को है। तो ये काग़ज़ खुद कह रहा है कि इसे लिखने वाले के पास अदालत नहीं है। इसमें खुद लिखा है, अपनी ही नाक कटवा रहा है।"
काजल ने हाथ नीचे किया। फिर उसने पर्चे को ध्यान से देखा। और उसके चेहरे का रंग बदल गया।
"अंकुश," उसने धीरे कहा। "इसमें टाइप के अक्षर टेढ़े हैं। जैसे किसी पुरानी मशीन में 'क' का पीछा टूटा हो।"
"यही तो," मैंने कहा। "हम इस पर बात करेंगे। पहले इसे उतारो — नहीं, उतारो मत। जैसा है वैसा ही रहने दो। मीरा को बुलाओ। फोटो चाहिए — इसकी, इसकी मुहर की, और उस पूरी दीवार की।"
तभी बाहर गेट पर रोशनी हिली। कोई आ रहा था — तेज़ क़दम, और एक लाठी की टक-टक। मैंने सिर उठाया।
शालिनी सबसे पहले आई। उसके हाथ में वही काली फाइल थी, कंधे पर बैग, और सिर के बाल पसीने से चिपके हुए। उसके पीछे दुबे अंकल — नीली शर्ट, हाथ में पुरानी छड़ी, और उस छड़ी की टक-टक से पूरा गलियारा गूँज रहा था। उनके हाथ में एक पुरानी मुड़ी हुई कॉपी थी।
"पता चला क्या हुआ?" शालिनी ने साँस रोककर कहा।
"ज़्यादा नहीं," मैंने कहा। "मरीज़ गलियारे में हैं, डॉक्टर साहब ने सबको यक़ीन दिलाया है कि बिना अदालत के कोई बाहर नहीं जाएगा, और मेरी बहन ये पर्चा फाड़ने वाली थी।"
"मैंने कहा था मत फाड़ो," काजल ने तुरंत कहा।
"उसने कहा था मत फाड़ो," मैंने कहा। "मेरी बहन हमेशा ऐसी ही रहती है।"
शालिनी ने पर्चा देखा। उसने पढ़ा। उसका चेहरा वैसा ही सख़्त रहा, पर उसकी उँगली काग़ज़ पर ज़ोर से दब गई।
"ये मुहर," उसने कहा। "ये मुहर भारद्वाज की है। पर अक्षर — अक्षर किसी और हैं।"
दुबे अंकल आगे आए। उन्होंने बिना कुछ कहे पर्चा मेरे हाथ से लिया, मोमबत्ती के पास ले गए, और अपना चश्मा ठीक किया। फिर उन्होंने सूँघा।
कोई काग़ज़ नहीं सूँघता। दुबे अंकल सूँघते हैं।
"स्याही," उन्होंने धीरे कहा। "ये स्याही वो है जो पुराने बाज़ार में केरोसिन और साबुन के तेल से बनती है।"
"क्या कह रहे हैं आप?" शालिनी ने कहा।
दुबे अंकल ने पर्चा पलटा। उँगली से अक्षरों के किनारे छुए। फिर वो उठे और उन्होंने पर्चे को मेरी आँखों के सामने रखा और एक अक्षर की तरफ़ इशारा किया।
"देखो," उन्होंने कहा। "इस 'ट' के ऊपर की लकीर दो हिस्सों में टूटी है। और ये 'श' — इसकी पूँछ हर बार दो जगह से दबी है। ये उस मशीन का काम है जिसमें कुछ दाँते घिस चुके हैं। वो मशीन पुराने बाज़ार की उसी प्रेस में है जहाँ से साहब के पोस्टर छपते हैं — मेला, स्कूल, कंबल बाँटना, सब। मैं उस प्रेस से छपे काग़ज़ों के नीचे बीस साल से अपनी शिकायतों पर मुहर नहीं लगवा पाया, क्योंकि वही टूटी 'ट' मुझे हर बार दिख जाती थी।"
शालिनी ने पर्चा उसके हाथ से लिया। उसने कुछ देर देखा, और फिर उसके होंठ खुले रह गए। उसकी आवाज़ जैसे किसी और गले से आई।
"ये मेरे पापा की प्रेस है," उसने कहा।
गलियारे में जो लोग बैठे थे, उन्होंने भी सिर उठाया।
"मेरे पापा की मशीन," शालिनी ने कहा। "वही मशीन जो छत की रिपोर्ट छापती थी। वही मशीन जो झूठी रसीदें छापती थी। और वही मशीन — अब ये काग़ज़ छाप रही है। मेरे हाथ ने आज दिन भर जो काग़ज़ उठाए, उन सब पर यही टूटी 'ट' है और मैंने इसे नहीं देखा। मैंने इसे देखा ही नहीं।"
वो बेंच पर बैठ गई। धम से नहीं, धीरे से — जैसे उसके घुटने खुद फ़ैसला ले चुके हों।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"शालिनी," मैंने कहा। "तुमने नहीं देखा, इसका मतलब ये नहीं कि तुम ग़लत हो। इसका मतलब ये है कि तुम दिन भर वो चीज़ें देख रही थी जिनसे ज़िंदगी बचती है। ये काग़ज़ तुमने नहीं छापा। ये काग़ज़ तुम्हारे पापा की मशीन पर दूसरे हाथों ने छापा है। और अब तुम अपनी मशीन को उन हाथों से छीनकर लाओगी — यही तुम्हारा काम है।"
उसने सिर हिलाया। फिर कुछ ऐसा कहा जो मुझे आज तक याद रहेगा।
"मेरी मशीन," उसने कहा, "ने पहले शादी के कार्ड छापे थे। एक भी कार्ड ऐसा नहीं था जिस पर मेरे पापा ने अपनी मर्ज़ी से मुहर लगाई हो और वो मुहर झूठी निकली हो। आज वो ही मशीन मरीज़ों को डरा रही है। अब वो मेरी मशीन नहीं है। पर जब तक मैं इसे वापस नहीं लेती, मैं सो नहीं सकती।"
दुबे अंकल ने अपनी पुरानी कॉपी खोली। काग़ज़ की सुगंध से गलियारे में जैसे एक पुराना दिन खुल गया।
"मैंने इक्कीस साल पहले एक शिकायत में यही लिखा था," उन्होंने कहा। "कि शहर में दो ही जगह से झूठ निकलता है — एक मुंह से, दूसरी उस प्रेस से। मुंह तो बंद हो जाता है, अंकुश। प्रेस नहीं होती। उसको बंद करना पड़ता है।"
"आज रात नहीं," मैंने कहा। "आज रात हम कुछ बंद नहीं करवाएँगे। आज रात हम सिर्फ़ एक काम करेंगे — जागेंगे।"
मैं मुड़ा और गलियारे के बीच में खड़ा हो गया। लालटेन की पीली रोशनी में सबके चेहरे आधे अंधेरे में, आधे रोशनी में थे। किसी की आँख में डर था, किसी की आँख में गुस्सा, और एक बूढ़े की आँख में सिर्फ़ थकान — ऐसी थकान जो सालों से जमा हुई हो।
"मैं नाम से सबको नहीं जानता," मैंने कहा। "पर मैं इतना जानता हूँ कि आज रात यहाँ जो बैठा है, वो इस अस्पताल में इलाज कराने आया है, गुज़ारिश करने नहीं। और इस गली की हर चीज़ — ये अस्पताल, वो पीपल, उस्ताद की दुकान, शबनम आपा की गुमटी, स्कूल — ये किसी के बाप की जागीर नहीं है। ये हमारी है। हमने इसे अपने हाथों से बनाया है, अपने पैसों से नहीं, अपने दिनों से।"
मैंने रुककर देखा। बुज़ुर्ग औरत ने बक्से को अपने सीने से और चिपका लिया।
"कल सुबह तक काग़ज़ पूरा करना है," मैंने कहा। "और हम करेंगे। पर सुनो — अगर इस बीच कोई आए और कहे कि तुम बाहर निकलो, तो तुम एक बात कहना। बस एक बात। ये कहना — मेरा इलाज शुरू हो चुका है, मेरा काग़ज़ डॉक्टर साहब के पास है, और मेरा नाम आज रात किसी दस्तख़त के नीचे नहीं जाएगा। बस इतना कहना। बाक़ी मैं देख लूँगा।"
"देख लूँगा" कहते हुए मुझे खुद अपनी आवाज़ में वो डर सुनाई दिया जो मैं छिपा रहा था। क्योंकि सच ये था — मैं कुछ देख नहीं रहा था। मैं सिर्फ़ गिनती कर रहा था। जेब में चौंतीस अंक बचे थे। माँ की दवा दस दिन की थी। और आज शाम सात बजे की सभा में सबको जगह मिलनी थी, वरना पूरी गली का सच उसी अंधेरे में बह जाता जिसमें अभी हम खड़े थे।
शबीना ने अचानक कहा, "मेरा बच्चा बोल नहीं रहा। वो मुझे देख रहा है, पर बोल नहीं रहा।"
मैं उसके पास गया। मैंने बच्चे की आँखों में देखा। बच्चा डरा हुआ था। मैंने धीरे से कहा, "क्या नाम है?"
शबीना ने कहा, "अहमद।"
मैंने कहा, "अहमद, मेरा नाम अंकुश है। सुन, तेरी अम्मी कल सुबह जब तुझे उठाएगी, तुझे यही छत दिखेगी। और तू उस वक़्त भी यही छत देखेगा जब तू बड़ा होकर इसी अस्पताल में किसी को लाएगा। ये छत हमारी है। इसे कोई उठाकर नहीं ले जा सकता।"
बच्चे ने मेरी तरफ़ देखा। उसने कुछ नहीं कहा। पर उसकी साँस, जो पहले छोटी थी, ज़रा लंबी हुई।
डॉक्टर इसरानी ने उस वक़्त कहा, "अंकुश, एक बात कहूँ?"
"कहिए।"
"मैं आज रात सबको जगाए रखने की बात मानता हूँ। पर जागने का मतलब ये नहीं कि सब डरते रहें। जागने का मतलब ये है कि सब कुछ करते रहें।" उन्होंने मोमबत्ती उठाई। "मैं रसोई में जाता हूँ। हमीदा दाई को बता दूँ कि आज रात चाय दो बार बनेगी, पानी की बदली भी होगी, और दवा की खिड़की कभी नहीं बंद होगी।"
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "आप बूढ़े हैं, आपको आराम करना चाहिए।"
उन्होंने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने कुछ बहुत बड़ा गुनाह कहा हो।
"बेटा," उन्होंने कहा, "मैं साठ के पार हूँ, ये सही है। पर इस अस्पताल में एक भी मरीज़ ऐसा नहीं है जिसे मैंने अपने हाथ से दवा देकर न छोड़ा हो। मुझे आराम करने की सलाह उस रात देना जिस रात यहाँ कोई बीमार न हो।"
वो चले गए। मोमबत्ती की लौ उनके साथ गलियारे की दीवार पर डोलती हुई दूर तक गई।
तभी मुझे लगा — कोई मेरी तरफ़ देख रहा है।
मैंने सिर घुमाया।
पाँचवें बेड के पास वो आदमी अभी भी बैठा था। लालटेन की पीली रोशनी में उसका चेहरा साफ़ नहीं दिख रहा था, पर इतना दिख रहा था कि उसके हाथ में एक मोड़ा हुआ काग़ज़ है और वो उसे पढ़ नहीं रहा — वो उसे पकड़े हुए था, जैसे किसी पुरानी तस्वीर को पकड़ा जाता है।
मैंने काजल की तरफ़ देखा। काजल ने सिर हिलाया, यानी वही आदमी।
मैंने कुछ कहना चाहा। पर उस वक़्त डॉक्टर इसरानी की आवाज़ दूर से आई, "हमीदा दाई, पानी गरम रखो — आज रात बहुत लोग जागेंगे।" और उस आवाज़ में जो उम्मीद थी, उससे मेरा ध्यान बँट गया।
मैं उस आदमी से बात करने के लिए दो क़दम बढ़ा ही था कि—
दरवाज़े पर पैरों की आवाज़ आई। तेज़। धूल में फिसलती हुई जैसी।
और फिर वो आवाज़ आई जिसे सुनकर मेरा पूरा शरीर एक पल के लिए ठंडा हो गया।
"उस्ताद!"
टिंकू।
मैं दौड़कर गेट की तरफ़ गया। वो बेंच से टकराया, गिरा, फिर उठा। उसके घुटने पर पट्टी खुल गई थी और उसके होंठ सूखे हुए थे। उसकी साँस इतनी तेज़ थी जैसे उसने सारी गली दौड़कर आई हो।
"टिंकू," मैंने कहा, "साँस ले। बोल।"
उसने साँस लेने की कोशिश की। और फिर उसने वो कहा।
"उस्ताद, स्कूल के पीछे कोई आग लगा रहा है!"
एक पल के लिए गलियारे में सब कुछ रुक गया। बूढ़ी औरत का बक्सा भी, शबीना के हाथ भी, पीले वार्ड की सील भी।
"कैसे?" मैंने कहा।
"मैं स्कूल की छत पर था," टिंकू ने हाँफते हुए कहा। "गुड्डू और रफ़ीक़ पीपल पर थे। मैं छत से देख रहा था कि गली खाली है या नहीं। फिर मैंने पीछे की तरफ़ देखा — वहाँ से काला धुआँ उठ रहा था, दीवार के पीछे से। और आग नहीं थी, उस्ताद। पहले सिर्फ़ धुआँ था। फिर मैंने सुना — किसी ने मिट्टी का तेल डाला।"
"किसने?" शालिनी ने पूछा।
"मुझे दो आदमी दिखे," टिंकू ने कहा। "काले कपड़े में। एक के हाथ में डिब्बा था। और एक — एक सीढ़ी लेकर दीवार से लगा रहा था। उस्ताद, वो स्कूल की उस तरफ़ जा रहे थे जिधर परीक्षा के डिब्बे रखे हैं!"
मेरा दिमाग़ एक साथ कई दिशाओं में दौड़ा।
स्कूल में आग। आज रात, जब पूरी गली यहाँ जाग रही है। स्कूल में वो काग़ज़ हैं — छत की सच्ची रिपोर्ट, स्टोर के रजिस्टर, वो बंद कमरा जिसमें पुराने काग़ज़ हैं। अगर वो जल गए, तो कल कोई कहेगा — छत गिर गई, गनीमत है बच्चे नहीं थे। और फिर स्कूल का काग़ज़ अपने आप बन जाएगा, किसी के अंगूठे के नीचे।
आग सिर्फ़ आग नहीं होती। आग भी एक काग़ज़ होती है — एक ऐसा काग़ज़ जो खुद अपना सबूत मिटा देता है।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी को छुआ। वो अभी भी गरम थी — वैसे ही गरम, जैसे कुछ देर पहले हुई थी।
"काजल," मैंने कहा। "तू यहाँ रुक। माँ को यहीं रख। गेट पर मत जाना।"
"पर—"
"काजल!" मैंने कहा। और मेरी आवाज़ पहली बार उस रात सख़्त हुई। "अगर ये आग लगी तो लोग डरकर इधर दौड़ेंगे। इस अस्पताल में अभी बीस मरीज़ हैं। तेरी जगह यहाँ है। समझी?"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में गुस्सा था। पर फिर उसने सिर हिला दिया।
"शालिनी," मैंने कहा, "तू मीरा को फोन कर। उससे कह — कैमरा लगा रहे और आग की तरफ़ आए, पर अकेली न आए।"
"अंकुश," शालिनी ने कहा, "अगर वहाँ आग लगी है तो तुम अकेले क्या करोगे?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। और फिर मेरे मुँह से वो निकला जो मैंने सोचा नहीं था।
"मैं अकेले कुछ नहीं करूँगा," मैंने कहा। "ये गली मेरी नहीं है। ये गली हम सबकी है। और आज रात इस गली में एक भी आदमी अकेला नहीं रहेगा — न वो जो आग बुझाने जाएगा, न वो जो यहाँ मरीज़ों के पास बैठा है।"
मैंने टिंकू का कंधा पकड़ा।
"कितनी दूर से धुआँ दिख रहा था?"
"स्कूल की छत से," उसने कहा, "दीवार के ठीक पीछे से। मतलब वो जगह जहाँ बच्चों को पतंग उड़ाने से मना किया गया था।"
"पानी की टंकी के पास?"
"हाँ," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ फट गई। "उस्ताद, टंकी के पास — वहाँ जो बक्सा है, जिसमें अपना नाम लिखा था—"
मैंने उसे रोका। "टिंकू। सुन। अब तू मेरे साथ चलेगा। तू कुछ नहीं छुएगा। तू सिर्फ़ देखेगा और मुझे बताएगा। अगर मैं भूल जाऊँ, तो तू याद दिलाएगा। समझा?"
"समझा।"
मैं गेट की तरफ़ दौड़ा, और मेरे पीछे टिंकू, और उसके पीछे दुबे अंकल — जो अपनी उम्र में उस तेज़ चलने में काँप रहे थे, पर रुके नहीं।
दरवाज़े पर मैंने एक बार पीछे मुड़कर देखा। गलियारे में शबीना ने अपने बच्चे को सीने से और चिपका लिया था। बूढ़ी औरत ने अपना ज़ंग लगा बक्सा गोद से उठाकर सीने से लगाया था। डॉक्टर इसरानी हमीदा दाई के साथ खड़े थे और मुझे देख रहे थे।
और उस आदमी ने — पाँचवें बेड के पास वाला वो अजनबी — इस बार अपना मुँह थोड़ा सा खोला और धीरे से कुछ कहा।
मैंने उसकी बात नहीं सुनी।
पर घंटी ने सुनी।
क्योंकि उसी पल, मेरी जेब में, घंटी ने एक बार बहुत छोटी सी आवाज़ की — जैसे कोई दूर से हाँ कह रहा हो।
और मैं स्कूल की तरफ़ भागा।
॥
मैं स्कूल की तरफ़ भागा और मेरे फेफड़े मुझसे पहले पहुँच गए।
रात में भागना अजीब होता है। रास्ता दिखता नहीं, पर पैर जानते हैं कि कहाँ मुड़ना है। स्कूल की गली में कुत्ते भौंक रहे थे, पर वो भौंकना डर का नहीं था, वो भौंकना आग की गंध का था। जानवर आग को पहले सूँघ लेते हैं। हम इंसान देर से सूँघते हैं, इसीलिए हमारे हाथ जलते हैं।
स्कूल का लोहे का गेट खुला था। आधा खुला। जैसे किसी ने जल्दी में धक्का दिया हो और भूल गया हो कि दुनिया में दरवाज़े बंद भी किए जाते हैं।
मैं अंदर घुसा और मेरे पीछे टिंकू, और उसके पीछे दुबे अंकल। दुबे अंकल की साँस ऐसी चल रही थी जैसे पुरानी साइकिल का पंप चल रहा हो। मैंने उन्हें रोकना चाहा, पर मुझे पता था कि अगर मैं उन्हें रोकूँगा तो वो मेरी बात मानेंगे और फिर सारी उम्र यह सोचते रहेंगे कि उस रात वो किसी काम के नहीं थे। इसीलिए मैं चुप रहा।
स्कूल के पीछे वाली जगह घास और कूड़े से भरी है। वहाँ एक पुरानी बाउंड्री है, और उस बाउंड्री के सहारे कुछ पुराने डिब्बे और तख़्ते पड़े हैं जो सालों से कोई नहीं हटाता। बच्चे वहाँ से गुज़रते हैं और पतंग उड़ाते हैं और मास्टर लोग वहाँ जाने से मना करते हैं। मना करने की वजह आज समझ आई।
जैसे ही मैं मुड़ा, मुझे लपट दिखी।
बड़ी आग नहीं थी। छोटी थी। पर छोटी आग भी कुत्ते जैसी होती है — जब तक उसे धक्का न दो, वो भौंकती रहती है; और जब धक्का दो, तो काटती भी है। सूखी घास में फैलती हुई पीली लपटें, और ऊपर धुआँ — काला, सीधा ऊपर जाता हुआ, जैसे कोई उँगली उठाकर कह रहा हो, देखो, मैं यहाँ हूँ।
और गंध।
मैंने वो गंध पहचानी। तेल की गंध। मिट्टी का तेल। वही जो हमारे घर के पीछे वाले ज़ंग लगे थैले से आई थी।
मेरे पीछे टिंकू की आवाज़ फटी। "उस्ताद — वहाँ!"
मैंने देखा। बाउंड्री के उस पार, कूड़े के ढेर के ठीक पीछे, एक जीप खड़ी थी। बत्ती बुझी हुई। पीछे का लाल बत्ती जल रही थी जो हर गाड़ी में होती है और जो किसी की नज़र में नहीं आती।
और जीप की तरफ़ भागता हुआ एक आदमी।
मोटा आदमी। कमर तक खुली कमीज़, हाथ में लाल कैन। पैर फिसल रहे थे।
तभी मेरे बाएँ से एक आवाज़ आई — छोटी, तेज़, बिना डरी हुई।
"रुको! रुको मत करो! मैंने तुम्हारा नंबर लिख लिया है!"
सानिया थी।
मैंने पलटकर देखा। पुराने नीम के पेड़ के पीछे से चार नन्हे साये निकले। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू। चारों के हाथ में कुछ न कुछ था — सानिया के हाथ में उसकी लाल कवर कवर कॉपी, गुड्डू के हाथ में बल्ला, रफ़ीक़ के हाथ में पानी की बाल्टी, और चिंटू के हाथ में — भगवान जाने क्या था, पर वो हिल रहा था और चिंटू उसे दोनों हाथों से पकड़े था।
"तुम लोग?" मेरी आवाज़ में गुस्सा आया, और उस गुस्से में डर भी मिला हुआ था। "तुम लोग यहाँ क्यों खड़े हो? पता है क्या हो सकता था—"
"उस्ताद, हमने देखा!" सानिया ने कहा, और उसकी आवाज़ में जीत थी और काँप भी। "हमने सब देखा। हम पीछे आए थे क्योंकि गुड्डू को उस जगह पर पतंग गिरी थी, जहाँ मना है। और तभी वो आया। मोटा। नीली शर्ट। हाथ में लाल कैन। उसने डिब्बे के पास कुछ डाला और माचिस निकाली।"
"माचिस से पहले उसने आस-पास देखा," गुड्डू ने कहा। "और उसने अपना हाथ ऐसे किया—" उसने हाथ माथे के पास ले जाकर माथा पोंछने जैसा किया। "जैसे पसीना पोंछ रहा हो। पर उस वक़्त ठंड थी, उस्ताद। ठंड में पसीना किसे होता है?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
चौदह साल का लड़का मुझे ठंड में पसीने का हिसाब बता रहा था।
"फिर?" मैंने कहा।
"फिर मैंने आवाज़ दी," सानिया ने कहा। "मैंने कहा — अरे, मैंने तुम्हें देख लिया। और वो घूमा और उसका मुँह मैंने देखा।"
"तूने देखा?"
"देखा," सानिया ने कहा, और उसने अपनी कवर कॉपी खोली। पन्ने पर आकृतियाँ बनी थीं — गोल, तिकोने, लकीरें। "ये गाड़ी का नंबर है। मैंने सुना था कि गाड़ियों के नंबर को ऐसे याद रखते हैं। मैंने यही तरीका इजाद किया। ये जीप पर लिखा था।"
मैंने पन्ने को देखा। आकृतियाँ मेरे लिए बेमतलब थीं, पर सानिया के लिए वो नंबर था, और नंबर सबूत होता है।
उस वक़्त मेरे कॉमन सेंस ने हुक्म दिया। "पहले आग।" मैंने कहा। "ये सब बाद में। पानी कहाँ है?"
"टंकी में पानी नहीं है," रफ़ीक़ ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो गुस्सा था जो बच्चे बड़ों की बेवकूफ़ी पर होते हैं। "पर मैंने बाल्टी भर ली — स्कूल के हैंडपंप से। पानी आ रहा है, उस्ताद! पंप चल रहा है!"
मैंने एक पल को उसे देखा। रफ़ीक़, जो अब तक सिर्फ़ खबरें लाता था, ने बाल्टी में पानी भरा था। खुद भरा था। पता भी नहीं कब।
"चल," मैंने कहा।
उस आग को बुझाना मुश्किल नहीं था। आग छोटी थी, सूखी घास में। मुश्किल ये थी कि घास के नीचे लकड़ी के तख़्ते पड़े थे, और तख़्तों के ऊपर बोरियाँ, और उन बोरियों के पीछे स्कूल के स्टोर की खिड़की — वो खिड़की जिसके अंदर रजिस्टर रखे थे। अगर वो लकड़ी पकड़ लेती, तो फिर पानी की नहीं, आग के और लोगों की ज़रूरत पड़ती।
मैंने अपनी कमीज़ से अपना मुँह ढका और उस तक़रीब से गया जितना कर सकता था। रेत थी वहाँ — स्कूल के किनारे रेत का ढेर पड़ा था, जो बारिश में बहकर जम गया था। रेत आग पर डालते ही आग मरती नहीं, दबती है। और मरना और दबना अलग-अलग चीज़ें हैं। मैंने रेत डाली, रफ़ीक़ ने पानी, गुड्डू ने अपना बल्ला दे दिया ताकि मैं दूर से जलती घास खींच सकूँ, और चिंटू ने — शाबाश चिंटू — अपनी गंदी जैकेट उतारकर गीली कर ली और उससे बोरियों की आग बुझाई।
दुबे अंकल ने कुछ नहीं कहा। वो बस अपनी छड़ी से जलती हुई लकड़ियों को रास्ते से हटाते रहे, ताकि आग कूड़े की तरफ़ न जाए। आग कूड़े की तरफ़ गई तो वो और भड़कती — कूड़े में पुराने केमिकल वाले डिब्बे पड़े थे, और रसोई की पुरानी टिन। स्कूल की सफ़ाई वाली दीदी कहती हैं कि कूड़े में जान डालो तो वो जवाब देता है।
आठ-दस मिनट में आग बुझ गई। पूरी तरह नहीं — कुछ जगह से धुआँ उठता रहा, और गीली रेत में लाल राख बनी रही जो पानी में भाप बनकर उठती थी।
मैं घुटनों के बल बैठ गया।
तभी मेरी नज़र पड़ी।
पत्थर के नीचे, आधा जला हुआ, एक माचिस का डिब्बा पड़ा था।
मैंने उसे उठाया। आधा जल चुका था। पीछे की तरफ़ छपाई थी — नीली लकीर और उस पर कुछ लिखा। मैंने आँख सिकोड़कर देखा। नीचे छोटे अक्षरों में कंपनी का नाम। और उससे ऊपर — एक जानी-पहचानी छाप।
मैंने उसे टिंकू को दिया। "पढ़।"
टिंकू ने पढ़ा। वो पढ़ता रहा और उसका चेहरा बदलता रहा।
"उस्ताद," उसने धीरे कहा, "ये वो माचिस है जो बड़े समारोहों में बाँटी जाती है। पिछले महीने अस्पताल के कार्यक्रम में भी बाँटी थी। इस पर कंपनी का नाम है — भारद्वाज।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
और कुछ दूर, रेत के उस पार, एक चीज़ पड़ी थी जो आग में नहीं जली थी।
मोटे कपड़े का दस्ताना।
मज़दूरों वाला दस्ताना, जिसके दानों के बीच ज़मीन की रेत और सीमेंट अब भी लगी थी। मैंने उसे उठाया और उसके भीतर की गंध सूँघी।
और हाँ — उसके किनारे पर भी वही नीली मोहर थी। जो टोपियों पर लगती है, बोर्डों पर लगती है, रसीदों पर लगती है।
"उस्ताद," गुड्डू ने कहा, और उसकी आवाज़ अब गर्व से भरी थी, "हमने ड्राइवर को भी देखा। वो जीप में बैठा था और उसने उस मोटे को हाथ से इशारा किया — जल्दी कर। मैंने उसका चेहरा देखा। वो दुबला है, और उसने अपनी कलाई पर लाल धागा बाँधा हुआ है।"
"मैंने देखा!" चिंटू चहक उठा। "लाल धागा! मेरे उस्ताद की कलाई पर भी वैसा धागा था, याद है? जब हमने उस दिन दुकान पर—"
"हाँ हाँ," रफ़ीक़ ने कहा, "हर आदमी की कलाई पर लाल धागा होता है, चिंटू।"
"पर उसकी भी थी—"
"चिंटू।" मैंने कहा। "रुक। एक बात तय करते हैं। हम बहादुर हैं, ये सही। पर बहादुरी और बेवकूफ़ी में थोड़ा ही अंतर होता है। अगर वो आदमी यहाँ तुम चारों को देख लेता, और तुम्हारे हाथ में लोहे का बल्ला देख लेता — तो मुझे अभी बात करने के लिए कोई नहीं मिलता। समझ रहे हो?"
चारों चुप हो गए।
"बोलो।"
"समझ रहे हैं," सानिया ने कहा।
"अच्छा। अब अगली बार — अगली बार ऐसा कुछ दिखे, तो तुम लोग क्या करोगे?"
चारों ने एक-दूसरे को देखा।
"चिल्लाएँगे," गुड्डू ने कहा।
"नहीं," मैंने कहा।
"भागेंगे," रफ़ीक़ ने कहा।
"नहीं।"
"तो?" चिंटू ने कहा।
मैंने उनकी तरफ़ देखा। "तुम लोग किसी को बताओगे। बड़े को। मुझे। शबनम आपा को। उस्ताद को। उस आदमी को जो सबसे नज़दीक हो। तुम्हारा काम खबर पहुँचाना है, लड़ना नहीं। लड़ना मेरा काम है — और वो भी तभी, जब कोई रास्ता न बचे। समझे?"
"समझे," उन्होंने कहा। और सानिया ने कहा, "पर उस्ताद, हमारी खबर से आज आग बुझी। अगर हम न बताते, तो स्कूल जल जाता।"
वो सही थी।
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। "हाँ," मैंने कहा। "आज तुम लोगों ने स्कूल बचाया। और सच कहूँ, तो आज रात तुम चारों उन बड़ों से ज़्यादा काम के निकले जो मैदान में भाषण सुन रहे हैं।"
चारों के चेहरे खिल गए। चिंटू ने अपनी जैकेट उठाई, उसे झाड़ा, और फिर भी पहन ली — जली हुई, गीली, काली। उसने कहा, "ये अब मेरी जासूसी जैकेट है।"
और फिर मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
टिंकू खड़ा था। उसकी टाँग काँप रही थी। वो छिपाने की कोशिश कर रहा था, पर बच्चों से छिपाया जा सकता है, मुझसे नहीं। मैंने देखा कि उसके हाथ में माचिस का डिब्बा था और उसकी उँगलियाँ काली थीं।
"टिंकू," मैंने धीरे कहा।
"हाँ उस्ताद।"
"तू क्यों काँप रहा है?"
"नहीं काँप रहा।"
"तेरी टाँग काँप रही है।"
उसने नीचे देखा। जैसे टाँग को अलग आदमी मानकर उसे डाँटना चाहता हो।
"उस्ताद," उसने कहा, और उसकी आवाज़ बैठ गई, "जब मैं छत पर था, तब उस आदमी ने ऊपर देखा था।"
मैं सीधा खड़ा हो गया।
"क्या कहा?"
"उसने ऊपर देखा। मुझे देखा। उसने अपनी उँगली उठाई—" टिंकू ने वो हरकत की, और उसकी उँगली भी काँप रही थी, "ऐसे। जैसे कहे — तू अगली बारी है।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा हो गया।
मुझे पता है वो एहसास क्या होता है। तेरह साल का लड़का, जो स्कूल छोड़ चुका है, जो अपनी माँ से डरता है कि कहीं उसे काम से निकाल न दें — उस लड़के पर कोई उँगली उठाए तो वो टाँगें काँपेंगी। काँपेंगी ही।
मैं घुटनों के बल उसके सामने बैठ गया, वैसे ही जैसे दुकान पर बैठता हूँ जब कोई छोटा बच्चा रो रहा हो।
"टिंकू। मेरी तरफ़ देख।"
उसने देखा।
"उसने उँगली उठाई। ठीक है। उँगली से कुछ नहीं होता। आग लगती है माचिस से, उँगली से नहीं। और माचिस हमारे पास है।" मैंने उसके हाथ से डिब्बा लिया और उसकी जेब में रख दिया। "ये तेरे पास रहेगा। तू इसे अपनी जेब में रखेगा, और जब तेरी टाँग काँपेगी, तो इसे छू लेगा और याद करेगा कि आज रात इस डिब्बे को जलाने वाला भाग गया, और तू यहाँ खड़ा है।"
टिंकू ने एक लंबी साँस ली।
"और टिंकू — अगर वो तुझे दोबारा देखे भी, तो मैं उसके सामने खड़ा मिलूँगा। ये मेरा काम है। तुझे इसकी ज़रूरत नहीं पड़ेगी।"
उसने सिर हिलाया। उसकी टाँग अब भी काँप रही थी, पर कम।
उसी वक़्त, कूड़े के ढेर के पीछे वाले अंधेरे से एक आवाज़ आई।
पैरों के नीचे कुचली लकड़ी जैसी आवाज़। फिर साँस।
मैंने हाथ उठाया — रुको। सब रुक गए। रफ़ीक़ ने बाल्टी उठा ली। गुड्डू ने बल्ला।
और अंधेरे से निकला — बबलू।
उसके हाथ खाली थे।
बिल्कुल खाली। न चेन, न पानदान, न काग़ज़, न कुछ। उसकी कमीज़ पर धूल थी और उसका चेहरा पसीने से ऐसा भीगा था जैसे उसने मुँह धोया हो और पोंछा भूल गया हो।
वो मेरी तरफ़ देख रहा था।
और मैं उसकी तरफ़।
और उस पल, मुझे कुछ समझ आया — जैसे घंटी के बिना, किसी जादू के बिना, सिर्फ़ आदमी की शक्ल देखकर समझ आ जाता है। वो यहाँ था। वो उनके साथ आया था। पर उसने आग नहीं लगाई। आग लगाने वाले के हाथ में कैन था, माचिस थी, और जल्दी थी — भागते वक़्त आदमी का चेहरा ऐसा नहीं होता।
बबलू का चेहरा ऐसा था जैसे वो खुद जल रहा हो।
"बबलू," मैंने कहा।
वो कुछ नहीं बोला।
"बबलू," मैंने दोबारा कहा, और इस बार मेरी आवाज़ में वो सख़्ती नहीं थी जो थाने में थी। "तेरे हाथ खाली हैं।"
उसने अपने हाथ देखे, जैसे पहली बार देख रहा हो।
और फिर घंटी बोली।
बहुत छोटी आवाज़ में, बहुत धीमी, पर साफ़।
"इसके हाथ खाली हैं।"
बबलू की आँखें भर आईं।
वो धीरे-धीरे नीचे बैठा — पहले घुटनों के बल, फिर दोनों हाथ ज़मीन पर, और उसका सिर झुक गया। एक बड़ा, मोटा, चेन वाला, पान चबाने वाला, धमकाने वाला आदमी — राख और रेत में बैठा हुआ, और रो रहा था। ऐसे रो रहा था जैसे बरसों का हिसाब एक साथ टूट पड़ा हो।
मैंने उसे उठाने की कोशिश नहीं की।
कभी-कभी आदमी को बैठने देना चाहिए। अगर तुम उसे उस वक़्त उठा दो, तो वो फिर कभी नहीं बैठेगा — और जो आदमी कभी नहीं बैठा, वो कभी सच भी नहीं बोलेगा।
"उस्ताद," उसने कहा, और उसकी आवाज़ गला दबाकर निकली, "मैंने माचिस नहीं जलाई।"
मैं चुप रहा।
"मैंने माचिस नहीं जलाई, उस्ताद।" उसने सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था और उस पानी के पीछे वो डर था जो बच्चों की आँखों में होता है — वो डर जो इंसान बड़ा होकर भी नहीं उतार पाता। "पर मैं यहाँ उनके साथ आया था।"
हवा रुक गई।
सानिया ने अपनी कॉपी सीने से लगा ली। रफ़ीक़ ने बाल्टी नीचे रख दी। गुड्डू का बल्ला ढीला पड़ गया। चिंटू ने अपनी जली जैकेट की जेब में हाथ डाल दिया, जैसे वहाँ कुछ ऐसा मिल जाए जो इस वक़्त काम आए।
दुबे अंकल ने अपनी छड़ी ज़मीन पर टिकाई और अपना सिर झुका लिया।
और मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी अब भी गरम थी।
"कह," मैंने कहा। "पूरी बात कह। यहाँ से जाने के बाद कोई कुछ नहीं कहेगा। पहले कह।"
बबलू ने अपना चेहरा दोनों हाथों से ढका।
और फिर उसने वो कहा, जो आज रात के बाद इस गली का हिसाब बदल देगा।
"साहब ने मुझे कहा था — स्कूल जला दो।"
॥
"साहब ने मुझे कहा था — स्कूल जला दो।"
यह वाक्य हवा में लटक गया और हवा ने उसे नीचे नहीं गिरने दिया। राख की गंध, जली जैकेट की बू, और उस आदमी के पसीने की महक — तीनों मेरे मुँह में एक साथ भर गईं। मैंने कुछ नहीं कहा। कभी-कभी चुप रहना सबसे ज़ोर की आवाज़ होता है, और उस वक़्त मुझे लगा कि अगर मैंने एक भी शब्द बोला, तो ये आदमी जो अभी-अभी खुद से टूटकर बाहर आया है, वापस अपने खोल में घुस जाएगा।
बबलू के हाथ ज़मीन पर थे। राख उसकी उँगलियों से चिपक रही थी।
दुबे अंकल ने छड़ी पर अपना वज़न डाला और धीरे से कहा, "बेटा, यहाँ नहीं।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"यहाँ नहीं," उन्होंने दोहराया। "ये आदमी अभी बोलेगा, पर यहाँ बोलेगा तो सिर्फ़ राख सुनेगी। इसे अंदर ले चल। पानी दे। और हाँ — एक रोटी रख दे सामने। जो आदमी रोते-रोते बोलता है, उसका गला सूख जाता है।"
बबलू ने सुना, पर सिर नहीं उठाया।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। वो सख़्त था, जैसे पत्थर। मैंने ज़ोर नहीं लगाया। बस हल्का-सा दबाया और कहा, "उठ।"
वो उठा। धीरे-धीरे, जैसे कोई बहुत पुराना दरवाज़ा खुल रहा हो जिसकी कुंडी ज़ंग खा गई हो।
हम स्कूल की पिछली बाउंड्री से निकले। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू पीछे-पीछे आने लगे, पर दुबे अंकल ने हाथ उठाकर उन्हें रोक दिया।
"तुम लोग यहीं रुको," उन्होंने कहा। "आग बुझी है, पर अंगारे अभी ज़िंदा हैं। कोई पानी का बर्तन भरकर रखो। और ख़ासकर तुम, गुड्डू — वो जीप का नंबर वाली कॉपी कहीं गिरा मत देना।"
गुड्डू ने अपनी जेब को दोनों हाथों से थाम लिया, जैसे उसमें हीरा हो।
टिंकू रुका नहीं। वो मेरे पीछे चुपचाप चलने लगा, और मैंने उसे मना भी नहीं किया। कभी-कभी लड़के को उस जगह खड़ा रहने देना चाहिए जहाँ से वो बड़ा होता है।
गली की धूल में हम तीनों के पैरों के निशान बनते गए — मेरे, बबलू के और टिंकू के। पीपल के नीचे से गुज़रते वक़्त मैंने देखा कि चबूतरी खाली है। दरोगा ने मेज़, कुर्सी, बोर्ड — सब हटा दिया था। ज़मीन पर एक चौकोर जगह बची थी जहाँ धूल अभी भी साफ़ थी, जैसे उसे याद हो कि वहाँ क्या रखा था।
उस्ताद की दुकान बंद थी। शटर पर वो भारी ताला लटक रहा था जो रात में लगा था, और उसके ऊपर नीलामी का काग़ज़ झूल रहा था। मैंने उसे देखकर अपनी नज़र फेर ली। आज रात के बाद उन सब चीज़ों का हिसाब होना था, पर पहले एक आदमी से बात करनी थी जिसके हाथ अभी खाली थे।
दुकान का शटर मैंने आधा ही उठाया — इतना कि हम झुककर अंदर जा सकें। पीछे वाले कमरे में बल्ब अब भी धीरे-धीरे गुनगुना रहा था, जैसे उसे भी पता हो कि आज रात किसी को अंधेरे की ज़रूरत है।
कमरे में चारपाई थी, लोहे की अलमारी थी, औज़ारों का ट्रंक था, और दीवार पर वो पुरानी झाड़ू टँगी थी जिससे मैं महीने में एक बार कमरा झाड़ता हूँ और बारहों महीने याद रखता हूँ कि झाड़ू भी अपनी जगह माँगती है।
मैंने बबलू को चारपाई के किनारे बैठाया।
टिंकू दरवाज़े के पास खड़ा रहा। उसके हाथ में अब भी वो आधा जला माचिस का डिब्बा था जो मैंने उसके हाथ से लेकर जेब में रखा था — नहीं, उसने वो तो मुझे दे दिया था, पर उसकी मुट्ठी अभी भी उसी आकार में बंद थी जैसे माचिस पकड़ी हो।
मैंने लोहे की अलमारी के ऊपर से स्टील का गिलास उठाया, पानी का मटका खोला, और भरकर बबलू के हाथ में रखा।
उसने गिलास नहीं पकड़ा। उसके हाथ काँप रहे थे।
मैंने गिलास उसकी उँगलियों पर टिका दिया। "पकड़।"
उसने पकड़ा।
"पी।"
उसने पिया। पहला घूँट गले से नीचे उतरते वक़्त उसकी आँखें बंद हो गईं, जैसे पानी उसके अंदर कहीं जाकर किसी सूखी ज़मीन पर गिरा हो। फिर उसने पूरा गिलास खत्म कर दिया और गिलास अपने घुटनों पर रख लिया।
मैंने ट्रंक के पास रखी थाली से रोटी उठाई — माँ ने शाम को जो रोटियाँ सभा के लिए बनाई थीं, उनमें से दो बची थीं — और उसके आगे रख दी। साथ में गुड़ का एक टुकड़ा। बिना ज़्यादा सोचे।
बबलू ने रोटी की तरफ़ देखा और फिर वैसे ही देखता रहा जैसे वो कोई चीज़ नहीं, कोई सवाल हो।
टिंकू ने एक लंबी साँस ली और फिर वो बोला जो वो बोलता है जब हिम्मत से ज़्यादा मुँह बोलता है।
"उस्ताद," उसकी आवाज़ में वो हल्की बेरुख़ी थी जो तेरह साल का लड़का अपनाता है जब वो किसी बड़े आदमी को टूटा देखता है, "इतनी बड़ी सोने की चेन वाला आदमी रोटी पर रो रहा है।"
बबलू ने सिर उठाया।
और उसकी आँखों में वो चीज़ आई जो उस वक़्त नहीं आनी चाहिए थी — गुस्सा।
"चेन?" उसकी आवाज़ फटी, जैसे पुराने ताले की जीभ। "ये चेन नकली है, टिंकू।"
उसने गले में हाथ डाला। वो चेन जिसे पूरी गली सोने की समझती थी, जिसे रणवीर के आदमी देखकर झुक जाते थे, जिसे देखकर बबलू खुद ऐसे चलता था जैसे उसके गले में सूरज लटक रहा हो — उसने खींचकर तोड़ दी।
धातु का टुकड़ा फ़र्श पर गिरा। मैंने उसे देखा। पीतल की परत पीली थी, पर किनारे पर जहाँ रगड़ लगी थी, वहाँ से सस्ता लोहा झाँक रहा था। मैंने बारीक चीज़ देखकर कभी नहीं कहा, पर आज देखा।
"नकली है," बबलू ने कहा, और उसकी आवाज़ में जो था वो कड़वाहट भी नहीं थी, बस थकान थी। "दो सौ साठ रुपये की है। जब मैं साहब के साथ पहली बार बाहर गया था — एक शादी में — तो उन्होंने खुद अपनी जेब से खरीदकर मेरे गले में डाल दी थी। कहा था, बबलू, तुझे देखकर लोगों को पता चलना चाहिए कि तू किसका आदमी है।"
उसने रोटी की तरफ़ देखा।
"मैं बारह साल उस चेन को सोने की तरह पहनकर घूमा, उस्ताद। और जिस दिन साहब ने कहा कि स्कूल जला दे — उस दिन मुझे लगा ये चेन उतार दूँ, तो मेरी कलाई, गला, सब नंगा दिखेगा।"
वो रुका।
"असली सिर्फ़ साहब की मुस्कान है।"
कमरे में एक पल के लिए सिर्फ़ बल्ब की गुनगुनाहट बची।
और फिर मैं हँसा।
नहीं, ऐसे नहीं जैसे किसी का मज़ाक उड़ा रहा हूँ। मैं हँसा इसलिए कि उस वाक्य में इतनी सच्चाई थी कि उसे सहने के लिए एक हँसी की ज़रूरत पड़ी। मैंने सिर पीछे किया और कंधे हिलाकर हँसा, और टिंकू पहले चौंका, फिर उसके होंठ भी हिले, और फिर बबलू — बबलू के मुँह से वो आवाज़ निकली जो पिछले कई दिनों से बंद थी। वो हँसी नहीं थी, वो उस हँसी का पुराना निशान था, पर वो निकली।
और उसके बाद उस आदमी का शरीर ढीला पड़ गया, जैसे किसी ने उसकी पीठ से बोरी उतार दी हो।
मैंने रोटी उसकी तरफ़ सरका दी। "खा।"
इस बार उसने रोटी उठाई। छोटा टुकड़ा तोड़ा, मुँह में रखा, और चबाने लगा। धीरे-धीरे। घूँट भरने की तरह।
और फिर मैं गंभीर हो गया।
"बबलू," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो सख़्ती नहीं थी जो थाने में थी, "एक बात सुन। आदमी गलती कर सकता है। बड़ी गलती। ऐसी गलती जिससे दूसरों का घर जल जाए।"
उसका हाथ रुक गया।
"पर सुधारने का मौक़ा हर बार मिलना चाहिए। हर बार नहीं मिलता — ये मैं जानता हूँ। बहुत लोगों को नहीं मिलता। पर जब मिले, तब उसे पकड़ना पड़ता है। दोनों हाथों से।"
मैंने उसकी तरफ़ झुककर देखा।
"तुझे मिला है। आज रात। ये मौक़ा है। इसे मत गँवा।"
उसने रोटी नीचे रख दी।
और फिर वो बोला — और इस बार आवाज़ काँप नहीं रही थी। बस धीमी थी। बहुत धीमी, जैसे कोई आदमी खुद से बात कर रहा हो।
"उस्ताद, साहब ने मुझे बुलाया था। दोपहर को। भवन की दूसरी मंज़िल पर। मैं गया, तो वो खिड़की के पास खड़े थे। मुस्कुरा रहे थे — वैसे ही, जैसे हर तस्वीर में मुस्कुराते हैं।"
वो रुका। उसका गला सूखा था। मैंने गिलास फिर भर दिया और उसके आगे रख दिया। उसने पिया।
"कहने लगे — बबलू, तेरे बच्चे हैं न?"
मेरे कान खड़े हो गए।
"मैंने कहा — जी साहब, दो हैं। बेटा और बेटी। बेटी की शादी अगले साल सोच रहा हूँ।"
"तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा — अच्छा। फिर शादी भी हो जाएगी, और तेरी नौकरी भी रहेगी। बस एक काम करना है।"
बबलू की आवाज़ टूटी।
"मैंने पूछा — क्या काम, साहब? तो उन्होंने काग़ज़ की तरफ़ इशारा किया और कहा — स्कूल। उसकी छत। जला दो।"
टिंकू ने दरवाज़े की चौखट पर अपना हाथ रख लिया। उसकी उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गईं।
"मैंने कहा — साहब, वहाँ बच्चे पढ़ते हैं। तो उन्होंने कहा — अभी बच्चे नहीं हैं। रात है। काग़ज़ जलेंगे, बच्चे नहीं। और अगर काग़ज़ जल गए, तो कल वहाँ पढ़ने वाले बच्चे भी नहीं रहेंगे — वो नई इमारत में जाएँगे। साफ़-सुथरी इमारत। क्या बुरा है इसमें?"
उसने अपना सिर हिलाया, जैसे खुद को झटका दे रहा हो।
"और मैंने कहा — साहब, ये ठीक नहीं है। तो उन्होंने मुस्कान नहीं छोड़ी। बस आवाज़ बदल दी। कहा, बबलू, बारह साल से तू मेरी छाया में चल रहा है। तेरा किराया, तेरे बच्चों का स्कूल, तेरी बीवी का इलाज — सब इसी छाया से है। और अब जब एक छोटा-सा काम है, तो तू ठीक नहीं है बोल रहा है?"
बबलू ने अपने घुटनों को देखा।
"फिर उन्होंने कहा — अगर नहीं करेगा, तो ठीक है। कल सुबह से तेरे काग़ज़ दफ़्तार से हटा दिए जाएँगे। तेरी चाबी मुझे दे दे। और उसके बाद जो तू करे, तेरी मर्ज़ी।"
मैं चुप रहा।
"मैंने बहुत सोचा, उस्ताद," उसकी आवाज़ भर्राई। "बहुत सोचा। मैंने सोचा — आग अगर मैं नहीं लगाऊँगा, तो कोई और लगाएगा। साहब ने कह दिया है, तो लगेगी। फिर मेरा क्या नुक़सान? मैं तो सिर्फ़ साथ जाऊँगा। मैं सिर्फ़ साथ खड़ा रहूँगा।"
वो रुका। उसका हाथ काँपा।
"बारह साल से मैं साथ ही खड़ा हूँ, उस्ताद। साथ खड़े रहने को ही मैं नौकरी समझ बैठा था।"
तब मैंने कुछ कहा — बहुत धीमे। "और तूने आग नहीं लगाई।"
उसने सिर हिलाया। "जब मोटा आदमी कैन लेकर बाउंड्री की तरफ़ गया, तब मुझे लगा — ऐसे तो नहीं होगा। मैंने उसे रोका भी। कहा, स्कूल के पीछे ज़्यादा सूखी घास है, वहाँ से शुरू कर।" वो रोया। "मैंने रास्ता बताया, उस्ताद। मैंने आग नहीं लगाई, पर रास्ता मैंने ही बताया।"
कमरे में सन्नाटा था।
फिर मैंने कहा, "कौन था वो मोटा? नीली शर्ट वाला।"
"साहब का नया आदमी। नाम नहीं बताया। बस कहता है — मुझे बुलाओ मत, मैं काम करके चला जाऊँगा।"
"और जीप वाला दुबला? लाल धागा बाँधे हुए?"
बबलू ने पहली बार हैरानी से देखा। "तुमने देखा?"
"गुड्डू ने देखा।"
उसने धीरे से कहा, "वो सफ़ेद कुर्ते वाले का आदमी है। उसका नाम भी नहीं जानता। बस इतना पता है कि जब वो आता है, तो साहब खुद दरवाज़े तक छोड़ने आते हैं।"
मेरे हाथ रुक गए।
मैंने टिंकू की तरफ़ नहीं देखा, पर मुझे पता था वो भी अब सीधा खड़ा हो गया है।
"बबलू," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी हो गई, "सफ़ेद कुर्ते वाला आज आया था? मिलने?"
उसने सिर हिलाया।
"कब?"
"शाम को। जब बत्तियाँ बुझी थीं। वो भवन के पिछले दरवाज़े से आया। साहब उसके सामने खड़े थे और उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे… जैसे कोई मास्टर बच्चे से पूछ रहा हो कि होमवर्क किया या नहीं।"
"क्या कहा उसने?"
बबलू ने अपना गला साफ़ किया। जैसे वो शब्द मुँह में रखे हुए हैं और निगलना नहीं चाहता।
"उसने कहा — आज रात बक्से के पास खुद जाना। साहब ने कहा — जी सर। मैंने सुना — सर।"
वो रुका।
"मैं बारह साल साहब के साथ हूँ, उस्ताद। मैंने उन्हें कभी किसी के सामने झुकते नहीं देखा। पर उस आदमी के सामने वो झुके।"
मैंने कुर्सी खींची और बैठ गया।
सच कहूँ, तो उस पल मेरे हाथ ठंडे पड़ गए थे। मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और घंटी को छुआ। वो न गरम थी, न ठंडी। बस वैसी थी जैसे कोई साँस रोककर सुन रहा हो।
"आज रात?" मैंने पूछा। "कितने बजे?"
"बत्तियाँ बुझने के बाद। साहब ने कहा — बारह बजे। बक्से के पास। अकेले।"
"और तू?"
"मुझे बाहर रुकने को कहा। दूर। कहा — तेरी ज़रूरत नहीं।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। "बबलू, तू सच बोल रहा है?"
उसने अपना सिर उठाया और सीधा मेरी तरफ़ देखा। "उस्ताद, मैं बारह साल से भाग रहा हूँ। आज पहली बार मुझे कोई जगह ऐसी मिली है जहाँ खड़े होकर मुझे भागना नहीं पड़ेगा। तू मुझे मार सकता है, गली से निकाल सकता है — पर आज मैं झूठ नहीं बोलूँगा।"
टिंकू ने दरवाज़े से कहा, "उस्ताद, अगर वो अकेले जा रहा है, तो हम भी जा सकते हैं।"
"नहीं," मैंने कहा। "पहले बात पूरी सुन।"
मैं बबलू की तरफ़ मुड़ा।
"एक बात साफ़ कर। सफ़ेद कुर्ते वाला — वो असल में कौन है? नाम?"
उसने सिर हिलाया। "नाम नहीं पता। पर उसकी उँगली पर काली अंगूठी है। और जब वो बोलता है, तो साहब की आवाज़ भी धीमी हो जाती है।"
"कब से?"
"मैं जब से साहब के साथ हूँ — दस-बारह साल। वो आता रहा है। महीने में एक बार। कभी दो बार। कभी रात को, कभी सुबह। साहब उसके लिए दरवाज़ा खुद खोलते हैं।"
मैंने पूछा, "और वो क्या करता है?"
बबलू ने अपना निचला होंठ काटा। "उस्ताद, मैंने उसके साथ कभी काम नहीं किया। पर इतना पता है — साहब जो भी बड़ा काम करते हैं, उससे पहले वो आता है। और उसके जाने के बाद साहब का चेहरा थोड़ा और… ठंडा हो जाता है।"
टिंकू ने धीरे से कहा, "जैसे कोई बैटरी लगाकर जाता हो।"
बबलू ने उसकी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा।
मैंने कुर्सी पीछे सरकाई और खिड़की की तरफ़ देखा। बाहर गली में अंधेरा था और दूर कहीं पीपल की तरफ़ एक लालटेन जल रही थी, जिसकी रोशनी में कोई आदमी धीरे-धीरे चल रहा था।
मैंने कहा, "बबलू, तुझे एक बात पूछनी है। और अगर तू झूठ बोलेगा, तो मैं जान जाऊँगा।"
उसने गिलास मज़बूती से पकड़ा। "पूछ।"
"तूने बारह साल साहब के साथ काम किया। तूने उनके हर काग़ज़ को, हर दरवाज़े को, हर आदमी को देखा। अब बता — क्या साहब के पास ऐसी कोई चीज़ है जो उनके हाथ में नहीं, पर उन्हें लगता है कि उनके हाथ में है?"
बबलू की आँखें सिकुड़ीं। वो सोचने लगा।
"मतलब?"
"मतलब — कोई ऐसी चीज़ जो उन्हें ताक़त देती है, जो उनके काबू में नहीं है, पर वो समझते हैं कि है।"
वो एक पल चुप रहा। फिर उसने धीरे से कहा, "बिजलीघर का बक्सा।"
मैंने सिर हिलाया। "बता।"
"वहाँ वो अकेले जाते हैं। महीने में एक-दो बार। रात को। कभी-कभी तो ऐसे ही — बीच में — जैसे किसी से मिलने जा रहे हों। मैंने एक बार पूछा, तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा — बबलू, वहाँ मेरा हिसाब रखा है।"
"कैसा हिसाब?"
"मैंने भी पूछा था," बबलू ने कहा। "तो उन्होंने कहा — जो आदमी अपना हिसाब नहीं देखता, वो दूसरों का हिसाब हमेशा गलत लिखता है।"
मैंने देखा कि टिंकू के चेहरे पर वो भाव आया है जो उसे तब आता है जब उसे कुछ समझ आता है। मैंने उसे इशारा नहीं किया। कभी-कभी लड़के को अपने दिमाग़ की आवाज़ खुद सुननी चाहिए।
"बबलू," मैंने कहा, "आज रात तू साहब के साथ जाएगा?"
उसने सिर नहीं हिलाया। "उन्होंने मना किया है।"
"पर तू जाना चाहता है?"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो आदमी के अंदर सिर्फ़ एक बार आती है — जब वो पहली बार समझता है कि उसने अपनी ज़िंदगी किसी और के हाथ में रखी थी।
"मैं जाना चाहता हूँ," उसने कहा। "पर डरता हूँ।"
"डर किस बात का?"
"इस बात का कि कहीं वो मुझे देखकर मुस्कुरा न दे।" उसकी आवाज़ भर्राई। "उस्ताद, उस आदमी की मुस्कान से मैं बारह साल से डरता आया हूँ। और मैं खुद नहीं जानता क्यों।"
मैं हँसा।
वो चौंका।
"बबलू," मैंने कहा, "मुस्कान से डरना सही है। पर मुस्कान में ताक़त नहीं होती। ताक़त उस चीज़ में होती है जो मुस्कान के पीछे छिपी होती है। और तूने अभी-अभी वो चीज़ मुझे बता दी है।"
उसने पूछा, "क्या?"
"बक्सा।"
कमरे में एक पल के लिए बल्ब फीका पड़ा, फिर वापस चमका। जैसे उसे भी हामी देनी हो।
मैंने जेब से घंटी निकाली।
वो गरम थी। बहुत गरम नहीं, बस उतनी, जितनी कोई हाथ पकड़कर कहे कि वो सुन रहा है।
मैंने उसे धीरे से बजाया।
आवाज़ बहुत छोटी निकली, जैसे किसी दूसरे कमरे से आई हो।
"बक्सा जाग रहा है," घंटी ने कहा।
मैंने उसे जेब में रख लिया।
टिंकू ने पूछा, "उस्ताद, तो हम जाते हैं न?"
"हाँ," मैंने कहा। "पर सिर्फ़ हम नहीं जाएँगे। पूरी गली जाएगी।"
मैं उठा। मेरी कुर्सी पीछे सरकी और उसकी टाँग फ़र्श पर खुरच खाकर रुकी।
बबलू भी उठा। उसने अपनी टूटी चेन उठाकर जेब में डाली — फेंकी नहीं। मैंने देखा और कुछ नहीं कहा। कभी-कभी आदमी को अपनी गलती का सबूत जेब में रखना चाहिए, ताकि वो फिर उसी गलती पर न लौटे।
वो दरवाज़े तक आया, फिर रुक गया।
"उस्ताद," उसकी आवाज़ बदल गई। धीमी। बहुत धीमी। जैसे वो आख़िरी बात बोलने से पहले खुद से लड़ रहा हो।
मैं रुका।
"एक और बात है," उसने कहा। "मैं इसे बोलना भूल गया था। या शायद बोलना नहीं चाहता था।"
"बोल।"
उसने एक लंबी साँस ली।
"साहब ने आज दोपहर को ही कहा था — साइकिल मँगवा लो।"
मैंने पलटकर देखा। "कौन-सी साइकिल?"
वो मेरी तरफ़ देख रहा था, और उसकी आँखों में वो डर था जो अब तक नहीं था — ये डर अपने लिए नहीं था।
"तुम्हारे पापा की पुरानी साइकिल। वही जो उन्होंने पच्चीस साल पहले गिरवी रखी थी।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
"मैंने पूछा — क्यों, साहब? तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा — साइकिल पर बैठकर कोई बोलेगा। मंच पर। कल शाम।"
कमरे में सन्नाटा था।
और फिर घंटी बजी।
इस बार उसकी आवाज़ साफ़ थी। बिल्कुल साफ़। जैसे कोई बहुत दूर से नहीं, ठीक मेरे कान के पास से बोल रहा हो।
"अब साइकिल बोलेगी।"
॥
"अब साइकिल बोलेगी।"
ये शब्द कमरे में इस तरह लटके रहे जैसे छत से कोई पुरानी चीज़ झूल रही हो और किसी को छूने की हिम्मत न हो।
बबलू ने अपनी गर्दन धीरे से घुमाई। उसका मुँह खुला रह गया था।
टिंकू ने पहले मेरी तरफ़ देखा, फिर बबलू की तरफ़, फिर दोबारा मेरी तरफ़। उसकी आँखों में वो सवाल था जो उसे रोज़ पूछना होता है, पर आज उसने ज़ुबान से नहीं पूछा। वो उठा, ट्रंक के पास गया, और मेरे औज़ारों को इस तरह छूने लगा जैसे उनमें जवाब छिपा हो।
"उस्ताद," बबलू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो रूखापन लौट आया था जो सच बोलने के बाद थोड़ी देर के लिए चला जाता है, "तुम्हें समझ आ रहा है या मुझे समझाऊँ?"
"समझ आ रहा है," मैंने कहा। "पर पसंद नहीं आ रहा।"
"क्या?"
"ये कि वो साइकिल पर किसी और को बिठाएगा।" मैंने घंटी जेब में रखी। "साइकिल मेरे पापा की है, बबलू। वो खड़ी थी पच्चीस साल से। किसी ने उसे छुआ नहीं। और आज अचानक साहब को याद आ गई। इसका मतलब है कि वो उस साइकिल पर सिर्फ़ एक आदमी नहीं बिठाना चाहता। वो उस साइकिल से एक बात कहलवाना चाहता है।"
बबलू ने धीरे से कहा, "वो हमेशा से ऐसा ही करता है। वो खुद कुछ नहीं बोलता। वो चीज़ों से बुलवाता है। काग़ज़ से, चाबी से, कुर्सी से, और अब साइकिल से।"
टिंकू ने पलटकर कहा, "तो हम साइकिल को उससे पहले उठा लें।"
मैं हँस पड़ा। सच में हँसा। उसकी बात इतनी सीधी थी कि मेरे सारे सोच के जाले एक झटके में टूट गए।
"टिंकू," मैंने कहा, "तू एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगा। या बहुत बड़ा मुसीबत। दोनों में फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि उसे कौन साथ लेकर चलता है।"
उसने गर्व से छाती फुलाई। "तो हम साइकिल उठा लेते हैं?"
"नहीं," मैंने कहा। "आज नहीं। आज हम साइकिल नहीं उठाएँगे। आज हम गली को उठाएँगे।"
मैंने उन दोनों को देखा।
"आज रात बारह बजे से पहले मुझे पीपल के नीचे पूरी गली चाहिए। हर वो आदमी जो बाईस साल से डरकर चुप बैठा है। हर वो औरत जो अपना नाम किसी काग़ज़ पर नहीं लिखवाना चाहती थी। हर वो बच्चा जो जानता है कि उसके अब्बा साइट पर कितनी मज़दूरी लेते हैं और घर में क्या बताते हैं।"
बबलू ने कहा, "इतनी रात को कोई नहीं आएगा। लोग डरते हैं।"
"तो हम डर का इलाज करेंगे," मैंने कहा। "और इलाज आज चाय से शुरू होगा।"
बबलू ने मुझे देखा, जैसे मैंने कुछ ऐसा कहा हो जो उसे समझ नहीं आया। फिर वो धीरे से हँसा — पहली बार उस शाम। उसकी हँसी खुरदुरी थी, जैसे बरसों से बंद कमरे का दरवाज़ा खुला हो।
"तू अजीब लड़का है, उस्ताद," उसने कहा। "तेरे पास जवाब नहीं होते। तेरे पास सिर्फ़ काम होते हैं।"
"जवाब भी हैं," मैंने कहा। "पर जवाब देने से पहले मैं लोगों को एक जगह बैठाना चाहता हूँ। जवाब अकेले में सोचे जाते हैं, पर सच सिर्फ़ भीड़ में बोला जाता है।"
बाहर निकलते वक़्त आसमान में तारे निकल आए थे।
गली में वो अजीब सी खुशबू थी जो आग बुझने के बाद रात में आती है — गीली राख, जली घास और ठंडी मिट्टी की। स्कूल की पिछली बाउंड्री से अभी भी धुआँ उठ रहा था, पतला, जैसे कोई सिगरेट बुझा कर चला गया हो।
दुबे अंकल बच्चों के साथ वहीं खड़े थे। उन्होंने मुझे देखा और सिर हिलाया।
"कुछ और नहीं जला," उन्होंने कहा। "रजिस्टर बच गए। पर अगर ये लोग एक बार और आए, तो मैं अपनी छड़ी से नहीं, अपनी किताब से लड़ूँगा।"
"आज रात कोई नहीं आएगा, अंकल," मैंने कहा।
"कैसे पता?"
"क्योंकि आज रात उनका आदमी बक्से के पास होगा। और जो आदमी बक्से के पास होता है, वो आग जलाने के लिए आदमी नहीं भेज सकता। उसे अपने आस-पास सब चाहिए होता है।"
दुबे अंकल ने मुझे देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो बूढ़े सिपाही की आँखों में तब आती है जब कोई लड़का उन्हें ऐसी बात बता दे जो उन्हें खुद सोचनी चाहिए थी।
"तू ठीक कहता है," उन्होंने कहा। "पर फिर भी मैं यहीं बैठूँगा। मेरी कुर्सी यहीं रहेगी।"
फिर शाम ढल गई — नहीं, शाम नहीं, रात ढल रही थी, ऊपर की तरफ़।
पीपल के नीचे पहले सिर्फ़ दो दीये जले। फिर चार। फिर आठ। फिर मैंने गिनना छोड़ दिया।
बच्चों ने मिट्टी के दीये बनाए थे, असली वाले, जो मेले में मिलते हैं — छोटे, टेढ़े, किसी के किनारे पर अँगूठे का निशान। तेल शबनम आपा की रसोई से आया, और बत्तियाँ पुराने कपड़े को फाड़कर बनाई गईं।
सानिया दीये जलाने में उस्ताद थी। उसने हर दीये को तीन बार फूँका, दो बार बुझाया, और फिर जब जला तो चिल्लाकर सबको बुलाया, जैसे उसने आग नहीं, कोई खज़ाना खोजा हो।
गुड्डू ने दीयों को पीपल की जड़ के पास एक गोल घेरे में रखा।
रफ़ीक़ ने हर दीये के पीछे एक पत्थर रखा, ताकि हवा से न गिरें।
चिंटू ने पूरे चौक का चक्कर लगाकर बताया कि कहाँ-कहाँ अंधेरा है और कहाँ रोशनी पहुँच रही है — जैसे वो कोई सरकारी अफ़सर हो।
और धीरे-धीरे लोग आने लगे।
पहले वो आए जो रोज़ आते हैं — भोला भाई, अपनी पतलून पहने, हाथ में कुछ नहीं, पर आँखों में वो चीज़ जो कह रही थी कि वो आज कुछ माँगने नहीं, कुछ देने आया है।
फिर नसीमा बाई आईं, अपनी राशन की दुकान का ताला जेब में डालकर।
फिर वो किराने वाले बूढ़े काका आए जिन्होंने पीले काग़ज़ पर अंगूठा लगाने से साफ़ मना कर दिया था। वो लाठी टेककर आए और पीपल की जड़ के पास बैठ गए, और उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा।
फिर सात-आठ औरतें आईं। फिर दो-तीन आदमी जो अब तक मुझसे आँख नहीं मिलाते थे, आज आँख मिलाकर सिर हिला गए।
मैं किसी से कुछ नहीं कह रहा था।
यही तो सीखा था मैंने — कभी-कभी जोड़ने का पहला काम यह होता है कि तुम कुछ न करो। बस खड़े रहो। बस जगह बनाओ। लोग खुद आ जाते हैं। बस उन्हें एक जगह दिखनी चाहिए जहाँ बैठने पर उनसे काग़ज़ न माँगा जाए।
तभी गुमटी की तरफ़ से खड़खड़ाहट आई।
शबनम आपा आ रही थीं — एक हाथ में बड़ी केतली, दूसरे में कपों की ट्रे, और सिर पर समोसों का थाल रखा हुआ, जैसे कोई पहाड़ पर चढ़ रहा हो।
उन्होंने थाल पीपल की चबूतरी पर रखा और एक लंबी साँस ली।
"मैंने कल चूल्हा बंद कर दिया था," उन्होंने कहा, बिना किसी से पूछे। "सबके सामने कह दिया था कि सच खुलने तक चाय नहीं बनेगी।"
किसी ने कुछ नहीं कहा।
"और आज शाम मैंने चूल्हा जलाया," उन्होंने आगे कहा। "क्योंकि मुझे लगा कि अगर सच खुलने के दिन भी चाय न बने, तो सच का क्या फ़ायदा?"
फिर उन्होंने कटोरियाँ बाँटनी शुरू कीं।
चाय गरम थी। सच में गरम। और उसमें अदरक उतनी थी कि गले से नीचे उतरते हुए लगा कि कोई अंदर से सफ़ाई कर रहा है।
मैंने कटोरी पकड़ी और पीपल की जड़ पर बैठ गया।
टिंकू मेरे पास आया और धीरे से बोला, "उस्ताद, बच्चे तैनात हैं।"
"कहाँ?"
"गली के मोड़ पर गुड्डू और रफ़ीक़ हैं। स्कूल के गेट पर चिंटू है। और सानिया पीछे वाली गली में है। सबके पास सीटी है।"
"सीटी कहाँ से आई?"
उसने थोड़ा शर्माते हुए कहा, "भोला भाई की दुकान से। उन्होंने पूछा नहीं, हमने बताया नहीं।"
"ठीक है," मैंने कहा। "पर एक बात याद रखना — सीटी सिर्फ़ तब बजेगी जब सच में कुछ हो। मज़े के लिए नहीं।"
"उस्ताद," उसने कहा, बहुत गंभीर होकर, "आज मज़े का दिन नहीं है।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। उसका सिर छोटा था और उसमें इतनी बातें भरी थीं कि मुझे अक्सर डर लगता था कि कहीं वो फट न जाए।
पापा पीपल के दूसरी तरफ़ बैठे थे। उन्होंने आज वो पुरानी नीली शर्ट नहीं पहनी थी। आज उन्होंने सादी सफ़ेद कमीज़ पहनी थी, और उसकी जेब में कुछ था जिस पर उनका हाथ बार-बार जाता था।
मैंने पूछा नहीं।
कभी-कभी बाप के पास बैठकर भी कुछ नहीं पूछना चाहिए।
उस्ताद अली बक्श अपनी दुकान से एक कुर्सी उठाकर लाए थे — वही कुर्सी जिस पर वो रोज़ बैठते हैं। उन्होंने उसे पीपल के नीचे रखा और खुद उस पर बैठ गए, और फिर किसी से कुछ नहीं कहा।
मीरा अपना कैमरा लेकर आई थी, पर उसने आज उसे तिपाई पर नहीं रखा। उसने उसे नीचे रख दिया, बंद कर दिया, और मेरे पास आकर बैठ गई।
"आज रिकॉर्ड नहीं करोगी?" मैंने पूछा।
"आज नहीं," उसने कहा। "आज मैं सिर्फ़ देखना चाहती हूँ। और सुनना। कुछ चीज़ें कैमरे के सामने नहीं होतीं। वो सिर्फ़ उन लोगों के लिए होती हैं जो वहाँ मौजूद थे।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा और मुझे लगा कि ये वही मीरा नहीं है जो कुछ महीने पहले मेले में मेरे मुँह पर माइक थमा कर खड़ी थी। ये मीरा अब कुछ और है। या शायद वो हमेशा से यही थी, और उसने खुद को दिखाया नहीं था।
चाय के बाद शबनम आपा ने समोसे बाँटे।
फिर वो चुप हो गईं।
और उनका चुप होना अजीब था, क्योंकि शबनम आपा का चुप होना उतना ही अजीब है जितना पीपल का हिलना।
मैंने उनकी तरफ़ देखा। वो गुमटी की तरफ़ देख रही थीं, नहीं — गुमटी से भी आगे, गली के मुँह की तरफ़। जहाँ अंधेरा था।
और फिर मैंने भी उस अंधेरे में देखा।
कोई आ रहा था।
एक औरत। सिर पर पुरानी चादर, जिसके किनारे से पीले पड़ चुके थे। हाथ में एक पुराना सूटकेस, जिसकी पकड़ टेप से बँधी थी। चलने में वो हिचकिचा रही थी, जैसे हर कदम पर सोच रही हो कि लौट जाऊँ या आगे बढ़ूँ।
वो पीपल के घेरे के बाहर रुकी।
और उसी वक़्त शबनम आपा के हाथ से चम्मच छूट गया।
चम्मच फ़र्श पर गिरा — पत्थर पर। उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि चौक में हर आदमी ने सिर उठा लिया।
किसी ने कुछ नहीं कहा।
किसी ने साँस तक नहीं ली।
शबनम आपा वहीं खड़ी रहीं, हाथ हवा में, जैसे कोई उन्हें रोक रहा हो।
और फिर वो औरत बोली।
"आपा।"
बस इतना। एक शब्द। बहुत धीमा। बहुत टूटा।
चारों तरफ़ लोगों के चेहरे बदलने लगे। पहले किसी को समझ नहीं आया। फिर एक बूढ़ी औरत ने धीरे से कहा, "रज़िया?"
और फिर जैसे एक साथ दस लोगों को याद आ गया।
"रज़िया आपा।"
"शबनम की बहन।"
"अरे, ये तो पंद्रह साल बाद…"
"चुप करो।"
आख़िरी आवाज़ किसी ने डपटकर कही और सब चुप हो गए।
मैंने अपनी कटोरी नीचे रखी।
मेरे पास कहने के लिए बहुत कुछ था, पर मैंने कुछ नहीं कहा। मैं उठा, टिंकू का कंधा दबाया — जिसका मतलब था, बैठा रह — और मैं पीछे हट गया। पीपल के उस पार जाकर खड़ा हो गया, जहाँ से मुझे सब दिख रहा था और मैं किसी के रास्ते में नहीं था।
शबनम आपा ने अपना मुँह दूसरी तरफ़ फेर लिया।
ये वो मुँह फेरना नहीं था जो गुस्से में फेरा जाता है। ये वो मुँह फेरना था जिसमें आदमी अपने आँसू छिपाता है, क्योंकि उसने पंद्रह साल से अपने आप से एक वादा कर रखा है कि वो किसी के सामने नहीं रोएगी।
रज़िया ने अपनी जेब में हाथ डाला।
उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
वो कुछ निकाल नहीं पा रही थी — जैसे उसकी जेब में कुछ ऐसा है जो उसके हाथ से चिपक गया हो।
फिर उसने निकाला।
एक टूटी चूड़ी का टुकड़ा।
हरी चूड़ी। घिसी हुई। एक किनारे पर सुनहरी लकीर।
उसने उसे हथेली पर रखकर आगे बढ़ाया।
और शबनम आपा — जो पूरे मोहल्ले की सबसे तेज़ ज़ुबान वाली औरत थीं, जो किसी को भी दो शब्दों में चुप करा सकती थीं — उनका हाथ अपनी साड़ी के पल्लू के नीचे गया।
वो अपनी जेब से कुछ निकाल रही थीं।
मैंने देखा कि उनके हाथ भी काँप रहे थे।
उन्होंने एक टुकड़ा निकाला।
उसी चूड़ी का दूसरा टुकड़ा।
उन्होंने उसे हथेली पर रखा। दोनों टुकड़े एक दूसरे से उल्टे थे, पर मैं दूर से भी देख सकता था कि वो एक ही चूड़ी के हैं। किनारों पर वही सुनहरी लकीर। वही घिसाव। वही रंग।
दोनों औरतों की आँखें भर आईं।
कोई नहीं बोला।
समोसों का थाल वहीं पड़ा रहा। चाय ठंडी होने लगी। दीयों की लौ हवा में हिल रही थी और किसी ने उन्हें रोका नहीं।
रज़िया ने पहले हाथ बढ़ाया।
फिर रोक लिया।
फिर उसने अपना सूटकेस नीचे रखा — बहुत संभालकर, जैसे उसके अंदर कुछ बहुत नाज़ुक रखा हो — और दोनों हाथों से अपनी चादर सीधी की।
तभी भोला भाई ने धीरे से कहा, "आपा, बैठिए न।"
शबनम आपा ने उनकी तरफ़ ऐसी नज़र की कि भोला भाई एक कदम पीछे हट गए।
पर फिर उन्होंने खुद ही एक कटोरी उठाई, उसमें चाय डाली, और आगे बढ़ाकर रज़िया के हाथ में थमा दी।
"पहले पी ले," उन्होंने कहा। आवाज़ रूखी थी, पर रूखी में भी कुछ था। "रास्ते से आई है।"
रज़िया ने कटोरी दोनों हाथों से पकड़ी।
उसके हाथ काँप रहे थे। चाय किनारे पर आ गई।
उसने एक घूँट लिया।
फिर उसने कटोरी नीचे रखी और अपनी आँखें पोंछीं — आस्तीन से नहीं, हाथ की पीठ से, जैसे वो बच्ची हो।
और तब उसने वो बात कही जो वो पंद्रह साल से अपने अंदर लिए घूम रही थी।
"आपा।"
शबनम ने उसकी तरफ़ देखा। पहली बार पूरी तरह देखा।
"आपने माँ के आख़िरी दिनों में मुझे अस्पताल से बाहर क्यों धकेल दिया था?"
चौक में इतनी चुप्पी फैली कि पीपल की पत्तियों की आवाज़ सुनाई देने लगी।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी — न गरम, न बोलती। बस चुप। जैसे वो भी सुन रही हो।
शबनम आपा ने कुछ नहीं कहा।
उन्होंने बस अपनी हथेली में रखा चूड़ी का टुकड़ा देखा, और उनकी उँगलियाँ उसे इस तरह दबाने लगीं जैसे वो उससे कोई जवाब निकालना चाहती हों।
रज़िया ने अपनी आवाज़ नीची कर ली — इतनी नीची कि सिर्फ़ पास बैठे लोग सुन सकें। पर चौक में सब पास ही बैठे थे।
"मैं रोज़ आती थी," उसने कहा। "रोज़। सुबह दूध लेकर, शाम को दवा लेकर। और एक दिन आपने दरवाज़े पर खड़े होकर कह दिया कि अब तू मत आ।"
किसी औरत ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया।
"मैंने कहा था," शबनम आपा ने कहा। आवाज़ सपाट थी। "और मैं आज भी कहूँगी।"
"क्यों?"
"क्योंकि तू उस वक़्त गर्भवती थी," शबनम आपा ने कहा।
चौक में फिर सन्नाटा।
"अस्पताल में बुखार फैल रहा था," शबनम आपा ने आगे कहा, और उनकी आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो पंद्रह साल में जम गई थी। "माँ को क्या हो गया था, किसी को पता नहीं चला। डॉक्टर बोले — किसी को अंदर मत आने देना। और तू रोज़ आती थी, रोज़, बिना मास्क, बिना कुछ। मैंने तुझे रोका। तूने नहीं सुना। तो मैंने तुझे धक्का दिया।"
"धक्का नहीं," रज़िया ने कहा, और उसकी आवाज़ काँपी। "आपने मेरी बाँह पकड़ी और सीढ़ी से नीचे उतार दिया। और जब मैं फिर ऊपर आई, तो दरवाज़े पर ताला लगा था।"
"वो ताला डॉक्टर का था," शबनम आपा ने कहा। "मैंने नहीं लगाया था।"
"तो आपने खोला क्यों नहीं?"
ये सवाल हवा में लटक गया।
शबनम आपा ने कोई जवाब नहीं दिया।
उन्होंने चूड़ी का टुकड़ा उठाया और उसे देखने लगीं, जैसे उसमें जवाब लिखा हो।
"माँ ने तुझे बुलाया था," उन्होंने अचानक कहा। "आख़िरी रात। उन्होंने तीन बार तेरा नाम लिया।"
रज़िया की साँस अटक गई।
"और मैंने तुझे बुलाया था," शबनम आपा ने कहा। "मैंने तेरे घर फोन किया था। पर तेरे ससुराल वालों ने कह दिया कि तू सो रही है और वो तुझे जगाएँगे नहीं।"
वो चुप हो गईं।
"और मैंने उन्हें ज़ोर नहीं दिया," उन्होंने कहा। "मैंने सिर्फ़ कहा — ठीक है। और फोन रख दिया।"
रज़िया की आँखों से आँसू गिर रहे थे, और वो उन्हें पोंछ नहीं रही थी।
"मैंने तुझे अस्पताल से बाहर नहीं धकेला था," शबनम आपा ने कहा, और अब उनकी आवाज़ टूट रही थी। "मैंने अपने आप को अंदर बंद कर लिया था। मैं अकेली रह गई थी उस कमरे में। और मैं तुझे अंदर नहीं आने देना चाहती थी, क्योंकि अगर तू आ गई, तो मुझे बोलना पड़ता। और मुझे बोलना नहीं आता, रज़िया। मुझे सिर्फ़ चूल्हा जलाना आता है।"
ये सुनकर चौक में जो आवाज़ उठी, वो किसी के बोलने की नहीं थी। वो कई लोगों के एक साथ साँस भरने की थी।
टिंकू मेरे पास आया और उसने मेरी कमीज़ खींची।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
उसकी आँखें भरी हुई थीं। और उसके होंठ कुछ कहना चाह रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी।
मैंने धीरे से कहा, "बोल।"
"उस्ताद," उसने फुसफुसाकर कहा, "मेरी अम्मी भी नहीं बोलतीं। जब भी मेरे अब्बा की बात आती है, वो बस चूल्हे के पास चली जाती हैं।"
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"तो तू उनसे चूल्हे के पास जाकर बात करना," मैंने कहा। "कभी-कभी लोग चूल्हे के पास इसलिए जाते हैं क्योंकि वहाँ कोई सवाल नहीं पूछता।"
शबनम आपा ने आगे बढ़कर रज़िया का हाथ पकड़ा।
उन्होंने अपनी हथेली में रखा चूड़ी का टुकड़ा उसकी हथेली पर रखा — दोनों टुकड़े अब एक साथ थे।
"ये मैंने नहीं फेंका था," शबनम आपा ने कहा। "पंद्रह साल मेरी जेब में रहा। हर दिन।"
"मैंने भी नहीं फेंका," रज़िया ने कहा।
और फिर दोनों बहनें बैठ गईं।
बस बैठ गईं, पीपल की जड़ के पास, दीयों के घेरे में, जैसे पंद्रह साल पहले बैठी थीं।
किसी ने कुछ नहीं कहा।
शबनम आपा ने अपना हाथ बढ़ाया और रज़िया के सिर पर रख दिया।
और मैंने पीछे हटकर अपनी जेब से घंटी निकाली।
वो गरम थी।
बहुत हल्की गरम, जैसे किसी ने उसे हाथ में पकड़कर रखा हो और छोड़ दिया हो।
मैंने उसे हिलाया।
आवाज़ नहीं आई।
पर मुझे लगा कि उसने साँस ली है।
पीपल के नीचे, दीयों की रोशनी में, दो बहनें बैठी थीं और उनके बीच में चूड़ी का एक टुकड़ा था जो अब अधूरा नहीं लग रहा था।
पर सवाल अभी भी हवा में था।
वो सवाल जो रज़िया ने पूछा था, और जिसका पूरा जवाब अभी नहीं मिला था।
माँ की आख़िरी रात।
जो फोन रज़िया के ससुराल वालों ने उठाया था।
और शबनम आपा, जिन्होंने ज़ोर नहीं दिया।
ये बातें अभी बाकी थीं। और मुझे लगा कि आज रात, बारह बजे से पहले, ये सब सिर्फ़ पीपल के नीचे के दीयों की रोशनी में पूरा बोला जाएगा — क्योंकि आज रात पूरी गली सुन रही थी, और अब कोई भी किसी को चुप नहीं रहने देने वाला था।
मैंने घंटी को उलटा पलटा।
उस पर एक नई, बहुत पतली लकीर उभर आई थी।
और मुझे लगा कि उस लकीर के साथ एक और हाथ जुड़ गया है — उस औरत का हाथ जिसने पंद्रह साल से बक्से के भीतर अपनी बात नहीं रखी थी।
॥
शबनम आपा का हाथ रज़िया के सिर पर टिका रहा। वो हटाया नहीं।
पीपल के नीचे जितने लोग बैठे थे, सब चुप थे। दीयों की लौ हवा से एक तरफ़ झुकती, फिर सीधी हो जाती। किसी बच्चे ने खाँसा भी नहीं। किसी बूढ़े ने कराहा भी नहीं।
और मैंने पहली बार देखा कि शबनम आपा — जिनकी ज़ुबान गली में सबसे तेज़ थी, जो किसी को भी बोलने का मौका नहीं देतीं थी, जो चिमटी पटककर पूरी गली को चुप करा सकती थीं — वो चुप थीं।
बिल्कुल चुप।
उनकी आँखें रज़िया के सिर पर थीं, पर लग रहा था कि वो कहीं और देख रही थीं। पंद्रह साल पीछे।
रज़िया भी कुछ नहीं बोली।
मैंने सोचा कि हो सकता है यहीं सब ख़त्म हो गया। हो सकता है दोनों बहनें यूँ ही बैठ जाएँ, सुबह हो जाए, और कोई कुछ न कहे। पंद्रह साल की चुप्पी इसी तरह बैठती है — न खुलती है, न टूटती है। बस पड़ी रहती है, जैसे कोई पुराना संदूक जिसे खोलने डर लगता हो।
फिर शबनम आपा ने अपना हाथ रज़िया के सिर से हटाया।
और उन्होंने अपने दोनों हाथ अपने चेहरे पर रख लिए।
मैंने सोचा कि वो रो रही हैं। पर रोने की आवाज़ नहीं आई। सिर्फ़ उनके कंधे धीरे-धीरे हिल रहे थे, जैसे बारिश में कोई पुराना दरवाज़ा हिलता है।
"तू जानती है," उन्होंने कहा, और आवाज़ उनकी अपनी नहीं लगी, "मैंने तुझे टाला क्यों था?"
रज़िया ने अपना सिर उठाया।
"मैंने सोचा था तू मुझसे जलती है," रज़िया ने धीरे से कहा।
शबनम आपा ने हाथ चेहरे से हटाए। उनकी आँखें लाल थीं, पर एक भी आँसू नहीं गिरा था। ऐसा लगा जैसे वो आँसुओं को अंदर ही रोक रही हों, जैसे बाँध से पानी रोका जाता है।
"तू मुझसे जलती है?" उन्होंने कहा। "तू जब आई थी उस रात, तेरे पेट में… तू उसे भूल गई?"
पीपल के नीचे हल्की सी आवाज़ उठी। किसी औरत ने हाथ मुँह पर रखा।
रज़िया एकदम सीधी हो गई।
"क्या?" उसने कहा।
"तू गर्भवती थी," शबनम आपा ने कहा, और अब उनकी आवाज़ काँप रही थी। "पहला बच्चा आने वाला था। और डॉक्टर ने तुझे साफ़ कहा था — आराम करो, भागदौड़ मत करो, रात में बाहर मत निकलो। तूने वो डॉक्टर कहाँ देखा था? मेरे साथ। मैं ले गई थी तुझे। तू भूल गई?"
रज़िया का चेहरा बदल गया।
"माँ बीमार पड़ीं," शबनम आपा ने कहा, और अब आवाज़ तेज़ हो रही थी, पर गुस्से में नहीं — उस तरह जैसे पुरानी रस्सी खिंचने पर टूटने से पहले आवाज़ करती है। "और तूने कहा — मैं आ रही हूँ। और मैंने कहा — मत आ। तू पेट से है। तेरा ख़ून कमज़ोर है। डॉक्टर ने कहा था ना? कहा था कि पहला बच्चा है, संभलकर। मैंने कहा — तू नहीं आएगी।"
"मैंने सुना," रज़िया ने कहा, और उसकी आवाज़ में कुछ कड़वा आ गया था जो पंद्रह साल से जमा था। "मैंने सुना कि मेरी बहन ने मुझे माँ के पास आने से मना कर दिया। मुझे क्या समझा था तूने? कि मैं माँ से मिलकर उन्हें कुछ कह दूँगी? कि मैं तेरे सामने रो पड़ूँगी?"
"बहन—"
"मैं छुपकर आई थी," रज़िया ने कहा, और अब उसकी आवाज़ तेज़ हो गई। "रात को। तेरे पीछे। जब तू अस्पताल से लौटी, मैं तेरे पीछे-पीछे गई। मैंने सोचा कि तू मना करेगी, पर मैं माँ को एक बार देख लूँगी। बस एक बार।"
शबनम आपा की साँस रुक गई।
"वार्ड का दरवाज़ा बंद था," रज़िया ने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "मैंने दरवाज़ा खटखटाया। मैंने तेरा नाम लिया। मैंने कहा — आपा, मैं हूँ, रज़िया। पर कोई नहीं खोला। मैं वहाँ खड़ी रही। आधे घंटे। मैंने सोचा कि तूने सुन लिया और जानबूझकर नहीं खोला। मैंने सोचा कि तू चाहती है कि मैं माँ के पास न आऊँ।"
वो चुप हो गई।
"और मैं लौट गई," उसने कहा। "फिर कभी नहीं आई।"
पीपल के पत्तों में हवा आई और गई।
मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा।
उनके चेहरे पर वो भाव था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था। वो डर नहीं था, गुस्सा नहीं था। वो कुछ और था। वो चेहरा था जो आदमी के अंदर तब बनता है जब वो जान जाता है कि जिस काम को उसने बचाने की नीयत से किया था, वो किसी और के लिए पूरा बरबादी बन गया।
"मैंने दरवाज़ा नहीं बंद किया था," शबनम आपा ने कहा, और आवाज़ फुसफुसाहट जैसी थी। "मैं उस वक़्त अंदर थी। माँ की साँस… माँ की साँस कम हो रही थी। डॉक्टर अंदर था। नर्स मुझे बाहर जाने को कह रही थी। मैंने तेरा फोन नहीं सुना। मैं किसी का फोन नहीं सुन पाई उस रात।"
वो रुकीं।
"तू खटखटा रही थी," उन्होंने कहा, "और मैं… मैं माँ का हाथ पकड़े बैठी थी। मैंने सुना नहीं।"
रज़िया के होंठ काँपे।
"पर मैंने सुना," शबनम आपा ने कहा। "कुछ देर बाद। जब माँ की साँस आसान हुई। मैं दरवाज़े तक गई। मैंने दरवाज़ा खोला। तू नहीं थी। मैंने गलियारे में देखा। कोई नहीं था। मैंने सोचा कि तू कभी आई ही नहीं।"
"मैं आई थी," रज़िया ने कहा, और उसकी आवाज़ काँप रही थी।
"मुझे पता है," शबनम आपा ने कहा। "और मुझे यह भी पता है कि उसके बाद तू कभी नहीं आई। और मैंने तुझे ढूँढा भी नहीं। क्योंकि मुझे लगा कि तू गुस्से में है और मैं… मैं थक गई थी, रज़िया। माँ की देखभाल में मैं खुद को भूल गई थी। और जब माँ गईं, मैं इतनी टूट गई थी कि अपनी बहन को मनाने का भी हौसला नहीं रहा।"
"तूने मुझे नहीं मनाया," रज़िया ने कहा। "तूने कभी मुझे नहीं मनाया।"
"मुझे नहीं पता था कि मनाना कैसे होता है," शबनम आपा ने कहा, और ये पहली बार था जब उनकी आवाज़ टूटी। "मैं तुझसे बड़ी हूँ। मुझे बड़ी बहन होना सिखाया गया था। मुझे कभी किसी से माफ़ी माँगना नहीं सिखाया गया। मुझे सिर्फ़ चूल्हा जलाना सिखाया गया था, ताकि सब खाते रहें। और जब माँ गई, तो मैं चूल्हे के पास बैठी रही, रज़िया। क्योंकि वही एक चीज़ थी जो मुझे आती थी।"
दीयों की लौ एक साथ काँपी, जैसे हवा सबकी साँसों से बनी हो।
रज़िया ने अपने हाथ अपने घुटनों पर रखे। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
"मैंने तेरे फोन नहीं उठाए," उसने कहा। "तेरे बाद। मैंने सोचा कि तू यही कहेगी — माफ़ कर दे। और मैं माफ़ नहीं करना चाहती थी। क्योंकि माफ़ कर देने का मतलब था कि मैं मान लूँ कि जो हुआ, वो ठीक था। और मेरे लिए वो ठीक नहीं था। मेरा बच्चा… मैं उस वक़्त गिर गई थी, शबनम।"
पूरा पीपल सन्न रह गया।
"क्या?" शबनम आपा ने कहा। उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"तीन महीने बाद," रज़िया ने कहा, और अब उसकी आवाज़ पत्थर जैसी शांत थी, जैसे आदमी जब बहुत रो चुका हो तो कुछ सूखा-सूखा कहता है। "मैं गिर गई। नुक़सान हो गया। मेरी सास ने कहा कि यही होता है जब लड़की अपने मायके वालों से ज़्यादा सोचती है। डॉक्टर ने कहा कि ऐसा होता है। किसी को दोष नहीं दिया जा सकता। पर मैंने उस रात को याद रखा। मैंने सोचा कि अगर मैं माँ के पास आ गई होती, अगर तूने दरवाज़ा खोल दिया होता, तो शायद…"
वो रुक गई। फिर उसने कहा, "मुझे नहीं पता। शायद कुछ भी नहीं बदलता। पर मैंने किसी को दोष देना चाहा। और तू सबसे आसान थी।"
शबनम आपा उठीं।
वो धीरे उठीं, जैसे उनके घुटने अचानक भारी हो गए हों। वो रज़िया के सामने गईं।
और फिर — मुझे यक़ीन नहीं हुआ — वो घुटनों के बल बैठ गईं।
न दीयों की लौ ने कुछ कहा। न हवा ने। न किसी ने।
"मुझे नहीं पता था," शबनम आपा ने कहा, और अब वो रो रही थीं। खुलकर। बिना रोक। "मुझे नहीं पता था कि तू आई थी। मुझे नहीं पता था कि तूने खटखटाया। मुझे नहीं पता था कि तूने बच्चा खोया। अगर मुझे पता होता, तो मैं…"
"तू क्या करती?" रज़िया ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो पुराना गुस्सा लौटा, पर पहले से कमज़ोर। "तू क्या करती? तेरे पास वक़्त नहीं था। तू माँ के पास थी।"
"तब मुझे तुझे छोड़ना नहीं चाहिए था," शबनम आपा ने कहा।
और फिर जो उन्होंने कहा, वो शायद सबसे भारी बात थी जो पीपल के नीचे उस रात बोली गई।
"मैंने सोचा था कि मैं सबको बचा लूँगी," उन्होंने कहा। "मैंने सोचा कि माँ को बचा लूँगी। मैंने सोचा कि तुझे बचा लूँगी, तेरे बच्चे को बचा लूँगी, इस घर को बचा लूँगी। मैंने सोचा कि अगर मैं अकेली सब सह लूँगी, तो कोई नहीं टूटेगा।"
उनकी आवाज़ रुकी।
"पर मैंने सब कुछ खो दिया," उन्होंने कहा। "माँ गईं। तू गई। मेरे पास सिर्फ़ ये गुमटी बची। और ये चूल्हा। और पंद्रह साल में मैंने एक बार भी तुझसे यह नहीं कहा कि मैं तुझे याद करती हूँ।"
रज़िया उठी।
वो एक पल के लिए खड़ी रही, जैसे झूल रही हो। फिर उसने अपनी बहन को गले लगा लिया।
और दोनों गिर पड़ीं — घुटनों के बल, दीयों के बीच, पीपल की जड़ के पास — और रोने लगीं।
मैंने पीछे देखा।
शबनम आपा के हाथों से गिरी हुई चूड़ी के दोनों टुकड़े पत्थर पर पड़े थे।
और मैंने अपनी आँखों से देखा — मैं क़सम खाकर कहता हूँ, और मैं झूठ नहीं बोल सकता उस वक़्त — कि वो दोनों टुकड़े एक-दूसरे की तरफ़ खिसके।
धीरे। बहुत धीरे। जैसे किसी ने उन्हें नीचे से हाथ लगाकर धकेला हो।
वो मिले।
और उनके बीच की दरार… वो गायब नहीं हुई, पर वो बंद हो गई। जैसे कोई लकीर बनकर रह गई हो — वैसे ही जैसे टूटी हड्डी जुड़ने के बाद निशान छोड़ जाती है।
किसी ने ऊँची साँस भरी।
सानिया ने अपना हाथ मुँह पर रखा। गुड्डू ने अपनी आँखें मली, जैसे देखने की ग़लती हो गई हो।
शबनम आपा और रज़िया — दोनों रोने में इतनी डूबी थीं कि उन्होंने देखा भी नहीं।
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली।
वो गरम थी।
हल्की गरम — पहले से ज़्यादा, पर जलाने वाली नहीं।
और फिर उसने हिली।
अपने आप।
मेरे हाथ में रखी थी, और हिली, जैसे कोई उसे अंदर से धक्का दे रहा हो।
और उसकी आवाज़ आई।
रहस्यमय आवाज़ नहीं। छोटी, धीमी, साफ़।
"चालीस अंक," उसने कहा। "आधे तुम्हारे, आधे उधर।"
मेरे पीछे किसी ने कहा, "क्या कहा?"
मैंने पलटकर नहीं देखा।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। वो पीपल की दूसरी तरफ़ खड़े थे, दोनों हाथ सामने, जैसे प्रार्थना में। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से सिर हिलाया।
मैंने अपनी जेब से कॉपी निकाली और उसमें अंक लिखे।
अड़तीस थे। अब अठहत्तर।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। उनका चेहरा गंभीर था।
और तभी — बिल्कुल उसी वक़्त — दूर से आवाज़ आई।
पुराने बिजलीघर से।
एक गुनगुनाहट। लंबी। तेज़। जैसे कोई भारी मशीन भीतर से चालू हो रही हो, फिर भी कोई शोर न कर रही हो। ज़मीन से आती आवाज़। ज़मीन के भीतर से।
मैंने आसपास देखा।
पूरा पीपल सन्न था।
सानिया ने अपने अब्बा का हाथ पकड़ लिया। चिंटू दुबे अंकल की कुर्सी के पीछे छिप गया।
माँ ने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा।
"क्या ये?" उन्होंने धीरे से कहा।
"मैं नहीं जानता," मैंने कहा। "पर ये पहली बार नहीं है।"
दुबे अंकल ने अपनी छड़ी उठाई और उस गुनगुनाहट की दिशा में देखने लगे, जैसे वहाँ से कोई निकल आएगा।
शबनम आपा ने रज़िया को धीरे से अपने से अलग किया। उनके चेहरे पर आँसू सूख रहे थे, पर वो सूखे नहीं थे। वो चमक रहे थे, दीयों की रोशनी में।
उन्होंने उठकर चूड़ी के जुड़े टुकड़े उठाए।
दोनों टुकड़े उनके हाथ में थे। बीच की लकीर दिख रही थी। पर टुकड़े अलग नहीं हुए। वो जुड़े रहे।
उन्होंने वो चूड़ी अपनी कलाई पर पहनी।
दोनों हाथों से। धीरे से।
वो कलाई पर बैठ गई।
और फिर उन्होंने रज़िया की तरफ़ देखा।
"बैठ," उन्होंने कहा।
रज़िया बैठी।
शबनम आपा उसके साथ बैठीं।
पीपल की जड़ के पास, दीयों के बीच, दो बहनें बैठीं — पंद्रह साल बाद — और इस बार कोई रो नहीं रहा था।
शबनम आपा ने अपने आप को सीधा किया।
"मैं कुछ कहना चाहती हूँ," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ पूरे पीपल तक पहुँची। "इस सभा में। सबके सामने।"
मैंने कहा, "कहिए।"
"जो शंकर भाई के साथ हुआ," उन्होंने कहा, "वो सबके साथ हो रहा है। एक-एक करके। एक-एक दरवाज़े पर। और हम सब चुप बैठे हैं — क्योंकि हमें लगता है कि अगर हम बोलेंगे तो कुछ और टूट जाएगा।"
उन्होंने रज़िया का हाथ पकड़ा।
"और जब तक हम चुप बैठे रहेंगे," उन्होंने कहा, "तब तक वो साहब हमारे घर बनाता रहेगा। हमारे दरवाज़े बंद करवाता रहेगा। हमारी दुकानें बंद करवाता रहेगा। हमारी दवा रुकवाता रहेगा। हमारे बच्चों को रोज़ धमकाता रहेगा।"
उन्होंने पीपल के नीचे बैठे हर आदमी की आँखों में देखा।
"मैं पंद्रह साल अपनी बहन से नहीं बोली," उन्होंने कहा। "मुझे लगा कि सही थी। आज पता चला कि सही नहीं थी। जो माँ गईं, वो ये नहीं चाहती थीं। वो चाहती थीं कि हम साथ हों। और मैंने पंद्रह साल में एक बार भी ये नहीं सोचा कि रज़िया भी वही सोच रही होगी जो मैं सोच रही थी।"
उनकी आवाज़ भारी हो गई।
"मैं आज सबके सामने कहती हूँ," उन्होंने कहा। "मुझसे जो गलती हुई, मैं उसे मानती हूँ। और मैं अपनी बहन से माफ़ी माँगती हूँ — न पीछे, न किसी कमरे में, न किसी दरवाज़े के पीछे। सबके सामने।"
रज़िया ने एक पल शबनम आपा की तरफ़ देखा।
फिर उसने अपनी बहन का हाथ अपनी दोनों हथेलियों में लिया।
"माफ़ी माँगने की ज़रूरत नहीं," उसने कहा। "माफ़ी तो मैं भी माँगती हूँ। क्योंकि तू रात में खटखटा रही थी और मैंने तुझे नहीं सुना। मैंने सिर्फ़ माँ की साँस सुनी थी। और उसके बाद मैंने कभी चूल्हे पर खड़े होकर तुझे नहीं देखा।"
और फिर शबनम आपा ने अपना सिर रज़िया के कंधे पर रख दिया।
दोनों की सिसकियाँ पीपल के पत्तों में गूँजीं।
मैंने पीछे हटकर अपनी घंटी उठाई।
वो अब भी गरम थी।
और फिर उसने फुसफुसाया, इतना धीमे कि सिर्फ़ मैंने सुना — "अब अगला हाथ नीचे है।"
मैंने गर्दन उठाई।
दूर, पुराने बिजलीघर की तरफ़, वो गुनगुनाहट अब और तेज़ थी। आधी आवाज़ मेरी ओर, आधी नीचे की ओर — जैसे ज़मीन के भीतर कोई चीज़ जाग रही हो।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उन्होंने मेरी ओर देखा और धीरे से कहा, "अंकुश। अब सवाल चूड़ी का नहीं। अब सवाल हाथ का है।"
"कौन सा हाथ?" मैंने पूछा।
उस्ताद ने अपनी मशीन की तरफ़ देखा, जो उनके पीछे पीपल के नीचे रखी थी। उन्होंने कहा, "जो अभी तक नहीं खुला।"
मैंने घंटी अपनी जेब में रखी।
मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा — वो रज़िया के कंधे पर सिर रखे बैठी थीं, और उनके चेहरे पर कुछ ऐसा था जो पंद्रह साल में मैंने कभी नहीं देखा था। सुकून नहीं। सिर्फ़… खुलापन। जैसे कोई पुराना बंद कमरा चल दिया हो।
मैंने कहा, "आपा।"
उन्होंने सिर उठाया।
"आज रात बारह बजे," मैंने कहा, "मुझे आपकी ज़रूरत है। भूमि पर, असली सभा में, जहाँ बक्सा खुलेगा।"
उन्होंने एक पल सोचा।
फिर उन्होंने कहा, "चूल्हा अब बंद कर दूँगी।"
और रज़िया ने कहा, "मैं चूल्हा जलाऊँगी। तू बोलना।"
शबनम आपा ने अपनी बहन की तरफ़ ऐसे देखा जैसे पहली बार देख रही हों।
और फिर — मैंने पीपल के नीचे पहली बार देखा — वो हँसीं।
बहुत छोटी हँसी। पर हँसी।
और उस हँसी में चूल्हे की आवाज़ थी, और तेज़ ज़ुबान की आवाज़ थी, और माँ की आवाज़ भी थी — बहुत दूर से आती हुई, जैसे कोई छत से नीचे बुला रहा हो।
मैंने कॉपी में लिखा — अड़तीस से अठहत्तर।
फिर मैंने उसके नीचे लिखा — "शबनम आपा — चूल्हा, ज़ुबान, और बहन।"
और तभी — दूर, पुराने बिजलीघर से — वो गुनगुनाहट अचानक रुक गई।
पूरी तरह। चुप।
पीपल के पत्तों में भी हवा रुकी।
और मेरी जेब में घंटी ठंडी हो गई।
मैंने घंटी निकाली। वो ठंडी थी। सपाट। जैसे कोई पुरानी लकड़ी की टुकड़ी।
मैंने अपनी आँखें सिकोड़कर उसे देखा।
और उस पर वो नई पतली लकीर — जो अभी थोड़ी देर पहले उभरी थी — वो अब गहरी हो गई थी। बल्कि मैं कहूँगा कि उस लकीर के बगल में एक और लकीर शुरू हो गई थी।
छोटी। आधी। अधूरी।
जैसे कोई लिखने लगा हो और रुक गया हो।
मैंने सिर उठाकर दुबे अंकल की तरफ़ देखा।
वो पहले से मेरी तरफ़ देख रहे थे।
उन्होंने कहा, "क्या हुआ?"
मैंने कहा, "कुछ नहीं।"
पर मैं झूठ नहीं बोल सकता था उस वक़्त। मैंने कहा, "कुछ शुरू हो रहा है।"
और मैंने उस पल फैसला किया — कि चाहे जो हो, आज रात बारह बजे, जब वो बक्सा खुलेगा, वहाँ पर सिर्फ़ मैं और पापा नहीं होंगे। वहाँ पूरी गली होगी। शबनम आपा होंगी, रज़िया होगी, टिंकू होगा, सानिया होगी, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू होंगे, माँ होंगी, दुबे अंकल होंगे, उस्ताद होंगे, मीरा होगी, शालिनी होगी, भोला भाई होंगे, नसीमा बाई होंगी, बूढ़े काका होंगे, बबलू होगा।
उस रात जो भी होगा, अकेले नहीं होगा।
मैंने घंटी को जेब में वापस रखी।
फिर मैंने पीपल के नीचे बैठी दोनों बहनों की तरफ़ देखा।
और मैंने धीरे से कहा, "आपा, आपका चूल्हा आज रात गुमटी में नहीं जलेगा।"
शबनम आपा ने सिर उठाया।
"क्यों?" उन्होंने पूछा।
"क्योंकि आज रात," मैंने कहा, "वो चूल्हा गली के बीच जलेगा। सबके सामने।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। फिर रज़िया की तरफ़।
और फिर उन्होंने कहा, "ठीक है।"
रज़िया ने कहा, "मैं लकड़ी लाऊँगी।"
टिंकू ने ऊँची आवाज़ में कहा, "मैं माचिस लाऊँगा।"
पीपल के नीचे कई लोग हँसे।
पर ये हँसी पुरानी नहीं थी।
ये हँसी वो थी जो आदमी तब हँसता है जब उसे पता हो कि कुछ बड़ा आने वाला है और वो अकेला नहीं है।
मैंने कॉपी बंद की।
और मेरी जेब में, ठंडी पड़ी घंटी ने बहुत धीमे से कहा, इतना धीमे कि सिर्फ़ मैंने सुना — "अब सुबह तक खेल ख़त्म नहीं होगा।"
मैंने आसमान की तरफ़ देखा।
पीपल की डालियों के बीच से आधा चाँद दिख रहा था। पूरा नहीं। आधा।
और मुझे लगा कि आज रात के बाद, ये गली पहले जैसी नहीं रहेगी।
क्योंकि शबनम आपा ने अपना चूल्हा बंद करने का फैसला किया था — और जिस औरत का चूल्हा बंद हो जाए, उसके बाद वो औरत जो बोलती है, वो पूरी गली सुनती है।
दूर, बिजलीघर की तरफ़, गुनगुनाहट एक बार फिर उठी।
छोटी। फुसफुसाती। जैसे कोई किसी का नाम ले रहा हो।
और मैंने पीपल के नीचे खड़े होकर, अपनी जेब में हाथ डालकर, उस घंटी को छुआ जो अब ठंडी थी, पर जिसकी लकीरें गहरी हो रही थीं।
और मैंने धीरे से कहा, "अब जो भी होगा, सबके सामने होगा।"
॥
तालियाँ पहले धीमी शुरू हुईं।
जैसे किसी को यक़ीन नहीं हो रहा हो कि ये सच में हो गया। फिर धीरे-धीरे हाथ खुलने लगे, और फिर पूरा पीपल गूँज उठा। कोई सीटी बजा रहा था। कोई "हो गया, हो गया" कह रहा था। बच्चे चबूतरी पर चढ़कर कूदने लगे, और दुबे अंकल अपनी छड़ी से ज़मीन पर ताल ठोंक रहे थे, जैसे ढोल बजा रहे हों।
रज़िया खड़ी थी, और उसका चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उसके सिर से कोई बहुत भारी पत्थर उतार दिया हो।
शबनम आपा ने उसका हाथ पकड़ा।
"चल," उन्होंने कहा, "अंदर चल।"
"क्यों?" रज़िया ने पूछा।
"क्योंकि पंद्रह साल से तेरे हाथ में मेरी गुमटी की चाय का कप नहीं आया है।"
रज़िया हँसी — और वो हँसी टूटी हुई थी, किसी पुराने रोने के आख़िरी किनारे से निकली हुई।
शबनम आपा उसे गुमटी के अंदर ले गईं। गुमटी के अंदर का बल्ब आज बहुत तेज़ जल रहा था। मैंने देखा — उन्होंने चूल्हे पर रखी केतली उठाई, कप में चाय डाली, और वो कप रज़िया के हाथों में पकड़ा दिया।
पहला कप।
रज़िया ने कप दोनों हाथों से पकड़ा। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। उसने चाय पी। फिर उसने कप को सीने से लगा लिया, जैसे कोई बच्चा खिलौना लगा लेता है।
"गरम है," शबनम आपा ने कहा।
"हाँ," रज़िया ने कहा।
"फूँक मारकर पी।"
"हाँ।"
और बस। दोनों के बीच पंद्रह साल की कोई बात नहीं थी। सिर्फ़ "गरम है" और "हाँ"।
मुझे यही चीज़ हमेशा अजीब लगती है। हम सोचते हैं कि बड़ी बातें, बड़े शब्द, बड़े समझौते रिश्ते जोड़ते हैं। पर नहीं। चाय का एक कप जोड़ता है। "गरम है" — दो शब्द जोड़ते हैं।
गुमटी के बाहर टिंकू की आवाज़ आई।
"आपा!" वो चिल्लाया। "अब समोसे भी दो हिस्सों में बँटेंगे क्या?"
शबनम आपा ने बाहर आकर उसे ऐसा घूरा कि टिंकू एक कदम पीछे हट गया।
"क्यों?" उन्होंने पूछा। "समोसा क्यों बँटेगा?"
"क्योंकि—" टिंकू ने आँखें बड़ी करके कहा, "—क्योंकि अब एक हिस्सा बहन का भी होगा न!"
पीपल के नीचे सब हँसने लगे। सानिया की हँसी सबसे ऊँची थी। गुड्डू हँसते-हँसते पीपल के तने से टिक गया। चिंटू ने अपना समोसा हवा में उठाकर दिखाया और कहा, "देखो, ये आधा मेरा, आधा—" और फिर वो रुक गया, क्योंकि उसे समझ नहीं आ रहा था कि आधा किसका होगा।
रफ़ीक़ ने कहा, "भूखे का।"
और सब फिर हँस पड़े।
शबनम आपा ने गुमटी से बाहर आकर, दोनों हाथों में समोसे की थाली उठाकर कहा, "आज सब खाओ। पैसा मेरा।" फिर उन्होंने एक पल रुककर जोड़ा, "और हिसाब मेरा, कोई और नहीं।"
भोला भाई ने ताली बजाई। नसीमा बाई ने कहा, "आपा, आज तो आपके मुँह से निकल रहा है।"
"निकलना चाहिए," शबनम आपा ने कहा, "पंद्रह साल का ज़ंग लगा हुआ है।"
मैं उस भीड़ में खड़ा था, और मेरे पास शब्द नहीं थे।
पर मेरे पास घंटी थी।
और मैंने उसे जेब से निकालकर देखा।
वो अभी भी ठंडी थी। पर उस पर वो लकीरें — जो अभी थोड़ी देर पहले अधूरी थीं — वो अब ज़्यादा गहरी दिख रही थीं। पीतल पर लकीरें ऐसे बैठ गई थीं जैसे किसी बूढ़े हाथ की नसें चमड़ी पर बैठ जाती हैं।
और उसके भीतर, बहुत धीमी, बहुत दूर, एक हल्की-सी गर्माहट बची थी। जैसे अंगीठी बुझने के बाद भी राख के नीचे एक कोयला ज़िंदा होता है।
मैंने अपनी कॉपी खोली।
अठहत्तर।
पर कुछ अजीब था। अंक बढ़े थे — ये तो ठीक है — पर मुझे ऐसा लग रहा था कि जब घंटी गरम हुई थी और जब उसने "चालीस अंक, आधे तुम्हारे, आधे उधर" कहा था, तो उसके साथ ही कहीं दूर कुछ और भी हिला था।
कुछ और भी बढ़ा था।
और ये एहसास ऐसा था जैसे आप अपनी जेब में पैसा गिनते हैं और पता चलता है कि आपकी जेब में भी कुछ बढ़ा है, पर उसी वक़्त कोई और आपकी दूसरी जेब में हाथ डालकर मुस्कुरा रहा हो।
उस्ताद अली बक्श मेरे पास आए।
उनकी चश्मे की डंडी कान पर टेप से बँधी थी, और उनके कंधे पर वो पुराना कपड़ा पड़ा था, जो वो अक्सर पहले मशीन के ऊपर डालते थे।
उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा। आवाज़ धीमी थी।
"जी, उस्ताद।"
"अंक बढ़े?"
"बढ़े।" मैंने कॉपी दिखाई। "अठहत्तर।"
उन्होंने कॉपी की तरफ़ देखा, फिर नीचे ज़मीन की तरफ़। फिर उन्होंने एक लंबी साँस ली, जैसे कोई बहुत पुरानी दुकान का शटर उठा रहा हो।
"हर सच्चा जोड़," उन्होंने कहा, "उधर वाले को भी खुराक देता है।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"इसका मतलब?"
"इसका मतलब," उन्होंने कहा, "कि जितनी बड़ी मरम्मत, उतनी बड़ी खुराक। तुम जोड़ते हो, तो उधर वो मज़बूत होता है। हमने पचास साल पहले यही ग़लती की थी — हमने सोचा था कि हम जोड़ेंगे, तो सब ठीक हो जाएगा। पर उधर वाले को जश्न में भी खाना मिलता रहा।"
मैंने कहा, "तो फिर मैं जोड़ूँ या न जोड़ूँ?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें पुरानी थीं, पर उस वक़्त उनमें वो चीज़ थी जो बूढ़े लोगों की आँखों में तभी आती है जब वो किसी जवान को अपनी पुरानी गलती करते देखते हैं।
"जोड़ो," उन्होंने कहा। "पर जश्न में भी अपनी जेब को मत भूलना।"
मैंने हल्की हँसी में कहा, "उस्ताद, पहले इस रात को बचा लें। हिसाब कल देखेंगे।"
मैंने ये हँसते हुए कहा। पर मेरी आँखें हँस नहीं रही थीं, और उस्ताद ने ये देख लिया। वो कुछ नहीं बोले। उन्होंने बस मेरे कंधे पर हाथ दबाया और पीछे हट गए।
मैंने कॉपी बंद की और घंटी जेब में डाली।
तभी पापा मेरे पास आए।
वो सफ़ेद कमीज़ में थे, और उनकी कमीज़ की जेब पर मैंने हाथ देखा — वो बार-बार उस जेब को छू रहे थे, जैसे जेब में कोई चीज़ हो ही न, पर उँगली को यक़ीन दिला रहे हों कि वो वहाँ है।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"कुछ नहीं," उन्होंने कहा। फिर, कुछ देर बाद, "अंकुश, तुम्हारी माँ से कह देना कि मैंने आज रात सब बोलने का सोच लिया है।"
मैंने कहा, "आप खुद कहिए।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं कहूँगा," उन्होंने कहा। "पर ज़ुबान कभी-कभी रास्ते में रुक जाती है। तुम कह देना तो सहारा रहेगा।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि सच ये था कि पापा ने बाईस साल में पहली बार मुझे कुछ ऐसा दिया था जो औज़ार नहीं था, जो पैसा नहीं था — एक छोटी-सी ज़िम्मेदारी थी। और मुझे वो ज़िम्मेदारी अच्छी लगी।
मीरा पीपल के दूसरी तरफ़ खड़ी थी। उसका कैमरा अब भी चालू था, लाल बत्ती जल रही थी। वो शबनम आपा की तरफ़ कैमरा करके कह रही थी, "आपा, एक बात बोलिए—"
"नहीं," शबनम आपा ने कहा।
"सिर्फ़ एक लाइन—"
"मीरा," शबनम आपा ने कहा, "आज मेरी बहन आई है। कैमरा कल आना।"
मीरा ने कैमरा नीचे किया और हँस पड़ी।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो हँस रही थी, पर उसकी आँखों के नीचे वो दाग़ थे जो रात भर जागने से आते हैं, और उसके हाथ में वो मोड़ा काग़ज़ था जो उसने पाँच साल से संभाला हुआ था।
मुझे उस पल लगा — आज रात हर किसी के पास जोड़ने के लिए कुछ है। शबनम आपा के पास बहन है। मीरा के पास रमा मैडम का लिफ़ाफ़ा है। पापा के पास बाईस साल की चुप्पी है। माँ के पास वो हँसी है जो ताले में बंद है।
और मेरे पास क्या है?
मेरे पास एक घंटी है जो ठंडी है, एक कॉपी है जिसमें अठहत्तर लिखा है, और एक पूरी गली है जो आज रात बारह बजे बिजलीघर के पीछे खड़ी होगी।
काफ़ी है, मैंने सोचा।
पर तभी—
तभी दूर से आवाज़ आई।
बिजलीघर से।
वो गुनगुनाहट जो थोड़ी देर पहले रुक गई थी — वो लौट आई थी।
पर इस बार वो पहले जैसी नहीं थी।
पहले वो गुनगुनाती थी। जैसे कोई बंद मुँह से कोई पुरानी धुन गा रहा हो।
इस बार वो तेज़ थी। और साफ़। और—मुझे ये कहने में डर लग रहा है—इस बार उसमें जैसे कोई शब्द था। जैसे कोई बहुत दूर से कोई नाम बोल रहा हो, पर इतनी धीमी आवाज़ में कि कान को यक़ीन न हो।
पीपल के नीचे हँसी धीरे-धीरे कम होने लगी।
सानिया ने कहा, "ये क्या आवाज़ है?"
गुड्डू ने कहा, "आसमान में कोई गाड़ी है क्या?"
रफ़ीक़ ने कहा, "गाड़ी आसमान में क्यों होगी?"
"तो फिर आवाज़ कहाँ से आ रही है?"
और तभी मुझे एहसास हुआ — बबलू।
वो पीपल के उस कोने में बैठा था जहाँ कम रोशनी थी। उसके हाथ में वो पानदान नहीं था, चेन नहीं थी, पीली थैली नहीं थी। उसके हाथ खाली थे और वो उन्हें घुटनों पर रखे हुए बैठा था, और उसका पूरा चेहरा एक ही भाव में जम गया था।
डर।
वो सच में डर रहा था। मैंने बबलू को बहुत बार डरते देखा है — साहब के सामने, हम लोगों के सामने, पकड़े जाने के वक़्त। पर ये डर कुछ और था। ये वो डर था जो आदमी के अंदर बैठा रहता है, जिसे वो भूल जाना चाहता है, पर जो हर उस आवाज़ पर लौट आता है।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"बबलू।" मैंने कहा।
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें डबडबा रही थीं।
"ये वही आवाज़ है," उसने कहा।
"कौन-सी?"
"ये वही आवाज़ है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ फटने लगी, "जो मैंने बक्से के पास सुनी थी।"
पीपल के नीचे सन्नाटा छा गया।
शबनम आपा गुमटी से बाहर आईं। रज़िया उनके पीछे थी, कप अब भी हाथ में। उन्होंने घूरकर बिजलीघर की तरफ़ देखा, जो पीपल से दूर था, और रात में सिर्फ़ एक काला टीला लग रहा था।
"कितनी दूर है?" उन्होंने पूछा।
"आधा किलोमीटर," दुबे अंकल ने कहा। उन्होंने छड़ी से ज़मीन को टोहा, जैसे हिसाब लगा रहे हों। "से कम। ज़्यादा नहीं।"
"और यहाँ तक सुनाई दे रही है?" मीरा ने कहा।
"हाँ," उस्ताद ने कहा। उन्होंने अपना चश्मा ठीक किया। "पर ये आवाज़ ऐसे नहीं आती जैसे मशीन की आवाज़ आती है। ये आवाज़ ऐसे आती है जैसे—"
वो रुक गए।
"जैसे क्या, उस्ताद?" मैंने पूछा।
"जैसे किसी बंद कमरे में कोई बच्चा गा रहा हो," उन्होंने कहा। "और आवाज़ दीवार के पार सुनाई दे रही हो।"
मैं उस वक़्त खुद को समझा रहा था। हवा, मैंने सोचा। शायद कहीं से ट्रक की आवाज़ है। शायद बिजली का सामान है। शायद किसी के घर में पुराना पंखा चल रहा है और उसकी घरघराहट दूर तक जा रही है।
पर मेरी जेब में घंटी ने हरकत की।
छोटी-सी।
जैसे कोई सोता हुआ आदमी करवट ले।
मैंने घंटी निकाली और हाथ में रखी। वो ठंडी थी। पर उस पर अब तीन लकीरें थीं — एक गहरी, एक आधी, और एक नई, जो बहुत पतली थी, और जो अभी बन रही थी।
जैसे कोई लिख रहा हो।
धीरे-धीरे।
रफ़ीक़ ने मेरी तरफ़ देखकर कहा, "उस्ताद, घंटी क्या कह रही है?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा।
"पर वो हिली—"
"कुछ नहीं," मैंने फिर कहा। और इस बार मेरी आवाज़ थोड़ी सख़्त थी, और रफ़ीक़ चुप हो गया।
मुझे सच बोलने की आदत है, पर आज रात मुझे लगा कि अगर मैं ये बोलूँ कि घंटी पर लकीरें बन रही हैं, तो पीपल के नीचे खड़े कुछ लोग डरकर घर भाग जाएँगे। और आज रात मुझे किसी को भगाना नहीं था।
आज रात मुझे सबको बाँधना था।
तभी गुनगुनाहट तेज़ हुई।
एकदम तेज़। जैसे किसी ने पुराने रेडियो का वॉल्यूम घुमा दिया हो।
और उस गुनगुनाहट में अब एक और आवाज़ आ गई थी। बहुत धीमी। बहुत दूर। पर साफ़।
किसी के पैरों की आवाज़।
लकड़ी के जूतों की।
टक। टक। टक।
पीपल के नीचे कुछ लोग पीछे हटे। काजल ने मेरा हाथ पकड़ लिया। माँ ने अपनी साड़ी का पल्लू कस लिया। पापा की तरफ़ देखा तो वो सीधे खड़े हो गए थे और उनकी आँखें उसी काली तरफ़ थीं।
और फिर—
फिर वो तेज़ हुई।
ग़ज़ब की तेज़।
जैसे कोई पुरानी चीज़ जाग रही हो, और जागते वक़्त उसने आवाज़ नहीं रोकी हो।
मैंने अपनी जेब में घंटी को कसकर पकड़ लिया।
और मैंने देखा कि उस्ताद मेरी तरफ़ देख रहे थे, और उनके होंठ हिल रहे थे — बिना आवाज़ के, जैसे किसी पुरानी दुआ के शब्द याद कर रहे हों।
शबनम आपा ने कहा, "अंकुश, ये क्या है?"
मैंने कहा, "आपा, आप अंदर चली जाइए—"
"मैं अंदर नहीं जाऊँगी," उन्होंने कहा। "मैंने पंद्रह साल अंदर रहकर गुज़ार दिए। अब नहीं।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। और मैं मुस्कुरा दिया, क्योंकि उनका ये गुस्सा मुझे अच्छा लगा।
"ठीक है," मैंने कहा।
तभी गुनगुनाहट अचानक बढ़ी और फिर—
रुक गई।
पूरी तरह रुक गई।
जैसे किसी ने आवाज़ को मुट्ठी में दबा दिया हो।
और उस सन्नाटे में, उस सन्नाटे के बीच, जो हँसी थी, जो मिठाई थी, जो टिंकू का मज़ाक था, जो रज़िया के हाथ में पहला कप था — वो सब उस सन्नाटे में डूब गए।
और फिर उस सन्नाटे में से एक आवाज़ आई।
धीमी।
रूखी।
थकी हुई।
पर साफ़।
जैसे कोई बहुत दूर से, बहुत पुरानी चीज़ से, बहुत पुराने आदमी की आवाज़ में बोल रहा हो।
"शंकर…"
पापा के कंधे काँपे।
"शंकर…"
दूसरी बार।
ये नाम था। पापा का नाम।
पीपल के नीचे हर आदमी ने पापा की तरफ़ देखा। माँ ने उनका हाथ पकड़ लिया। काजल ने मेरी कलाई पकड़ ली, इतनी ज़ोर से कि नाखून चुभे।
और पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
उनकी आँखों में वो डर था जो बाईस साल से उनके सीने में बैठा था। और उस डर के पीछे, बहुत पीछे, कुछ और भी था।
कुछ ऐसा जो मुझे पहचानना था।
मैंने उनकी तरफ़ एक कदम बढ़ाया।
"पापा," मैंने कहा, "आप इसे जानते हैं?"
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।
"पापा—"
"हाँ," उन्होंने कहा। और उनकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे उनके होंठों को पढ़ना पड़ा। "मैं इसे जानता हूँ।"
मैंने पूछा, "ये कौन है?"
पापा ने आसमान की तरफ़ देखा। फिर ज़मीन की तरफ़। फिर उन्होंने अपनी कमीज़ की जेब पर हाथ रखा — वो जेब जिसे वो पूरी शाम छू रहे थे — और उन्होंने कहा, "ये वो है जिसने मुझे बचाया था।"
और उसी पल, दूर, उस काले टीले की तरफ़ से — बिजलीघर की तरफ़ से — वो आवाज़ फिर आई।
"शंकर…"
तीसरी बार।
पर इस बार वो रुकी नहीं।
इस बार उसके आगे कुछ और आया।
"शंकर… आ जा।"
पीपल के नीचे हवा रुक गई।
और मेरी जेब में घंटी — ठंडी, सपाट, चुप — अचानक एक बार हिली, और उसने बहुत धीमे, बहुत सूखे स्वर में सिर्फ़ दो शब्द कहे।
"अब नहीं।"
॥
पीपल के नीचे जो सन्नाटा था, वो किसी चीज़ का नहीं, किसी आदमी का नाम था।
पापा का।
और वो नाम हवा में लटका रहा, जैसे पेड़ से कोई सूखा पत्ता टूटकर गिरने से पहले एक पल हवा में रुक जाता है।
पापा ने एक कदम आगे बढ़ाया।
मैंने उनका हाथ पकड़ लिया।
"पापा, नहीं।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो बाईस साल से उनके सीने में बैठी थी, और उसके पीछे कुछ और भी था, जो मुझे पहले कभी नहीं दिखा था। जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपने बचपन के दरवाज़े पर खड़ा हो और अंदर जाने से डरे भी और न डरे भी।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "वो मुझे बुला रहा है।"
"मैं जानता हूँ," मैंने कहा। "इसीलिए तुम नहीं जाओगे।"
"बेटा—"
"पापा, सुनो।" मैंने उनका हाथ नहीं छोड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं, और हथेली पर वो पुरानी गर्मी नहीं थी जो काम करते वक़्त आती है। "आज रात तुम मेरे पास रहोगे। कल मैदान में तुम बोलोगे। जब सारी गली सुन रही होगी, तब बोलोगे। हवा से नहीं। हवा से बोलने वाले की बात कौन सुनता है?"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा और उनका जबड़ा कसा।
माँ ने उनका दूसरा हाथ पकड़ा और कहा, "शंकर, बेटा ठीक कह रहा है। तुम मेरे साथ रहोगे। और अगर तुम्हें जाना ही है, तो मैं भी साथ जाऊँगी।"
पापा ने कहा, "सुशीला—"
"मैंने बाईस साल चुप रहकर तुम्हारी चुप्पी को पाला है," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो तेज़ी थी जो सुबह पाँच बजे चूल्हे के साथ जागती है। "अब मैं तुम्हें अकेले हवा के मुँह में नहीं छोड़ूँगी।"
उस्ताद आगे आए। उनके हाथ में मशीन की वो पुरानी चाबी थी जो उन्होंने आज सुबह छत से उतारी थी, और उन्होंने उसे धीरे से पापा के कंधे पर रखा।
"शंकर भाई," उस्ताद ने कहा, "जो आवाज़ बुला रही है, वो बुलाने का हक़ रखती है। पर हक़ और हिसाब दोनों एक ही दरवाज़े से नहीं आते। आज रात हम जीतने नहीं जा रहे। आज रात हम सिर्फ़ देखने जा रहे हैं। जो देख लेता है, वो कल बोल सकता है।"
मैंने कहा, "मैं पीछे के रास्ते से जाऊँगा। उस्ताद साथ चलेंगे।"
काजल ने मेरी कलाई नहीं छोड़ी। "मैं भी चलूँगी।"
"नहीं।"
"अंकुश—"
"काजल, सुन।" मैंने उसकी तरफ़ मुड़कर कहा, और मैंने अपनी आवाज़ जितनी सख़्त कर सकता था, उतनी सख़्त की। "मरीज़ अंदर हैं। पीला वार्ड सील है। माँ यहाँ है। अगर आज रात कुछ भी गड़बड़ हुआ और मैं वापस न आया, तो अस्पताल में एक भी आदमी को अकेला नहीं छोड़ना है। समझी?"
काजल की आँखें भर आईं, पर उसने सिर हिला दिया।
टिंकू मेरे सामने आ गया। उसकी आँखों में वो चमक थी जो मुझे बहुत अच्छी लगती है और आज बहुत डरावनी भी।
"उस्ताद, मैं साथ चलूँगा," उसने कहा।
"तू यहाँ राजा है," मैंने कहा।
"राजा युद्ध में नहीं जाते?"
"राजा किले में रहते हैं," मैंने कहा और उसके सिर पर हाथ रखा। "देख टिंकू, मुझे ऊपर से पूरी गली दिखनी चाहिए। मुझे यह जानना है कि इस वक़्त कौन कहाँ है, कौन उठा, कौन बैठा, कौन ग़ायब हुआ। तू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू—तुम पाँच पीपल पर रहोगे। कोई उठकर गया तो मुझे पता चलेगा। पाँच जोड़ी आँखें मेरी जेब में। समझा?"
टिंकू ने सीना फुला लिया। "समझा।"
मीरा ने कैमरा मेरी तरफ़ बढ़ाया। "ये ले।"
मैंने मना कर दिया। "नहीं। तू इसे यहीं रख। मैं अंधेरे में जा रहा हूँ, मेरे हाथ में कुछ और होना चाहिए।"
उसने मेरी आँखों में देखा। "अंकुश, तू अकेले—"
"मैं अकेले नहीं जा रहा।"
"मैं जानती हूँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो घुटन थी जो मुझे एहसास दिलाती है कि मेरे साथ चलने वाले हर आदमी को वो अपने हिसाब से जोड़े रखती है। "मेरा मतलब है, तू अंदर से अकेले जा रहा है।"
मैं मुस्कुरा दिया। "मीरा, अंदर से हम सब अकेले ही होते हैं। बाहर से ही गली बनती है।"
शबनम आपा ने आगे आकर मेरी कमीज़ का कॉलर सीधा किया, जैसे करीब तीस साल की माँ अपने बेटे को स्कूल भेजने से पहले करती है।
"पीछे के रास्ते से जाओ," उन्होंने कहा। "सूखी नाली वाला रास्ता सबसे अंधेरा है, पर वहाँ कोई खड़ा नहीं होता। बीस साल से उस रास्ते से सिर्फ़ कुत्ते जाते हैं।"
मैंने कहा, "और अगर आपको यहाँ कुछ गड़बड़ लगे?"
शबनम ने गुमटी की लोहे की चिमटी उठाई, जो अभी भी चूल्हे की गर्मी से तप रही थी। "मुझे कुछ नहीं लगेगा। मैं लगाऊँगी।"
रज़िया ने अपनी चादर कसकर ओढ़ी और माँ की चुनरी उठाकर अपने कंधे पर रख ली। "दीदी, मैं नहीं डरूँगी।"
शबनम ने उसकी तरफ़ देखा और कहा, "पंद्रह साल बाद अगर तू डरने लगी, तो मैं तुझे गुमटी में बंद कर दूँगी।"
रज़िया ने कहा, "यही डर तो है मुझे।"
और दोनों बहनें आधी हँसी, आधी रोई। यही गली है। कभी कभी रोने का सबसे सही तरीक़ा हँसी होती है।
मैं पीछे मुड़ा। बबलू दूर खड़ा था। उसकी सोने की चेन नहीं थी, गले में अब कुछ नहीं था, और वो खाली गले को बार-बार छू रहा था, ऐसे जैसे उसने तीस साल पहन कर रखी हो और अब नंगा लगे।
"बबलू भाई," मैंने कहा, "तुम जानते हो वहाँ का रास्ता।"
उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"मैं… मैं तो सिर्फ़ बाहर से गया हूँ। उन्होंने मुझे दूर बाहर रुकने को कहा था।"
"तो बाहर का रास्ता काफ़ी है। चलो।"
"अंकुश," उसने कहा, और उसकी आवाज़ फटी। "मैं… मैंने आज तक किसी का साथ नहीं किया। साथ करने वालों का क्या होता है?"
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"पता है, बबलू भाई? साथ करने वालों का क्या होता है? उनके पास एक आदमी कम होता है जिसे वो गिनकर रोते हैं। बस यही। और बाक़ी सब वैसा ही रहता है। मगर आज रात हमें सिर्फ़ सुनना है, कुछ करना नहीं। करने वाला कल होगा। सुनने वाले का काम सबसे मुश्किल है।"
बबलू ने सिर हिलाया, और उसके हाथ काँप रहे थे।
हम चल पड़े।
पीपल से निकलकर पीछे वाली गली, फिर अस्पताल की पिछली दीवार, फिर वो सूखी नाली जो सिर्फ़ बारिश में याद आती है। रास्ते में उस्ताद बिल्कुल नहीं बोले। और यही उनका सबसे ज़्यादा बोलना होता है।
रास्ता जितना आगे बढ़ता गया, उतना ही ठंडा होता गया।
और ठंडा भी अजीब तरह से। ऊपर से हवा नहीं थी, पर नीचे से ठंड आ रही थी, ज़मीन से, ईंटों से, दीवारों से, जैसे पूरी ज़मीन साँस ले रही हो और साँस में पुरानी राख घोल रही हो।
मेरे हाथ में छोटी टॉर्च थी। मैंने उसे कम रोशनी पर रखा। इतनी कम कि सिर्फ़ मेरे पाँव के अगले दो फुट दिखें।
फिर दीवार खत्म हुई और हम वो जगह पहुँचे जहाँ पुराने प्लॉट की कच्ची ज़मीन शुरू होती है। यहाँ से बिजलीघर की तरफ़ ढलान है। सामने पुरानी लोहे की बाउंड्री है, जिसके पाए पीले पड़ चुके हैं, और उसके पीछे कुछ सफ़ेद धुंध जैसी टिमटिमाती रोशनी।
टिमटिमाती नहीं, यह उसकी भनक भर थी।
पर एक चीज़ साफ़ थी। धुंध के उस पार खड़ी एक लंबी सफ़ेद गाड़ी।
जीप।
मैंने उस्ताद का कंधा दबाया और हम तीनों एक पुरानी ईंट की चबूतरी जैसी चीज़ के पीछे बैठ गए, जो यहाँ बीस साल से पड़ी है।
सफ़ेद जीप का पिछला दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर हल्की नीली रोशनी जल रही थी। ड्राइवर सीट पर एक दुबला आदमी बैठा था, हाथ स्टीयरिंग पर, और उसकी कलाई पर सूखे खून जैसा एक लाल धागा बँधा था।
मैंने उस लाल धागे को देखा और मेरे भीतर कुछ ठंडा हुआ।
इस शहर में लाल धागा कोई पहनता है। मुझे पता है कौन।
बबलू मेरे कान के पास आया। उसकी साँस में पान और डर दोनों थे।
"अंकुश," उसने फुसफुसाकर कहा, "वो गाड़ी यहीं खड़ी रहती है। साहब गाड़ी से उतरते हैं, और फिर… फिर गाड़ी वाला आदमी उन्हीं गाड़ी में बैठा रहता है। कभी नीचे नहीं आता। कभी नहीं।"
"तुमने उसे कभी उतरते देखा?"
"नहीं।" उसने गला साफ़ किया। "और मुझे लगता है, वो बाहर आएगा तो कुछ बड़ा हो जाएगा।"
उस्ताद ने धीरे से कहा, "चुप।"
और हम चुप हो गए।
क्योंकि सामने काली दीवार के नीचे, धूल और अंधेरे के बीच, छह बड़े लोहे के बक्से थे।
छह। एक सीध में, उसी तरह जैसे मैंने उन्हें पहले कभी देखा था। दीवार के साथ, बराबर अंतर पर। पुराने, ऊँचे, ढक्कन वाले। जैसे छह बंद मुँह ज़मीन के अंदर से उग आए हों।
और उन छह में से एक — सबसे आख़िरी — वो बक्सा था जिसके आगे की ज़मीन पर धूल नहीं थी।
मैंने बबलू की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया। वो बक्सा।
बक्से की तरफ़ से हल्की ठंड आ रही थी। मैं उसे दूर से महसूस कर सकता था, जैसे किसी ने दरवाज़ा खोलकर शीत घर की हवा बाहर छोड़ दी हो।
और बक्से से आवाज़ आ रही थी।
नहीं। आवाज़ नहीं।
गुनगुनाहट।
बहुत धीमी। बहुत अंदर से। जैसे कोई बूढ़ी औरत रोटी बेलते हुए बहुत पुराना गीत गुनगुना रही हो, और वो गीत इतना पुराना हो कि उसके शब्द खो गए हों और सिर्फ़ सुर बचा हो।
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
क्योंकि माँ भी रोटी बेलते हुए ठीक इसी तरह गुनगुनाती है।
और तभी—
उस गुनगुनाहट के ऊपर एक आवाज़ बोली।
"नहीं। नहीं, ऐसा नहीं।"
आदमी की आवाज़। साफ़। ठंडी। बिना जल्दी की।
रणवीर भारद्वाज की।
वो उस बक्से के सामने खड़ा था।
मुझे उसका चेहरा नहीं दिख रहा था, सिर्फ़ कंधे और पीठ और उनकी सफ़ेद कमीज़ की एक चमक। पर मैं उसकी आवाज़ को बरसों से जानता हूँ — वो आवाज़ जो मंच पर हर बच्चे को “बेटा” कहती है और काग़ज़ पर हर बच्चे का नाम काटती है।
और वो अकेला नहीं था।
वहाँ कोई था। वो किसी से बात कर रहा था।
पर मुझे कोई दिख नहीं रहा था।
उसके सामने सिर्फ़ अंधेरा था, और बक्सा।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उस्ताद ने बहुत धीरे, बहुत छोटे से सिर का इशारा किया। यानी — सुनो। बस सुनो।
"ये मैं जानता हूँ," रणवीर कह रहा था। "पर मुझे वो नहीं चाहिए। मुझे उसका इस तरह बोलना नहीं चाहिए। और तुम मुझे मजबूर मत करो।"
रुकावट।
और उस रुकावट में मुझे कुछ सुनाई दिया।
मुझे नहीं सुनाई दिया। महसूस हुआ। मेरी रीढ़ के नीचे से एक ठंडी सुई जैसी चीज़ ऊपर गई, सीधी सिर तक, और फिर जाकर रुक गई। जैसे किसी ने कान के अंदर बहुत पतली चीज़ से एक लकीर खींच दी हो।
बबलू की साँस रुक गई। उसने उस्ताद का आस्तीन पकड़ लिया।
"ये," उसने बिना आवाज़ के होंठ हिलाकर कहा। "ये… ये वहीं आवाज़ है।"
और मुझे समझ आ गया।
रणवीर किसी आवाज़ से बात कर रहा था जो सिर्फ़ उसके कान में थी। जो किसी और को नहीं सुनाई देती। जो सुई की तरह चुभती है और फिर कुछ नहीं कहती।
फूट।
मेरी मुट्ठी अपने आप भींच गई।
उसी पल रणवीर का सिर हल्का-सा हिला, जैसे उसने कुछ सुना और मान लिया। फिर उसने अपने सीने पर हाथ रखा, वहाँ जहाँ ताबीज़ लटकता है, और उसकी उँगलियाँ कुछ पल वहीं रुकीं।
"ठीक है," उसने कहा। "तुम्हारी बात। पर एक शर्त है। आज रात के बाद मुझे सिर्फ़ एक चीज़ चाहिए। और वो चीज़ काग़ज़ में नहीं आएगी।"
फिर वो बोला, और उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी कोमलता आ गई। वैसी कोमलता जो आदमी तब दिखाता है जब वो किसी को नीचा दिखाने की तैयारी कर रहा हो।
"कल के मैदान में," उसने कहा, "शंकर यादव को उसी पुरानी साइकिल पर बैठाकर लाना है। उसी पर। जिस पर आज से पच्चीस साल पहले उसके बाप ने दस्तख़त छोड़े थे। मंच पर सिर्फ़ साइकिल रखी होगी, साइकिल का हैंडल माइक के सामने, और शंकर बगल में खड़ा। पूरी गली को लगेगा कि साइकिल बोल रही है और वो चुप खड़े सुन रहे हैं।"
रुकावट।
"नहीं, वो नहीं बोलेगा," रणवीर ने कहा, और हल्की हँसी जैसी आवाज़ निकली, पर हँसी नहीं थी। "वो जो बोलेगा, वो मैंने पहले से तय कर रखा है। उसके हाथ काँपेंगे, आवाज़ भर्राएगी, और लोग समझेंगे कि ये अपनी ही करनी का सच कह रहा है। सच कहने वाले की आवाज़ भी ऐसी ही होती है ना?"
मुझे अपनी जीभ पर कुछ कड़वा-सा लगा।
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया, धीरे, बहुत धीरे।
उस्ताद ने मेरा आस्तीन पकड़ा और ना में सिर हिलाया। वो ठीक कहते थे। मैं जानता था वो ठीक कहते थे। पर मेरे भीतर कुछ ऐसा था जो अंधेरे में उस आवाज़ की तरफ़ खिंच रहा था।
रणवीर फिर बोला, "और अगर बेटा बीच में आए—"
रुकावट। लंबी।
फिर वो बहुत साफ़, बहुत ठंडी आवाज़ में बोला।
"ताला तोड़ देना।"
मेरी साँस रुक गई।
ताला।
मंसूर का ताला। वो ताला जिसमें माँ की हँसी बंद है, पापा का डर बंद है, और मेरा बचपन बंद है। वो ताला जो एक बार खुला, तो फिर कभी बंद नहीं होगा, और एक बार टूटा तो फिर कभी खुलेगा नहीं?
"और उसके बाद," रणवीर ने कहा, "उस बेटे को अपनी माँ के बिस्तर तक पहुँचने के लिए रास्ता खोजना पड़ेगा।"
मेरे कानों में खून भर आया।
उस्ताद का हाथ मेरे हाथ पर था, और उनकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों को दबा रही थीं। मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर अब डर नहीं था, एक अजीब-सी परचम जैसी चुप्पी थी।
और तभी—
छाया से एक आदमी बाहर आया।
धीरे। बिना आवाज़। सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद जूते, और उसकी उँगली में कुछ काला चमका।
मेरी साँस अंदर ही रुक गई।
मैंने उसका चेहरा नहीं देखा। मुझे देखने की ज़रूरत नहीं थी। मैंने उसकी चाल पहचान ली। मैंने उसका हाथ देखा, और मैंने वो काली अंगूठी देखी जो मुझे आज से बाईस साल पहले के एक काग़ज़ पर बने निशान से जोड़ती है।
"साहब," उसने कहा। उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जिससे दाँत खट्टे हो जाते हैं। "साहब, मैंने एक बात सोची है।"
रणवीर ने उसकी तरफ़ बिना मुड़े कहा, "बोलो।"
"कल मैदान में लोग सच बोलेंगे।"
"बोलने दो।"
"साहब, मेरा मतलब है, वो सच बोलेंगे, और हम उनका सच सुनेंगे।"
रणवीर रुका। फिर वो मुड़ा, और उसका चेहरा अब कुछ ज़्यादा दिख रहा था — आधा अंधेरे में, आधा उस बक्से की ठंडी चमक में।
"तो?"
"तो साहब, सच अगर बोला गया है, तो उसे लिखा भी जाएगा।" उसने बहुत धीरे कहा। "हमारे हिसाब से। उनकी ज़ुबान से निकला सच, उसी रात हमारे रजिस्टर में चढ़ जाएगा। जो बोलेगा, वो अपने सच की गवाही खुद देगा। और सच्ची गवाही के बाद… काग़ज़ वापस नहीं होता।"
बक्से के पास ठंडी हवा तेज़ हुई।
मुझे उस आदमी से नफ़रत नहीं हुई। मुझे उससे जलन हुई। क्योंकि वो मेरे ही हथियार से मुझ पर वार कर रहा था। सच। वही चीज़ जिसे मैं जोड़ने के लिए इस्तेमाल करता हूँ, वो उसे बाँधने के लिए इस्तेमाल करना चाहता था।
रणवीर ने कुछ पल सोचा। फिर उसने कहा, "और अगर कोई अपना सच वापस ले?"
"साहब, सच बोलने के बाद वापस नहीं लिया जाता। दुनिया में सबसे मुश्किल काम है ये। आपने कभी किसी को सच बोलकर मुकरते देखा है? नहीं देखा होगा। लोग झूठ से मुकरते हैं। सच से नहीं।"
और रणवीर हँसा।
वो हँसी मैंने पहले भी सुनी थी — जब उसने मंच पर मुझे “बेटा” कहकर अपने पास बैठाया था। उस हँसी में न मज़ाक होता है, न शरारत। उसमें सिर्फ़ ज़रूरत होती है।
"ठीक है," रणवीर ने कहा। "कल शाम तक हर सच हमारे हिसाब की किताब में होगा। और उसके बाद—"
वो रुका।
फिर उसने वो बात कही जो मुझे आज तक नींद में जगाती है।
"उसके बाद उस गली में एक भी आदमी ऐसा नहीं बचेगा जिसके पास अपना कुछ हो। सब के सब काग़ज़ी हो जाएँगे। और जिसके पास अपना कुछ न हो, वो मेरा होता है।"
मेरी मुट्ठी इतनी कस गई कि नाखून हथेली में चुभने लगे।
उस्ताद ने मेरा हाथ पकड़ा।
उनका हाथ ठंडा था, पर मज़बूत।
और उन्होंने मेरे कान में सिर्फ़ एक शब्द कहा।
"अभी।"
मैंने आँखें बंद कीं।
वो शब्द उन्होंने गुस्से से नहीं कहा था। उन्होंने वो शब्द उस तरह कहा जैसे कोई छत पर चढ़े आदमी से कहे — अभी नहीं देखो, नीचे देखो। पाँव जगह पर रखो।
और मैंने पाँव जगह पर रखे।
मेरी साँस धीमी हुई।
मैंने अपने भीतर की उस आवाज़ को, जो कह रही थी — अब जाकर इसकी खोपड़ी फोड़ दे — उसे धक्का देकर बैठा दिया।
मैं जानता था उस्ताद सही कहते हैं। जो आदमी सब कुछ सुन लेता है, वो कल सब कुछ बोल सकता है। और जो अभी कूद पड़ेगा, वो कल कुछ नहीं बोलेगा, क्योंकि कल वो यहाँ नहीं होगा।
फिर बबलू ने हिलना शुरू किया।
उसका शरीर काँप रहा था, धीरे-धीरे, जैसे ठंड लगी हो। और उसके पैर के नीचे एक पुरानी ईंट थी जो उस वक़्त अपनी जगह से खिसक गई।
खड़खड़।
बहुत छोटी आवाज़। बहुत छोटी।
पर उस रात वो आवाज़ तोप जैसी लगी।
रणवीर की बात रुक गई।
मैंने अपनी साँस रोकी। बबलू ने भी। उस्ताद ने भी।
मैंने देखा कि रणवीर का सिर बक्से के ऊपर से हमारी तरफ़ घूमा।
बहुत धीरे।
उसने हमारी तरफ़ देखा। पूरे अंधेरे में देखा, जहाँ उसे कुछ दिखना नहीं चाहिए था।
और फिर उसने वो किया जो सबसे डरावना था।
उसने मुस्कुरा दिया।
नहीं। मुस्कुराया नहीं।
उसके होंठ हिले।
"इस कोने में कोई है," उसने कहा। "बहुत पुराना कोना है। पुराने कोनों में चूहे बहुत होते हैं।"
सफ़ेद कुर्ते वाले आदमी ने भी उसी तरफ़ देखा।
और फिर उसने अपनी आवाज़ में वो मिठास घोली और कहा, "साहब, चूहे तो हैं। पर मुझे लगता है, यहाँ आज एक चूहा ऐसा है जो अपनी मौत देखने आया है।"
बक्से के पास ठंडी हवा फिर चली, और इस बार उसमें राख की गंध साफ़ थी।
मैंने उस्ताद का आस्तीन पकड़ा और पीछे खिसका।
एक इंच।
दो इंच।
मेरे पीछे बबलू था, और बबलू के पीछे पुरानी ईंट की चबूतरी जैसी चीज़, और उसके बाद अंधेरा।
मेरे दिल की धड़कन मेरे कानों में इतनी तेज़ थी कि मुझे लगा पूरा प्लॉट सुन रहा है।
एक कदम। दूसरा कदम।
फिर—
फिर मेरे कंधे पर किसी का हाथ आया।
नर्म नहीं। सख़्त नहीं। ऐसा हाथ जिसमें बहुत सालों की मेहनत थी और बहुत सालों की चुप्पी। उँगलियाँ रेती जैसी खुरदुरी।
मेरा पूरा शरीर एक पल के लिए जम गया।
मैंने उस हाथ को देखना चाहा, पर मैं उल्टा नहीं हुआ।
और उस हाथ वाले ने मेरे कान के बहुत पास अपना मुँह लाकर धीमी आवाज़ में कहा।
"अब तुमने खुद को पकड़वा दिया।"
वो आवाज़ बूढ़ी थी।
और उसमें अंधेरे की वो खुरदुराहट थी जो मैं कहीं सुन चुका था। बहुत पहले। बहुत दिन पहले। किसी तहखाने में। किसी दरवाज़े के नीचे से। किसी काग़ज़ के कोने से।
वो हाथ मेरे कंधे से नीचे सरका और मेरी बाँह पकड़कर मुझे पीछे खींच लिया, इतनी ताक़त से कि मेरे पाँव धूल में घिसट गए, और मैं, उस्ताद और बबलू तीनों उस ईंट की चबूतरी के पीछे गिर गए, और वहाँ अंधेरा इतना घना था कि मेरी आँखें खुली होकर भी नहीं खुल रही थीं।
मैंने टॉर्च उठाई।
आदमी मेरे सामने झुका हुआ खड़ा था।
बूढ़ा। सत्तर से ऊपर। पुरानी धोती, फटा कुर्ता, और उसके सिर पर वो मैला पीला कपड़ा था जो पहले कभी पीला था, अब सिर्फ़ कपड़ा था।
और उसकी उँगली।
उसकी एक उँगली आधी थी।
मैंने उसे देखा और मेरी गर्दन के बाल खड़े हो गए। मुझे वो आधी उँगली याद थी। मुझे वो काग़ज़ याद था जिस पर हरिप्रसाद का नाम लिखा था और उस काग़ज़ पर कहीं उँगली का निशान भी था।
मैंने धीमे से कहा, "तुम?"
और वो हँसा।
बहुत धीमी हँसी। ऐसी हँसी जिसमें सिर्फ़ दाँत दिखते हैं और आँखें नहीं हँसतीं।
"हाँ," उसने कहा। "मैं। मैं इंतज़ार कर रहा था कि इस गली का लड़का अपने पैरों से उस जगह आए जहाँ उसे आना नहीं चाहिए था।"
उसने मेरी टॉर्च की रोशनी के बाहर एक कदम आगे रखा और उसकी आवाज़ और भी धीमी हो गई।
"अंकुश यादव," उसने कहा, "तू जो ताला खोलने निकला है, वो मेरा है। और मुझे अच्छी तरह याद है, उसे किसने बंद किया था।"
॥
मैंने अपनी टॉर्च की रोशनी उस आधी उँगली पर टिका दी थी, और मेरे भीतर का हर पुराना डर एक साथ जाग गया।
फिर मेरे कंधे पर दूसरा हाथ आया।
ये हाथ पहले वाले से बिल्कुल अलग था। इसमें रेती जैसी खुरदुराहट नहीं थी। इसमें वर्दी वाली सफ़ाई थी, थोड़ी साबुन की गंध थी, और उतनी ही चुप्पी थी जितनी पुराने थानेदारों की आँखों में होती है।
वो आवाज़ मैं पहचानता था।
"चुप।"
मैं पलटा।
और टॉर्च की पीली रोशनी में मेरे सामने दुबे अंकल खड़े थे।
नीली शर्ट। आस्तीन चढ़ी हुई। बाल वैसे ही बेतरतीब जैसे हमेशा। पर उनका चेहरा — जो दिन में हँसता रहता है, चबूतरी पर बैठकर बच्चों को कहानियाँ सुनाता है — वो चेहरा अब ऐसा था जैसे पत्थर पर बरसों की धूल जम गई हो।
उन्होंने एक हाथ ऊपर उठाया।
सीधा इशारा। पीछे। चुपचाप। अभी।
मैंने गर्दन घुमाई।
हरिप्रसाद उसी अंधेरे में एक कदम पीछे खिसक चुका था, जैसे वो कभी वहाँ था ही नहीं। सिर्फ़ उसकी आवाज़ बची थी, बहुत धीमी, बहुत दूर से आती हुई।
"कल," उसने कहा। "मैदान में। तेरे पापा से पहले मैं बोलूँगा।"
और फिर वो अंधेरे में घुल गया।
दुबे अंकल ने मेरी बाँह पकड़ी और मुझे उसी ईंटों की चबूतरी के पीछे खींच लिया। उस्ताद पहले ही वहाँ बैठे थे, साँस रोके हुए। बबलू घुटनों के बल गिरा था और उसका मुँह खुला रह गया था, जैसे वो चीखना चाहता था और आवाज़ नहीं निकल रही थी।
दुबे अंकल ने अपना मुँह मेरे कान के पास लाया।
"सुन," उन्होंने कहा। "वो दोनों अभी ग्यारह कदम पीछे हैं। उनके पास टॉर्च है, पर उन्हें अंधेरे में देखने की आदत नहीं है। मेरे पीछे-पीछे। ईंटों के ढेर तक। एक भी शब्द नहीं।"
मैंने सिर हिलाया।
हम चले।
मेरी जूतियाँ धूल में दब रही थीं और हर कदम पर मुझे लगता था कि कोई उसे सुन रहा है। पीछे से सफ़ेद कुर्ते वाले की आवाज़ आई, वही मिठास घोली हुई।
"साहब, चूहे तो हैं। पर मुझे लगता है आज एक चूहा अपनी मौत देखने आया है।"
रणवीर ने जवाब दिया, बहुत ठंडे ढंग से।
"मौत नहीं। मौत से काम नहीं चलता। मुझे चूहा ज़िंदा चाहिए। ज़िंदा चूहा रास्ता दिखाता है।"
मेरी रीढ़ के साथ ठंडी सुई सी चली।
हम ईंटों के ढेर के पीछे पहुँचे। दुबे अंकल ने हमें बैठा दिया और खुद घुटनों के बल बैठकर झाँका। उनके हाथ में जो छड़ी थी, उसे उन्होंने धूल में दबा दिया, ताकि खड़खड़ न हो।
सामने से रोशनी आई।
टॉर्च की पीली लकीर ईंटों पर, धूल पर, और उस पुराने प्लॉट के सूखे पत्तों पर फिरी। फिर रुकी।
मैंने साँस रोकी।
बबलू के घुटने के नीचे एक सूखी डाली थी। उसने हल्का सा हिलकर आवाज़ की — चट।
रोशनी उसी तरफ़ मुड़ी।
दुबे अंकल ने बिना देखे मेरा हाथ पकड़ा और दबाया, जैसे कह रहे हों — मत हिलो।
सफ़ेद कुर्ते वाले ने कहा, "यहाँ कोई है साहब। मुझे यक़ीन है।"
और रणवीर ने जो कहा, वो सबसे डरावनी बात थी।
"होने दो," उसने कहा। "जो यहाँ छिपा है, वो कल मैदान में खुद खड़ा होगा। आज उसे छिपने दो। छिपा हुआ आदमी कल सबसे पहले बोलता है।"
फिर उसकी आवाज़ में वही मुस्कान आई जो मुझे अंधेरे में भी दिख रही थी।
"और मुझे वही चाहिए। मुझे उसकी आवाज़ चाहिए, गली के सबसे बड़े माइक पर।"
टॉर्च की रोशनी हट गई।
कदमों की आवाज़ दूर गई। जीप का दरवाज़ा खुला, बंद हुआ, और इंजन की आवाज़ उस पुराने प्लॉट से निकलकर सड़क पर मिल गई।
दुबे अंकल ने लंबी साँस छोड़ी।
और फिर मेरी तरफ़ मुड़कर उन्होंने वो कहा जो मुझे अंदर तक झकझोर गया।
"आज रात तुम सीधी टक्कर नहीं लड़ सकते।"
मैंने कहा, "अंकल, वो साइकिल—"
"सुन पहले," उन्होंने काटा। "थाने में दो-तीन आदमी उसके पक्ष में हैं। राठौर का नाम तो तुम सुन चुके हो। उसका फोन रणवीर के दफ़्तर से आता है, दिन में तीन बार। मेरे पास कोई सबूत नहीं, सिर्फ़ बत्तीस साल की नौकरी और आँखें हैं। और ये आँखें अब भी कुछ देख लेती हैं।"
उन्होंने बबलू की तरफ़ देखा, जो अब भी घुटनों के बल था।
"अगर आज रात यहाँ हाथापाई हो गई, तो कल सुबह थाने में एक काग़ज़ बनेगा। उस काग़ज़ में लिखा होगा कि शंकर यादव का बेटा रात में ज़मीन पर कब्ज़ा करने आया था। और फिर कल की सभा पर रोक लग जाएगी। तुम्हारी गली कल बोल नहीं पाएगी। समझ रहे हो?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि वो सही कह रहे थे। और सच्ची बात सबसे ज़्यादा चुभती है।
उस्ताद ने धीरे से कहा, "दुबे जी, उसने साइकिल मँगवाई है। शंकर की पुरानी साइकिल। वो कल मंच पर बोलेगी।"
दुबे अंकल ने आँखें बंद कीं।
"तो कल मंच पर साइकिल होगी," उन्होंने कहा। "पर आज रात हमें ये साइकिल नहीं, अपने लोगों को बचाना है। आओ। सूखी नाली वाले रास्ते से चलो। वो रास्ता उसके आदमियों को नहीं पता।"
हम उठे।
और तभी बबलू ने अपनी गर्दन से हाथ फेरा, उस मोटी सोने की चेन को उँगली में उलझाया और एक झटके में उतार दिया।
उसने उसे देखा। फिर मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश भाई," उसने कहा, आवाज़ भारी थी, "पंद्रह साल इस गले में रही। सबको लगता था बबलू पांडे सोना पहनता है। और आज पता चला ये दो सौ साठ रुपये की है।"
उसने चेन जेब में डाली।
"अब गला हल्का लग रहा है," उसने कहा। "और अजीब बात है — मुझे अच्छा लग रहा है।"
दुबे अंकल ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"ये तो शुरुआत है, बबलू," उन्होंने कहा। "असली वज़न गले में नहीं होता। असली वज़न उस बात में होता है जो आदमी ने बोली नहीं, और जो उसके अंदर बैठी रहती है।"
हम सूखी नाली के रास्ते चले।
वो रास्ता पुराने प्लॉट के पीछे से शुरू होता था और उस्ताद की दुकान के पीछे निकलता था। सूखी नाली के पत्थर पैरों के नीचे धँसते थे और ऊपर से लोहे की एक टूटी चादर लटकी थी, जो हवा में हिलकर ऐसी आवाज़ करती थी जैसे कोई बूढ़ा कराह रहा हो।
रास्ते में कोई नहीं बोला।
मैं बस अपनी जेब में हाथ डाले चल रहा था। घंटी उसी जेब में थी — ठंडी, चुप, और उस चुप्पी में भी कुछ कहती हुई। मेरी उँगली उस पर टिकी थी और मुझे लग रहा था कि वो ठंडी नहीं, बस थकी हुई है।
दुकान के पीछे पहुँचकर दुबे अंकल रुके।
"मैं यहीं से लौटता हूँ," उन्होंने कहा। "आज रात मुझे थाने में रहना है। मेरी कुर्सी खाली मिली तो शक होगा।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा।
"अंकल, वो हरिप्रसाद—"
उन्होंने मेरा हाथ हल्के से दबाया।
"मैं उसे जानता हूँ," उन्होंने कहा। "बत्तीस साल पहले मैंने एक काग़ज़ पर उसका नाम लिखा था। उसके बाद वो कभी मिला नहीं। आज पहली बार देखा।"
वो एक पल चुप रहे।
"वो तुमसे बात करेगा," उन्होंने कहा। "पर उसकी बात सुनने से पहले अपनी बात याद रखना। और अंकुश —"
उनकी आवाज़ धीमी हुई।
"कल मैदान में सबसे ज़्यादा खतरा उस आदमी से नहीं है जो चिल्लाएगा। खतरा उस आदमी से है जो बीच में उठकर कहेगा — भाई, अब बहुत हो गया, हम समझौता कर लें।"
वो गए।
हम दुकान के पीछे से गली में आए।
गली में दीये अब भी जल रहे थे। पीपल के नीचे लोग बैठे थे, और जैसे ही मैं दिखा, सब उठ खड़े हुए। टिंकू सबसे आगे दौड़ा आया।
"उस्ताद! क्या हुआ? हमने सीटी बजाई थी, फिर रुक गए क्योंकि पता नहीं—"
मैंने हाथ उठाया।
"सब ठीक है," मैंने कहा। "कुछ नहीं हुआ। कोई नहीं मारा गया, कोई नहीं पकड़ा गया।"
मैंने चारों तरफ़ देखा। शबनम आपा गुमटी के दरवाज़े पर खड़ी थीं, हाथ में चिमटी। रज़िया उनके पीछे। भोला भाई, नसीमा बाई, बूढ़े काका, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — सब के सब।
और सबकी आँखों में वही सवाल था।
मैंने गला साफ़ किया।
"आज रात सब घर जाओ," मैंने कहा। "कोई बहस नहीं। कल सुबह से पहले सबको पीपल पर होना है।"
भोला भाई ने कहा, "और रात बारह बजे वाला बक्सा?"
"वो आज नहीं," मैंने कहा। "उसने अपना वक़्त खुद चुना है और वो वक़्त कल का है। आज रात हमें सिर्फ़ एक काम करना है — ज़िंदा रहना।"
शबनम आपा ने चिमटी मेज़ पर रखी।
"चूल्हा बंद कर रही हूँ," उन्होंने कहा। "कल सुबह जो सबसे पहले आएगा, उसके हाथ की चाय से शुरुआत होगी।"
टिंकू ने मेरा हाथ खींचा।
"उस्ताद, मैंने देखा," उसने धीरे से कहा। "सफ़ेद गाड़ी में एक बूढ़ा बैठा था। लकड़ी के जूते पहने हुए। उसने खिड़की से मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराया।"
मेरे हाथ में घंटी ठंडी से और ठंडी हो गई।
"तू ठीक है?" मैंने पूछा।
"हाँ," टिंकू ने कहा। "पर उस्ताद, वो मुस्कुराया ऐसे जैसे मुझे पहले से जानता हो।"
मैंने उसका सिर पकड़ा।
"घर जा," मैंने कहा। "माँ को कुछ मत बता। और कल सुबह सबसे पहले मेरे पास आ।"
वो गया।
मैं घर की तरफ़ बढ़ा।
और घर की तरफ़ बढ़ते हुए मुझे लगा कि मेरे पैर मुझसे कह रहे हैं — मत जा। आज रात कुछ और हो गया है।
मैंने दरवाज़ा धकेला।
वो खुला था।
घर के भीतर बत्ती जल रही थी, पर वो रोशनी पहले जैसी नहीं थी। वो रोशनी ऐसी थी जैसे किसी ने कमरे में आँखें खुली छोड़ दी हों और फिर चला गया हो।
कमरे के बीच में पापा का पुराना संदूक खुला पड़ा था।
और वो खाली था।
मैंने एक कदम आगे रखा।
संदूक के अंदर सिर्फ़ कपड़े की गंध बची थी और धूल में एक लंबा साफ़ निशान — जहाँ साइकिल रखी थी।
साइकिल नहीं थी।
मेरे हाथ से टॉर्च गिर गई।
माँ कुर्सी पर बैठी थीं। सीधी बैठी थीं। हाथ गोद में। साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ, पर उन्होंने उसे संभाला नहीं था। उनका चेहरा ऐसा था जैसे कोई बहुत देर से रो रहा हो और अब आँसू सूख गए हों।
काजल दीवार के सहारे खड़ी थी। उसकी आँखें लाल थीं। वो मुझे देखकर कुछ कहना चाहती थी, पर होंठ हिले और आवाज़ नहीं निकली।
और पापा।
पापा कमरे के कोने में बैठे थे।
फ़र्श पर। ठंडे फ़र्श पर। घुटने सीने से लगाए। हाथ जमीन पर रखे हुए। चश्मा उनके हाथ में था और वो उसे बार-बार पोंछ रहे थे, हालाँकि उसमें कोई धूल नहीं थी।
मैंने दीवार की तरफ़ देखा।
और मेरे भीतर कुछ टूट गया।
दीवार पर लाल रंग से, मोटे अक्षरों में लिखा हुआ था —
कल मैदान में शंकर यादव बोलेंगे।
और उसके नीचे, छोटे अक्षरों में —
बेटा सुनने आएगा?
लाल रंग अभी गीला था। उसकी कुछ बूँदें नीचे दीवार पर टपककर सूख गई थीं, और उन दाग़ों से लाल रंग की गंध आ रही थी — तेज़, धातु जैसी, जैसे किसी ने पेंट की जगह लाल स्याही उठाकर दीवार पर फेंक दी हो।
मैंने कमरे में घूमकर देखा।
पीछे वाले कमरे का दरवाज़ा खुला था। चूल्हे के पीछे वाला दरवाज़ा — जो बाईस साल से बंद था और जिसे माँ ने खोलने से मना किया था — वो भी खुला था, और उसके भीतर अंधेरा एक अलग तरह का अंधेरा था।
मैंने काजल की तरफ़ देखा।
"कब?" मैंने पूछा।
मेरी आवाज़ मुझे अपनी नहीं लगी। वो किसी और की आवाज़ थी, किसी ऐसे आदमी की जिसने बहुत देर से साँस नहीं ली हो।
"कब गई, काजल?"
काजल ने होंठ भींचे।
"तुम गए उसके बाद," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूटी। "दस बजे के आसपास। मैं अस्पताल से लौटी थी। माँ रसोई में थी। पापा आँगन में बैठे थे।"
उसने साँस ली।
"फिर बाहर से आवाज़ आई।"
मैं स्थिर हो गया।
"कैसी आवाज़?"
काजल ने पापा की तरफ़ देखा।
"वही आवाज़," उसने कहा। "जो पीपल पर आई थी। जो पापा का नाम ले रही थी। 'शंकर' — तीन बार। और फिर 'शंकर आ जा'।"
मेरे भीतर ठंडी लहर गई।
"मैं दौड़कर बाहर आई," काजल ने कहा। "गली सूनी थी। पीपल के नीचे कोई नहीं था। मैंने चारों तरफ़ देखा।"
उसकी आवाज़ और धीमी हुई।
"और जब मैं लौटी, पापा वैसे ही आँगन में बैठे थे। आँखें खुली हुईं। हाथ जमीन पर। मैंने उन्हें हिलाया, पुकारा, चिल्लाई — पापा, पापा उठिए — पर वो उठे नहीं। वो बस देख रहे थे। जैसे कोई उनको जकड़कर रखा हो।"
माँ ने तब पहली बार बोला।
"वो डरा हुआ था, बेटा," उन्होंने कहा। आवाज़ शांत थी, और यही शांति सबसे ज़्यादा चुभ रही थी। "बाईस साल का डर एक आवाज़ से नहीं जाता।"
मैंने कहा, "तो साइकिल किसने निकाली?"
काजल ने कहा, "दो आदमी आए। सफ़ेद कुर्ते में। एक बूढ़ा और एक जवान। बूढ़े के पैरों में लकड़ी के जूते थे — मैंने आवाज़ सुनी, कट-कट, कट-कट। उन्होंने दरवाज़ा खटखटाया भी नहीं। वो सीधे पीछे वाले कमरे में चले गए, जैसे उन्हें घर पता हो।"
"और तूने कुछ किया नहीं?" मेरी आवाज़ ऊँची हो गई। "तू वहाँ थी, काजल—"
काजल ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में आँसू और गुस्सा दोनों थे।
"मैंने चिल्लाया," उसने कहा। "मैंने कहा — छोड़ो उसे। और तब वो बूढ़ा मेरी तरफ़ मुड़ा।"
वो रुकी।
"उसने मुझे देखा। और उसने कहा — बेटी, तेरे पापा ने आज तक जो किया, वो सब बस इसलिए किया ताकि तू बची रहे। तू चुप रह, तेरे पापा के पास एक ही चीज़ बची है, वो भी आज मुझे दे देना।"
मेरे हाथ की मुट्ठी कस गई।
"और वो बूढ़ा…" मैंने कहा, "उसके पैरों में लकड़ी के जूते थे?"
काजल ने सिर हिलाया।
"हाँ। और उसने दीवार पर लिखा। अपने हाथ से। जब वो जा रहा था, तब लिखा। माँ ने रोका, मैंने रोका, पर उसने हमारी तरफ़ देखा भी नहीं। लिखकर वो मुड़ा और बोला — बेटा सुनने आएगा?"
कमरा चुप हो गया।
मैं उस कोने की तरफ़ बढ़ा जहाँ पापा बैठे थे।
मैं उनके सामने घुटनों के बल बैठ गया।
"पापा।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
और मैंने पहली बार उनकी आँखों में वो देखा जो मैंने उन्नीस साल की उम्र से नहीं देखा था — शर्म।
बहुत गहरी, बहुत पुरानी शर्म।
"तुमने देखा नहीं दिया," मैंने कहा। "तुम सिर्फ़ बैठे रहे?"
मेरी आवाज़ तेज़ हो गई और मैं उसे रोक नहीं पाया।
"तुम्हारे सामने से हमारी साइकिल उठा ले गए और तुम—"
"अंकुश।"
माँ की आवाज़।
मैं चुप हो गया।
माँ ने कुर्सी से उठकर मेरी तरफ़ दो कदम चले और फिर मेरे सामने खड़ी हो गईं। उनका चेहरा सख़्त था, पर उनकी आवाज़ में जो था वो स्वर में नहीं, साँस में था।
"जो आदमी बाईस साल से अपने डर के अंदर बंद है," उन्होंने कहा, "उसे तू एक रात में मत तोलना। तूने वो बाईस साल देखे हैं? तूने देखा है कि रात को वो उठकर क्या सोचता है, कितनी बार उठता है, कितनी बार दरवाज़ा देखता है?"
मैंने आँखें नीची कर लीं।
"मुझे माफ़ करो," मैंने कहा।
माँ ने मेरा सिर अपनी छाती से लगा लिया।
"मुझे माफ़ी मत दे," उन्होंने कहा। "मुझे तेरा गुस्सा चाहिए। गुस्सा अच्छा है। गुस्से में आदमी उठता है। पर वो गुस्सा उस पर मत निकाल जो अब भी उठने की कोशिश कर रहा है।"
मैं उठा।
और मैंने कमरे में चारों तरफ़ देखा।
संदूक खुला। साइकिल गायब। दीवार पर लाल लिखाई। दरवाज़े पर धूल में पैरों के निशान। और उस धूल में एक जगह ऐसी थी जहाँ किसी ने साइकिल रखी थी — पहिये की लकीर बाहर तक जाती हुई।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।
घंटी वहाँ थी। ठंडी।
"कुछ बोल," मैंने धीरे से कहा। "कुछ तो बोल।"
घंटी चुप रही।
और फिर, बहुत धीमे, बहुत दूर से, जैसे किसी पुराने कमरे में कोई बंद दरवाज़े के पीछे से बोल रहा हो, घंटी में एक आवाज़ आई।
"अब वो साइकिल नहीं, गवाही है।"
मेरी साँस रुक गई।
"मतलब?"
घंटी ने कहा, "जो चीज़ मंच पर बोलेगी, वो साइकिल नहीं।"
और चुप हो गई।
मैंने उसे जेब में वापस रखा।
फिर मैंने काजल की तरफ़ देखा।
"अस्पताल कैसा है?"
"मरीज़ अंदर हैं," उसने कहा। "डॉक्टर इसरानी जाग रहे हैं। शबीना का बच्चा सो गया है। दवा दस दिन की है।"
"और वो अजनबी जो पाँचवें बेड के पास बैठा था?"
काजल ने एक पल सोचा।
"वो चला गया," उसने कहा। "जब मैं लौटी तो वहाँ कोई नहीं था। पर बेड पर एक काग़ज़ छोड़ गया था।"
"क्या लिखा था?"
काजल ने जेब से एक मुड़ा काग़ज़ निकाला और मुझे दिया।
मैंने उसे खोला।
उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी, बहुत साफ़ अक्षरों में —
"जो काग़ज़ कल बोलेगा, उसका पहला नाम मैं हूँ।"
मैंने वो काग़ज़ मोड़कर अपनी कॉपी में रख लिया।
फिर मैं पापा के सामने दोबारा बैठा।
इस बार मेरी आवाज़ धीमी थी।
"पापा," मैंने कहा। "मुझे साइकिल नहीं चाहिए। मुझे जानना है — तुमने उस आवाज़ को पहचाना?"
पापा ने अपना चश्मा पोंछना बंद किया।
उन्होंने बहुत देर तक मेरी तरफ़ देखा।
और फिर उन्होंने वो कहा जो मैंने उनसे कभी नहीं सुना था।
"मैंने पहचाना," उन्होंने कहा। "मैं उसे बत्तीस साल से पहचानता हूँ। वो आवाज़ मुझे बचाने आई थी, अंकुश। उस रात। जब मैं उस प्लॉट पर मरा पड़ा था।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
"उसने मुझे उठाया," पापा ने कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी। "उसने मेरे मुँह पर अपना कपड़ा रखा, क्योंकि धुआँ अंदर जा रहा था। उसने मुझे कंधे पर उठाया और बाहर लाया। और मैं उसका चेहरा नहीं देख पाया, क्योंकि मेरी आँखें जल रही थीं।"
उन्होंने साँस ली।
"मैंने उससे सिर्फ़ इतना पूछा — तुम कौन हो? और उसने कहा — जो तेरा हिसाब रखता है।"
मैंने कहा, "और आज?"
"आज भी वही," पापा ने कहा। "वो आज भी मेरा हिसाब रखता है। पर आज मैं उठ नहीं पाया।"
उनकी आवाज़ टूट गई।
"मैंने सुना। मैंने साफ़ सुना — शंकर, शंकर आ जा। मेरे पैर थे, मेरे हाथ थे, मेरे अंदर सब था। पर मैं उठ नहीं पाया। क्योंकि मुझे लगा — अगर मैं उठा, तो जो मैंने बाईस साल छिपाया है, वो सब दरवाज़े के सामने खड़ा मिलेगा।"
वो रुके।
"और मैं उससे मिलना नहीं चाहता था।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा।
"पापा, वो साइकिल कोई साधारण साइकिल नहीं है। वो दादा की है। और जब वो मंच पर बोलेगी—"
"मुझे पता है," पापा ने कहा। "वो साइकिल बोलेगी और मुझे उसके सामने खड़ा होना पड़ेगा।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"और मैं खड़ा होऊँगा, अंकुश। मैं कल खड़ा होऊँगा।"
माँ ने कुर्सी पकड़ ली।
काजल ने होंठ भींच लिए।
मैंने कहा, "मैं तुम्हारे साथ रहूँगा।"
पापा ने सिर हिलाया।
"हाँ," उन्होंने कहा। "पर पहले…"
वो उठे।
बड़ी मुश्किल से उठे। उनके घुटने सुन्न हो गए थे और वो दीवार का सहारा लेकर खड़े हुए। फिर वो पीछे वाले कमरे की तरफ़ गए, जहाँ चूल्हे के पीछे वाला दरवाज़ा खुला था, और भीतर से एक पुराना लकड़ी का डिब्बा उठाकर लाए।
वो डिब्बा मैंने पहले नहीं देखा था।
उस पर धूल की मोटी परत थी और एक कोने से ज़ंग लगी कील बाहर निकली हुई थी।
पापा उसे मेज़ पर रखकर मेरे सामने बैठे।
और उन्होंने काँपते हाथों से मेरा हाथ पकड़ लिया।
उनकी हथेली बर्फ जैसी ठंडी थी।
"कल मैं बोलूँगा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार साफ़ थी। "पर पहले एक बात तुझे बतानी है जो मैंने आज तक नहीं बताई।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
और मेरे भीतर कुछ ऐसा हिला जो मैं नहीं जानता था कि वो अब तक बचा हुआ था।
॥
पापा की हथेली मेरे हाथ पर बर्फ जैसी ठंडी थी, और उनकी आवाज़ में जो काँप रहा था, वो डर नहीं था। वो कुछ और था। शायद शर्म। शायद वो चीज़ जो बाईस साल से उनके सीने में बैठी थी और आज पहली बार बाहर निकलने को मचल रही थी।
"पहले ये खोल," उन्होंने डिब्बे की तरफ़ इशारा किया।
मैंने डिब्बे का ढक्कन उठाया। ज़ंग लगी कील चरचराई, और भीतर से एक गंध उठी — पुराने कपड़े की, नैप्थलीन की, और उससे भी पुरानी किसी चीज़ की जो मुझे नहीं पहचानी।
डिब्बे में एक कपड़े का पोटला था। मैला, मोटा, रस्सी से दो बार बँधा हुआ।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
पापा ने कुछ नहीं कहा। बस देखते रहे।
मैंने रस्सी खोली। कपड़ा खिसका।
भीतर से निकला — एक जोड़ी बच्चों के जूते। बहुत छोटे। जैसे किसी चार साल के बच्चे के हों। एक चूड़ी का जोड़ा। और एक पुरानी मोटी कॉपी, जिसके ऊपर मेरा नाम लिखा था — मेरी पापा के हाथ की लिखाई में।
मैंने कॉपी उठाई। पहला पन्ना खोला।
उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी, और उस लाइन ने मेरे भीतर कुछ ऐसा हिला दिया जो मैंने सोचा था कि बहुत पहले मर चुका है।
"अंकुश, तेरे पापा ने आज घर छोड़ने का मन बना लिया है।"
मैंने कॉपी बंद कर दी। मेरे हाथ काँप रहे थे।
"पापा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ वो नहीं थी जो मैं चाहता था कि हो। "ये क्या है?"
पापा ने साँस ली। लंबी, धीमी, जैसे कोई बहुत गहरे पानी से ऊपर आ रहा हो।
"वो रात," उन्होंने कहा। "जिस रात संदूक से साइकिल गायब हुई, उससे एक हफ़्ता पहले। मैंने तेरे लिए ये कॉपी लिखी थी। ताकि अगर मैं लौटूँ ना, तो तुझे पता हो कि मैं भागा नहीं था। मैं मजबूर था।"
कमरे में सन्नाटा था। इतना कि मुझे अपने ही दिल की धड़कन सुनाई दे रही थी।
"तुम भागने वाले थे?" मैंने पूछा।
"मैं भागने वाला था," पापा ने कहा। "और तेरी माँ को पता था। तू सोचता है वो बाईस साल चुप क्यों रही? क्योंकि उसने मेरा बोरिया-बिस्तर उस रात देखा था।"
माँ ने नज़र नीची कर ली।
काजल ने मुझे देखा, फिर पापा को। वो कुछ कहने को हुई, पर मैंने सिर हिला दिया — रुक जा।
"पर तुम गए नहीं," मैंने कहा। "तुम गए नहीं।"
"नहीं," पापा ने कहा। "क्योंकि उसी रात… साइकिल गायब होने से ठीक पहले… मैंने तुझे देखा था। तू उस वक़्त नौ साल का था। तू सो रहा था, और तेरा हाथ काजल के सिर पर था। जैसे तू उसे बचा रहा हो। और तेरी माँ दरवाज़े पर खड़ी थी, और उसकी आँखों में वो सवाल था जो उसने कभी ज़ोर से नहीं पूछा — कि मैं जाऊँ या रुकूँ?"
वो रुके। उनका गला भर आया।
"मैं रुक गया," उन्होंने कहा। "पर पूरा नहीं रुका। जिस आदमी ने तेरे बाप को डरा दिया था, उसने मुझे रुकने नहीं दिया। मैं रोज़ उस अंगूठे के नीचे जाता रहा। रोज़ उस काग़ज़ में एक और लाइन जुड़ती गई। और तू देखता रहा कि तेरा बाप चुप है। तूने सोचा कि मैं कमज़ोर हूँ।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"मुझे मालूम है तूने सोचा। मैं तेरी आँखों में देखता था, रोज़।"
मुझे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं थी। मैं उठा। कुर्सी पीछे खिसकी, और उसकी आवाज़ इस छोटे कमरे में चीख जैसी लगी।
"नौ साल का," मैंने कहा। और मेरी आवाज़ मेरे कान में ही अजनबी लगी। "मैं नौ साल का था, पापा। मैंने तुम्हें हर रविवार देखा — चश्मा पोंछते, औज़ार साफ़ करते, और कभी कुछ नहीं कहते। मैंने सोचा कि तुम्हारे पास कहने को कुछ नहीं है।"
"मेरे पास बहुत कुछ था," पापा ने कहा।
"तो क्यों नहीं बोले?" मेरी आवाज़ तेज़ हो गई। "मैं तेरा बेटा हूँ। मैं तेरा दुश्मन नहीं था। काजल तेरी बेटी है, तूने उसे क्या सिखाया? चुप रहना? हम दोनों यही सीखते रहे — कि घर में बड़ी बात हो तो बोलना नहीं।"
काजल ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
"अंकुश," वो धीरे बोली।
"नहीं," मैंने कहा। "छोड़।"
मैंने हाथ खींच लिया। फिर दरवाज़े की तरफ़ चलने लगा। बाहर रात थी, गली में हल्की चहल थी — शबनम आपा की गुमटी से आती खड़खड़ाहट, किसी के पैरों की आवाज़।
मैंने दरवाज़ा नहीं खोला।
मैं रुक गया।
क्योंकि मेरे भीतर कुछ था जो मुझसे कह रहा था — रुक जा, अंकुश। ये वही चीज़ है जिसका तू बाईस साल इंतज़ार कर रहा था। अब मिल रही है तो भाग क्यों रहा है?
मैं धीरे से मुड़ा।
पापा वहीं बैठे थे। हिले नहीं। उनकी आँखों में उस वक़्त कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — डर नहीं, शर्म नहीं। वो कुछ और था। वो देख रहे थे कि उनका बेटा उनसे दूर जा रहा है और इस बार उनके पास छिपने की जगह नहीं थी।
मैं वापस आया। उनके सामने कुर्सी खींची। धीरे से बैठा।
मेरी आवाज़ धीमी हो गई। बहुत धीमी।
"पापा," मैंने कहा। "मुझे तेरे उस अंगूठे से शिकायत नहीं है।"
वो चौंके।
"मुझे मालूम है तू डरा हुआ था। माँ बीमार थी। रणवीर तेरे पीछे था। तूने अंगूठा लगाया, ठीक है, गलती थी, पर वो डर था। डर से ऐसा हो जाता है।"
मैंने साँस ली।
"मुझे तेरी चुप्पी से शिकायत है," मैंने कहा। "बाईस साल की चुप्पी। इतनी लंबी कि मुझे लगा कि तेरे पास मेरे लिए वक़्त नहीं है। कि मैं तेरे लिए बोझ हूँ। कि तेरा चेहरा इसलिए ऐसा है जैसे कुछ टूट गया हो मुझे देखकर।"
मेरी आवाज़ टूटी।
"मैंने सोचा था कि तूने मुझे अफ़सोस से देखा है।"
पापा ने अपना चश्मा उतारा। धीरे से मेज़ पर रखा। फिर अपना सिर झुकाया और दोनों हाथों से अपना चेहरा छिपा लिया।
"अंकुश," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ किसी और की लग रही थी — पुरानी, टूटी, बच्चों जैसी। "तू मेरे लिए बोझ नहीं था। तू मेरा सबूत था। मैं जब भी उस काग़ज़ के पास जाता, मुझे तेरा चेहरा दिखता और मुझे लगता — शंकर, तू झूठ नहीं बोल सकता, पर सच भी नहीं बोल सकता। इसलिए मैं चुप रहा। और यही सबसे बड़ी ग़लती थी।"
माँ उठीं। वो हमारे बीच आईं और उन्होंने अपनी दोनों हथेलियाँ मेज़ पर रख दी, जैसे कोई ताक़त चाहती हों।
"बहुत हुआ," उन्होंने कहा।
हम दोनों ने उनकी तरफ़ देखा।
"बाईस साल के आँसू एक रात में नहीं सूखते," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ साफ़ थी, वैसी ही जैसे सुबह पाँच बजे चूल्हे के पास होती है। "पर कल सुबह सूरज निकलने से पहले हमें मैदान में खड़ा होना है। तुम दोनों अब रोने, छिपने, पुरानी बातें खुरचने के चक्कर में रहोगे, तो सुबह क्या होगा? रणवीर क्या एक रात हमें इजाज़त देगा सोने की?"
काजल ने मुश्किल से हँसा।
"माँ," वो बोली। "तू बात सही कह रही है, पर तेरी बात में भी मसाला है।"
"मसाला मेरा काम है," माँ ने कहा। "बेटा, मेरी बात सुनो। ये आँसू इसलिए नहीं बह रहे कि ये चीज़ें हुईं। ये इसलिए बह रहे हैं कि अब हम एक-दूसरे को देख पा रहे हैं। ये अच्छी निशानी है। पर अब इनके सूखने का वक़्त है। कल सुबह सच को खड़ा होना है। और सच खड़ा तभी होगा जब तुम दोनों खड़े होंगे।"
पापा ने अपना चेहरा छोड़ा। उन्होंने माँ की तरफ़ देखा।
"सुशीला," उन्होंने कहा, बहुत धीरे। "मैं तुझसे कुछ नहीं कहा बाईस साल।"
"मुझे पता है," माँ ने कहा। और उनकी आवाज़ में पहली बार कुछ नरमी थी। "पर तूने भी मेरा इंतज़ार किया। तूने बेटे-बेटी को नहीं छोड़ा, उस रात। मैंने भी तुझे नहीं छोड़ा। क्योंकि मुझे पता था तू कमज़ोर नहीं है। तू बस रास्ता नहीं देख पा रहा था।"
वो कुछ देर रुकीं।
"अब दिख रहा है," माँ ने कहा।
पापा ने सिर हिलाया।
और फिर उन्होंने सीधे मेरी तरफ़ देखा — सच में सीधे। पहली बार ऐसा लगा जैसे उन्होंने मुझे देखा है।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "कल मैं तेरे सामने बोलूँगा। मैं उस काग़ज़ की हर लाइन का हिसाब दूँगा। पर आज रात…" — उन्होंने डिब्बे की तरफ़ इशारा किया — "ये कॉपी तेरे पास रहने दे। मैंने इसे लिखा था तेरे लिए। बाईस साल पहले। अगर कल कुछ हो जाए तो ये कॉपी तुझे बता देगी कि तेरा बाप भागने के लिए पोटला नहीं बाँध रहा था। वो रुक रहा था।"
मैंने कॉपी उठाई। हल्की थी। पर हाथ में ऐसे लग रही थी जैसे कोई बच्चा गोद में लिया हो।
"कुछ नहीं होगा," मैंने कहा।
पापा हँसे। पहली बार हँसे, पूरे बाईस साल में।
"तुझे तो पता है," उन्होंने कहा, "कुछ न हो, ये मेरे बस में नहीं है। पर हाँ — अब होगा तो हम साथ होंगे।"
मैंने कॉपी उठाई और माँ की कुर्सी के पीछे रख दी।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।
काजल ने खोला। बाहर उस्ताद अली बक्श खड़े थे — अपने मोटे चश्मे के पीछे थके हुए, पर पूरी तरह जागते हुए। उनके पीछे शालिनी खड़ी थी, हाथ में एक मोटी काली फाइल। और उनके पीछे मीरा, जिसके कंधे पर कैमरा था और हाथ में एक छोटी डायरी।
"सो नहीं रहे?" उस्ताद ने पूछा।
"नहीं," मैंने कहा।
"अच्छा किया," उस्ताद ने कहा। "क्योंकि आज रात नींद की नहीं, काग़ज़ की ज़रूरत है।"
वो भीतर आए। उनके हाथ में एक मोटी लाल जिल्द वाली कॉपी थी, जिसके किनारे से काग़ज़ निकले हुए थे। उन्होंने उसे मेज़ पर रखा — एक ज़ोर की आवाज़ के साथ।
"ये क्या है?" पापा ने पूछा।
"हिसाब," उस्ताद ने कहा। "पचास साल का। मैंने इसे रात भर खोला। पचास साल पहले जो काग़ज़ भंडार में जला, वो पूरा नहीं जला था। इसमें एक कॉपी बची थी — मैंने बनाई थी, किसी को बताया नहीं।"
शालिनी ने फाइल खोली।
"और ये," उसने कहा, "सारी गवाहियाँ हैं जो हमने अब तक इकट्ठी कीं — डॉक्टर इसरानी की, रेहाना की, भोला भाई की, रमेश भाई की, नसीमा बाई की, बूढ़े काका की, और…" — उसने मेरी तरफ़ देखा — "गोविंद भाई की। वो आज शाम लौट आए थे। मैंने उनका बयान दर्ज कर लिया।"
मैं चौंक गया।
"गोविंद भाई लौट आए?"
"लौट आए," शालिनी ने कहा। "और मैंने उन्हें कहीं जाने नहीं दिया। अभी स्कूल की कोठरी में बैठे हैं, चाय पी रहे हैं।"
उस्ताद ने काग़ज़ फैलाए।
"अब सुनो," उन्होंने कहा। "अभी से सुबह सात बजे तक हमें व्यवस्था करनी है। रणवीर की योजना बड़ी है, पर हमारी योजना साफ़ होनी चाहिए। हर काग़ज़ का एक नाम होगा। हर नाम का एक बोलने वाला। और हर बोलने वाले के पीछे एक गवाह।"
मैंने आगे झुककर देखा। उस रात उस्ताद ने ऐसी सूची बनाई जो मैंने कभी नहीं सोची थी।
पहली लाइन पर लिखा था — सात अंगूठों वाला शर्तनामा, और उसके नीचे नामों की सूची।
फिर — भारद्वाज ट्रस्ट का झूठा दस्तावेज़।
फिर — स्कूल की छत की झूठी रिपोर्ट और शालिनी के पापा की कंपनी।
फिर — गिरवी साइकिल, जिस पर कल मंच पर बोला जाना था।
फिर — पुराने बिजलीघर के बक्से और उसकी राख।
फिर — तीन काग़ज़ जो कटे, जिनमें से एक सातवाँ काग़ज़ था।
फिर — और फिर आठवाँ नाम।
"उस्ताद," मैंने कहा। "इतना सब एक दिन में?"
"इतना सब एक दिन में नहीं," उस्ताद ने कहा और उन्होंने चश्मा ऊपर किया। "हर काग़ज़ किसी का हिस्सा है, अंकुश। जब एक बोलेगा, दूसरा खुद आगे आएगा। सच ऐसा होता है — वो शर्मिंदा करता है, पर अकेले में। सबके सामने वो सबको साहस देता है।"
शालिनी ने एक और पन्ना निकाला।
"मेरे पास एक और बात है," उसने कहा। "मेरे पापा की गोदाम वाली रसीद — जिसमें मरम्मत का झूठ बताया गया था। मैंने उसे कल सुबह पेश करने का मन बना लिया है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तुम्हारे पापा?"
"उनसे बात कर ली," शालिनी ने कहा, और उसकी आवाज़ साफ़ थी, पर उसमें दर्द छुपा था। "उन्होंने कहा कि वो कल बोलेंगे। और मैंने कहा कि मैं उनके साथ बैठूँगी।"
मैंने सिर हिलाया।
तभी टिंकू दौड़ता हुआ आया। उसके हाथ में एक मोटी रस्सी थी और कंधे पर एक बड़ा थैला।
"दीये तैयार हैं," वो हाँफते हुए बोला। "सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू ने पानी की बोतलें भर लीं। शबनम आपा ने कहा — रोटियाँ तैयार हैं, गुड़ और अचार भी है।"
"कितने लोग?" मैंने पूछा।
"अभी तक गिनती है — बयालीस।"
मैं रुक गया।
"बयालीस?"
"और बढ़ रहे हैं," टिंकू ने कहा। "बच्चों ने घर-घर खबर भेजी है कि कल सुबह सूरज निकलने से पहले पीपल पर कोई नहीं सोएगा। जो आना चाहे आए। चाय शबनम आपा की।"
मैंने काजल की तरफ़ देखा। वो मुस्कुरा रही थी, पहली बार उस रात।
"अंकुश भैया," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ ज़रा धीमी हो गई। "एक बात है।"
"क्या?"
उसने थैला नीचे रखा और भीतर से एक मुड़ा काग़ज़ निकाला। वो मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"ये मुझे स्कूल के पीछे मिला," उसने कहा। "पत्थर के नीचे दबा था।"
मैंने उसे खोला। नीली स्याही में लिखा था, यही दो लकीर-बिंदु निशान, और नीचे एक लाइन —
"जो औरत घंटी लौटाने आई थी, वो अब भी उसी वार्ड में है। उसका नाम किसी काग़ज़ पर नहीं है।"
मैंने घंटी जेब से निकाली। ठंडी थी।
"कौन?" मैंने पूछा।
घंटी चुप रही। एक सेकंड, दो सेकंड।
फिर उसने धीमे से कहा —
"जो नाम नहीं, निशान है।"
मैंने काग़ज़ पापा को दिया। उन्होंने पढ़ा और उनका चेहरा पीला पड़ गया।
"ये…" उन्होंने धीमे से कहा। "ये वो औरत है, अंकुश। उस रात वार्ड में जो खड़ी थी। जिसने मुझे घंटी दी और कहा था कि तेरे बेटे को दे देना। पर तब मैं तुझे ये देने लायक नहीं था।"
"अब कहाँ है वो?"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"कल जो बोलेगा," उन्होंने कहा, "उसका पहला नाम मैं हूँ। पर शायद — शायद दूसरा नाम वो है।"
माँ ने तभी हमारे बीच थाली रख दी। रोटियाँ, गुड़, प्याज़, और एक छोटा कटोरा अचार का।
"पहले खाओ," उन्होंने कहा। "कल बहस करना।"
उस रात पूरी गली नहीं सोई। पर सोने की देर सबको एक जैसी लगी।
टिंकू और बच्चों ने पीपल के नीचे दीये जलाए — बयालीस दीये, एक-एक करके। मीरा ने कैमरों की बैटरी चेक की। शालिनी करीब दो बजे तक फाइलों के पन्नों पर नंबर डालती रही। उस्ताद ने अपनी मशीन के पास बैठकर कुछ सीला — मुझे बाद में पता चला कि वो एक बैनर था, सफ़ेद कपड़े पर नीले धागे से लिखा — "सच की चौपाल"। शबनम आपा ने रात भर के लिए एक बड़ी देगची में खिचड़ी बनाई और कहा कि आज कोई भूखा नहीं सोएगा।
मैं अपने कमरे में आया। कुर्सी पर बैठा। कॉपी — पापा वाली कॉपी — खोली।
वही पहला पन्ना। वही लाइन। फिर आगे पलटा।
दूसरे पन्ने पर लिखा था — "अगर मैं लौटा, तो तुझे साइकिल सिखाऊँगा। अगर नहीं लौटा, तो याद रख — तेरा बाप डरा हुआ था, पर तेरे लिए रुका।"
मैंने कॉपी बंद कर दी। फिर मैंने घंटी जेब से निकाली और उसे अपने माथे से लगाया।
"कल," मैंने कहा। "कल हम दोनों को साथ खड़ा होना है।"
घंटी सिर्फ़ एक बार हल्की गुनगुनाई। कुछ कहा नहीं।
मैं चारपाई पर लेटा। आँख बंद की। नींद आई, पर वो गहरी नहीं थी — वो हल्की, डरती हुई नींद थी जिसमें हर आवाज़ आपको जगा देती है।
फिर सुबह।
आँख खुली — बाहर अभी रोशनी भी नहीं थी। सिर्फ़ एक धुँधला नीला आसमान खिड़की से दिख रहा था। मुर्गे की आवाज़ भी नहीं आई थी।
मैं उठा। चारपाई से पैर नीचे रखे। कमरे में ठंड थी।
फिर मैंने बगल में देखा।
पापा का बिस्तर खाली था।
चादर बिछी थी, तकिया ठीक जगह था — पर उस पर कोई नहीं था।
मैंने जल्दी से कमरा देखा। दूसरे कोने में काजल सो रही थी। माँ की चारपाई भी खाली थी।
मेरा दिल एक झटके में तेज़ धड़का।
मैं दौड़कर बाहर आया। आँगन खाली था। चूल्हे के पास कोई नहीं था। दरवाज़े का कुंडा — बाहर से।
मैंने दरवाज़ा खोला।
और मैं वहीं रुक गया।
दरवाज़े के बाहर लोहे के कुंडे से एक काग़ज़ टेप से बँधा था।
और टेप से ही — काँपते हाथ से — पापा का चश्मा उस काग़ज़ के साथ चिपका हुआ था। वही चश्मा जिसे कल रात उन्होंने अपने सामने मेज़ पर रखा था।
काग़ज़ पीला था। उस पर पेंसिल से लिखा था —
"मैं पहले मैदान जा रहा हूँ। तू अपनी घंटी लेकर आ।"
मैंने चश्मा निकाला। मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने चश्मा पहना — मेरे चेहरे पर बहुत बड़ा था, पर मैंने उतारा नहीं।
और ठीक उसी पल, मेरी जेब से घंटी बजी।
कुछ नहीं कहा।
बस बजी।
और मैं समझ गया कि पापा ने वही किया जो वो करना चाहते थे।
वो बाईस साल चुप रहे। अब वो चुप नहीं रहना चाहते थे।
मैंने साँस ली। फिर मैंने पीछे मुड़कर देखा — काजल दरवाज़े पर खड़ी थी, उसके हाथ में ओढ़नी थी।
"वो गए?" उसने पूछा।
"गए," मैंने कहा।
वो एक पल को रुकी। फिर उसने अपनी ओढ़नी कंधों पर ठीक की।
"तो चल," उसने कहा। "हमें भी पहुँचना है।"
मैंने पीछे आँगन में देखा। माँ वहीं चारपाई पर बैठी थीं — चुप, पर उनके चेहरे पर डर नहीं था। उन्होंने मुझे देखा और कहा —
"मैंने कहा था ना। अब रोने का वक़्त नहीं।"
मैंने सिर हिलाया।
फिर मैंने आसमान की तरफ़ देखा — पहली लकीर लाल निकल रही थी।
और मैंने घंटी को जेब से निकाला और उसे एक बार ज़ोर से बजाया।
साफ़, तेज़, पूरी गली की आवाज़।
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