The Mysterious Bell – Chapter 421: jodne wala mistri hissa 043 ep421-430
सुबह की धूप उस वक़्त चबूतरी पर ऐसे गिर रही थी जैसे किसी ने पीला कपड़ा बिछा दिया हो। पीपल की पत्तियों के बीच से आती रोशनी में धूल के कण ऐसे तैर रहे थे जैसे हवा में कोई पुरानी कहानी घुल रही हो।
उस्ताद का हाथ हवा में था।
और सामने, भोला भाई की जीप के खुले दरवाज़े से, एक बूढ़ा हाथ बाहर आ रहा था — काँपता हुआ, पतला, नसों से भरा, जैसे सूखी लकड़ी पर उभरी हुई लकीरें। उस उँगली में पीतल की वो पतली अँगूठी थी, जिस पर छोटा सा फूल खुदा था।
मैंने उस्ताद का चेहरा देखा।
वो रो नहीं रहे थे। वो बस खड़े थे, और उनका चेहरा ऐसा था जैसे कोई पुराना मकान अंदर से खिसक रहा हो, और बाहर से कुछ न दिख रहा हो।
फिर इलाही बक्श जीप से उतरे।
पहले उनका एक पैर ज़मीन पर आया — पतला, सूखा, घुटने से थोड़ा मुड़ा हुआ, और पुराने सफ़ेद कपड़े की नाली में लिपटा हुआ। फिर दूसरा। फिर उनका पूरा शरीर।
वो बहुत दुबले थे। सफ़ेद कुर्ता, जिस पर दो जगह पैबंद लगे थे और तीसरी जगह धागा उधड़ा हुआ था। कमर झुकी हुई, पर उसमें भी एक अजीब सी सीधी लकीर थी — जैसे आदमी झुका हो, पर टूटा न हो।
और उनकी आँखें।
उस्ताद की आँखें जैसी, पर कुछ ज़्यादा नरम। जैसे उसी साँचे में ढली हों, बस उस पर पचास साल की हवा चल गई हो।
वो चार कदम चले। भोला भाई ने हाथ बढ़ाया, पर उन्होंने नहीं पकड़ा। वो अपने आप चले — धीरे, पर सीधे, चबूतरी की तरफ़।
और फिर वो रुक गए।
उस्ताद से बस एक हाथ की दूरी पर।
चबूतरी पर पड़ा बक्सा, टिंकू के पैर के पास, चुप था। चारों बच्चे — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — पत्थर की मूरत जैसे बैठे थे। चिंटू की नाक बह रही थी और वो उसे पोंछ भी नहीं रहा था।
शबनम आपा गुमटी के बाहर खड़ी थीं, हाथ में लोहे की चिमटी, और चिमटी उनके हाथ में धीरे-धीरे काँप रही थी।
मीरा ने अपना कैमरा नीचे कर लिया था। मैंने देखा — उसने बटन दबाकर रिकॉर्डिंग रोक दी।
पापा पीछे खड़े थे, चश्मा हाथ में, और उनका अंगूठा चश्मे के किनारे को ऐसे रगड़ रहा था जैसे कोई पुराना दाग मिटा रहा हो।
और फिर, उस सुबह की सबसे बड़ी आवाज़ आई।
आवाज़ नहीं।
चुप्पी।
पचास साल की चुप्पी एक जगह खड़ी थी और वो इतनी भारी थी कि पीपल की पत्तियों की खड़खड़ाहट भी उसमें दब गई।
मुझे लगा मेरी साँस भी सुनाई दे रही है।
तुम सोच रहे होगे कि इतने सारे लोग, एक बूढ़ा बक्सा, और दो बूढ़े भाई — इसमें ऐसा क्या था जो सब रुक गए?
सुनो।
रुकने वाली बात ये थी कि दोनों भाई एक-दूसरे को देख रहे थे और दोनों की आँखों में एक ही सवाल था — तू अब भी मुझे चोर समझता है?
और वो सवाल किसी ने ज़ुबान से नहीं पूछा।
फिर इलाही बक्श ने अपना हाथ नीचे किया। उन्होंने अपनी जेब से रूमाल निकाला — फटा, धुला हुआ, किनारे से फीका पड़ा हुआ — और उसे हाथ में मरोड़ते हुए बोले, बहुत धीरे, ऐसे जैसे हर शब्द उनके अंदर से तोड़कर निकल रहा हो।
"मैंने तुझे कभी चोर नहीं कहा था।"
उस्ताद ने कुछ नहीं कहा।
"बारह रुपये," इलाही बोले, "बारह रुपये मैंने नहीं लिए थे। पर मैंने एक बात और नहीं कही थी — और वो बात ज़्यादा भारी थी।"
उन्होंने रूमाल को हाथ में दबाया।
"मैंने खुद को कायर कहा था, भाई। उस रात से रोज़ कहा। तेरे दरवाज़े तक आया, तीन बार आया। पहली बार तेरी दुकान का शटर गिरा था, दूसरी बार तेरे बुढ़ापे की आहट सुनी और लौट गया, तीसरी बार तेरे मुँह से अपने बारे में कुछ सुन लिया और — बस।"
उनकी आवाज़ लड़खड़ाई।
"तेरे मुँह से सुना था, भाई। उस दिन तेरे दरवाज़े पर खड़ा था, और तूने किसी से कहा था — मेरा कोई भाई नहीं है।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उनका पूरा शरीर एक कदम पीछे हटा, बिना पैर हिले।
"मैंने कहा था?" उनकी आवाज़ फट गई, जैसे किसी पुराने कपड़े को ज़ोर से खींचा गया हो।
"कहा था," इलाही ने कहा। "और मैं उसी दिन लौट गया। पचास साल के लिए।"
उस्ताद ने अपना हाथ उठाया — नहीं, नहीं, वो हाथ नहीं उठाया। वो अपनी छाती पर रखा और बोले, इतनी धीमी आवाज़ में कि मुझे सुनने के लिए आगे झुकना पड़ा।
"उस रात मैंने तुझे गरीब नहीं कहा था।"
वो रुके।
"मैंने तुझे पराया कहा था।"
और जैसे ही ये शब्द हवा में गिरे, इलाही का हाथ ऊपर आया।
ये वो हाथ नहीं था जो जीप से बाहर आया था। ये थोड़ा और ऊपर था, थोड़ा और तेज़।
उस्ताद ने उसे पकड़ा।
और फिर दूसरा हाथ आया। फिर दूसरा। चार हाथ। दो बूढ़े आदमी, चबूतरी के सामने, एक-दूसरे का हाथ पकड़े, और कोई कुछ नहीं बोल रहा था।
रोने की आवाज़ नहीं आई।
बस कंधे हिल रहे थे। दोनों के। एक ही लय में, जैसे पचास साल बाद दोनों की साँस ने एक साथ चलना सीख लिया हो।
और मैं वहीं खड़ा था, और मुझे अपनी जेब में घंटी की गरमाहट महसूस हुई — धीमी, स्थिर, जैसे कोई बूढ़ी औरत चूल्हे पर रोटी बेलते-बेलते रुक जाए और सुन ले कि बेटा आ गया।
मैंने पीछे मुड़कर बच्चों को देखा।
सानिया ने गुड्डू का हाथ पकड़ रखा था। रफ़ीक़ ने अपना टूटा चश्मा उतारकर आँखों पर हाथ रख लिया था, जैसे चश्मे के बिना दुनिया ज़्यादा साफ़ दिखती हो। चिंटू रो रहा था — बिना आवाज़, बस होंठ काँप रहे थे और वो उन्हें दाँतों से दबाए हुए था।
और टिंकू?
टिंकू ने अपना सिर झुका लिया था, और मैंने उसे पहली बार ऐसे देखा — बिलकुल चुप, बिलकुल छोटा, जैसे वो भी उन दो हाथों में कुछ अपना ढूँढ रहा हो। उसका अपना पापा छह महीने पहले चला गया था, और उसने आज तक उस पर एक आँसू नहीं बहाया था — कम से कम मेरे सामने तो नहीं।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। उसने हाथ नहीं हटाया।
तभी शबनम आपा की चप्पलों की आवाज़ आई।
वो आईं, हाथ में पीतल की थाली, उस पर चार कुल्हड़ — भाप उठती हुई। उन्होंने थाली चबूतरी के किनारे उस जगह रखी जहाँ कोई नहीं बैठा था, और बिना एक शब्द बोले पलटकर चल दीं।
मैंने देखा — उन्होंने जाते वक़्त अपनी आँख का कोना अपनी साड़ी के पल्लू से छुआ।
शबनम आपा। जिनकी ज़ुबान से आज तक किसी ने नहीं जीता था। जो पंद्रह साल से अपनी बहन से नहीं बोली थीं।
वो चुपचाप आईं और चुपचाप गईं, और उनकी चुप्पी में सबसे ज़्यादा आवाज़ थी।
अब मैं तुम्हें वो बात बताता हूँ जो उस सुबह सबसे अजीब थी।
जब उस्ताद और इलाही ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा, तब मैंने देखा — चबूतरी के बीच में रखा बक्सा, हल्का हिला।
नहीं, हिला नहीं। काँपा।
और फिर उसके पहले ताले से एक आवाज़ आई — ठीक वैसी आवाज़ जैसी पुरानी कुंडी के भीतर कोई चाबी घूमती हो, धीरे-धीरे, जैसे खुद से घूम रही हो।
टिंकू ने सिर उठाया।
"उस्ताद —"
"देख रहा हूँ," मैंने कहा।
पहले ताले का छल्ला घूमा। फिर उसका कुंडा उठा — ज़ंग से भरी साँस छोड़ता हुआ, छी… जैसे उसने पचास साल की हवा एक साथ बाहर निकाली हो।
और ताला खुलकर बक्से के किनारे लटक गया।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने इलाही की तरफ़। इलाही ने उनकी तरफ़।
"मैंने इसे नहीं छुआ," फ़ैज़ ने कहा, पीछे से।
"कोई नहीं छू रहा, बेटा," मैंने कहा। "ये खुद खुला है। और अब दूसरा बाकी है।"
दूसरा ताला वहीं था — वही जुड़वाँ, वही आकार, पर ज़रा भी नहीं हिला।
मैंने उस्ताद से कहा, "उस्ताद, ये ताला सिर्फ़ हाथ पकड़ने से नहीं खुला। वो पहला था। ये दूसरा है।"
"तो क्या चाहिए?" उन्होंने पूछा।
"सच। पर एक साथ।"
मैंने बक्सा उठाकर उनके बीच रख दिया। इलाही थोड़ा झुके, उस्ताद भी।
"अलग-अलग तो आप दोनों बोल ही चुके हैं," मैंने कहा। "अब एक साथ बोलिए। जो भीतर है, वो पूरी बात सुनेगा। अधूरी नहीं।"
उस्ताद ने इलाही को देखा। इलाही ने उन्हें। फिर कुछ देर दोनों की साँसें रुकीं, और फिर — एक साथ, वैसे ही जैसे तीस साल पहले पाठशाला की घंटी दोनों ने एक साथ बजाई होगी।
"हम दोनों ने एक-दूसरे को कुछ नहीं कहा," उस्ताद बोले, "और हमने दोनों ने खुद को सज़ा दी।"
इलाही ने वही दोहराया, धीरे से, हर शब्द पर रुकते हुए।
और दूसरा ताला खुला।
इस बार धीमा नहीं। इस बार उसमें से एक सीधी, साफ़ आवाज़ आई — टक — जैसे किसी ने खुल कर कह दिया हो कि हाँ, चलेगा।
बच्चे उठ खड़े हुए। सानिया ने मुँह पर हाथ रख लिया। चिंटू ने ऐसी चीख निकाली जैसे कोई उसे लुका-छिपी में मिल गया हो।
उस्ताद ने बक्से का ढक्कन उठाया।
उसमें से पहले गंध आई।
पुरानी, मीठी, थोड़ी बासी — जैसे किसी पुराने संदूक में कपड़ों के बीच कपूर रखा हो और वो बरसों में कपड़ों से बात करने लग गया हो।
फिर मैंने वो तीन चीज़ें देखीं।
एक — पीली जिल्द वाला मोटा रजिस्टर, जिसके किनारे उखड़े हुए और जिसकी जिल्द पर एक भी अक्षर नहीं, बस ज़मीन के रंग का एक टुकड़ा चिपका हुआ।
दो — छोटी लोहे की चाबी, हथेली भर से भी छोटी, जिसके दाँते घिस गए थे और जिसके छल्ले में रस्सी का एक काला टुकड़ा लिपटा था।
तीन — कपड़े की पोटली, मोटे खादी में लिपटी, रस्सी से दो बार बँधी, और उसके ऊपर किसी ने उँगली से खुरचकर वही दो लकीरें और बिंदु वाला निशान बनाया था।
मैंने पोटली को हाथ नहीं लगाया।
उसका वक़्त अभी नहीं आया था।
मैंने रजिस्टर उठाया और उस्ताद के हाथ में रखा। उनके हाथ काँप रहे थे, पर जैसे ही उनकी उँगली जिल्द पर लगी, कंपन थम गया।
"ये हमारी पाठशाला का हिसाब है," उन्होंने कहा। "मैंने ये जिल्द हर महीने के आख़िर में खोलकर देखा था। पचास साल से नहीं देखा।"
उन्होंने पहला पन्ना पलटा।
उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी, भूरी स्याही में, घुमाते अक्षरों में —
जो जोड़ता है, उसका हिसाब कभी बराबर नहीं होता।
मैंने देखा, मीरा ने कॉपी निकाली और उसे उलटी तरफ़ से लिखने लगी। उसकी कलम तेज़ चल रही थी — जैसे सब कुछ पकड़ लेना चाहती हो।
उस्ताद ने पन्ने पलटने शुरू किए।
बीच के पन्नों पर रोज़ की एंट्री थी — किसकी साइकिल आई, किसका ताला आया, किसकी सिलाई हुई, क्या मरम्मत हुई और किसने कितना दिया। कोई दाम नहीं। सिर्फ़ इतना — "कपड़ा वाला भाई, दो रुपये बाक़ी"; "किराने वाला, एक रुपया"; "बढ़ई, मरम्मत के बदले स्कूल की बेंच"।
"पैसा लिखा है?" चिंटू ने पूछा। "कहाँ है पैसा?"
"यही है," मैंने कहा। "ये रजिस्टर पैसा नहीं, भरोसा है। जिसे जितना मिला, उसने उतना ही लौटाया — पर रुपये में नहीं, हाथ में।"
उस्ताद ने आख़िरी पन्ना पलटा।
और वहीं सब रुक गए।
उस पन्ने पर ऊपर की तरफ़ साफ़ लिखे हुए तीन नाम थे, बराबर की लकीर से अलग किए हुए, और हर नाम के आगे एक ही बात — "हिस्सा बराबर"।
पहला नाम — उस्ताद अली बक्श।
दूसरा नाम — इलाही बक्श।
तीसरा नाम — शिवनारायण यादव।
मैंने देखा बिना आवाज़ पढ़ते हुए। मेरे परदादा का नाम। वो नाम जो मैंने पहली बार पीतल की टूटी पट्टी पर पढ़ा था, गड्ढे से निकली हुई।
पापा ने पीछे से कहा, "जगदीश यादव के पिता?"
"हाँ," उस्ताद ने कहा। "वही। जो साइकिल के पुर्ज़े और ताले बनाते थे, और जिन्होंने कभी किसी से दाम नहीं माँगा।"
मैं चुप हो गया।
और फिर उस्ताद की उँगली उसी पन्ने पर नीचे की तरफ़ सरकी।
तीन नामों के नीचे, एक लकीर खींची हुई थी। और उस लकीर के नीचे, अलग स्याही में, छोटे अक्षरों में, एक चौथा नाम लिखा था।
मंसूर।
और उसके आगे — "हिस्सा बराबर नहीं। हिस्सा बराबर करने वाला।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
वो उस नाम को देख रहे थे जैसे कोई अपने ही घर की दीवार पर अनजान आदमी की तस्वीर देख रहा हो।
"मंसूर?" मैंने कहा। "वही मंसूर? ताले-चाबी वाला?"
"हाँ," उस्ताद ने कहा।
"उस्ताद, आपने कहा था ताले मंसूर के बनाए हैं। पर आपने ये नहीं कहा था कि वो हमारा चौथा हिस्सेदार है।"
"क्योंकि मुझे खुद नहीं पता था," उन्होंने कहा। "मैंने उसे सिर्फ़ कारीगर समझा था। जो चाबी बनाता था, ताला बनाता था और चाबी के बदले कहानी सुनता था।"
इलाही ने रजिस्टर की तरफ़ झुककर देखा और धीरे से बोले, "ये मेरी लिखाई नहीं है।"
"मेरी भी नहीं," उस्ताद ने कहा।
"तो?" मीरा ने पूछा।
"तो इसे भी किसी ने यहाँ जोड़ा है," उस्ताद ने कहा। "बाद में।"
उन्होंने पन्ने को करीब लाकर देखा और मुझे दिखाया।
"देख, इस नाम के नीचे लकीर की स्याही और ऊपर के नामों की स्याही अलग है। ऊपर वाली भूरी है, पुरानी है, बैठ गई है। और ये नीली है।"
"कितनी नई?" मैंने पूछा।
मीरा ने पास आकर झाँका और बोली, "दो दिन से ज़्यादा पुरानी नहीं।"
मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ।
कोई दो दिन पहले इस बंद बक्से में, दो तालों के पीछे, एक नाम जोड़ गया था।
और उसी वक़्त मेरी जेब में घंटी गरम हुई। गरम, बहुत गरम, और फिर उसने बोला — इस बार बिना लड़खड़ाए, बिना टूटे, पूरी और साफ़ आवाज़ में।
"एक ताला खुला। एक नाम बचा।"
मैंने उसे जेब से निकाला। वो हथेली में रखी थी और उसकी सतह पर पुराने निशान के नीचे एक नई पतली लकीर उभर आई थी।
"एक नाम बचा मतलब?" मैंने पूछा।
घंटी चुप।
"उस्ताद," मैंने कहा, "ये मंसूर का नाम — ये असली है या जोड़ा हुआ?"
"असली," उस्ताद ने कहा। "मंसूर हमारे साथ था। हिसाब रखता था। जोड़ता था। मरम्मत करता था। वो हमारा चौथा हाथ था।"
"तो फिर ये नाम जोड़ने की क्या ज़रूरत थी?"
"क्योंकि," उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ भारी हो गई, "पाठशाला के काग़ज़ों में मंसूर का नाम कभी नहीं था। हम तीन के नाम थे। वो चौथा था, पर काग़ज़ पर नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि उसने कहा था — जो हाथ जोड़ता है, उसका नाम आख़िर में आता है। पहले वो जोड़ता है, फिर नाम।"
मैं कुछ कहने ही वाला था कि गली के मुँह से आवाज़ आई।
चप्पलों की नहीं। जूतों की।
सख़्त, साफ़, और बहुत तेज़ — जैसे कोई पत्थर पर पत्थर मार रहा हो।
सबने मुँह उठाया।
गली के मुँह से एक आदमी आ रहा था। सफ़ेद शर्ट, नीली पैंट, हाथ में काग़ज़ों का बंडल — और वो काग़ज़ों को ऊपर उठाए हुए हिला रहा था, जैसे कोई झंडा लेकर आ रहा हो।
उसके पीछे दो और थे। एक के हाथ में मोटी फाइल थी। दूसरे के हाथ में — मैंने गौर से देखा — स्याही की डिब्बी और एक मोहर।
सफ़ेद शर्ट वाला आदमी चौक के बीच आया, रुका, और इतनी ऊँची आवाज़ में बोला कि गुमटी की केतली की आवाज़ भी उसमें दब गई।
"ये दुकान उस्ताद अली बक्श की नहीं रही!"
शबनम आपा की चिमटी हाथ से छूटकर थाली पर गिरी — टन।
बच्चे खड़े हो गए। भोला भाई जीप के बोनट से हट गए। मीरा ने कैमरा उठा लिया और उसका लाल बत्ती जल गई।
उस्ताद ने धीरे से रजिस्टर बंद किया और उसे सीने से लगाया।
"क्या कहा तुमने?" उन्होंने पूछा, बिलकुल शांत आवाज़ में।
"कहा नहीं, दिखा रहा हूँ," आदमी ने कहा और काग़ज़ आगे बढ़ा दिया।
काग़ज़ ठीक मेरी आँखों के सामने आया।
ऊपर नीला गोल निशान। नीचे तारीख़। और सबसे नीचे, साफ़, मोटी स्याही में एक नाम — चंद्रेश सक्सेना।
"ये अदालत का काग़ज़ नहीं है," मीरा ने तुरंत कहा। "ये दफ़्तार की मुहर है।"
"दफ़्तार की मुहर हो या अदालत की," आदमी ने कहा, "काम एक ही करती है। इस काग़ज़ के मुताबिक़ इस ज़मीन पर दुकान का हक़ खत्म हो चुका है। आज दोपहर बारह बजे तक सामान हट जाए, वरना हम हटाएँगे।"
और फिर उसने अपनी उँगली काग़ज़ पर रखी — ठीक उस जगह, जहाँ मोहर के नीचे एक आधा अक्षर बना था।
वो आधा अक्षर मैंने पहले भी देखा था।
बहुत पहले।
उसी पीली फाइल के पहले पन्ने पर, जिसे शुक्ला बाबू ने छाती से लगाया था।
मैंने इलाही की तरफ़ देखा।
उनका चेहरा पीला पड़ गया था। उनकी आँखें उस काग़ज़ पर टिकी थीं, और उनका हाथ — जो अभी तक उस्ताद का हाथ पकड़े था — छूट गया।
और उनकी वो उँगली, जिसमें उस्ताद की माँ की पीतल की अँगूठी थी, काँपने लगी।
पहले धीरे। फिर तेज़। इतनी तेज़ कि अँगूठी उस उँगली पर खड़ी हो गई और फिर लुढ़ककर चबूतरी के पत्थर पर गिर पड़ी — टिन।
गेंद की तरह लुढ़कती हुई वो रुकी मेरे पैर के पास।
मैंने उसे उठाया। पीतल ठंडा था। बर्फ़ जैसा ठंडा, और उस पर खुदा फूल मेरी हथेली में ऐसे दबा जैसे किसी ने उँगली से मेरा हाथ पकड़ लिया हो।
"इलाही चाचा?" मैंने कहा।
वो नहीं बोले।
उन्होंने काग़ज़ की तरफ़ देखा, फिर उस्ताद की तरफ़, फिर उस आदमी की तरफ़, और फिर बहुत धीरे से, ऐसे जैसे अपने आप से बोल रहे हों —
"ये मुहर मैं जानता हूँ।"
सफ़ेद शर्ट वाला आदमी मुस्कुराया।
"अच्छी बात है। फिर तो सब आसान हो जाएगा।"
"क्यों?" इलाही ने पूछा।
"क्योंकि जो इस मुहर को जानता है," आदमी ने कहा, "वो इसके नीचे का नाम भी जानता होगा।"
और फिर उसने काग़ज़ को पलट दिया।
पीछे, नीले धागे से सिली हुई एक पतली पर्ची चिपकी थी, और उस पर मेरे सामने, रोशनी में, साफ़ पढ़ा जा सकता था —
"दुकान सात। हस्तांतरण। हस्ताक्षरकर्ता — इलाही बक्श।"
चारों बच्चे एक साथ बोले, "क्या?"
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया।
"उस्ताद," मैंने कहा, बिना उनकी तरफ़ देखे, "ये काग़ज़ कह रहा है कि आपकी दुकान इलाही चाचा ने बेची है।"
उस्ताद ने एक शब्द भी नहीं कहा।
इलाही बक्श ने अपना रूमाल मुँह पर रख लिया और फिर वो दो शब्द बोले, जो पूरे चौक में गूँज गए —
"मैंने कब?"
आदमी ने कंधे उठाए।
"तारीख़ लिखी है। देख लीजिए।"
और मैं वहीं खड़ा रह गया, हाथ में उस्ताद की माँ की अँगूठी, जेब में एक खुला बक्सा, एक अनखुली पोटली, और सामने एक ऐसा काग़ज़ जिस पर उस सुबह की सबसे बड़ी झूठ लिखी थी।
मेरी जेब में घंटी ने एक बार हल्का सा टन किया — बिलकुल वैसे, जैसे कोई बूढ़ी औरत सिर हिलाकर कहे — "देखा? मैंने कहा था न।"
और मैंने अपनी कॉपी निकाली, उसमें एक नई लाइन लिखी, और उस लाइन के नीचे सिर्फ़ चार शब्द लिखे —
अब चौथा नाम बोलेगा।
क्योंकि अगर ये दुकान किसी ने बेची थी, तो बेचने वाले का नाम काग़ज़ पर था, और जो नाम काग़ज़ पर है, वो नाम मिट भी सकता है — पर उसका हिसाब नहीं।
और हिसाब, मेरी जान, इस गली में कभी अकेला नहीं चलता।
वो हमेशा किसी के साथ चलता है।
कभी किसी भाई के साथ। कभी किसी बहन के साथ। कभी किसी ऐसे आदमी के साथ जिसने पचास साल पहले अपना नाम आख़िर में लिखने की ज़िद की थी, ताकि पहले उसका काम बोले।
मैंने अँगूठी उस्ताद की तरफ़ बढ़ाई।
उन्होंने उसे देखा, फिर इलाही को देखा, और फिर अपना हाथ आगे किया — बहुत धीरे, जैसे कोई उसे छूने से डर रहा हो।
"उस्ताद," मैंने कहा, "ये अँगूठी आपकी माँ की है। इसे पहनने वाला भी आपके ही खून का है। और जिसने इसे भेजा है, वो भी शायद आपके ही खून का है।"
उन्होंने अँगूठी ली और उसे अपनी हथेली में बंद कर लिया।
"तो अब?" उन्होंने पूछा।
मैंने उस सफ़ेद शर्ट वाले आदमी की तरफ़ देखा, जो अब भी काग़ज़ हिला रहा था, जैसे उसे हवा से भी ज़्यादा ज़रूरत हो किसी चीज़ को हिलाने की।
"अब?" मैंने कहा। "अब हम बारह बजे का इंतज़ार नहीं करेंगे। हम अभी चलेंगे। और जिसने ये काग़ज़ बनाया है, उससे पूछेंगे कि इलाही बक्श का हस्ताक्षर उसने किस रात बनाया था — और उस रात इलाही बक्श कहाँ थे।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
"उस्ताद, वो छोटी लोहे की चाबी जो बक्से में मिली है — वो किसकी है?"
उन्होंने रजिस्टर उठाया, उसके नीचे रखी चाबी उठाई, और उसे रोशनी में देखा।
उनका चेहरा बदला।
"ये," उन्होंने कहा, "ये मंसूर की दुकान की है।"
और मेरी जेब में घंटी ने दो शब्द कहे, जो उस सुबह सबसे भारी थे।
"वो ज़िंदा है।"
॥
सुबह चार बजे की गली ऐसी होती है कि जैसे किसी ने पूरी बस्ती की आवाज़ उतारकर किसी पुराने ताले में बंद कर दी हो। हवा भी नहीं चल रही थी। पीपल के पत्ते इतने धीरे हिल रहे थे कि लगे कोई बूढ़ा नींद में करवट बदल रहा हो। और उस वक़्त, उस्ताद अली बक्श की दुकान के शटर पर, एक भारी लोहे का ताला झूल रहा था।
वो ताला उनका नहीं था।
हम सब वहीं खड़े थे। मैं, उस्ताद, इलाही बक्श, फ़ैज़ और पापा। चबूतरी से उठकर सीधे यहीं आए थे, क्योंकि उस्ताद ने बक्से से चाबी उठाते वक़्त सिर्फ़ एक बात कही थी — "मुझे अपनी दुकान देखनी है। अपनी आँखों से।"
अब वो अपनी आँखों से देख रहे थे, और उनका हाथ जेब में चाबी पर जमा हुआ था, जैसे कोई बच्चा अपनी मिठाई छिपाकर रखता है और डरता है कि कहीं कोई छीन न ले।
उस्ताद ने चाबी निकाली। छोटी, घिसी, पीतल के छल्ले में बँधी। उन्होंने ताले के छेद में डाली। चाबी आधी तक गई, फिर अटक गई — जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीढ़ी पर आधे पैर रखकर रुक जाए और सोचे कि ऊपर जाना है या नहीं।
"नहीं खुला," फ़ैज़ ने धीरे से कहा।
"खुलेगा क्यों?" मैंने कहा। "ताला ही उनका नहीं है।"
उस्ताद ने चाबी निकाल ली, और फिर वो जो किया, वो मैं कभी नहीं भूलूँगा। उन्होंने हाथ बढ़ाया और शटर के ऊपर टँगे उस पुराने लकड़ी के बोर्ड को छुआ, जिस पर बड़े-बड़े घिसे अक्षरों में लिखा था — अली बक्श, दर्ज़ी। पचास साल की धूल, पचास साल की बारिश, और उनका पूरा नाम। वो बोर्ड छूकर वैसे ही खड़े रह गए, जैसे कोई अपने ही घर का दरवाज़ा खटखटाने से पहले सोच रहा हो कि अंदर कौन सो रहा है।
पीछे से पैरों की आवाज़ आई। टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — पाँचों दौड़ते हुए आए, हाँफते हुए।
"उस्ताद!" टिंकू ने कहा। "हमें शबनम आपा ने भेजा। वो कह रही थीं कि गली के मुँह पर एक टेम्पो रुका था और उसमें से कोई भारी चीज़ उतारी गई।"
"भारी चीज़?" मैंने कहा।
"लोहे जैसी आवाज़ थी," सानिया ने कहा। "और टेम्पो का नंबर मैंने याद कर लिया। मेरी कॉपी में लिख भी लिया।"
चिंटू ने ताला देखा और उसका मुँह खुला रह गया। "अंकुश भैया, इसे तोड़ दें? मेरे पास चप्पल है, और चप्पल से…"
"चप्पल से ताला नहीं टूटता, चिंटू," मैंने कहा। "चप्पल से आदमी टूटते हैं, और वो भी तब, जब वो बहुत ज़्यादा बोलने लगे।"
मैं ताले के पास गया। मोटा, काला, ऊपर से तेल की पतली परत चढ़ी हुई। कहीं कोई नाम नहीं, कोई मुहर नहीं। बस एक चिकनी, चुप्पी सी चीज़, जो शटर के हैंडल और बोर्ड के कुंडे दोनों को एक साथ पकड़े हुए थी — यानी जिसने भी लगाया था, उसने सिर्फ़ दुकान नहीं बंद की थी, उसने नाम भी बंद कर दिया था।
मैंने हल्का सा हँसकर कहा, "अरे, नया ताला लगाने वाला भी गलती कर गया।"
टिंकू ने पूछा, "क्या गलती?"
"उसे चाहिए था कि शटर उल्टा लगा दे। तब पूरा मज़ा आता। गली वाले सुबह आकर देखते कि उस्ताद की दुकान तो खुली है, बस अंदर घुसने की जगह नहीं है।"
टिंकू हँसा, पर हँसी आधी में रुक गई। क्योंकि उस्ताद ने उस वक़्त बोर्ड से हाथ नहीं हटाया था।
फ़ैज़ ने ताले से बँधा एक काग़ज़ देखा। पतली जूट की रस्सी से, तीन गाँठ लगाकर, ताले के छल्ले से बाँधा हुआ। उसने खोला, और पढ़ने लगा। वो पढ़ता रहा, और उसकी आवाज़ धीरे-धीरे कम होती गई, जैसे किसी के हाथ से पानी का लोटा फिसल रहा हो।
"पढ़ो, ज़ोर से," इलाही ने कहा।
फ़ैज़ ने गला साफ़ किया।
"नीलामी के कारण दुकान का क़ब्ज़ा नगर निगम को दिया जा रहा है। आज दोपहर बारह बजे तक सामान हटा लें। अन्यथा प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी।"
पूरी गली उस वक़्त चुप थी, और गली चुप हो तो आवाज़ ऐसी लगती है जैसे किसी ने धीरे से कुछ गिरा दिया हो।
उस्ताद ने बोर्ड से हाथ हटाया, फिर बहुत शांत आवाज़ में कहा, "बारह बजे तक सामान हटा लें। और सामान क्या है? एक सिलाई मशीन, एक कुर्सी, और पचास साल की टिक-टिक।"
इलाही ने काग़ज़ अपने हाथ में लिया और उसे उलटकर देखा, पलटकर देखा। "इस पर मेरा नाम कहाँ है? मेरी ज़मीन है तो मेरा नाम होना चाहिए न।"
"चाचा जी," मैंने कहा, "जिस काग़ज़ पर कोई नाम नहीं, उस काग़ज़ का काम ही नाम मिटाना है।"
तभी चप्पलों की आवाज़ आई — तेज़, बेपरवाह, जल्दबाज़। मीरा आ रही थी। उसके हाथ में कैमरा था, कंधे पर वही फटा बैग, और आँखों में वो चमक जो सिर्फ़ तब आती है जब उसे कोई ऐसी चीज़ मिले जिस पर सबकी नज़रें नहीं गईं।
"मुझे बुलाया था?" उसने कहा।
"तू कहाँ से आ रही है?" मैंने पूछा।
"नगर निगम के बाहर से। सुबह पाँच बजे कोई नहीं बैठता, पर मैंने वहाँ के बाहर वाले बोर्ड पर लगा सारा कुछ फोटो में उतार लिया है। और," उसने काग़ज़ मेरे हाथ से लिया, "एक बात बताऊँ?"
"बता।"
उसने काग़ज़ की तह को नाक के पास लाकर सूँघा। एक बार नहीं, दो बार। फिर उसने उसे रोशनी की तरफ़ उठाया और किनारे को नाखून से रगड़ा।
"ये काग़ज़ नगर निगम का नहीं है," उसने कहा।
"कैसे पता?"
"क्योंकि नगर निगम के काग़ज़ में जो स्याही लगती है, उसमें तेज़ गंध होती है, और शीट के किनारे मोटे होते हैं। यहाँ स्याही में हल्की कपूर जैसी महक है और किनारे इतने बराबर कटे हैं जैसे किसी दफ़्तर की मशीन ने काटे हों।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "यही गंध चंद्रेश सक्सेना के दफ़्तार की फाइलों से आती है। मैं वहाँ जाती हूँ, याद है न?"
मैंने काग़ज़ को करीब से देखा। नीचे एक गोल मुहर थी, धुँधली, घिसी हुई।
"और ये मुहर?" मैंने पूछा।
"मुहर असली है," मीरा ने कहा। "पर मुहर असली होना काग़ज़ असली होना नहीं होता। तू किसी भी चीज़ पर असली मुहर लगा सकता है — यहाँ तक कि तेरे अपने हाथ पर भी।"
उस वक़्त पापा आगे आए।
वो अब तक पीछे खड़े थे, हाथ जेब में, आँखें ज़मीन पर। उन्होंने ताले को छुआ — पहले उँगली से, फिर पूरी हथेली से, और फिर उँगलियों को उसके भीतरी किनारे पर फेरा, जैसे कोई अंधा आदमी चीज़ें पहचानता है।
"ये… ये वैसा ही ताला है," उन्होंने कहा। बस इतना कहा, और फिर मुँह फेर लिया।
मैंने देखा कि उनकी आँखें भर आई थीं।
उस्ताद ने बिना कुछ कहे उनका हाथ पकड़ लिया। दोनों बूढ़े आदमी वहीं खड़े रहे — एक जिसकी दुकान बंद हो रही थी, दूसरा जिसने बाईस साल पहले किसी और के काग़ज़ पर अंगूठा लगाया था और तब से खुद को माफ़ नहीं किया था।
मेरी जेब में घंटी ने तीन शब्द कहे।
"दोनों हाथ खाली नहीं।"
मैंने पूछा, "क्या मतलब?"
पर घंटी चुप हो गई। जब वो चुप होती है, तो मुझे लगता है कि वो भी सोच रही है। बूढ़ी औरतें भी ऐसे ही करती हैं — बात कहकर चुप हो जाती हैं और तुम्हें खुद ही समझना पड़ता है।
इलाही ने काग़ज़ फाड़ने के लिए हाथ बढ़ाया।
"मत," मैंने कहा।
"क्यों नहीं? ये झूठ है।"
"झूठ है इसलिए मत फाड़ो। जो झूठ काग़ज़ पर लिखा है, वो काग़ज़ ही सबूत है। फाड़ दिया तो हम भी उन्हीं की तरह हो जाएँगे — जो सबूत मिटाते हैं।"
मैंने काग़ज़ मोड़कर अपनी जेब में रखा, ताला के नीचे से रस्सी खोली और उसे भी जेब में डाला। कोई चीज़ छोड़नी नहीं थी। इस गली में एक टुकड़ा भी छूटे तो किसी न किसी रात आकर वही टुकड़ा तुम्हारे खिलाफ़ बोलने लगता है।
सूरज निकलने लगा था। गली के मुँह पर चाय की गुमटी की पहली लौ जल उठी थी और उसकी गंध आ रही थी। शबनम आपा दौड़ती हुई आईं, हाथ में चिमटी, और उसे देखकर ही चिल्लाईं, "ताला? मेरी गुमटी से दो कदम पर ताला? अंकुश, ये तुम्हारा काम है क्या?"
"आपा," मैंने कहा, "अगर मेरा काम होता तो मैं ताले के साथ एक चिट्ठी भी छोड़ जाता, जिस पर लिखा होता — माफ़ी, चाय बाद में।"
वो हँसीं, फिर ताला देखकर उनकी हँसी भी उसी जगह रुक गई जहाँ टिंकू की रुकी थी।
"लेकिन ये तो नया है," उन्होंने कहा। "नया ताला। मतलब किसी ने रात में खरीदा है। रात में दुकान खुली कहाँ रहती है?"
"कहीं नहीं," मीरा ने कहा। "इसलिए ताला खरीदने वाले के पास या तो दुकान है, या दुकान खरीदने का हौसला है।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
"पापा, आप घर जाइए। माँ अकेली हैं।"
उन्होंने सिर हिलाया। फिर एक कदम चले, फिर रुके, और बिना पलटे बोले, "अंकुश।"
"हाँ?"
"ये ताला… मैंने एक बार देखा है।" और फिर वो चल दिए, बिना और कुछ कहे।
मैं कुछ देर उनके पीछे देखता रहा। उनकी कमीज़ की पीठ पर पसीना था, और वो काँप रहे थे — सुबह की ठंड से नहीं।
मैंने सबको वहीं इकट्ठा किया।
"अब सुनो सब। दुकान का ताला तोड़ना नहीं है। काग़ज़ फाड़ना नहीं है। कोई गुस्सा नहीं करेगा। हम आज वो करेंगे जो कोई नहीं करता — पूछेंगे।"
"किससे?" फ़ैज़ ने कहा।
"उससे जिसने काग़ज़ बनाया है।"
"और अगर उसने जवाब नहीं दिया?" इलाही ने कहा।
"तो हम उसके जवाब का इंतज़ार करेंगे। जवाब भी थक जाते हैं, चाचा जी। देर से आते हैं, और जब आते हैं तो बिना बुलाए आते हैं।"
दोपहर के करीब बारह बजे मैं नए बाज़ार की दूसरी मंज़िल पर पहुँचा।
ये वही इमारत थी जहाँ चंद्रेश सक्सेना का दफ़्तार था। बाहर से देखो तो सीधी-सादी — नीचे जूते की दुकान, ऊपर काँच के दरवाज़े। पर अंदर घुसते ही हवा बदल जाती थी। वहाँ जो हवा थी, उसमें काग़ज़ और स्याही के साथ बहुत महीन सी मिठास थी, जैसे किसी ने कई चीज़ें मीठी ज़ुबान से कहकर खत्म की हों।
मैंने मेज़ पर काग़ज़ रखा।
"चंद्रेश सक्सेना से मिलना है।"
मेज़ पर बैठा आदमी बिना आँख उठाए बोला, "नाम?"
"अंकुश यादव। साइकिल गली। मरम्मत करता हूँ।"
उसने पहली बार ऊपर देखा, और देखते ही उसका ढंग बदल गया — न कड़वा, न मीठा, बस सावधान, जैसे किसी के कहने पर उसने मेरा चेहरा पहले से याद कर रखा हो।
"सर व्यस्त हैं। बैठिए।"
मैं बाहर की लकड़ी की बेंच पर बैठ गया। बेंच ऊपर से चिकनी थी और नीचे से टेढ़ी — ऐसी कि आदमी जितनी देर बैठे, उतना ही असहज होता जाए।
मैंने जेब से कॉपी निकाली और उसमें आज की तारीख़ के नीचे लिखा — "ताला उन्नीस की दुकान जैसा।" फिर लिखा — "पापा ने इससे पहले देखा है। कहाँ?"
कॉपी बंद करते वक़्त मेरी नज़र दूसरी मेज़ पर पड़ी।
वहाँ एक लड़की बैठी थी। उम्र करीब अट्ठाईस-तीस। काले रंग का सादा कुर्ता, गले में कोई ज़ेवर नहीं, बाल पीछे बँधे हुए, और सामने काग़ज़ों के दो ढेर — एक में मोटी फाइलें, दूसरे में कोरी शीटें।
वो काम नहीं कर रही थी। वो एक पुरानी तस्वीर को हाथ में लेकर उलट रही थी, पलट रही थी — जैसे बार-बार देखकर भी कुछ न मिल रहा हो और फिर भी देखना न छोड़ा जाए।
तस्वीर छोटी थी, किनारे से पीली पड़ी हुई। दूर से इतना ही दिख रहा था कि उसमें कोई दुकान थी — छोटी सी, आधा उठा हुआ शटर, और उसके नीचे बैठा कोई आदमी। दुकान की बाईं तरफ़ कुछ टँगा दिख रहा था, ठीक वैसे जैसे हमारी गली में दुकानों पर पुराने बोर्ड टँगे रहते हैं।
मैंने उसे देखना बंद नहीं किया, और वो मेरी तरफ़ नहीं देख रही थी।
तभी उसकी मेज़ पर रखा फ़ोन बजा। उसने एक बार देखा, नहीं उठाया। फिर दूसरी बार बजा, फिर तीसरी बार। तीसरी बार पर उसने उठाया और बोली, "पापा, मैं बात कर रही हूँ।"
फिर वो कुछ देर सुनती रही। उसका चेहरा नहीं बदला, पर उसकी उँगलियाँ उस काग़ज़ के कोने पर दबने लगीं, इतनी ज़ोर से कि किनारा मुड़ गया।
"मैंने साइन नहीं किया है," उसने कहा। "और नहीं करूँगी।"
उसने फ़ोन काट दिया और उसे उलटकर मेज़ पर रख दिया — मुँह नीचे।
तभी बगल वाले केबिन का दरवाज़ा खुला और एक मोटा सा आदमी निकला, जिसके हाथ में काग़ज़ों की फाइल थी। उसने उसकी तरफ़ देखा और सिर से इशारा किया — अंदर चलो, सर बुला रहे हैं।
वो उठी। कुर्सी पीछे सरकी, और मैंने देखा कि उसके हाथ में एक पुरानी कॉपी भी थी, जिसकी जिल्द उखड़ी हुई थी।
वो केबिन की तरफ़ चली। दरवाज़ा पूरा बंद नहीं हुआ — आधा खुला रह गया, और उसके भीतर से आवाज़ आने लगी।
चंद्रेश सक्सेना की आवाज़। मीठी, धीमी, जैसे कोई गरम दूध में मिश्री घोल रहा हो।
"बेटा, तुम इतनी परेशान क्यों होती हो? तुम्हारे पापा का काग़ज़ तो मैंने सँभाल लिया था।"
वो कुछ नहीं बोली, या इतने धीरे बोली कि मैं सुन नहीं पाया।
"देखो," चंद्रेश ने कहा, "जो काग़ज़ सँभाला हुआ है, वो तुम्हें तभी मिलेगा जब सब कुछ साफ़ हो जाएगा। तुम्हारे पापा की कंपनी का हिसाब, मज़दूरों की सूची, सब मेरे पास सुरक्षित है। तुम घर बैठकर आराम करो और अपनी माँ की दवा की तरफ़ ध्यान दो।"
फिर एक लंबी चुप्पी।
और फिर वही मीठी आवाज़, इस बार थोड़ी कम मीठी, "बस एक अंगूठा, बेटा। एक। और सब बात खत्म।"
बेंच के नीचे मेरा हाथ कस गया।
मुझे अचानक याद आया कि मैं तो यहाँ काग़ज़ लेकर आया था — उस्ताद की दुकान का। और अब मैं किसी दूसरे केबिन में चल रही बात सुन रहा था, जो शायद उसी चीज़ का दूसरा सिरा थी।
दरवाज़ा खुला।
वो बाहर निकली। उसके हाथ में वही फाइल थी, काँपती हुई। उसने दरवाज़ा बंद किया, बिना ज़ोर, बहुत धीरे — जैसे करने को कुछ न हो और अंदर कोई सुन रहा हो।
फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।
वही चेहरा, वही आँखें, पर अब उनमें वो चीज़ नहीं थी जो भीतर जाने से पहले थी। अब वहाँ कुछ और था। गुस्सा नहीं, रोना नहीं। कोई चीज़ जो रोने से पहले आती है — जैसे कोई तय कर रहा हो कि अब तोड़ना है या नहीं।
मैं उठ गया।
वो मेरे पास आई। दो कदम रुकी, फिर एक और आगे बढ़ी। उसने मेरी जेब की तरफ़ नहीं देखा, मेरी कॉपी की तरफ़ नहीं देखा। उसने सिर्फ़ मेरी आँखों में देखा।
और फिर उसने इतनी धीमी आवाज़ में कहा कि अगर मैं वहाँ न होता तो बात हवा में ही रह जाती —
"तुम वही साइकिल वाले हो ना… जिसे चंद्रेश सर काला जादूगर कहते हैं?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"मुझे तुमसे एक बात करनी है।"
और उस वक़्त मेरी जेब में घंटी ने धीरे से, बहुत धीरे से एक ही शब्द कहा।
"अब।"
॥
"मुझे तुमसे एक बात करनी है।"
उसने ये इतनी धीमी आवाज़ में कहा कि आसपास की गली की आवाज़ें भी उससे तेज़ लगीं। जैसे कोई बात नहीं, जैसे कोई काग़ज़ माँग रहा हो। पर उसकी उँगलियाँ उस फाइल के किनारे पर इतनी ज़ोर से दबी थीं कि किनारा सफ़ेद पड़ गया था।
मैंने चारों तरफ़ देखा। सीढ़ियों के नीचे जूते की दुकान से रबर और गोंद की बू आ रही थी। ऊपर पुराना पंखा अपनी ही धुन में खड़खड़ा रहा था। कोई सुन नहीं रहा था। पर मैं अब ये भी सीख चुका था कि दीवारों के भी कान होते हैं, और उनमें भी कुछ ज़ुबानें होती हैं जो किसी को दिखती नहीं।
"यहाँ नहीं," मैंने कहा।
वो एक पल रुकी, जैसे सोच रही हो कि मेरे साथ चलना समझदारी है या नहीं। फिर उसने फाइल अपने सीने से लगाई और सिर हिलाया।
"कहाँ?"
"चलो, चाय पिलाता हूँ।"
हम सीढ़ियों से उतरे। नीचे की गली में दोपहर की धूप सीधी गिर रही थी और छतों की टीन चटक रही थी, जैसे कोई दूर से बर्तन बजा रहा हो। एक ठेले पर नींबू और मिर्ची के हार टँगे थे, हवा से हिल रहे थे।
वो मेरे साथ-साथ चल रही थी, पर आधा कदम पीछे। उसकी चप्पलों की आवाज़ सीधी और तेज़ थी। जिस आदमी को कुछ छिपाना होता है, वो धीरे चलता है। जिसे कुछ कहना होता है, वो ऐसे ही चलता है।
"तुम्हारा नाम?" मैंने पूछा।
"शालिनी।"
"पूरा?"
एक पल रुकी। "शालिनी दीक्षित।"
मैंने कुछ नहीं कहा। नाम याद रख लिया। मेरी आदत है — नाम पहले, बात बाद में। नाम से पता चल जाता है कि आदमी खुद को कहाँ रखता है।
गुमटी पीपल के उस पार है, जहाँ से गली दो हिस्सों में बँट जाती है। आगे शबनम आपा का चूल्हा, उसके पीछे बर्तन धोने की जगह और उस जगह के पीछे चार फुट का एक कोना जहाँ पुरानी बेंच पड़ी है। वहाँ बैठकर पूरी गली की आवाज़ आती है, पर वहाँ से किसी को तुम्हारी आवाज़ नहीं आती। मैंने वो कोना इसलिए नहीं चुना था कि मैं बहुत होशियार हूँ। मैंने वो कोना इसलिए चुना था कि वहाँ दीवार से टिककर बैठने पर पीठ को लगता है कि कम से कम एक तरफ़ से तो कोई आ नहीं सकता।
शबनम आपा चूल्हे पर थीं। उन्होंने पलटकर देखा — पहले मुझे, फिर उसे, फिर उसके हाथ में पकड़ी फाइल को। उन्होंने कुछ नहीं पूछा। बस एक स्टूल खींचकर रख दिया और अपने हाथ की लोहे की चिमटी चूल्हे के किनारे टिका दी।
"दो कटोरी," मैंने कहा।
"तीन," उन्होंने कहा, "मेरी भी।"
फिर वो हमारे पीछे आईं, उस पुरानी बेंच पर दो कटोरियाँ रखीं और जाते-जाते मेरी तरफ़ आँख से इशारा किया — लड़की रो रही है।
मैंने देखा। सच में, उसकी आँखें सूखी थीं, पर उसकी नाक के पास वो हल्की लाली थी जो रोने के बाद ही आती है। और वो अपना होंठ बार-बार ज़ुबान से गीला कर रही थी, जैसे मुँह में कोई बात बैठी हो और नीचे न उतर रही हो।
मैंने कटोरी उसकी तरफ़ सरका दी।
"पहले पी लो।"
उसने कटोरी उठाई, फिर रख दी।
"तुम… तुम वही हो ना?" उसने कहा। "जिसे सर काला जादूगर कहते हैं?"
"हाँ।"
"और तुम ये सब करते हो? लोगों के रिश्ते जोड़ते हो, काग़ज़ ठीक करते हो, घंटी बजाते हो?"
"काग़ज़ नहीं ठीक करता," मैंने कहा। "काग़ज़ तो सिर्फ़ लिखता है जो हो चुका है। मैं वो ठीक करता हूँ जो काग़ज़ के पीछे टूट गया है।"
वो एक पल मेरी तरफ़ देखती रही। फिर बोली, बहुत सीधा, बिना घुमाए —
"क्या मैं तुम पर भरोसा कर सकती हूँ?"
मैं रुक गया।
ये सवाल मुझसे अब तक कितने लोगों ने पूछा था। मीरा ने पूछा था, पर उस वक़्त उसकी आवाज़ में मज़ाक था। उस्ताद ने कभी नहीं पूछा, क्योंकि उस्ताद सवाल से ज़्यादा जवाब देखते हैं। टिंकू ने पूछा था, पर उसकी आँखों में डर नहीं, उत्साह था।
इस लड़की की आवाज़ में डर था। साफ़, ठंडा, गिना-तौला डर।
"भरोसा मत कर," मैंने कहा।
उसने कटोरी उठाई हुई थी, वहीं रोक दी।
"क्या?"
"भरोसा मत कर। पहले चाय पी। फिर सोच। चाय गरम होती है तो दिमाग़ ठंडा होता है। जब दिमाग़ ठंडा हो जाए, तब तय करना कि भरोसा करना है या नहीं। मैं तुमसे ये नहीं कहूँगा कि मैं अच्छा आदमी हूँ। मैं खुद अभी तक ये तय नहीं कर पाया, तो तुम क्या करोगी।"
उसने एक घूँट पिया। फिर दूसरा। फिर कटोरी नीचे रखी और उसकी आवाज़ पहले से थोड़ी साफ़ थी।
"मेरे पापा की छोटी सी दुकान थी," उसने कहा।
और फिर वो बोलती चली गई, बिना रुके, जैसे किसी ने अंदर से कोई ढक्कन खोल दिया हो।
"नई बस्ती के मोड़ पर। साइकिल मरम्मत की दुकान। बोर्ड पर लिखा था — मरम्मत और असेंबलिंग का काम। पापा सुबह सात बजे शटर उठाते थे और रात आठ बजे गिराते थे। मेरा बचपन उसी दुकान की गंध में बीता — ग्रीस, रबर और हवा वाले पंप की गंध। जब मैं छोटी थी, मैं उनकी ट्रंक पर बैठकर पुर्ज़े गिनती थी। बोल्ट, नट, बियरिंग की गोलियाँ। पापा कहते थे — बेटा, एक-एक चीज़ गिनना सीख, ज़िंदगी में कभी किसी की गिनती में मत आना।"
उसने चाय का आख़िरी घूँट पिया और कटोरी दूर सरका दी।
"धीरे-धीरे उसी दुकान के पीछे उन्होंने एक छोटा प्रेस खोल लिया। दो पुरानी मशीनें, एक बड़ी कैंची, और दीवार पर लगा एक हाथ से लिखा बोर्ड — शादी के कार्ड, स्कूल की कॉपी, और जो लिखा पढ़ा न हो वो भी छप जाएगा। पापा को पढ़ना बहुत कम आता था। पर वो काग़ज़ को ध्यान से देखते थे। कहते थे — काग़ज़ झूठ नहीं बोलता, बेटा, काग़ज़ पर सिर्फ़ वही छपता है जो कोई लिखता है। इसलिए काग़ज़ पर लिखने वाले से ज़्यादा उसको देखने वाले को जानना चाहिए।"
मैंने कुछ नहीं कहा। मेरे हाथ चाय की कटोरी पर थे और कटोरी धीरे-धीरे ठंडी हो रही थी।
"फिर चंद्रेश आया," उसने कहा, और ये नाम उसने ऐसे लिया जैसे मुँह में कुछ कड़वा रख लिया हो।
"पहली बार वो साइकिल ठीक कराने आया था। एक सफ़ेद साइकिल, बहुत साफ़। गली में कोई उस साइकिल को छू भी नहीं रहा था। पापा ने उसे बैठने को कुर्सी दी, पानी दिया। वो बोला — भाई साहब, आपकी दुकान का काग़ज़ पुराना हो गया है, लाइसेंस की तारीख़ बदलनी है, मैं देख लूँगा। मुफ़्त में। मुझसे कुछ मत लेना।"
वो रुकी। उसने फाइल अपनी गोद में रखी, फिर सीधी होकर बैठी।
"मुफ़्त," उसने कहा। "वो शब्द। वही शब्द। मेरे पापा उस शब्द से पिघल जाते थे। गरीब आदमी को मुफ़्त कहने पर लगता है कि दुनिया में कोई तो है जो कुछ माँग नहीं रहा। पर कोई भी कुछ माँगने के लिए मुफ़्त नहीं करता। बस माँगने का तरीक़ा पहले नहीं दिखाता।"
"क्या माँगा?" मैंने पूछा।
"पहले सिर्फ़ एक फॉर्म था। दुकान के काग़ज़ का। उसने कहा — यहाँ अंगूठा लगा दो, आगे की लाइन मैं भर दूँगा। पापा ने लगा दिया। मैं उस वक़्त बाहरवीं में थी। मुझे याद है, उस शाम पापा खुश थे। उन्होंने मिठाई लाई थी और कहा था — अब हमारी दुकान का काग़ज़ साफ़ है, बेटा।"
वो फिर रुकी। इस बार रुकना लंबा था। उसने कटोरी में बची चाय को देखा और अपनी नाक सूँघी — छोटी सी आवाज़, जो लोग रोने से पहले करते हैं।
"फिर वही हुआ जो उनकी मर्ज़ी थी," उसने कहा। "धीरे-धीरे। एक काग़ज़, फिर दूसरा। किसी पर तारीख़ बदल गई, किसी पर नाम। किसी पर मेरी अम्मी के हस्ताक्षर जैसा कुछ बन गया, जबकि अम्मी ने अंगूठा कभी किसी चीज़ पर नहीं लगाया था — सिर्फ़ रसोई के हिसाब की कॉपी में। दुकान की ज़मीन का काग़ज़ पहले आधा हुआ, फिर एक ही नाम पर आ गया। पापा को पता भी नहीं चला, क्योंकि उन्होंने पढ़ना नहीं कहा, देखना कहा था। और देखने वाले से छुपाने के लिए काग़ज़ पर सिर्फ़ एक पंक्ति काफ़ी होती है, जो सबसे नीचे छोटे अक्षरों में होती है।"
"तुमने कब देखा?" मैंने पूछा।
"जब दुकान से मशीनें उठाई गईं," उसने कहा।
उसकी आवाज़ नहीं बदली, पर उसने अपनी कटोरी दोबारा अपनी तरफ़ खींच ली, जैसे थामने के लिए कुछ चाहिए हो।
"एक दिन सुबह छह बजे आए। दो बने हुएआदमी। पापा ने रोटी खाते-खाते सुना। एक ने काग़ज़ खोला और कहा कि दुकान तो चार महीने पहले ही बिक चुकी है। पापा हँसे। कहा — अरे भाई, मैं बेचता तो मुझे पता होता ना। उस आदमी ने काग़ज़ को उनके सामने रखा और उँगली से एक लाइन पर टिका दी। उस लाइन में पापा का नाम था। पापा ने देखा, फिर उन्होंने अपना चश्मा पोंछा, फिर दोबारा देखा। उन्होंने किसी से कुछ पूछा नहीं। उन्होंने बस रोटी रख दी और दुकान के पीछे वाले कमरे में साइकिल के पुर्ज़ों के बीच बैठ गए।"
मेरे हाथ से कटोरी सरकी और टेबल के किनारे से टकराई। मैंने उसे पकड़ लिया।
"पापा को दिल का दौरा पड़ा," उसने कहा। "उस रात। अस्पताल में तीन दिन। चौथे दिन वो उठे और उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और कहा — बेटा, वकील बनो। पर एक बात मानना। वकील बनकर सीधा रहना, मुड़ना मत। काग़ज़ में जो बड़ा सच लगे, वो सच नहीं होता। सच मेज़ के नीचे रहता है।"
वो रुकी।
"मैं वकील बन गई," उसने कहा। "और दो साल पहले चंद्रेश सक्सेना के दफ़्तार में नौकरी लग गई।"
मेरी तरफ़ से कुछ नहीं निकला, पर मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ।
"तुमने उसके यहाँ नौकरी क्यों ली?" मैंने पूछा, बहुत धीरे से।
"क्योंकि," उसने कहा, और पहली बार उसकी आवाज़ में कुछ तेज़ आया, "जो आदमी मेरे पापा का सब कुछ ले गया, उसकी मेज़ के नीचे मुझे काग़ज़ निकालने हैं। मैं उसी की मेज़ के नीचे बैठना चाहती थी। जो मुँह नहीं देख पाए, वो उसकी कुर्सी को देखकर हिसाब रखा जाता है।"
उसने अपना हाथ मेज़ पर रखा। साफ़ हाथ, लंबी उँगलियाँ, नाखून छोटे कटे हुए। किसी वकील के हाथ जैसे।
"दो साल, अंकुश। दो साल से मैं उसके काग़ज़ों में एक ऐसी लाइन खोज रही हूँ जिसमें मेरे पापा की दुकान का नाम हो। एक भी नहीं मिली। हर काग़ज़ ऊपर से साफ़ है। हर काग़ज़ में लिखा है — सहमति से, नियम के अनुसार, आदर सहित। वो काग़ज़ों से नहीं हारता। वो काग़ज़ों को पहले ही अपनी मुट्ठी में लेकर आया है।"
मैं चुप बैठा रहा।
फिर मैंने अपनी कटोरी में देखा, जिसमें आधी चाय ठंडी होकर सतह पर एक पतली परत बना चुकी थी।
"मेरे पापा ने भी अंगूठा लगाया था," मैंने कहा।
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"बाईस साल पहले," मैंने कहा। "मेरी माँ के इलाज के लिए। एक मेज़ थी जिसके सामने बैठकर उन्होंने अपना अंगूठा स्याही में डुबोया। उस काग़ज़ पर जो लिखा था, वो उन्होंने पढ़ा नहीं था। पढ़ने की हिम्मत नहीं थी। और जिसने काग़ज़ रखा था, उसने भी पढ़कर नहीं सुनाया। सिर्फ़ इतना कहा — यह啊 यहाँ, यहाँ अंगूठा।"
मैंने उसकी आँखों में देखा।
"मुझे ये बात आज बतानी नहीं चाहिए थी," मैंने कहा। "बताना था कल, किसी सभा में, जिसकी तैयारी चल रही है। पर तुमने आज पूछा कि भरोसा करूँ या नहीं, तो मुझे सिर्फ़ यही सूझा कि तुम्हें एक सच बताऊँ, जो मेरे लिए भारी है। भरोसा बात से नहीं बनता। भरोसा इससे बनता है कि सामने वाला अपना भारी हिस्सा पहले रखे।"
वो कुछ देर मुझे देखती रही। फिर उसने कहा, बहुत धीमी आवाज़ में —
"तुम्हारे पापा और मेरे पापा… दोनों ने एक ही मेज़ के सामने सिर झुकाया था।"
"हो सकता है," मैंने कहा। "हो सकता है वो मेज़ आज भी कहीं खड़ी हो। और हम दोनों उस काग़ज़ के दो अलग-अलग कोनों पर बैठे हों, ये सोचकर कि हम अलग-अलग जंग लड़ रहे हैं।"
उसने कुछ नहीं कहा। पर उसका चेहरा पहली बार ढीला पड़ा।
और फिर, अचानक, वो हँसी।
छोटी सी हँसी, जैसे किसी पुरानी बात पर हँसी आ जाए और आधी हँसी गले में ही रह जाए। उसने अपनी आँख के कोने पर उँगली रखी और पोंछा।
"तुम्हारी हिम्मत कैसे पड़ी मुझसे ये सब कहने की?" उसने कहा। "मैं तुम्हें जानती तक नहीं। मैं सिर्फ़ दो महीने से तुम्हारा नाम सुन रही हूँ — जिसके हाथ में घंटी है, जो लोगों से बात करवाता है, जिसे सर काला जादूगर कहते हैं। और तुम बैठे हो, चाय पी रहे हो, और अपने पापा का सबसे भारी सच उगल रहे हो, जैसे ये कोई मज़ाक हो।"
"हिम्मत नहीं," मैंने कहा। "साइकिल की घंटी ने भेजा है।"
"क्या?"
"मेरे पास एक घंटी है," मैंने कहा। "जब उसे लगता है कि अब किसी को कुछ कहना चाहिए, तो वो बजती है। और जब बजती है, तो मैं कुछ न कहूँ — ये मेरे बस में नहीं रहता। तुमने सुना नहीं? जब तुम मेरे पास आई थीं, तब भी उसने कुछ कहा था।"
वो एक पल सोचती रही। फिर उसकी आँखें थोड़ी बड़ी हुईं।
"वो मैंने सुना," उसने कहा। "मुझे लगा मेरे कान में पड़ा हुआ है।"
"नहीं। वो सिर्फ़ मुझे सुनती है।"
उसने अपना माथा माथे पर रखा, फिर हटा दिया। और जब वो फिर बोली, तो उसकी आवाज़ बदल गई थी। वो मज़ाक वाली आवाज़ नहीं थी। वो वकील की आवाज़ थी — धीमी, साफ़, और हर शब्द तौलकर रखने वाली।
"अंकुश," उसने कहा, "मैं तुम्हें एक बात बताती हूँ। दफ़्तार में एक सफ़ेद फाइल है। बड़ी, मोटी। उस पर कोई लिखा नहीं है — न नाम, न तारीख़। सिर्फ़ कोने पर एक नीला गोल निशान है, जो किसी मुहर का है। वो फाइल चंद्रेश सर कभी अपनी मेज़ पर नहीं छोड़ते। कभी नहीं। दिन भर में जब भी वो बाहर जाते हैं, वो उसे अपने साथ ले जाते हैं, या मेज़ के नीचे दराज़ में रखकर उसका ताला अपनी जेब में ले जाते हैं।"
मैंने उसकी तरफ़ सीधा देखा।
"कल," शालिनी ने कहा, "उन्हें शाम चार बजे बाहर जाना है। कलेक्टर के दफ़्तार में उनका काम है। वो कम से कम दो घंटे लेंगे। जब वो निकलते हैं, तो दरवाज़ा खुला छोड़ जाते हैं क्योंकि सफ़ाई वाली अंदर आती है, चपरासी चाय रखकर जाता है, और मुझे उनका कुछ काम वहीं रहता है। पर वो फाइल… वो फाइल तब भी साथ होती है। हर बार।"
"हर बार नहीं होगी," मैंने कहा।
"कैसे पता?"
"क्योंकि आदमी का कोई एक दिन ऐसा आता है जब वो भूल जाता है," मैंने कहा। "और वो दिन वो ही होता है जिस दिन उसे लगता है कि सब कुछ उसके हाथ में है।"
वो कुछ नहीं बोली। फिर उसने अपनी फाइल उठाई और उसे अपने सीने से लगाया।
"मुझे जाना होगा," उसने कहा। "इतनी देर में वो दो बार फोन कर चुके होंगे।"
वो उठी। मैं भी उठा। मैंने चाहा कि कुछ कहूँ — कुछ ऐसा जो उसकी हिम्मत बाँध सके, या कम से कम ये बता दे कि मैं समझ गया कि वो क्या कह रही है। पर तब तक मेरी जेब में घंटी गरम हो चुकी थी।
शबनम आपा चूल्हे के पास खड़ी थीं, चिमटी हाथ में। उन्होंने हमारी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा। पर जब शालिनी गुमटी के कोने से बाहर निकलने लगी, तब उन्होंने कहा —
"बेटा।"
शालिनी रुकी।
"कटोरी छोड़ गई थी," आपा ने कहा और उसे उठाकर कपड़े से पोंछने लगीं। मुझे पता था कि उन्होंने ये बात सिर्फ़ इसलिए कही ताकि लड़की एक पल रुके और उसका चेहरा बाहर की धूप में जाने से पहले थोड़ा सँभल जाए।
शालिनी ने आपा की तरफ़ देखा और सिर हिलाया। फिर वो गली में निकल गई।
मैं उसके पीछे-पीछे गया, दो कदम पीछे।
धूप अब ढल रही थी। पीपल की छाया लंबी होकर गली के बीचोंबीच आ रही थी, और उस छाया में एक छोटा सा हिस्सा बचा था जहाँ बच्चे पतंग उड़ा रहे थे।
शालिनी गली के मोड़ तक पहुँची। फिर वो रुकी।
उसने पलटकर देखा। उसने अपनी फाइल को दोनों हाथों से पकड़ा और फिर उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे सुनने के लिए एक कदम आगे जाना पड़ा।
"अगर…" उसने कहा, और रुक गई।
"अगर?"
"अगर उस फाइल की एक कॉपी मिल जाए," उसने कहा, "तो चंद्रेश सर के सारे काग़ज़ एक रात में उलट जाएँगे।"
मैं कुछ नहीं बोला।
"मैं जानती हूँ कि उस फाइल में क्या है," उसने कहा। "मैंने उसे एक बार आधा खुला देखा है। उसमें नाम हैं, तारीख़ें हैं, और हर नाम के आगे एक रकम है, जो किसी को नहीं दी गई। पर…"
वो रुकी। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
"पर?" मैंने कहा।
"पर तब मेरी नौकरी और मेरा नाम, दोनों चले जाएँगे।"
मैं उसकी आँखों में देखता रहा।
वो एक पल और खड़ी रही, जैसे कुछ और कहना चाहती हो। फिर वो मुड़ी और गली के मोड़ पर मुड़कर दफ़्तार की तरफ़ चली गई।
मेरे हाथ से घंटी निकली और मेरी हथेली पर बैठ गई।
उसने बहुत धीरे से, बहुत ही धीरे से, एक ही शब्द कहा।
"दो।"
॥
रात भर घंटी ने एक शब्द भी नहीं कहा। मैंने उसे तीन बार उठाया, तीन बार कान के पास ले जाकर हिलाया, और तीनों बार वो सिर्फ़ गुनगुनी रही, जैसे कोई बूढ़ा आदमी आँख बंद किए बैठा हो और जानता हो कि सामने वाला अब भी सवाल पूछेगा।
"दो।"
बस। दो। और उसके बाद पूरी रात चुप्पी।
मैं छत पर बैठा रहा। गली में देर रात तक एक कुत्ता भौंकता रहा, फिर बंद हो गया। पीपल की पत्तियाँ बिना हवा के भी हिलती रहीं, और मैं सोचता रहा कि "दो" का मतलब क्या है। दो सच? दो काग़ज़? दो आदमी? या वो दो जो अब तक हिसाब में नहीं जुड़े — मेरा और उसका?
सुबह चार बजे माँ ने खाँसा। मैं नीचे गया। काजल उनके पास बैठी हुई थी और उसकी आँखें सूजी थीं। माँ ने मेरा हाथ पकड़कर कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ गले में ही रह गई। सिर्फ़ होंठ हिले — मत खोल।
"नहीं खोलूँगा, माँ," मैंने कहा। "आज नहीं।"
काजल ने मुझे बाहर तक छोड़ा। दरवाज़े पर वो रुकी और बोली, "भैया, वो तीन बार कह चुकी हैं। नींद में भी।"
"क्या?"
"मत खोल। और एक बात — वो कह रही थीं कि वो कुआँ नहीं है।"
मैं सीढ़ियों पर खड़ा रह गया। नीचे का पिछला दरवाज़ा, जो पाँच साल से बंद है, आज सुबह भी बंद ही था, पर उसकी कुंडी पर सुबह की ओस जमी हुई थी और उस पर उँगली का कोई निशान नहीं था। जो बंद है, वो बंद है। जो अंदर है, वो अंदर है।
मैं दुकान पहुँचा तो सूरज निकल चुका था। शटर उठाया, बाल्टी से सामने पानी डाला, और औज़ारों का ट्रंक खोलकर बैठ गया। दिन का पहला काम हमेशा यही होता है — ट्रंक की सफ़ाई। पुराने पेंच, मुड़ी कीलें, आधी घिसी रिंचें, और वो चीज़ें जिनका कोई नाम नहीं होता पर जिनके बिना एक भी साइकिल ठीक नहीं होती।
तभी गुमटी से चाय की गंध आई, और उसके पीछे-पीछे एक जानी-पहचानी आवाज़ आई।
"उस्ताद।"
मैंने सिर उठाया। शालिनी खड़ी थी। हाथ में एक भूरा लिफ़ाफ़ा था, मोटा, जिसका कोना मुड़ा हुआ था। उसकी आँखों के नीचे काली लकीरें थीं, जैसे रात भर सोई ही न हो। और वो हाथ…
हाथ काँप रहे थे। सच में काँप रहे थे, ऐसे जैसे कोई बहुत भारी चीज़ उठाकर रखी हो और अब उसका वज़न उठाने वाले से कह रहा हो — मैं तुम्हारी नहीं हूँ।
मैंने कुछ नहीं पूछा। न ये पूछा कि ये क्या है, न ये कि तुमने ये कैसे लिया, न ये कि तुम ठीक हो या नहीं। मैंने सिर्फ़ अपने सामने रखा चाय का कटोरा उठाया और उसकी तरफ़ सरका दिया, और फिर अपने लिए दूसरा लिया।
वो बैठी। बिना कहे बैठी, और दोनों हाथों से कटोरा पकड़ लिया, जैसे ठंड लगी हो।
"चाय में चीनी कम है," मैंने कहा।
"ठीक है।" उसकी आवाज़ रेत जैसी थी।
"नहीं है ठीक।" मैंने उठकर गुमटी से चीनी का डिब्बा लिया और उसके कटोरे में एक चम्मच डाल दिया। "पहले पी लो। फिर बताओ।"
उसने एक घूँट लिया। दूसरा घूँट लिया, और फिर वो अचानक रो पड़ी — बिना आवाज़, बिना किसी नाटक के, जैसे किसी का गला ही भर आया हो। शबनम आपा चूल्हे के पास से कुछ नहीं बोलीं, सिर्फ़ पीछे से एक साफ़ रुमाल लाकर मेज़ पर रखकर चली गईं।
"मैंने कभी ऐसा नहीं किया," शालिनी ने कहा। "मैं कभी किसी की मेज़ नहीं खोली। मैं वकील हूँ, मैं जानती हूँ कि इसका मतलब क्या होता है।"
"तुमने मेज़ नहीं खोली," मैंने कहा। "तुमने वो उठाया जो गलती से खुला रह गया। फ़र्क़ है दोनों में।"
"फ़र्क़ कानून में नहीं होता।"
"कानून में नहीं होता," मैंने कहा। "आदमी में होता है।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने लिफ़ाफ़ा आगे सरका दिया, ऐसे जैसे कोई ज़हर का प्याला सरका रहा हो।
"मैंने रात दो बजे कॉपी की," उसने कहा। "सारे सात पन्ने। फिर मैंने उसे वापस उसी जगह रख दिया। सुबह वो मिल गई और उसे कुछ पता नहीं चला।"
मैंने लिफ़ाफ़े को उठाया। हल्का था, पर हाथ में भारी लगा।
"यहाँ नहीं," मैंने कहा। "उस्ताद की दुकान के पीछे। वहाँ दीवार है, छत है, और वहाँ जो बोला जाता है, वो बाहर नहीं जाता।"
हम पीछे गए। उस्ताद पहले से बैठे थे, मशीन के पास, चश्मा कान पर, और उनके सामने मेज़ पर पाठशाला का पीला रजिस्टर खुला रखा था। इलाही उनके पास बैठे थे — कमर सीधी नहीं कर पाते थे, पर आज वो सीधे बैठे थे। फ़ैज़ कोने में खड़ा था। टिंकू दरवाज़े पर बैठा था, हाथ में ग्रीस लगा पेंच पकड़े, और मीरा कैमरा सीने से लगाए, मुँह पर उँगली रखे हुए थी — मतलब माइक बंद है, बोलो।
"यह लड़की है?" उस्ताद ने पूछा। मैंने सिर हिलाया।
"तो बैठो, बेटी," उस्ताद ने कहा और अपनी कुर्सी खिसका दी। "जो लायी हो, मेज़ पर रखो। और सबसे पहले यह बताओ — तुम अपना नाम इस काग़ज़ में लिखवाना चाहती हो या नहीं?"
शालिनी ने उनकी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में कुछ बदला, जैसे किसी ने पहली बार उससे वो सवाल पूछा हो जो कोई नहीं पूछता।
"नहीं," उसने कहा। "मैं सिर्फ़ सच चाहती हूँ। बस।"
"तो ठीक है," उस्ताद ने कहा। "सच किसी का नाम नहीं माँगता।"
लिफ़ाफ़ा खुला। सफ़ेद काग़ज़ निकले — सात पन्ने, दोनों तरफ़ टाइप किए हुए, कुछ पर हाथ की लिखाई, कुछ पर सिर्फ़ नंबर और रकम। मैंने पहला पन्ना उठाया। ऊपर कोई नाम नहीं, कोई तारीख़ नहीं, बस एक फीका नीला गोल निशान, जो मुहर जैसा था पर मुहर नहीं था।
"ये फाइल बिना नाम की है," मीरा ने कहा। "इसलिए कोई इसे कभी साबित नहीं कर पाया। इसमें किसी का नाम नहीं, तारीख़ नहीं, ऊपर सिर्फ़ एक निशान। ये काग़ज़ नहीं, ये साया है।"
"और साये का कोई मुक़दमा नहीं होता," शालिनी ने कहा।
मैं पन्ने पलट रहा था। तीन, चार, पाँच… छठे पन्ने पर शालिनी के पापा की दुकान का नंबर था, और उसके आगे एक रकम जो किसी को नहीं दी गई थी। सातवें पन्ने पर जगदीश यादव — मेरे दादा का नाम — और उसके आगे सिर्फ़ दो शब्द लिखे थे, जो मैं दो बार पढ़ गया।
दुकान सात।
और फिर मैंने सातवें पन्ने को उलटा किया, और मेरा हाथ रुक गया।
क्योंकि सातवें पन्ने के पीछे, जो काग़ज़ चिपका था, वो सफ़ेद था ही नहीं। वो पीला था। पुराना पीला — वैसा पीला जैसा गुड़ की डली का काग़ज़ होता है जो दस साल अलमारी में पड़ा रहे। और वो चिपका हुआ नहीं था। वो जान-बूझकर, बड़े करीने से, बीच में रखा गया था, दोनों किनारों से बराबर छोड़कर।
जैसे कोई चुपके से आया हो और उसे वहाँ रख गया हो।
"रुको," मैंने कहा। "रुको, रुको।"
मैंने उसे उठाया। उसकी स्याही नीली थी, बहुत पुरानी, जो अब धुँधली पड़ चुकी थी, पर अक्षर साफ़ थे — वैसे साफ़ जैसे हाथ से लिखी कोई मिन्नत हो।
मैंने पढ़ा।
यह ज़मीन कभी बेची नहीं जाएगी। यह ज़मीन कभी गिरवी नहीं रखी जाएगी। इस ज़मीन पर जो अस्पताल है, वो हमेशा रहेगा, और उसका एक कमरा हमेशा उनके लिए मुफ़्त रहेगा जो दवा का पैसा नहीं दे सकते।
नीचे कोई तारीख़ नहीं थी। सिर्फ़ तीन लकीरें थीं — तीन हस्ताक्षर। पहला बहुत बड़ा और मोटा, दूसरा छोटा और झुका हुआ, और तीसरा…
तीसरा उस्ताद के हाथ से लिया हुआ चश्मा देख रहा था।
मैंने तीसरा हस्ताक्षर पढ़ा और मेरे हाथ से काग़ज़ नहीं गिरा, क्योंकि टिंकू ने नीचे से उसे थाम लिया और हल्का सा धक्का देकर मेरी हथेली पर सीधा कर दिया।
शिवनारायण यादव।
मेरे परदादा। मेरे दादा के पिता। वो आदमी जिसका नाम मैंने पहली बार उस दिन सुना था जिस दिन गड्ढे से पीतल की टूटी पट्टी निकली थी। और उसके नीचे, दो लकीरों और एक बिंदु वाला वही निशान था, जो आज मेरी घंटी के छल्ले पर है, चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर है, और उस्ताद की दुकान के फ़र्श के नीचे मिले लोहे के ढक्कन पर है।
और दूसरा हस्ताक्षर?
मैंने देखा। बूढ़ी स्याही, झुकी लकीरें, और नीचे छोटे अक्षरों में एक नाम।
निहाल इसरानी।
कमरे में अचानक इतनी चुप्पी आई कि मुझे उस्ताद की मशीन की टिक-टिक भी सुनाई देनी बंद हो गई, हालाँकि वो चल ही नहीं रही थी।
उस्ताद का हाथ काँपा। उन्होंने काग़ज़ छुआ और फिर हाथ खींच लिया, जैसे किसी गरम तवे को छू लिया हो।
"मैंने ये पन्ना देखा है," इलाही ने कहा। उनकी आवाज़ जैसे किसी कुएँ के नीचे से आई। "पचास साल पहले। इसी दुकान में। मैं चौदह साल का था और मुझे लगा था कि ये कोई मज़ाक है। भाई ने कहा था — इलाही, इसे देख। मैंने पढ़ा और मैंने कहा, ये काग़ज़ किसी काम का नहीं, ये तो सिर्फ़ दिल की बात है। और भाई ने कहा — हाँ, यही सबसे मज़बूत काग़ज़ है।"
उस्ताद ने आँखें बंद कर लीं।
"मैंने इसे अपनी आँखों से देखा," इलाही ने दोहराया, "और फिर मैंने इसे पचास साल भुला दिया।"
"ये डॉक्टर इसरानी का हस्ताक्षर है," मीरा ने धीरे से कहा। "इसका मतलब… ये उन्होंने खुद लिखा है।"
"ये उन्होंने खुद लिखा है," इलाही ने कहा। "और इसे देखकर वो रोए थे। याद है मुझे। वो जवान थे, सफ़ेद कोट बहुत बड़ा था, और वो बोले थे — मेरे पास देने को पैसा नहीं है, देने को सिर्फ़ अपना नाम है। तो नाम ही दे दो।"
मैंने काग़ज़ को मेज़ पर रखा और उसे दोनों हाथों से सीधा किया।
तभी मेरी जेब में घंटी गरम हुई। सच में गरम — जैसे किसी ने उसे धूप में रख दिया हो। मैंने उसे निकाला और वो मेरी हथेली पर आकर बैठ गई, और आज उसकी आवाज़ में वो रूखापन नहीं था जो आम दिन होता है। आज वो धीमी थी, जैसे कोई बहुत दूर से बोल रहा हो, बहुत थककर।
"ये पन्ना वो नहीं है," घंटी ने कहा।
सब रुक गए।
"ये पन्ना वो नहीं है जो दुकान बचाएगा।"
इलाही ने साँस रोक ली।
"ये पन्ना वो है जो अस्पताल बचाएगा।"
और फिर, जैसे किसी बूढ़े ने आख़िरी ताक़त लगाकर एक बात कही हो और फिर आराम से बैठ गया हो, घंटी चुप हो गई।
मैं कुछ नहीं बोला। मेरे हाथ में घंटी थी, मेज़ पर पीला पन्ना था, और मेरे सामने उस्ताद बैठे थे जिनकी आँखों से आँसू उनके चश्मे के पीछे जमा थे और बहने का रास्ता नहीं ढूँढ पा रहे थे।
"ये…" टिंकू ने धीरे से कहा, और फिर रुक गया, क्योंकि उसे भी लगा कि इस वक़्त आवाज़ उठाना गलत है।
"बोल," मैंने कहा।
"ये सच है?"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर ये सच है," टिंकू ने कहा, "तो अस्पताल को कोई बेच ही नहीं सकता। हमें किसी काग़ज़ की ज़रूरत नहीं। हमें बस ये दिखाना है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। तेरह साल का लड़का, घुटने पर पट्टी, हाथ में ग्रीस, और ज़ुबान ऐसी कि कभी-कभी मुझे लगता है ये मुझसे ज़्यादा समझता है।
"हाँ," मैंने कहा। "हमें ये दिखाना है।"
तभी मेरे अंदर कुछ हुआ — मैं झूठ नहीं बोलूँगा, अब तक कई बार ये हुआ है, पर आज पहली बार महसूस हुआ कि पैरों के नीचे की ज़मीन एक इंच ऊपर उठ गई हो। जैसे कोई सीढ़ी का पत्थर अपनी जगह पर आ गया हो। मेरे हाथ की उँगलियाँ झुनझुनी से भर गईं, और सामने हवा में कुछ ऐसा दिखा जो किसी और को नहीं दिखता — बहुत तेज़ चलते हुए छोटे-छोटे अक्षर, जो पढ़े नहीं जाते, बस महसूस होते हैं।
अंक आ रहे थे।
"उस्ताद," मैंने कहा। "आपकी मशीन की दराज़ में वो पुराना लाल किनारे वाला रजिस्टर है न?"
"है।"
"मुझे उसमें लिखना है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर उठकर दराज़ खोली, और रजिस्टर निकालकर मेरे सामने रख दिया। पन्ना पलटा, कलम उठाई, और मैंने लिखा —
आज का जोड़। अस्पताल की ज़मीन। तीन हस्ताक्षर वाला पन्ना। पचास साल पुराना, आज मिला।
मैंने लिखते हुए महसूस किया कि जो चीज़ मुझे अब तक सिर्फ़ बटोरती दिखती थी, आज वो मुझे कुछ लौटा रही है। और लौटाने का तरीक़ा अजीब है — किसी ने मेरी थकान के बदले मुझमें साँस रख दी हो।
"कितने?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ में वो ठंडापन नहीं था जो पत्रकारों में होता है। इसमें डर था।
"बहुत," मैंने कहा। "इससे पहले इतने कभी नहीं आए।"
"कितने बहुत?"
मैंने रजिस्टर बंद किया और उसे उस्ताद को लौटा दिया।
"इतने कि अगर मैं चाहूँ," मैंने कहा, "तो आज रात हम उस फाइल के सारे नाम गली की दीवारों पर लिख सकते हैं।"
मीरा ने कुछ नहीं कहा। वो उठी, मेज़ के चारों तरफ़ घूमी, और फिर रुककर मेरे सामने खड़ी हो गई।
"फिर लिखो," उसने कहा।
"क्या?"
"आज शाम," उसने कहा। "मेरे चैनल पर। ये पन्ना, ये तीन हस्ताक्षर, और तुम्हारा चेहरा। मैं इसे आज शाम सीधा दिखाऊँगी।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। वो वही मीरा थी जिसने मेले में मुझे ठग समझकर माइक थमाया था। पर आज उसकी आवाज़ में वो जल्दबाज़ी नहीं थी, वो सिर्फ़ चीज़ें जल्दी करने की आदत थी जो अब काम में बदल गई थी।
"तुम्हारा चैनल कितने लोग देखते हैं?" मैंने पूछा।
"जितने देखते हैं, उनमें से आधे को यक़ीन नहीं होगा," उसने कहा। "पर बाक़ी आधे अपनी आँखों से देखेंगे। और आज के बाद वो किसी को ये नहीं कहने देंगे कि ये ज़मीन किसी की निजी जागीर है।"
"तो करो," मैंने कहा।
टिंकू उछल पड़ा। सच में उछला, और उसका पैर मेज़ की टाँग से टकराया जिससे पूरा पीला पन्ना एक इंच खिसक गया, और मैंने झपटकर उसे थाम लिया।
"आज हम जीत गए!" टिंकू ने कहा। "उस्ताद, आज हम जीत गए न?"
उसकी आवाज़ में वो ख़ुशी थी जो सिर्फ़ तेरह साल की उम्र में आती है — बिना हिसाब, बिना डर, बिना ये सोचे कि जीत के बाद क्या आता है।
"जीत?" शबनम आपा ने दरवाज़े से कहा, हाथ में चाय की केतली। "कौन जीता?"
"हम," टिंकू ने कहा। "अस्पताल बच गया।"
आपा ने केतली मेज़ पर रखी और मेरी तरफ़ देखा। उनकी नज़र में वो बात थी जो आपा की नज़र में हमेशा होती है — बेटा, जल्दी मत कर।
और तभी, ठीक उसी पल, मैंने शालिनी की तरफ़ देखा।
वो नहीं हँस रही थी।
पीछे दरवाज़े के पास खड़ी थी, और उसका चेहरा ऐसा पीला पड़ गया था जैसे किसी ने उसका खून निकाल लिया हो। उसने अपना मोबाइल जेब से निकाला। स्क्रीन पर कुछ था जो उसे देखते ही उसके होंठ सूख गए। उसने उँगली स्क्रीन पर रखी और फिर हटा ली, जैसे किसी चीज़ को छूने से वो सच हो जाएगी।
"शालिनी?" मैंने कहा।
उसने जवाब नहीं दिया।
"शालिनी।"
उसने मोबाइल मेरी तरफ़ बढ़ाया। फिर घुमाया, क्योंकि स्क्रीन मेरी तरफ़ उलटी थी। और जब स्क्रीन मेरी तरफ़ आई, तब मैंने देखा कि उस पर एक सूचना खुली हुई थी — किसी खबर वाले ऐप की सूचना, बड़े अक्षरों में, और नीचे एक तस्वीर।
तस्वीर में रणवीर था। सफ़ेद कुर्ता, हाथ जोड़े, मुस्कान।
और उसके बगल में चंद्रेश सक्सेना, सफ़ेद कुर्ता, एक हाथ में फाइल।
"क्या है ये?" मैंने कहा।
शालिनी ने अपना गला साफ़ किया। उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी ने उसका गला दबा दिया हो।
"प्रेस वार्ता," उसने कहा।
"कब?"
"एक घंटे बाद।"
मैंने स्क्रीन पर नज़र दौड़ाई। ऊपर टाइटल था, मोटे अक्षरों में, और वो टाइटल मेरे सीने में ऐसे उतरा जैसे कोई ठंडी सुई उतरती है।
अंकुश यादव और उनका काला जादू।
मैंने स्क्रीन से नज़र नहीं हटाई। नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था कि भारद्वाज ग्रुप और उनके कानूनी सलाहकार आज दोपहर ग्यारह बजे पत्रकारों से बात करेंगे, और वो उन सब सवालों का जवाब देंगे जो पिछले कुछ दिनों से मोहल्ले में उठ रहे हैं।
"ग्यारह बजे," मीरा ने कहा। उसने अपना मोबाइल निकाला और स्क्रीन देखी। "मेरे पास भी आया है। सबको आया है।"
"एक घंटे बाद," शालिनी ने कहा। "और मैं अभी तक उस दफ़्तार में काम करती हूँ।"
कमरे में फिर चुप्पी आई। इस बार वो चुप्पी ख़ुशी वाली नहीं थी। ये वो चुप्पी थी जो किसी के पैर के नीचे से ज़मीन खिसकने पर आती है।
मैंने पीला पन्ना उठाया। उसे दोनों हाथों से पकड़ा। उस पर तीन हस्ताक्षर थे — एक मेरे परदादा का, एक डॉक्टर इसरानी का, और एक तीसरे का जिसे मैं अभी नहीं पढ़ पाया था क्योंकि स्याही बहुत धुँधली थी और मेरा ध्यान भटक गया था।
"मीरा," मैंने कहा।
"हाँ।"
"तुमने कहा था आज शाम।"
"हाँ।"
"तो अब शाम नहीं," मैंने कहा। "अब ग्यारह बजे। उसी वक़्त। जिस वक़्त वो बोलेंगे, हम भी बोलेंगे।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पहले डर था, फिर कुछ और आया — वो चीज़ जो पत्रकार के अंदर होती है जब उसे पता चल जाए कि आज खबर उसके हाथ में है।
"ठीक है," उसने कहा। "पर मेरे पास एक कैमरा है, एक माइक है, और एक फटा बैग है।"
"तो काफ़ी है," मैंने कहा।
"और तुम्हारे पास?"
मैंने घंटी जेब में रखी और पीला पन्ना सावधानी से मोड़कर कमीज़ की अंदरूनी जेब में रखा।
"मेरे पास गली है," मैंने कहा।
और जैसे ही मैंने ये कहा, मेरी जेब में वो पुराना ताला — जो कल से कई बार बर्फ़ जैसा ठंडा और कई बार गरम हो चुका था — एक पल के लिए गरम हुआ। सिर्फ़ एक पल। फिर ठंडा हो गया।
उस्ताद ने उठकर मशीन पर से कपड़ा हटाया। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"बेटा," उन्होंने कहा। "अगर वो काला जादू कहेंगे, तो जवाब क्या देना है?"
मैंने सोचा। फिर मैंने कहा —
"उस्ताद, हम कहेंगे — जादू वो होता है जो बिना मेहनत के हो जाए। हमने कुछ बिना मेहनत के नहीं किया।"
उन्होंने सिर हिलाया। और फिर उन्होंने अपनी पचास साल पुरानी सिलाई मशीन का चक्का एक बार घुमाया, बिना धागा डाले, बिना कुछ सिले। सिर्फ़ चक्का घुमाया। और वो मशीन — जिसने आज सुबह तक तीन दिन से काम नहीं किया था — एक टाँका जितनी आवाज़ करके चुप हो गई।
जैसे किसी ने हाँ कह दी हो।
॥
उस्ताद की मशीन ने एक टाँके जितनी आवाज़ की और चुप हो गई।
और उसके बाद जो चुप्पी आई, वो मशीन की नहीं थी। वो गली की थी।
मैंने मुड़कर देखा। फ़ैज़ अपने दादा के कंधे पर हाथ रखे खड़ा था। इलाही भाई की आँखें भरी हुई थीं, पर वो रो नहीं रहे थे। उस्ताद अपनी मशीन के चक्के पर हाथ रखे ऐसे खड़े थे जैसे कोई बूढ़ा अपने बेटे का हाथ पकड़कर खड़ा हो।
टिंकू ने मेरी कमीज़ खींची।
"उस्ताद," उसने धीरे से कहा। "दस बजकर इकतालीस हो गए।"
मैंने जेब से घंटी निकाली। वो चुप थी। पिछले कुछ दिनों से वो ज़्यादा बोलती नहीं, कभी एक शब्द कहती, कभी दो, और फिर चुप। जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीढ़ी-सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते साँस लेने के लिए रुक जाए।
"उन्नीस मिनट," मैंने कहा। "चलो।"
उस्ताद ने मशीन पर कपड़ा डाला। फिर मेरी तरफ़ देखा।
"तू घर जा," उन्होंने कहा। "माँ के पास बैठ। वो अकेली नहीं सुननी चाहिए।"
मैंने सिर हिलाया। और मैं निकल पड़ा।
उस्ताद की दुकान से हमारे घर तक चलने में चार मिनट लगते हैं। सीधी गली, पीपल, पत्थर की चबूतरी, नाली का पुल। चार मिनट।
उस दिन मुझे वो चार मिनट ज़िंदगी में सबसे लंबे लगे।
क्योंकि उन चार मिनट में मैंने अपनी गली को ऐसे देखा जैसे पहली बार देख रहा हूँ। हर घर का दरवाज़ा खुला था। हर दरवाज़े के भीतर एक ही नीली रोशनी काँप रही थी। एक ही आवाज़ आ रही थी। एक ही सफ़ेद कुर्ता हर स्क्रीन पर हिल रहा था।
भोला भाई की दुकान का शटर आधा उठा था और उन्होंने अपनी छोटी टीवी स्टूल पर रख दी थी। चार आदमी वहाँ खड़े थे। कोई चाय नहीं पी रहा था। कोई बात नहीं कर रहा था।
शबनम आपा अपनी गुमटी के दरवाज़े पर खड़ी थीं, हाथ में केतली थी, और केतली से भाप निकल रही थी, पर वो डाल नहीं रही थीं। उनकी गुमटी में एक छोटी टीवी है, मैं जानता हूँ। वो भी उसी चैनल पर थी।
मैं रुका नहीं। पर मेरे अंदर एक बात ठंडी होकर बैठ गई।
ये आदमी गली में आकर लोगों को डराता नहीं। ये गली में आकर हमारे घरों में घुसता है, हमारी टीवी के अंदर बैठ जाता है, हमारी चाय की भाप के साथ बैठ जाता है।
दरवाज़े पर माँ की आवाज़ आई।
"कौन?"
"मैं हूँ, माँ।"
अंदर जाते ही मुझे सब समझ आ गया। काजल ने टीवी निकालकर माँ के पलंग के सामने उसी पुराने लकड़ी के स्टूल पर रख दी थी, जिस पर माँ हिसाब की कॉपी रखती हैं। स्क्रीन पर रंग आ रहे थे और माँ पलंग पर आधी बैठी थीं। उनके बाल बँधे हुए थे। हाथ में वो स्टील का गिलास था जिसमें पानी है और जिसे वो कभी खत्म नहीं होने देतीं।
पापा कोने में बैठे थे। उनकी गोद में भूरी फाइल बंद पड़ी थी। वो स्क्रीन नहीं देख रहे थे। वो अपने जूतों के अगले हिस्से को देख रहे थे।
और मीरा — मीरा हमारे घर में थी। कैमरा उसके बैग में बंद था, और वो घुटनों के बल पलंग के पास बैठी थी। उसने मुझे देखा और बहुत धीरे से कहा, "मैंने कैमरा बंद कर दिया। ये घर है, स्टूडियो नहीं।"
मैंने उसका हाथ थोड़ी देर पकड़ा। फिर मैं काजल के बगल में बैठ गया।
घड़ी में दस बजकर पचास मिनट।
और फिर ग्यारह बजे।
स्क्रीन पर पहले पानी का गिलास आया। फिर माइक। फिर एक मेज़ जिस पर सफ़ेद कपड़ा बिछा था और किनारे पर एक छोटा गमला रखा था — वही गमला, वही फूल, जो उसकी हर तस्वीर में होता है।
और फिर वो आया।
सफ़ेद कुर्ता। सफ़ेद धोती जैसा पायजामा। हाथ जोड़े हुए। वो बैठा, और जब बैठा तो पहले मेज़ की तरफ़ देखा, फिर माइक की तरफ़, फिर कैमरे में आँखें डालकर मुस्कुराया।
उसके बगल में चंद्रेश सक्सेना बैठा था। सफ़ेद कुर्ता, सोने के रंग का पेन, हाथ में फाइल। और वो मुस्कुरा रहा था — आधी मुस्कान, जैसे कोई बूढ़ा अपने होशियार बेटे की तरफ़ देखता है।
माँ ने गिलास पलंग के किनारे रख दिया। काँच की आवाज़ आई।
रणवीर ने साँस ली। और फिर वो बोला। आवाज़ बिल्कुल वैसी, जैसे गुमटी पर चाय पीते वक़्त होती है।
"भोपाल की पुरानी बस्ती," उसने कहा। "हम सबकी माँ है। वहाँ मेरा बचपन गया है, वहाँ मेरे पिता ने साइकिलों के पुर्ज़े बेचे हैं, और आज मैं उसी बस्ती की एक बात आपके सामने रखना चाहता हूँ।"
उसने रुककर सबको देखा। कैमरे के पीछे बैठे पत्रकार भी उसकी तरफ़ देख रहे थे। मुझे लगा ये आदमी अगर सड़क पर खड़ा होकर फल बेचता तो भी लोग खरीदते।
"पिछले कुछ महीनों में," वो फिर बोला, "वहाँ एक नौजवान उठा है। उम्र में छोटा, हौसले में बड़ा — मैं ये मानता हूँ, मैं उसकी उम्र का अपमान नहीं करूँगा। पर वो एक बात करता है जो मुझे रात को सोने नहीं देती।"
अब उसकी आवाज़ धीमी हुई। और जब आवाज़ धीमी होती है, तब आदमी सबसे ज़्यादा सुना जाता है।
"वो एक घंटी बजाता है," रणवीर ने कहा। "हाँ, घंटी। एक पुरानी साइकिल की घंटी। और उस घंटी के नाम पर वो लोगों से कहता है कि टूटी चीज़ें जुड़ जाएँगी, टूटे रिश्ते जुड़ जाएँगे, बिगड़े काम बन जाएँगे।"
उसने हाथ जोड़कर माथे से लगाए, जैसे कोई बुज़ुर्ग किसी बात पर शर्मिंदा हो।
"मैंने खुद देखा है," वो बोला। "मैंने खुद अपनी आँखों से देखा है कि वो अपने दोस्तों को, अपने मोहल्ले के बच्चों को, बूढ़ों को, बीमार लोगों को — उसी अंधविश्वास में फँसा रहा है। और मुझे ये कहने में कोई शर्म नहीं कि जो आदमी बीमार माँ के सामने घंटी बजाकर चमत्कार का वादा करे, वो समाजसेवी नहीं होता। वो… माफ़ कीजिएगा, मैं कोई कड़ा शब्द नहीं कहूँगा।"
चंद्रेश ने बगल से बहुत प्यार से एक शब्द जोड़ा।
"शोषण," उसने कहा। "सर, आप शोषण कहिए। कानून में उसका नाम यही है।"
"हाँ," रणवीर ने कहा। "शोषण।"
मेरी हथेली में पसीना आ गया। मैंने माँ की तरफ़ देखा।
माँ सीधी बैठी थीं। उनका चेहरा स्क्रीन की नीली रोशनी में साफ़ दिख रहा था। और उनके चेहरे पर डर नहीं था।
बिल्कुल नहीं।
काजल ने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और माँ का हाथ पकड़ लिया। माँ ने हाथ नहीं छुड़ाया। उन्होंने उलटकर काजल की उँगलियाँ दबा दीं।
स्क्रीन पर एक पत्रकार खड़ा हुआ।
"सर, आपने कहा कि आपने खुद देखा है। क्या आपने उस लड़के से बात की है?"
"मैंने उससे बात करने की कोशिश की," रणवीर ने कहा। "मैंने उसके घर तक आदमी भेजा। मैंने उसकी माँ के इलाज का खर्च उठाने की बात कही। मैंने उसे अपनी कंपनी में जगह दी। आप जानते हैं उसने क्या किया?"
पत्रकार चुप।
"उसने मेरे आदमी को दुकान से भगा दिया," रणवीर ने कहा। "क्योंकि मेरी बात मानने का मतलब था — उस घंटी का जादू खत्म। और जिसका जादू खत्म हो जाए, वो फिर कोई नहीं रहता।"
बात साफ़ थी। मुझे कोई गुस्सा नहीं आया। मुझे ठंड लगी। क्योंकि ये आदमी झूठ नहीं बोल रहा था — ये आदमी सच को इस तरह मोड़ रहा था कि सच भी उसका हो जाए।
फिर वो सीधा होकर बैठा। उसकी आवाज़ में पहली बार कोई बदलाव आया — थोड़ी ऊँची, थोड़ी तेज़, जैसे कोई घोषणा करता है।
"पूर्णिमा की शाम," उसने कहा।
मैं ठिठक गया।
"पूर्णिमा की शाम, सात बजे, नूर अस्पताल के खुले मैदान में — जनसुनवाई।"
मेरे कान के अंदर एक आवाज़ हुई। जेब में पड़ा घंटी का पुराना ताला एक पल के लिए गरम हुआ। सिर्फ़ एक पल।
"मैं वहाँ सबके सामने हूँगा," रणवीर बोल रहा था। "चंद्रेश जी होंगे, डॉक्टर साहब को भी बुलाया है, गली के सब बुज़ुर्गों को बुलाया है। और उस नौजवान को भी बुलाया है। वो आए, मंच पर आए, और सबके सामने वो घंटी बजाए।"
उसने रुककर मुस्कुराया।
"मैं नहीं कहता कि घंटी में कुछ है या नहीं। मैं तो उससे यही कहूँगा — भाई, आ जाओ, बजाओ। अगर जुड़ गया कुछ, तो मैं खुद आपके पैर छूकर माफ़ी माँगूँगा। और अगर नहीं जुड़ा…"
उसने कंधे उठाए।
"तो गली को पता चल जाएगा कि उसका काला जादूगर क्या है।"
काला जादूगर। उसने वो शब्द खुद नहीं बोला, उसने सबको बोलने पर मजबूर कर दिया। छह कैमरे उसकी तरफ़ थे, और हर कैमरे के पीछे एक आदमी जो अब इसी नाम से खबर लिखेगा।
"सर," मीरा ने अचानक कहा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो स्क्रीन के बहुत पास झुक गई थी।
"क्या हुआ?"
"उसने कहा — पूर्णिमा की शाम।"
"तो?"
"अंकुश, कोई सभा का दिन ऐसे नहीं बताता।" उसकी आवाज़ सूखी थी। "वो कहेगा — परसों शाम सात बजे। या — अगले रविवार। उसने 'पूर्णिमा' कहा। ये शब्द उसने फेंका नहीं है।"
मेरा पेट ठंडा हो गया।
क्योंकि पूर्णिमा वो नाम था जो मुझे एक टेप बँधे पुराने सूटकेस वाली औरत ने दिया था। पूर्णिमा वो नाम था जो ताले के छेद में फँसे पुराने पीले काग़ज़ पर लिखा मिला था। पूर्णिमा वो औरत थी जिसने मुझसे कहा था कि उसका नाम सातवें काग़ज़ पर है।
"वो जानता है," मैंने धीरे से कहा। "वो जानता है पूर्णिमा कौन है।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उन्होंने कुछ नहीं पूछा। बस देखा।
स्क्रीन पर चंद्रेश सक्सेना अब माइक की तरफ़ झुक रहा था।
"मैं एक बात साफ़ कर देना चाहता हूँ," उसकी मीठी आवाज़ आई। "हमारी तरफ़ से किसी पर कोई आरोप नहीं है। हमने कोई मुकदमा नहीं किया। हम सिर्फ़ सच को सबके सामने रखना चाहते हैं। जो सच बोलना चाहे, मंच खुला है। जो अपनी बात कहना चाहे, वो आए।"
और फिर उसने वो जोड़ा जो मैं कभी नहीं भूलूँगा।
"बस एक बात याद रखिएगा," उसने कहा। "मंच पर खड़े होकर जो बात कही जाती है, वो काग़ज़ पर आ जाती है। और काग़ज़ — काग़ज़ कभी नहीं भूलता।"
टीवी बंद हुई।
काजल ने रिमोट नीचे रखा। कमरे में जो रोशनी रह गई वो बल्ब की पीली थी और बहुत थोड़ी थी।
पापा ने चश्मा उतारा।
उन्होंने कमीज़ के पल्ले से उसे पोंछना शुरू किया। धीरे। बहुत धीरे। पहले बाएँ काँच को, फिर दाएँ को। फिर वही।
और फिर उनकी उँगलियाँ रुक गईं। काँच पर ठिठक गईं, जैसे रास्ते में कोई दरवाज़ा आ गया हो।
वो कुछ नहीं बोले।
मुझे उनसे यही उम्मीद थी। और मुझे उनसे यही डर भी लगता था।
फिर माँ ने कहा।
उनकी आवाज़ बुखार वाली थी — हल्की, फटी हुई। पर शब्द साफ़ थे, एक-एक अलग।
"जिसके पास सच होता है," माँ ने कहा, "वो सभा से नहीं डरता।"
कमरे में कोई हिला नहीं।
"वो डरता है," माँ ने आगे कहा, "जिसके पास सिर्फ़ काग़ज़ होता है। काग़ज़ बहुत बोलता है, बेटा। इसीलिए काग़ज़ वाले इतने सारे माइक लगवाते हैं।"
काजल ने माँ का हाथ पकड़े हुए ही सिर नीचा कर लिया। उसकी आँखें भर आई थीं, पर वो रोई नहीं। वो अठारह साल की है, मेरी छोटी बहन, और उस दिन मुझे लगा वो मुझसे बड़ी हो गई है।
"माँ," मैंने कहा।
"हाँ।"
"तू डरी नहीं?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। और उन्होंने वो किया जो वो बहुत कम करती हैं — हल्का सा मुँह बनाकर मुस्कुराईं।
"मैं बाईस साल से एक काग़ज़ से डर रही हूँ," उन्होंने कहा। "अब उससे ज़्यादा किसी चीज़ से क्या डरूँगी?"
और फिर, बहुत हल्की आवाज़ में, जैसे कोई अपने आप से बोल रहा हो —
"और वो घंटी बजाने की बात… उसका जवाब मैं नहीं दूँगी। तू देगा। पर तू अकेला मत देना।"
बाहर दरवाज़े पर खटखट हुई।
फ़ैज़ खड़ा था, साँस फूली हुई। उसके पीछे टिंकू और सानिया।
"चाचा," फ़ैज़ ने कहा। "उस्ताद कह रहे हैं — अभी आ जाओ। और… और गली के लोग आ रहे हैं।"
"कौन?"
"बहुत लोग," टिंकू ने कहा। उसकी आँखों में वो चमक थी जो डर में भी आ जाती है। "भोला भाई, नसीमा बाई, किशनलाल काका, और… और गुड्डू की अम्मी भी आई हैं।"
मैं उठा। माँ ने मेरा हाथ पकड़ा।
"जा," उन्होंने कहा। "पर सुन — जो आज डरकर आया है, उसे मत झिड़कना। डरा हुआ आदमी सबसे पहले अपनी इज़्ज़त बचाना चाहता है। उसे इज़्ज़त देकर बात करना।"
मैंने सिर हिलाया और निकल पड़ा।
गुमटी के बाहर तीस-चालीस लोग खड़े थे।
शबनम आपा ने बेंच पर एक बड़ी केतली रखी थी और कुल्हड़ भी। पर किसी ने चाय नहीं छुई थी। जब मैं आया तो सब एक साथ बोल पड़े और मुझे कुछ समझ नहीं आया — आवाज़ें ऊपर-नीचे हो रही थीं, कोई कह रहा था कि हमें सभा में जाना चाहिए, कोई कह रहा था कि हमें बिल्कुल नहीं जाना चाहिए।
फिर शबनम आपा ने थाली उठाई और पीतल की थाली पर चिमटी पटक दी।
"चुप," उन्होंने कहा। "एक-एक करके।"
भोला भाई ने पहले कहा। उनकी आवाज़ हल्की थी।
"बेटा, मैं सीधी बात करूँ? मेरी दुकान है। मेरा बेटा उसकी साइट पर सीमेंट ढोता है। अगर मैं उस सभा में तेरे साथ खड़ा दिख गया, तो सुबह मेरा शटर बंद मिलेगा।"
कुछ लोगों ने सिर हिलाया। कोई बोला, "हाँ भाई, यही तो बात है।"
मैंने देखा कि नसीमा बाई अपनी बाल्टी हाथ में पकड़े खड़ी हैं, और किशनलाल काका अपना चना मुँह के पास ले जाकर फिर नीचे रख रहे हैं, और सबसे पीछे — सबसे पीछे गुड्डू की अम्मी खड़ी थीं, जिन्होंने एक बार स्कूल के गेट पर कहा था कि उन्होंने गुड्डू का रास्ता बदल दिया है।
मैंने सबको देखा। फिर मैंने कहा।
"भोला भाई, आप सभा में मेरे साथ मत खड़े होइए।"
वो चौंके।
"आप अपनी दुकान पर खड़े रहिए," मैंने कहा। "शटर उठाकर। और टीवी ऑन रखिए। अगर उस दिन आपका शटर बंद मिले तो पूरी गली जान जाएगी कि किसने बंद कराया।"
भोला भाई की आँखें झपकीं।
"और नसीमा बाई," मैंने कहा, "आप अपनी दुकान पर रहिए। आपके यहाँ जो भी राशन लेने आए, उसे बता दीजिए कि सात बजे मैदान में क्या होने वाला है।"
"मैं बताऊँगी," नसीमा बाई ने कहा। फिर उन्होंने बाल्टी नीचे रखी। "पर तू एक बात का जवाब दे — वो घंटी सच में बजेगी?"
सब चुप हो गए।
मैंने जेब से घंटी निकाली। वो ठंडी थी। मैंने उसे हथेली पर रख लिया।
"मैं नहीं जानता," मैंने सच बोला। और जब मैंने सच बोला, तो मुझे अंदर हल्का लगा। "मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ कि वो मुझसे झूठ नहीं बोलती। और आज वो बहुत देर से चुप है।"
शबनम आपा ने तब कहा, जो सबसे ज़रूरी बात थी।
"देख, बेटा," उन्होंने कहा, "वो आदमी तुझे घंटी बजाने को इसलिए नहीं कह रहा कि वो घंटी से डरता है। वो इसलिए कह रहा है कि उसने पहले से तय कर लिया है कि उस दिन घंटी बजेगी या नहीं बजेगी — और दोनों में उसका फ़ायदा है। बज गई तो वो कहेगा, देखो, इसने जादू किया। नहीं बजी तो कहेगा, देखो, झूठा है।"
"तो फिर क्या करें?" किसी ने पीछे से कहा।
"हमें सभा में जाना है," मैंने कहा।
सब फिर बोल पड़े। मैंने हाथ उठाया।
"सुनो। हम सभा में जाएँगे, पर भीख माँगने नहीं। हम किसी से ये नहीं कहेंगे कि हम पर भरोसा करो। हम सिर्फ़ अपनी बात कहेंगे — जो हुआ, जैसा हुआ, जितना हुआ। और जिसे भरोसा करना हो वो करे, जिसे न करना हो वो न करे। मैं किसी का नाम अपने साथ नहीं घसीटूँगा।"
भोला भाई ने कुछ सोचा। फिर बोले, "पर तेरे पास काग़ज़ क्या है? उसके पास तो फाइल है, वकील है, कलेक्टर है।"
"मेरे पास एक घंटी है," मैंने कहा। "और एक गली है।"
शबनम आपा ने तब कुल्हड़ उठाया और मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"ले," उन्होंने कहा। "चाय ठंडी हो गई, पर पी ले। कल से मेरी गुमटी पर जो भी आए, उसे मैं यही बताऊँगी — सात बजे मैदान में। और हाँ, सात बजे से पहले मेरा चूल्हा बंद रहेगा। मैं भी चलूँगी।"
रात के करीब दस बजे मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में आया।
बल्ब गुनगुना रहा था। चारपाई पर मेरा पुराना कंबल मुड़ा पड़ा था। औज़ारों का ट्रंक खुला था और उसके ऊपर नई रिंच पड़ी थी, जिसे टिंकू रोज़ छूना चाहता है और रोज़ मना कर दिया जाता है।
मैंने जेब से घंटी निकाली और मेज़ पर रख दी।
मेज़ बहुत पुरानी है। एक टाँग में से कील निकल आई है, इसलिए जब भी उस पर कुछ भारी रखो तो वो हल्का सा झुक जाती है।
घंटी रखते ही मेज़ झुकी और फिर सीधी हो गई।
मैं बैठ गया। मेरे हाथ में आज का दिन उतर आया था — सुबह की वो मशीन की आवाज़, गली के खुले दरवाज़े, हर स्क्रीन पर वही सफ़ेद कुर्ता, माँ का वो वाक्य, और आख़िर में वो शब्द — पूर्णिमा।
मैंने अपनी कॉपी खोली। जिसमें मैंने आज का जोड़ लिखा था। ऊपर मैंने लिखा था — माँ का नाम। फिर उस्ताद और इलाही भाई। फिर शकील भाई।
और उसके नीचे मैंने पेंसिल उठाकर लिखा —
सात बजे। मैदान। सबके सामने।
मैंने पेंसिल रखी। फिर मैंने उँगली बढ़ाकर घंटी को छुआ।
वो हल्की गरम थी।
गरम, पर जलती नहीं। जैसे किसी ने उसे थोड़ी देर हाथ में पकड़ा हो और फिर रख दिया हो।
मैंने उँगली नहीं हटाई। मैंने कहा, "घंटी।"
कोई जवाब नहीं।
"घंटी, मुझे पता है तू सुन रही है। आज बहुत कुछ हो गया।"
और फिर, मेरे हाथ के नीचे, वो पीतल एक बार हिला — जैसे कोई बूढ़ा सिर हिलाता हो।
और आवाज़ आई।
बहुत धीमी। पहले से ज़्यादा धीमी। जैसे पीतल के भीतर से नहीं, पीतल के बहुत पीछे से कोई बोल रहा हो।
"अंकुश।"
"हाँ।"
"पूर्णिमा वाली सभा में मैं पूरी नहीं बोलूँगी।"
मैं सीधा हो गया।
मेरे हाथ से कॉपी खिसककर चारपाई पर गिर गई और उसकी पेंसिल लुढ़ककर फ़र्श पर चली गई, पर मैंने उसे उठाया नहीं।
"क्या मतलब?" मैंने कहा। "तू नहीं बोलेगी? उसने पूरी गली के सामने, छह कैमरों के सामने कह दिया कि मैं घंटी बजाऊँगा। और अगर तू चुप रही तो—"
"तो वो जीत जाएगा," घंटी ने कहा। "मुझे पता है।"
"फिर?"
"फिर भी मैं पूरी नहीं बोलूँगी।"
मैं उठ खड़ा हुआ। कमरे में घूमने लगा। दो कदम इधर, दो कदम उधर। यही कमरा है — छह फुट चौड़ा और आठ फुट लंबा। दो कदम से ज़्यादा चलने की जगह नहीं।
"घंटी, तू मुझे आज तक कभी ऐसे नहीं मिली। तू छोटी बातें करती है, आधी बातें करती है, फिर चुप हो जाती है। पर आज तू ऐसा कह रही है जैसे कोई आदमी अपनी बीमारी बता रहा हो।"
"क्योंकि ये बीमारी नहीं है," घंटी ने कहा। "ये हिसाब है।"
मैं रुक गया।
"कैसा हिसाब?"
घंटी कुछ देर चुप रही। मैंने उसे फिर छुआ। वो अब भी गरम थी, पर गरमाहट बदल रही थी — जैसे अंगीठी की आख़िरी गरमाहट।
फिर उसने कहा। बहुत छोटा वाक्य। सिर्फ़ सात शब्द।
"क्योंकि तेरा एक हिस्सा अभी भी टूटा है।"
मैंने साँस रोक ली।
और उसने आख़िरी बात कही। धीमी। इतनी धीमी कि मुझे लगा मैंने सुना नहीं, मैंने महसूस किया।
"और वो हिस्सा तेरे ही घर में रहता है।"
चुप्पी।
बल्ब गुनगुनाता रहा।
मैं धीरे-धीरे मुड़ा और खुले दरवाज़े से बाहर आँगन की तरफ़ देखा। पापा के कमरे की बत्ती अभी जल रही थी। उसकी परछाईं परदे पर नहीं थी — यानी वो बैठे नहीं थे। वो खड़े थे। बस खड़े थे, बीच कमरे में, कुछ किए बिना।
और मेरे हाथ के नीचे मेज़ पर पड़ी घंटी एक बार और हल्की गरम हुई — जैसे किसी ने बहुत दूर से आँख मार दी हो।
मैंने कॉपी उठाई, पेंसिल उठाई, और उस पन्ने पर जहाँ मैंने आज का हिसाब लिखा था, सबसे नीचे मैंने एक नई लाइन जोड़ी।
घर का सबसे चुप आदमी।
और मैं बाहर आँगन में चला गया, नंगे पैर, ठंडी मिट्टी पर, उस जलती बत्ती की तरफ़ जिसके भीतर मेरा पापा बिना कुछ किए खड़े थे।
॥
नंगे पैर आँगन की मिट्टी पर चलते वक़्त मुझे अपने ही पैरों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। ऐसी ठंडी मिट्टी थी, जैसे रात भर किसी ने उसे पानी से धोया हो। और पापा के कमरे का बल्ब — वही पुराना, ऊपर से काला पड़ चुका बल्ब — पीली रोशनी में पूरे दरवाज़े को ऐसे रंग रहा था जैसे कोई पुरानी तस्वीर हो।
मैंने दरवाज़े के चौखट पर हाथ रखा।
पापा भीतर खड़े थे। बीच कमरे में। बिना कुछ किए। भूरी जिल्द वाली फाइल उन्होंने दोनों हाथों से सीने से लगाई हुई थी, और उस फाइल के कोने से उनकी उँगलियाँ ऐसे सफ़ेद पड़ी थीं जैसे उन्होंने उसे बहुत ज़ोर से पकड़ा हो।
उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा।
मैंने कहा, "पापा।"
उन्होंने बस एक बार साँस ली। फिर बोले, "आ जा।"
मैं गया। दरवाज़े से चारपाई तक, चारपाई से उनके पास तक। मेरे पैरों के नीचे फ़र्श ठंडा था। कमरे में उनकी पुरानी औज़ारों वाली गंध थी — लोहे, तेल और धूल की। और उसके ऊपर हल्की सी कपूर की महक, जो माँ की संदूकची से आती है और जो बरसों से इस घर की दीवारों में बस गई है।
"तूने सुना?" पापा ने पूछा।
"क्या?"
"घंटी ने जो कहा। घर में एक हिस्सा टूटा है।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखें फाइल पर थीं, मेरे ऊपर नहीं।
मैंने कहा, "आपने सुना?"
"मैंने नहीं सुना। मैंने समझा। तेरे कमरे की बत्ती जल रही थी, और तू बार-बार उठकर बैठ रहा था। इतनी रात को इंसान ऐसे ही नहीं उठता, अंकुश। इंसान तभी उठता है जब उसके अंदर कोई चीज़ जगा दे।"
मैं चुप रहा।
वो फाइल को मेज़ पर रखने ही वाले थे, फिर रखी नहीं।
"मैं ये फाइल नहीं छिपा रहा था," उन्होंने कहा। "मैं इसे खोलने से डर रहा था। दोनों में फ़र्क़ है।"
"अब?"
"अब डर खत्म नहीं हुआ।" उन्होंने फाइल मेरी तरफ़ बढ़ा दी। "पर मैंने सोच लिया है।"
मैंने फाइल ली। हल्की थी — इतनी हल्की कि हैरान रह गया। बाईस साल का डर इतने काग़ज़ों में होता है, ये मुझे पता नहीं था।
"अंकुश," पापा ने कहा। अब उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनका चश्मा टेप से बँधा था, और टेप की एक परत उखड़कर कान पर लटक रही थी। "घंटी ने जो कहा, वो सच कहा। पर वो टूटा हिस्सा मैं नहीं हूँ।"
मैं रुका।
"और माँ भी नहीं है।"
"तो?"
वो चुप हो गए। मुझे लगा वो कुछ कहेंगे, कोई नाम लेंगे, कोई पुरानी बात खोलेंगे। मगर उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा। उनका हाथ पतला था, और उसमें ज़रा भी ताक़त नहीं थी — जैसे किसी पुराने औज़ार का हत्था, जो पहले मज़बूत था और अब सिर्फ़ आदत से पकड़ा जाता है।
"तू खुद पहचानेगा," उन्होंने कहा। "कल। और मैं तुझे बता दूँ — जब तू उसे पहचानेगा, तू मुझसे नाराज़ होगा।"
"आपसे क्यों?"
"क्योंकि हर टूटा हिस्सा किसी के हाथ से जुड़ा होता है, बेटा। हमारे घर का टूटा हिस्सा भी किसी के हाथ से जुड़ा है। और वो हाथ मेरा है।"
मैंने कुछ कहना चाहा। वो बोलने नहीं दिया।
"कल मैं मंच पर तेरे साथ खड़ा रहूँगा," उन्होंने कहा। "तेरे पीछे नहीं। साथ। और जो मैंने बाईस साल में नहीं किया, वो करूँगा — अपना नाम अपनी ज़ुबान से लूँगा। ज़ुबान अटकेगी, हाथ काँपेंगे, पर नाम मेरा होगा।"
फिर उन्होंने बल्ब बुझा दिया।
अंधेरे में उनकी आवाज़ आई, "अब जा। सो जा। कल सुबह तेरे पास बहुत काम है।"
मैं आँगन में लौटा। आसमान में तारे थे। घंटी मेरी जेब में अब भी हल्की गरम थी, जैसे किसी ने उसे मेरी जेब से बाहर निकालकर किसी और के हाथ में दे दिया हो और फिर वापस रख दिया हो।
मैं सो नहीं पाया।
सुबह चार बजे से पहले मैं उठ गया। और जब मैं उठा, तो मुझे लगा कि मैंने सपना देखा — पापा के कमरे का बल्ब जल रहा था, और भीतर पापा चुपचाप अपना पुराना चश्मा पोंछ रहे थे, जैसे पूरी रात वो सिर्फ़ इसी काम में लगे हों।
तीन अलग-अलग रास्तों से सुबह एक जगह आ गई।
जब मैं पीपल के नीचे पहुँचा, तो सुबह के छह बज रहे थे और पूरी गली में कोहरा ऐसा था जैसे किसी ने कपास फैला दी हो। पीपल का पेड़ कोहरे में डूबा था, और उसके नीचे की चबूतरी पर पहले से कोई बैठा था।
उस्ताद अली बक्श।
इलाही भाई उनके ठीक बगल में, दोनों हाथ लाठी पर, सिर झुका हुआ। फ़ैज़ पीछे खड़ा था और उसके हाथ में एक लकड़ी का छोटा स्टूल था, जिसे उसने चबूतरी के किनारे रखा — वही स्टूल जो उस्ताद ने पचास साल बाद इलाही के लिए रखा था।
शबनम आपा की गुमटी से धुआँ उठ रहा था। वो आज चूल्हा पहले जला चुकी थीं। उन्होंने सात कुल्हड़ चाय के चबूतरी की तरफ़ बढ़ाए और बिना किसी से कुछ पूछे किनारे पर रख दिए। उनका मुँह आज सख़्त था, और उनका वो चिमटी वाला हाथ जेब में था — यानी वो आज किसी को बख़्शने के मूड में नहीं थीं।
मीरा आई। कैमरा इस बार तिपाई पर नहीं था, उसके गले में लटका था। हाथ में एक नई मोटी कॉपी थी, जिसके पन्ने कोनों से मुड़े हुए थे — मतलब रात भर वो लिखती रही।
टिंकू आया — काले मोज़े, जूते हाथ में, आँखों में सुबह की वो ख़ास चमक जो बच्चों में तभी आती है जब उन्हें लगता है कि आज कुछ बड़ा होने वाला है। उसके पीछे सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — चारों एक ही डंडी के पीछे-पीछे, जैसे गली के जासूस नहीं, कोई फ़ौज हो।
और फिर वो आया जिसे देखकर मैं रुक गया।
बबलू पांडे।
ना स्कूटर। ना गले में सोने की मोटी चेन। ना हाथ में पानदान। वो पैदल आया था, सफ़ेद कुर्ता पहने, और उसके जूतों पर धूल थी — ऐसी धूल जो गली के कोने से पीपल तक चलकर ही लगती है। वो आया और चबूतरी के किनारे खड़ा हो गया। किसी ने उसे बैठने को नहीं कहा, और उसने बैठने की ज़िद नहीं की।
और उसके बाद, सबसे आख़िर में, गोविंद भाई।
गोविंद भाई जब आए, तो मैंने पहली बार देखा कि उनके हाथ नहीं काँप रहे थे। बिल्कुल नहीं। उन्होंने काँपते हाथों वाली आदत को जैसे घर पर ही छोड़ दिया था। उनके हाथ में कपड़े में बँधा एक बंडल था — बाईस साल की रसीदें, मोहरें, अंगूठे और तारीख़ें। वो आए, उस्ताद के पैर छुए, फिर मेरे सामने खड़े होकर बोले, "अंकुश भाई, आज आप जो कहेंगे, वही करूँगा। बस एक बात कह दूँ — जब मैं मंच पर खड़ा होऊँगा, तो मेरी आवाज़ काँपेगी। हाथ नहीं काँपेंगे, आवाज़ काँपेगी।"
मैंने कहा, "गोविंद भाई, आवाज़ काँपे तो कोई बात नहीं। सच काँपकर बोला जाए तो भी सच ही रहता है।"
वो हँसे। पहली बार। इतने बरसों में पहली बार।
हम सब बैठे। चबूतरी पर जगह कम थी, पर आज किसी ने जगह की शिकायत नहीं की। टिंकू ज़मीन पर बैठ गया। सानिया भी। इलाही भाई ने फिर भी मुझे अपने पास बैठाया — जैसे वो कोई बुज़ुर्ग हों और मैं उनका कोई पोता।
मीरा ने अपनी कॉपी खोली।
"मैं रात भर बैठी रही," उसने कहा। "और मैंने एक चीज़ निकाली है।" उसने पन्ना पलटा। "अगर पूर्णिमा की शाम सात बजे सभा है, तो हमें पूर्णिमा तक हर उस इंसान को तैयार करना है जिसका कोई काग़ज़ चंद्रेश के पास है।"
उस्ताद ने सिर हिलाया। "अच्छी बात। पर तैयार करने का मतलब क्या है? उन्हें डराना?"
"नहीं," मीरा ने कहा। "उन्हें याद दिलाना। कि उनका नाम किसी काग़ज़ पर लिखा है, और वो काग़ज़ उन्होंने नहीं लिखा।"
मीरा ने पन्ना पलटा और पढ़ने लगी।
"नसीमा बाई — राशन की दुकान, उनके बेटे साजिद ने सफ़ेद कुर्ते वाले से दो हज़ार लिए थे। किशनलाल काका — पीछे की किराने की दुकान, उनकी दुकान बेची हुई दिखाई गई है, जबकि उन्होंने कभी नहीं बेची। भोला भाई — दुकान सील, और उनके बेटे सनी की नौकरी का लालच। रमेश भाई — नल का झगड़ा, दो सौ अस्सी रुपये, और एक अंगूठा। चूड़ी वाली बाई — जिसके हाथ में लाल धागे लिपटे रहते हैं और जिसकी दुकान पर तीन आदमी दिन भर बैठते हैं। साइकिल पुर्ज़ों वाला भाई — जिसने नाम हटाने का काग़ज़ दिया और बोलने से मना कर दिया। गुड्डू की अम्मी — जिसने कल ही से गुड्डू का रास्ता बदल दिया है। सानिया के अब्बा और गुड्डू के पापा — जिन्होंने नल के झगड़े में भरोसा खत्म होने की बात कही थी। हरी दुपट्टे वाली औरत, बच्चों वाली माँ, शकील भाई, रज्जो बाई, शाहिद, भवानी प्रसाद…"
वो रुकी। उसने कॉपी बंद की।
"और हम," उसने कहा। "हम सब भी उसी सूची में हैं। हमारे भी कोई न कोई काग़ज़ उसके पास हैं।"
चबूतरी पर चुप्पी बैठ गई।
और तभी, इस चुप्पी में, गुड्डू ने कहा, "तो मैं ढोल बजाऊँगा।"
सब उसकी तरफ़ देखने लगे।
"क्यों?" मैंने पूछा।
"क्योंकि सभा में ढोल होता है। मेरे मामा की शादी में ढोल था। जब ढोल बजता है, तो सब देखते हैं। और जब सब देखेंगे, तो सुनेंगे भी।"
चिंटू तुरंत खड़ा हो गया। "और मैं बड़ा सा बैनर लिखूँगा। इतना बड़ा कि पीपल के पीछे से भी दिखे। लाल कपड़े पर सफ़ेद पेंट से।"
रफ़ीक़ ने अपना टूटा चश्मा आँख पर सरकाया — जिसका एक काँच गायब था — और बहुत सीरियस होकर बोला, "पर बैनर पर अगर हिंदी में लिखेंगे तो कौन पढ़ेगा?"
एक पल की चुप्पी।
फिर चबूतरी पर हँसी फूट पड़ी।
सानिया हँसते-हँसते चबूतरी पर लेट गई। टिंकू की चाय हाथ से छूटकर गिरते-गिरते बची। गोविंद भाई की आँखों से पानी आ गया — और मुझे नहीं पता वो हँसी के कारण था या कुछ और। शबनम आपा ने अपनी चिमटी हवा में घुमाई और बोलीं, "बेटा, तेरे चश्मे में एक ही काँच है, तुझे क्या फ़र्क़ पड़ता है कि कौन पढ़ेगा?"
और फिर मैंने एक चीज़ देखी जो मैं नहीं भूलूँगा।
उस्ताद अली बक्श मुस्कुरा रहे थे।
उनका चेहरा सालों से ऐसा था जैसे कोई पुराना कपड़ा हो जिस पर इस्त्री की गई हो — खिंचा हुआ, सीधा, बिना किसी सिलवट के। आज उस पर एक सिलवट आई। एक छोटी सी। और इलाही भाई ने उनकी तरफ़ देखकर अपनी लाठी पर हाथ कसकर रख दिया, जैसे कह रहे हों — देखा, मैंने कहा था न, ये हँसता भी है।
मैंने हाथ उठाया।
हँसी धीरे-धीरे रुकी।
"ठीक है," मैंने कहा। "सबकी बात सुन ली। अब मेरी सुनो।"
मैं खड़ा हो गया।
"ना ढोल। ना बैनर। ना नारे।"
गुड्डू का मुँह उतर गया।
"पर भैया—"
"गुड्डू, बैठ।" मैंने कहा, और वो बैठ गया, क्योंकि मेरी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मैंने खुद पहले कभी नहीं सुना। "सुनो सब। कल रणवीर ने कहा कि अगर घंटी बजी तो वो माफ़ी माँगेगा। तुम सोच रहे होगे कि ये तो अच्छा सौदा है — घंटी बजी और साहब माफ़ी माँगने लगे। पर सोचो ज़रा — वो माफ़ी माँगेगा, तो उसका कोई काग़ज़ वापस नहीं आएगा। माँ की दवा वापस नहीं आएगी। भोला भाई का शटर वापस नहीं आएगा।"
चुप्पी।
"वो जो चाहता है वो ये है कि पूरी सभा एक तमाशा बन जाए। घंटी बजे या ना बजे — बात वहीं खत्म हो जाए। लोग कहें, अरे, बज गई, अरे, नहीं बजी। और काग़ज़ पर कोई नहीं बोले।"
उस्ताद ने सिर हिलाया। धीरे से। जैसे अंदर ही अंदर कह रहे हों — यही तो पचास साल से मैं कहता आया हूँ।
"तो हम क्या करेंगे?" मीरा ने पूछा।
"हम कुछ नहीं करेंगे," मैंने कहा। "हम बस सच बोलेंगे। एक-एक आदमी। अपनी बात। अपनी ज़ुबान में। सभा में कोई नारा नहीं होगा। सबसे बड़ा नारा यही है कि मैंने ये किया, और मैं इसे छिपा रहा था।"
शबनम आपा ने कहा, "और जो लोग न बोलना चाहें?"
"तो न बोलें," मैंने कहा। "मैं किसी के मुँह में हाथ नहीं डालूँगा। माँ ने कहा था — सबसे ज़्यादा डरने वाली औरत पहले बोलती है। तो हम बस इंतज़ार करेंगे। मगर उस इंतज़ार में भी हमें पास बैठना होगा।"
तभी उस्ताद ने कुछ कहा। उन्होंने पहले अपनी कुर्सी पर से चाय का कुल्हड़ उठाया, एक घूँट लिया, और फिर कहा —
"एक बात याद रखना, अंकुश। वो सभा में कोई पुरानी बात उछालेगा।"
मैंने कहा, "कैसी पुरानी बात?"
"ऐसी बात जो सच होगी," उस्ताद ने कहा। "वो झूठ नहीं बोलेगा। वो कभी झूठ नहीं बोलता। वो सच को इस तरह उछालता है कि सच भी झूठ जैसा लगने लगे। कल वो तेरे पापा का अंगूठा उछालेगा, तेरी माँ की बीमारी उछालेगा, शायद तेरे दादा की आग वाली रात भी उछालेगा। और तुझे तैयार रहना होगा — कि जब वो कोई सच बोले, तो तू चुप न रहे। तू कहे — हाँ, ये हुआ था।"
मैंने कहा, "और अगर वो कुछ ऐसा उछाले जो मुझे खुद न पता हो?"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक।
"तब," उन्होंने कहा, "तू उस वक़्त झूठ मत बोलना। तू बस इतना कहना — मुझे नहीं पता। और ये भी एक सच है।"
इलाही भाई ने पहली बार अपना सिर उठाया।
"और एक बात," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ सूखी थी, जैसे पचास साल से किसी ने उसका इस्तेमाल न किया हो। "रणवीर का सबसे बड़ा हथियार उसकी मुस्कान है। वो गुस्सा नहीं करेगा। वो गाली नहीं देगा। वो तेरी तारीफ़ करेगा, तेरे पापा को भाई कहेगा, तेरी माँ के लिए दुआ भेजेगा, और उसी हँसी में सबको ज़मीन पर बैठा देगा। तू उसके सामने कभी गुस्सा मत दिखाना। क्योंकि गुस्सा दिखाया तो वो कहेगा — देखो, ये लड़का पागल है। और जब बड़ा आदमी छोटे आदमी को पागल कहे, तो बात खत्म हो जाती है।"
मैंने कहा, "तो मैं क्या करूँ?"
"तू मुस्कुराना," इलाही भाई ने कहा। "जब वो मुस्कुराए, तू भी मुस्कुराना। वो तेरे सामने मुस्कुराएगा ये सोचकर कि तू झुक जाएगा। और तू मुस्कुराएगा ये जानकर कि तू नहीं झुकेगा। और उस दिन उसकी मुस्कान पहली बार कमज़ोर पड़ेगी।"
चबूतरी पर सब चुप थे। कोहरा हट रहा था। सूरज पीपल के पत्तों में से झाँकने लगा था, और उसकी रोशनी चबूतरी पर गिर रही थी — टुकड़ों में, पत्तों की छाया के साथ।
मैंने चारों जासूसों की तरफ़ देखा।
"तुम चारों का काम सबसे ज़रूरी है," मैंने कहा।
सानिया ने कहा, "क्या?"
"तुम गली-गली घूमोगे। और जिस घर में जाओ, वहाँ से एक बात लेकर आओगे — उस घर का सच। कोई डरा हुआ है, कोई शर्मिंदा है, कोई बीमार है। तुम सबको नहीं मनाओगे। तुम सबको सिर्फ़ याद दिलाओगे कि सात बजे मैदान में कोई उनका नाम लेगा, और वो वहाँ होना चाहिए।"
चिंटू ने कहा, "और अगर कोई डाँटे?"
"तो भाग जाना," मैंने कहा। "पर भागने से पहले एक बात कहना — मेरा नाम भी उस काग़ज़ में है।"
टिंकू ने कहा, "और मैं?"
"तू मेरे साथ।"
उसकी आँखें चमक गईं।
"पर एक शर्त है," मैंने कहा। "आज कोई जासूसी नहीं। कोई छिपकर जाना नहीं। किसी की जेब नहीं, किसी की अलमारी नहीं। आज तुझे सीधा चलना है और जो पूछे उसे सच बताना है।"
"क्यों?"
"क्योंकि कल सभा में जब सब बोलेंगे, तो जिसने छिपकर काम किया होगा, उसकी बात कमज़ोर लगेगी। और जिसने खुलकर किया होगा, उसकी बात पत्थर जैसी लगेगी।"
टिंकू ने सिर हिलाया। सीरियस। बहुत सीरियस, जैसे वो सत्रह साल का नहीं, पचास का हो।
मैंने बबलू की तरफ़ देखा। वो अब भी खड़ा था।
"बबलू भाई," मैंने कहा।
वो सीधा हो गया। उसके कंधे कस गए, जैसे उसे लगा कि अब कोई ताना आएगा, कोई हिसाब होगा।
मैंने कहा, "आपको एक काम देना है।"
उसने कहा, "क्या?"
"आप उन सबको बुलाना जिन्हें मैं नहीं बुला सकता। जो मेरा नाम सुनकर दरवाज़ा बंद कर देते हैं। जो मेरे पास आते हैं तो चाय लिए बिना चले जाते हैं। क्योंकि वो मुझसे डरते हैं, और आपसे डरते थे। आप जाइए। कहिए — भाई, मैंने अपना सच बोल दिया। अब तेरी बारी है।"
बबलू ने बहुत देर तक मुझे देखा। फिर वो बोला, "और जो मुझे भी दरवाज़ा बंद कर दें?"
"तो आप दरवाज़े के बाहर बैठ जाइए। बस। कुछ मत कहिए। कुछ देर बैठिए। लोग बाहर बैठे आदमी को नज़रअंदाज़ नहीं कर पाते।"
वो हँसा। एक छोटी सी हँसी, जिसमें कोई मज़ाक नहीं था, सिर्फ़ थकान। और उस थकान में एक चीज़ और थी जो मैंने पहले उसके चेहरे पर नहीं देखी थी — शायद राहत।
फिर मैंने सबसे आख़िरी बात कही।
"एक बात साफ़ कर दूँ," मैंने कहा। "कल मेरे साथ मंच पर कोई नहीं खड़ा होगा।"
सब एक साथ बोल पड़े।
मैंने हाथ उठाया।
"सुनो पहले। मंच पर सिर्फ़ मैं और मेरे पापा होंगे। और घंटी।" मैंने जेब से घंटी निकालकर दिखाई। "तुम सब अपनी जगह से बोलोगे। शबनम आपा — गुमटी से। उनकी गुमटी मैदान के रास्ते पर है, वहाँ से गली का हर आदमी गुज़रता है। उस्ताद — दुकान से। इलाही भाई — अपने दरवाज़े से। गोविंद भाई — मंच के सामने की मेज़ से, जहाँ सब काग़ज़ रखे जाएँगे। मीरा — कैमरे के पीछे से। बच्चे — भीड़ के बीच से। और टिंकू — बस मेरे पास से।"
मैंने चारों तरफ़ देखा।
"क्योंकि कल की सभा में अगर मंच पर पूरी गली खड़ी दिखेगी, तो लोग कहेंगे — अरे, ये तो गुट है। गुट का मुकाबला गुट से होता है। पर अगर एक लड़का मंच पर अकेला खड़ा हो, और पीछे-पीछे गली अपनी-अपनी जगह से बोल उठे — तो उसका नाम गुट नहीं होगा। उसका नाम गली होगा।"
कोहरा पूरा हट चुका था।
सूरज पीपल पर आ गया था और चबूतरी के पत्थर पर उसकी रोशनी ऐसी पड़ रही थी जैसे कोई किसी पुराने काग़ज़ को सामने खोलकर रख रहा हो।
सब उठे। टिंकू ने मेरे हाथ से एक कुल्हड़ लिया। शबनम आपा ने कुल्हड़ उठाते वक़्त कहा, "अंकुश, सात बजे से पहले मैं चूल्हा बंद करके आऊँगी। और अगर मुझे रोकने कोई आया, तो उसके मुँह पर चिमटी रख दूँगी — ठंडी नहीं, गरम।"
उस्ताद ने जाते वक़्त मेरे कंधे पर हाथ रखा। कुछ नहीं बोले। पर उनके हाथ में जो ज़ोर था, वो किसी वादे से कम नहीं था।
दिन भर मैंने कुछ और नहीं किया। बस गली में घूमता रहा। किसी की दुकान के बाहर खड़ा होता रहा। किसी की छत पर बैठा रहा। किसी के दरवाज़े पर चुपचाप।
कोई मुझसे बात करता तो मैं कहता — सात बजे, मैदान। और आगे कुछ नहीं कहता। मैंने ये सीखा था कि ज़्यादा कहने से लोग कम सुनते हैं, और कम कहने से सुनकर भी सुनते हैं।
शाम को, सूरज ढलने के वक़्त, मैं दुकान की पीछे वाली छत पर बैठा था।
वो छोटी छत — आधी ईंट, आधी टीन। जहाँ से पूरी गली दिखती है। पीपल, चबूतरी, उस्ताद की दुकान, शबनम आपा की गुमटी, नाली पर पड़ा पत्थर का पुल, और आगे मुहाने पर नूर अस्पताल के पीले बोर्ड तक।
मैंने घंटी निकाली। हाथ में रखी।
वो हल्की गरम थी। बहुत हल्की। जैसे किसी ने उसे बहुत देर पहले हाथ में पकड़ा हो और उसकी गरमाहट अब बस याद बनकर बची हो।
मैंने कहा, "घंटी।"
कोई जवाब नहीं।
"घंटी, मैं जानता हूँ तू कल से पहले मुझसे कुछ कहना चाहती है। क्योंकि तू जब चुप होती है, तब भी कुछ कहती है — मैंने ये किसी से नहीं कहा, पर मैं समझता हूँ।"
सूरज की आख़िरी किरण उस्ताद की दुकान के शटर पर पड़ी और फिर खिसक गई।
"तो अभी बता दे," मैंने कहा। "कल सात बजे के बाद अगर तू न बोली, तो मुझे तेरी बात किसी और से पूछनी पड़ेगी। और मुझे तेरी बात किसी और से पूछनी नहीं है। वो मेरे घर की बात है। मैं उसे तुझसे सुनना चाहता हूँ।"
घंटी कुछ देर चुप रही। इतनी देर कि मुझे लगा वो आज बोलेगी ही नहीं।
फिर वो हिली। एक बार। और मेरे हाथ में उसकी गरमाहट थोड़ी बढ़ी — जैसे किसी ने आँख मारी हो।
और फिर वो बोली। धीमी, पर साफ़।
"अंकुश।"
"हाँ।"
"कल तेरी आवाज़ मेरी आवाज़ से बड़ी होनी चाहिए।"
मैं रुक गया। मेरी उँगलियाँ घंटी पर जम गईं।
"क्या मतलब?"
"मतलब ये कि कल जब तू बोलेगा, तो लोग तेरी आवाज़ सुनें, मेरी नहीं। अगर लोग मेरी आवाज़ सुनकर रुके, तो मैं तेरे साथ नहीं बोलूँगी।"
मैंने कहा, "पर तू तो पीतल है। तू बजती है तो लोग सुनते हैं।"
"हाँ," घंटी ने कहा। "और यही डर है।"
बहुत देर तक मैं कुछ नहीं बोला।
मैंने छत के किनारे से नीचे देखा। गली में किसी ने दीया जलाया था। दूर गुमटी पर शबनम आपा का चूल्हा अब भी जल रहा था, और उसकी रोशनी में कुछ बच्चे बैठे थे — शायद टिंकू और उसकी टोली, जो आज भी किसी नई खबर के पीछे निकल पड़े थे।
मैंने घंटी फिर हाथ में कसकर पकड़ी।
"घंटी," मैंने कहा। "मेरी आवाज़ तेरी आवाज़ से बड़ी कैसे होगी? मैं तो हूँ ही ऐसा — मैं बोलता हूँ तो लोग हँसते हैं। मैं जब गंभीर बोलने की कोशिश करता हूँ, तब भी लोग हँसते हैं।"
घंटी एक पल चुप रही।
और फिर उसने इतना कहा, इतना धीमे से कि मुझे लगा वो कहकर भी नहीं कह रही —
"जब तेरा अपना टूटा हिस्सा जुड़ेगा, तब समझ जाएगा।"
मैंने कहा, "कौन सा हिस्सा? कह दे ना। तू तो जानती है।"
पर घंटी ने जवाब नहीं दिया।
बस हल्की ठंडी पड़ गई। फिर और ठंडी। और फिर वो पूरी तरह गरमाहट खो बैठी और चुप हो गई — वो चुप जिसमें कोई सवाल नहीं होता, सिर्फ़ इंतज़ार होता है।
मैंने उसे जेब में रखा।
आसमान में पहला तारा दिखा। गली में किसी ने रेडियो जोड़ा और कोई पुरानी धुन बजने लगी — इतनी धीमी कि सिर्फ़ चबूतरी तक पहुँच रही थी।
मैं वहीं बैठा रहा।
और मेरे भीतर एक सवाल घूम रहा था जो मैं आज किसी से नहीं पूछ सकता था — न पापा से, न माँ से, न उस्ताद से।
अगर घर में मेरा ही एक हिस्सा टूटा है, और वो हिस्सा मेरे ही भीतर रहता है…
तो कल मंच पर खड़ा आदमी कौन होगा?
मैंने अपनी जेब से घंटी फिर निकाली और उसे सिर्फ़ एक बार देखा।
वो चुप थी।
पर उसकी सतह पर, उस गहरी पीतल की सतह पर, सूरज की आख़िरी लालिमा ऐसी पड़ी थी जैसे किसी ने उस पर एक बूँद आँसू टपका दिया हो और वो अभी सूखा न हो।
मैंने उसे जेब में रखा और छत की सीढ़ी की तरफ़ बढ़ गया।
॥
मैं सीढ़ी से उतरा तो नीचे घर के आँगन में पूरी गली जमा थी।
शबनम आपा के हाथ में बड़ी केतली थी, उस्ताद अली बक्श अपनी सिलाई की दुकान से एक कुर्सी उठा लाए थे, इलाही भाई सफ़ेद कुर्ते में चुप खड़े थे और फ़ैज़ उनकी पीतल की पेटी थामे। मीरा कैमरा पहले से चालू रखकर दरवाज़े के पास, टिंकू दीवार से चिपककर, सानिया अपनी माँ के हाथ पकड़े, गुड्डू और रफ़ीक़ और चिंटू एक ही सफ़ेद कुर्ते में तीन छोटे मास्टर जैसे।
पापा आँगन के बीच में खड़े थे। नीली शर्ट, वही पुरानी, घिसी आस्तीन, और हाथ में कोई काग़ज़ नहीं, कोई फाइल नहीं। मैंने उन्हें इतने खाली हाथ बरसों बाद देखा था।
मैंने कहा, "पापा, चलिए।"
पापा ने सिर हिलाया, कुछ बोला नहीं। फिर मेरी तरफ़ देखा और बोले, "अंकुश।"
"हाँ।"
"आज मैं तेरे साथ रहूँगा। तेरे पीछे नहीं, हूँ गर कोई पूछे तो — तेरे बराबर में।"
मेरी ज़ुबान सूख गई। मैंने पलटकर घंटी को जेब में टटोला। वो अब भी वही ठंडी थी। पर मैंने हाथ नहीं हटाया।
माँ को काजल ने कंधा दिया था, पर माँ ने कहा कि वो भी चलेगी। काजल चुप नहीं बैठी, बोली, "माँ, आप बुखार में हैं।"
माँ ने कहा, "मेरे घर का आदमी मंच पर खड़ा होगा, और मैं घर में बुखार में पड़ी रहूँ? काजल, मेरा गमछा और वो पीली चुनरी निकाल, जो तेरे नाना के घर से आई थी। मैं ये मुँह ढककर बैठूँगी, बोलूँगी नहीं। पर बैठूँगी ज़रूर।"
काजल ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने कहा, "ले आ।"
फिर हम निकले।
गली में चलते वक़्त किसी ने ढोल नहीं बजाया। किसी ने नारा नहीं लगाया। कोई बैनर नहीं उठाया। ये मैंने खुद कहा था सुबह — कोई शोर नहीं, कोई सजावट नहीं, हर आदमी अपने पैरों से चलेगा। और मैंने सोचा था कि ये आसान होगा, पर जब पूरी गली चुप होकर तेरे पीछे चले, तो आदमी के पैर भारी हो जाते हैं।
टिंकू मेरे बगल में आया, छोटी पीतल की बाल्टी उसके हाथ में थी जो उसने सुबह लाउडस्पीकर बनाने के लिए उठाई थी। मैंने वो बाल्टी उसके हाथ से ले ली और पीपल के पास रख दी।
टिंकू ने कहा, "उस्ताद—"
"अब नहीं," मैंने कहा। "बाद में।"
गुड्डू पीछे से बोला, "उस्ताद, घबराए नहीं। हम हैं ना।"
मैंने पलटकर उसे देखा — दस साल का, घुटने पर पट्टी, और ज़ुबान में वो बात जो बड़े लोग भी मुँह से नहीं निकाल पाते। मैंने मुस्कुराने की कोशिश की।
"गुड्डू," मैंने कहा, "मैं डरा नहीं हूँ।"
और ये झूठ था। पर घंटी ने कुछ नहीं कहा। वो अब भी चुप थी।
अस्पताल का गेट आया, तो मैंने एक पल के लिए कदम रोक लिए।
मैदान दो हिस्सों में बँटा था।
एक तरफ़ — बड़ा सफ़ेद मंच। दस फुट ऊँचा, चारों तरफ़ सफ़ेद कपड़ा, ऊपर बड़े-बड़े बैनर — "सेवा, समर्पण, और साथ" लिखा हुआ, और उसके नीचे रणवीर भारद्वाज की तस्वीर जिसमें वो हाथ जोड़े खड़े थे। मंच के बीच में माइक का स्टैंड, चमकता हुआ, नीले रिबन बँधे। मंच के आगे पहली पंक्ति में सफ़ेद कुर्सियाँ — बीस, तीस, शायद चालीस — जिन पर बैठने वाले अभी आए नहीं थे। और मंच के पीछे एक बड़ा नीला बोर्ड जिस पर "भारद्वाज ट्रस्ट — जनसुनवाई" लिखा था। नीचे बजने वाला लाउडस्पीकर, धीमा संगीत चला रहा था — वही पुरानी फ़िल्मी धुन, जो हर सरकारी समारोह में बजती है।
दूसरी तरफ़ — ये मैदान नहीं था। ये गली थी, जो बाहर निकल आई थी।
मैंने देखा — उस्ताद की सिलाई की दुकान की कुर्सी, जो वो साथ लाए थे, एक कोने में रखी थी। उसके ऊपर उस्ताद बैठे थे, हाथ में टेप लिपटा उनका पुराना चश्मा था, और आँखें बंद थीं। इलाही भाई उनके बगल में खड़े थे, फ़ैज़ के हाथ में पीतल की पेटी। शबनम आपा ने केतली उठाकर हवा में हिलाई, मेरी तरफ़ देखा, और मुँह से कुछ कहा जो मैंने सुना नहीं, पर समझ लिया — "आ, तुझे पिलानी है आज।"
गोविंद भाई बड़ी पुरानी मेज़ के पीछे खड़े थे, हाथ अब भी नहीं काँप रहे थे, और मेज़ पर मोटी फाइल, मोहरें, पुरानी रसीदें और चार-पाँच पीले लिफ़ाफ़े रखे थे। उनके बगल में बबलू पांडे खड़े थे — मैंने उन्हें पहले कभी इतना सीधा खड़ा नहीं देखा था। न चेन, न पानदान, न सोने का लॉकेट। सिर्फ़ सफ़ेद कुर्ता और एक हाथ में छोटी मुड़ी परची।
बच्चे — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — पहली पंक्ति में खड़े थे। कोई पीछे नहीं था।
और बाक़ी गली — रेडियो वाले बूढ़े, किशनलाल काका, भोला भाई, हबीब चाचा, नसीमा बाई, रमेश भाई, मोहन, गिरधारी, याकूब, मंसूर? नहीं, मंसूर नहीं था। मैंने सोचा, फिर बाद में सोचता हूँ। औरतें, बच्चे, बूढ़े, जवान — सब खड़े थे, किसी के हाथ में झंडा नहीं, किसी के मुँह पर नारा नहीं। बस खड़े थे।
मैंने एक गहरी साँस ली।
पापा मेरे बराबर में आए।
और तभी माइक पर रणवीर की आवाज़ आई।
"आ जाइए, आ जाइए।"
उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो किसी शादी में बड़े मेहमान की होती है। वो सफ़ेद कुर्ते में था, बाल साफ़ कटे, चेहरे पर वो मुस्कान जो मैंने हर तस्वीर में देखी थी — बस आज कुछ ज़्यादा चौड़ी।
"मैंने कहा था ना," वो बोला, "कि आज कोई काग़ज़ नहीं, कोई अंगूठा नहीं, कोई वकील नहीं। बस मैं, आप, और सच्चाई।"
उसने माइक से हाथ हटाकर भीड़ की तरफ़ बढ़ाया, जैसे कोई बपौती बाँट रहा हो।
"यही तो मैं चाहता हूँ। आज कोई डर नहीं। कोई काग़ज़ नहीं। बस — अंकुश यादव।"
मेरा नाम माइक से इतनी साफ़ निकला कि मैदान की धूल भी हिल गई। पीछे कोई फुसफुसाया।
"अंकुश यादव," रणवीर ने दोहराया, "आइए। मंच पर। और लाइए अपनी वो मशहूर घंटी।"
मेरा हाथ जेब में गया। घंटी बर्फ़ जैसी ठंडी थी।
मैंने एक क़दम बढ़ाया।
और फिर चारों — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — मेरे पीछे आ गए। टिंकू मेरे बगल में। पापा मेरे साथ। काजल माँ को सँभाले दाईं तरफ़।
मैंने मंच की सीढ़ी पर पैर रखा, तो गुड्डू ने धीरे से कहा, "उस्ताद, आप घबराए नहीं, हम हैं ना।"
मैंने उसका सिर थपथपाया। कुछ नहीं कहा।
मैं मंच पर पहुँचा। मंच की पहली सीढ़ी लोहे की थी, और जब मैं ऊपर पहुँचा तो मुझे एहसास हुआ कि मैदान की हवा यहाँ से अलग है — ज़्यादा ठंडी, ज़्यादा साफ़, और इस पर सफ़ेद रोशनी पड़ रही है जो नीचे किसी को नहीं मिली।
रणवीर मेरे पास आया।
और उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
जैसे कोई बड़ा भाई रखता है।
"बेटा," वो बोला, और वो शब्द उसके मुँह से उतना ही आसानी से निकला जैसे "पानी" निकलता है। "अब बजाओ अपनी घंटी।"
मैंने उसका हाथ अपने कंधे से नहीं हटाया।
मैंने जेब से घंटी निकाली।
मंच के नीचे हज़ार आँखें थीं। मैंने मीरा को देखा — कैमरा चालू, लाल बत्ती जल रही थी, और वो अपनी आँख से लगी थी। मैंने उस्ताद को देखा — आँखें बंद। इलाही भाई अपने हाथ जोड़े खड़े थे। शबनम आपा ने केतली नीचे रख दी थी।
मैंने गहरी साँस ली।
और फिर ज़ोर से बजाया।
टन।
सूखी धातु की आवाज़ — बस इतनी।
घंटी ने कुछ नहीं कहा। कोई आवाज़ नहीं आई। मैंने दो पल रुककर इंतज़ार किया, फिर वो बात याद आई — जब भी वो बोलती थी, आवाज़ मेरे कानों में पानी की तरह फैलती थी, धीमी, साफ़, जैसे कोई मेरे पास बैठकर बोल रहा हो। अब कुछ नहीं।
सिर्फ़ गरम पीतल की सतह पर रणवीर की सफ़ेद रोशनी पड़ रही थी।
मैंने फिर बजाया।
टन।
कुछ नहीं।
तीसरी बार।
टन।
यह बार आवाज़ मेरे कान में चुभी, जैसे खाली बाल्टी पर पत्थर मारा जाए।
मैंने चौथी बार नहीं बजाया। मैंने हाथ नीचे कर लिया।
मंच के नीचे पहले कोई नहीं बोला। फिर एक आवाज़ आई — किसी बूढ़ी औरत की, जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी, पर जो हर गली में होती है —
"अरे, ये तो सिर्फ़ घंटी है।"
और फिर फुसफुसाहट फैल गई। पहले चार-पाँच लोग, फिर पंद्रह, फिर तीस, फिर पूरा मैदान। कोई ज़ोर से नहीं बोल रहा था, पर हज़ार फुसफुसाहटें मिलकर एक हवा जैसी आवाज़ बनाती हैं, और वो आवाज़ — वो आवाज़ अपने आप में एक तरह का फैसला होती है।
मैंने अपने हाथ में घंटी देखी।
वो बर्फ़ जैसी ठंडी थी। न कोई गरमाहट, न कोई हलचल, न कोई धीमी साँस, जो पिछली रात मुझे सुनाई दी थी।
रणवीर ने माइक अपने मुँह के पास किया।
और उसकी मुस्कान चौड़ी हो गई — बहुत चौड़ी, इतनी चौड़ी कि उसके चेहरे पर वो बात उभर आई जो हर रणवीर की मुस्कान के पीछे होती है — ये कि वो जीत गया।
"देखा?" वो बोला, धीरे, इतना धीरे कि सिर्फ़ माइक सुन सके और सारा मैदान सुन सके। "मैंने कहा था ना। ये सिर्फ़ शोर है।"
उसने माइक से हाथ हटाया और सीधा मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो शांति थी जो सिर्फ़ उस आदमी की होती है जिसने जान-बूझकर अपने सामने खड़े आदमी को टूटता हुआ देख लिया हो।
"बेटा," उसने मेरे कंधे पर हाथ फिर रखा — इस बार थोड़ा ज़्यादा कसकर — "अब मान जाओ। घंटी में कुछ नहीं है। तुम अच्छे लड़के हो। तुम्हें बस किसी ने ग़लत समझा दिया। अब आओ, मेरे साथ मंच पर खड़े रहो, और सबको बताओ कि ये सब — ये सब एक भूल थी।"
उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो मुझे बचपन में कभी हमारी गली के उस आदमी में सुनाई देती थी, जो चौक के मोड़ पर खोमचा लगाता था और जो बच्चों को मुफ़्त बतासे देता था — और जिसे हम बाद में जान पाए कि वो बच्चों से चोरी करवाता था।
मैंने घंटी को अपनी हथेली में बंद कर लिया।
इतनी ठंडी वो थी कि मुझे अपनी उँगलियाँ नहीं समझ आईं — बस एक सख़्त पीतल, किसी अनजान शरीर की हड्डी जैसी।
मंच के नीचे फुसफुसाहट और बढ़ गई। एक आवाज़ आई — शायद किशनलाल काका की — "अंकुश, बेटा, आ जा नीचे।"
और एक तरफ़ से कोई चुपचाप मुँह फेर रहा था, मुझे दिख रहा था। उस्ताद अब भी आँख बंद किए बैठे थे — पर उनके होठ हिल रहे थे। कुछ बुदबुदा रहे थे। मैंने उनके होठों को पढ़ने की कोशिश की — पर वो इतने धीमे थे कि मैं पकड़ नहीं पाया।
मैंने रणवीर की तरफ़ देखा।
उसकी मुस्कान वही थी। चौड़ी, चिकनी, चमकती।
मैंने घंटी फिर उठाई।
रणवीर ने मुस्कुराते हुए कहा, "बजाओ, बजाओ। शौक़ से बजाओ। पाँच बार, दस बार, सौ बार। जितनी बार चाहो बजाओ, बेटा। इसमें कुछ नहीं है।"
मैंने घंटी को अपने हाथ में कसा।
और मेरे भीतर से एक आवाज़ आई — अपनी ही आवाज़, वो आवाज़ जो शायद कभी घंटी में बोलती थी, पर आज मेरे भीतर बोल रही थी, और उसने सिर्फ़ इतना कहा:
बजाओ नहीं। बोलो।
मैं रुक गया।
घंटी अब भी मेरे हाथ में सख़्त, ठंडी, चुप।
मैंने माइक की तरफ़ देखा — सफ़ेद रिबन बँधा, चमकता हुआ, मेरे सामने, इतना पास कि मैं उसके ठंडे लोहे की ठंडक अपने चेहरे पर महसूस कर रहा था।
मैंने रणवीर की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया, मुस्कुराते हुए, जैसे कोई बड़ा भाई छोटे भाई को माइक दे रहा हो।
और मैंने वही किया।
मैं माइक के पास गया।
और रणवीर की मुस्कान एक पल के लिए रुक गई — क्योंकि उसे ये उम्मीद नहीं थी।
मैं माइक के सामने खड़ा था। सफ़ेद रिबन वाला माइक मेरे मुँह से थोड़ा नीचे था, जैसे किसी ने जान-बूझकर मुझे छोटा दिखाने का इंतज़ाम किया हो।
मैंने उसे पकड़ा। लोहा ठंडा था।
मैदान में एकदम चुप्पी छा गई। उस चुप्पी में मुझे अपनी साँस सुनाई दी, दूर कहीं पानी की टंकी पर बजती धीमी टप-टप, और मेरे पीछे खड़े गुड्डू की फुसफुसाहट — "उस्ताद, धीरे बोलना।"
मैंने मुँह खोला।
"मैं घंटी के बारे में नहीं बोलूँगा।"
मेरी आवाज़ काँपी। मैंने रुककर साँस भरी।
"मैं सिर्फ़ इतना बोलूँगा कि ये घंटी मेरे पास आई कहाँ से।"
भीड़ में हलचल हुई। मैंने मीरा की तरफ़ नहीं देखा, पर मुझे पता था उसका कैमरा मेरी तरफ़ है। और मुझे पता था कि आज जो भी मैं बोलूँगा, वो किसी एक फ़ोन में, किसी एक रात में, किसी एक घर में ज़रूर पहुँचेगा।
"मेरे पापा इसी अस्पताल में अपने आख़िरी तीन महीने सोए थे।"
ये लाइन बोलते ही मेरा गला सूख गया। मैदान में कोई हिला नहीं।
"और उनके सिरहाने भी एक घंटी रखी थी। बिल्कुल ऐसी ही।"
मैंने हथेली खोली। पीली, घिसी हुई, मैली घंटी। उस पर बार-बार अँगूठे के निशान पड़ चुके थे, जैसे किसी ने सालों उसे पकड़कर रगड़ा हो।
"उस रात जब पापा गए, तो वो घंटी गायब थी। किसी ने उसे उठा लिया था। और मैं उसे ढूँढता रहा — दो साल, एक-एक गली, एक-एक दुकान, एक-एक मोहल्ला।"
मेरी आवाज़ अब नहीं काँप रही थी। ये आवाज़ मेरे भीतर से आ रही थी, वो आवाज़ जो रात में तकिये में बोलती है।
"और फिर एक औरत मेरे पास आई। जिसके हाथ में यही घंटी थी। उसने कहा कि ये मेरे पापा की है। उसने कहा कि इसे सुनो।"
मैंने भीड़ की तरफ़ देखा। सैकड़ों चेहरे, ऊपर उठी हुई ठुड्डियाँ, चमकती आँखें।
"मैंने सुना। सच में सुना। इस घंटी में किसी ने मेरा नाम बोला था।"
मैदान में एक हल्की सी आवाज़ उठी। कोई बोला, "अरे, ये तो…"
और फिर किशनलाल काका की आवाज़ आई, ऊँची, घबराई हुई — "अंकुश, बेटा, चुप हो जा।"
पर मैं चुप नहीं हुआ।
"मैं नहीं जानता वो कौन थी। मैं नहीं जानता उसे मेरा नाम कैसे पता था। पर मैं इतना जानता हूँ कि जो औरत मुझे ढूँढ रही थी, वो पागल नहीं थी। वो डर रही थी।"
मैंने उँगली उठाई।
"और ये आदमी जानता है वो क्यों डर रही थी।"
रणवीर ने एक पल इंतज़ार किया। जान-बूझकर इंतज़ार किया, इतना कि मेरी आख़िरी लाइन हवा में लटकती रहे और भीड़ उसे पचा न पाए। फिर उसने बहुत धीरे हाथ बढ़ाया और मेरे हाथ से माइक ले लिया — इतने प्यार से, जैसे कोई बड़ा भाई छोटे भाई से कोई नुकीली चीज़ छीनता हो।
"बेटा," वो बोला, और उसकी आवाज़ में नमी आ गई, "तुम्हारे पापा गए, ये दुख की बात है। भगवान उन्हें जगह दे।"
भीड़ ने सिर हिलाए। कुछ औरतों ने आँचल से आँखें पोंछीं।
"लेकिन तुम ये नहीं जानते कि उस औरत की हालत क्या थी।"
उसने हाथ उठाया। भीड़ में से एक आदमी आगे आया — सफ़ेद कोट, चश्मा, हाथ में फ़ाइल। मैंने उसे पहचाना। वो वही डॉक्टर था जो पापा के वार्ड में रोज़ आता था और कभी मेरी तरफ़ देखता भी नहीं था।
"डॉक्टर साहब," रणवीर ने कहा, "आप बताइए। सच बताइए, कोई शर्म नहीं।"
डॉक्टर ने फ़ाइल खोली और बिना मेरी तरफ़ देखे बोला, "ये औरत हमारे पुराने वार्ड की मरीज़ थी। बहुत साल। उसे लगता था कि मंदिर की घंटियाँ उससे बात करती हैं। वो मंदिरों से घंटियाँ उठा लेती थी।"
भीड़ में हँसी की एक लहर उठी। छोटी, ठंडी, बुरी हँसी।
"अब आप समझे?" रणवीर ने कहा, बिना ज़ोर दिए, बिना चिल्लाए। "इस बच्चे का दिल साफ़ है। इसके पापा गए, इसे कुछ सुनाई दिया, इसे लगा कि कोई बोल रहा है। पर सच ये है कि एक बीमार औरत ने एक दुखी बच्चे के हाथ में एक पुरानी घंटी पकड़ा दी।"
"पर उसे मेरा नाम कैसे पता था?" मैं चिल्लाया। माइक उसके हाथ में था, इसलिए मेरी आवाज़ आधी ही निकली। "बताओ ना! उसे मेरा नाम कैसे पता था?"
रणवीर ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ नहीं थी जो झूठ बोलने वाले की आँखों में होती है। उसकी आँखों में सिर्फ़ हिसाब था। जैसे कोई दुकानदार तराज़ू पर बाट रख रहा हो।
"बेटा," वो मुस्कुराया, "अस्पताल में सबको सबका नाम पता होता है।"
और भीड़ हँसी। इस बार ज़ोर से।
मैंने अपने भीतर वो आवाज़ ढूँढी जो अभी बोली थी। वो नहीं थी। दरवाज़ा बंद हो चुका था।
उस्ताद ने अचानक आँखें खोल दीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनके होठ हिले, और इस बार मैं सुन पाया। बहुत धीमे, बस इतना — "अब नहीं। अब बंद करो।"
पर मैं कुछ नहीं कर पाया।
मैंने पीछे मुड़कर देखा। गुड्डू वहीं खड़ा था, हाथ जेब में, आँखें नीची। उसने मुझे देखा और मुस्कुराने की कोशिश की, पर मुस्कान आधी बनकर टूट गई। मीरा ने कैमरा नीचे कर दिया था। वो मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसके चेहरे पर वो भाव था जो लोग अपने घरवाले के चेहरे पर तब देखते हैं जब वो ज़मीन पर गिर पड़े हों — ऊपर उठाने का नहीं, देखने का भाव।
भीड़ धीरे-धीरे बिखरने लगी। कोई अपनी चप्पल पकड़ रहा था, कोई बच्चे को कंधे पर बैठा रहा था, कोई अपने पड़ोसी से कह रहा था कि चलो, रात हो गई।
रणवीर ने माइक अपने मुँह के एकदम पास किया। उसकी मुस्कान चौड़ी हो गई — बहुत चौड़ी — और उसने धीरे से कहा, इतने धीरे कि माइक भी सिर्फ़ सुन सके और सारा मैदान भी सुन सके —
"देखा? मैंने कहा था ना। ये सिर्फ़ शोर है।"
और मेरी हथेली में घंटी बर्फ़ जैसी ठंडी हो गई।
॥
हँसी पहले चार आदमियों से शुरू हुई। फिर आठ हुए। फिर बीस। और फिर वो लहर बन गई जो मेले में पतंग के डोर की तरह एक जगह से दूसरी जगह खिंचती है।
"देखा, मैंने कहा था ना।"
"मैं तो तब ही बोल रहा था, ये लड़का सीधा नहीं है।"
"अरे, बेचारा है। बाप गया। दिमाग़ हिल गया।"
"घंटी बजाकर गली को बर्बाद करने निकला था। भगवान का शुक्र है, सच सामने आ गया।"
मैं मंच पर खड़ा था। मेरा हाथ, मेरे शरीर के साथ किसी और चीज़ का लग रहा था। मेरे कानों में भीड़ की आवाज़ आ रही थी, पर वो अंदर तक नहीं पहुँच रही थी। जैसे कोई दरवाज़े पर खड़ा हो और पीछे से बोले, और अंदर कोई न हो जो सुने।
मैंने अपनी हथेली में देखा। घंटी वहीं थी। पीतल की वही पुरानी घंटी। जिसे मैंने पहली बार छुआ था तो वो गरम थी, जैसे किसी के हाथ से आई हो। जिसने मेरे कान में पहला शब्द बोला था। जिसने रात में मुझे जगाया था। जिसके बिना मैं कभी किसी असली बात तक नहीं पहुँचा था।
अब वो बर्फ़ जैसी थी।
न सिर्फ़ ठंडी। जमी हुई। दो दिन की छुप्पी। मरे हुए जैसी।
मैंने उसे फिर हिलाया। घंटी की ज़ुबान चुप। मैंने उसे अपने माथे से लगाया। कोई आवाज़ नहीं। कोई साँस नहीं।
रणवीर ने माइक अपने मुँह के पास रखा और वो आख़िरी लाइन बोली, जो मेरे पीछे पूरे मैदान में गूँज गई।
"देखा? मैंने कहा था ना। ये सिर्फ़ शोर है।"
और तालियाँ बजीं।
नहीं, तालियाँ उसके आदमियों ने बजाईं। लेकिन जब आदमी ताली बजाते हैं, तो और आदमी भी बजा देते हैं। क्योंकि ताली बजाने में सोचना नहीं पड़ता।
फिर मैदान के दोनों कोनों से दो लड़के आगे आए। दोनों सफ़ेद कुर्ते में थे और दोनों के हाथ में बड़े सुनहरी डिब्बे थे।
"मिठाई!" एक लड़का बोला, ऐसे जैसे कुछ न हुआ हो। "आज साहब के शहर को सौगात मिली है। सब खाइए, सब खाइए।"
डिब्बे खुले और केसर और इलायची की खुशबू पूरे मैदान में फैल गई।
वो खुशबू मुझे कहीं ले गई। कहीं उस दिन, जब रणवीर गली में आया था और अपने चमकीले गोल टॉफ़ी के डिब्बे से बच्चों को टॉफ़ी दे रहा था। टिंकू ने तब पूछा था कि इसमें ज़हर तो नहीं है। मैंने तब उसको डाँटा था। आज लगा, बच्चा सही पूछ रहा था।
"अरे, ये लो भाई।" एक लड़के ने मेरी तरफ़ डिब्बा भी बढ़ा दिया, "आप भी खा लीजिए। मीठा खाइए, दिल साफ़ होगा।"
मैंने अपना हाथ पीछे खींच लिया।
उस लड़के के चेहरे में मज़ाक भी नहीं था। वो सिर्फ़ काम कर रहा था। और यही सबसे बुरा था। अपमान वो नहीं होता जिसमें गुस्सा हो। अपमान वो होता है जिसमें कोई गुस्सा भी न करे।
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
माँ वहीं, मंच के पास, पीली चुनरी और गमछे से मुँह ढके। सिर्फ़ आँखें दिख रही थीं। और उन आँखों में वो डर था जिसे मैं बचपन से पहचानता हूँ। वो डर जो माँ के चेहरे पर तब आया था जब पापा ने अंगूठा लगाया था, और जो अब कभी पूरा नहीं गया। काजल उनका हाथ पकड़े थी। काजल के होंठ हिल रहे थे, वो कुछ कह रही थी, शायद माँ को हिम्मत दे रही थी, शायद खुद को।
उस्ताद मंच के नीचे कुर्सी पर बैठे थे, आँखें बंद। उनकी उँगलियाँ अपनी लाठी पर थीं, बिल्कुल स्थिर। मैंने उन्हें कभी इतना स्थिर नहीं देखा था। इलाही भाई उनके पीछे खड़े थे और उनका हाथ उस्ताद की कुर्सी की पीठ पर था। फ़ैज़ अपनी पीतल की पेटी सीने से चिपकाए खड़ा था और उस आदमी को देख रहा था जो उसका बाप मानो आज पहली बार बना हो।
गोविंद भाई मेज़ के पास खड़े थे। उनकी मेज़ पर पुरानी फाइल, मोहरें, रसीदें और चार-पाँच पीले लिफ़ाफ़े पड़े थे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और उनका हाथ काँपकर काग़ज़ों पर रुक गया। वो आदमी कहीं जा नहीं रहा था। वो वहीं मर रहा था, खड़े-खड़े।
बबलू पांडे सबसे पीछे खड़ा था, सफ़ेद कुर्ते में, बिना चेन, बिना पानदान। उसने मिठाई का डिब्बा लेने से इनकार कर दिया और लड़के को ऐसा देखा कि लड़का अपने आप हट गया।
और टिंकू।
टिंकू पहली पंक्ति में खड़ा था, आँखें बड़ी, और उसकी मुट्ठी में कुछ था। मैंने देखा, वो मुट्ठी में क्या दबा रहा है। वो मेरा कार्डबोर्ड माइक था, जिसे उसने खुद बनाया था और जिस पर पेंसिल से लिखा था "जोड़ स्कूल"।
उसने माइक ऊपर उठाया।
"उस्ताद सच बोल रहे थे!" उसने चिल्लाया, और उसकी आवाज़ फटी हुई थी, "उस्ताद झूठ नहीं बोलते!"
किसी ने नहीं सुना।
मीरा उसके पास आई और उसका कंधा पकड़ लिया।
और तभी मैंने वो देखा जो मैंने पहले नहीं देखा था।
चंद्रेश सक्सेना मंच के सबसे दाएँ कोने पर खड़ा था। उसके हाथ में एक फ़ाइल थी, और पीछे से दो आदमी एक बड़ी लंबी शीट लेकर आ रहे थे।
"धीरे," चंद्रेश ने मुस्कुराते हुए कहा, "सँभालकर। ये सारे मोहल्ले का सपना है।"
उन्होंने शीट खोली।
और मैदान में सबसे पहले वो चित्र आया।
एक इमारत। बहुत बड़ी। बहुत साफ़। चार मंज़िल, शीशे की खिड़कियाँ, नीचे हरा मैदान, फूलों की क्यारियाँ, बच्चों के झूले, एक बड़ा पार्क, और बीच में एक चमकता हुआ फव्वारा।
नीचे मोटे अक्षरों में लिखा था — "नई शुरुआत, नए सपने।"
भीड़ आगे बढ़ी। जो लोग जाने लगे थे, वो भी रुक गए।
"देखिए," चंद्रेश ने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई ज़ोर नहीं था, सिर्फ़ मिठास थी, "यहीं, इसी ज़मीन पर। वही ज़मीन जिस पर आज एक टूटा दवाखाना खड़ा है, जहाँ करीब पंद्रह दिन में कुछ नहीं बचेगा। यहाँ बच्चों के लिए खेल का मैदान होगा। यहाँ हर गरीब के लिए मुफ़्त इलाज होगा। मुफ़्त दवा। मुफ़्त जाँच। सुबह से शाम तक काम, कोई काग़ज़ नहीं, कोई अंगूठा नहीं, कोई वकील नहीं।"
"सच?" भीड़ में से एक औरत बोली।
"सच," चंद्रेश ने कहा। "और ये सब सिर्फ़ इसलिए कि हमारे साहब ने कहा—मेरी माँ इसी बस्ती की थी।"
भीड़ में तालियाँ फिर बजीं। इस बार थोड़ी ईमानदार। और यही सबसे डरावना था। क्योंकि झूठ जब ईमानदार लगने लगे, तो सच बचता ही नहीं।
मैंने माइक की तरफ़ कदम बढ़ाया।
एक कदम। दो कदम।
"मैं सिर्फ़ एक बात कहना चाहता हूँ!" मैंने अपनी आवाज़ में जितनी ताक़त थी डाली। "ये ज़मीन—"
और माइक चुप हो गया।
मैंने देखा, मंच के पीछे खड़ा एक आदमी माइक का तार खींचकर अपनी जेब में डाल रहा था। उसने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। बस तार खींचा, जेब में डाला और एक कदम पीछे हो गया।
मैंने फिर बोला। मेरी आवाज़ निकली।
कोई नहीं सुना।
मैंने ज़ोर लगाकर चिल्लाया — "ये ज़मीऩ किसी की नहीं है! ये नूर अस्पताल की है! ये छह सौ मरीज़ों की है!"
मेरी आवाज़ मंच के पहले पाँच कदम तक गई और हवा में मर गई।
मैदान में हँसने की आवाज़ें चल रही थीं। मिठाई के डिब्बे खुल रहे थे। कोई बच्चा रो रहा था। कोई औरत अपनी साड़ी का पल्लू ठीक कर रही थी।
यही सच्चाई है ना। जब भीड़ खुश हो रही हो, तुम चिल्लाओ भी तो कौन सुनेगा।
मीरा ने अपना फोन निकाला।
"मैं लाइव करूँगी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में जो था वो मैंने पहले कभी नहीं सुना था — डर नहीं, ज़िद। "मेरे चैनल पर छह हज़ार लोग हैं। अगर ये सब उन्होंने सुना—"
उसने फोन उठाया। स्क्रीन खोली। लाइव का बटन दबाया।
और स्क्रीन पर लिखा आया — "नेटवर्क नहीं है"।
"एक मिनट," उसने कहा, और अपना हाथ ऊपर उठाया, जैसे हवा में सिग्नल ढूँढ रही हो। "एक मिनट, ये आ जाएगा।"
फिर वो रुकी।
उसने अपना सिर घुमाया।
मैदान के बाहर, पीपल की दूसरी तरफ़, जहाँ मोहल्ले का पुराना पीला टावर खड़ा था — वहाँ एक सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी।
मैंने उसे भी देखा। और मेरे भीतर कुछ ठंडा हुआ।
वो गाड़ी हमारे मैदान की तरफ़ मुँह किए खड़ी थी। उसका शीशा बंद था। और मैं शपथ खाकर कह सकता हूँ कि उस गाड़ी के भीतर कोई था। चेहरा नहीं दिख रहा था। बस एक पीतल जैसी चमक थी, फिर वो गई।
"उसने टावर पर कुछ लगवा रखा है," मीरा ने बहुत धीरे कहा, जैसे खुद से बोल रही हो। "या उसने टावर वाले आदमी को बोल दिया है। जान-बूझकर।"
"इतना भी कर सकता है क्या कोई?" मैंने पूछा।
"पैसा वाला आदमी," मीरा ने कहा, और उसने फोन अपनी जेब में रख दिया, "कुछ नहीं करता, बस एक फोन कर देता है। उसका काम वहीं ख़त्म। मरने वाला तो हम होते हैं।"
और तभी मुझे मेरे हाथ पर एक हाथ महसूस हुआ।
मैंने पीछे देखा।
पापा।
वो मेरे ठीक बगल में खड़े थे। मैंने उन्हें आते नहीं देखा। वो मंच पर पहले भी मेरे साथ खड़े थे, पर जब मैंने घंटी बजाई थी और वो चुप रही, तो मुझे लगा वो कहीं पीछे चले गए होंगे।
वो पीछे नहीं गए थे। वो वहीं थे।
उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा।
और मैं रुक गया।
क्योंकि मैंने पच्चीस साल में अपने पापा का हाथ कई बार पकड़ा था। साइकिल के हैंडल पर, औज़ार पकड़ाते वक़्त, दुकान की सीढ़ी पर। लेकिन आज उनके हाथ में कुछ और था।
ताक़त।
मैंने उनका हाथ पहचानने की कोशिश की। यही हाथ था जिसने बाईस साल एक काग़ज़ पर अंगूठा लगाया था, डर के मारे, बीवी के इलाज के लिए। यही हाथ था जो रात में सिलाई करते वक़्त काँपता था। यही हाथ था जो अब तक कभी मेरे हाथ से आगे नहीं बढ़ा था।
पर आज ये हाथ मेरे हाथ से ज़्यादा मज़बूत था।
"पापा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ टूटी, "मैं अभी—"
उन्होंने मेरा हाथ खींचा।
एक झटका। न ज़ोर वाला, न गुस्से वाला, बस एक ऐसा झटका जो किसी बच्चे को रास्ते से हटाता है जब सामने गाड़ी आ रही हो।
"चल."
बस एक शब्द।
मैं मंच की सीढ़ी की तरफ़ मुड़ा। लाल कालीन धूल भरा हुआ था। मेरा पैर उस पर फिसला और पापा ने मेरी कलाई और कसकर पकड़ ली।
नीचे उतरते वक़्त मैंने मैदान देखा। भीड़ धीरे-धीरे बिखर रही थी। कोई मिठाई का डिब्बा लेकर जा रहा था। कोई मुँह में मिठाई डालकर सिर हिला रहा था। कोई औरत कह रही थी — "अरे, अब ये लड़का भी क्या करे, बेचारा। माँ बीमार, बाप ने सच बोल दिया, अब बच्चा टूट गया।"
यही सबसे अजीब बात थी। अब वो मेरी तरफ़ नफ़रत से नहीं देख रहे थे।
वो मुझ पर तरस खा रहे थे।
और तरस, नफ़रत से ज़्यादा चुभता है।
एक बूढ़ा आदमी मेरे पास आया। वो रेडियो ठीक करने वाला बूढ़ा था, जिसकी लाठी का निचला सिरा घिसकर गोल पत्थर जैसा हो गया था। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"बेटा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ सूखी थी जैसे पुरानी लकड़ी, "तू क्या करेगा घंटी से। बेटा, यहाँ सबको रोटी चाहिए। सच कोई नहीं खरीदता।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"तू अपनी दुकान संभाल," वो बोला, "अपनी माँ की दवा देख। यहाँ काग़ज़ वालों से लड़ने के लिए ज़िंदगी देनी पड़ती है। और तेरे पास ज़िंदगी है?"
वो चला गया। लाठी टक-टक करती गई।
हम सीढ़ी की आख़िरी पायदान तक पहुँचे और तभी मुझे अपने कान के पास एक गरम साँस महसूस हुई।
रणवीर।
वो मंच के किनारे से झुककर मेरे कान के बहुत पास आ गया था। माइक दूर था। भीड़ दूर थी। बस वो था और मैं।
"बेटा," उसकी आवाज़ मधुर थी। मीठी। इस हद तक मीठी कि मेरे भीतर कुछ पलट गया। "तुझे एक बात बताऊँ? तेरी घंटी तो मेरे पास है।"
मैं जम गया।
"जो तूने आज बजाई," उसने कहा, "वो सिर्फ़ पीतल थी। उसमें जो बोलता था, वो नहीं था। वो मेरे पास है। बहुत पहले से।"
"तो फिर—" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फट गई, "तो फिर उसने सब कुछ कैसे कहा? उसने मेरा नाम कैसे बोला? उसने रातों में खटखट कैसे—"
"बेटा," उसने कहा, और उसका हाथ बहुत हल्के से मेरे कंधे पर आया, "तू मुझे क्या समझता है? मैं तेरा दुश्मन नहीं हूँ। मैं तो सिर्फ़ काम करवाता हूँ। बाकी जो तूने सुना, वो तेरा ही मन था। तेरे पापा गए, तू उनको याद कर रहा था, तेरी घंटी बजी और तूने सुन लिया।"
"झूठ!"
"और तेरे पास अब क्या बचा है?" उसने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई चीख़ नहीं थी, बिल्कुल नहीं। वो ऐसे बोल रहा था जैसे कोई मालिक अपने मुनीम से कह रहा हो कि महीने का हिसाब लगाओ। "यादव बंधु, ये टूटी साइकिल। एक दुकान जो कल तक काग़ज़ में मेरी हो जाएगी। और एक घंटी जो तेरे हाथ में है, पर जो भीतर से खाली है। बस इतना। सोच ले, बेटा। सोच ले।
उसका हाथ हटा और वो सीधा खड़ा हो गया। मैंने उसके चेहरे की तरफ़ देखा, और उस चेहरे पर कोई जीत नहीं थी। कोई शरारत नहीं। सिर्फ़ एक थकी हुई मुस्कान थी, ऐसी जैसे किसी ने सौ किताबें पढ़कर एक पन्ना फाड़ दिया हो।
"बस इतना भी मत सोच कि तू अकेला है," उसने कहा, और मुड़ गया। "एक और बात। अगली बार जो चीज़ तुझे इलाही भाई के नाम पर आएगी, वो उन्हीं की होगी। याद रखना।"
और वो मंच पर लौट गया।
मेरे पैर काँप रहे थे। पापा ने मेरा हाथ और कसकर पकड़ लिया।
"चल, बेटा।"
हम मंच से उतर गए। आधे मैदान से निकले। और तभी मेरी उँगली घंटी से टकरा गई।
पीतल। ठंडा। बर्फ़ जैसा ठंडा।
और मैंने अपनी उँगली को अपने आप पीछे खींचा।
मेरी उँगली पर एक छोटा सा फफोला था।
मैंने देखा। बहुत छोटा, मटर के दाने जितना। पर वो था। सफ़ेद किनारा और लाल बीच। जैसे किसी ने चिमटी से चमड़ी खींच ली हो।
ठंड से फफोला नहीं पड़ता।
जलने से पड़ता है।
मैंने घंटी को फिर देखा। वो वैसी ही थी। पीतल थी, पुरानी थी। कहीं से भी गरम नहीं।
फिर मुझे समझ आया।
अंदर से जो चीज़ गरम होकर बाहर आती है, वो निकल जाए, तो बाहर सिर्फ़ ठंड बचती है। और मेरी घंटी आज ठंड इसलिए थी क्योंकि उसके भीतर से सब कुछ निकल चुका था।
बर्फ़ जैसी नहीं। खोखली।
मैं वहीं खड़ा रह गया। मेरी साँस रुक गई।
और तभी पापा ने मेरा हाथ अपनी हथेली में लिया।
दोनों हाथों से। धीरे से। जैसे किसी बर्तन को ज़मीन पर रखते हैं। उन्होंने मेरी हथेली खोली, मेरी चारों उँगलियाँ ऊपर कीं, और फिर मेरे फफोले पर अपना अँगूठा बहुत हल्के से रखा।
"देखा?" उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, बहुत धीमी। "जल रही है।"
"पापा, ये ठंडी—"
"नहीं बेटा," उन्होंने कहा, "ये ठंडी नहीं। ये तेरी है।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"यही घंटी मुझे मेरे बाप ने दी थी," पापा ने कहा। "मेरे बाप को उनके बाप ने दी थी। तेरे दादा जगदीश यादव की साइकिल पर लगी थी। और मैंने इसे बाईस साल छत की कोठरी में बंद रखा। मैंने इससे बात नहीं की। मैं इससे डरता रहा। और जब वो एक दिन अपने आप बजी, तो मैंने उसे तेरे सामने रख दिया, बिना बताए कि ये क्या है।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैं डरपोक था," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ नहीं काँपी, यही सबसे अजीब था। "मुझे लगा अगर तू खुद पहचान लेगा, तो तेरा हिस्सा होगा। मैंने दिया नहीं, मैंने सिर्फ़ रख दिया। इसमें फ़र्क़ है।"
मैं रोने लगा। नहीं, रोता नहीं।
मेरी आँखों में पानी आया और मैंने उसे जाने दिया।
"ये रोने की बात नहीं है," पापा ने कहा।
"तो क्या है?"
वो मुड़े। मैदान में लोग जा रहे थे। मंच पर चंद्रेश चार्ट पर लिखी लाइनें पढ़ रहा था। भारद्वाज कंस्ट्रक्शन का लोगो हवा में झूल रहा था। शबनम आपा की बड़ी केतली अब मैदान के कोने में खाली पड़ी थी। उस्ताद कुर्सी से उठे नहीं थे। मीरा मुझे देख रही थी और उसका कैमरा नीचे लटका था, जैसे किसी मुर्दे के साथ कैमरा भी शोक मना रहा हो।
"तेरे पास जो है," पापा ने कहा, "वो किसी भी काग़ज़ से बड़ा है। तेरे पास तेरे पापा हैं। और तेरे पापा आज तक किसी सभा में नहीं बोले।"
वो मेरे सामने आए। मेरी उम्र के हिसाब से वो मुझसे छोटे लगे। झुकी कमर, टेप से बँधा चश्मा, हाथ में कोई औज़ार नहीं, कुछ नहीं। खाली हाथ।
"आज तेरी घंटी नहीं बोलेगी," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो मैंने कभी नहीं सुनी थी। "आज तेरा पापा बोलेगा। घर चल।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा।
हम मैदान से बाहर निकले, गली में मुड़े और पीपल की छाया में आए।
वहीं, चबूतरी के पास, घंटी ने मेरी जेब में एक बार हिलकर खुद को ज़रा-सा गरम किया।
सिर्फ़ एक शब्द कहा।
"अब।"
और फिर चुप हो गई।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
उन्होंने भी मेरी तरफ़ देखा।
और हम दोनों घर की तरफ़ चल दिए। पीछे मैदान में मिठाई बँट रही थी। पीपल के नीचे, अंधेरे में, एक पुरानी चबूतरी खाली पड़ी थी। और उस चबूतरी पर उस शाम के बाद पहली बार कोई नहीं बैठा।
पर गली की आवाज़ें अभी बाकी थीं।
॥
गली में लौटते वक़्त पीपल की छाया पैरों के नीचे ऐसी लगी, जैसे किसी ने गीला कपड़ा बिछा दिया हो।
मैं पापा के पीछे-पीछे चल रहा था। उनका कंधा मेरे सामने था, झुका हुआ, और उनकी चाल में वो जल्दबाज़ी नहीं थी जो आम दिनों में होती है। वो धीरे चल रहे थे। ऐसे, जैसे चलने से कहीं कुछ टूट न जाए।
मेरी जेब में घंटी थी। ठंडी। मेरी उँगली पर कपड़ा बँधा था और वो कपड़ा अब भी गरम लग रहा था, जबकि मैं जानता था कि वो गरम नहीं है। जला हुआ हिस्सा अपनी गरमी खुद बनाता है। शरीर कोई चीज़ जितनी जल्दी नहीं भूलता, उतनी जल्दी दिमाग़ नहीं भूलता।
गली के मोड़ पर दुबे अंकल की कुर्सी खाली थी। थाने के बाहर कुर्सी खाली हो, ये मैंने पहली बार देखा।
शबनम आपा की गुमटी का चूल्हा बुझा हुआ था। बड़ी केतली उन्होंने मैदान में ही छोड़ दी थी, मैंने देखा था—कोने में, खाली, ऐसे जैसे कोई बर्तन रो रहा हो।
किसी की स्कूटर गुज़री। किसी की खिड़की से टीवी की आवाज़ आई, जिसमें कोई बहुत खुश आदमी किसी बात पर हँस रहा था। दुनिया अपनी रफ़्तार से चल रही थी। उसे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि किसकी घंटी खोखली हो गई।
घर के दरवाज़े की कुंडी मैंने खुद खोली।
आँगन में बल्ब जल रहा था। पीला, थका हुआ, जैसे वो भी आज पूरी रात जागकर गुज़ार चुका हो। बल्ब के नीचे माँ की चारपाई थी, जिस पर माँ लेटी थीं। काजल पास में फ़र्श पर बैठी थी, हाथ में गीला कपड़ा, और वो कपड़ा उसने एक ही जगह पर इतनी बार दबाया था कि उसकी उँगलियाँ सूज गई थीं।
मेरे आते ही काजल ने सिर उठाया।
और मैंने उसके चेहरे पर वो चीज़ देखी जो मैंने कभी नहीं देखी थी। गुस्सा नहीं। ताना नहीं। मारने-पीटने वाली बात नहीं। सिर्फ़ डर। वो डर जो किसी के लौट आने के बाद भी नहीं जाता।
“माँ?” मैंने कहा।
“बुखार उतर रहा है,” काजल ने धीरे से कहा। “डॉक्टर इसरानी ने दवा दी थी। पी ली है। पर वो कह रही थीं कि तुम आओ तो जगाओ।”
“मैं आ गया,” मैंने कहा।
मैंने घंटी जेब से निकाली और मेज़ पर रख दी।
मेज़ पर माँ की हिसाब की कॉपी पड़ी थी। घंटी कॉपी के पास रखी, तो आवाज़ हुई। वो आवाज़ जो होती है जब कोई पीतल की चीज़ ज़मीन पर नहीं, लकड़ी पर गिरे। एक छोटी, खोखली आवाज़।
टन।
और फिर चुप्पी।
काजल ने घंटी की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।
“इससे कुछ कहो,” वो बोली।
“क्या कहूँ?”
“तुम्हें पता है।”
मैं उस चीज़ के सामने बैठ गया जो पूरी गली में मेरी सबसे बड़ी ताक़त मानी जाती थी, और जो आज एक घंटी भर पीतल थी। ठंडी। बेजान। मेरी उँगली पर जले निशान के बराबर भी गरम नहीं।
टिंकू दरवाज़े के पास खड़ा था। उसके हाथ में वो कार्डबोर्ड का माइक था जिस पर उसने पेंसिल से “जोड़ स्कूल” लिखा था। मैदान में उसने वो माइक उठाकर उस्ताद के पक्ष में कुछ कहा था। मुझे पूरी बात याद नहीं। मुझे बस याद है कि उसकी आवाज़ काँप रही थी और फिर उसने ऊपर मुझे देखा था।
अब वो उसी माइक को सीने से लगाए खड़ा था, जैसे कोई बच्चा पानी में बहते हुए लकड़ी का टुकड़ा पकड़े रहता है।
“तुम बैठो,” मैंने उससे कहा।
“उस्ताद…”
“बैठो, टिंकू।”
वो बैठ गया। फ़र्श पर। चारपाई से सटकर। उसके घुटने पर पट्टी थी और पट्टी की गाँठ खुली हुई थी।
तभी माँ ने आँखें खोलीं।
वो बुखार में थीं। मुझे उनका बुखार पता था, हाथ लगाकर नहीं, उनके चेहरे से। तेज़ बुखार में इंसान की आँखें बड़ी दिखती हैं। अंदर कुछ सिकुड़ जाता है और बाहर आँखें फैल जाती हैं। माँ की आँखें आज बड़ी थीं। और साफ़ थीं।
वो उठीं।
“माँ, आप लेटी रहो—”
“चुप।”
एक शब्द। बस एक शब्द। और काजल का हाथ पहले से माँ के कंधे पर था, पर माँ ने उसे हटा दिया।
वो चारपाई से नीचे आईं। फ़र्श पर। मेरे पास। मेरे सामने वो बैठीं, और फिर उन्होंने अपनी गोद फैलाई, और मेरा सिर पकड़कर अपनी गोद में रख लिया।
मैं चौबीस साल का आदमी हूँ।
और मैं उस वक़्त एक बच्चा था।
माँ के हाथ में बुखार की गरमी थी। उनकी साड़ी में चूल्हे की गंध थी। उनका पल्लू कमर में खोंसा हुआ था, जैसे हमेशा रहता है, और उनके माथे पर चंदन का टीका आधा मिट चुका था।
उन्होंने मेरे बालों में हाथ फेरा।
“मेरा बेटा हारा नहीं,” उन्होंने कहा। “बस थका है।”
मेरे गले में कुछ अटक गया।
“माँ, सबके सामने—”
“मुझे पता है। मैं वहीं थी। काजल के कंधे पर खड़ी थी। मुझे सब दिखा।”
“तो आपको पता है कि मैंने क्या किया।”
“तूने क्या किया?” उन्होंने पूछा।
“मैंने उन्हें मंच दिया। मैंने घंटी बजाई और वो नहीं बजी। मैंने पूरी गली को बुलाया और उन्हें हँसने का मौक़ा दे दिया।”
माँ का हाथ मेरे सिर पर रुका।
“और तूने क्या किया?” उन्होंने फिर पूछा।
“मैंने उस्ताद की दुकान दाँव पर लगा दी।”
“और?”
“मैंने सबका भरोसा…”
“और?”
मैं चुप हो गया।
“तूने अपना सब कुछ दाँव पर लगाया,” माँ ने कहा। “ये बता, उन्होंने क्या दाँव पर लगाया था जो तूने उनका भरोसा लिया? उस्ताद ने अपनी दुकान तेरे हाथ में दी थी? इलाही ने? शबनम ने? या तूने खुद सब कुछ उठाकर अपने सिर पर रख लिया?”
मैंने आँखें बंद कर लीं।
माँ का बुखार मेरे कान से सटा था, और उनकी साँस गरम थी।
“मैं डर गया था,” मैंने कहा।
“अच्छा किया। डरना चाहिए। जो नहीं डरता, वो अगली बार भी वही गलती करेगा।”
“पर मैंने…”
“अंकुश,” उन्होंने कहा, और मेरा नाम उन्होंने ऐसे लिया जैसे किसी बर्तन को थाली में धीरे से रखते हैं। “तेरे पास जो है, वो मेरे पास भी नहीं है। तेरे पास वो घंटी है। और तेरे पास वो लोग हैं जो आज भी तेरी दुकान के सामने से गुज़रते वक़्त अंदर झाँकते हैं। उन्हें हँसने दो। हँसी चार दिन की होती है। काम लंबा होता है।”
मैं उठा।
मैं नहीं जानता कि क्यों उठा। मैं नहीं जानता कि उस वक़्त मेरे अंदर क्या चल रहा था। गुस्सा था, पर किस पर, ये मुझे खुद नहीं पता था। रणवीर पर? उस पर भी नहीं। खुद पर? वहाँ भी कोई ठोस चीज़ नहीं थी जिसे पकड़कर मैं कह सकूँ, ये तेरी गलती है।
सिर्फ़ एक चीज़ थी। वो चुप्पी। वो चुप्पी जो मंच पर नहीं थी, वो चुप्पी जो मेरी जेब में थी।
मैं आँगन की दीवार के पास गया और अपनी हथेली दीवार पर मार दी।
जोर से।
पूरे ज़ोर से नहीं। पूरे ज़ोर से मारता तो हड्डी जाती। बस इतना कि आवाज़ हो जाए और अंदर का कुछ बाहर निकल जाए।
धूल उड़ी। पुरानी दीवार थी। उस पर से चूना झरा और फ़र्श पर सफ़ेद बुकनी बिखर गई।
“सब मेरी गलती है!” मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपनी ही नहीं लगी।
काजल उठी। टिंकू उठा।
“मुझे सभा में नहीं जाना चाहिए था,” मैंने कहा। “मुझे उस मंच पर नहीं चढ़ना चाहिए था। मैंने सोचा था कि अगर मैं सबके सामने खड़ा हो जाऊँगा, अगर मैं सच बोल दूँगा, तो सब अपने आप जुड़ जाएगा। मैंने सोचा था कि घंटी मेरे साथ है। मैंने सोचा था कि मैं…”
रुका।
“मैंने सोचा था कि मैं रणवीर से बड़ा हूँ,” मैंने धीरे से कहा। “बस यही। यही सच है। मुझे लगा कि मैं उससे बड़ा हूँ और मैंने मंच पर चढ़कर अपनी बात कह दी। और उसने एक आदमी बुलाया, सिर्फ़ एक आदमी, सफ़ेद कोट में, और मेरी पूरी बात हवा में उड़ गई।”
काजल ने मेरा हाथ पकड़ा। जला हुआ हाथ। मैंने झटका दिया।
“मत कर,” वो बोली।
“मैंने उस्ताद की दुकान दाँव पर लगा दी,” मैंने कहा। “तुम्हें पता है उनकी दुकान क्या है? पचास साल। पचास साल की सिलाई। उनकी माँ की पेटी उसी दुकान में है। और मैंने उसे एक शाम में एक सभा के लिए रख दिया।”
“उस्ताद ने खुद कहा था—” काजल बोली।
“उस्ताद ने क्या कहा था? उस्ताद ने कहा था कि सोच-समझकर चलना। और मैंने सुना नहीं।”
“तूने सुना था,” काजल ने कहा। उसकी आवाज़ अब कड़क हो गई थी, वो कड़क आवाज़ जो उसमें तब आती है जब वो गुस्से में होती है और गुस्से में सच बोलती है। “तूने सुना था और तूने तब भी वही किया जो करना था। क्योंकि रास्ता वही था। तू ये मत कर कि अब बैठकर अपने आपको सज़ा देने लगे। सज़ा देना सबसे आसान काम है। कोई तुझे इसके पैसे नहीं देगा।”
“काजल,” माँ ने धीरे से कहा।
“नहीं माँ,” काजल बोली। “वो अभी से शुरू हो गया है। मुझे पता है ये। ये रात भर खुद को कोसेगा, और सुबह उठेगा तो आँखें लाल होंगी और हाथ में रिंच होगी, और ये सबको यही कहेगा कि मैं ठीक हूँ। और फिर ये वही करेगा जो इसे करना है, पर अकेले। और अगली बार जब ये गिरेगा, तब कोई नहीं होगा जो इसे उठाए।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
वो सही बोल रही थी।
यही सबसे ज़्यादा चुभता है। जब कोई तुम्हारे बारे में तुमसे ज़्यादा सही बोल दे।
मैं दीवार के सहारे बैठ गया। फ़र्श पर। धूल में।
तभी मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा।
पापा वहाँ खड़े थे।
वो आँगन में नहीं आए थे। दरवाज़े की चौखट पर, बाहर की तरफ़, अंधेरे में खड़े थे। उनका एक हाथ चौखट पर था और दूसरा नीचे लटका हुआ। उनका टेप से बँधा चश्मा नाक पर था, पर वो उसे ठीक नहीं कर रहे थे।
उन्होंने मुँह खोला।
मैंने देखा कि उन्होंने मुँह खोला। होंठ हिले। हवा अंदर गई।
और आवाज़ नहीं निकली।
उन्होंने फिर कोशिश की। फिर नहीं निकली।
फिर उन्होंने मुँह बंद कर लिया और आँखें नीची कर लीं।
वो खड़े रहे। बस खड़े रहे।
माँ ने उनकी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा।
काजल ने भी नहीं कहा।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा, फिर पापा की तरफ़, फिर वापस मेरी तरफ़।
और उसी वक़्त हवा में एक आवाज़ हुई।
घंटी से नहीं।
मेज़ पर घंटी रखी थी और घंटी ने कुछ नहीं किया। मैंने उसे देखा भी। वो वहीं पड़ी थी, अपनी जगह पर, बिल्कुल स्थिर।
आवाज़ कमरे की हवा से आई।
सूखी थी। रूखी थी। जैसे कोई पुराना काग़ज़ रगड़ा जाए। जैसे कोई लकड़ी का दरवाज़ा जिसकी कुंडी सालों से नहीं खुली, उसे हवा के एक झोंके ने ज़रा-सा हिला दिया हो।
और वो आवाज़ मेरे कान में सीधी उतरी।
बाहर से नहीं। जैसे कोई मेरे सिर के अंदर, कान की हड्डी के ठीक पीछे बैठकर बोल रहा हो।
उसने कहा—
“पहले तेरा अपना टूटा रिश्ता जुड़ेगा। तब घंटी पूरी बोलेगी।”
मैं उठ खड़ा हुआ।
“कौन?” मैंने कहा। मेरी आवाज़ ज़ोर से निकली। सबने मेरी तरफ़ देखा।
“कौन सा रिश्ता?” मैंने कहा।
काजल ने मेरा कंधा पकड़ा। “अंकुश, किससे बात कर रहा है तू?”
“बोल!” मैंने कहा। “कौन सा रिश्ता?”
हवा एक पल के लिए रुकी।
और फिर वही सूखी, रूखी, काग़ज़ जैसी आवाज़ आई।
जैसे किसी ने मेरे कान में एक शब्द रख दिया हो। बहुत हल्के से। बहुत धीरे से। इतने धीरे से कि लगा मैंने खुद ही सोचा हो।
शब्द था—
“घर।”
और फिर चुप्पी।
ऐसी चुप्पी जिसमें आँगन का बल्ब भी ज़ोर से सुनाई देने लगे। बल्ब गुनगुनाता रहा। कहीं दूर गली में एक कुत्ता भौंका, दो बार, फिर चुप हो गया। किसी का टीवी बज रहा था जिसमें कोई गाना चल रहा था और फिर किसी ने उसे बंद कर दिया।
मैं धीरे से बैठ गया।
फिर से।
इस बार मैं दीवार के सहारे नहीं बैठा। मैं सीधा बैठा। और मेरी नज़र मेज़ पर रखी घंटी पर थी।
वो अब भी बर्फ़ जैसी ठंडी थी।
मैंने हाथ बढ़ाया और उसे छुआ। कुछ नहीं हुआ। न गरमी, न आवाज़।
मैंने उसे उठाया। हिलाया।
चुप।
“तूने सुना?” मैंने काजल से पूछा।
“मैंने कुछ नहीं सुना,” वो बोली। उसकी आवाज़ डर गई थी।
“टिंकू?”
टिंकू ने सिर हिलाया। नहीं।
“माँ?”
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में बुखार था और उस बुखार के पीछे कुछ और भी था। कुछ ऐसा जो पहचानता था।
“क्या कहा उसने?” माँ ने पूछा।
मैंने बताया।
मैंने पूरा बताया—वो आवाज़ कैसी थी, कहाँ से आई, क्या कहा। मैंने ये भी बताया कि वो घंटी से नहीं आई थी।
माँ ने सुनकर आँखें बंद कर लीं।
“तो फिर वो घंटी नहीं थी,” उन्होंने कहा।
“माँ, वो और क्या था?”
“मुझे नहीं पता,” उन्होंने कहा। “पर जब घर बोलता है, तब घर के अंदर से बोलता है। बाहर से नहीं।”
मैंने अपनी जली उँगली को देखा। कपड़ा उतर गया था और नीचे सफ़ेद फफोला था, जिसके किनारे लाल थे। वो अब भी दर्द कर रहा था। धीरे-धीरे, हर दिल की धड़कन के साथ।
“घर,” मैंने कहा। शब्द मुँह में अजीब लगा। “घर का कौन सा रिश्ता?”
माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।
काजल ने कोई जवाब नहीं दिया।
और पापा—वो अब भी दरवाज़े पर खड़े थे। पर अब उनका सिर उठा हुआ था। उनकी आँखें मुझ पर थीं। और मुझे कुछ ऐसा दिखा जो मैंने उनकी आँखों में पहले कभी नहीं देखा था।
वो डर नहीं था।
वो शर्म नहीं थी।
वो एक ऐसी चीज़ थी जिसका नाम मुझे उस वक़्त नहीं पता था, पर उसका असर मुझ पर सीधा हुआ। ऐसा लगा जैसे कोई मेरे सीने में हाथ डालकर कुछ ठीक कर रहा हो।
“पापा,” मैंने कहा।
उन्होंने होंठ हिलाए।
इस बार भी आवाज़ नहीं निकली।
लेकिन वो दरवाज़े की चौखट छोड़कर अंदर आए।
धीरे। एक कदम। दो कदम।
और मेरे पास आकर वो मेरे बगल में बैठ गए। फ़र्श पर। उसी जगह पर जहाँ मैं बैठा था, थोड़ी दूर, और उन्होंने अपने घुटने सीने से लगा लिए और सामने देखने लगे।
आँगन में हम पाँच लोग थे।
माँ चारपाई के किनारे बैठी थीं, हाथ में गीला कपड़ा। काजल उनके पास। टिंकू दरवाज़े के पास, कार्डबोर्ड माइक गोद में। मैं और पापा, बीच में।
और बीच में जो चीज़ बैठी थी, वो किसी इंसान से कम नहीं थी।
सन्नाटा।
पूरे आँगन में सिर्फ़ सन्नाटा बैठा था, और वो हमारे बीच में बैठा था, ठीक उसी तरह जैसे कोई तीसरा आदमी बैठता है जिसे किसी ने नहीं बुलाया और जो फिर भी चला आया।
मैंने दो बार बोलने की कोशिश की।
पहली बार: “पापा, वो काग़ज़ वाली बात…”
और पापा का हाथ रुक गया।
दूसरी बार: “पापा, आज मंच पर…”
और पापा का हाथ फिर रुक गया।
दोनों बार उनके हाथ रुके। मैंने देखा—उनका हाथ कुछ पकड़े हुए था, कोई औज़ार नहीं, कुछ नहीं। खाली था। पर रुक गया। जैसे कोई दरवाज़ा खुलते-खुलते बंद हो जाए।
फिर वो कुछ नहीं बोले।
बस वहीं बैठे रहे।
और मैंने भी कुछ नहीं बोला।
तभी माँ ने कहा, बहुत धीरे से, बुखार में भी उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो सिर्फ़ माँ के पास होती है—
“आज नहीं।”
काजल ने उनकी तरफ़ देखा।
“आज इसका दिल छोटा हो गया है,” माँ ने कहा। “बात कल सुबह।”
काजल ने सिर हिलाया।
मैंने कुछ कहना चाहा, पर माँ की आँखों ने मना कर दिया। और मैं चुप हो गया। माँ सही थीं। माँ हमेशा उस वक़्त सही होती हैं जब हम गलत होते हैं और हमें पता नहीं होता।
टिंकू ने धीरे से कहा, “उस्ताद, मैं…”
“तू घर जा,” मैंने कहा।
“मैं रुक जाऊँगा।”
“तेरी माँ तेरा इंतज़ार कर रही होगी।”
वो उठा, फिर रुका।
“उस्ताद,” उसने कहा, “आज मंच पर… मैंने जो किया, वो…”
“तूने कुछ गलत नहीं किया,” मैंने कहा।
“पर उस्ताद, मैं डर गया था। मैं वहाँ बैठा था और मैं डर गया था।”
“सब डर गए थे, टिंकू,” मैंने कहा। “मैं भी।”
वो एक पल मेरी तरफ़ देखता रहा, फिर चला गया।
दरवाज़े की कुंडी की आवाज़ आई, फिर गली में उसके पैरों की आवाज़ दूर गई।
काजल ने माँ को चारपाई पर लिटाया। माँ ने मेरी तरफ़ देखा और मैंने उन्हें देखा। और उनकी आँखों में वो बात थी जो वो कहना चाहती थीं और नहीं कह रही थीं।
काजल ने मेरे पास आकर मेरा हाथ उठाया और उस पर पट्टी बाँधी। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं। उसने कुछ नहीं कहा। बस पट्टी बाँध दी और मेरी उँगली अपने हाथ में लेकर थोड़ी देर देखती रही।
“ये निशान रहेगा,” वो बोली।
“रहने दो।”
“मैं नहीं चाहती कि तू हर बार इसे देखकर वो शाम याद करे।”
“मैं उस शाम को नहीं भूलना चाहता,” मैंने कहा।
वो उठी और अंदर चली गई। दरवाज़े पर पर्दा हिला और फिर स्थिर हो गया।
आँगन में अब मैं, पापा और माँ थे। माँ की आँखें बंद हो चुकी थीं। बुखार की दवा असर कर रही थी।
और पापा मेरे पास बैठे थे।
हम दोनों बहुत देर चुप बैठे रहे।
और उस सन्नाटे में मुझे एक अजीब बात महसूस हुई। मैंने पापा की तरफ़ नहीं देखा, पर मुझे लगा कि उनकी तरफ़ से कोई गरमी आ रही है। कोई आवाज़ नहीं। कोई शब्द नहीं। बस गरमी।
जैसे पुरानी दीवार जो दिन भर धूप में तपी हो और रात को भी गरम रहे।
मैंने धीरे से कहा, बिना उनकी तरफ़ देखे, “आप आज बहुत देर तक खड़े रहे।”
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
“मंच पर,” मैंने कहा। “आप मेरे पीछे थे।”
अब भी कुछ नहीं।
“आपने मेरा हाथ खींचा था,” मैंने कहा। “जब रणवीर माइक ले रहा था। आपने मेरा हाथ पकड़कर मुझे नीचे खींचा।”
तब उन्होंने कहा, बहुत धीरे से, जैसे कोई बहुत दूर से बोल रहा हो—
“नहीं खींचा।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“मैंने पकड़ा था,” उन्होंने कहा। “खींचा नहीं।”
मैं कुछ नहीं बोला।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, और मेरा नाम उनके मुँह से ऐसे निकला जैसे किसी पुराने संदूक की चाबी घूम गई हो। “तूने आज जो किया, वो सबके सामने किया। मैं सबके सामने कुछ नहीं कर पाया। बाईस साल में कुछ नहीं किया।”
“पापा—”
“मुझे बोलने दे,” उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ नहीं काँपी। यही सबसे अजीब था। “कल से पहले। क्योंकि कल मैं बोलूँगा, और तब मेरी बात सुनी जाएगी। आज रात मैं सिर्फ़ इतना कहना चाहता हूँ कि मुझे पता है मैं कैसा लगता हूँ। मुझे पता है तू मेरी तरफ़ देखता है और सोचता है कि ये आदमी चुप क्यों है।”
“मैं ऐसा नहीं सोचता।”
“तू सोचता है,” उन्होंने कहा। “और सोचना चाहिए। मैं चुप था। मैं चुप रहा। और चुप्पी भी एक काम है। जब तुम कुछ नहीं करते, तब भी तुम कुछ कर रहे होते हो। बस वो किसी और के फ़ायदे का होता है।”
वो उठे।
“आज रात सो जा,” उन्होंने कहा। “कल सुबह उठना है।”
वो दरवाज़े की तरफ़ गए, फिर रुके। बिना पलटे बोले—
“वो जो आवाज़ आई ना… वो घंटी से नहीं आई थी। मैंने भी सुना था। मुझे भी सुनाई दिया था।”
मैं स्तब्ध रह गया।
“आपने सुना था?”
“हाँ।”
“तो आपने कुछ कहा क्यों नहीं?”
वो पलटे।
“क्योंकि,” उन्होंने कहा, “वो मेरे कान में नहीं आई। तेरे कान में आई। और जो आवाज़ बेटे के कान में आए, उसका जवाब बाप नहीं देता।”
वो अंदर चले गए।
मैं आँगन में अकेला रह गया।
मैंने घंटी उठाई और उसे हथेली में रखा।
बर्फ़ जैसी।
फिर मैंने उसे कान के पास ले जाकर हिलाया। कुछ नहीं। मैंने उसे माथे से लगाया। कुछ नहीं।
मैंने धीरे से कहा, “घर कौन सा रिश्ता है?”
घंटी चुप रही।
पर कमरे की हवा में कुछ हिला। बहुत हल्का। जैसे किसी ने साँस ली हो और फिर रोक ली हो।
मैंने घंटी मेज़ पर रख दी और उसके पास बैठ गया।
गली की आवाज़ें अब भी बाकी थीं। कोई शटर गिरा। किसी ने पानी डाला। कहीं दूर किसी बच्चे ने माँ को पुकारा और माँ ने जवाब दिया।
मैंने अपनी कॉपी खोली और उस पर पेंसिल से एक शब्द लिखा।
घर।
और उसके नीचे एक सवालिया निशान।
फिर मैंने कॉपी बंद कर दी और अपने जले हुए हाथ को अपनी छाती पर रखकर लेट गया, आँगन के फ़र्श पर, चारपाई से दूर, जहाँ से पूरी गली दिखती है और जहाँ से आसमान दिखता है।
और सोचता रहा।
घर का कौन सा रिश्ता?
माँ? माँ से तो कोई रिश्ता टूटा ही नहीं। माँ तो वही हैं।
काजल? वो तो सबसे पहले खड़ी होती है।
पापा?
मैंने आँखें खोलीं।
ऊपर आसमान था, जिसमें एक भी तारा नहीं दिख रहा था, जैसे आज आसमान ने भी अपने तारे छिपा लिए हों।
पापा।
वो मेरे पापा थे।
और मैंने उनसे आज तक एक सीधी बात नहीं की थी। मैंने उनसे कभी नहीं पूछा कि आपको क्या हुआ था। मैंने कभी नहीं पूछा कि आप रात भर जागते क्यों हैं। मैंने कभी नहीं पूछा कि आप उस दरवाज़े से क्यों नहीं गुज़रते।
मैंने बस उन्हें चुप देखा था।
और मैंने उनकी चुप्पी को उनका स्वभाव मान लिया था।
यही टूटा हुआ था।
घर में एक दरवाज़ा था, जो बंद नहीं था, पर खुला भी नहीं था। और वो दरवाज़ा पापा के और मेरे बीच था। हम दोनों उसके दोनों तरफ़ खड़े थे, और दोनों को लग रहा था कि दूसरा तरफ़ से दरवाज़ा बंद है।
मैंने करवट बदली।
मेरी उँगली दर्द कर रही थी।
मेरे सीने में कुछ था जो बैठ नहीं रहा था।
और उस वक़्त, उसी वक़्त, मुझे मंच की वो बात याद आई जो मैं किसी को नहीं बताना चाहता था।
रणवीर ने मेरे कान में कहा था कि बोलने वाला उसके पास है।
और अगर बोलने वाला उसके पास है, तो उसने आज घंटी को क्यों चुप कराया? वो तो चाहता था कि घंटी बजे और मैं हार जाऊँ। अगर घंटी उसके पास है, तो वो मुझे बजाने देता, और फिर मुझे हरा देता।
पर उसने कुछ और किया।
उसने मेरे बोलने से पहले ही मुझे हरा दिया। उसने मुझे बोलने ही नहीं दिया।
क्यों?
क्योंकि घंटी उसके पास नहीं है।
रणवीर झूठ बोल रहा था।
और मैंने उस झूठ को सच मानकर अपने आपको हरा हुआ मान लिया।
मैं बैठ गया।
मेरे हाथ काँप रहे थे और मैं मुस्कुरा रहा था। एक अजीब सी मुस्कान। जैसे कोई बहुत देर तक अंधेरे में रस्सी खोजता रहे और फिर पता चले कि रस्सी उसके हाथ में ही है।
घंटी मेज़ पर थी।
ठंडी।
खोखली।
चुप।
पर चुप नहीं।
क्योंकि चुप तो वो होती है जो कुछ कह न सके। और ये घंटी कह रही थी। बस मेरी सुनने की बारी नहीं आई थी।
मैंने हवा में धीरे से कहा, “तू कह रही है ना? बस मेरा रास्ता बंद है।”
और हवा ने, बहुत हल्के से, मेरे कान के पीछे, कुछ कहा। मुझे पूरा नहीं सुनाई दिया। सिर्फ़ एक शब्द।
घर।
मैंने आँखें बंद कर लीं।
कल सुबह मुझे पापा से बात करनी थी। सीधी बात। वो बात जो मैंने आज तक नहीं की थी।
और उसके लिए मुझे ये भी पता था कि मुझे अपनी घंटी को बजाना होगा। नहीं तो वो कभी नहीं समझेगा कि मैं सच में उसके पास आया हूँ।
बाहर गली में एक साइकिल की घंटी बजी।
किसी और की साइकिल।
मैं मुस्कुराया।
कम से कम कोई तो बज रहा था।
॥
बाहर साइकिल की घंटी बज रही थी।
रुकती नहीं थी। बजती जाती थी, जैसे कोई रोज़ रात इसी वक़्त हमारी गली से गुज़रता है और मुझे चिढ़ाने के लिए अपनी घंटी बजाकर चला जाता है।
मैं उठकर बैठ गया। फ़र्श ठंडा था, पर मेरी पीठ गरम थी। अंदर कुछ जल रहा था और वो घंटी से नहीं, मुझसे जल रहा था।
काजल माँ की चारपाई के पास बैठी थी और माँ की कलाई पकड़े हुई थी। उसने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं, बस धीरे से बोली, "माँ सो गईं। डॉक्टर इसरानी की दवा का असर है। फ़िक्र मत कर।"
मैंने सिर हिलाया।
"तू भी सो जा। सुबह पापा से बात करनी है ना?"
मैं चौंक गया। "तूने कैसे जाना?"
"तू ज़ोर से नहीं बोला, अंकुश। तेरा चेहरा बोल रहा था।" उसने मुड़कर देखा। "और तेरी कॉपी खुली पड़ी है। उस पर घर लिखा है और नीचे एक सवालिया निशान।"
मैं हँस दिया। भारी हँसी। "तू अब पढ़ने वाली नर्स हो गई है।"
"मैं चारपाई पर सोने वाली बहन हूँ। पढ़ना मेरे हाथ की चीज़ है, तुझे बताने की ज़रूरत नहीं।"
फिर वो उठी, मेरे पास आई और बिना कुछ कहे मेरे सिर पर हाथ रख दिया।
हाथ ठंडा था। दवा, साबुन और थोड़ी सी नींद की गंध उससे आ रही थी।
"तेरी उँगली कैसी है?" उसने पूछा।
"जल रही है। अच्छा है।"
"अच्छा है?"
"हाँ। जब दर्द होता है तब पता चलता है कि हिस्सा अभी ज़िंदा है। जो दर्द नहीं करता, वो मर चुका होता है।"
काजल एक पल मेरी तरफ़ देखती रही। फिर बोली, "तू बहुत बड़ी-बड़ी बातें करने लगा है। पहले तू सिर्फ़ 'भूख लगी' बोलता था।"
"भूख भी लगी है।"
"रोटी रखी है। ठंडी हो गई होगी, पर घी ऊपर लगा है। खा ले।"
"खाऊँगा।"
वो चली गई। दरवाज़े तक गई, फिर रुकी और बिना पलटे बोली, "अंकुश, कल तूने मंच पर जो कहा, वो झूठ था ना?"
मेरे हाथ रुक गए।
"कौन सी बात?"
"वो बात। कि पापा की मृत्यु के वक़्त घंटी सिरहाने रखी थी। पापा ज़िंदा हैं। तूने 'पापा की मृत्यु' कहा था। मंच पर। सबके सामने।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
"हाँ," मैंने कहा। "सिवाय एक शब्द के, सब सच था। और वो एक शब्द मैंने जान-बूझकर नहीं कहा। ज़ुबान फिसल गई।"
"या फिर तेरे अंदर कहीं वो डर बैठा है कि पापा एक दिन चले जाएँगे और तब भी तू उनसे बात नहीं कर पाएगा।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
काजल चली गई।
मैं आँगन में अकेला रह गया, फ़र्श पर बैठा, अपनी उँगली पर बँधी पट्टी को देखता हुआ।
बाहर साइकिल वाला चला गया था। घंटी बंद हो गई थी। और उसके जाने के बाद गली इतनी चुप हो गई कि मुझे अपनी साँस की आवाज़ सुनाई देने लगी।
मैंने मेज़ से घंटी उठाई।
ठंडी थी। खोखली थी। पर मेरे हाथ में आते ही उसमें एक झुरझुरी सी हुई, जैसे कोई सोते हुए आदमी करवट बदले।
"तू सुन रही है?" मैंने धीरे से कहा। "मुझे पता है तू सुन रही है। बस मेरी तरफ़ से रास्ता बंद है।"
कोई जवाब नहीं आया।
"कल सुबह मैं पापा से बात करूँगा," मैंने कहा। "सीधी बात। आज तक जो नहीं की। और मैं तुझे साथ रखूँगा। तेरे बिना नहीं।"
इस बार भी कोई जवाब नहीं आया। पर घंटी का तापमान बदला। बर्फ़ जैसी ठंडक में एक कोना थोड़ा गुनगुना हो गया, और फिर वो भी ठंडा पड़ गया।
मैंने उसे जेब में रखा और आँखें बंद कर लीं।
नींद नहीं आई। बस आँखें बंद रहीं और दिमाग़ में एक ही बात घूमती रही।
घर। घर का कौन सा रिश्ता?
माँ से कोई रिश्ता टूटा ही नहीं था। काजल से तो कभी नहीं।
पापा।
बस पापा।
मैंने उनसे आज तक एक सीधी बात नहीं की थी। मैंने कभी नहीं पूछा कि आपको क्या हुआ। मैंने कभी नहीं पूछा कि आप रात भर क्यों जागते हैं। मैंने कभी नहीं पूछा कि आप उस बंद दरवाज़े से क्यों नहीं गुज़रते।
मैंने बस उन्हें चुप देखा था।
और मैंने उनकी चुप्पी को उनका स्वभाव मान लिया था।
यही टूटा हुआ था।
घर में एक दरवाज़ा था जो बंद नहीं था, पर खुला भी नहीं था। और वो दरवाज़ा पापा के और मेरे बीच था। हम दोनों उसके दोनों तरफ़ खड़े थे और दोनों को लग रहा था कि दूसरी तरफ़ से दरवाज़ा बंद है।
सुबह चार बजे मैं उठा।
चाय रखी। पापा का चश्मा मेज़ पर रखा था, टेप खुला हुआ।
मैंने टेप को उँगली से दबाया। चिपचिपा था। मैंने सोचा, आज टेप बदल दूँगा। फिर सोचा, नहीं। यही टेप उनका है। यही टेप उनकी आँखों की कहानी बताता है।
मैं पापा के कमरे के दरवाज़े पर गया।
दरवाज़ा खुला था।
चारपाई खाली थी।
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"पापा?"
कोई जवाब नहीं।
मैं घर के पिछले हिस्से में गया। चूल्हे के पीछे वाला दरवाज़ा बंद था। मैंने उस पर हाथ रखा। बर्फ़ जैसा। मेरी जेब में घंटी भी बर्फ़ जैसी थी।
"कहाँ हो तुम?" मैंने अपने आप से कहा।
तभी बाहर गली से आवाज़ आई। जूतों की आवाज़, फिर एक खाँसी, फिर किसी के चलने की वो खास लंगड़ी चाल।
मैं दौड़कर बाहर आया।
पापा दरवाज़े पर खड़े थे, हाथ में पानी का गिलास और एक पुराना लिफ़ाफ़ा। सुबह की ठंड में उन्होंने जैकेट नहीं पहनी थी। सिर्फ़ वही पुरानी कमीज़, जिसकी एक जेब फटी थी।
"आप कहाँ गए थे?" मेरी आवाज़ ज़्यादा ऊँची निकल गई। "इतनी सुबह? मैं डर गया था।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें थकी थीं, पर डरी नहीं थीं।
"नल पर पानी भरने गया था," उन्होंने कहा। आवाज़ धीमी, पर साफ़। "और लिफ़ाफ़ा उठाया।"
"कौन सा लिफ़ाफ़ा?"
उन्होंने लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ाया।
पीला, मैला, कोना फटा हुआ। ऊपर कुछ लिखा नहीं था। बस एक छोटी सी गोल मुहर थी, फीकी नीली।
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला।
अंदर एक काग़ज़ था। उस पर टाइप किए हुए अक्षर थे, टेढ़े-मेढ़े, जैसे पुरानी मशीन पर छपे हों।
"इस गुमटी में आने वाले हर आदमी के घर में पिछले दो महीने में कुछ टूटा है।"
बस यही एक लाइन।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
"यह कहाँ से आया?"
"तेरी दुकान के शटर के नीचे से। पत्थर दबाकर रखा था। मुझे सुबह दूध वाले ने बताया।"
मैंने लिफ़ाफ़े को पलटा। पीछे कुछ नहीं था। कोई मुहर, कोई तारीख़, कोई नाम।
"पापा, मैं आपसे एक बात पूछनी है।"
पापा रुक गए।
उन्होंने गिलास नीचे रखा। और उन्होंने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे बहुत दिनों से इस सवाल का इंतज़ार कर रहे हों।
"पूछ," उन्होंने कहा।
मेरा गला सूख गया। मैंने सोचा था कि बोलूँगा — पर जब वक़्त आया तो ज़ुबान ने जवाब दे दिया।
"पापा, आपने मुझे घंटी क्यों नहीं दी?"
पापा ने आँखें बंद कर लीं।
उनके चेहरे पर कोई झटका नहीं आया। कोई चौंक नहीं। सिर्फ़ एक थकान आई, जैसे कोई बहुत दूर तक चलकर आया हो और अब बैठना चाहता हो।
"क्योंकि मैं डर गया था," उन्होंने कहा।
बस तीन शब्द।
और मेरे अंदर कुछ टूट गया, पर अजीब तरीक़े से — टूटकर आराम मिला।
"डर किस बात का?"
"यही बात का कि तू मुझसे पूछेगा," पापा ने कहा। "और फिर मुझे सब बताना पड़ेगा।"
तभी गली के मुँह से शोर आया।
सानिया दौड़ती हुई आई, पीछे गुड्डू और रफ़ीक़। उसकी साँस फूली हुई थी और चेहरा लाल।
"उस्ताद भैया! उस्ताद की दुकान पर…"
मेरा दिल धक्क से रह गया।
"क्या हुआ?"
"नया ताला लगा है! बड़ा सा! और एक काग़ज़ भी चिपका है।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा। पापा ने गिलास उठाया और बिना कुछ कहे चलने लगे। मैं उनके पीछे दौड़ा।
रास्ते में पापा ने धीरे से कहा, "अंकुश, बात अधूरी रह गई।"
"पता है, पापा।"
"पर आज पूरी होगी।"
मैंने उनका हाथ पकड़ लिया।
और पापा ने हाथ नहीं छुड़ाया।
उस्ताद की दुकान के बाहर भीड़ लगी थी। शबनम आपा गुमटी का चूल्हा बंद करके खड़ी थीं, हाथ में लोहे की चिमटी। भोला भाई दूर से देख रहे थे, मुँह में तौलिया दबाए। इलाही और फ़ैज़ दरवाज़े के पास खड़े थे और फ़ैज़ के हाथों में वही पीतल की पेटी थी।
शटर पर एक भारी काला ताला लगा था। तेल की पतली परत उस पर चमक रही थी, जैसे अभी लगाया गया हो।
ताले से जूट की रस्सी बँधी थी और उससे एक काग़ज़ लटक रहा था।
मैंने उसे पढ़ा।
"नीलामी के कारण दुकान का कब्ज़ा नगर निगम को। दोपहर बारह बजे तक सामान हटा लो।"
नीचे एक और लाइन थी, बहुत छोटी।
"अन्यथा कार्रवाई।"
उस्ताद कुर्सी पर बैठे थे। आँखें बंद थीं। इलाही उनके पास खड़े थे और उनका कंधा पकड़े हुए थे।
"उस्ताद," मैंने कहा।
उन्होंने आँखें खोलीं।
"मैंने पचास साल इस दुकान पर सिलाई की है," उन्होंने कहा। "पहला टाँका इसी शटर के नीचे लगा था। तेरे दादा ने मेरी मशीन की सुई का पहला छेद साफ़ किया था। और आज ये लोग मेरी दुकान पर बाहर से ताला डाल रहे हैं।"
उनकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था। दर्द था। और दर्द भरी आवाज़, मुझे लगा, गुस्से से ज़्यादा डरावनी होती है।
"ताला तोड़ दूँ?" टिंकू ने कहा। वो कब आया, पता नहीं। उसके हाथ में पत्थर था।
"रख," मैंने कहा। "तोड़ने से हम ग़लत हो जाएँगे।"
"तो क्या करें?"
मैंने काग़ज़ फिर पढ़ा। टाइप किए हुए अक्षर टेढ़े थे। स्याही कुछ जगह फैली थी।
"मीरा कहाँ है?" मैंने पूछा।
"यहाँ हूँ।"
मीरा भीड़ को चीरकर आई। उसके बाल बिखरे हुए थे, कैमरा कंधे पर, और वो बिना साँस लिए काग़ज़ देखने लगी।
उसने उसे सूँघा। फिर अपनी उँगली से अक्षरों को रगड़ा।
"स्याही में कपूर की महक है," उसने कहा। "और किनारे बिल्कुल बराबर कटे हैं। नगर निगम का काग़ज़ ऐसा नहीं होता। यह चंद्रेश सक्सेना के दफ़्तार का है।"
"यानी मुहर असली है और काग़ज़ जाली," मैंने कहा।
"और तारीख़ नहीं है," इलाही ने कहा। "कानूनी काग़ज़ पर तारीख़ नहीं होती तो वो काग़ज़ नहीं, काग़ज़ का मज़ाक होता है।"
भीड़ में फुसफुसाहट फैली।
तभी दोपहर की तेज़ धूप में एक पतली छाया हमारी तरफ़ बढ़ी।
शालिनी आ रही थी।
हाथ में एक भूरा फ़ाइलनुमा लिफ़ाफ़ा था, जिसे उसने दोनों हाथों से सीने से लगाया हुआ था।
वो सीधी मेरे पास आई।
"अंकुश," उसने कहा। आवाज़ हल्की थी, पर काँप रही थी। "मुझे देर हो गई। मैं सीधे दफ़्तार से आई हूँ।"
"क्या हुआ?"
"चंद्रेश सर आज सुबह दस बजे शहर से बाहर चले गए। पर जाने से पहले उन्होंने एक आदेश छोड़ गए।" उसने लिफ़ाफ़ा खोला। "यह दुकान सिर्फ़ पहला कदम है। बारह बजे के बाद उनके आदमी मशीन लेकर आएँगे और गली के पाँच और काग़ज़ भी तैयार हैं। इसमें तुम्हारी दुकान भी है, अंकुश।"
भीड़ में सन्नाटा छा गया।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"और एक बात," शालिनी ने कहा। उसने अपनी आँखें मेरी आँखों में डालीं। "मैंने यह चुपचाप नहीं किया। मैंने उनके दफ़्तार से कुछ निकाला है।"
उसने थैले से एक मोटी सफ़ेद फाइल निकाली।
उस पर कोई नाम नहीं था। बस एक नीला गोल निशान, कोने पर।
"यह वही फाइल है," मीरा ने धीरे से कहा। "जिसकी कॉपी कल रात आई थी।"
"हाँ," शालिनी ने कहा। "पर कल रात की कॉपी में एक पन्ना नहीं था। यह वाला।"
उसने फाइल खोली।
भीतर, बाक़ी पन्नों के बीच, एक पीला पुराना पन्ना दबा हुआ था। सात बार मोड़ा हुआ, किनारों से घिसा, और उस पर नीली स्याही की लिखाई— पुरानी, घिसी, थोड़ी फैली हुई।
मैंने उसे पढ़ा।
"यह ज़मीन कभी बेची नहीं जाएगी, न गिरवी रखी जाएगी। नूर अस्पताल हमेशा रहेगा। इसका एक कमरा हमेशा गरीबों के लिए मुफ़्त रहेगा। जो इसे बदलेगा, उसका हिस्सा इस ज़मीन से हमेशा के लिए मिट जाएगा।"
नीचे तीन हस्ताक्षर थे।
पहला — शिवनारायण यादव।
दूसरा — निहाल इसरानी।
तीसरा — धुँधला, मिटा हुआ, जिसे मैं पढ़ नहीं पाया।
और उन तीन नामों के नीचे सात अंगूठे थे, गोल-गोल, लाल स्याही में, बरसों पुराने।
मेरे हाथ काँपने लगे।
"यह मेरे दादा का हाथ है," मैंने कहा।
"और यह डॉक्टर इसरानी का," शालिनी ने कहा। "तीसरा नाम किसी ने जान-बूझकर मिटाया है। पर अंगूठे नहीं मिटाए। अंगूठे मिटते नहीं, अंकुश। अंगूठे हिसाब होते हैं।"
मैंने घंटी जेब से निकाली।
और उस पल, उस पन्ने के ऊपर हाथ रखते हुए, घंटी में एक झुरझुरी हुई।
बहुत हल्की। बहुत धीमी। जैसे कोई बहुत दूर से, नींद में, मेरा नाम बोले।
"बोल," मैंने धीरे से कहा।
घंटी ने एक शब्द कहा।
"तीन।"
मैंने आँखें ऊपर कीं। शालिनी मेरी तरफ़ देख रही थी।
"तीन क्या?" उसने पूछा।
"तीन हाथ," मैंने कहा। "तीन हस्ताक्षर। और एक अधूरा।"
"तीसरा कौन है?"
मैंने घंटी को हिलाया। कुछ नहीं आया। घंटी फिर चुप हो गई।
इलाही ने आगे आकर पन्ने पर झुका हुआ नाम देखा।
"यह लिखाई…" उसकी आवाज़ रुक गई। "यह मेरे अब्बा की लिखाई जैसी है।"
"क्या?"
"मेरे अब्बा यानी इलाही बक्श। वो इस हस्ताक्षर में शामिल थे।" उसने अपनी उँगली मिटे नाम पर रखी। "पर उनका नाम यहाँ मिटाया गया है। मेरे अब्बा का नाम मिटाया गया है और उनका अंगूठा अभी भी नीचे है।"
उस्ताद कुर्सी से उठे। उन्होंने पन्ना अपने हाथ में लिया और देर तक देखा।
"यह तीसरा अंगूठा," उन्होंने कहा, "मेरे भाई का है।"
वहाँ खड़े सब लोग एक साथ साँस लेना भूल गए।
"मतलब यह ज़मीन," मीरा ने धीरे से कहा, "दादा जगदीश यादव, डॉक्टर इसरानी और इलाही बक्श, तीनों ने मिलकर अस्पताल को दी थी।"
"और यह काग़ज़," शालिनी ने कहा, "चंद्रेश सर ने जान-बूझकर छिपाया था। इसीलिए यह काग़ज़ असली फाइल में था और कॉपी में नहीं।"
तभी भीड़ के पीछे से किसी ने कहा, "दोपहर बारह बजे तक यह काग़ज़ किसी काम का नहीं। ताला लग चुका है।"
मैंने पलटकर देखा।
सफ़ेद कुर्ता, हाथ में फ़ाइल, चेहरे पर वो विनम्र मुस्कान जो मुझे अब किसी बीमारी जैसी लगती थी।
चंद्रेश का आदमी। मनोज।
"मनोज भाई," मैंने कहा। "आपने ग़लत दफ़्तार से काग़ज़ ले लिया है।"
"काग़ज़ वही होता है जो मुहर वाला हो," उसने कहा। "बाक़ी कहानियाँ पीपल के नीचे अच्छी लगती हैं पर अदालत में नहीं।"
"अदालत में काग़ज़ जाता है," मैंने कहा। "पर अदालत में इंसान भी जाता है। और आज सुबह आपने एक नहीं, दो जाली काग़ज़ लगाए हैं। एक इस दुकान पर, एक और?"
मनोज के चेहरे पर कुछ बदला। बहुत थोड़ा।
"आपकी गुमटी पर," मैंने कहा। "शबनम आपा, आपके चूल्हे के पीछे लगा कोई काग़ज़?"
शबनम आपा ने उसकी तरफ़ देखा और फिर दौड़कर गुमटी में गई।
वो एक मिनट में लौटी। उसके हाथ में एक काग़ज़ था जो स्याही में भीगा हुआ था।
"अस्थायी रूप से काम बंद," उसने पढ़ा। अपनी आवाज़ में, बिना झुके। "मेरी गुमटी। मेरे हाथ से। यह काग़ज़ सुबह नहीं था। यह अभी लगा है।"
मनोज ने कंधे उठाए। "मेरा काम काग़ज़ लगाना नहीं, काग़ज़ देखना है।"
"और जो काग़ज़ जाली है, उसे देखने वाला भी उसी जाल में आता है," शालिनी ने कहा।
वो अब मेरे साथ खड़ी थी। पीछे नहीं।
मनोज ने तीनों को देखा — शालिनी, मीरा और मुझे। फिर भीड़ को देखा, जो अब हमारे इर्द-गिर्द खड़ी थी, हमारे पीछे नहीं।
उसने अपनी फ़ाइल बंद की।
"दोपहर बारह बजे," उसने कहा। "मशीन यहाँ होगी। आप चाहे कितने काग़ज़ दिखा लें, शटर खुला नहीं मिलेगा। और अगर मिला, तो मशीन उसे गिराते वक़्त देख लेगी।"
वो मुड़ा और चला गया।
भीड़ में से कोई नहीं हिला। कोई नहीं बोला।
तभी बबलू आगे आया।
वो बिना चेन, बिना पानदान, बस सादे कुर्ते में था। उसकी आँखों में वो डर नहीं था जो पहले था। कुछ और था — शर्म।
"अंकुश," उसने कहा। "मैं वो काग़ज़ जला चुका हूँ जो साहब ने मुझे दिया था। पर मेरे पास एक और बात है।" उसने अपनी जेब से एक छोटी मुड़ी पर्ची निकाली। "यह साहब के दफ़्तार की दराज़ से है। सात काग़ज़ों वाली सूची है। उनमें से एक पर लिखा था — उस्ताद की दुकान।"
"सात काग़ज़," मीरा ने कहा। "मतलब यह सिर्फ़ हमारी गली नहीं। सात जगह।"
"और सातों का एक ही दिन," बबलू ने कहा। "आज।"
मैंने घंटी फिर जेब से निकाली।
बर्फ़ जैसी।
पर उस बर्फ़ के अंदर, बहुत दूर, एक आवाज़ थी, जो किसी ने सुनी और किसी ने नहीं।
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा। "क्या हुआ?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "बस मुझे लगा कि घंटी कुछ कह रही है।"
"क्या कह रही है?"
"मुझे नहीं पता," मैंने सच बोला। "पर इतना पता है कि वो खुश नहीं है।"
शालिनी ने धीरे से कहा, "तो फिर ठीक है। मेरे पापा भी खुश नहीं थे। खुश लोग दुकानें नहीं खोते।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें सूखी थीं, पर उनमें वो चीज़ थी जो बरसों के गुस्से के बाद आती है — एक ठंडी सी शांति।
"तुम्हारे पापा की दुकान?" मैंने पूछा।
"मेरे पापा की साइकिल मरम्मत की छोटी दुकान थी," उसने कहा। "और पीछे एक प्रेस। चंद्रेश सर ने पहले उन्हें मुफ़्त लाइसेंस का लालच दिया। फिर अंगूठा लिया। फिर साइकिल, मशीनशालिनी ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी थी। वो "मशीन" कहकर रुक गई, जैसे उस शब्द ने उसका गला पकड़ लिया हो।
मैंने इंतज़ार किया।
कुछ चीज़ें जल्दी पूछने से टूट जाती हैं। मैंने बहुत बार देखा था — किसी के टूटे हुए को जल्दी खींचने से वो और फट जाता है।
शालिनी ने अपनी कलाई पर बँधी घड़ी को देखा, जो शायद रुकी हुई थी, क्योंकि उसने देखने के बाद भी वक़्त का कोई हिसाब नहीं बताया। फिर वो बोली।
"मशीनें भी चली गईं। प्रेस की दो बड़ी मशीनें। पापा ने उन्हें अपने हाथों से खड़ा किया था, एक-एक पुर्ज़ा बाज़ार से लाकर। चंद्रेश सर ने काग़ज़ों में उन्हें गिरवी दिखा दिया। पापा ने कहा — बेटा, यह मेरी गलती है, मैंने अंगूठा लगाया। और फिर वो बैठ गए। बैठे रहे। तीन दिन। चौथे दिन डॉक्टर आए और बोले कि दिल ने हार मान ली है और अब हार नहीं सकता, इसलिए सँभलकर रहना पड़ेगा।"
मैंने पूछा, "तुम्हारे पापा अब?"
"अब वो चलते हैं। दवा लेते हैं। और रोज़ सुबह चार बजे उठकर उस खाली दुकान के सामने खड़े हो जाते हैं जो अब हमारी नहीं है। सिर्फ़ खड़े रहते हैं। कुछ नहीं करते।"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।
घंटी थी। बर्फ़ जैसी।
पर उस बर्फ़ में भी कुछ था, जो मुझे चुप नहीं रहने दे रहा था।
"तुमने मुझसे एक बात कही थी," मैंने कहा। "सफ़ेद फाइल की कॉपी।"
"हाँ।"
"कब?"
शालिनी ने चारों तरफ़ देखा। गुमटी के पीछे कोई नहीं था; शबनम आपा का चूल्हा भी उस वक़्त बंद था। सिर्फ़ भाप उठ रही थी एक बर्तन से, जिसे किसी ने ढक दिया था — जैसे उस भाप को भी किसी से नहीं मिलना है।
"आज रात नहीं," उसने कहा। "सर आज रात दफ़्तार में हैं। पर कल सुबह। सात बजे। जब वो दफ़्तार आते हैं, उनका पहला काम चाय है, दूसरा फोन और तीसरा दराज़। दराज़ के पास जाने से पहले वो आधा घंटा बैठक में बिताते हैं। मुझे वो आधा घंटा चाहिए।"
"आधा घंटा," मैंने दोहराया।
"आधा घंटा," उसने कहा। "और उस दौरान फाइल उस कमरे से बाहर होनी चाहिए। क्योंकि अगर मैं उसे वहीं कॉपी करती रही और वो लौट आए, तो…"
"तो तुम्हारी नौकरी," मैंने कहा।
"नौकरी बाद की बात है," उसने कहा। "अगर वो जान गए तो पापा की दुकान वाला काग़ज़, जो अभी उनके दराज़ में है, वो कभी नहीं मिलेगा। और पापा रोज़ चार बजे उस दुकान के सामने खड़े रहेंगे। मेरा यही नहीं जाता।"
मैंने कुछ देर उसे देखा।
फिर मैंने कहा, "ठीक है। सात बजे।"
"पर एक बात," उसने कहा। "फाइल में जो है, वो सिर्फ़ अस्पताल की ज़मीन नहीं है। उसमें और भी पन्ने हैं। गली की सात दुकानें, उस्ताद की दुकान का पुराना काग़ज़, और एक पन्ना जिस पर सिर्फ़ एक नाम है और उसके आगे एक तारीख़।"
"कौन सा नाम?"
"वो मैं नहीं पढ़ पाई," उसने कहा। "सिर्फ़ इतना दिखा कि नाम के आगे 'उस्ताद' लिखा था। और नीचे एक लाइन — 'शटर बंद, मशीन बारह बजे'।"
मेरे हाथ में पकड़ी घंटी एक झटके में हिली।
एक छोटी सी हरकत। जैसे कोई सोते हुए आदमी करवट बदले।
शालिनी ने नहीं देखा।
पर मैंने देखा।
"मुझे जाना है," मैंने कहा।
"अंकुश।"
"हाँ।"
"तुमने आज मंच पर कहा था कि घंटी… वो गायब हुई थी, तुम्हारे पापा की मृत्यु के वक़्त। सच था?"
मैंने उसकी आँखों में देखा।
"मेरे पापा ज़िंदा हैं," मैंने कहा।
"मुझे पता है," उसने कहा। "मैं मंच की बात कर रही हूँ। तुमने यह क्यों कहा?"
"क्योंकि मुझे वही बताया गया था," मैंने कहा। "और आज शाम मुझे पता चला कि जो मुझे बताया गया था, वो अधूरा था।"
शालिनी ने एक गहरी साँस ली।
"अधूरा सच," उसने कहा, "पूरे झूठ से ज़्यादा खतरनाक होता है। मेरे पापा ने भी अधूरा सच सुना था — कि लाइसेंस मुफ़्त मिलेगा।"
वो मुड़ी और चली गई।
मैं गुमटी के पीछे कुछ देर खड़ा रहा।
फिर मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली और उसे हथेली पर रखा।
वो ठंडी थी।
पर उस ठंड में एक तार था, जो खिंच रहा था।
मैंने धीरे से कहा, "तू क्या कह रही है?"
कोई जवाब नहीं।
"तू बोल," मैंने कहा। "मैं सुन रहा हूँ।"
फिर भी कोई जवाब नहीं।
पर उस वक़्त, उसी वक़्त, मुझे महसूस हुआ कि घंटी का वज़न बदल रहा है। जैसे उसके अंदर कुछ खिसक रहा हो।
मैंने उसे कान के पास लाया।
और मुझे एक आवाज़ आई।
बहुत धीमी। बहुत दूर। जैसे किसी दूसरे घर से आती हुई।
घर।
सिर्फ़ एक शब्द।
फिर चुप्पी।
मैंने घंटी जेब में रखी और तेज़ कदमों से घर की तरफ़ चल दिया।
रास्ते में पीपल आया। उसके नीचे अंधेरा था। धूल का वो चौकोर निशान अब भी था, जहाँ से मेज़-कुर्सी हटी थी, और उस निशान को देखकर मुझे लगा कि ज़मीन याद रखती है। इंसान भूल जाता है, काग़ज़ भूल जाता है, पर ज़मीन नहीं।
गली के मोड़ पर एक छाया खड़ी थी।
मैं रुका।
छाया हिली।
पापा थे।
वो अपने हाथ में एक छोटी चीज़ पकड़े थे, जिसे उन्होंने मुझे देखते ही सीने से लगा लिया।
"पापा?"
"आ जाओ," उन्होंने कहा। "घर चलो।"
हम चुपचाप चले।
उन्होंने कुछ नहीं पूछा — न मंच की बात, न शालिनी की, न घंटी की।
और मैंने भी कुछ नहीं पूछा।
पर उस वक़्त मुझे लगा कि हम दोनों एक ही रास्ते पर चल रहे हैं, और बीच में वो दरवाज़ा है, जिसे आज खोलना है।
घर पहुँचकर मैंने देखा कि माँ जाग रही थीं।
उनका बुखार उतर आया था, पर चेहरा पीला था। काजल उनके सिरहाने बैठी थी और उनके माथे पर गीला कपड़ा रख रही थी।
"आ गया," माँ ने कहा।
"आ गया," मैंने कहा।
"फिर क्या सोच रहा है?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "कल सुबह पापा से बात करनी है।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था, जो न बुखार का था, न थकान का।
"आज ही कर," उन्होंने कहा।
"आपने कहा था कि बात कल सुबह।"
"मैंने तुमसे कहा था कि मेरी बात कल सुबह," उन्होंने कहा। "पर तुम्हारे और तुम्हारे पापा के बीच की बात मेरी नहीं है। वो तुम्हारी है। और वो कल तक टालने वाली नहीं।"
काजल ने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से सिर हिलाया।
मैं बाहर आँगन में आया।
पापा चारपाई के पास बैठे थे। उनके हाथ में वही छोटी चीज़ थी — एक पुरानी पीली जिल्द वाली कॉपी, जो उन्होंने सीने से लगाकर रखी थी।
मैं उनके सामने बैठ गया।
पूरी गली सो रही थी।
सिर्फ़ दूर कहीं एक कुत्ता भौंक रहा था, और कभी-कभी पीपल की पत्तियों से कुछ गिरता था।
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली और उसे अपने और पापा के बीच फ़र्श पर रख दिया।
पापा ने घंटी देखी।
उनके हाथ काँपे।
"तुम जानते हो?" उन्होंने पूछा।
"मुझे नहीं पता कि क्या जानना है," मैंने कहा। "तुम बताओ।"
पापा ने कॉपी को सीने से हटाया और ज़मीन पर रख दिया।
फिर उन्होंने एक लंबी साँस ली।
"बाईस साल पहले," उन्होंने कहा, "जब तुम्हारी माँ अस्पताल में थीं, और मेरे पास एक भी काग़ज़ नहीं था जो रणवीर को हटा सके, तब मैं घर आया था। रात थी। मैंने उस कोठरी को देखा, जिसमें मेरे पापा का कुछ सामान रखा था। और मैंने वो कोठरी खोली। मुझे उम्मीद थी कि कहीं कुछ पैसा होगा, कहीं कुछ ऐसा होगा जो इलाज में काम आए।"
उन्होंने रुककर घंटी को देखा।
"उस कोठरी में पैसा नहीं था," उन्होंने कहा। "सिर्फ़ यह घंटी थी। और मेरे पापा का एक काग़ज़, जिस पर उनका नाम था। मैंने घंटी उठाई, और उसी वक़्त—"
वो रुके।
"उसी वक़्त क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"उसी वक़्त घंटी ने बोला," पापा ने कहा। "मुझसे। मेरे कान में। मेरे पापा की आवाज़ में नहीं, अपनी आवाज़ में।"
मेरी साँस रुक गई।
"क्या कहा?"
"कहा — तू इसे रख," पापा ने कहा। "मैं इसे लेकर नहीं जा सकती। इसे तेरा बेटा उठाएगा। और जिस दिन वो उठाएगा, उस दिन तू उसके पास खड़ा होना, पीछे नहीं।"
मैं चुप हो गया।
पापा ने अपना चश्मा उतारा, जिसकी डंडी कान पर टेप से बँधी थी, और उसे अपनी गोद में रख दिया।
"मैं उस रात डर गया," उन्होंने कहा। "मुझे लगा कि अगर यह घंटी सच में बोलती है, तो यह मेरे बेटे के साथ क्या करेगी? अगर यह मेरे बेटे से भी वही कहेगी जो मुझसे कहा, तो वो भी उसी रास्ते पर जाएगा। मैंने घंटी उठाई और उसे कोठरी के पीछे, उस पुरानी अलमारी के पीछे छिपा दिया। फिर मैं वापस अस्पताल गया और रणवीर के काग़ज़ों पर अंगूठा लगा दिया।"
उन्होंने अपनी हथेली को देखा।
"मैंने सोचा था कि एक कमज़ोरी बच्चे को बचा लेगी," उन्होंने कहा। "पर वो बच्चा मेरे बगल में ही बड़ा होता रहा और वो खुद उस कमज़ोरी से लड़ता रहा। और मैं चुप बैठा रहा।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा।
"पापा।"
"हाँ।"
"घंटी मुझे तुमसे नहीं मिली," मैंने कहा। "मुझे वो मेले में मिली। एक कबाड़ी ने बेची। उसके हैंडल पर जो खाली ब्रैकेट था, वहाँ मैंने अपनी पुरानी घंटी लगाई। फिर लगा कि यह उसी की है।"
पापा ने घंटी को देखा।
"यह उसी की है," उन्होंने कहा। "पर यह उसी दिन गई थी जिस दिन मेरे पापा गए। मैंने उसे उस रात अस्पताल ले जाकर उनके सिरहाने रख दिया था। उसके बाद वो चली गई थी। मुझे लगा कि कोई ले गया। मैंने ढूँढा नहीं। डर के मारे ढूँढा नहीं।"
मैंने घंटी को हाथ में उठाया।
वो अब उतनी ठंडी नहीं थी।
फिर भी वो बोली नहीं।
मैंने उसे बजाया।
कोई आवाज़ नहीं आई।
मैंने फिर बजाया।
कुछ नहीं।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
"पापा," मैंने कहा। "घंटी ने मुझे कल रात कहा था कि पहले घर का टूटा रिश्ता जुड़ेगा, तभी वो पूरी बोलेगी।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तो फिर," उन्होंने कहा, "हमें क्या करना है?"
मैंने एक गहरी साँस ली।
"मुझे एक बात कहनी है," मैंने कहा, "जो मैंने आज तक कभी तुमसे नहीं कही।"
"कहो।"
"मैं तुमसे नाराज़ था," मैंने कहा। "बरसों से। मुझे लगता था कि तुम चुप हो क्योंकि तुम्हें फ़र्क नहीं पड़ता। मुझे लगता था कि माँ बीमार हैं, घर टूट रहा है, और तुम चुप बैठे हो। मैंने तुम्हारी चुप्पी को तुम्हारी लापरवाही समझा।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"मैंने सोचा था कि तुम मुझे कभी यह नहीं बताओगे," उन्होंने कहा। "मैं तुम्हारे नाराज़गी को देखता था। हर रोज़। पर मैं कुछ कह नहीं पाता था, क्योंकि मुझे लगता था कि तुम सही हो।"
"मैं सही नहीं था," मैंने कहा।
"मैं भी सही नहीं था," उन्होंने कहा।
हम दोनों चुप हो गए।
फिर मैंने कहा, "पापा, मैं तुमसे एक बात कहूँ?"
"कहो।"
"तुम्हारे बिना मैं यह सब नहीं कर पाता," मैंने कहा। "अगर तुमने उस रात अपना अंगूठा नहीं लगाया होता, तो हमारे पास वो काग़ज़ होता जो रणवीर ने तुमसे छीना है। और वो काग़ज़ ही होगा जो कल उसे हराएगा। तुमने गलती की, पर उसी गलती से एक तार बना, जिससे मैं आज खींच रहा हूँ।"
पापा की आँखें भर आईं।
वो कुछ कहना चाहते थे, पर उनका गला रुक गया।
मैंने उनका हाथ पकड़ा और उनकी तरफ़ घंटी को बढ़ाया।
"अब तुम इसे छूओ," मैंने कहा।
पापा ने घंटी को छुआ।
उस वक़्त घंटी गरम हो उठी।
और उसने आवाज़ की।
एक आवाज़, जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी। न मेरी, न किसी और की। जैसे एक बूढ़ी औरत की आवाज़ हो, जो बहुत दूर से बोल रही हो।
"दो हाथ," उसने कहा। "अब दो हाथ नहीं, चार हैं।"
फिर घंटी चुप हो गई।
पर वो ठंडी नहीं थी।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
पापा मुस्कुरा रहे थे।
बरसों बाद।
और उस मुस्कान में वो चीज़ थी जो मैंने कभी नहीं देखी थी — हल्कापन।
"अब सो जाओ," उन्होंने कहा। "सुबह काम बहुत है।"
मैं लेट गया।
आँगन के फ़र्श पर।
और उस रात मुझे नींद आई, बहुत देर बाद, और उस नींद में कोई सपना नहीं था। सिर्फ़ एक आवाज़ थी, बहुत दूर की, जो कह रही थी — अब देखते हैं, अब देखते हैं।
सुबह मैं उठा तो सूरज निकल आया था और आँगन में पहले से खदबदाहट थी।
शबनम आपा की गुमटी पर चूल्हा जल चुका था। उस्ताद की दुकान से सिलाई मशीन की आवाज़ आ रही थी — टिक-टिक, टिक-टिक। इलाही भाई और फ़ैज़ ने उनके पास लाकर रखे हुए थे। पीपल पर बच्चे जुट रहे थे।
मैं उठा और मैंने देखा कि मेरे हाथ पर, जहाँ उँगली जली थी, उस पट्टी के नीचे अब दर्द नहीं था।
काजल ने मुझे चाय दी।
"आज क्या करना है?" उसने पूछा।
"सात बजे शालिनी," मैंने कहा। "दोपहर बारह बजे मशीन। इसके बीच में — कुछ।"
"क्या?"
"फाइल," मैंने कहा। "उस फाइल में सिर्फ़ ज़मीन नहीं है। उसमें उस्ताद की दुकान भी है। और जिस आदमी ने उस्ताद की दुकान को निशाना बनाया, वो मेरे पापा को भी निशाना बना चुका है। तो यह उसी आदमी का काम है।"
मैं उठा।
तभी मुझे याद आया कि चंद्रेश ने कल कहा था कि दोपहर बारह बजे मशीन उस्ताद की दुकान के सामने होगी, और शटर खुला नहीं मिलेगा।
मैंने काजल की तरफ़ देखा।
"उस्ताद का शटर अभी बंद है?"
"सुबह से खुला है," काजल ने कहा।
"तो फिर…"
मैं जूते पहनने लगा।
तभी दरवाज़े पर टिंकू आया। वो दौड़ रहा था और उसकी साँस फूली हुई थी।
"उस्ताद!" उसने चिल्लाया। "उस्ताद काका की दुकान के बाहर एक आदमी खड़ा है! हाथ में काग़ज़ है और वो… वो देख रहा है कि शटर कहाँ से खुलता है!"
मैंने उसे रोका।
"तुम ठीक हो?"
"हाँ," उसने कहा। "पर उस्ताद, वो आदमी अभी वहीं है। शबनम आपा उससे बहस कर रही हैं!"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
पापा उठ चुके थे।
"चलो," उन्होंने कहा। "देखते हैं कौन है।"
मैंने घंटी जेब में रखी।
वो गरम थी।
और जब मैंने दरवाज़ा खोला, तो पीपल के नीचे से आती सुबह की रोशनी में मुझे एक आदमी दिखा — सफ़ेद शर्ट, नीली पैंट, हाथ में लिफ़ाफ़ा।
वो मेरी तरफ़ मुड़ा।
"अंकुश यादव?" उसने पूछा।
"हाँ।"
उसने मेरी तरफ़ लिफ़ाफ़ा बढ़ाया।
"यह मेज़ पर मिला है," उसने कहा। "यह पता लिखा है।"
मैंने लिफ़ाफ़ा लिया।
ऊपर मेरा नाम नहीं था। सिर्फ़ एक लाइन थी, जिसकी स्याही अभी गीली थी।
"जो तुम्हारे पास है, उसका एक हिस्सा मेरे पास है। आज सात बजे। शालिनी के पास।"
मैंने नीचे भेजने वाले का नाम देखा।
नाम नहीं था।
सिर्फ़ दो लकीरें थीं और बीच में एक बिंदु।
जो निशान मुझे पहले भी मिला था।
चूल्हे के पीछे के दरवाज़े पर।
उस्ताद की घंटी के छल्ले पर।
और घंटी के भीतर, बहुत दूर, मुझे फिर एक आवाज़ आई।
"अब घर से बाहर।"
मैंने लिफ़ाफ़ा जेब में रखा।
और मैंने उस आदमी से, जो अभी चला नहीं था, एक सवाल पूछा।
"तुमने यह लिफ़ाफ़ा कहाँ से उठाया?"
"उस्ताद की दुकान के शटर के नीचे से," उसने कहा। "मैं वहाँ रोज़ सुबह पानी पीने जाता हूँ। आज वहाँ यह पड़ा था।"
"क्या तुमने शटर खोला?"
"नहीं," उसने कहा। "शटर बंद था।"
मैंने उसकी आँखों में देखा।
वो झूठ नहीं बोल रहा था।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
उनकी आँखें चौड़ी थीं।
"अगर शटर बंद था," मैंने कहा, "तो यह लिफ़ाफ़ा नीचे से कैसे आया?"
कोई जवाब नहीं था।
हवा रुक गई थी।
सिर्फ़ उस्ताद की सिलाई मशीन की आवाज़ आ रही थी — टिक-टिक।
और उस आवाज़ के नीचे, बहुत धीमे, एक और आवाज़ थी।
किसी के चलने की।
लकड़ी के जूते।
बहुत दूर से।
हमारी तरफ़ आ रहे थे।
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