The Mysterious Bell371 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 371: jodne wala mistri hissa 038 ep371-380

265 min read November 5, 2026

घंटी ने जो कहा, वो तीन शब्दों में था — जिससे ली है, उससे मिलाने का वक़्त आ गया।

और उसके बाद वो चुप हो गई।

मैं कुर्सी पर बैठा रहा। बाहर गुमटी की केतली खौल रही थी, कोई साइकिल बजा रहा था, दूर कहीं बच्चे क्रिकेट की बॉल पर चिल्ला रहे थे। गली अपनी रोज़ की आवाज़ों में चल रही थी।

पर मेरे अंदर सब बंद हो गया था।

मैंने घंटी निकाली। लाल खोल खोला। पीतल की सतह पर उँगली रखी तो गरम थी। फिर धीरे-धीरे ठंडी होने लगी — जैसे किसी ने हाथ हटा लिया हो।

“तू कहाँ से आई है,” मैंने धीरे से पूछा।

कोई जवाब नहीं।

“तू मेरे दादा की है या किसी और की?”

सन्नाटा।

“कम से कम इतना बता दे — जो आज शाम मुझे बुला रहा है, वो मुझसे घंटी माँगेगा या मेरा नाम?”

घंटी ने कुछ नहीं कहा। पर मैंने महसूस किया कि वो मेरी हथेली में एक बार हल्की काँपी — बिना बजे।

उस रात मैं सोया नहीं। चारपाई पर लेटा, छत की ओर देखता रहा, और सोचता रहा कि पाँच बजे मैं क्या बोलूँगा।

सुबह जब आँख खुली, तो गली बदल चुकी थी।

मुझे पहले तो कुछ समझ नहीं आया। मैंने शटर उठाया, सुबह की हवा अंदर आई, मैंने पंचर वाला टब भरा और औज़ारों का ट्रंक खोला।

फिर मैंने देखा — सामने वाले घर की आंटी, जो रोज़ सुबह मुझे “बेटा, चाय ले ले” कहती थीं, आज अपने बेटे को पीछे खींच रही थीं।

बच्चा स्कूल जा रहा था। बस्ता कंधे पर, बाल कंघी किए हुए। उसने मुझे देखा और हाथ हिलाने लगा।

“अंकुश भैया!”

आंटी ने उसका हाथ पकड़ा और इतनी ज़ोर से खींचा कि बच्चा लड़खड़ा गया।

“चल, देर हो रही है।”

“अम्मी, अंकुश भैया—”

“मैंने कहा चल।”

मैंने टब का नल बंद नहीं किया। पानी बहता रहा।

मैं वहीं खड़ा रहा, और पीछे गुमटी से शबनम आपा की आवाज़ आई — “ये क्या तमाशा है?”

आंटी ने पलटकर भी नहीं देखा।

शबनम आपा ने चिमटी मेज़ पर पटकी और मेरी तरफ़ देखा।

“कुछ बोल क्यों नहीं रहा?”

“क्या बोलूँ, आपा,” मैंने कहा। “बच्चे को मेरा नाम लेना मना है। मैं खुद का नाम बदल दूँ?”

वो हँसी नहीं। उसने सिर्फ़ मेरी तरफ़ देखा और कहा, “कुछ हुआ है।”

और हुआ था।

दस बजे तक मुझे पूरी बात समझ आ गई।

मैंने उस्ताद की दुकान की तरफ़ जाने के लिए गली पार की। पीपल के नीचे चबूतरी पर आज कोई नहीं बैठा था — ये पहली चीज़ थी जो अजीब लगी। बंसी बाबा की जगह खाली थी। रहमत बाबा की जगह खाली थी। पत्थर पर सिर्फ़ धूल और एक चाय का छूटा हुआ गिलास।

पीपल के उस पार, छोटी चाय दुकान के पास, चार-पाँच औरतें खड़ी थीं। उनकी आवाज़ें मेरे आने पर धीमी हो गईं।

मैं रुक गया। मैंने सुना।

“सुनी है, उसके पास जो भी गया, उसका घर टूट गया।”

“गोविंद भाई को देखो। कितना अच्छा आदमी था, अब रोज़ सुबह रोता हुआ अस्पताल के बाहर खड़ा मिलता है।”

“भोला भाई की दुकान का शटर? पहले कभी ऐसा हुआ था?”

“शालिनी मैडम का घर… वो लड़की इसी के चक्कर में पड़ी और सब जाने लगा।”

“और उस्ताद की दुकान?”

“उस्ताद तो बहुत पहले से जानते थे। इसीलिए अब उनकी दुकान पर भी…”

वो औरत चुप हो गई, क्योंकि मैं वहीं खड़ा था।

मैंने कोई सवाल नहीं किया। मैं आगे बढ़ गया।

पर उस एक मिनट में मेरे अंदर कुछ ऐसा हुआ जो मैं अब तक नहीं जानता था।

मैंने देखा — मैंने जिन-जिन लोगों को जोड़ा था, उन्हें उल्टा करके मेरे सामने रखा जा रहा था। गोविंद भाई का रोना, भोला भाई का आधा शटर, शालिनी का फटा हुआ घर — ये सब मेरे “काले जादू” के सबूत बन गए थे।

और सबसे दर्द की बात ये थी कि ये सबूत अचानक नहीं बने थे। इन्हें बनाया गया था। एक-एक करके। धीरे-धीरे। इतनी सफ़ाई से कि वो सच जैसे लगने लगे।

मैं उस्ताद की दुकान पहुँचा तो वो ज़मीन पर बैठे थे, चश्मा हाथ में, और उनकी सिलाई मशीन के ऊपर कपड़ा ढका था।

“उस्ताद?”

“आ जा।”

“मशीन क्यों ढकी है?”

“क्योंकि आज काम नहीं है।”

मैं बैठ गया उनके सामने।

उन्होंने चश्मा पोंछा, कान पर पेंसिल टिकाई, और मेरी तरफ़ देखा।

“दुकान पर ताला लगेगा,” उन्होंने कहा। “दो दिन में। काग़ज़ आया है। कहते हैं मकान खतरनाक है। दीवार में दरार है।”

“दरार पचास साल से है, उस्ताद। उस दीवार की उम्र आपकी दुकान से भी ज़्यादा है।”

“हाँ। पर दरार अब खतरनाक हो गई है। कल तक नहीं थी, आज हो गई।”

मैंने मुट्ठी भींच ली।

“मैं कुछ करता हूँ। मीरा को बोलता हूँ, शालिनी को—”

“बैठ।”

मैं बैठ गया।

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा और बहुत धीरे कहा, “तूने सुना नहीं क्या, गली क्या कह रही है?”

“सुन लिया।”

“और क्या सोचा?”

“सोचा कि गली गलत नहीं है,” मैंने कहा। “गली को ग़लत बताया गया है। फ़र्क़ है दोनों में।”

उस्ताद ने पहली बार हल्की मुस्कुराहट दी। “हाँ। फ़र्क़ है। और जो ये फ़र्क़ समझ ले, वो जोड़ने वाला होता है।”

फिर उनकी आवाज़ भारी हो गई।

“पर अंकुश, एक बात याद रख। जिस दिन गली किसी से डरने लगती है, वो उस दिन अपना मुँह बंद कर लेती है। और जब गली का मुँह बंद हो जाए, तो जोड़ने वाला अकेला रह जाता है। तेरी घंटी भी अकेली पड़ जाएगी।”

“घंटी तो जादू है, उस्ताद।”

“नहीं,” उन्होंने कहा। “घंटी सिर्फ़ आवाज़ है। आवाज़ वहीं गूँजती है जहाँ लोग हों। जिस दिन लोग चुप होंगे, घंटी भी चुप हो जाएगी।”

मुझे उस वक़्त उनकी बात समझ नहीं आई। मैंने सिर हिला दिया और उठ गया।

ग्यारह बजे मैंने शबनम आपा की गुमटी पर वो मंज़र देखा जो मैंने कभी नहीं देखा था।

गुमटी खुली थी, चूल्हा जल रहा था, केतली चढ़ी थी — और गुमटी के सामने कोई नहीं था।

आम दिनों में सुबह दस बजे वहाँ आठ-दस आदमी खड़े रहते थे। भोला भाई अपनी चाय लेने आते थे, उस्ताद एक कटोरी लेते थे, मज़दूर आधी छुट्टी में आते थे, बच्चे स्कूल के पहले समोसे के लिए भागते थे।

आज एक भी नहीं।

मैं बेंच पर बैठ गया।

“आपा, आज चाय?”

“क्यों?” उन्होंने पूछा। “तुझे कौन मना कर रहा है?”

“आप कर रही हैं।”

“हाँ। मैं कर रही हूँ। क्योंकि तू यहाँ बैठकर मेरी चाय नहीं पिएगा। मैं तेरी चाय लाकर खुद दे दूँगी। मेरी गुमटी पर आज नोटिस लगा है, और नोटिस में लिखा है कि जगह अवैध है। अब जो आएगा, वो तेरे पास बैठेगा तो उसका नाम भी अवैध में लिखा जाएगा।”

“आपा—”

“सुन।” उन्होंने चिमटी उठाई। “बीस दिन की बात थी। अब बीस घंटे लग रहे हैं। पर चूल्हा बंद नहीं होगा। आज कोई ग्राहक नहीं आया तो कल आएगा। और कल भी नहीं आया तो परसों। पर मैं ये कटोरी उठाकर फेंकूँगी नहीं।”

फिर उनकी आवाज़ हल्की हो गई, और उनकी आँखें भरी आईं — जो मैंने पहली बार देखा।

“अंकुश, मेरी बहन रज़िया कल से कह रही है — ये सब तेरे आने के बाद शुरू हुआ। मैंने उसे डाँट दिया। पर…” उन्होंने चिमटी नीचे रखी, “…पर जब अपने घर में ही कोई ऐसा कहे, तो सहना पड़ता है।”

मैं कुछ नहीं बोल सका।

मैंने वहाँ से उठकर चलने से पहले सिर्फ़ इतना कहा, “आपा, चूल्हा जलता रखिए। मैं आउँगा।”

“मैं जानती हूँ,” उन्होंने कहा। “पर उस दिन आना जब गली में फिर चाय की भीनी खुशबू हो, और सिर्फ़ सामोसे की बू न हो।”

दोपहर में वो हुआ जिसने मुझे तोड़ दिया।

मैं गुमटी से दुकान की तरफ़ लौट रहा था। मोड़ पर पक्का घेरा और पानी का नल है — आपको याद होगा, वही नल जहाँ रमेश भाई और नसीम भाई की सुलह हुई थी, जहाँ नई ईंट तिरछी रखकर पूरी गली का रास्ता गीला किया जाता था।

आज वहाँ दो आदमी आमने-सामने खड़े थे।

सानिया के अब्बा और गुड्डू के पापा।

“मेरी बारी में एक बाल्टी ही भरने देना था,” गुड्डू के पापा चिल्लाए।

“तुम्हारी बारी थी तो तुम दस मिनट पहले आते। नल पर तुम्हारा ठेका नहीं लगा है।”

“तुम्हारा लगा है?”

“मेरी बीवी बुखार में है, मुझे पानी चाहिए। तुम्हारी बीवी को क्या है?”

“मेरी बीवी को क्या है, वो मैं तुम्हें नहीं बताऊँगा। पर बाल्टी मेरी है और भरी हुई मेरी है।”

“भरी हुई? भरी हुई तो वो है जब पानी उसमें हो।”

मैं उनके बीच चला आया।

“भाई साहब।”

दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।

“एक बाल्टी के लिए पूरी गली गीली कर देने की क्या ज़रूरत है। मेरी दुकान पर टब भरा है, दो बाल्टी वहाँ से भर लीजिए, और वो…” मैंने ईंट उठाने को हाथ बढ़ाया।

“मत कर।”

सानिया के अब्बा की आवाज़ सख़्त थी।

“क्यों?”

“क्योंकि तुमको हाथ लगाना नहीं है,” उन्होंने कहा। “तुम्हारा हाथ लगा तो कल को फिर कहीं न कहीं दरार पड़ेगी।”

मेरा हाथ हवा में रुक गया।

“भाई साहब, ये क्या बात कर रहे हैं?”

“जो सब कह रहे हैं,” गुड्डू के पापा बोले। “मैं कुछ नहीं कहता अंकुश। पर मेरी माँ कहती है कि तुम्हारे पास जाना ठीक नहीं।”

“आपकी माँ अपनी दवा के पैसे मेरे साथ तीन महीने से जोड़ रही हैं,” मैंने कहा। और मेरी आवाज़ जितनी चाहिए थी उतनी ही रही। “तीन महीने। एक काग़ज़ नहीं लगा। एक अँगूठा नहीं लगा। सिर्फ़ भरोसा।”

“अब भरोसा नहीं रहा,” उसने कहा।

और ये वाक्य मेरे ऊपर उस तरह गिरा जैसे हम दोनों के बीच खड़ा कच्चा पत्थर का चबूतरा गिर जाए।

“अच्छा,” मैंने कहा।

मैं वहीं से मुड़ा।

“अंकुश।”

मैं रुका।

“बुरा मत मानना,” सानिया के अब्बा ने कहा। “डर हमें भी लगता है। हम भी अपने बच्चों के बारे में सोचते हैं।”

मैंने सिर हिला दिया। मैं आगे बढ़ गया।

पर मेरे भीतर कुछ बोल रहा था और वो बहुत शांत, बहुत ठंडा बोल रहा था — अंकुश, यही सब तेरे जोड़ों का इनाम है। तूने दो लोगों को जोड़ा, तूने झगड़े छुड़ाए, तूने बीसियों को एक-दूसरे से बोलने लायक बनाया। और आज तेरे ही हाथों को “न छूने” की चीज़ मान लिया गया।

चार बजे दरोगा आए।

दो खाकी आदमी, एक जीप, और पीपल के नीचे खड़ा हुआ मैं।

“ये सभा क्या है?” दरोगा ने पूछा।

“सभा नहीं है, हुज़ूर,” मैंने कहा। “ये चबूतरी है। यहाँ कभी लोग बैठते थे।”

“कभी बैठते थे। अब?”

“अब कोई नहीं बैठता।”

“तो ये चबूतरी पर रखा झंडा, ये तख़्ती, ये लोगों के नाम वाला काग़ज़?”

मैंने देखा — किसी ने जोड़ केंद्र का बोर्ड निकालकर रख दिया था, बीचोंबीच। जो बोर्ड मैंने सफ़ेद पेंट से बनाया था, जिस पर लिखा था कि टूटी चीज़ लाओ और टूटा रिश्ता साथ लाओ।

उसके नीचे एक काग़ज़ चिपका था — “बिना अनुमति सभा।”

किसने चिपकाया? मैंने पूछा नहीं। मुझे पता था।

“हुज़ूर, ये मेरी जगह नहीं है,” मैंने कहा। “ये चबूतरी गली की है। यहाँ कोई काग़ज़ नहीं लगता। यहाँ लोग बैठते हैं।”

“तो इसे हटाओ,” दरोगा ने कहा और मुड़ गए। “और सुन लो, अंकुश जी। आगे से यहाँ कोई सभा, कोई जोड़-जुगाड़, कोई काग़ज़ बाँटना — तो अगली बार कुर्सी पर बैठकर बात होगी।”

“हुज़ूर, एक बात पूछूँ?”

“पूछो।”

“ये काग़ज़ किसने लगाया?”

वो रुके। उन्होंने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर कहा, “काग़ज़ काग़ज़ है। किसने लगाया, ये मुझे नहीं पूछना। तुम हटाओ और चले जाओ।”

वो गए।

मैंने बोर्ड उठाया।

तीन टाँगों वाली टूटी मेज़ पलटी पड़ी थी। पेपर, पेंसिल, किसी का छोड़ा हुआ रुमाल, एक टूटी चूड़ी का टुकड़ा — सब धूल में।

मैंने एक-एक चीज़ उठाई।

और मुझे वो तीन महीने पहले वाला दिन याद आ गया जब मैंने पहली बार ये चबूतरी चुनी थी — इसलिए नहीं कि यहाँ जगह थी, बल्कि इसलिए कि यहाँ पीपल था, यहाँ छाया थी, और यहाँ बैठकर लोग एक-दूसरे की आवाज़ सुन सकते थे।

आज यहाँ कोई नहीं था।

सब देख रहे थे। खिड़कियों से, दरवाज़ों से, गुमटी के पीछे से, दुकानों के अंधेरे से।

कोई आया नहीं।

एक भी नहीं।

शाम छह बजे गली ऐसी चुप हो गई जैसी मैंने कभी नहीं सुनी थी।

ये वो चुप्पी नहीं थी जो रात में होती है। रात की चुप्पी में सिसकियाँ, दूर का रेडियो, किसी का खाँसना — कुछ तो होता है।

इसमें कुछ नहीं था।

माँ की रोटी बेलने की आवाज़ आज नहीं आई, क्योंकि माँ को बुख़ार था। काजल अस्पताल गई थी। उस्ताद की मशीन चुप थी। गुमटी पर केतली नहीं खौली। बच्चों की आवाज़ नहीं आई।

स्कूल की छत से पतंग नहीं उड़ी।

मैं दुकान के बाहर कुर्सी पर बैठा था और मुझे लग रहा था कि मैं अपने ही मोहल्ले में अजनबी हूँ।

तभी मैंने वो किया जो करना चाहिए था, या जो मेरी आदत थी।

मैंने जेब से घंटी निकाली।

लाल खोल खोला। पीतल की घंटी हथेली पर रखी।

“बोल,” मैंने कहा।

कुछ नहीं।

मैंने बजाया।

कोई आवाज़ नहीं आई। सिर्फ़ घंटी की आवाज़ — टन। जो हवा में मिल गई और खत्म।

“बोल।”

फिर बजाया।

फिर बजाया।

छह बार। सात बार। दस बार।

घंटी का पीतल ठंडा था। जैसे उसे अभी किसी क़ब्र से उठाया हो।

मैं उठा। दुकान के अंदर आया। शटर गिराया।

अंधेरे में बैठकर मैंने फिर बजाया। फिर बजाया।

“बोल न,” मैंने कहा, और मेरी आवाज़ टूट गई। “तू जो बोलती थी न — ‘अब मुझे भी भूख लगी है’ — वो बोल। ‘दो खाते’ बोल। ‘आधा उधार’ बोल। कुछ बोल।”

घंटी चुप रही।

और उस वक़्त मुझे डॉक्टर इसरानी की वो बात याद आई जो उन्होंने पिछले हफ़्ते अस्पताल के गलियारे में धीरे से कही थी, जब मैं उनके पास बैठा था और मेरी हिम्मत टूट रही थी।

वो सीढ़ी पर बैठे थे, बूढ़े हाथों में काग़ज़, और उन्होंने कहा था — “अंकुश, तुम्हारा ये तंत्र किसी जादू की पुस्तक से नहीं आया। ये लोगों से चला है। जिस दिन मोहल्ला जुड़ा, उस दिन घंटी बोली। जिस दिन मोहल्ला चुप हो जाएगा…”

वो रुके थे।

“तो, डॉक्टर साहब?”

“तो घंटी भी चुप हो जाएगी,” उन्होंने कहा था। “और उस दिन सबसे ज़्यादा डरना ये है कि तुम घंटी को दोष दोगे। घंटी बेज़ुबान है, इसलिए वो अपनी सफ़ाई नहीं दे सकती।”

अब, अंधेरे में बैठे, मुझे वो बात घूँसा दे रही थी।

मैंने घंटी मेज़ पर रख दी।

और मैंने पहली बार, कई महीनों में, अपने आप से एक सच्ची बात कही — “मैं अकेला नहीं कर सकता।”

जब मैंने ये बात मन में कही, तो दुकान का पीछे वाला काला बक्सा, जो गुमटी से वापस दुकान के पीछे के कमरे में रखा गया था, अपनी जगह से हिला।

मैंने आवाज़ सुनी — खट।

मैंने पीछे जाकर देखा। बक्से का ज़ंग लगा ताला झूल रहा था। न खुला, न बंद। बस झूल रहा था।

उससे कोई आवाज़ नहीं आई।

ये भी चुप था।

सात बजे काजल अस्पताल से लौटी, और उसके हाथ में दवा की थैली थी।

“दीदी ने बोला, माँ की दवा दस दिन की है। पर…” उसने थैली नीचे रखी, “…अस्पताल में आज कोई मरीज़ नहीं आया। कोई नहीं। दो दिन पहले तक पचास मरीज़ रोज़ आते थे। आज डॉक्टर साहब आँगन में अकेले बैठे थे।”

“क्यों?”

“क्योंकि गली कह रही है कि उस अस्पताल से वो लड़का जुड़ा है, जिसके पास काला जादू है।”

मैं हँसा। मैंने सच में हँसा। और फिर हँसी मेरे गले में अटक गई।

“काजल, बता,” मैंने कहा। “मैंने आज तक किसी का क्या बिगाड़ा है?”

“कुछ नहीं।”

“तो फिर?”

काजल ने मेरे बगल में बैठकर मेरा कंधा पकड़ा।

“भैया, डर का कोई हिसाब नहीं होता। डर सिर्फ़ जगह ढूँढता है। किसी ने उसे बता दिया कि जगह ये है। बस।”

आठ बजे मैं उस्ताद की दुकान से होकर गुज़रा। वो बैठे थे, और उनके सामने एक कटोरी में ठंडी चाय पड़ी थी।

“उस्ताद, आपने सुना? अस्पताल में आज—”

“सुन लिया।”

“और आपको ये सब…”

“अंकुश, बैठ।” मैं बैठ गया। “आज मुझे एक बात समझ आई है।”

“क्या?”

“रणवीर कभी मेहनत नहीं करता था। वो हमेशा लोगों को आपस में लड़ाता था, और जब लोग लड़ते थे, वो सस्ते दाम पर ज़मीन ले लेता था।” उन्होंने कटोरी हटाई। “पर आज उसने कुछ नया किया है। आज उसने लोगों को ये नहीं बताया कि वो एक-दूसरे से लड़ें। आज उसने लोगों को ये बताया कि वो तुमसे लड़ें।”

“फ़र्क़ क्या है?”

“फ़र्क़ ये है कि जब लोग एक-दूसरे से लड़ते हैं, तो हर झगड़े के बाद किसी को भरोसा चाहिए होता है — और तब तेरी ज़रूरत होती है। पर जब लोग तुझसे लड़ते हैं…” उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, “…तो उन्हें किसी पर भरोसा नहीं चाहिए होता। उन्हें सब पर शक चाहिए होता है। और जिस गली में शक हो, वहाँ जोड़ने वाला कोई नहीं होता।”

मैं चुप बैठा रहा।

“तो मैं क्या करूँ, उस्ताद?”

“आज कुछ नहीं।” उन्होंने कहा। “आज सो जा।”

“कल?”

“कल जब कोई मुझे बता देगा कि तेरे दुकान के पास खड़े होने से उसके घर में बीमारी हो गई है,” उस्ताद ने कहा, “तब तू मेरी दुकान पर आकर बैठ जाना। और चाय पीना। बिना सफ़ाई दिए।”

“इससे क्या होगा?”

“इससे ये होगा,” उन्होंने कहा, “कि गली देखेगी कि सबसे बुज़ुर्ग आदमी भी तेरे पास बैठा है। और जब सबसे बुज़ुर्ग बैठा है, तो बाकी लोगों को बैठने की हिम्मत आएगी।”

उस रात नौ बजे मेरी दुकान के बाहर एक सफ़ेद गाड़ी आकर रुकी।

मैं दुकान के अंदर था, कुर्सी पर। मैंने गाड़ी की आवाज़ पहचानी।

शीशा नीचे आया।

मैंने बाहर नहीं जाना चाहा, पर मैं उठा और दरवाज़े तक आया।

खिड़की से वही आदमी था — जो सुबह दस बजे भारद्वाज भवन का संदेश लाया था। वही बिना मुस्कुराए, वही बिना धमकी दिए।

“साहब ने आज नहीं बुलाया,” उसने कहा।

“तो?”

“साहब ने कहा, पहले तुम अपनी गली देख लो।”

मैंने कुछ नहीं कहा।

“और साहब ने ये भी कहा,” उसने आगे कहा, “कि कल से इस गली में तेरा नाम नहीं होगा। मेरा नाम होगा।”

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

“कह देना साहब से,” मैंने कहा, “कि नाम बोर्ड पर लिखा जाता है, गली में नहीं। गली में नाम लोगों की ज़ुबान पर रहता है। और ज़ुबान वो नहीं लिख सकता जो बोर्ड छापता है।”

वो एक पल मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर उसने शीशा चढ़ाया और गाड़ी चली गई।

मैं वहीं दरवाज़े पर खड़ा रहा।

दुकान के अंदर मेज़ पर घंटी पड़ी थी।

मैंने हाथ बढ़ाया, उसे उठाया, कान के पास लाया, और बजाया।

कुछ नहीं।

न आवाज़। न गरमाहट। न कँपकँपी।

सिर्फ़ पीतल की सीधी-सादी टन।

और मेरे सामने वो गली थी — साइकिल गली — जो आज पहली बार सोई नहीं, बस चुप हो गई थी।

मैंने घंटी जेब में रखी।

एक बात मैं उस रात समझ गया था, और वो ये थी — रणवीर मेरी घंटी नहीं छीनना चाहता था।

वो मेरी गली छीनना चाहता था।

क्योंकि जिस घंटी में लोगों की आवाज़ होती है, उसे तोड़ने के लिए कोई जादू नहीं चाहिए। उसे तोड़ने के लिए बस इतना काफ़ी है कि गली चुप हो जाए।

॥

उस रात मैं सोया नहीं।

चारपाई पर लेटा रहा, छत की तरफ़ देखता रहा, और घंटी मेरी जेब में पड़ी रही — ठंडी, जैसे कोई पत्थर। मैंने उसे तीन बार जेब से निकालकर देखा। हर बार वही पीतल, वही फूल खुदा हुआ, वही पुरानी चमक। और हर बार मैंने उसे कान के पास लाकर हल्का सा बजाया — टन। बस टन। कोई आवाज़ नहीं।

सुबह पाँच बजे माँ के चूल्हे की आवाज़ आई। मैं उठा, कमरे से बाहर आया, और गली में खड़ा हो गया।

गली में सुबह की वो आवाज़ नहीं थी जो मैं बचपन से सुनता आया था। न नल की छपाक, न झाड़ू की खरखर, न किसी बच्चे की चिल्लाती हुई "अम्मी, टिफ़िन दे दे"।

सिर्फ़ एक कुत्ता भौंका। और फिर वो भी चुप हो गया।

मैंने देखा — तीन घरों के दरवाज़े खुले थे, पर कोई बाहर नहीं था। सानिया की माँ कूड़ा फेंकने आई, मुझे देखा, और कूड़ा हाथ में ही लेकर अंदर चली गई। दरवाज़ा बंद। कुंडी की आवाज़। मेरे पेट में कुछ ठंडा सा गया।

तुम सोच रहे होगे कि एक कूड़ा फेंकने वाली औरत से क्या होता है। मैं बताता हूँ — पूरी गली एक औरत की तरह होती है। जब एक औरत आँख चुरा ले, तो बाकी भी सीख जाती हैं।

मैं दुकान आया, शटर उठाया, बैठ गया।

शटर उठाने की आवाज़ सुनी सिर्फ़ उस्ताद ने। वो अपनी दुकान के बाहर, छोटी स्टूल पर बैठे थे। मशीन ढकी हुई थी — सफ़ेद कपड़े से।

"उस्ताद," मैंने कहा। "मशीन क्यों ढकी है?"

वो मेरी तरफ़ देखते रहे। फिर बोले, "क्योंकि कल कोई नहीं आया।"

"आज आएगा।"

"आज कोई आएगा," उन्होंने कहा, "तो मैं कपड़ा उठा दूँगा।"

मैं उनके पास बैठ गया। दो मिनट चुप बैठे रहे। फिर मैंने धीरे से कहा, "उस्ताद, घंटी बोल नहीं रही।"

"मुझे पता है।"

"आपको कैसे पता?"

"क्योंकि आज सुबह मैंने तुम्हारे शटर की तरफ़ देखा," उन्होंने कहा, "और तुम्हारी घंटी मेरे कानों में नहीं आई। जो घंटी पाँच साल से मेरे कान में धीरे-धीरे बोलती थी, वो आज सुबह चुप थी।"

मैंने उनके हाथ की तरफ़ देखा। उनके हाथ में कैंची थी, पर वो कुछ काट नहीं रहे थे। वो बस कैंची पकड़े हुए थे, जैसे कोई चीज़ का सहारा चाहिए हो।

"कल शाम सफ़ेद गाड़ी वाला आया था," मैंने कहा।

"मैंने सुना।" उन्होंने कैंची मेज़ पर रखी। "शबनम ने बताया।"

"उसने कहा कि कल से इस गली में मेरा नाम नहीं होगा।"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा और बहुत धीरे से कहा, "अंकुश, अगर कोई आदमी तुम्हारा नाम मिटाने की बात करे, तो समझ लेना उसने मिटा दिया है। बात तब होती है जब कुछ बचता है। जो पहले से मिटा है, वो धमकी नहीं देता, वो सिर्फ़ करता है।"

मैं एक पल के लिए चुप हो गया।

"तो वो धमकी क्यों दे रहा है?"

"क्योंकि," उस्ताद ने कहा, "वो अभी खुद नहीं जानता कि गली किसकी है। और जो अपनी चीज़ पर शक करे, वो धमकी देता है।"

मैं हल्का सा मुस्कुराया। "आप ये बातें कहाँ से लाते हैं, उस्ताद?"

"सत्तर साल की दुकान से," उन्होंने कहा। "जिस दुकान पर सत्तर साल तक लोग आते-जाते रहे, वहाँ आदमी को थोड़ा-बहुत समझ में तो आ ही जाता है।"

तभी शबनम आपा की आवाज़ आई। वो गुमटी के बाहर खड़ी थीं और किसी से बहस कर रही थीं।

"भाई साहब, मैं क्या करूँ? चाय बना रही हूँ, किसी को पीनी नहीं है। समोसा तला है, कोई नहीं बैठता।"

मैं उठकर गया।

गुमटी के सामने नोटिस चिपका था। छोटा सा काग़ज़, सफ़ेद, ऊपर कोई नाम नहीं, नीचे कोई मुहर नहीं। सिर्फ़ टाइप किए हुए टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में एक लाइन — "अस्थायी रूप से काम बंद।"

"कब से?" मैंने पूछा।

"सुबह पाँच बजे, जब मैंने चूल्हा जलाया," शबनम आपा ने कहा। उनका हाथ चिमटी पर था, और चिमटी गरम थी। "मैंने ये काग़ज़ उठाया, पढ़ा, और वापस चिपका दिया।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैं इस पर से कोई नोटिस नहीं उतारना चाहती।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "जो लोग इस काग़ज़ को पढ़कर चले गए, वो कल वापस आएँगे — और देखेंगे कि काग़ज़ अब भी यहीं है। मतलब मैं डरी नहीं।"

"आपा—"

"और मैं डरी नहीं," उन्होंने दोहराया, "क्योंकि मैंने पंद्रह साल एक बात नहीं बोली थी, अंकुश। पंद्रह साल। तब मैं डरती थी। अब मैं डरना छोड़ चुकी हूँ। डरने का ज़माना जा चुका।"

उन्होंने चाय की केतली उठाई और खाली कटोरा मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"पी।"

"ग्राहक नहीं हैं, आप मेरा पैसा नहीं लेंगी—"

"आज तो कोई ग्राहक ही नहीं है," उन्होंने कहा, "तो तू ही ग्राहक है। पी।"

मैंने चाय पी।

और उसी वक़्त मुझे पीछे से एक आवाज़ सुनाई दी। एक औरत अपने बेटे का हाथ पकड़े जा रही थी, और बेटा मेरी दुकान की तरफ़ देख रहा था — वो चिंटू का दोस्त था, मुझे नाम याद नहीं, पर वो रोज़ अपनी साइकिल की घंटी बजाकर जाता था।

"मम्मी, मुझे भैया को हेलो—"

"चल।"

"पर मम्मी—"

"मैंने कहा चल!"

वो औरत मेरी तरफ़ देख भी नहीं रही थी। वो उल्टी तरफ़ देख रही थी। और यही सबसे बुरा था। जब कोई तुमसे लड़ता है, तो वो तुम्हारी तरफ़ देखता है। जब कोई तुमसे डरता है, तो वो ऐसे देखता है जैसे तुम हवा में हो।

शबनम आपा ने कटोरा मेज़ पर रखा।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "एक बात सुन।"

"कहिए।"

"आज सुबह मेरे पास दो औरतें आईं। दोनों ने कहा — शबनम, तू अपना हिसाब देख। तेरी गुमटी अंकुश की दुकान से सटी है। तेरे यहाँ कोई नहीं आता। कुछ तो गड़बड़ है।"

"और आपने क्या कहा?"

"मैंने कहा — हाँ, गड़बड़ है। मेरी गुमटी के पास एक आदमी खड़ा है जो दूसरों के घर तोड़ रहा है। उसका नाम रणवीर भारद्वाज है।"

मैंने होंठ कस लिए।

"आपा, आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए था।"

"क्यों नहीं?"

"क्योंकि अब वो लोग आपको भी उसी खाते में डाल देंगे।"

शबनम आपा ने चिमटी उठाई, और उसे पीतल की थाली पर ज़ोर से पटका। आवाज़ पूरी गली में गई।

"तो डाल दें!" उन्होंने कहा। "अंकुश, सुन। मैं पंद्रह साल अपनी बहन से नहीं बोली। पंद्रह साल मेरे घर में एक भी मेहमान नहीं आया। मैं अकेली रही, अकेली खाई, अकेली सोई। और उन पंद्रह सालों में मुझे किसी ने नहीं पूछा कि शबनम, तू ठीक है? तूने एक कौर खाया? तेरा चूल्हा जला?"

उनकी आवाज़ भारी हो गई, पर वो रुकीं नहीं।

"और पिछले महीने मेरे पास तेरी माँ आई थी — बुखार में, लाठी के सहारे, सिर्फ़ ये कहने कि शबनम, तू बेटी जैसी है। मेरे घर में कोई नहीं था। कोई नहीं था। तेरी माँ को किसने भेजा था? तूने।"

मैं चुप था।

"तो मैं तेरे साथ हूँ," उन्होंने धीमे से कहा, "चाहे गुमटी बंद हो जाए, चाहे गली में मेरा नाम मिट जाए। मैं तेरे साथ हूँ। और मेरी गुमटी का शटर उस दिन बंद होगा जिस दिन मेरा हाथ चिमटी उठाना भूल जाए।"

मैंने कुछ नहीं कहा। मैं कह भी नहीं सकता था। गला सूख रहा था।

मैंने सिर्फ़ इतना कहा, "चाय और दे दो, आपा।"

वो हँसीं। "अब बात बन रही है।"

दस बजे के करीब उस्ताद की दुकान पर एक आदमी आया।

मैं अपनी दुकान पर बैठा था, पर मैंने देखा। सफ़ेद कमीज़, हाथ में लिफ़ाफ़ा, और चाल में वो जल्दबाज़ी जो सिर्फ़ उन लोगों में होती है जो किसी और का काम करके पैसे लेते हैं।

उसने उस्ताद की दुकान के शटर पर एक काग़ज़ चिपकाया और चला गया। उस्ताद अंदर थे, और जब वो बाहर आए, तो उन्होंने काग़ज़ देखा, पढ़ा, और फिर मेरी तरफ़ मुड़े।

"उस्ताद?"

"अंकुश, आज शाम तक दुकान बंद करनी है।"

मैं उठकर गया। मैंने वो काग़ज़ पढ़ा।

दो दिन में दुकान खाली करने की बात थी, और नीचे एक छोटी लाइन — "अन्यथा कार्रवाई।"

"ये किसने भेजा?" मैंने पूछा।

"ऊपर कुछ लिखा नहीं है," उस्ताद ने कहा। "न मुहर, न तारीख़, न नाम। बस एक टाइप की हुई लाइन।"

"तो हम इसे नहीं मानेंगे।"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। "मैं इसे मानूँगा।"

"उस्ताद!"

"सुन।" उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा। "मैं इस दुकान को सत्तर साल से देख रहा हूँ। मेरे बाप ने इसे खोला, मैंने इसे चलाया, और मेरे भाई ने इसे छोड़ा। मैं जानता हूँ कि काग़ज़ झूठ बोलता है। पर अंकुश, एक बात है — मैं अब अकेला नहीं हूँ।"

"मतलब?"

"मतलब ये कि अगर मैं आज तेरे साथ लड़ने के लिए दुकान नहीं बंद करता, तो कल जब मैं इसे बंद करूँगा, तो कोई नहीं देखेगा।" उन्होंने काग़ज़ मोड़ा। "पर अगर मैं आज बंद कर दूँ, और आज शाम सबके सामने अपना ताला लगाऊँ, तो पूरी गली देखेगी कि मुझे बंद कराया गया। बस यही चाहिए।"

मैं एक पल के लिए रुका।

"आप गलत नहीं हैं," मैंने कहा।

"मुझे पता है," उन्होंने कहा। "सत्तर साल में सीखा है।"

दोपहर में स्कूल के गेट पर भीड़ थी।

मैं वहाँ नहीं जाना चाहता था। पर मीरा का फोन आया — "आ जा, कुछ हो रहा है" — और मैं गया।

स्कूल के गेट के बाहर आठ-दस अभिभावक खड़े थे। चार बच्चे बैग लटकाए खड़े थे, और सानिया उनमें से एक थी। उसके पिता अपना हाथ पकड़े खड़े थे।

"सानिया, चल," वो बोले।

"अब्बा, मुझे टिफ़िन—"

"चल, मैंने कहा।"

मैं आगे बढ़ा। "सानिया के अब्बा—"

"तुम रुको।" उन्होंने हाथ उठाया, पर मेरी तरफ़ देखा नहीं। "तुमसे बात नहीं करनी।"

"मैं सिर्फ़ पूछ रहा हूँ—"

"मैं क्या पूछूँ, अंकुश?" अब उन्होंने देखा। "मैं क्या पूछूँ? कल सुबह मेरी बीवी ने कहा — हमारे घर की बकरी क्यों मरी? मैंने कहा, बकरी बीमार थी। उसने कहा, बकरी अंकुश की गली में बंधी थी। मैंने कहा, बकरी अंकुश की गली में नहीं, अपने घर में बंधी थी। उसने कहा, फिर भी।"

"सानिया के अब्बा—"

"तुम बताओ, मैं अपनी औरत को क्या जवाब दूँ?" उनकी आवाज़ भारी थी। "मैं पढ़ा-लिखा आदमी नहीं हूँ। मैं नहीं जानता जादू होता है या नहीं। मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ कि रात को जब मेरी बच्ची सोती है, तो मैं उसका माथा छूकर देखता हूँ कि बुखार तो नहीं।"

मैं चुप हो गया।

"तुम्हारे पास जवाब है?" उन्होंने पूछा।

मेरे पास जवाब नहीं था। सच में नहीं था। मैं कह सकता था कि जादू नहीं होता, पर मैं झूठ नहीं बोल सकता था। तंत्र होता है। घंटी होती है। तंत्र है, और वो अभी चुप है।

मैंने सिर्फ़ इतना कहा, "मुझे नहीं पता कि बकरी क्यों मरी। पर मुझे इतना पता है कि मैंने किसी की बकरी नहीं मारी।"

"यही तो दिक्कत है," वो बोले। "तुम भी यही कहते हो, और वो भी यही कहता है।"

"कौन?"

"जो कल शाम मेरे घर आया था।" उन्होंने कहा। "सफ़ेद कुर्ता पहने, बैग लिए। बोला — भाई, मैं तुम्हारे बच्चे के भविष्य की बात करने आया हूँ। बोला — तुम्हारी बच्ची रोज़ उस दुकान के पास से गुज़रती है न? वहाँ कुछ ठीक नहीं है। बोला — हम चाहें तो तुम्हारी बच्ची के लिए स्कॉलरशिप करा दें।"

मेरे पेट में फिर वही ठंडा सा उठा।

"आपने क्या कहा?"

"मैंने कहा — मेरी बच्ची को स्कॉलरशिप नहीं चाहिए। मुझे बस इतना चाहिए कि तुम्हारी बकरी ज़िंदा रहे।" उन्होंने अपनी बच्ची का हाथ कस लिया। "और अब जब बकरी मर गई, तो मुझे लग रहा है कि उस आदमी की बात में कुछ तो है।"

मैंने सानिया की तरफ़ देखा। वो अपने अब्बा का हाथ पकड़े खड़ी थी, और उसकी आँखों में पानी था। वो मेरी तरफ़ देख रही थी, और मैं देख सकता था कि वो मुझसे कुछ कहना चाहती है — माफ़ी, या कोई खबर, या सिर्फ़ ये कि "मैं आपके साथ हूँ भैया।"

पर वो चुप थी। क्योंकि बच्चों को सिखाया जाता है कि जब बड़े बोल रहे हों, तो बोलना नहीं।

"सानिया," मैंने कहा। "टिफ़िन खा लेना। ठंडा न हो जाए।"

उसने होंठ कस लिए और सिर हिला दिया।

मैं वहाँ से चला आया। यही सबसे ज़्यादा चुभता है — जब तुम्हारी तरफ़दारी करने वाला भी तुम्हारी तरफ़ देख न सके।

शाम को नल पर झगड़ा हुआ।

मैं उस वक़्त दुकान पर बैठा था, और मुझे बाहर से आवाज़ आई — "बाल्टी मेरी थी!" और दूसरी आवाज़ — "तेरी थी तो नाम लिखा था क्या?"

मैं दौड़कर गया।

मोड़ के नल पर सानिया के अब्बा और गुड्डू के पापा आमने-सामने खड़े थे। बीच में एक लोहे की बाल्टी पड़ी थी, आधी भरी। पानी गली में फैल रहा था, और दोनों के पैर कीचड़ में थे।

"ये बाल्टी मेरी है!" गुड्डू के पापा बोले।

"मेरी है!" सानिया के अब्बा बोले। "मैंने सुबह इसमें पानी भरा था!"

"तो मैंने भरा था, तो तेरी हो गई?"

"तू रोज़ मेरी बाल्टी उठा लेता है!"

"तेरे नाम की मुहर लगी है क्या?"

दोनों एक-दूसरे पर झपटे।

मैं बीच में आ गया।

"रुको!" मैंने हाथ बीच में डाला। "रुको, भाई साहब, बात सुनो—"

और तभी दोनों मेरी तरफ़ मुड़े।

"तू हट!" सानिया के अब्बा ने कहा।

"तू यहाँ से जा!" गुड्डू के पापा ने कहा। "तेरे कारण ही सब हो रहा है!"

मैं ठिठक गया।

"मेरे कारण?"

"हाँ, तेरे कारण!" गुड्डू के पापा बोले। "तेरे आने से पहले हम इस गली में भाई-भाई की तरह रहते थे। किसी को कोई काग़ज़ नहीं चाहिए था, किसी को कोई मुहर नहीं चाहिए थी। और अब?" उन्होंने हाथ फैलाया। "अब हर आदमी के पास एक काग़ज़ है और एक शक।"

"और ये बाल्टी?" मैंने धीमे से पूछा।

"ये बाल्टी?" गुड्डू के पापा ने मेरी तरफ़ देखा, और पहली बार उनकी आवाज़ में कुछ फटा। "ये बाल्टी मेरी बीवी की थी, अंकुश। हमारी शादी में मिली थी। और अब सानिया के अब्बा कहते हैं कि ये उनकी है।"

सानिया के अब्बा ने कुछ कहना चाहा, पर गुड्डू के पापा ने उन्हें रोक दिया।

"नहीं, तू सुन। मैं नहीं कहता कि तू झूठा है। मैं कहता हूँ कि मुझे अब याद नहीं कि मैंने ये बाल्टी कब खरीदी थी। तुझे याद है?"

सानिया के अब्बा चुप हो गए।

"देखा?" गुड्डू के पापा ने मेरी तरफ़ देखा। "यही हो रहा है। पहले हम जानते थे कि किसकी चीज़ कौन सी है। अब हमें शक होता है। और जिस दिन शक होने लगे, उस दिन बाल्टी किसी की नहीं रहती।"

मैंने वो बाल्टी उठाई। मैंने उसके नीचे देखा। नीचे तले पर कोई नाम नहीं था। पर किनारे पर एक जगह रगड़ी हुई थी, जहाँ कुछ लिखा था और मिट गया था।

"यहाँ कुछ लिखा था," मैंने कहा।

दोनों झुककर देखने लगे।

"मुझे नहीं दिख रहा," सानिया के अब्बा बोले।

"मुझे भी नहीं," गुड्डू के पापा बोले।

मैंने गीली मिट्टी उँगली से पोंछी। सिर्फ़ दो अक्षर बचे थे — जो न पूरा नाम बनाते थे, न कोई मतलब।

"अब क्या?" सानिया के अब्बा ने पूछा।

मैं एक पल चुप रहा।

"ये बाल्टी," मैंने कहा, "तुम दोनों में से किसी की भी रह सकती है। और दोनों की भी। क्योंकि गली की चीज़ें ऐसी ही होती हैं — किसी एक की नहीं होतीं, सबकी होती हैं।"

"ये फ़िलॉसफ़ी नहीं चाहिए," किसी ने पीछे से कहा।

मैं मुड़ा। पीछे तीन-चार औरतें खड़ी थीं, और सबसे आगे वो औरत थी जिसने सुबह अपने बेटे को खींचा था।

"तुम फ़िलॉसफ़ी मत दो," उसने कहा। "हमें सिर्फ़ इतना बताओ कि तुम्हारी दुकान के पास से गुज़रने वाले बच्चों को क्या होता है?"

"कुछ नहीं होता।"

"तो ये काग़ज़ क्या है?" उसने अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला। "कल रात मेरे दरवाज़े के नीचे से आया। इसमें लिखा है कि तुम्हारे पास आने वाले घरों में बीमारी आती है।"

मैंने वो काग़ज़ लिया। पढ़ा। कोई मुहर नहीं। कोई तारीख़ नहीं। सिर्फ़ टाइप किए हुए अक्षर।

"ये झूठ है," मैंने कहा।

"ये झूठ है या नहीं, ये तुम बताओगे?" उसने पूछा। "तुम कौन हो?"

मैं कौन हूँ।

अच्छा सवाल था। मैं कौन हूँ? एक साइकिल मिस्त्री, जिसके पास एक घंटी है जो अब बोलती नहीं। एक लड़का, जिसके पिता ने पाँच साल पहले अंगूठा लगाया और कभी नहीं बताया। एक आदमी, जिसकी गली आज उससे आँख नहीं मिला रही।

"मैं वही हूँ," मैंने कहा, "जो कल तक था।"

"कल तक तुम सिर्फ़ साइकिल ठीक करते थे," उसने कहा। "अब तुम कुछ और भी करते हो। हमें नहीं पता क्या। और जो हमें नहीं पता, वो हमें नहीं चाहिए।"

वो मुड़ी और चली गई। और बाकी औरतें भी।

बाल्टी वहीं पड़ी रही। और उसे उठाने वाला कोई नहीं था।

शाम सात बजे के करीब पुलिस आई।

दो सिपाही और एक दरोगा — तीन जीपें नहीं, एक जीप। पर जीप में से उतरे चार आदमी। उनके हाथ में एक काग़ज़ था, और उस काग़ज़ पर एक बड़ी सी मुहर।

"ये किसका है?" दरोगा ने पीपल के नीचे रखी मेज़ की तरफ़ इशारा किया।

मैं आगे आया। "मेरा है।"

"तुम कौन?"

"अंकुश यादव। साइकिल मिस्त्री।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर काग़ज़ पढ़ा, फिर बोले, "ये जगह सार्वजनिक है। बिना अनुमति यहाँ बोर्ड लगाना, लोगों को बुलाना, सभा करना — ये अवैध है। तीन दिन में हटाओ।"

"हम कोई सभा नहीं—"

"मैंने पढ़ लिया," उन्होंने कहा। "तुम बोलना बंद करो और सुनो। काग़ज़ हमारे पास आया है। हम काग़ज़ से चलते हैं।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"किसका काग़ज़?"

"तुम्हें इससे मतलब नहीं।"

"पर मैं जानना चाहता हूँ—"

"बेटा," दरोगा ने धीमे से कहा, और उनकी आवाज़ में अचानक थकान आ गई, "मैं तुम्हें एक बात बताता हूँ। मैं तीस साल से यही कर रहा हूँ। रोज़ शाम को मेरे पास चार काग़ज़ आते हैं और मैं उन पर मुहर लगाता हूँ। जिस दिन मैं मुहर नहीं लगाता, उस दिन मेरे बच्चे का स्कूल फ़ीस नहीं जाता। और तुम मुझसे पूछ रहे हो कि किसका काग़ज़ है।"

मैं चुप हो गया।

"मेज़ हटाओ," उन्होंने कहा। "बोर्ड उतारो। और कल से यहाँ कुछ नहीं।"

वो मुड़े और जाने लगे। फिर रुके और बिना पलटे बोले, "और बेटा, एक बात याद रखना। आज जो काग़ज़ मेरे पास आया है, कल वही काग़ज़ तुम्हारे नाम पर आ सकता है।"

वो चले गए।

मैंने बोर्ड उतारा। टूटी लकड़ी की मेज़ उठाई। उसे दुकान के पीछे रख दिया।

और जब मैं वापस आया, तो पीपल के नीचे वो जगह खाली थी — वो जगह जहाँ सुबह तक लोग आते थे, बैठते थे, अपनी टूटी चीज़ें रखते थे, अपनी टूटी बातें कहते थे।

अब वहाँ सिर्फ़ पीपल था, और उसकी छाया।

रात आठ बजे मैंने घंटी निकाली।

मैं दुकान के अंदर था। मैंने दरवाज़ा बंद किया, बल्ब जलाया, कुर्सी खींची और बैठ गया। मैंने घंटी मेज़ पर रखी।

फिर मैंने उसे उठाया और बजाया।

टन।

कोई आवाज़ नहीं।

मैंने फिर बजाया।

टन।

फिर।

टन।

फिर। फिर। फिर।

मेरा हाथ काँप रहा था। मैंने उसे दोनों हाथों से पकड़ा और हिलाया, और उसकी टन-टन पूरे कमरे में गूँजने लगी — जैसे कोई खाली बर्तन में पत्थर डाल रहा हो। कोई आवाज़ नहीं। कोई गरमाहट नहीं। कोई फुसफुसाहट नहीं।

"बोल," मैंने कहा। "बोल न।"

कुछ नहीं।

"तूने कहा था तू मेरे साथ है," मैंने कहा। "तूने कहा था जोड़ा तो किसने खाया। तूने कहा था अब मुझे भी भूख लगी है। तूने कहा था घर जा।"

कुछ नहीं।

मैंने घंटी मेज़ पर पटक दी।

वो लुढ़ककर किनारे तक गई और रुक गई।

और मैं वहीं कुर्सी पर बैठ गया, सिर हाथों में डालकर।

मुझे याद आया — उस्ताद ने कहा था: "घंटी लोगों की आवाज़ से चलती है। जिस दिन गली चुप हो जाएगी, उस दिन घंटी भी चुप हो जाएगी।"

आज गली चुप थी।

न बच्चों की आवाज़, न नल की छपाक, न शबनम की चिमटी, न उस्ताद की मशीन। आज पूरी गली एक कमरे जैसी थी जिसमें कोई नहीं रहता।

और घंटी चुप थी।

नौ बजे मेरे पास डॉक्टर इसरानी का फोन आया।

"अंकुश, अस्पताल आ जाओ।"

"क्यों? माँ ठीक है न?"

"माँ ठीक है," उन्होंने कहा। "मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ।"

मैं गया।

अस्पताल का आँगन खाली था। वो आँगन जहाँ कल तक पाँच-सात लोग बैठे रहते थे, चारपाई पर मरीज़ के आने का इंतज़ार करते हुए। आज वहाँ सिर्फ़ एक कुर्सी थी, और उस पर डॉक्टर इसरानी बैठे थे, हाथ में पुराना स्टेथोस्कोप पकड़े, जिसकी नली पर टेप लिपटा था।

"बैठो," उन्होंने कहा।

मैं बैठ गया।

"आज कोई मरीज़ नहीं आया," उन्होंने कहा। "मैं सुबह आठ बजे आया, शाम सात बजे तक बैठा रहा। एक भी मरीज़ नहीं। एक भी। और ये अस्पताल चालीस साल से चल रहा है — कभी ऐसा नहीं हुआ।"

"डॉक्टर साहब—"

"मैंने पूछा तो लोगों ने कहा — डॉक्टर साहब, आप अंकुश के साथ बैठते हैं न? तो हम क्यों आएँ?"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर गुस्सा नहीं था। थकान थी।

"आप मुझे दोष दे रहे हैं?"

"नहीं," उन्होंने कहा। "मैं तुम्हें एक बात समझाने आया हूँ।"

उन्होंने स्टेथोस्कोप मेज़ पर रखा।

"अंकुश, तुम्हारे पास एक घंटी है, जो तुम्हें लगता है कि तुम्हारी है। पर वो तुम्हारी नहीं है। वो किसी की नहीं है। वो उस गली की है जिसमें हम रहते हैं।"

"मुझे पता है।"

"तो फिर तुम ये क्यों भूल गए कि उसका ईंधन क्या है?" उन्होंने पूछा। "वो काग़ज़ से नहीं चलती। वो पैसे से नहीं चलती। वो उस भरोसे से चलती है जो लोग एक-दूसरे पर करते हैं। उस चाय से चलती है जो शबनम तुम्हें पिलाती है। उस थप्पड़ से चलती है जो मैं तुम्हें अभी देने वाला हूँ क्योंकि तुमने अपनी गली को अकेला छोड़ दिया।"

"मैंने क्या किया?"

"तुमने क्या नहीं किया," उन्होंने कहा। "तुमने ये नहीं किया कि जब सानिया के अब्बा ने तुम्हें डाँटा, तुम वहाँ से चले आए। तुम बाल्टी वहीं छोड़ आए। तुमने उन्हें जवाब नहीं दिया — तुमने उन्हें सिर्फ़ चुप देखा।"

मैंने होंठ कस लिए।

"डॉक्टर साहब, अगर मैं जवाब देता तो वो और भड़क जाते।"

"और अगर तुम नहीं देते," उन्होंने कहा, "तो वो आज रात सोचेंगे कि वो सही थे। और कल सुबह वो अपनी बेटी को और दूर भेज देंगे।"

मैं एक पल के लिए कुछ नहीं बोला।

"मुझे क्या करना चाहिए?"

"तुम्हें घंटी के साथ नहीं, लोगों के साथ रहना चाहिए," उन्होंने कहा। "और आज रात तुम्हें एक काम करना है।"

"क्या?"

"तुम्हें घर जाना है," उन्होंने कहा, "और माँ की दवा लेनी है, और काजल को सोने भेजना है, और अपने लिए रोटी लगानी है। और खानी है। चाहे कितना भी गला भरा हो।"

मेरी आँखों में कुछ आया, और मैंने उसे झटके से पोंछ दिया।

"डॉक्टर साहब—"

"और कल," उन्होंने कहा, "तुम उस उस्ताद की दुकान पर जाना, और उसके साथ बैठना। बिना किसी काम के। सिर्फ़ बैठना। चाय पीना। क्या समझे?"

"समझ गया।"

"क्या समझे?"

"कि घंटी मेरी नहीं है," मैंने कहा। "वो गली की है। और मैं उसका रखवाला हूँ, मालिक नहीं। और रखवाले को रखवाली के लिए लोगों की ज़रूरत होती है।"

डॉक्टर इसरानी मुस्कुराए। पहली बार उस दिन।

"अब जा," उन्होंने कहा। "और ये ले।" उन्होंने अपने डिब्बे से एक छोटी पुड़िया निकाली। "माँ के लिए। बुखार के लिए। और तेरे लिए भी — दोनों के लिए एक ही दवा है। आराम।"

रात नौ बजकर पचास मिनट पर मैं घर पहुँचा।

माँ सो रही थीं। काजल उनके पास चारपाई पर बैठी थी, हाथ में नर्सिंग की किताब, आँखें बंद।

"काजल।"

वो उठी। "भैया, तुम अभी आए?"

"तू सो जा।"

"तूने खाया?"

"अभी खा रहा हूँ।"

वो मेरी तरफ़ देखती रही। फिर बोली, "झूठ बोल रहा है।"

"काजल—"

"तेरी आवाज़ सुनकर पता चलता है।" वो उठी। "बैठ। मैं रोटी लगा देती हूँ। और तू बात कर। बात करने से भूख लगती है।"

मैं बैठ गया। उसने रोटियाँ लगाईं और सामने रखीं। और मैंने खाया। पहला कौर निगलना मुश्किल था। फिर आसान हो गया।

"आज गली में क्या हुआ?" उसने पूछा।

"कुछ नहीं।"

"भैया।"

मैंने रोटी रख दी।

"दरोगा आया," मैंने कहा। "बोर्ड उतरवाया। मेज़ हटवाई। और कहा कि बिना अनुमति सभा करना अवैध है।"

"और तूने क्या किया?"

"मैंने बोर्ड उतार दिया।"

काजल कुछ देर चुप रही। फिर बोली, "अच्छा किया।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "क्या?"

"अच्छा किया," उसने दोहराया। "अगर तू नहीं उतारता, तो वो उतरवाते। और उतरवाने में दो सिपाही लगते हैं और दो सिपाही लगने में गली में डर बैठ जाता है। तूने खुद उतारा, तो कम से कम गली में ये बात नहीं गई कि पुलिस ने तुझे झुकाया।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तू ये सब कहाँ से सीखती है?"

"अस्पताल में," उसने कहा। "जब मरीज़ के घर वाले झगड़ते हैं, तो डॉक्टर इसी तरह बात करते हैं। वो कभी नहीं कहते कि तुम गलत हो। वो कहते हैं — तुम जो करना चाहते हो, वो करो, पर सोच-समझकर करो।"

वो उठी, अपनी किताब उठाई, और दरवाज़े तक गई। फिर रुकी और बिना पलटे बोली, "भैया, वो सफ़ेद गाड़ी वाला फिर आया था?"

"नहीं।"

"आएगा।"

"क्यों?"

"क्योंकि," उसने कहा, "जो आदमी काग़ज़ भेजता है, वो काग़ज़ के बाद खुद आता है — ये देखने कि काग़ज़ ने काम किया या नहीं। और आज उसके काग़ज़ ने काम किया है।"

वो अंदर चली गई।

मैं अकेला बैठा रहा।

रात दस बजकर पंद्रह मिनट पर मेरी दुकान के बाहर सफ़ेद गाड़ी आकर रुकी।

मैं उस वक़्त दुकान में था। मैं अंदर ही रहा। मैंने शटर नहीं खोला।

खिड़की नीचे हुई, और उससे वही आदमी बोला — वही जो सुबह आया था, वही जो कल आया था, वही जिसकी आवाज़ में कभी मुस्कुराहट नहीं होती।

"अंकुश भाई।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"साहब ने कहा है," उसने कहा, "कि आज तुम्हें बताना।"

मैं दरवाज़े तक आया। मैंने कुंडी नहीं खोली। मैं सिर्फ़ दरवाज़े से सटकर खड़ा हो गया।

"बताओ।"

"साहब ने कहा — कल से इस गली में तुम्हारा नाम नहीं होगा।"

मैं चुप रहा।

"मेरा नाम होगा।" वो रुका। "पर साहब ने ये भी कहा कि मैं तुमसे एक बात और कहूँ।"

"क्या?"

"साहब ने कहा — उससे कह देना कि जो गली मेरी है, उसमें उसका नाम रहे या न रहे, फ़र्क़ नहीं। फ़र्क़ ये है कि उसके नाम के बिना गली कैसी दिखती है।"

मेरी मुट्ठी भींच गई।

"और साहब ने एक आख़िरी बात कही," उसने कहा। "साहब ने कहा कि अंकुश से पूछना — उसकी घंटी आज बोली?"

मैं ठिठक गया।

मेरा गला सूख गया। मेरी उँगलियाँ काँपने लगीं।

"क्या कहा?"

"साहब ने कहा कि उससे पूछना," उसने धीरे-धीरे दोहराया, "कि उसकी घंटी आज बोली? और अगर नहीं बोली, तो उससे कहना कि साहब उसकी घंटी से नहीं, उसकी गली से लड़ रहे हैं। घंटी तो बस उसका बहाना थी।"

मैं कुछ नहीं बोल सका।

"और ये भी," उसने कहा। "साहब ने कहा — कल सुबह जब वो उठे, तो अपना दरवाज़ा खोलें और देखें कि गली में किसके नाम की आवाज़ आ रही है।"

खिड़की चढ़ने लगी।

फिर वो रुकी, और उसमें से आख़िरी आवाज़ आई — "साहब ने ये नहीं कहा कि तुम जवाब दो। साहब ने ये कहा कि तुम सिर्फ़ सुनो।"

खिड़की बंद हुई।

गाड़ी चली गई।

गली में धूल उठी और फिर बैठ गई।

मैं दुकान के बाहर आया।

पीपल के नीचे खाली जगह थी। उस जगह पर अब सिर्फ़ उस्ताद की दुकान से आती हुई एक दूर की टिक-टिक थी, जो आज बंद थी, तो सन्नाटा और भी गहरा लग रहा था।

मैंने जेब से घंटी निकाली। मैंने उसे हथेली पर रखा। ठंडी थी।

"सुन," मैंने धीरे से कहा। "मुझे पता है तू चुप है। मैं जानता हूँ क्यों। गली चुप है, तो तू भी चुप है। मैं इसे ठीक करूँगा।"

कुछ नहीं।

"पर एक बात कहनी है," मैंने कहा। "আज से मैं तुझे बजाकर नहीं पूछूँगा। मैं लोगों को बजाकर पूछूँगा। जो तेरे अंदर बोलते थे — उन्हीं को मैं बाहर बुलाऊँगा।"

मैंने घंटी जेब में रखी।

और मैंने उस रात एक और बात मन में तय की।

मैं घंटी से जवाब नहीं माँगूँगा। मैं गली से माँगूँगा।

क्योंकि रणवीर की मुस्कान इसलिए काम करती है कि वो लोगों से कहता है — "मैं तुम्हारा भला चाहता हूँ।" और मेरी घंटी इसलिए चुप है कि मैं लोगों से ये नहीं कह पाया — "मैं तुम्हारे साथ हूँ, पर तुम्हारे बिना कुछ नहीं हूँ।"

कल सुबह मैं उस्ताद की दुकान पर जाऊँगा। उनके साथ बैठूँगा। चाय पीऊँगा। बिना सफ़ाई दिए।

और गली देखेगी।

और उसके बाद जो होगा, देखा जाएगा।

क्योंकि जिस घंटी में लोगों की आवाज़ होती है, उसे तोड़ने के लिए जादू नहीं चाहिए।

उसे तोड़ने के लिए बस इतना काफ़ी है कि गली चुप हो जाए।

और उसे वापस जोड़ने के लिए भी जादू नहीं चाहिए।

उसे जोड़ने के लिए बस इतना चाहिए कि एक आदमी अपना दरवाज़ा खोले और कहे — "भाई, चाय पी ले।"

बस इतना।

और आज रात मुझे सिर्फ़ इतना करना था कि सुबह तक ज़िंदा रहूँ, ताकि कल वो चाय पी सकूँ।

मैंने शटर गिराया।

गली में आख़िरी आवाज़ शटर की थी।

और फिर सब चुप।

॥

सुबह मैं पहले जागा या गली पहले जागी, ये मुझे आज भी नहीं पता चला।

आँख खुली तो छत का पुराना पंखा चुप था। बल्ब की गुनगुनाहट भी नहीं थी। बाहर से किसी साइकिल की घंटी नहीं आ रही थी, किसी बच्चे के पैरों की थपकी नहीं आ रही थी, कोई माँ अपने बेटे को स्कूल के लिए नहीं डाँट रही थी। कमरे में सिर्फ़ मेरी साँस थी और औज़ारों के ट्रंक से आती धूल की पुरानी गंध।

मैं उठा। मुँह धोया। पानी के टब में हाथ डाला तो पानी भी ठंडा लगा, जैसे रात भर किसी ने उसे भी चुप रहने को कह दिया हो।

शटर उठाया।

गली खाली थी।

पीपल के नीचे पत्थर की चबूतरी सूनी पड़ी थी। चबूतरी पर धूल की एक पतली परत जम गई थी, जिस पर किसी के बैठने का एक भी निशान नहीं था। नाली पर पुराना पत्थर का पुल था, वहाँ भी कोई नहीं। गुमटी की तरफ़ देखा तो चूल्हा जल रहा था, धुआँ उठ रहा था, पर वहाँ भी कोई खड़ा नहीं था।

और सबसे डरावनी बात — स्कूल की तरफ़ से बच्चों की आवाज़ नहीं आ रही थी।

मैं दुकान के बाहर आया। खड़ा रहा। सुबह की हवा चल रही थी, पीपल के पत्ते हिल रहे थे, पर उनकी आवाज़ भी कुछ अजीब तरह से दबी हुई लग रही थी।

मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी वहीं थी। ठंडी। बिल्कुल वैसी ही जैसी रात में थी। मैंने उसे निकाला, हथेली पर रखा, उँगली से छुआ। कुछ नहीं।

“सुबह हो गई,” मैंने धीरे से कहा। “देख, सुबह हो गई।”

घंटी चुप।

मैंने उसे जेब में रखा और उस्ताद की दुकान की तरफ़ चला।

उनका शटर आधा उठा हुआ था। अंदर उजाला जल रहा था। सिलाई मशीन पर पुराना कपड़ा ढका हुआ था, और उस्ताद अपनी लकड़ी की छोटी स्टूल पर बैठे थे, हाथ में एक पुराना लोहे का ताला पकड़े हुए।

“आ जा,” उन्होंने मेरी तरफ़ देखे बिना कहा।

मैं अंदर गया। उनके सामने बैठ गया। चारपाई नहीं थी, स्टूल एक ही था, तो मैं फ़र्श पर बैठ गया, पीठ दीवार से टिकाकर।

“चाय?” उन्होंने पूछा।

“आप बना रहे हैं?”

“नहीं। तू बना।”

मैं उठा। पीछे के कोने में स्टोव था, केतली थी। मैंने चाय बनाई। दो गिलास भरे। एक उनकी तरफ़ बढ़ाया, एक अपने पास रखा।

“ताला किसका है?” मैंने पूछा।

उस्ताद ने ताले को हवा में घुमाया।

“ये मेरा है। पुराना है। मेरे अब्बा के ज़माने का। दुकान खोलने से पहले मैं इसे हर रोज़ देखता था। लगाता नहीं था, बस देख लेता था — कि जिस दिन लगाना पड़े, तब भी मेरा ही रहे।”

“काग़ज़ आ गया?”

“सुबह सात बजे आया। सफ़ेद कमीज़ वाला आदमी, हाथ में लिफ़ाफ़ा। काग़ज़ चिपकाकर चला गया। लिखा है — दुकान दो दिन में खाली। आज पाँच बजे तक पहला ताला।”

मेरा गला सूख गया। चाय का गिलास हाथ में था, पर मुँह तक नहीं गया।

“उस्ताद—”

“सुन पहले,” उन्होंने कहा। “ताला वो लगाएँगे, नहीं लगाएँगे, ये मैं नहीं जानता। पर आज शाम पाँच बजे मैं अपनी दुकान का शटर अपने हाथ से नीचे गिराऊँगा। ताला अपना लगाऊँगा। चाबी अपनी जेब में रखूँगा।”

“पर इससे तो वो जीत जाएँगे—”

“नहीं,” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो पचास साल से ज़्यादा पुरानी थी, कुर्सी की लकड़ी जैसी सूखी पर मज़बूत। “जो आदमी अपनी दुकान अपने हाथ से बंद करता है, उसकी दुकान बंद नहीं होती। दबती है, पर बंद नहीं होती। और जिसे दूसरे का हाथ बंद करता है, वो सच में बंद हो जाती है।”

मैं चुप बैठा रहा।

“अंकुश,” उन्होंने कहा। “आज तेरा दिन है।”

“मेरा दिन?”

“सुन। आज सुबह से तेरे कान में जो आवाज़ आएगी, वो तू सुन। बोलना नहीं। बस सुनना।” उन्होंने चाय का घूँट लिया। “मैंने तुझे एक बात बताई थी न — जोड़ने वाला अकेले नहीं जोड़ता। आज वो सब अपने आप दिखेगा।”

“क्या दिखेगा?”

“ये दिखेगा कि गली को तेरी घंटी से कोई दुश्मनी नहीं थी,” उन्होंने कहा। “लोगों को तू और तेरी दुकान से दुश्मनी है। और वो दुश्मनी आज बोलेगी। तैयार रह।”

मैंने गिलास मुँह तक उठाया। चाय गरम थी, पर मेरे अंदर कुछ ठंडा रह गया था।

पहला झटका उस वक़्त आया जब मैं दुकान लौटा।

चूड़ी वाली बाई अपनी गुमटी के बाहर बैठी थी, सामने लाल धागे से लिपटी चूड़ियों की पेटी खुली, और उसके पास एक दुबला आदमी खड़ा था — सफ़ेद कुर्ता, हाथ में काग़ज़ों का बंडल। वो उससे धीरे-धीरे कुछ कह रहा था। उसका हाथ बीच-बीच में उस तरफ़ उठता था जिधर मेरी दुकान थी।

मैं रुक गया। मुझे सुनना था। उस्ताद ने कहा था — सुनने का।

मैं उस्ताद की दुकान के साये में खड़ा रहा। आवाज़ पूरी नहीं आ रही थी, शब्द टूटकर आ रहे थे।

“…उसके जोड़ से घर टूटते हैं…”

“…भूला भाई की दुकान गई, शबनम की गुमटी बंद, उस्ताद की दुकान पर ताला…”

“…पर वो किसी को कुछ नहीं बताता, इसलिए पता नहीं चलता…”

“…दिखता है जोड़ने वाला, पर असल में वो…”

आख़िरी शब्द हवा में गम हो गए, पर मैंने उन्हें पूरा समझ लिया। वो शब्द था — जादू।

मैं खड़ा रहा। मेरा हाथ जेब की तरफ़ गया, घंटी की तरफ़, फिर रुक गया। नहीं। मैंने हाथ निकाल लिया।

वो आदमी काग़ज़ों का बंडल सीने से लगाए आगे बढ़ गया। चूड़ी वाली बाई ने सिर उठाया और मुझे देखा।

उसका चेहरा बदल गया।

मैं मुस्कुराया। “बाई, चूड़ियाँ ठीक चल रही हैं?”

वो जवाब देने से पहले एक बार इधर-उधार देखा। फिर धीरे से बोली, “अंकुश बेटा, तू बुरा मत मानना।”

“मैं नहीं मानता।”

“मेरी दुकान पर रोज़ तीन आदमी आते हैं। बैठते हैं। पूछते हैं कि तू क्या करता है, तेरे पास कौन आता है। मैं क्या बोलूँ?” उसने अपनी उँगली पर लिपटा लाल धागा खींचा। “मैं बोलती हूँ — कुछ नहीं, वो तो साइकिल ठीक करता है। पर…” वो रुकी।

“पर?”

“पर बेटा, जब उस्ताद की दुकान पर ताला लगने की खबर आई, तो मैं सोच में पड़ गई।” उसने आँखें नीची कर लीं। “मुझे डर लगता है। मेरे लड़के की नौकरी लगी है, नई बस्ती में। अगर नाम कट गया तो…”

“मैं समझता हूँ,” मैंने कहा।

और सच में समझता था। इसीलिए और दर्द हो रहा था।

मैं आगे चला।

दुकान के मोड़ पर चिंटू आ रहा था, दौड़ता हुआ, हाथ में पुरानी रिम। उसकी अम्मी पीछे खड़ी थीं, एक हाथ में तांबे की केतली थी।

“चिंटू!” उन्होंने पुकारा।

चिंटू ने मुझे देखा। उसका चेहरा खिला। “उस्ताद—”

“चिंटू, हमारी केतली का ढक्कन—” वो बोलता हुआ मेरी तरफ़ बढ़ा।

“चिंटू!” अम्मी की आवाज़ दो गुना ऊँची हो गई। “इधर आ। अभी।”

वो रुक गया। मेरे और अपनी अम्मी के बीच में खड़ा रह गया, हाथ में रिम, आँखों में सवाल।

“इधर आ,” अम्मी ने दोहराया। “उसकी छाया में भी मत खड़ा हो।”

गली सुन सकती थी। गली सुन ही रही थी, दरवाज़ों के पीछे से, खिड़कियों के पीछे से। मैंने चिंटू की तरफ़ देखा और मुस्कुराया।

“जा,” मैंने कहा। “केतली का ढक्कन लेकर आना, मैं लगा दूँगा।”

चिंटू ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर अपनी अम्मी की तरफ़। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो बड़ों की आँखों में नहीं थी — शर्म।

वो अपनी अम्मी के पास गया। अम्मी ने उसकी कलाई पकड़ी और खींचकर घर के अंदर कर दिया।

मैं वहीं खड़ा रहा। दुकान का शटर खुला था, पर अंदर कोई नहीं। मैं वहीं खड़ा रहा और मुझे लगा कि किसी ने मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ली है।

तभी सानिया आई।

वो मेरे सामने से गुज़री। देखा। फिर तेज़ी से नज़र नीची कर ली और आगे चली गई। दस कदम जाकर रुकी, पलटी, कुछ कहने को मुँह खोला, फिर बिना कुछ कहे भाग गई।

मैंने उसे जाने दिया।

उस्ताद ने कहा था — सुन। बोलना नहीं।

दस बजे स्कूल के गेट पर भीड़ थी।

मैं वहाँ नहीं गया। मुझे बुलाया नहीं गया था। मैं दुकान में बैठा था, एक पुरानी साइकिल की चेन साफ़ कर रहा था, जिसे किसी ने तीन महीने पहले छोड़ दिया था और लेने नहीं आया। मेरे हाथ में तेल था, कपड़ा काला हो रहा था।

रफ़ीक़ की अम्मी आईं।

वो दरवाज़े पर खड़ी रहीं, अंदर नहीं आईं। हाथ में एक थैला था, जिसमें कुछ कपड़े थे — पता नहीं सिलने के लिए लाई थीं या बहाना था।

“अंकुश भाई,” उन्होंने कहा।

मैंने हाथ पोंछा और उठा। “आइए।”

“नहीं, मैं…” उन्होंने थैला सीने से लगाया। “मैं कपड़े सिलवाने आई थी। उस्ताद के पास जा रही थी।”

“उस्ताद की दुकान वही है।”

“हाँ, पर…” वो रुकीं।

“पर?”

“पर स्कूल में आज अभिभावकों की बैठक थी,” उन्होंने धीरे से कहा। “कहा गया कि बच्चों को उस गली से नहीं गुज़रने देना जहाँ…” उन्होंने मेरी आँखों में देखा और शब्द बदल दिए। “…जहाँ उस्ताद की दुकान है।”

मैंने सिर हिलाया।

“और क्या कहा गया?”

“कुछ नहीं कहा गया,” वो बोलीं। “बस काग़ज़ बाँटे गए। बच्चों के नाम, स्कूल का नाम, और नीचे लिखा था — बच्चों को भरोसेमंद जगहों पर ही भेजें।”

“भरोसेमंद जगहें कौन सी हैं?”

वो चुप रहीं।

“आप बता दें,” मैंने कहा। “मुझे जानना है।”

“जहाँ साहब का नाम लिखा है,” उन्होंने कहा, और आवाज़ इतनी धीमी थी कि लगा अपने आप से भी छिपा रही हैं। फिर उन्होंने थैला मेज़ पर रखा। “ये कपड़े उस्ताद को दे देना। और अंकुश भाई…”

“हाँ?”

“रफ़ीक़ रो रहा है। घर में। बोल रहा है कि वो तुम्हारे पास नहीं जाएगा तो कौन उसकी पतंग ठीक करेगा।” उनकी आँखें भर आईं। “मैं उसे क्या जवाब दूँ?”

मेरा गला भर आया।

“आप उससे कह दें,” मैंने कहा, “कि पतंग मैंने ठीक करके दुकान के ऊपर टाँग दी है। वो रास्ते से देख लेगा। पास आने की ज़रूरत नहीं।”

वो मुस्कुराईं। एक छोटी सी, टूटी सी मुस्कान। फिर चली गईं।

मैं दुकान में लौटा।

और मैंने दुकान के ऊपर एक पतंग टाँग दी। सफ़ेद काग़ज़ की, अख़बार के पन्ने से बनी, जिस पर कोई नाम नहीं था। सिर्फ़ एक पतंग।

उसे देखकर सब समझ जाएँगे कि मैं यहाँ हूँ, मैंने सुना है, और मैंने माफ़ किया है।

दोपहर में गुमटी की तरफ़ से आवाज़ आई।

मैं गया। शबनम आपा चूल्हे के पास खड़ी थीं, हाथ में लोहे की चिमटी। सामने बेंच पर एक आदमी बैठा था — गली का ही आदमी, हरी शर्ट, हाथ में स्टील का गिलास।

“आपा, आज नहीं,” वो कह रहा था।

“क्यों नहीं?”

“बस ऐसे ही। आज नहीं।”

“आदमी, तेरे पैसे मेरी कटोरी में पड़े हुए चार महीने से हैं। अब जब चाय नहीं पीनी, तो पैसे उठा।”

“रहने दो।”

“नहीं रहने दूँगी।”

वो उठा। “आपा, गली में जो चल रहा है, वो आप भी जानती हैं। मुझे अपने बच्चों की सोचनी है।”

शबनम आपा ने चिमटी मेज़ पर पटक दी। पीतल की थाली पर चिमटी गिरी तो एक लंबी, कड़वी आवाज़ निकली जो पूरी गली में गई।

“तेरे बच्चों की सोचनी है?” उन्होंने कहा। “तू तो जानता है न, मैंने तेरी बीवी के लिए क्या-क्या किया? जब तेरा बेटा बीमार पड़ा था, तेरे हाथ में गाँठ थी, रात में मैं आई थी या नहीं? नौकरी जाते-जाते बची थी, तब मैंने किसी से कहा था या नहीं कि शाहिद का बाप ईमानदार है?”

आदमी का सिर झुक गया।

“आपा…”

“चल। जा। अपनी सोच। मैं कुछ नहीं बोलती।”

वो चला गया। उसने पैसे नहीं उठाए। शबनम आपा ने बेंच पर उसका बचा हुआ गिलास उठाया और दूर जाकर फेंक दिया। फिर वो वापस चूल्हे के पास आईं।

“आपा,” मैंने कहा।

“तू बैठ,” उन्होंने कहा। “तू भी खड़ा होकर मेरी तरफ़ देखेगा तो लगेगा कि मैं किसी की रहम पर हूँ।”

मैं बैठ गया। उन्होंने मेरे सामने चाय रखी, अपने लिए भी ली, और सामने दीवार पर लगे उस काग़ज़ को देखने लगीं जिस पर लिखा था — अस्थायी रूप से काम बंद।

“ये काग़ज़,” मैंने कहा।

“हटाऊँ?”

“नहीं।”

“क्या कहा?”

“नहीं हटाइए,” मैंने कहा। “रहने दीजिए। हर आदमी जब यहाँ आकर ये पढ़ेगा, तो एक बार रुकेगा। रुकेगा तो सोचेगा। सोचेगा तो पूछेगा — किसने लिया? किसने चिपकाया? नाम किसका नहीं है? आपा, डर बहुत बड़ा है, पर उससे भी बड़ा सवाल है। हम सवाल छोड़ देंगे, तो डर जीत जाएगा।”

शबनम आपा ने मुझे देखा। फिर काग़ज़ को देखा।

“तू अजीब है,” उन्होंने कहा। “काग़ज़ को अपनी तरफ़ के फ़ायदे में बदल रहा है।”

“मैंने उस्ताद से सीखा है।”

“मैंने क्या कहा?” उस्ताद की आवाज़ पीछे से आई।

वो आए। उनके हाथ में एक मोटा लाल कपड़े में लिपटा पैकेट था। वो आकर मेरे पास बैठ गए।

“सुन,” उन्होंने कहा। “मेरी दुकान पर पाँच बजे ताला लगेगा। मैं लगाऊँगा। पर उससे पहले मुझे एक काम करना है।”

“क्या?”

“आज शाम चार बजे, चबूतरी पर, सबको बुला।”

“पर सभा पर रोक लग गई है।”

“सभा नहीं,” उन्होंने कहा। “मेरी दुकान बंद करने का दर्द। सभा में काग़ज़ चाहिए, दर्द में सिर्फ़ आदमी चाहिए। मैं अपनी दुकान अपने हाथ से बंद करूँगा, और जो भी देखना चाहे, देख ले। बिना नाम की सभा होगी — बिना बोर्ड, बिना बैनर, बिना कुर्सी। सिर्फ़ मैं, मेरी मशीन और मेरा ताला। और जिसको आना है, आए।”

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

“उस्ताद, पुलिस आएगी।”

“आएगी,” उन्होंने कहा। “तो आए। पुलिस कोई ताला लगाने से रोक सकती है? मैं अपनी दुकान ही तो बंद कर रहा हूँ।”

शबनम आपा ने चाय का आख़िरी घूँट लिया और गिलास मेज़ पर रखा।

“मैं आऊँगी,” उन्होंने कहा। “और चूल्हा उस वक़्त भी जलता रहेगा। दुकान बंद करनी है, गुमटी नहीं।”

तीन बजे मोड़ के नल पर झगड़ा शुरू हुआ।

मुझे खबर सानिया लाई थी। वो दौड़कर आई और दरवाज़े पर रुक गई।

“भैया!” उसने कहा। “नल पर लड़ाई है। अब्बा और गुड्डू के पापा।”

मैंने तेल का कपड़ा फेंका और दौड़ा।

नल के नीचे पक्का घेरा था, और घेरे के किनारे उसी नई लाल ईंट की जगह अब एक लोहे की बाल्टी रखी थी। पानी भर रहा था, और बाल्टी के नीचे से पानी नाली में नहीं, सीधा गली में फैल रहा था।

सानिया के अब्बा ने बाल्टी पकड़ी थी। गुड्डू के पापा ने भी।

“बाल्टी मेरी है!” सानिया के अब्बा चिल्लाए।

“बाल्टी गली की है!” गुड्डू के पापा ने कहा। “तू रोज़ पहले आ जाता है, तेरी बीवी के पत्थर की, हमारे बच्चे भी पानी पीते हैं!”

“तो तेरा बच्चा आदमी है, मेरी बीवी आदमी नहीं?”

“मैंने ऐसा कब कहा?”

“तू बोल रहा है!”

मैं बीच में गया।

“रुकिए। चाचा। भाई। दो मिनट।”

दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।

“अंकुश, तू दूर रह,” गुड्डू के पापा ने कहा।

“चाचा, पहले बाल्टी नीचे रखिए, पानी बह रहा है।”

“बहने दे,” उन्होंने कहा।

“पूरी गली के पैरों के नीचे पानी आएगा, कीचड़—”

“तू अपनी दुकान संभाल,” सानिया के अब्बा ने कहा। उनकी आवाज़ कड़वी थी, और उसमें वो ज़हर था जिसे मैं पहले कभी उनके लिए नहीं सुना था।

“चाचा—”

“तेरे आने से ही ये सब शुरू हुआ,” उन्होंने कहा। मेरा हाथ उनकी बाल्टी पर था। मैंने हाथ खींच लिया। “तू सबको जोड़ता फिरता है, तेरे जोड़ से ये लड़ाई है। बाल्टी छोड़ दे।”

“चाचा, ये लड़ाई बाल्टी की नहीं है,” मैंने कहा। “ये वो लड़ाई है जो कल किसी ने आपके कान में डाली है।”

वो रुके।

और उसी रुकने में उनका गुस्सा दो गुना हो गया, क्योंकि सच बोलने की चोट सबसे बड़ी होती है।

“बोलता बहुत है,” गुड्डू के पापा ने कहा। “बोलने की उमर हो गई है। अपने बाप को देख, वो कितना बोलता है। सीख ले।”

मुझे बाप की बात पर कुछ चुभ गया। वहाँ पूरी गली खड़ी थी — गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू, औरतें, एक बूढ़ा काका जो खड़ा नहीं हो सकता था पर दरवाज़े से झाँक रहा था। और सानिया। सानिया बीच में खड़ी थी, और वो अपने अब्बा की तरफ़ भी नहीं देख रही थी, और मेरी तरफ़ भी नहीं। वो सिर्फ़ ज़मीन देख रही थी।

मैंने एक लंबी साँस ली।

“ठीक है,” मैंने कहा। “बाल्टी आपकी। दोनों की। मैं दूर खड़ा हूँ।”

मैं पीछे हटा।

बाल्टी उनके बीच झूलती रही। पानी बहता रहा। और फिर बाल्टी छूटी, गिरी, उलटी, और पानी की धार एक तरफ़ को फूट पड़ी। बाल्टी लुढ़ककर मेरे पैरों के पास आई।

मैंने उसे उठाया। मेरे पैर भीगे हुए थे।

“अब बोलो,” मैंने कहा। “बाल्टी ये है। लड़ाई किस बात की है?”

दोनों चुप हो गए।

“तुम दोनों की बीवी-बच्चे एक ही नल से पानी भरते हैं,” मैंने कहा। “आज तक कभी झगड़ा नहीं हुआ। आज क्या हुआ? क्या पानी कम हो गया?” मैंने बाल्टी उनके बीच पत्थर पर रखी। “पानी वही है। डर बढ़ गया है। और डर का रास्ता नल से होकर जाता है, क्योंकि वहाँ सब मिलते हैं।”

किसी ने कुछ नहीं कहा।

“मैं सिर्फ़ इतना कहूँगा,” मैंने कहा। “कल आप दोनों को याद रहेगा कि लड़ाई किस बात पर हुई थी। और आपको याद नहीं आएगा।”

मैं पलटा और दुकान की तरफ़ चला।

पीछे से गुड्डू के पापा की आवाज़ आई, धीमी, थकी हुई।

“अंकुश।”

मैं रुका।

“तेरे पास जो भी है,” उन्होंने कहा, “वो हमारे काम का नहीं। तू हमें छोड़ दे। हम ऐसे ही ठीक हैं।”

मैंने पलटकर देखा।

“ठीक नहीं हैं,” मैंने कहा।

और मैं चला आया।

शाम चार बजे चबूतरी पर कोई नहीं आया।

उस्ताद आए, अपनी सिलाई मशीन के साथ — मशीन बंद, कपड़े से ढकी, वो उसे गोद में रखकर लाए, ऐसे जैसे कोई बच्चा ला रहा हो। मशीन भारी थी। वो उसे उठाकर फ़र्श पर रखकर सीधे खड़े रहे और साँस नहीं ली, ताकि पता न चले कि उनकी कमर दुख रही है।

शबनम आपा आईं, हाथ में स्टील का गिलास, और रज़िया।

मैं आया।

और पाँच बजे तक सिर्फ़ हम चार थे।

न पीपल के नीचे बैठने वाले बुज़ुर्ग, न औरतें, न बच्चे। एक-एक करके दरवाज़े खुले, लोगों ने झाँका, और बंद कर दिए। काका खाँसते हुए आए, खड़े रहे, और वापस चले गए — उनकी आँखों में वो शर्म थी जो मैं जानता था।

पाँच बजे उस्ताद ने घड़ी देखी।

“बहुत हो गया,” उन्होंने कहा।

उन्होंने मशीन उठाई। मैंने उनका हाथ पकड़ा — उनकी कलाई पतली थी, हड्डी ऊपर उभरी हुई।

“मैं उठाता हूँ,” मैंने कहा।

“मेरी मशीन है।”

“तो आप मशीन उठाइए, मैं आपको उठाता हूँ।”

मैंने उन्हें सहारा दिया। हम दुकान तक चले।

शटर खुला था। अंदर उजाला जल रहा था। मैंने उन्हें अंदर बिठाया, मशीन को उनकी जगह रखा — जहाँ वो पचास साल से रखी थी, वहाँ।

उस्ताद ने मशीन पर हाथ रखा।

“पचास साल,” उन्होंने कहा।

“कुछ नहीं होगा,” मैंने कहा।

“मुझे पता है,” उन्होंने कहा। “वो आ जाएगा। मशीन उठेगी, ये टेबल उठेगी, ये सिला हुआ कपड़ा भी उठेगा। पर मशीन का हाथ बराबर नहीं होगा।”

उन्होंने ताला निकाला।

“अंकुश।”

“हाँ।”

“बाहर आ।”

हम बाहर आए।

फिर उन्होंने शटर नीचे गिराया।

आवाज़ पूरी गली में गई। मैंने कभी नहीं सुना था कि एक लोहे का शटर इतनी ज़ोर से गिरता है। उसके पीछे दो बच्चों की आवाज़ दब गई, गुमटी का चूल्हा भी मानो धीमा पड़ गया, और पीपल के पत्ते बजने से रुक गए।

उस्ताद ने ताला लगाया।

चाबी जेब में रखी।

“अब जो भी आए, मैं नहीं,” उन्होंने कहा। “जबरदस्ती लगाएँ, तो लगाएँ।”

मैं उनके साथ खड़ा रहा।

और तभी पुलिस आई।

दरोगा जी सफ़ेद जीप में थे। दो सिपाही पीछे। एक के हाथ में काग़ज़ था, दूसरे के हाथ में कुछ नहीं था।

दुबे अंकल जीप से उतरे — वो हमेशा से जीप से नहीं उतरते थे, पर आज उतरे थे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर वो बात थी जो कहना चाहती थी और कह नहीं सकती थी।

दरोगा मेरे पास आए।

“अंकुश यादव?”

“हाँ।”

“तुम यहाँ पीपल के नीचे जोड़ केंद्र नाम का चबूतरा चला रहे हो?”

“नहीं चला रहा।”

“बोर्ड लगा था।”

“बोर्ड नहीं है।”

“कल था।”

“कल था। आज नहीं है।”

उन्होंने मेरे पीछे चबूतरी की तरफ़ देखा। मैंने भी देखा। वहाँ कुछ नहीं था। फिर भी उन्होंने सिपाही की तरफ़ हाथ बढ़ाया, और सिपाही ने काग़ज़ दिया।

“काग़ज़ लिखा है — पीपल के नीचे बिना अनुमति इकट्ठा होने और लोगों को इकट्ठा करने की शिकायत मिली है,” उन्होंने कहा। “जन-सुविधा की जगह है। इसका उपयोग धंधे के लिए नहीं कर सकते।”

“मैं धंधा नहीं करता।”

“कहते हैं कि टूटी चीज़ों के पैसे लेते हो।”

“कभी नहीं।”

“काग़ज़ कुछ और कहता है।”

“काग़ज़ पर मेरा हस्ताक्षर है?”

उन्होंने काग़ज़ देखा। फिर नीचे पढ़ा। फिर मेरे सामने उसे मोड़ लिया।

“हस्ताक्षर नहीं है,” वो कहने ही वाले थे, तभी सिपाही ने उन्हें रोका, कुछ कान में कहा, और दरोगा ने काग़ज़ फिर खोला और बोले, “पर शिकायत पहले भी आई थी। हमारे रजिस्टर में है।”

“कब आई?”

“तारीख़ काग़ज़ पर है।”

“काग़ज़ पर तारीख़ ही नहीं है।”

दरोगा जी रुक गए। उन्होंने मुझे देखा। वो गुस्सा नहीं दिखा रहे थे। वो थके हुए थे। उनकी आँखों के नीचे काला था, और उनकी वर्दी के कॉलर पर पसीने का निशान था।

“सुन बेटा,” उन्होंने धीरे से कहा। “मैंने इस गली में साइकिल चलाई है। मेरी बीवी ने तुम्हारी माँ से टिफ़िन लिया है। मुझे अपनी नौकरी से ज़्यादा इस गली से लगाव है, तभी मैं आज आया हूँ। दूसरा आदमी आता तो लाठियाँ लेकर आता।”

“मैं समझता हूँ।”

“तो समझ ले — आज मैं ये जगह खाली कराने आया हूँ। काग़ज़ के हिसाब से। मुझे पता है ये काग़ज़ सही नहीं है। परीक्षा में मैं ये लिखकर भी नहीं दे सकता।” उन्होंने जेब से रूमाल निकाला। “मैं सेवा में हूँ, अंकुश। सेवा में आदमी अपना मन नहीं रखता।”

“जब तक आपकी सेवा है, तब तक किसी का काम नहीं आएगा,” मैंने कहा।

दरोगा जी रुके।

“ये तूने ठीक कहा,” वो बोले।

उन्होंने सिपाहियों की तरफ़ इशारा किया।

दोनों सिपाही चबूतरी के पास गए। मैंने उन्हें रोका।

“एक मिनट,” मैंने कहा। “मैं हूँ।”

मैंने खुद चबूतरी पर चढ़कर टूटी लकड़ी की मेज़ उठाई — जो जोड़ केंद्र की मेज़ थी, जिसकी एक टाँग नाप में नहीं थी। अब मैंने उसे सहारा दिया, और उतारकर नीचे रखा। फिर उस सफ़ेद पतंग को देखा जो पीपल की डाल में टँगी थी और अब आधी-आधी हो चुकी थी।

वो वहीं रह गई। मैंने उसे नहीं छुआ।

“ये दें?” सिपाही ने पूछा।

“नहीं,” मैंने कहा। “पतंग किसी की नहीं है।”

“मेज़ रखनी है?”

“रख दो दुकान के पीछे। टूटी है, फेंकूँगा नहीं।”

सिपाही मज़ाक नहीं कर रहा था; उसने मेज़ उठाई और ले गया। मेरे पीछे वो लगा, मेरे से भी ज़्यादा शर्मिंदा।

फिर दरोगा जी ने काग़ज़ पढ़ा।

“अगली बार सभा करने पर कुर्सी—” वो बोले, और रुक गए। उन्होंने इधर-उधर देखा। गली खाली थी। “अगली बार सभा करने पर कार्रवाई होगी। याद रखना।”

“मैं याद रखूँगा,” मैंने कहा।

वो चले गए। जीप गई। दुबे अंकल चले गए, और जाते वक़्त उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और होंठ हिलाए। मैंने नहीं सुना, पर मैंने पढ़ लिया। वो बोले थे — “हिम्मत मत हार।”

रात सात बजे गली में सन्नाटा था।

ऐसा सन्नाटा कि मुझे अपने ही कदमों की आवाज़ बड़ी लगने लगी। मैंने पत्थर के पुल पर चलकर उस्ताद की बंद दुकान के सामने से गुज़रना चाहा, पर वहाँ पहुँचकर मैं रुक गया, क्योंकि उनका शटर देखकर कुछ अंदर से टूट गया।

मैं गुमटी की तरफ़ गया। शबनम आपा चूल्हे के पास बैठी थीं, छोटा चूल्हा जल रहा था, सामने पानी के छोटे बर्तन में उबल रहा था। कोई चाय माँगने वाला नहीं।

“आपा,” मैंने कहा।

“बैठ,” उन्होंने कहा।

मैं बैठ गया। उन्होंने चाय दी। कोई शब्द नहीं बोला।

फिर रज़िया आई, दो प्लेटों में दो रोटियाँ और सब्ज़ी लिए, और बिना पूछे मेरे सामने रख दिया।

“खा ले,” वो बोली। “माँ की कसम, खा ले। बस यही कहूँगी।”

मैंने खाया। नहीं भूख थी, पर मैंने खाया, क्योंकि खाना शुक्र अदा करने का सबसे छोटा तरीका है।

मैंने आख़िरी टुकड़ा मुँह में रखा और पानी का गिलास उठाया।

शबनम आपा मेरे सामने बैठी थीं। चिमटी उनके हाथ में थी, चूल्हे की लौ उनके चेहरे पर पीली रोशनी डाल रही थी, और उस पीली रोशनी में उनका चेहरा उम्र से ज़्यादा थका हुआ लग रहा था।

"आपा, आज कितने ग्राहक आए?" मैंने पूछा।

"दो," उन्होंने कहा।

मैंने गिलास रख दिया।

"एक ने रास्ता पूछा," वो बोलीं, "और एक ने पानी। दोनों ने चाय नहीं पी।"

रज़िया बगल में बैठी थी, और उसने अपनी प्लेट उठाई जिसमें उसकी रोटी बाकी थी। वो उठकर अंदर जाने लगी, फिर रुकी और बिना मुड़े बोली, "आपा, वो काग़ज़ उतार दो ना।"

"कौन सा काग़ज़?" मैंने पूछा।

"जो उसके शटर पर चिपका है," रज़िया ने कहा, और मेरी तरफ़ देखा। "अस्थायी रूप से काम बंद। कोई पढ़ता है तो लगता है हम खुद बंद कर रहे हैं।"

शबनम आपा ने चिमटी चूल्हे पर रखी और उसकी आवाज़ ऐसी हुई जैसे कोई लोहा पत्थर पर रख रहा हो।

"मैंने वो काग़ज़ इसलिए नहीं उतारा कि मैं डर गई हूँ," उन्होंने कहा। "मैंने इसलिए नहीं उतारा कि जिसने लगाया है, वो आकर देखे कि शबनम का चूल्हा काग़ज़ से बंद नहीं होता।"

रज़िया कुछ कहने लगी, फिर चुप हो गई और अंदर चली गई।

"आपा," मैंने धीरे से कहा। "कल से गुमटी में कोई नहीं आएगा।"

"आएगा," उन्होंने कहा।

"कैसे?"

"क्योंकि मैं चूल्हा जलाऊँगी," उन्होंने कहा, और मेरी तरफ़ देखा। "चूल्हा जलता दिखेगा तो कोई न कोई तो आएगा ही। कोई चाय माँगे या न माँगे, चूल्हा जलना नहीं बंद होगा। और अगर तू कल से ये सोचेगा कि गली में सब खत्म हो गया, तो मैं तेरी चाय में नमक नहीं, गुस्सा डालूँगी।"

मैं हँसा। हँसी निकली नहीं, सिर्फ़ चेहरे पर आई और रुक गई।

"जा," उन्होंने कहा। "सो जा। सुबह जल्दी उठना है।"

घर लौटते वक़्त मैंने पीपल के नीचे से गुज़रना चुना। जान-बूझकर। मुझे देखना था कि वो जगह कैसी लगती है।

चबूतरी वहीं थी। ईंटें वहीं थीं। पर उस जगह पर जहाँ मेरी टूटी मेज़ रखी थी, अब सिर्फ़ धूल में चार गोल निशान बचे थे। उन निशानों को देखकर मुझे लगा कि धूल किसी की याद भी रखती है, बस उसकी शक्ल में नहीं, उसके बोझ में।

पीपल की डाल में वो सफ़ेद काग़ज़ की पतंग अब भी टँगी थी। सानिया और रफ़ीक़ ने बनाई थी, फिर आधी फट गई थी, फिर कोई उसे छोड़ गया। मैंने उसे आज नहीं छुआ।

मैं घर पहुँचा। माँ बुखार में सोई थीं। काजल उनके पैरों के पास बैठी थी और उसके हाथ में नर्सिंग की किताब थी, पर आँखें किताब पर नहीं, माँ के चेहरे पर थीं।

"कुछ खाया?" उसने पूछा।

"खा लिया।"

"क्या खाया?"

"रोटी।"

"किसके घर की?"

"आपा की।"

वो थोड़ा सुकून में आई। "अच्छा।"

मैं दरवाज़े के पास बैठ गया। माँ की साँस धीमी थी और थोड़ी बेआवाज़, जैसे कोई सोते हुए भी गिन रहा हो।

काजल ने किताब बंद की और धीरे से बोली, "भैया, आज माँ ने नींद में एक बात कही।"

"क्या?"

"कहा कि जो घंटी बोलती थी, वो घंटी नहीं थी।"

मैं ठिठका।

"और कुछ?" मैंने पूछा।

"कुछ नहीं।" उसने कंधा उचकाया। "बस इतना। फिर करवट बदल ली।"

मैं माँ के पास गया। उनका हाथ ठंडा था और उनके माथे पर पसीना था। मैंने उनकी चादर सीधी की। वो हिलीं, आँखें खोलीं, और मुझे देखकर पहली बात यह कही —

"घंटी बोली?"

मेरा गला सूख गया।

"नहीं," मैंने कहा।

वो मेरी तरफ़ देखती रहीं। फिर उन्होंने धीरे से कहा, "तो वो भी इंतज़ार कर रही है। किसी का।"

मैंने उनके पैर को हाथ लगाया। "आप सोइए।"

"मैं सो रही हूँ," उन्होंने कहा, और आँखें बंद कर लीं। फिर बिना आँखें खोले बोलीं, "बेटा, कल दुकान खोलना। आज की तरह चुपचाप नहीं। आवाज़ करके खोलना।"

सुबह मैंने शटर उठाया।

मैंने जान-बूझकर उसे आवाज़ के साथ उठाया। लोहा चरमराया, नीचे धूल गिरी, और मैंने अपनी पूरी ताक़त से शटर खींचकर ऊपर किया, इतनी तेज़ कि आवाज़ गली के मोड़ तक गई होगी।

कोई नहीं आया।

मैंने पहियों वाले टब को बाहर निकाला और उसमें पानी भरा। मैंने औज़ारों को एक-एक करके पोछा और ट्रंक पर सजाया। मैंने नई रिंच वहीं रखी जहाँ टिंकू उसे देखता था, और फिर उसे उठाकर अंदर रख दिया, क्योंकि उसे देखकर मेरा मन बैठ गया।

सात बजे मैंने बाहर आकर देखा। गली में दो औरतें नल पर पानी भर रही थीं, एक बच्चा दूध लेने जा रहा था, एक बूढ़ा अपनी चारपाई पर बैठा खाँस रहा था।

कोई भी मेरी तरफ़ नहीं देख रहा था।

यही सबसे अजीब था। कोई गाली नहीं, कोई बहस नहीं, कोई ताना नहीं। बस आँखें कहीं और।

मैं दुकान के बाहर पत्थर की पटिया पर बैठ गया और अपनी कोहनी पर हाथ टिकाकर सड़क देखने लगा।

तभी चिंटू आया।

वो साइकिल पर था। उसकी साइकिल का पहिया मेरी दुकान की ओर मुड़ गया, यानी उसका इरादा था। वो मुड़ा भी, और उसने आधी आवाज़ में कहा, "भैया, मेरी चेन—"

"इधर आ," मैंने कहा।

वो आगे बढ़ा ही था कि पीछे से उसकी अम्मी की आवाज़ आई।

"चिंटू!"

वो जैसे हवा में रुक गया।

उसकी अम्मी दौड़ती हुई आईं, उसका कंधा पकड़ा और उसे साइकिल से उतार दिया। फिर वो मेरी तरफ़ देखे बिना बोलीं, "चिंटू, मैंने कितनी बार कहा है कि उस तरफ़ मत जाना।"

"अम्मी, चेन टूट गई है—"

"चेन मैं ठीक करवा दूँगी," वो बोलीं, और साइकिल उलटी तरफ़ घसीटने लगीं। "चल।"

चिंटू ने पीछे मुड़कर मुझे देखा। उसकी आँखों में वो बात थी जो बच्चों की आँखों में होती है — शर्म और सवाल एक साथ।

मैंने हाथ उठाया और मुस्कुरा दिया। उसे डाँटने की ज़रूरत नहीं थी। उसकी अम्मी को नहीं, उसे नहीं।

वो चला गया। साइकिल की चेन उसकी अम्मी की साड़ी से रगड़ खाती गई और आवाज़ करती गई।

मैं वहीं बैठा रहा। और उस दिन मैंने एक चीज़ सीखी — मुझे कोई सफ़ाई देने आए, उससे पहले मुझे सुनना होगा। बिना सुने सफ़ाई देना भी एक तरह का शोर है।

नौ बजे मैं स्कूल के गेट पर था।

मुझे वहाँ कोई काम नहीं था। मैंने खुद से कहा कि मुझे चिंटू का दस्ताना मिला था, उसे लौटाना है। झूठ था। मैं बस यह देखना चाहता था कि गली में क्या बोला जा रहा है। और गली की सबसे सच्ची खबर हमेशा स्कूल के गेट पर होती है।

मैंने दूर से देखा।

गेट के पास तीन औरतें खड़ी थीं और एक आदमी — मोटा, हाथ में टिफ़िन का थैला। वो बात कर रहे थे और उनकी बात में मेरा नाम नहीं था, पर मेरी दुकान थी।

"वो जो साइकिल वाला है ना," एक औरत बोली, "उसके पास जो जाता है, उसके घर में कोई न कोई पड़ जाता है।"

"मेरी भाभी कह रही थी," दूसरी बोली, "कि उसने अपनी दुकान में कोई तांत्रिक चीज़ रखी है। छोटी सी घंटी है। रात में बजती है।"

"हाँ, मेरे बच्चे ने भी सुना था।"

"और उसके पास जो आया, उसका घर टूटा — भोला भाई की दुकान, शबनम की गुमटी, उस्ताद की सिलाई — सब देख रहे हो ना?"

मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे पैर जम गए थे। मैंने सोचा था कि मैं गुस्सा करूँगा। पर गुस्सा नहीं आया। जो आया, वो ठंडा और भारी था, जैसे किसी ने मेरे सीने पर गीली चादर रख दी हो।

मोटे आदमी ने कहा, "मैं तो अपने लड़के को साफ़ कह चुका हूँ — उस गली से निकलना मत, उस दुकान के सामने से मत जाना।"

"पर वो तो गली में ही रहता है," एक औरत ने कहा।

"तो रहता रहे," उसने कहा। "हम नहीं जाएँगे।"

मैं वहीं से मुड़ गया।

दोपहर को नल पर झगड़ा हुआ।

मुझे बच्चों की टोली से खबर मिली — रफ़ीक़ दौड़ता हुआ आया और साँस नहीं ले पा रहा था। उसने सिर्फ़ इतना कहा, "भैया, नल पर अब्बा लड़ रहे हैं!"

मैं दौड़ा।

वहाँ पहुँचा तो देखा — सानिया के अब्बा और गुड्डू के पापा आमने-सामने थे। दोनों का हाथ एक ही लोहे की बाल्टी पर था। पानी बीच में गिर रहा था, धूप में सफ़ेद भाप जैसा उठता हुआ।

"छोड़ बाल्टी," सानिया के अब्बा कह रहे थे।

"तू छोड़," गुड्डू के पापा बोले। "मेरी बारी थी। रोज़ मैं दो बाल्टी भरता हूँ।"

"रोज़ तेरी बारी होती है," सानिया के अब्बा बोले। "मेरी बीवी को बुखार है, मुझे पानी चाहिए।"

"मेरे घर में भी चूल्हा जलाना है।"

"तो चूल्हा पहले जलाओ, बाल्टी बाद में!"

बात इतनी बढ़ी कि दोनों की उँगलियाँ उठ गईं।

"अब्बा!" सानिया ने कहा। वो दूर खड़ी थी और उसका चेहरा सफ़ेद था।

मैं बीच में गया।

"अब्बा," मैंने कहा, "बात सुनिए। बाल्टी दोनों की है, नल सबका है। आधा-आधा भर लीजिए, और चाहे तो मैं एक और बाल्टी लेकर आ जाऊँगा।"

दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।

और फिर दोनों ने एक साथ मेरी तरफ़ हाथ उठाया।

"तू बीच में क्यों आता है?" सानिया के अब्बा की आवाज़ कड़क थी, पर उसमें कुछ और भी था, जो उन्हें खुद भी अच्छा नहीं लग रहा था। "तू मेरी बेटी को अपनी दुकान पर मत बुला। वो तेरे पास जाती है, मेरे घर में अशांति है।"

मेरे पेट में कुछ मुड़ा।

"अब्बा, ये क्या कह रहे हैं?" मैंने कहा। "सानिया ने क्या किया?"

"सानिया ने कुछ नहीं किया," गुड्डू के पापा ने कहा। "पर तेरे पास आने वालों का हिसाब ठीक नहीं है। मेरे बेटे ने कल से खाना छोड़ दिया है, तेरी गली से आते ही। तू बता, मैं इसे किसके भरोसे छोड़ूँ?"

"मैंने किसी का कुछ नहीं किया," मैंने कहा। मेरी आवाज़ धीमी थी, और शायद इसीलिए सबने सुना।

"किया हो या न किया हो," सानिया के अब्बा बोले, "अब तेरी दुकान के सामने से मेरी बेटी नहीं गुज़रेगी।"

बाल्टी छूट गई। पानी फैल गया। और ज़मीन पर गिरी बाल्टी लुढ़ककर मेरे पैर के पास रुकी। मैंने उसे उठाया।

"ये लीजिए," मैंने कहा, और सानिया के अब्बा की तरफ़ बढ़ाई।

उन्होंने नहीं ली।

मैंने गुड्डू के पापा की तरफ़ बढ़ाई।

उन्होंने भी नहीं ली।

"रख दे वहीं," सानिया के अब्बा ने कहा, और मुड़ गए।

वो दोनों चले गए। सानिया दूर खड़ी रही। उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में जो था, वो ऐसा था कि मैंने अपनी नज़र नीची कर ली।

मैंने वो बाल्टी वहीं नल के नीचे रख दी। पानी भरकर। दोनों के लिए। अलग-अलग।

कोई उठाने नहीं आया।

मैं वापस दुकान आया और हाथ धोया।

टब में मेरा चेहरा दिख रहा था। मैंने उसे देखा और धीरे से बोला, "अंकुश, तू इनका क्या लगता है?"

पानी में कोई जवाब नहीं आया।

दो बजे उस्ताद की दुकान पर एक और काग़ज़ आया।

मैं वहीं था — उनके साथ बैठा था, जैसा डॉक्टर साहब ने कहा था। उनकी पचास साल पुरानी सिलाई मशीन कपड़े से ढकी थी। आज टिक-टिक नहीं हो रही थी, और उस टिक-टिक के बिना दुकान ऐसी लग रही थी जैसे साँस लेना भूल गई हो।

काग़ज़ एक सफ़ेद कमीज़ वाला आदमी लाया। उसने उस्ताद के हाथ में दिया, कुछ नहीं बोला, और मुड़कर चला गया — वैसे ही जैसे तीन दिन पहले वाला आदमी गया था।

उस्ताद ने उसे खोला। उन्होंने चश्मा नहीं पहना था। उन्होंने काग़ज़ बहुत दूर से देखा, जैसे पढ़ रहे हों, फिर मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।

"पढ़," उन्होंने कहा।

"उस्ताद, आप—"

"पढ़।"

उसमें लिखा था कि दुकान से जुड़े काग़ज़ों की जाँच तक काम बंद रहेगा, और आज शाम पाँच बजे दुकान पर प्रशासन की तरफ़ से ताला लगाया जाएगा। नीचे न मोहर नाम न तारीख़।

मैंने काग़ज़ मेज़ पर रख दिया।

"उस्ताद," मैंने कहा, "ये काग़ज़ नहीं है। ये डर है, काग़ज़ की शक्ल में।"

"मुझे पता है," उन्होंने कहा।

"तो?"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनका चश्मा मेज़ पर था, और उनकी आँखें उसके बिना छोटी और बहुत साफ़ लग रही थीं।

"मैं ताला खुद नहीं लगाऊँगा," उन्होंने कहा। "मैं तीन बजे दुकान खोलूँगा, चार बजे तक बैठूँगा, और पाँच बजे जब वो आएँगे, तो दुकान खुली मिलेगी।"

"और अगर वो ताला लगा दें?"

"तो गली देखेगी," उन्होंने कहा। "मेरे हाथ से नहीं, उनके हाथ से लगेगा। फ़र्क़ यही है।"

वो उठे, मशीन के पास गए, और उससे लगी अलमारी से एक कपड़ा निकाला। फिर वो बैठ गए और उसी कपड़े को गोद में रखकर सीधा करने लगे, हालाँकि वो पहले से सीधा था।

"उस्ताद," मैंने कहा, "घंटी आपसे भी नहीं बोलती?"

उनके हाथ रुक गए।

"मैंने कल रात बजाई थी," उन्होंने कहा। "तू सो रहा था, मैंने जान-बूझकर तुझे नहीं बुलाया। मैंने कहा, चल देखें।"

"तो?"

"कुछ नहीं," उन्होंने कहा। "सिर्फ़ ठंडा पीतल।"

मैंने सिर नीचा कर लिया।

फिर उन्होंने वो कपड़ा मेज़ पर रखा और बोले, "अंकुश, मैं तुझे एक बात बताता हूँ जो मैंने पचास साल में सीखी। जोड़ तंत्र दो चीज़ों से चलता है — सच और भरोसा। सच तेरे पास है। भरोसा गली के पास है। और आज गली का भरोसा तेरे पास नहीं है। इसीलिए घंटी चुप है।"

"तो मैं क्या करूँ?"

"कुछ मत कर," उन्होंने कहा।

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"आज कोई काम मत कर," उन्होंने कहा। "आज कोई सफ़ाई मत दे, किसी को मत कह कि मैंने कुछ नहीं किया, अपना बोर्ड मत लगा, बच्चों को मत बुला। आज बस बैठ। मेरे साथ। चाय पी।"

"इससे क्या होगा?"

"गली देखेगी कि तू डरकर भागा नहीं," उन्होंने कहा। "और बात करने वाले बहुत होते हैं, अंकुश। देखने वाले कम।"

तीन बजे उस्ताद ने दुकान खोली।

उन्होंने मशीन का कपड़ा उतारा, बुनाई की तरफ़ देखा, और फिर मशीन शुरू कर दी। टिक-टिक शुरू हुई — धीमी, कमज़ोर, पर टिक-टिक।

चार बजे एक ग्राहक आया — बूढ़ा किशनलाल काका, पुरानी किराने की दुकान वाला। वो आया और रुका, और उसने कुछ सिलने को नहीं दिया। उसने बस उस्ताद के सामने बैठकर कहा, "क्या हाल है?"

"ठीक," उस्ताद ने कहा।

"मेरी दुकान पर भी काग़ज़ आया था," काका ने कहा। "मैंने जलाया नहीं। बोरी के नीचे रख दिया।"

उस्ताद ने सुई रोक दी।

"क्यों रखा?" उन्होंने पूछा।

"क्योंकि जो काग़ज़ बिना नाम का हो," काका ने कहा, "वो मेरा नहीं। और जो मेरा नहीं, उसे जलाने का हक़ भी मेरा नहीं।"

वो उठे और चले गए।

मैं उनकी तरफ़ देखता रहा।

"देखा?" उस्ताद ने कहा। "ये भी एक ग्राहक है। और गिनती में है।"

शाम को मैंने गुमटी की तरफ़ देखा।

शबनम आपा चूल्हे के पास बैठी थीं। चूल्हा जल रहा था। और उनके सामने वाला बेंच खाली था।

एक आदमी गुज़रा — वो भोला भाई के पास का ही था, मुझे चेहरा याद था। शबनम आपा ने उसे देखकर कहा, "अरे, एक कटोरी चाय पी ले। मेरी तरफ़ से।"

वो आदमी रुका। उसने चूल्हे की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़ देखा — मैं दुकान के बाहर बैठा था — और उसने कहा, "नहीं आपा, अभी जल्दी है।"

और वो चला गया।

शबनम आपा ने कटोरी वापस रखी। उन्होंने कुछ नहीं कहा।

रज़िया बाहर आई और उसने कटोरी उठाई।

"आपा," उसने कहा, "इसे मैं पी लूँ?"

"पी ले," शबनम आपा ने कहा।

रज़िया ने पी, और पीते-पीते उसकी आँखें भर आईं। उसने कटोरी रख दी और अंदर चली गई।

मैंने देखा — शबनम आपा के हाथ काँप रहे थे। पर वो चिमटी उठाकर समोसे पलटने लगीं, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

सात बजे मैं पीपल के नीचे अकेला था।

गली में बच्चों की आवाज़ नहीं थी।

ये बात मुझे तब समझ आई जब मैंने कान लगाकर सुना। हर शाम यहाँ क्रिकेट की आवाज़ होती थी, चिंटू की चीख, सानिया की डाँट, गुड्डू का रोना, रफ़ीक़ का हँसना। आज कुछ नहीं। सिर्फ़ एक तारे जैसी चिड़िया बोली और चुप हो गई।

मैंने जेब से घंटी निकाली।

"सुन," मैंने कहा।

कुछ नहीं।

मैंने उसे बजाया।

टन।

बस टन। ठंडा, सूखा, बिना किसी आवाज़ के।

"अरे," मैंने कहा, "मैं जानता हूँ तू नाराज़ है। पर एक बार बोल।"

कुछ नहीं।

मैंने फिर बजाया। फिर बजाया। फिर बजाया, और अब मेरा हाथ काँप रहा था और मुझे पता था कि मैं कितना बेवकूफ़ लग रहा हूँगा अगर कोई देख रहा हो, पर मैं रुका नहीं।

"तू बोलती थी," मैंने कहा। "तूने मुझे बताया था कि कौन सा रिश्ता टूटने वाला है, तूने मुझे चेताया था, तूने मेरे कान में बातें डाली थीं — अब चुप क्यों?"

कुछ नहीं।

"मैंने कुछ ग़लत किया हो तो बता," मैंने कहा। "मैं सुधार लूँगा।"

कुछ नहीं।

"सुन," मैंने धीरे से कहा। "अगर तुझे लगता है कि मैंने तुझे ग़लत इस्तेमाल किया, तो बता। मैं तुझे वापस कर दूँगा। जहाँ से आई थी, वहीं।"

और जैसे ही ये शब्द मेरे मुँह से निकले, मेरे हाथ में घंटी थोड़ी और ठंडी हो गई। ऐसी ठंडी जैसे बर्फ़।

मैंने उसे तुरंत सीने से लगा लिया।

"नहीं," मैंने कहा। "नहीं, मैं वो नहीं कहूँगा। जाने की बात नहीं करूँगा। तू रह। तू बस रह। चुप रह, पर रह।"

मैं चबूतरी पर बैठ गया और घंटी अपनी हथेली पर रखकर देर तक बैठा रहा। रात गहरी होती गई। मेरे पैर सुन्न हो गए।

तभी मेरे पीछे से आवाज़ आई, "यहाँ अकेले?"

मैं चौंका।

डॉक्टर निहाल इसरानी थे। हाथ में छोटी टॉर्च और एक काग़ज़ का थैला।

"अस्पताल गया था," मैंने कहा, खड़ा होते हुए। "माँ की दवा—"

"माँ की दवा मैंने काजल को दे दी," उन्होंने कहा। "मैं तुझे ढूँढ रहा था।"

वो मेरे पास बैठ गए। उन्होंने चबूतरी पर हाथ रखा और धूल देखी, फिर मेरी हथेली में रखी घंटी देखी।

"बजी?" उन्होंने पूछा।

"नहीं।"

"क्या सोच रहा है?"

"सोच रहा हूँ," मैंने कहा, "कि ये मेरे काम की नहीं रही।"

डॉक्टर साहब कुछ देर चुप रहे। फिर उन्होंने अपनी जेब से अपना पुराना स्टेथोस्कोप निकाला — वो जिसकी नली पर टेप लिपटा था — और उसे अपनी हथेली पर रखकर बोले, "देख।"

"क्या?"

"मेरे पास तीस साल से ये है," उन्होंने कहा। "जिस दिन मरीज़ नहीं आते, ये भी चुप हो जाता है। किसी को सुनता नहीं। बेकार। और जब पहला मरीज़ आता है, ये वैसे ही काम करता है, जैसे कल तक कर रहा था। ये बदला नहीं। मेरा अस्पताल बदला, मरीज़ बदले।"

"आप क्या कहना चाहते हैं?"

"मैं कहना चाहता हूँ," उन्होंने कहा, "कि घंटी कभी तेरी नहीं थी। वो गली की है। जिस दिन गली चुप हो जाती है, वो भी चुप हो जाती है। ये हमारा तंत्र है, अंकुश — ये लोगों से चलता है। जादू से नहीं।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"तो मेरी ग़लती क्या थी?"

"तेरी ग़लती यह नहीं थी कि तूने कुछ ग़लत किया," उन्होंने कहा। "तेरी ग़लती यह थी कि तूने सोचा कि तू काफ़ी है।"

मेरा गला भर आया। मैंने सिर नीचा कर लिया, ताकि वो देख न सकें।

"मैं डर गया था," मैंने कहा। "आज सुबह जब कोई नहीं आया, तो मुझे लगा कि मैं ख़त्म हो गया।"

"नहीं," उन्होंने कहा। "तू ख़त्म नहीं हुआ। तेरा शोर ख़त्म हुआ है। और शोर ख़त्म होना भी ज़रूरी है। जो आदमी शोर करके जोड़ता है, वो शोर ख़त्म होने पर रो देता है। जो चुपचाप जोड़ता है, वो चुप्पी में भी बैठा रहता है।"

उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और उठ गए।

"कल सुबह," उन्होंने कहा, "उस्ताद के साथ बैठना। बिना काम। और अगर कोई कहे कि तूने उसका घर तोड़ा है, तो बहस मत करना। बस पूछना — भाई, चाय पी ले।"

"और अगर वो चाय न पिए?"

"तो कल फिर पूछना," उन्होंने कहा, और चल दिए।

मैं उन्हें देखता रहा। वो गली के मोड़ पर मुड़ गए और अंधेरे में मिल गए।

रात दस बजे मैंने शटर गिराया।

पर मैं अंदर नहीं गया। मैं बाहर पत्थर की पटिया पर बैठ गया और गली देखने लगा। दूर एक बत्ती जल रही थी और एक कुत्ता कहीं भौंका और चुप हो गया।

तभी मुझे कदमों की आवाज़ सुनाई दी।

पहले मुझे लगा कि डॉक्टर साहब लौट रहे हैं। फिर मुझे लगा कि कोई बच्चा है। फिर मैंने देखा और मेरी साँस रुक गई।

कोई गाड़ी नहीं थी।

वो पैदल आ रहा था।

सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद पैंट, और जूते जिनपर आज धूल थी। वो अकेला था। उसके पीछे कोई नहीं था। वो मेरी दुकान तक आया और रुका, और फिर उसने वो किया जो मैंने सोचा भी नहीं था।

उसने पीपल की डाल की तरफ़ हाथ बढ़ाया।

और वो सफ़ेद काग़ज़ की पतंग उतार ली।

वो उसे दोनों हाथों से सीधा करने लगा। काग़ज़ चरमराया।

"ये किसी की नहीं है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वही पुरानी नरमी थी। "किसी ने मुझे बताया था।"

मैं उठ खड़ा हुआ। मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए।

"आपको क्या चाहिए?" मैंने कहा।

"कुछ नहीं," उसने कहा। "मैं आज कोई काग़ज़ लेकर नहीं आया। कोई वकील नहीं है। कोई गाड़ी नहीं है।"

उसने पतंग मोड़ी, और फिर उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया — मेरी तरफ़।

मैंने हाथ नहीं बढ़ाया।

"ले," उसने कहा। "ये किसी की नहीं है ना? तो अब मेरी है।"

"रखिए," मैंने कहा।

उसने पतंग अपनी जेब में रख ली।

फिर उसने पीपल की तरफ़ देखा, और उस जगह की तरफ़ जहाँ धूल में चार गोल निशान थे।

"कल शाम पाँच बजे," उसने कहा, "मैं यहाँ कुर्सी रखवाऊँगा। एक नहीं, दो। एक मेरी, एक तेरी।"

"मेरी कुर्सी क्यों?"

"क्योंकि मैं चाहता हूँ कि तू बैठे," उसने कहा। "मैं चाहता हूँ कि पूरी गली देखे कि हम दोनों एक ही जगह बैठ सकते हैं। और फिर वो जो तेरे बारे में स। "और फिर वो जो तेरे बारे में सोचते हैं, वो खुद सोचते रह जाएंगे।"

उसने यह कहा और मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ नहीं थी जो अक्सर तस्वीरों में होती है। कोई चमक नहीं, कोई जीत नहीं। बस एक थकान। ऐसी थकान जो बहुत दूर तक चलकर आए आदमी के चेहरे पर होती है।

"आप रात में अकेले क्यों आए?" मैंने पूछा।

"क्योंकि दिन में मेरे साथ लोग होते हैं," उसने कहा। "और आज मैं किसी के साथ नहीं आना चाहता था।"

"क्यों?"

"क्योंकि जिस बात के लिए मैं आया हूँ, वो भीड़ में नहीं कही जाती।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरी दुकान का शटर गिरा हुआ था। पीपल की डाल हवा में हिल रही थी और वो काग़ज़ की पतंग उसकी जेब से बाहर एक कोना दिखा रही थी, जैसे कोई चोर पकड़ा गया हो।

"पाँच बजे की कुर्सी की बात छोड़िए," मैंने कहा। "पहले ये बताइए — आप गली में ये क्यों फैला रहे हैं कि मेरे पास जो आता है, उसका घर टूटता है?"

वो हँसा। बहुत धीमे से। इतने धीमे कि हँसी का पता ही नहीं चला, सिर्फ़ उसके कंधे हिले।

"मैंने कुछ नहीं फैलाया," उसने कहा। "मैंने तो सिर्फ़ सच कहा। और सच को फैलाना नहीं पड़ता। सच खुद फैलता है।"

"कौन सा सच?"

"ये सच," उसने कहा, "कि तेरे पास जो आया, वो अपनी टूटी चीज़ लेकर आया। और जो टूटी चीज़ लेकर किसी के पास जाता है, वो अपनी टूटन भी साथ ले जाता है। तेरे पास आकर लोग जुड़ते नहीं — लोग टूटते हैं। उनका ध्यान टूटता है, उनका भरोसा टूटता है, उनकी नींद टूटती है। और तू उन्हें ये कहता है कि मैं जोड़ रहा हूँ।"

मेरी मुट्ठी भींच गई। फिर मैंने उसे ढीला किया।

"आप झूठ बोल रहे हैं," मैंने कहा। "आपको पता है कि आप झूठ बोल रहे हैं।"

"हो सकता है," उसने कहा, "पर जो लोग इसे सुनेंगे, उन्हें ये नहीं पता चलेगा। उन्हें सिर्फ़ इतना पता चलेगा कि मैंने एक चीज़ कही और उनके घर में कुछ टूटा। और इंसान दो चीज़ों को हमेशा जोड़कर देखता है — जो उसने सुना, और जो उसके साथ हुआ।"

वो पलटा।

फिर वो रुका और बिना पलटे बोला, "तेरे पास जो घंटी है ना… वो आज बोली?"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"नहीं बोली," उसने कहा। "मुझे पता है। क्योंकि जिस चीज़ की ज़ुबान लोगों से चलती है, वो लोगों के चुप होते ही चुप हो जाती है। और आज तेरी गली चुप है।"

वो चला गया।

उसके जाने के बाद गली में धूल बैठ गई और मैं वहीं खड़ा रहा। बहुत देर तक।

मैंने उस रात आँख नहीं लगाई।

चारपाई पर लेटा रहा। छत की तरफ़ देखता रहा। बल्ब गुनगुनाता रहा और बाहर कभी कुत्ता भौंकता, कभी नहीं। घंटी मेरी जेब में थी। मैंने उसे नहीं निकाला। मुझे डर था कि अगर निकालूँगा और वो चुप रही, तो मैं सो नहीं पाऊँगा। और मुझे सोना था। सुबह उस्ताद की दुकान पर जाना था। चाय पीनी थी। बिना सफ़ाई दिए।

मैंने आँखें बंद कीं और मन में गिनती गिनने लगा। एक, दो, तीन…

फिर मैंने घंटी निकाली।

अँधेरे में पीतल कुछ नहीं बोला। मैंने उसे हथेली पर रखा। ठंडी थी। मैंने उसे सीने से लगाया। फिर वापस जेब में रखा।

और सुबह हो गई।

सुबह जब मैंने शटर उठाया, तो गली में कोई नहीं था।

सच में कोई नहीं।

ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। सुबह छह बजे भी गली में आवाज़ होती थी — नल की, चप्पलों की, किसी औरत के बर्तन की, किसी बच्चे के रोने की। आज सिर्फ़ चिड़िया थी, और गली के आख़िर में कोई दरवाज़ा खुला और फिर बंद हो गया।

मैंने पानी का टब भरा और हाथ धोया। फिर मैंने औज़ारों के ट्रंक को खोला और उसमें से एक पुराना पंचर का टुकड़ा निकाला, जिसे मैंने कल ही रखा था। मेरे हाथ काम करना चाहते थे। पर दुकान पर काम नहीं था।

तभी मुझे गुमटी की तरफ़ से आवाज़ आई। शबनम आपा की आवाज़।

"आज चाय नहीं बनेगी," किसी ने कहा था।

और शबनम आपा का जवाब था, "चूल्हा जल रहा है।"

मैं गुमटी तक गया तो वहाँ लक्ष्मी देवी बैठी थीं। उनके हाथ में कपड़ा था और उनकी सुई चल रही थी। शबनम आपा के हाथ में लोहे की चिमटी थी और वो चूल्हे पर रखे तवे को साफ़ कर रही थीं। गुमटी के बाहर नोटिस अब भी लगा हुआ था, कोने से हवा में हिलता हुआ।

"क्या बात है?" मैंने कहा।

"कुछ नहीं," शबनम आपा ने कहा। "रोज़ जैसा ही दिन है।"

"आपा, गुमटी में कोई नहीं है।"

"अभी सुबह है," उन्होंने कहा। "लोग आएँगे।"

मैं वहीं खड़ा रहा।

तभी एक आदमी आया। पीली शर्ट, हाथ में थैला। वो गुमटी के सामने आया और रुक गया और फिर शबनम आपा की तरफ़ देखने लगा और फिर मेरी तरफ़।

उसने कोई चाय नहीं माँगी।

"चाय?" शबनम आपा ने कहा।

उसने हाथ हिलाया। "मुझे… मुझे वहाँ से पी लूँगा," उसने मोड़ की तरफ़ इशारा किया।

"यहाँ बैठिए," शबनम आपा ने कहा। "कुर्सी खाली है।"

"वो… वो बैठे हैं," उसने मेरी तरफ़ देखकर कहा।

शबनम आपा ने हाथ में चिमटी पकड़ी थी। उन्होंने चिमटी को तवे पर पटक दिया।

पटकने की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि वो आदमी एक कदम पीछे हट गया।

"सुन," शबनम आपा ने कहा। "ये गुमटी बीस साल से यहाँ है। इस गुमटी में न किसी का बाप आया, न किसी का साहब। जो चाय पीनी है, वो बैठकर पिएगा। जिसे नहीं पीनी, वो जाए और कहीं और पी।"

वो आदमी कुछ कहे बिना चला गया।

शबनम आपा ने उसकी तरफ़ देखा और फिर मेरी तरफ़ और फिर उन्होंने मुझे बैठने का इशारा किया।

मैं बैठ गया।

"तू चिंता मत कर," उन्होंने कहा। "आज ग्राहक कम है। कल ज़्यादा होंगे।"

"आपा, कल ज़्यादा क्यों होंगे?"

"क्योंकि भूख किसी कीमत पर नहीं रुकती," उन्होंने कहा। "और जिस दिन चाय वाले को चाय के लिए सोचना पड़े, उस दिन समझ लेना कि दुनिया टेढ़ी हो गई है।"

मैंने कप उठाया। फिर मैंने कहा, "मेरे साथ मत बैठिए। आपका धंधा बंद हो जाएगा।"

शबनम आपा हँसीं। ज़ोर से।

"मेरा धंधा तब बंद होगा," उन्होंने कहा, "जब मेरा हाथ चिमटी उठाना भूल जाए। तू अपने धंधे की सोच।"

उस्ताद की दुकान में आज टिक-टिक नहीं थी।

वो मशीन ढकी हुई थी। सफ़ेद कपड़े से। कपड़े पर धूल नहीं थी, यानी उन्होंने आज सुबह ही उसे ढका था।

उस्ताद सिलाई की छोटी स्टूल पर बैठे थे। उनके सामने चाय का कप रखा था और उनके हाथ में चश्मा था। वो चश्मे का काँच पोंछ रहे थे, हालाँकि उसमें कोई धूल नहीं थी।

"आइए," उन्होंने कहा, मेरी तरफ़ देखे बिना।

मैं बैठ गया।

"मशीन क्यों ढकी है?"

"आज काम नहीं है," उन्होंने कहा।

"कल?"

"कल की कल देखेंगे।"

वो चुप रहे। फिर उन्होंने चश्मा पहना और मेरी तरफ़ देखा।

"ताला लगाने की बात कही थी," मैंने धीरे से कहा। "आपने कहा था शाम को ताला लगाएँगे और पूरी गली गवाह होगी।"

उस्ताद ने अपना कप उठाया। एक घूँट लिया। फिर उन्होंने कप रख दिया।

"मैंने सोचा," उन्होंने कहा, "और मैंने ताला नहीं लगाया।"

"क्यों?"

"क्योंकि ताला लगाने का मतलब था कि मैं हार गया," उन्होंने कहा। "और मैं हारा नहीं हूँ। मैं तो अभी लड़ा भी नहीं।"

उन्होंने अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ सूखी थीं और फटी हुई थीं और उनके नाखून काटे हुए थे। कोई उम्र भर सुई और कैंची और धागे से खेलता है तो उसके नाखून ऐसे ही हो जाते हैं।

"एक बात सुन," उन्होंने कहा। "पचास साल पहले, जब मैंने ये मशीन खरीदी थी, तब मेरे भाई ने मुझसे कहा था — ये मशीन तेरी नहीं है, ये उसका है जो इस पर सबसे पहला टाँका लगाएगा।"

"और पहला टाँका किसने लगाया?"

"माँ ने," उस्ताद ने कहा। "मेरी माँ ने। और उसके बाद पूरी गली की औरतें आईं और ये मशीन कभी अकेली नहीं रही।"

उन्होंने चाय का दूसरा घूँट लिया।

"अब ये मशीन एक हफ़्ते से अकेली है," उन्होंने कहा। "और आज सुबह मुझे ताला लगाने का मन था। पर मैंने सोचा, अगर मैंने ताला लगा दिया और कल कोई औरत आई और मेरी मशीन पर टाँका लगाने के लिए बैठ गई, तो वो क्या करेगी? जाएगी तो कहाँ?"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"एक बात और," उस्ताद ने कहा। "तूने कल रात मुझे बताया था कि तेरी घंटी चुप हो गई। मैंने तुझे सुबह सिर्फ़ इतना कहा था कि घंटी लोगों से चलती है। पूरी बात नहीं कही थी।"

"क्या पूरी बात?"

वो उठे। दुकान के अंदर गए। वो वहाँ से एक छोटा लकड़ी का डिब्बा लाए, जिसके ऊपर पुराना सफ़ेद कपड़ा लिपटा हुआ था। उन्होंने उसे मेरे सामने रखा और फिर उन्होंने वो कपड़ा खोला।

डिब्बे में एक पुरानी सिलाई की सुई थी। बहुत पुरानी। उसका आधा हिस्सा ज़ंग खा चुका था और नोक मुड़ी हुई थी।

"ये मेरी माँ की है," उस्ताद ने कहा। "ये सुई तब टूटी थी जब मेरे भाई ने मेरी मशीन का धागा काट दिया था।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"मेरी माँ ने मुझे ये सुई दी थी और कहा था — याद रख, जो सुई टूटे, उसी से टाँका भी लगता है।"

मैं उनकी बात समझ रहा था और नहीं भी समझ रहा था।

"तू घंटी को बजाकर पूछता है," उस्ताद ने कहा। "पर घंटी कोई अलग चीज़ नहीं है। ये सुई है। ये महसूस करती है कि गली में कोई धागा जुड़ रहा है या नहीं। जब गली में कोई धागा जुड़ता है, ये बोलती है। जब गली में सब धागे टूटे पड़े हों, तो ये क्या बोलेगी? तू बोल।"

"कुछ नहीं," मैंने कहा।

"कुछ नहीं," उन्होंने कहा। "बिल्कुल सही। तेरी घंटी खराब नहीं हुई है। तेरी गली से धागे टूटे पड़े हैं।"

मैंने चाय का कप उठाया। मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने कप रख दिया।

"फिर मैं क्या करूँ?" मैंने पूछा।

"मेरे पास जवाब नहीं है," उस्ताद ने कहा। "जवाब मेरे पास पचास साल पहले था, जब मैंने तेरी उम्र के एक लड़के से कहा था कि गली का काम गली करेगी। आज मैं तुझे वही कहूँगा और तू मुझसे सवाल पूछेगा कि कैसे। और मेरे पास जवाब नहीं होगा।"

उन्होंने अपना कप खाली किया।

"अब जा," उन्होंने कहा। "और तूने जो कहा था ना — बिना सफ़ाई के चाय पीने की बात — वो तूने मेरे साथ निभा लिया। इससे ज़्यादा और कुछ मत माँगना।"

मैं उठा। दरवाज़े तक गया। फिर मैंने पलटकर पूछा, "दुकान पर ताला कब तक टलेगा?"

"जब तक ये मशीन अकेली रहेगी," उन्होंने कहा।

दोपहर में नल पर झगड़ा हुआ।

मैं दुकान पर बैठा था। सामने कुछ नहीं था। मैं बस ट्रंक में रखी रिंचों को एक जगह से दूसरी जगह रख रहा था, जैसे कोई आदमी खाली हाथ बैठा हो और उसे हाथ धोने का बहाना चाहिए हो।

तभी मोड़ से आवाज़ आई।

मैं दौड़ा।

नल पर सानिया के अब्बा खड़े थे। उनके हाथ में लोहे की बाल्टी थी। सामने गुड्डू के पापा खड़े थे। दोनों के चेहरे लाल थे और दोनों की आवाज़ें ऊँची थीं।

"पहले मैं भरूँगा," सानिया के अब्बा ने कहा।

"तुम रोज़ पहले भरते हो," गुड्डू के पापा ने कहा।

"क्योंकि मेरी बीवी बीमार है।"

"और मेरे बच्चे को कल से तेज़ बुखार है।"

मैं बीच में आया। मैंने सानिया के अब्बा की बाल्टी पकड़ी और मैंने गुड्डू के पापा की तरफ़ देखा।

"दो मिनट," मैंने कहा। "आप भरिए, और आप बाद में भरिए। दो मिनट की बात है।"

सानिया के अब्बा ने मेरा हाथ झटक दिया।

"तू दूर रह," उन्होंने कहा।

मैं चौंक गया। मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में जो था, वो गुस्सा नहीं था। डर था। बहुत डर।

"सानिया को कल रात से बुखार है," उन्होंने कहा। "और औरतें कह रही हैं कि ये सब तेरी दुकान से आया है।"

"क्या?"

"बोल, तेरे पास जो आता है, उसके घर में क्या होता है?"

गुड्डू के पापा ने भी अपनी बाल्टी नीचे कर दी। वो मेरी तरफ़ देखने लगे।

"आप ये कहाँ सुन रहे हैं?" मैंने कहा।

"पूरी गली सुन रही है," सानिया के अब्बा ने कहा।

"साहब के आदमी कह रहे हैं—"

"साहब के आदमी?" मैंने कहा। "आप साहब के आदमी की बात सुन रहे हैं और मुझसे पूछ रहे हैं?"

"मैं किसी की बात नहीं सुन रहा," उन्होंने कहा। "मैं अपनी बच्ची का बुखार देख रहा हूँ। और उससे बड़ी बात मेरे पास कोई नहीं है। चाहे वो साहब कहे, चाहे तू कहे।"

मैं खड़ा रहा।

"अब तू यहाँ से जा," गुड्डू के पापा ने कहा। "और अपनी दुकान पर जाकर बैठ। तेरे पास आकर हम लोगों ने अपने घर की शांति खो दी।"

मैं कुछ नहीं बोला। मैंने एक बार सानिया के अब्बा की तरफ़ देखा। उनकी आँखें भरी हुई थीं। वो अपनी बाल्टी उठाकर नल के नीचे रख चुके थे और उनके हाथ काँप रहे थे।

मैं पलटा और चला आया।

रास्ते में मुझे सानिया दिखी। वो अपने घर के दरवाज़े पर खड़ी थी। उसकी आँखें लाल थीं। उसने मुझे देखा और फिर अपनी माँ की आवाज़ आई और वो अंदर चली गई।

मैंने आगे देखा। गुड्डू दुकान के पीछे खड़ा था। रफ़ीक़ उसके साथ था। चिंटू पीपल की जड़ के पास बैठा था।

तीनों ने मेरी तरफ़ देखा और तीनों ने अपनी नज़रें नीचे कर लीं।

मैंने कुछ नहीं कहा।

मैं दुकान पर लौट आया और बैठ गया।

शाम पाँच बजे पुलिस आई।

मैंने पहले आवाज़ सुनी — जीप की, जो गली के मुँह पर रुकी। फिर मैंने कदमों की आवाज़ सुनी। फिर मैंने देखा कि दुबे अंकल अपनी कुर्सी से उठकर खड़े हो गए हैं और उनका हाथ उनकी कमर पर रखी लाठी पर है।

दरोगा जी सामने आए। उनके पीछे तीन सिपाही थे। दरोगा जी ने पीपल के नीचे खाली जगह देखी, जहाँ कल तक मेरी मेज़ थी और फिर उन्होंने मेरी दुकान की तरफ़ देखा।

"अंकुश यादव?"

"जी।"

"तुम्हारा ये जो जोड़ केंद्र है…" उन्होंने पीपल की तरफ़ इशारा किया। "…ये अवैध सभा है।"

"सभा नहीं है," मैंने कहा। "यहाँ लोग अपनी टूटी चीज़ें लाते थे—"

"अब नहीं लाएँगे," उन्होंने कहा।

उन्होंने जेब से एक काग़ज़ निकाला। उसे खोला। उसे पढ़ा। और फिर वो मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"शिकायत आई है," उन्होंने कहा। "तीन दिन में तुम्हारे पास सभा करने की इजाज़त नहीं है। और कोई भी भीड़ जमा होगी, तो उसकी ज़िम्मेदारी तुम पर होगी।"

"शिकायत किसने की?"

दरोगा जी ने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक।

"इसी मोहल्ले के किसी ने," उन्होंने कहा।

मेरे पेट में कुछ ठंडा उतर गया।

"अब तुम इसे हटाओ," उन्होंने पीपल की तरफ़ इशारा करके कहा। "कुछ भी रखा हो, वो हटाओ। कल से यहाँ कुछ नहीं दिखेगा।"

सिपाही आगे बढ़े। उन्होंने पीपल की डाल पर लगा लकड़ी का बोर्ड खींचा — वही बोर्ड जिस पर मैंने सफ़ेद पेंट से लिखा था कि टूटी चीज़ लाओ और टूटा रिश्ता साथ लाओ — और उसे ज़मीन पर रख दिया। फिर उन्होंने चबूतरी के पास रखा मेरा पुराना टूलबॉक्स उठाया और जीप में रख दिया।

"ये तुम ले जाओ," दरोगा जी ने कहा। "पर यहाँ मत रखना।"

सबके सामने।

पूरी गली में एक भी आदमी बाहर नहीं आया। एक भी। दरवाज़ों से सिर्फ़ आँखें दिख रही थीं। मुझे शबनम आपा की गुमटी में एक चेहरा दिखा। और उस्ताद की दुकान का आधा शटर, जिसके नीचे उनकी आँखें थीं।

दरोगा जी जाने लगे। फिर वो रुके और बिना पलटे बोले, "एक बात कहूँ, यादव?"

"कहिए।"

"इस मोहल्ले में मैं पैंतीस साल से हूँ," उन्होंने कहा। "मैंने यहाँ बहुत झगड़े देखे हैं। पर जो आज हो रहा है, वो झगड़ा नहीं है। ये डर है। और डर में आदमी अपने ही लोगों को पहले छोड़ता है। तू अपने आप को संभाल।"

वो चले गए।

जीप का पीछा धूल उड़ाकर गायब हो गया।

मैं पत्थर की पटिया पर बैठ गया।

और फिर वो हुआ जो मैंने डरा हुआ था।

शाम सात बजे गली में बच्चों की आवाज़ नहीं आई।

सोचो, एक गली है जहाँ चार बच्चे हमेशा क्रिकेट खेलते हैं। जहाँ सानिया की चप्पल की आवाज़ आती है, गुड्डू की बल्ले की, रफ़ीक़ के चश्मे के गिरने की, चिंटू की हँसी की। आज कोई नहीं था।

और यही सबसे डरावना था।

मैंने जेब से घंटी निकाली।

उसे हथेली पर रखा। मैंने उसे दोनों हाथों में लिया। मैंने उसे हिलाया।

टन।

पीतल की आवाज़ आई। पर वो आवाज़ सिर्फ़ धातु की थी। उसमें कोई ज़ुबान नहीं थी।

"सुन," मैंने कहा। "मुझे पता है गली चुप है। मुझे पता है। पर तू बोल। एक बार। एक शब्द। बस एक।"

कुछ नहीं।

मैंने फिर बजाया। टन। फिर बजाया। टन। टन।

लगातार।

"बोल ना," मैंने कहा। मेरी आवाज़ फट रही थी। "बोल! बोल ना, एक बार!"

टन।

"तूने कल कहा था — नाम नहीं, निशान ढूँढ। मैंने ढूँढा। मैं ढूँढता रहा। फिर भी तू चुप क्यों है?"

टन।

"मैंने क्या गलती की? मैंने किसी का घर नहीं तोड़ा। मैंने तो जोड़ा है। मैंने सिर्फ़ जोड़ा है।"

टन।

मैंने घंटी को ज़मीन पर पटक दिया।

मैं कोई सोचे बिना पटक नहीं दिया। मैंने सोचा था कि शायद टक्कर से… शायद झटके से… शायद कुछ टूटेगा और फिर जुड़ेगा।

वो फर्श पर गिरी, उछली, और एक तरफ़ लुढ़क गई और फिर रुक गई।

बस टन।

और फिर मैं उसे उठाने के लिए झुका, और मेरे हाथ रुक गए, क्योंकि उस पल मुझे अपने ही हाथ से डर लगा।

मेरे हाथ काँप रहे थे।

मैं उसे उठाकर अपनी हथेली पर रख लिया और सीने से लगा लिया।

मैं वहीं फर्श पर बैठ गया।

डॉक्टर इसरानी आए तो मैं वैसे ही बैठा था।

"एक घंटे से बैठा हूँ," मैंने कहा। "किसी को आने मत देना। गली में किसी को मत आने देना।"

"कोई आने वाला नहीं है," उन्होंने कहा।

वो मेरी दुकान के बाहर कुर्सी खींचकर बैठ गए। उनके हाथ में एक छोटा स्टील का डिब्बा था। उन्होंने उसे मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।

"पहले ये पी," उन्होंने कहा। "अपने हाथ से पकड़। देख, तेरे हाथ कैसे काँपते हैं।"

मैंने डिब्बा पकड़ा। अंदर चाय थी। गरम। मैंने पिया। मेरे गले में उतरी और मेरी आँखें भर आईं।

"क्या हुआ?" उन्होंने पूछा।

"घंटी," मैंने कहा। "वो नहीं बोल रही।"

"मुझे पता है," उन्होंने कहा।

"आपको कैसे पता?"

"क्योंकि मैं साठ साल से यह देख रहा हूँ," उन्होंने कहा। "जब मेरी बीवी ज़िंदा थी, अस्पताल में भीड़ रहती थी। बुखार आता था, हाथ टूटता था, बच्चे रोते थे और ये गली के लोग छत पर और नीचे बैठे चारपाई पर सोते थे। फिर मेरी बीवी चली गई। फिर अस्पताल में लोग कम आने लगे। और आज देख — एक मरीज़ नहीं है। अंकुश, अस्पताल में एक भी मरीज़ नहीं है।"

"तो अस्पताल भी—"

"अस्पताल भी। घंटी भी। गली भी। सब एक ही चीज़ पर चलते हैं।"

"किस पर?"

"भरोसे पर," उन्होंने कहा। "जब तक लोग आपस में भरोसे से बाँधे रहते हैं, ये अस्पताल में आते हैं, ये तेरी दुकान पर आते हैं, ये शबनम की गुमटी पर चाय पीते हैं। जिस दिन भरोसा टूटा, दोनों तरफ़ सन्नाटा।"

उन्होंने अपनी कुर्सी में थोड़ा आगे झुककर कहा, "पर सुन। तेरी घंटी नहीं बोल रही, इसका मतलब ये नहीं कि वो मर गई। इसका मतलब ये है कि उसके पास कहने को कुछ नहीं है। और जब उसके पास कहने को होगा, तो वो बोलेगी। तेरे बजाने से नहीं। गली के बोलने से।"

"गली कैसे बोलेगी? गली तो डर गई है।"

"गली डरी नहीं है," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "गली शरमाई हुई है। और शरमाई हुई गली को कोई एक आदमी चाहिए जो उससे पहले बोले।"

"मैंने बोला था," मैंने कहा। "आज सुबह उस्ताद के साथ बैठकर चाय पी। बिना सफ़ाई दिए।"

"और?"

"और कुछ नहीं हुआ।"

"तो इंतज़ार कर," उन्होंने कहा। "एक बात मान, तेरी उम्र में मुझे भी लगता था कि दुनिया में सब कुछ तुरंत होना चाहिए। पर साठ साल में मैंने सिर्फ़ एक चीज़ सीखी — जो जुड़ता है, वो धीरे जुड़ता है। और जो टूटता है, वो तुरंत टूटता है। इसीलिए टूटना आसान है और जोड़ना मुश्किल। और इसीलिए जो जोड़ता है, वो अकेला रह जाता है — क्योंकि जो तुरंत टूट सकते हैं, वो उसके पास आने से डरते हैं।"

वो उठे।

"कल सुबह मेरे पास आ," उन्होंने कहा। "मैं तुझे अस्पताल के उस पुराने रिकॉर्ड कमरे में ले जाऊँगा। जो वहाँ है, वो तेरे काम आएगा।"

वो चले गए। उनके जाने के बाद मैंने घंटी को अपनी हथेली पर लिटाया और उसे देखा। बहुत देर तक।

फिर मैंने उसे जेब में रखा और अंदर जाकर चारपाई पर लेट गया।

रात नौ बजे के आसपास मैं उठा। मुझे प्यास लगी थी।

मैं बाहर आया। गली खाली थी। पीपल के नीचे से मेरी मेज़ हट चुकी थी और वो जगह अब पहले से भी ज़्यादा खाली लग रही थी। जैसे कोई दाँत निकाल दिया गया हो।

पानी पीकर जैसे ही मैं पलटा, मुझे आवाज़ आई।

गाड़ी की आवाज़।

सफ़ेद गाड़ी। वही। गली के मुँह पर रुकी। मैं दुकान के दरवाज़े तक आया। मैंने शटर नहीं उठाया। मैं सिर्फ़ बाहर आकर खड़ा हो गया।

गाड़ी की खिड़की नीचे उतरी। उसमें से मैंने मीरा की आवाज़ नहीं सुनी। कोई औरत नहीं थी। कोई और आदमी नहीं था।

वही था जो कल रात आया था।

उसने काग़ज़ की तरह कुछ आगे बढ़ाया।

"ये सिर्फ़ देख लो," उसने कहा।

मैंने उसे लिया। उस पर लिखा था—

"कल शाम पाँच बजे। पीपल के नीचे। दो कुर्सी।

रखी जाएगी।

सभा होगी।

भारद्वाज ट्रस्ट के सौजन्य से।"

मैंने काग़ज़ को मोड़ा और अपनी जेब में रख लिया।

"ये न्योता है या धमकी?" मैंने कहा।

"सवाल अच्छा है," उसने कहा। "साहब ने कहा था तू यही पूछेगा।"

"और साहब का जवाब?"

"साहब ने कहा — दोनों।"

वो हँसा नहीं। मैं भी नहीं हँसा।

"एक बात और," उसने कहा। "साहब कह रहे हैं कि कल शाम पाँच बजे गली के सारे लोग वहाँ होंगे। और वो सबके सामने तेरे नाम का बोर्ड… वो बोर्ड जो…उसने कहा था कि सुबह दरवाज़ा खोलकर देखना, गली में किसके नाम की आवाज़ आ रही है।

मैंने वो किया।

सुबह छह बजे शटर उठाया। आधा उठाया, आधा नहीं। जैसे कोई ऐसा दरवाज़ा खोल रहा हो जिसके पीछे कुछ न कुछ मिलेगा, और डर हो कि जो मिलेगा, वो बर्दाश्त नहीं होगा।

गली में धूल थी। पिछली रात की हवा से सड़क पर रेत जमी थी। पीपल के नीचे वाली जगह अब भी खाली। मैंने उस खाली जगह को देखा और मुझे लगा कि जैसे किसी ने वहाँ से मेरा पूरा नाम उखाड़ लिया है।

सबसे पहले मुझे रेडियो वाले बूढ़े की आवाज़ सुनाई दी। वो अपनी दुकान के बाहर खड़े थे और उनके हाथ में एक कपड़ा था जिसे वो बार-बार पोंछ रहे थे, हालाँकि वो साफ़ था।

मैंने हाथ उठाया।

उन्होंने देखा। और मुड़ गए।

मैंने हाथ वापस नीचे कर लिया। यह पहली बार नहीं था कि किसी ने मुझे देखकर मुँह फेरा था। पर आज कुछ अलग था। आज किसी ने मुझसे डरकर मुँह नहीं फेरा था। आज लोगों ने मुझे देखकर मुँह फेरा था — जैसे कोई बीमारी वाले पेड़ के नीचे से गुज़रते वक़्त कदम तेज़ कर लेता है।

दस मिनट बाद ही मुझे सच पता चल गया। दुकान के सामने चार औरतें आईं, और उनके हाथ में कुछ नहीं था। न कोई साइकिल, न कोई औज़ार, न कोई टिफ़िन। सिर्फ़ बात।

"अंकुश भाई," सबसे आगे वाली बोली। वो फीके हरे दुपट्टे वाली औरत थी, जो रोज़ नसीमा बाई की दुकान से आती थी। "हमें तुमसे एक बात पूछनी है।"

"पूछो।"

"तुम्हारे पास जो घंटी है…"

मैं चुप रहा।

"वो… क्या वो जादू है?"

मैंने कहा, "वो मेरे दादा की साइकिल की घंटी है।"

"ना, वो बात नहीं," दूसरी औरत बोली। उसकी आवाज़ में वो डर था जो अफवाह में अचानक बढ़ जाता है। "लोग कह रहे हैं कि तुम जिसे जोड़ते हो, उसका घर टूट जाता है। तुमने गिरधारी और मोहन को जोड़ा — और कुछ दिन बाद मोहन का पहिया टूट गया।"

"वो पहिया होता ही टूटा था," मैंने कहा। "मैंने ही तो जोड़ा था।"

"और बंसी बाबा?" तीसरी औरत आगे आई। "उनका फ्रेम टूटा। हाफ़िज़ बाबा की दुकान पर ताला आया। जब तुमने उन दोनों को जोड़ा, उसी हफ़्ते।"

मैंने अपना हाथ उठाया, फिर रोक लिया। मुझे गुस्सा आ रहा था। पर गुस्सा होता तो वही साबित हो जाता जो वो सोच रही थीं। वही नहीं आना था।

"आप पूरी बात करें," मैंने कहा। "किसने कहा? क्या नाम लिया? किसने कहा कि अंकुश का जोड़ काला जादू है?"

पहली औरत ने मुँह नीचे कर लिया।

"कोई कह रहा है," उसने कहा। "हमें नाम नहीं पता।"

"नाम नहीं पता," मैंने दोहराया। "तो नाम तो बाद में निकालेगा। पहला काम तो हुआ।"

वो मेरी बात समझी या नहीं, पता नहीं। पर तीनों चुप हो गईं।

फिर पीछे से बूढ़ी आवाज़ आई। सीढ़ी वाली माँ थीं। उनके हाथ में वही ज़ंग लगा बक्सा था जो उनके सीने से चिपका रहता था। वो बोलीं — "बेटा, मैं तुम्हें दोषी नहीं कह रही। पर जब मेरे बेटे ने सुना कि कुर्सी तुमने ठीक की, तो उसने कहा — अब माँ को अंकुश के पास जाने मत देना। उसने कहा कि जो चीज़ तुमसे जुड़ती है, वो बाद में और टूटती है।"

मैं सन्न रह गया।

बूढ़ी माँ ने कहा — "मैं उसकी बात नहीं मानूँगी। पर बाक़ी गली, अंकुश। बाक़ी गली मान रही है।"

वो गईं।

मैं दुकान के दरवाज़े पर खड़ा रहा।

और मेरे सामने पूरी गली ने अपना चेहरा बदल लिया।

दस बजे तक गली के बच्चे स्कूल की तरफ़ जाने लगे। मैंने सानिया को देखा। वो अपने घर के दरवाज़े से निकली, बस्ता कंधे पर, और उसने मुझे देखा। मैंने हाथ उठाया। वो एक पल रुकी, फिर सानिया के अब्बा ने दरवाज़े से ही आवाज़ दी — "सानिया! इधर आ।"

सानिया मेरी तरफ़ देखकर खड़ी रही।

"सानिया!"

वो गई।

मैंने अपना हाथ फिर नीचे कर लिया।

दस मिनट बाद गुड्डू आया। उसकी माँ उसे खींचकर स्कूल की तरफ़ ले जा रही थी। गुड्डू मेरी तरफ़ देखकर बोला — "भैया, मेरे पंचर वाली साइकिल…"

"गुड्डू!" उसकी माँ की आवाज़ में वो तेज़ी थी जो डर से आती है। "चल, देर हो रही है।"

गुड्डू चला गया।

मैंने उसकी माँ को रोका नहीं। मैं क्या कहता? "आपका बेटा मेरे पास आ सकता है, मैं कुछ नहीं करूँगा"? यह कैसे कहता? यह कहना तो मान लेना होता कि मुझमें कुछ है जिससे बचना चाहिए।

ग्यारह बजे मैं उस्ताद की दुकान पर गया। मैंने उन्हें बताया कि डॉक्टर इसरानी ने कहा था — बिना काम बैठो, चाय पियो। मैं यही करने आया हूँ।

उस्ताद ने मशीन से नज़र नहीं हटाई। "बैठ जा।"

मैं बैठ गया।

उन्होंने चाय बनाई। दो गिलास लाए। एक मेरे आगे रखा। फिर बैठ गए। उन्होंने पूछा नहीं कि गली में क्या हुआ। उन्होंने कुछ नहीं पूछा।

मैंने चाय पी।

आधा गिलास खत्म होने पर उन्होंने कहा — "अब सुन।"

"हाँ।"

"मेरी दुकान पर कल तक ताला लगेगा।"

मैंने गिलास रख दिया।

"क्या?"

"काग़ज़ आया है। बिना मुहर का, पर काग़ज़ है, और जब काग़ज़ आए, तो काग़ज़ की बात माननी पड़ती है। दो दिन में दुकान खाली करनी है।"

"उस्ताद—"

"मैंने कहा था न," उन्होंने मेरी बात काट दी। "आज शाम सबके सामने ताला लगाकर गली को गवाह बनाऊँगा। ताला लगाने के पहले मैं एक बात कहूँगा।"

"क्या?"

"ये काग़ज़ अंकुश की वजह से आया है, या अंकुश के बिना आया होता?" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "ये सवाल मैं सबके सामने रखूँगा। और मैं जानता हूँ जवाब क्या है। पचास साल से इस गली में हूँ। दुकान की जगह कभी नहीं बदली। पहली बार ताला आया है, और वो उसी हफ़्ते आया है जिस हफ़्ते अंकुश ने सबको जोड़ना शुरू किया।"

"तो जवाब यही है कि—"

"जवाब ये है," उन्होंने कहा, "कि ताला उसने नहीं भेजा जो जोड़ रहा है। ताला उसने भेजा है जो टूटने से बढ़ता है। पर गली वो नहीं सुनेगी। गली को आसान जवाब चाहिए। और आसान जवाब तुम हो।"

मैं चुप रहा।

"तू चुप क्यों है?"

"क्योंकि मैं कुछ कहूँगा और वो सही नहीं लगेगा," मैंने कहा। "मुझे लग रहा है कि मैं आज जो भी बोलूँगा, वो सफ़ाई जैसा लगेगा।"

उस्ताद ने धीरे से सिर हिलाया।

"ये सीख ले," उन्होंने कहा। "जब गली तुझ पर शक करे, तो तू सफ़ाई मत दे। सफ़ाई देने वाला आदमी अपने आप को बचाता दिखता है। और जो अपने आप को बचाता दिखता है, वो कमज़ोर दिखता है। गली को यह नहीं दिखना चाहिए कि तू कमज़ोर है। गली को यह दिखना चाहिए कि तू अब भी वहीं खड़ा है जहाँ वो तुझे छोड़ गई थी।"

"और अगर गली बोलने ही न दे?"

उन्होंने अपनी सिलाई मशीन पर हाथ रखा।

"तो चुप रह," उन्होंने कहा। "चुप रहना भी एक जवाब है। सबसे मुश्किल जवाब। पर सबसे मज़बूत भी।"

दोपहर दो बजे मुझे पता चला कि शबनम आपा की गुमटी पर सिर्फ़ दो गिलास चाय बिकी थी। उस दिन आम तौर पर पचास गिलास बिकते थे। शाम को बैठकर वो कटोरी गिनती थीं। आज कटोरी में सिर्फ़ दो सिक्के थे।

मैं गया। मैंने कहा — "आपा, आज मेरी चाय भी एक गिलास।"

वो मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराई। फिर बोली — "बैठ।"

मैं बैठ गया।

चाय आई। मैंने पहला घूँट लिया और कहा — "कड़क है।"

"दूध कम था," उन्होंने कहा। "आज कोई लेने आया ही नहीं। आधा दूध बासी हो जाएगा, आधा यहाँ खप जाएगा।"

फिर वो चुप हो गईं।

फिर बोलीं — "सुन, तुझे एक बात बतानी है।"

"बोलो।"

"सुबह स्कूल के अभिभावकों की एक सभा हुई थी।" उन्होंने चिमटी उठाई, समोसा निकाला, मेरे सामने रखा। "उसमें तय हुआ है कि बच्चे अंकुश की दुकान के पास नहीं जाएँगे। अगर कोई बच्चा गया, तो उसके माँ-बाप को स्कूल बुलाया जाएगा।"

मैंने समोसे को हाथ नहीं लगाया।

"किसने बुलाई ये सभा?"

"किसी ने नहीं बुलाई," उन्होंने कहा। "खुद से जुट गए। एक आदमी आया था—सफ़ेद कुर्ता, नए जूते। उसने पाँच मिनट बोला और चला गया। पाँच मिनट में यह हो गया।"

"शबनम आपा—"

"मैं तुझे सिर्फ़ बता रही हूँ," उन्होंने कहा। "मैं तुझे रोक नहीं रही। और याद रख — मैं अपनी गुमटी का चूल्हा तब तक नहीं बुझाऊँगी, जब तक मेरा हाथ चिमटी उठाना न भूल जाए।"

"आपका क्या हाल है?"

"दो गिलास चाय बिकी," उन्होंने कहा। "एक तेरा। एक उस्ताद का।"

"उस्ताद आए थे?"

"उन्होंने अपनी चाय खुद पी और तेरी चाय के लिए पैसे रख गए।" उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मुझे चुभा। "उन्होंने कहा — जब अंकुश आए तो यह उसके हाथ में दे देना। मैं तेरे पैसे नहीं लूँगा, तू मेरी चाय नहीं पीएगा।"

चार बजे नल पर झगड़ा हुआ।

मैं वहाँ नहीं था। मैं दुकान पर था। मैंने आवाज़ सुनी और भागा।

सानिया के अब्बा और गुड्डू के पापा आमने-सामने खड़े थे। बीच में एक लोहे की बाल्टी पड़ी थी, जिसका किनारा रगड़ा हुआ था। दोनों के हाथ बाल्टी पर थे। दोनों की आँखों में वो गुस्सा था जो पानी की कमी से आता है।

"मैंने पहले भरी थी," गुड्डू के पापा बोले।

"तुमने भरी थी तो क्या, बाल्टी मेरी है," सानिया के अब्बा बोले।

"बाल्टी लोहे की है, उसमें नाम नहीं लिखा," गुड्डू के पापा ने कहा। "पानी मेरा पहले आया।"

"तेरा पानी?" सानिया के अब्बा ने कहा। "ये गली का नल है, तेरा बाप का नहीं।"

"तेरा बाप का भी नहीं!"

मैं बीच में आया। मैंने दोनों के बीच हाथ रखा।

"रुको," मैंने कहा। "रुको। एक-एक बाल्टी से काम चल जाएगा। मैं भर दूँगा।"

दोनों ने पहले मेरी तरफ़ देखा।

फिर दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।

फिर सानिया के अब्बा बोले — "तू बीच में क्यों आता है?"

मैं चौंका। "मैं बस—"

"तू बस क्या?" उन्होंने मेरा हाथ झटक दिया। "तेरे आने से नल में पानी बढ़ जाता है क्या?"

"अब्बा, नहीं—"

"नहीं क्या?" उनकी आवाज़ ऊँची हो गई। "तू जिसे जोड़ता है, उसका घर टूटता है। मेरी बकरी मरी। मेरी बेटी स्कूल में पीछे बैठ गई। मेरे घर सुख नहीं। और अब तू मेरी बाल्टी के पास खड़ा है। मेरा पानी छीनने आया है?"

मैं चुप रह गया।

गुड्डू के पापा बोले — "ये बात सही है।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"तू इसे सही मत कह," मैंने कहा। "तू अभी इससे लड़ रहा था। अब तू इसकी बात सही कह रहा है। दो मिनट पहले तू इससे उलझा हुआ था। तुझे इन बातों से फ़र्क़ नहीं पड़ता, तुझे बस बाल्टी चाहिए।"

गुड्डू के पापा झिझके।

सानिया के अब्बा बोले — "बाल्टी चाहिए तो चाहिए। पर तेरे साथ नहीं। तू जोड़ने वाला है, तेरे जोड़ से हमारी गली टूट रही है। तू दूर रह, इसी में हमारा भला है।"

मैंने बाल्टी छोड़ दी।

मैंने कहा — "अगर मैं दूर रहूँ, तो कल एक और आदमी आएगा जो कहेगा कि यह नल अब उसकी ज़मीन पर है। और तब आपकी बाल्टी के लिए पानी नहीं होगा।"

"तो वो ज़मीन का मालिक होगा," सानिया के अब्बा बोले। "ज़मीन का मालिक आए तो बात करेंगे। पर तू मालिक नहीं है। तू तो बस एक लड़का है जो साइकिल ठीक करता है और समझता है कि पूरी गली उसकी ज़िम्मेदारी है।"

मैं वहीं खड़ा रहा।

फिर मैं मुड़ा। मैं सीधा दुकान की तरफ़ गया।

पीछे से गुड्डू के पापा ने कहा — "बाल्टी का झगड़ा छोड़, ये बता, अब पानी कौन भरेगा?"

मैंने पलटकर नहीं देखा।

पर मैंने सुना — सानिया के अब्बा ने कहा — "तू भर। मुझे तेरे भरे पानी की ज़रूरत नहीं।"

छह बजे दरोगा आए।

मैं दुकान पर था। शटर उठा था पर अंदर कोई काम नहीं था। मैं दीवार से टेक लगाकर बैठा था और मेरी गोद में एक पुरानी रिंच थी जिसे मैं बार-बार घुमा रहा था।

दरोगा ने पीपल के नीचे आकर अपनी लाठी टेकी। उनके साथ तीन सिपाही थे। एक के हाथ में काग़ज़ था, बाक़ी दो के हाथ खाली।

"अंकुश यादव?"

मैं उठा।

"हाँ।"

"ये जगह सरकारी है।" उन्होंने पीपल के नीचे वाली खाली जगह की तरफ़ इशारा किया। "यहाँ तुम्हारा जो भी बोर्ड था, वो हटा दिया गया है। अब यहाँ कोई सभा नहीं, कोई काउंटर नहीं, कोई कुर्सी-मेज़ नहीं।"

"मैंने बोर्ड खुद उतार दिया था," मैंने कहा।

"तो अच्छा किया।"

उन्होंने एक काग़ज़ आगे बढ़ाया।

"ये पढ़ ले।"

मैंने पढ़ा। उसमें लिखा था कि पिछले एक हफ़्ते में इस जगह पर लगातार सभाएँ हो रही थीं और इससे कानून-व्यवस्था पर असर पड़ रहा है। इसीलिए अगले तीन दिन तक यहाँ कोई सभा नहीं होगी। तीन दिन बाद समीक्षा होगी।

"तीन दिन," मैंने कहा।

"तीन दिन।"

"और तीन दिन बाद?"

दरोगा ने अपनी लाठी उठाई।

"तीन दिन बाद तुम्हारी दुकान का काग़ज़ भी आएगा," उन्होंने कहा। "और वो ज़्यादा सख़्त होगा। आज मैं तुम्हें रस्म के तौर पर बता रहा हूँ। कल से तुम यहाँ किसी को नहीं बुलाओगे। अगर बुलाया, तो कुर्सी पर बैठकर पछताओगे।"

"दरोगा जी—"

"मत बोलो," उन्होंने कहा। "मैं जानता हूँ तुम क्या कहोगे। तुम कहोगे कि मैं किसी को नहीं बुला रहा, लोग खुद आते हैं। पर आज लोग आए? तुम्हारे आसपास भीड़ थी? नहीं ना। सो अब तुम्हारे पास कोई नहीं आ रहा, और ये भी जान लो—जिसके पीछे भीड़ नहीं, उसके पीछे काग़ज़ भी नहीं होता।"

वो चले गए।

मैं खड़ा रहा।

उनकी लाठी की आवाज़ दूर तक गई। फिर गली में वो भी नहीं रही।

उस शाम गली में बच्चों की आवाज़ नहीं आई।

यह सबसे अजीब बात थी। मुझे बच्चों की आवाज़ की आदत थी। दिन में कम से कम दस बार कोई न कोई बच्चा गली में चिल्लाता था — क्रिकेट का शोर, पतंग की चिल्लाहट, पंचर वाली साइकिल की घंटी, टिंकू की हँसी, सानिया की डाँट, गुड्डू की भागदौड़। ये गली इन्हीं आवाज़ों से ज़िंदा थी।

आज कोई आवाज़ नहीं थी।

छह बजे से आठ बजे तक मैं दुकान के बाहर बैठा रहा। एक बच्चा भी नहीं दिखा। मुझे पता था कि बच्चे स्कूल से लौट चुके थे। मुझे पता था कि वो घरों के अंदर बंद हैं। मैंने किसी के दरवाज़े पर खटखटाने की नहीं सोची। अगर अब्बा ने मना किया होता, तो बच्चे डरते। और बच्चे जब डरते हैं, तो वो छुपकर भी नहीं आते। वो सीधे मान लेते हैं।

आठ बजे मैंने घंटी निकाली।

मैंने उसे हथेली पर रखा। ठंडी थी। मैंने उसे हिलाया। टन — बस एक धातु की आवाज़। फिर मैंने उसे दोबारा हिलाया। टन। तीसरी बार। टन। चौथी बार। पाँचवीं बार।

कुछ नहीं।

पहली बार ऐसा हुआ कि घंटी बजी और उसने कुछ नहीं कहा।

मैंने उसे सीने से लगाया। वो गरम नहीं हुई। न ही ठंडी पड़ी। वो बस पीतल बन गई थी।

मैं उठा। मैं अस्पताल गया।

डॉक्टर इसरानी अपने कमरे में बैठे थे। उनके सामने एक मोमबत्ती जल रही थी और वो उसकी रोशनी में कुछ काग़ज़ पढ़ रहे थे।

मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा। उन्होंने सिर उठाया।

"आ गए," उन्होंने कहा। "बैठो।"

मैं बैठ गया। मैंने घंटी जेब से निकाली और उनके सामने रख दी।

"इसने आज कुछ नहीं कहा," मैंने कहा।

वो घंटी को देखते रहे।

फिर उन्होंने कहा — "मैंने तुम्हें कल बताया था, तुमने सुना नहीं?"

"सुना था।"

"तो फिर डर क्यों रहे हो?"

"क्योंकि कहना और होना अलग बात है," मैंने कहा। "जब वो बोलती थी, तब मुझे लगता था कि ये बोलना आसान है। अब जब वो चुप है, तब पता चल रहा है कि ये चुप्पी कितनी भारी है।"

डॉक्टर इसरानी ने घंटी उठाई। उन्होंने उसे कान के पास ले जाकर हिलाया।

"तुम्हें पता है, इस घंटी की आवाज़ किस चीज़ से आती है?"

"लोगों से।"

"हाँ।" उन्होंने घंटी रख दी। "पर लोगों से कैसे? ये समझो। ये घंटी तुम्हारे हाथ से नहीं बजती। ये उन आवाज़ों से बजती है जो तुम्हारे पीछे हैं। जब गली में कोई किसी से बोलता है, तो वो आवाज़ इस घंटी में बैठ जाती है। जब कोई किसी की मदद करता है, तो वो हाथ इस घंटी में बैठ जाता है। जब कोई माफ़ी माँगता है, तो वो काँपती आवाज़ इस घंटी में बैठ जाती है।"

वो रुके।

"और आज तुम्हारी गली में किसी ने किसी से कुछ नहीं कहा। किसी ने किसी को माफ़ी नहीं माँगी। किसी ने किसी की मदद नहीं की। गली चुप थी। और जब गली चुप हो, तो इस घंटी में बोलने के लिए कुछ नहीं बचता।"

"तो ये घंटी खत्म हो गई?"

"नहीं," उन्होंने कहा। "ये घंटी भूखी है। ये तुम्हें यह बता रही है कि उसका ईंधन खत्म हो गया। और ईंधन है — गली का भरोसा।"

मैंने कहा — "तो मैं क्या करूँ?"

डॉक्टर इसरानी ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें थकी थीं, पर उनमें वो चीज़ थी जो उम्मीद से ज़्यादा ज़िद जैसी लगी।

"तुम क्या करो?" उन्होंने दोहराया। "तुम कुछ मत करो। तुम बस उनकी आवाज़ न बनो। तुम उनकी आवाज़ बनने की कोशिश करोगे, तो वो और चुप हो जाएँगे। तुम अभी उनके बीच सबसे बड़ी चर्चा हो। इसलिए तुम उनके बीच से हट जाओ।"

"मैं कहाँ जाऊँ?"

"कहीं मत जाओ," उन्होंने कहा। "अपनी दुकान पर बैठो। चुप बैठो। काम करो। जिस दिन तुम्हारे पास कोई न आए, तब भी तुम शटर खोलो, अपनी साइकिल के पुर्ज़ों को साफ़ करो, अपने औज़ार तेल से पोंछो। गली देखेगी कि तुम डरे नहीं। और जब गली देखेगी कि तुम डरे नहीं, तो एक-एक करके लोग लौटेंगे।"

"और अगर न लौटें?"

"तो फिर सच जान लो," उन्होंने कहा। "गली तुम्हारी नहीं थी। गली कभी किसी की नहीं होती। गली बस अपनी होती है। और जो अपनी होती है, वो अपनी राह चलती है।"

वो उठे। उन्होंने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया।

"मैं तुम्हें एक बात बताता हूँ," उन्होंने कहा। "बाईस साल पहले जब मैं ये अस्पताल बना रहा था, तब भी यही हुआ था। पहले हफ़्ते में गली के लोगों ने मेरी दुकान पर आना बंद कर दिया था। क्योंकि उन्हें लगा था कि इस अस्पताल से गली में बीमारी आएगी। और पता है क्या हुआ?"

"क्या?"

"मैंने दो महीने तक किसी मरीज़ के पास जाना बंद नहीं किया। मैं अकेले बैठा रहा। खाली कुर्सियों पर। फिर एक दिन सुबह एक औरत आई — तुम्हारी माँ।" उन्होंने देखा कि मैं चौंका। "हाँ। वो पहली मरीज़ थीं। उस दिन से गली समझ गई कि ये अस्पताल बीमारी नहीं, इलाज है। और आज तीस साल बाद भी गली यहीं है।"

मैं उठा।

मैंने घंटी जेब में रखी।

"डॉक्टर साहब—"

"जाओ," उन्होंने कहा। "और कल सुबह उस्ताद की दुकान पर बैठो। चाय पियो। मैं वहाँ आऊँगा। हम तुम्हें अस्पताल का पुराना रिकॉर्ड कमरा दिखाएँगे। उसमें एक काग़ज़ है जो मैंने दो हफ़्ते पहले देखा था और उसी दिन से मुझे नींद नहीं आ रही। आज रात तुम आराम करो। कल सुबह वो काग़ज़ देखो।"

मैं बाहर आया।

गली में चलते हुए मुझे लगा कि मेरे कदमों की आवाज़ भी किसी और की लग रही है। मैं दुकान तक आया। शटर उठाया। अंदर गया। मैंने शटर गिराया। मैंने बत्ती जलाई। पीली रोशनी में दुकान का फ़र्श, औज़ारों का ट्रंक, टूटी मेज़, सब कुछ वैसा ही था। फिर भी कुछ अलग था।

मैंने घंटी फिर निकाली।

मैंने उसे मेज़ पर रखा। मैं उसे देखता रहा।

फिर मैंने धीरे से कहा — "सुन। अगर तू सुन रही है, तो सुन ले। मैं तुझे बजाकर नहीं पूछूँगा। मैं जानता हूँ तू चुप है। मैं जानता हूँ क्यों। पर मैं तुझसे एक वादा करता हूँ। जिस दिन गली वापस बोलेगी, उस दिन तू भी बोलेगी। और जिस दिन तू बोलेगी, मैं उस दिन ये जान जाऊँगा कि जो मैंने किया, वो सही था।"

घंटी चुप रही।

पर मुझे इसका फ़र्क़ नहीं पड़ा। क्योंकि आज मैंने तय किया था कि मैं उससे जवाब नहीं माँगूँगा जब तक कि वो खुद बोले।

रात दस बजे मैं सोने की तैयारी कर रहा था।

तभी बाहर गाड़ी की आवाज़ आई।

सफ़ेद गाड़ी।

मैंने शटर नहीं उठाया। मैंने दरवाज़े की तरफ़ बस मुँह घुमाया। मैंने सुना — कार का दरवाज़ा खुला। फिर बंद हुआ। फिर जूतों की आवाज़। फिर दुकान का दरवाज़ा खटखटाया गया। दो बार।

मैंने खिड़की से बाहर देखा। वो खिड़की जो दुकान के पीछे वाली गली में खुलती है — वहाँ कोई नहीं था। मैं आगे गया। मैंने कुंडी खोली। मैंने शटर आधा उठाया।

वही आदमी था।

वो सफ़ेद कुर्ते में था। जूते चमक रहे थे।

उसने कोई काग़ज़ नहीं पकड़ा था। उसके हाथ खाली थे।

"मैं तुमसे लड़ने नहीं आया," उसने कहा।

"तो क्या करने आए हो?"

"सिर्फ़ एक बात कहने।" वो रुका। "साहब ने कहा कि मैं तुमसे कहूँ — कल से इस गली में तुम्हारा नाम नहीं होगा।"

मैं चुप रहा।

"मेरा नाम होगा," उसने कहा।

मैंने देखा — उसका चेहरा पत्थर जैसा था। उसमें कोई भाव नहीं था। न जीत, न हँसी, न तरस।

"कल सुबह जब तुम दरवाज़ा खोलोगे," उसने कहा, "तो गली में एक नाम सुनाई देगा। और वो नाम तुम्हारा नहीं होगा। साहब का होगा। क्योंकि साहब ने तय कर लिया है कि जो गली उसकी है, उस गली में सिर्फ़ एक नाम रहेगा।"

मैंने कहा — "गली किसी की नहीं होती।"

उसने पहली बार हल्की मुस्कान दी।

"अब ये बात साहब को भेज दूँ?" उसने कहा।

"हाँ, भेज दो।"

"और एक बात," उसने कहा। "साहब ने कहा — उससे कहना कि आज रात वो अपने हाथ में घंटी लेकर सोए, क्योंकि कल सुबह उसकी गली में सिर्फ़ एक आवाज़ आएगी। और वो आवाज़ घंटी की नहीं होगी।"

वो मुड़ा। दो कदम चला। फिर रुका।

"वैसे एक बात और।" वो पलटा। "साहब ने कहा कि अगर तुम पूछो कि साहब को क्या चाहिए, तो कहना — पूरी गली। हर घर। हर दुकान। और तुम्हारी दुकान का सातवाँ नंबर भी।"

वो गया।

गाड़ी चली गई।

शटर नीचे आया।

मैं दुकान के अंदर खड़ा रहा। मेरे हाथ में घंटी थी। ठंडी। कुछ नहीं बोली।

फिर मैंने अपनी जेब से काग़ज़ निकाला — वो काग़ज़ जिस पर अगली सभा की बात लिखी थी।

मैंने उसे मेज़ पर रखा। मैंने उस पर लिखा — "अगर ये मेरी आख़िरी रात है, तो अगली सुबह के लिए एक चाय बचाकर रखना।"

मैंने अपनी कॉपी निकाली। मैंने उस पर एक लाइन लिखी।

"आज मुझे पता चला कि गली के टूटने की आवाज़ वो नहीं होती जिसमें कुछ गिरता है। गली के टूटने की आवाज़ यह होती है — बच्चों का शोर बंद हो जाना।"

फिर मैंने कॉपी बंद की। मैंने घंटी सीने से लगाई और चारपाई पर लेट गया।

और उस रात सोने से पहले मैंने एक बात मन में सोची — कल सुबह जब मैं दरवाज़ा खोलूँगा, तो अगर गली में किसी और का नाम सुनाई दे, तो मैं उसे पोंछने नहीं जाऊँगा।

मैं अपने नाम को फिर से लिखूँगा।

अपने हाथों से।

अपने काम से।

और यह लिखने में मुझे कोई जादू नहीं चाहिए — बस एक सुबह चाहिए, जिसमें कोई मुझे "भाई, चाय पी ले" कह सके।

॥

सुबह मैंने शटर उठाया तो पहली नज़र पीपल पर गई।

वहाँ कुछ नहीं था।

न बोर्ड, न मेज़, न वो टूटी लकड़ी की कुर्सी जिस पर बैठकर मैंने कितनी शामें गुज़ारी थीं। सिर्फ़ पत्थर की चबूतरी थी, और उस पर सूखी धूल। दरोगा वाला काग़ज़ सच निकला — तीन दिन तक वहाँ कुछ नहीं रहेगा।

मैंने अपनी दुकान के शटर पर कोयले से फिर से लिखा — अंकुश यादव। साइकिल मरम्मत। टूटा लाओ।

मेरी लिखाई टेढ़ी थी, पर साफ़ थी।

और मैंने सुबह की पहली चाय बनाई। एक कप अपने लिए, एक कप उस खाली कुर्सी के लिए जो अब पीपल के नीचे नहीं थी।

चाय ठंडी हो गई।

कोई नहीं आया।

फिर किशनलाल काका की दुकान से आवाज़ आई — वो अपनी बोरियों के बीच बैठे थे और चने का लोटा मुँह के पास ले जाकर बात टाल रहे थे। मैं गया। मैंने कहा, काका, चना तो दो।

वो हँसे नहीं।

"बेटा," उन्होंने कहा, "बैठ जा।"

मैं बैठ गया।

"तूने सुना नहीं?" उन्होंने पूछा।

"क्या?"

"कल रात से एक बात चल रही है।" उन्होंने आवाज़ धीमी की, जैसे गली में कोई सुन रहा हो। "कह रहे हैं कि तेरे पास जो आता है, उसका घर टूटता है। तेरा वो जोड़-वोड़ कुछ है ना — वो काला जादू है। जो तेरे पास जाता है, उसके घर से किसी न किसी की जान या रिश्ता जाता है।"

मैं कुछ देर चुप बैठा रहा।

"काका, ये बात कौन कह रहा है?"

"कोई कह नहीं रहा, बेटा। बात खुद चल रही है।" उन्होंने लोटा नीचे रखा। "और जब बात खुद चलती है, तो समझ ले कि उसे चलाने वाला कोई है।"

"कौन?"

"जो चलाता आया है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "बेटा, मैं बूढ़ा हूँ। डरता हूँ। पर एक बात साफ़ कह दूँ — मेरी बोरी के नीचे मेरा काग़ज़ अब भी रखा है। मैंने उसे जलाया नहीं। और आज भी मैं तेरे पास बैठा हूँ। बस इतना याद रखना।"

मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनका हाथ ठंडा था।

"काका, आपका काग़ज़ किसी दिन हम सबके सामने खुलेगा। मेरा वादा है।"

वो मुस्कुराए और बोले, "तो जल्दी खुलवा। मेरी उम्र थोड़ी बची है।"

मैं हँसा। पर हँसी अंदर तक नहीं गई।

दस बजे स्कूल के गेट पर मैंने जो देखा, वो मुझे अंदर से खोखला कर गया।

सानिया का बैग उसके अब्बा ने पकड़ा हुआ था और वो उसे गाड़ी की तरफ़ खींच रहे थे। सानिया स्कूल जाना चाहती थी, पर उसके पापा कह रहे थे — स्कूल जा, ज़रूर जा, पर उस दुकान के पास से गुज़रना मत। उस आदमी की तरफ़ देखना भी मत।

सानिया ने कहा, "अब्बा, वो मेरा… वो तो…"

"वो क्या?" उसके अब्बा की आवाज़ भारी हो गई। "वो जिसके पास जाने से घर टूटते हैं? तू क्या जानती है? तुझे बुखार आया था। तीन दिन बुखार। और कल रात को तेरी अम्मी ने सपना देखा कि हमारा घर… हमारा घर…"

वो बीच में रुक गए।

सानिया ने मुझे देखा। मैं दूर खड़ा था। उसकी आँखों में कुछ था — शर्म नहीं, डर नहीं। जैसे उसे भी लगने लगा हो कि मेरे पास आना सच में खतरनाक है।

उसने नज़र नीचे कर ली।

मैंने कुछ कहना चाहा। मैंने सिर्फ़ इतना कहा, "सानिया, स्कूल जा। देर हो रही है।"

वो कुछ नहीं बोली। वो अपने अब्बा के साथ चली गई।

उसके बाद चिंटू आया। वो दौड़ता हुआ आ रहा था, दुकान की तरफ़। उसकी अम्मी पीछे आई, उसने उसका हाथ पकड़कर झटके से खींचा और कहा — "तुझे कितनी बार कहा है, उस दुकान के पास मत जाना। ज़ुबान नहीं संभलेगी तो बेंत से शिक्षा दूँगी।"

चिंटू का हाथ छूट गया। वो मेरी तरफ़ सिर्फ़ एक पल देख पाया।

फिर रफ़ीक़। उसकी अम्मी ने स्कूल सभा की बात सबको सुना दी थी। रफ़ीक़ रो रहा था। उसकी अम्मी उसे घसीट ले गई।

गली में बच्चों के जूते की आवाज़ एक शोर बनकर फैलती थी — चप्पल, दौड़, हँसी, टिफ़िन के डिब्बों की खट-खट।

आज कुछ नहीं था।

सिर्फ़ अधेड़ लोगों की चप्पलें थीं। और वो चप्पलें मेरी दुकान को देखकर आगे निकल जाती थीं, जैसे मेरी दुकान कोई गड्ढा हो जिसमें कोई नहीं गिरना चाहता।

ग्यारह बजे मैं शबनम आपा की गुमटी पर गया।

चूल्हा जल रहा था। भाप उठ रही थी। केतली बज रही थी।

पर बेंच खाली थी।

"आपा।"

"बैठ।" उन्होंने कटोरी मेरी तरफ़ सरका दी। "चाय पी।"

"ग्राहक?"

"कल तेरह थे," उन्होंने कहा। "आज सुबह दो।" उन्होंने चिमटी उठाई और समोसे के कड़ाहे में डुबोई। "अब सुन।"

वो रुकीं।

"तीसरा आदमी आज सुबह यहाँ बैठा था," उन्होंने कहा। "कह रहा था — आपा, आपके चाय में कोई कमी नहीं, पर हमें बच्चों की चिंता है। आपका पड़ोस कैसा है आप जानती हैं। और जो काग़ज़ आपकी दुकान पर लगा है ना, वो दिखता है। हम तो बस साफ़-सुथरी जगह से चाय पीना चाहते हैं।"

मैंने कटोरी पकड़ी रही। "और आपने क्या कहा?"

"मैंने कहा — चाय मेरी, बैठना तेरा। चाहना मेरा, चाहता तू। बस इतना फ़र्क़ है कि मैं तेरे चाहने से अपना चूल्हा बंद नहीं करूँगी।"

मैं हँसा। पर वो नहीं हँसीं।

"अंकुश," उन्होंने धीमे से कहा, "मेरी बहन से पंद्रह साल बाद मेरी ज़ुबान खुली थी। अब तू वो नहीं खो देना। मैं आज बैठी हूँ, कल नहीं होऊँगी।"

रज़िया पीछे बर्तन धो रही थीं। उन्होंने बिना पलटे कहा, "बंद काग़ज़ हटा दो। ये सब इसी से खड़ा है।"

"नहीं हटाऊँगी," शबनम आपा ने कहा। "जिसने लगाया है, उसी को आना पड़ेगा।"

दोपहर बारह बजे उस्ताद अली बक्श की दुकान पर मैं गया।

मशीन ढकी थी। सफ़ेद कपड़ा उस पर पड़ा था, जैसे किसी बीमार के ऊपर चादर हो।

उस्ताद कुर्सी पर बैठे थे और चश्मे को कपड़े से साफ़ कर रहे थे।

"उस्ताद।"

"बैठ।"

मैं बैठ गया।

"दो दिन," उन्होंने कहा। "परसों तक।" उन्होंने चश्मा पहना। "आज सुबह एक आदमी आया। सफ़ेद कमीज़। हाथ में सिर्फ़ एक काग़ज़। कोई मुहर नहीं, कोई तारीख़ नहीं। बस लिखा था — दुकान दो दिन में खाली।"

"आपने क्या किया?"

"मैंने पूछा — तुम कौन हो? वो बोला, कोई नहीं। मैंने पूछा — ये काग़ज़ किसका है? वो बोला, जो भी है।" उस्ताद मुस्कुराए। "बेटा, मैंने दो दिन का इंतज़ार नहीं किया। मैंने उसी वक़्त अपनी मशीन ढक दी।"

मेरा दिल बैठ गया। "उस्ताद, आप—"

"अरे, तू रुक।" उन्होंने हाथ उठाया। "मैंने ताला नहीं लगाया। फ़र्क़ समझ। ताला तब लगेगा जब मशीन अकेली रह जाएगी। अभी मशीन अकेली नहीं है। अभी उसके भीतर पचास साल की गुनगुनाहट है। अभी वो बोलती है।"

वो उठे और मशीन के पास गए। उन्होंने कपड़ा उठाया और चक्के को उँगली से छुआ। चक्का धीरे से घूमा।

"घंटी की बात सुन," उन्होंने कहा। "वो जादू नहीं है। वो गली के भरोसे की सुई है। जिस दिन गली के लोग सच बोलना बंद कर देंगे, उस दिन वो सुई रुक जाएगी। और आज…" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "आज गली बोल नहीं रही है।"

"तो मैं क्या करूँ?"

"अभी कुछ मत कर।" उन्होंने कपड़ा नीचे डाल दिया। "अभी सिर्फ़ चुप रहकर सुन कि बाज़ार क्या कह रहा है। बाज़ार जब झूठ फैलाता है, तो उसका शोर ज़्यादा होता है और सच का सब्र कम।"

मैं दुकान की तरफ़ लौट रहा था कि मोड़ के नल पर झगड़ा सुनाई दिया।

सानिया के अब्बा की आवाज़ थी और गुड्डू के पापा की।

मैं दौड़ा।

एक बाल्टी थी बीच में। दोनों हाथ उस पर।

"तूने मेरी बारी में पानी भर लिया," सानिया के अब्बा बोले।

"पानी पर किसका हक़ है? काग़ज़ लाओ, तब बात करना," गुड्डू के पापा बोले।

"काग़ज़ तो तेरे भी पास नहीं।"

"मेरे पास नहीं तो तेरे पास कहाँ से आया?"

मैं बीच में आया और बोला — "दोनों रुकिए। बाल्टी से बात बढ़ाने की ज़रूरत नहीं। दो बाल्टी भर लो। पानी उतना ही है जितना कल था।"

और फिर दोनों मुझ पर पलट गए।

"तू बीच में मत बोल," सानिया के अब्बा झल्ला कर बोले। "तेरे पास बैठने से लोगों के घर टूट रहे हैं। तू खुद निकल जा गली से, पानी कम पड़ेगा।"

गुड्डू के पापा ने कहा — "यार बात तो सही है। जिसके दुकान पर कुछ नहीं होता, वो बीच में होकर क्या करेगा?"

पानी की बाल्टी दोनों ने ज़ोर से खींची। पानी छलका और मेरे पैर भीग गए।

मैं चुप खड़ा रहा।

फिर मैंने बहुत धीमे से कहा, "पानी इसी बात पर गिरा है कि आप दोनों ने बाल्टी दो तरफ़ खींची। गली भी इसी बात पर गिर रही है। और आपको लग रहा है कि गिराने वाला मैं हूँ।"

कोई जवाब नहीं दिया।

सानिया के अब्बा ने बाल्टी छोड़ दी और चले गए। गुड्डू के पापा ने पानी भरा और ले गए।

रात को जब बात बढ़ गई तो सब जानते हैं क्या हुआ।

पर उससे पहले शाम चार बजे जो हुआ, वो मैं सबसे पहले बताना चाहूँगा, क्योंकि उसी से गली की चुप्पी शुरू हुई।

शाम चार बजे के करीब दो खाकी जीपें चौक पर आईं। उनमें से दरोगा जी उतरे। उनके पीछे दो सिपाही।

वो सीधे पीपल के नीचे पहुँचे जहाँ मेरी मेज़ थी। मैंने आज सुबह उसे वहाँ नहीं लगाया था, लेकिन सोचा था कल लगाऊँगा।

शायद मेरे कारण नहीं। पर दरोगा ने मेरा नाम लिया।

"अंकुश यादव।"

"जी, सर।"

"यहाँ सभा करने की अनुमति है?"

"सभा नहीं है, सर। बोर्ड है।"

"बोर्ड है या सभा है, ये मैं तय करूँगा।" उन्होंने सिपाही को इशारा किया। "इस जगह पर सार्वजनिक संपत्ति है। यहाँ किसी भी तरह का केंद्र, बोर्ड, मेज़, टूलबॉक्स नहीं रह सकता। ये अवैध सभा की श्रेणी में आता है। आगे कोई सभा करते मिले तो कुर्सी उठाकर जाना पड़ेगा।"

सिपाही ने मेरी मेज़ उठाई। मेरी कुर्सी उठाई। मेरा टूलबॉक्स उठाया — वो मेरा बाप का था, उस पर पापा ने खुद अपना नाम खुरचा था।

टूलबॉक्स को ट्रक में डाला जा रहा था तो मेरे हाथ उठ गए। फिर रुक गए।

दुबे अंकल अपनी कुर्सी पर बैठे थे, थाने के बाहर। उन्होंने देखा। फिर अपनी छड़ी ज़मीन पर टिकाई और आँखों से इशारा किया — चुप रह, बेटा। आज मत लड़।

मैं चुप रहा।

पर अंदर से चुप नहीं था।

पाँच बजे वो सब होकर चला गया। गली में आवाज़ की जगह… एक अजीब सी चादर बिछी मिली।

लोग घरों से बाहर आए थे, पर बोल नहीं रहे थे। औरतें बालकनी से देख रही थीं और अंदर चली जाती थीं। बच्चों को घरों में बंद कर दिया गया था।

यहाँ तक कि कुत्ते भी नहीं भौंके। भूरा की जगह अब कोई नया कुत्ता आ गया था, वो भी चुपचाप नाली के किनारे पड़ा था।

और पीपल के नीचे चबूतरी खाली पड़ी थी। बंसी बाबा, रहमत बाबा, मक़बूल चाचा — कोई नहीं। सिर्फ़ पत्तों की आवाज़।

मैंने अपनी दुकान के सामने वो टूटी चौकी रखी और बैठ गया।

आसमान में पहली बार गली के रंग फीके लगे। मुझे लगा जैसे पीपल के पत्ते भी धूल खा रहे हैं।

फिर मैंने घंटी निकाली।

जेब से निकाली। हथेली में रखी। गरम होने की उम्मीद थी, ठंडी थी।

मैंने बजाया।

टन।

सिर्फ़ धातु की आवाज़। एक सीधी, खाली, ठंडी आवाज़ — जैसे कोई मरे हुए आदमी के कान में बजा रहा हो।

मैं रुका। मैंने सुना। कुछ नहीं आया।

मैंने फिर बजाया।

टन।

"अरे," मैंने कहा, "बोल।"

कुछ नहीं।

मैंने फिर बजाया। फिर। फिर।

चौथी बार बजाया तो मेरे हाथ काँप रहे थे। पाँचवीं बार बजाया तो मेरी आँखें भर आईं।

"बोल ना," मैंने कहा। "बोल। कुछ तो बोल। तू हर वक़्त कुछ न कुछ बोलती है। आज मर गई है क्या?"

गली सुन रही थी। पर कोई बाहर नहीं आया।

मैंने घंटी को उलटा, पलटा, उसे दुकान के अंदर ले जाकर पोंछा, बाहर लाया, हवा में लहराया, पानी से धोया, कपड़े से रगड़ा।

कुछ नहीं।

वो बर्फ जैसी ठंडी थी और मेरे हाथ में निर्जीव पड़ी थी।

मुझे याद आया — कल रात मैंने उसे फ़र्श पर पटक दिया था। शायद मैंने उसे तोड़ दिया था। शायद उसके अंदर कुछ टूट गया था। शायद वो आख़िरी बार बोली थी और मैंने उसे गुस्से में पटककर उसकी ज़ुबान हमेशा के लिए बंद कर दी थी।

मैंने घंटी को सीने से लगाया और उसी चौकी पर बैठ गया।

शाम सात बजे गुमटी पर शबनम आपा ने चिमटी से तवे पर थपकी दी — मैंने दूर से सुना। किसी ग्राहक को बुलाने के लिए नहीं। बस आवाज़ के लिए। जैसे कोई अंधेरे कमरे में सीटी बजाकर खुद को यक़ीन दिलाता हो कि वो अकेला नहीं है।

आठ बजे मेरी दुकान के शटर पर तीन दस्तकें हुईं।

मैंने खोला।

डॉक्टर निहाल इसरानी खड़े थे। सफ़ेद कोट नहीं पहना था। पुरानी सी कमीज़ थी और हाथ में एक स्टील का डिब्बा।

"चाय लाया हूँ," उन्होंने कहा। "बेटा, मुझे अकेले पीने की आदत नहीं है।"

वो अंदर आए। चौकी पर बैठे। डिब्बा खोला। दो गिलास थे उसमें। उन्होंने एक मुझे दिया।

"घंटी बजाई?" उन्होंने पूछा।

मैंने हाथ में घंटी देखी। "हाँ।"

"कुछ बोली?"

"नहीं।"

उन्होंने चाय की चुस्की ली।

"अंकुश, एक बात सुन।" उन्होंने गिलास दोनों हाथों में रखा। "मैंने बहुत देखा है। चालीस साल से इस अस्पताल में बैठा हूँ। मरीज़ आते हैं, जाते हैं, रोते हैं, मरते हैं, बचते हैं। एक बात सीखी है — दवा आधा काम करती है, और आधा काम वो करता है जिसे मरीज़ अपने आस-पास महसूस करता है। जिस दिन घर में कोई नहीं बैठता, उस दिन दवा का असर भी कम हो जाता है।"

"डॉक्टर साहब, ये घंटी—"

" ये घंटी तेरे भरोसे से चलती है। और भरोसा अकेले नहीं बनता। भरोसा बहुत लोगों में बँटा होता है।" उन्होंने उँगली उठाई। "तू सोचता है तेरे पास कोई जादू है जो बोलता है। नहीं। जो बोलता है, वो इस गली के लोगों का भरोसा है। जो बच्चा सानिया तेरे पास आकर खुश होती थी, जो किशनलाल अपना काग़ज़ जलाने नहीं देता, जो शबनम तेरी चाय बनाती है, जो उस्ताद तेरे लिए मशीन नहीं बेचता — वो सब मिलकर उस घंटी की आवाज़ बनते हैं। और जब वो सब चुप हो जाएँ, तो घंटी के पास बोलने के लिए कुछ बचता ही नहीं।"

मैं कुछ देर चुप बैठा रहा।

"तो घंटी मर गई?"

"घंटी नहीं मरी।" उन्होंने मेरे हाथ से घंटी ली और उसे अपनी हथेली में रखा। "ये ठंडी है क्योंकि गली ठंडी है। जिस दिन गली फिर बोलेगी, ये फिर गरम होगी।" उन्होंने घंटी वापस दी। "पर बेटा, ये मत सोच कि गली अपने आप बोलेगी। गली को वो आदमी बोलता है, जो उसके बीच सुबह सबसे पहले खड़ा होता है।"

"मतलब?"

"मतलब — तू अपना शटर कल भी खोलना। चाय बनाना। कोई न आए तो बैठकर औज़ार साफ़ करना। जो गुज़रे उसे सिर्फ़ सलाम करना। कुछ माँगना नहीं। कुछ साबित करना नहीं।" उन्होंने आँखों में देखा। "जो आदमी सबसे ज़्यादा शक के घेरे में होता है, उसे अपनी बेगुनाही साबित नहीं करनी होती। उसे बस वही रहना होता है जो वो है। सच खुद अपना हिसाब रखता है।"

वो उठे। दरवाज़े तक गए। फिर रुके।

"एक और बात।" उन्होंने कहा। "मेरे पास एक पुराना रिकॉर्ड कमरा है। जिसमें इस अस्पताल की सारी ज़मीन और सारे दान का हिसाब है। कल सुबह उस्ताद के साथ आना। वो काग़ज़ आज किसी और के पास जाने वाला है। और अगर वो जाने से रुका, तो एक नाम खुलेगा जो सबने मिटाया है।"

वो चले गए।

रात ग्यारह बजे मैं चौकी पर बैठा था। दुकान का शटर आधा खुला रखा था, ताकि गली की हवा अंदर आ सके।

फिर गाड़ी आई।

एक बड़ी गाड़ी। चमकदार। रोशनी मेरी दुकान के शटर पर पड़ी और परछाइयाँ पीली हो गईं।

गाड़ी रुकी।

इंजन बंद हुआ।

खिड़की का काँच नीचे आया, धीरे, बिना आवाज़ के।

मैंने देखा — गाड़ी में सामने रणवीर बैठा था। सफ़ेद कुर्ता। हाथ में एक सफ़ेद रूमाल। और उसकी उँगली पर वो काली अंगूठी, जो पुराने ताले की कुंडी सी लगती है।

उसने चौकी की तरफ़ नहीं देखा। वो सीधा मेरी दुकान के उस पुराने नाम को देख रहा था जो मैंने सुबह कोयले से लिखा था।

"अंकुश," उसने कहा। आवाज़ बहुत नरम थी, जैसे कोई बड़ा भाई बुला रहा हो।

मैं चुप रहा।

"तुम्हारी दुकान का नंबर सात है, है ना?"

मैंने जवाब नहीं दिया।

"मुझे नंबर से मतलब नहीं है।" उसने रूमाल मोड़ा। "मुझे नाम से मतलब है। कल सुबह जब गली में लोग जागेंगे, तो इस गली में एक नाम सुनाई देगा।" वो रुका। "मेरा।"

मेरा हाथ घंटी पर था। घंटी बर्फ जैसी ठंडी।

"तुम्हारा नाम—" उसने धीमे से कहा, "अब इस गली में नहीं होगा। न दुकान पर, न स्कूल में, न किसी के मुँह पर। और जो कहेगा, उसका घर वही होगा जो आज शाम किशनलाल के साथ हुआ।"

मेरा दिल धड़का। "किशनलाल काका को क्या हुआ?"

वो हल्का मुस्कुराया।

"अभी कुछ नहीं।" उसने खिड़की उठाई। "पर सुबह तक हो जाएगा।"

खिड़की बंद हुई।

गाड़ी चली गई।

मैं दुकान के सामने खड़ा रह गया। मेरे हाथ में घंटी थी। मेरी आँखों के सामने कोयले से लिखा मेरा नाम था।

और अंदर से एक आवाज़ आई — घंटी से नहीं। मेरे ही सीने से।

मैंने वो कोयले वाला नाम मिटाया नहीं।

मैंने उसे और गहरा किया।

फिर मैंने अपनी कॉपी निकाली और उसमें लिखा — "आज गली चुप हो गई। घंटी चुप हो गई। तो अब सवाल यह नहीं है कि मैं घंटी से क्या सुनूँगा। सवाल यह है कि मैं गली को कैसे बोलना सिखाऊँगा।"

मैंने कॉपी बंद की।

और बाहर देखा। पीपल की डाल हवा में हिल रही थी। दूर किशनलाल की दुकान का बल्ब जल रहा था।

मैंने उस बल्ब को देखकर कहा, "काका, तुम डरना मत। मैं आ रहा हूँ।"

और मैंने घंटी जेब में रखी। ठंडी घंटी। पर अब मैं उसे बजाने नहीं जा रहा था। अब मैं उसे गरम करने जा रहा था — अपने हाथों से, अपनी गली से, अपने लोगों से।

रात बारह बजे जब मैं चारपाई पर लेटा, तब भी कुछ सोच रहा था।

एक आदमी ने मेरी गली से मेरा नाम मिटाने की बात कही थी।

पर उसे क्या पता — जिनके नाम अंदर से मिट जाते हैं, उनका नाम कोयले से दुकान पर लिखने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

॥

सुबह मैंने शटर उठाया तो हवा में कुछ अलग था।

गली में लोग थे। चल रहे थे। बातें कर रहे थे। पर सबकी बातें मेरी तरफ़ से फिसलकर गुज़र रही थीं, जैसे मैं वहाँ हूँ ही नहीं।

मैंने औज़ारों का ट्रंक खोला। रिंच निकाली। पंचर वाला टब भरा। चाय की केतली चूल्हे पर रखी। सब ठीक वैसा ही।

बस गली नहीं थी।

दस बजे तक कोई नहीं आया। ग्यारह बजे एक आदमी आया — वो भी बाहर से झाँककर चला गया, जैसे अंदर कुछ गिरा हुआ हो जिसे छूना मना हो।

फिर मोड़ से चार औरतें आईं। मैंने सुना — वो मेरी दुकान के सामने से नहीं, दूसरी तरफ़ से निकलीं, ताकि मेरा शटर उनकी नज़र में न आए।

उनमें से एक बोली, "उसी के पास जाते हैं तो घर में झगड़ा हो जाता है। मेरी बहू कल से बोल नहीं रही।"

दूसरी बोली, "मेरे बच्चे के हाथ पर फोड़ा निकल आया। एक ही हफ़्ते में।"

तीसरी ने धीमे से कहा, "काला जादू है। गोरा-गोरा मुँह, अंदर से कुछ और।"

मैंने रिंच हाथ में पकड़ी रखी और मैंने आँख नहीं उठाई। तुम सोच रहे होगे कि मैं भागकर उन्हें रोकता, कहता कि ऐसा कुछ नहीं है। पर उस वक़्त मुझे एक बात समझ आ गई थी — जो इल्ज़ाम हवा में डाला जाता है, उसे हवा से ही लड़ना पड़ता है। ज़ुबान से नहीं।

किशनलाल काका की दुकान का बल्ब अब भी जल रहा था। मैंने देखा — शटर आधा खुला। अंदर कोई नहीं। बोरियों के ढेर पर एक चटाई पड़ी थी, जैसे किसी ने बैठकर इंतज़ार किया हो और फिर उठ गया हो।

मैं वहाँ गया।

दरवाज़े पर खड़ा होकर मैंने कहा, "काका?"

अंदर से आवाज़ आई, "कौन?"

"मैं हूँ। अंकुश।"

फिर चुप्पी। लंबी चुप्पी। फिर धीमे पैरों की आवाज़, और काका बोरी के पीछे से निकले। उनके हाथ में चने का लोटा था, जो वो मुँह के पास उठाए हुए थे, जैसे बात टालने के लिए पकड़ा हो।

"काका, कल रात के बाद कुछ हुआ?"

"कुछ नहीं हुआ।" उन्होंने कहा। बहुत जल्दी कहा। "कुछ नहीं हुआ। बस… बस कुछ लोग आए थे। समझाने।"

"कौन?"

"तू जानता है कौन।" उन्होंने लोटा नीचे रखा। "अंकुश, मैं बूढ़ा आदमी हूँ। मेरी दुकान है, एक बेटा है जो बाहर काम करता है, एक बीवी है जिसकी कमर में दर्द रहता है। मुझे किसी से लड़ना नहीं है।"

"काका, मैंने किसी से लड़ने को नहीं कहा—"

"तूने नहीं कहा।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखें कमज़ोर थीं, पर उस वक़्त उनमें कुछ था जो मुझे चुभा। "तूने कभी नहीं कहा। पर तेरे पास आने वाले का घर टूटता है। यह बात मैंने तेरे मुँह से नहीं सुनी। गली के मुँह से सुनी। और गली की बात गली में रहती है, अंकुश। मेरे जैसे आदमी के लिए गली ही दुनिया है।"

मैं चुप खड़ा रहा।

"मैंने अपना काग़ज़ नहीं जलाया।" उन्होंने धीमे से कहा। "बोरी के नीचे है। तेरे कहे मुताबिक।" वो रुके। "पर अभी मत खुलवा। मुझे सोचने दे।"

मैंने सिर हिलाया।

"अच्छा है।" मैंने कहा। "आप सोचिए। पर काका, एक बात — जो काग़ज़ आपने नहीं जलाया, वही आपका सबसे बड़ा सबूत है। उसे और मत दबाइए।"

वो कुछ कहते, उससे पहले ही पीछे से किसी ने आवाज़ दी — "काका, दाल तौलनी है?" और काका ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे कह रहे हों, बेटा, अब तू जा।

मैं चला आया।

दुकान लौटकर मैंने उस्ताद की दुकान को देखा। परदा ढका हुआ। मशीन ढकी हुई। शटर आधा गिरा। और दरवाज़े पर वो काग़ज़ अब भी चिपका था — दो दिन में दुकान खाली करने वाला, बिना मुहर वाला।

मैं वहाँ गया। परदे के पास खड़ा होकर मैंने धीमे से कहा, "उस्ताद?"

अंदर से आवाज़ आई, "अंदर आ।"

मैं अंदर गया। उस्ताद सिलाई मशीन के पास बैठे थे। मशीन ढकी थी, पर उनका हाथ उस पर था, जैसे कोई बीमार आदमी की नाड़ी पकड़े बैठा हो।

"बैठ।" उन्होंने कहा।

मैं बैठ गया।

"ताला नहीं लगाया।" मैंने कहा।

"नहीं लगाया।" उन्होंने कहा। "मशीन अकेली रहेगी, तब ताला लगाऊँगा। आज सुबह मनोज आया था। उसने कहा — उस्ताद, आपका काग़ज़ साफ़ नहीं है। मैंने कहा, बेटा, मेरी सिलाई साफ़ है। काग़ज़ तो सरकार का धोबी धोएगा।"

वो हँसे। छोटी हँसी। फिर चुप।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "तूने कल घंटी बजाई थी?"

"बजाई।"

"आवाज़ आई?"

"नहीं।"

उन्होंने सिर हिलाया। "मुझे पता था।"

"आपको कैसे पता?"

"क्योंकि आज सुबह मेरी मशीन ने भी आवाज़ नहीं दी।" उन्होंने कहा। "मैंने सुई बदलनी चाही, तो धागा टूट गया। मैंने फिर लगाया, फिर टूट गया। तीन बार। फिर मैंने मशीन ढक दी।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"उस्ताद, आप डर रहे हैं?"

"मैं डर नहीं रहा।" उन्होंने कहा। "मैं सोच रहा हूँ।" वो रुके। "पचास साल पहले जब मैंने दुकान छोड़ी थी, तब भी मशीन ने ऐसे ही धोखा दिया था। धागा तोड़ना मशीन का गुस्सा नहीं होता, अंकुश। धागा तब टूटता है जब जोड़ने वाला हाथ काँप रहा हो।"

"मेरा हाथ नहीं काँप रहा।"

"मेरा काँप रहा है।" उन्होंने कहा। सीधा। बिना शर्म के। "और उसमें तेरा कसूर नहीं। मेरी उम्र का कसूर है। पचास साल में मैंने एक बात सीखी — जब गली चुप होने लगे, तो सबसे पहले बूढ़े की ज़ुबान सूखती है। क्योंकि बूढ़े को लगता है कि अब उसके पास खोने को कुछ नहीं बचा। पर सच यह है — सबसे ज़्यादा उसी के पास बचा होता है।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"जा।" उन्होंने कहा। "आज मुझे अकेले बैठने दे। और अंकुश—" वो रुके। "मशीन का परदा मत उठाना। जब तक मैं खुद न उठाऊँ।"

मैं उठा।

दरवाज़े पर पहुँचकर मैं रुका। "उस्ताद, कल सुबह डॉक्टर इसरानी ने रिकॉर्ड कमरे के लिए बुलाया है।"

"मुझे पता है।" उन्होंने कहा। "वो काग़ज़ आज किसी और के पास जाने वाला है। और मैं उसे जाने नहीं दूँगा। भले मेरी मशीन अकेली रहे।"

मैं बाहर आया।

दोपहर में शबनम आपा की गुमटी पर गया। वहाँ बेंच खाली थी। चूल्हा जल रहा था, कड़ाही में तेल गरम था, समोसे तले जा रहे थे — पर कोई खाने वाला नहीं था।

रज़िया बैठी थी। रोटी परोस रही थी, जिसे कोई माँगने वाला नहीं।

"आपा," मैंने कहा, "इतने समोसे?"

"आदत नहीं छोड़ सकती।" उन्होंने कहा। "चूल्हा जलता रहेगा, तो कोई न कोई आएगा।"

"काग़ज़ नहीं हटाया?"

"नहीं हटाया।" उन्होंने चिमटी उठाई। "यह काग़ज़ मेरे चूल्हे के ऊपर लटका है। जब चूल्हा बुझेगा, तब हटेगा।"

रज़िया ने धीमे से कहा, "दीदी, अब मान जाओ। दो दिन से कोई नहीं आया।"

"तो क्या?" शबनम आपा ने कहा। "मैं चूल्हा उनके लिए नहीं जलाती जो आते हैं। मैं उनके लिए जलाती हूँ जो नहीं आ रहे। जिस दिन वो लौटेंगे, चाय गरम मिले।"

मैंने चाय माँगी।

वो मुस्कुराईं। "अच्छा किया। कम से कम एक ग्राहक तो है।"

चाय पीते हुए मैंने कहा, "आपा, कल शाम को रणवीर की सभा है। पीपल के नीचे। दो कुर्सी।"

"मुझे पता है।" उन्होंने कहा। "मेरे पास भी काग़ज़ आया है।"

"आप जाएँगी?"

"जब तक चूल्हा जलता है, मैं अपनी जगह पर रहूँगी।" उन्होंने कहा। "वो मेरे पास आएंगे, तो बात करूँगी। मैं उनके पीछे नहीं जाऊँगी।"

मैंने चाय ख़त्म की।

जाते वक़्त मैंने देखा — रज़िया की आँखें भरी हुई थीं। उसने कुछ कहना चाहा, पर शबनम आपा ने उसका हाथ पकड़ लिया और वो चुप हो गई।

तीन बजे गली के नल पर मैं गया। पानी भरने की बाल्टी मेरे हाथ में थी। वहाँ सानिया के अब्बा खड़े थे — बाल्टी नीचे रखी, हाथ में रस्सी। और गुड्डू के पापा आ रहे थे, अपनी बाल्टी लेकर।

"नल पर मेरा नंबर पहले था।" सानिया के अब्बा ने कहा।

"नंबर का काग़ज़ कहाँ है?" गुड्डू के पापा ने कहा।

"काग़ज़ की बात मत कर।" सानिया के अब्बा की आवाज़ चढ़ गई। "काग़ज़ वालों ने ही तो यह हाल किया है।"

"मतलब तू मुझे काग़ज़ वाला कह रहा है?"

"मैं तुझे कुछ नहीं कह रहा। मैं कह रहा हूँ — मेरी बेटी बुखार में है। उसे पानी चाहिए।"

"मेरे घर में भी बर्तन खाली हैं।"

दोनों की आवाज़ें बढ़ने लगीं। रस्सी खिंची, बाल्टी खड़खड़ाई, और फिर वो बात आई जिसका मुझे डर था।

"यह सब उसी की वजह से है।" सानिया के अब्बा ने कहा। "जो आजकल दुकान पर बैठा है।"

"मुझे मत घसीट उसे।" मैंने कहा।

दोनों मेरी तरफ़ मुड़े।

"तू क्यों बीच में आता है?" गुड्डू के पापा ने कहा। "तूने ही तो सब शुरू किया था। तेरी वजह से लोग आपस में बोलते हैं।"

"मैंने तो किसी से लड़ने को नहीं कहा—"

"तूने नहीं कहा।" सानिया के अब्बा ने कहा। मेरी तरफ़ उँगली उठी। "पर तू जब दो लोगों को बैठाकर बात कराता है, तो बात फैलती है। और बात फैलने से घर टूटते हैं। मेरी बेटी तेरे पास जाती थी, तेरी दुकान पर। आज उसके हाथ पर फोड़ा है। तू बता — मैं इसे किससे जोड़ूँ?"

मैं चुप खड़ा रहा।

क्योंकि उस वक़्त मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मैं कह सकता था — यह तंत्र ऐसा नहीं करता। पर वो आदमी अपनी बेटी के हाथ का फोड़ा देख रहा था, मेरा तंत्र नहीं।

"अब वो नहीं जाएगी।" उन्होंने कहा। "मैंने मना कर दिया है। और तू भी उससे दूर रह।"

गुड्डू के पापा ने सिर हिलाया। "मेरे बेटे से भी।"

बाल्टियाँ लेकर दोनों चले गए। पानी नल से बहता रहा। मैं वहीं खड़ा रहा।

आधे घंटे बाद जब मैं लौट रहा था, तो देखा — सानिया अपने दरवाज़े की चौखट में खड़ी थी। उसके हाथ में एक बाल्टी थी, खाली। उसने मुझे देखा और फिर अंदर मुड़ गई, जैसे देखा ही न हो।

मेरे सीने में कुछ जल्दी-जल्दी चुभा। पर मैं रुका नहीं।

शाम चार बजे पुलिस आई।

दो जीपें। चौक पर रुकीं। दरोगा साहब उतरे — वही थे जो कल आए थे। उनके पीछे दो सिपाही।

मैं दुकान पर बैठा था, किसी पुराने पहिये की तीलियाँ सीधी कर रहा था।

दरोगा सीधे पीपल के नीचे गए।

वहाँ मेरी मेज़ थी। चबूतरी पर रखी। बोर्ड — जिस पर मैंने लिखा था कि टूटी चीज़ और टूटा रिश्ता दोनों लेकर आओ। टूलबॉक्स। दो छोटी कुर्सियाँ।

दरोगा ने हाथ उठाया।

सिपाहियों ने मेज़ उठाई। कुर्सियाँ उठाईं। टूलबॉक्स उठाया।

मैं दौड़कर गया।

"साहब, वो बोर्ड—"

"बोर्ड हटाओ।" उन्होंने कहा।

"वो बोर्ड मेरा है—"

"जगह सरकारी है।" उन्होंने कहा। "यहाँ बोर्ड लगाने की इजाज़त किसने दी? काग़ज़ दिखाओ।"

मेरे पास काग़ज़ नहीं था।

"मैं पूछ रहा हूँ, इजाज़त किसने दी?" वो फिर बोले।

मैं चुप रहा।

"अवैध सभा का काग़ज़ आया है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखकर कहा। "बिना इजाज़त के यहाँ जमावड़ा। तीन दिन की रोक लगती है। और यह जो कुछ तुमने पीपल के नीचे जमा कर रखा है, वो सब हटेगा। कल से यहाँ कुछ नहीं रखोगे। समझे?"

"साहब, मैं किसी को जोड़ने का काम करता हूँ—"

"कौन सा काम?" उन्होंने पूछा।

"मैं लोगों की बात कराता हूँ। रिश्ते जोड़ता हूँ।"

दरोगा हँसे।

"अंकुश यादव," उन्होंने धीमे से कहा, "जहाँ तक मुझे याद है, तुम साइकिल ठीक करते हो। पंचर बनाते हो। ट्यूब पैच करते हो। और जोड़ने का काम… सरकार करती है।"

वो अपनी जीप की तरफ़ मुड़े।

"साहब," मैंने पीछे से कहा, "एक बाल्टी पानी का सवाल था। नल पर दो आदमी लड़ रहे थे। मैंने बस उन्हें बैठाया था—"

दरोगा रुके।

"इसीलिए हटवा रहा हूँ।" उन्होंने कहा। "क्योंकि तुम अब भी यही सोचते हो कि तुमने कुछ ठीक किया है। तुमने नहीं ठीक किया, अंकुश। तुमने बीच में पड़कर आग हवा दी। जिस दिन यह समझ आ जाएगा, उस दिन तेरा भला होगा।"

वो चले गए।

पीपल के नीचे खाली ज़मीन बची। पत्थर की चबूतरी पर एक पीला गीला दाग — बबलू के पान का, जो कभी वहाँ बैठा था। और धूल में मेज़ के चार पैरों के निशान।

मैंने उन निशानों को देखा।

फिर मैंने मेज़ को नहीं उठाया। मैंने उसे उसी जगह, उसी चबूतरी के किनारे पटक दिया — जहाँ कभी जोड़ स्कूल बैठता था — और उस पर वो बोर्ड रख दिया जो मैंने सफ़ेद पेंट से बनाया था।

दरोगा ने कहा था — कल से यहाँ कुछ नहीं रखोगे। तो मैंने आज रख दिया। आख़िरी बार। जैसे कोई आदमी अपने घर का आख़िरी दीया बुझाने से पहले एक बार फूँक मारता है।

फिर मैं दुकान पर आ गया।

छह बजे शाम।

गली में सन्नाटा छा गया।

तुम सोचते होगे कि सन्नाटा क्या होता है? शोर का न होना? नहीं। सन्नाटा वो होता है जब बच्चों के खेलने की जगह पर बच्चे न हों। जब गेंद ज़मीन पर गिरकर उछले और कोई न दौड़े। जब माँ अपने बच्चे को बुलाए और आवाज़ दीवार से टकराकर लौट आए क्योंकि सामने कोई नहीं जो सुने।

उस शाम ऐसा ही था।

मैं दुकान के सामने चौकी पर बैठा था। पीपल की डाल अब भी हिल रही थी। पर उसके नीचे कुछ नहीं था। न बुज़ुर्ग, न बच्चे, न चबूतरी पर बैठने वाला कोई।

किशनलाल की दुकान का बल्ब जल रहा था।

शबनम आपा की गुमटी पर चूल्हा जल रहा था, पर वहाँ कोई ग्राहक नहीं था।

उस्ताद की दुकान ढकी हुई थी।

और मेरी दुकान खुली थी।

मैंने जेब से घंटी निकाली।

वो बर्फ जैसी ठंडी थी। छल्ले पर वो दो लकीरें और बीच का बिंदु था — मुझे अब उसमें कुछ और दिखने लगा था, जो पहले नहीं दिखता था। जैसे कोई आदमी थक जाए और रास्ते की हर लकीर में चेहरा ढूँढने लगे।

मैंने घंटी बजाई।

टन।

बस। बस टन। धातु की आवाज़। जैसे किसी और की साइकिल।

मैंने फिर बजाई।

टन।

फिर बजाई। और फिर।

टन। टन। टन।

मेरे हाथ की हड्डी दुखने लगी। मैंने घंटी को हथेली में दबाया, फिर खोला, फिर देखा, फिर गरम करने के लिए मुँह से फूँका।

कुछ नहीं।

ना आवाज़। ना फुसफुसाहट। ना वो रूखी, छोटी, टूटी ज़ुबान जो कहती थी — "क्या टूटा है?"

बस सन्नाटा।

मैंने उसे फिर बजाया।

"बोल।" मैंने कहा। मेरी आवाज़ काँप रही थी। "बोल ना। मुझे पता है तू सुन रही है। तूने कल भी सुना था। आज गली चुप है, तो क्या हुआ? तू तो घंटी है। तू मेरी है।"

टन।

"मत कर ऐसा।" मैंने कहा। "मैं तुझसे लड़ नहीं रहा। मैं तुझसे नहीं लड़ूँगा। बस एक बार बोल दे।"

कुछ नहीं।

मैंने घंटी को चौकी पर रख दिया। मेरे हाथ काँप रहे थे। और मेरी आँखें? वो भरी हुई थीं, पर मैंने उन्हें छुआ नहीं।

फिर पीछे से आवाज़ आई।

"अंकुश बेटा।"

मैं पलटा।

डॉक्टर इसरानी खड़े थे। हाथ में एक स्टील का डिब्बा था — उन्होंने पहले भी इस्तेमाल किया था — और उसमें से भाप निकल रही थी। गरम चाय।

"बैठ।" उन्होंने कहा।

मैं बैठ गया।

उन्होंने स्टील का डिब्बा मेरे हाथ में रखा।

"पी।"

मैंने पिया। गरम थी, और उससे मेरा गला भर गया। मैंने आँखें बंद कर लीं।

वो मेरे सामने खड़े रहे।

"घंटी बजा रहा था?" उन्होंने पूछा।

"हाँ।"

"आवाज़ आई?"

"नहीं।"

"अच्छा।" उन्होंने कहा।

मैंने उनकी तरफ़ देखा। "अच्छा?"

"हाँ।" वो मेरे सामने वाली कुर्सी पर बैठ गए। "मुझे पता था कि नहीं आएगी।"

"तो आपने मुझे बताया क्यों नहीं?"

"क्योंकि तू खुद सुनना चाहता था।" उन्होंने कहा। "और मेरी बात तूने कभी उतनी गहराई से नहीं सुनी जितनी अपने डर की। जब तक डर सामने न आए, बात पीछे नहीं लगती।"

मैं चुप रहा।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "यह घंटी कोई जादू की चीज़ नहीं है। मैं साठ साल से इन लोगों को देख रहा हूँ, इन गलियों को देख रहा हूँ। यह घंटी गली की ज़ुबान है। जब गली बोलती है, यह बोलती है। जब गली चुप हो जाती है, यह चुप हो जाती है। तूने तो बस उसकी आवाज़ बनना सीखा है।"

"पर यह तंत्र है।" मैंने कहा। "इसमें नियम हैं, अंक हैं, शक्तियाँ हैं—"

"हाँ।" उन्होंने कहा। "और उन सबका ईंधन क्या है?"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"मैं पूछ रहा हूँ, ईंधन क्या है?"

"भरोसा।" मैंने कहा।

"जली हुई लकड़ी को आग नहीं रहती।" उन्होंने कहा। "और भरोसा ही इस तंत्र की लकड़ी है। उसे इकट्ठा करने में तुझे महीने लगे, और इसे जलाने में रणवीर को एक हफ़्ता। क्योंकि आग जलाना आसान है, हवा देना आसान है।"

मेरा हाथ घंटी पर गया।

"तो मैं क्या करूँ?" मैंने कहा। "यहीं बैठ जाऊँ?"

"नहीं।" उन्होंने कहा। "तू वो कर जो इन सबब से होता है — सवाल छोड़कर अपना काम कर।"

"क्या?"

"एक आवाज़ी चीज़ का इंतज़ार मत कर। तू ज़ुबान वाला काम कर। कल सुबह उस्ताद के साथ मेरे पास आना। रिकॉर्ड कमरा खुलेगा। उसमें एक काग़ज़ है जिसमें इस अस्पताल की ज़मीन का हिसाब है, और उस हिसाब में एक नाम है जिसे सबने मिटाया है।"

"कौन सा नाम?"

"जब देखेगा तब जानेगा।" वो उठे। "पर एक बात कान में डाल ले — जिस दिन गली फिर से बोलेगी, उस दिन घंटी आवाज़ नहीं देगी। घंटी चीख़ देगी। जितनी गहरी चुप्पी, उतनी ऊँची आवाज़।"

वो चले गए।

मैं अकेला रह गया।

रात नौ बजे तक मैं दुकान पर बैठा रहा। घंटी सामने मेज़ पर पड़ी थी। मैंने उसे एक बार भी नहीं छुआ।

फिर ग्यारह बजे मैं बाहर आया। गली में बत्तियाँ बुझी हुई थीं। सिर्फ़ किशनलाल की दुकान का बल्ब जल रहा था। दूर, नए बाज़ार के मोड़ की तरफ़, एक-दो बत्तियाँ और दिख रही थीं।

मैंने सड़क की तरफ़ देखा।

फिर चौक की तरफ़।

फिर वो गाड़ी आई।

सफ़ेद। लंबी। चमकदार। रोशनी पहले मेरे शटर पर आई — मैंने वो कोयले वाला नाम और गहरा कर दिया था, वो उभरकर दिखा — फिर रोशनी मेरे चेहरे पर पड़ी।

गाड़ी रुकी। इंजन बंद हुआ। खिड़की का काँच उतरा। धीरे।

अंदर रणवीर बैठा था। सफ़ेद कुर्ता। हाथ में वही रूमाल। काली अंगूठी अब भी उँगली पर।

"अंकुश।" उसने कहा।

मैंने जवाब नहीं दिया।

"सुन।" उसने कहा। उसकी आवाज़ बहुत नरम थी, बहुत शांत। "आज शाम गली में क्या हुआ?"

"आप जानते हैं।" मैंने कहा।

"मैं जानना चाहता हूँ। बता।"

मैं कुछ नहीं बोला।

"तेरी गली आज चुप थी।" उसने खुद कहा। "बिल्कुल चुप। और यह मैंने नहीं किया।"

"आपने किया।"

"नहीं।" उसने रूमाल मोड़ा। "मैंने कुछ नहीं किया। मैंने किसी को नहीं मारा। मैंने कुछ नहीं तोड़ा। मैंने तेरे पीछे जो लोग थे, उन्हें बस उनसे वो सवाल पूछने दिया जो वो खुद से डरकर नहीं पूछ रहे थे। बाकी सब खुद हुआ।"

"आपने किशनलाल काका को डराया।"

"किशनलाल?" वो मुस्कुराया। "मैंने उनसे कहा था कि उनका गला मत दबाओ, उनका काग़ज़ दबाओ। उन्होंने काग़ज़ दबाया। इसलिए ज़िंदा हैं।"

मेरा हाथ मुट्ठी में बंद हो गया।

"आपने मेरे दोस्तों को डराया।"

"मैंने किसी को नहीं डराया।" उसने कहा। "मैंने बस सही जगह, सही बात, सही वक़्त पर छोड़ी। डर तो लोग खुद पालते हैं। मैं तो उन्हें सिर्फ़ वो दिखाता हूँ जो वो देखना नहीं चाहते।"

मैंने उसकी आँखों में देखा।

"आपको क्या मिलेगा इससे?" मैंने कहा। "एक छोटी गली। एक छोटी दुकान। एक साइकिल मरम्मत करने वाला लड़का। आपके पास करोड़ों हैं, आप इस गली के पीछे क्यों पड़े हैं?"

वो कुछ देर चुप रहा। फिर उसने कहा, "क्योंकि यह गली करोड़ों से नहीं मिलती।"

मैं चुप रहा।

"तेरे पास एक चीज़ है जो मेरे पास नहीं है।" उसने कहा। "और वो कोई जादू नहीं है। वो लोगों का भरोसा है। तुझे देखकर लोग सीधे हो जाते हैं, अंदर से। मेरे पास कोई सीधा नहीं होता। सब झुकते हैं। कोई सीधा नहीं होता।"

"तो आपने कभी सीधे होने की कोशिश नहीं की।"

"कोशिश में क्या रखा है?" उसने कहा। "मैं तेरी जगह होता, तो सीधा रहता। पर मैं अपनी जगह हूँ। और अपनी जगह रहने के लिए मुझे तेरी जगह चाहिए।"

वो रुका। फिर उसने खिड़की और ऊपर उठाई। उसकी आवाज़ धीमी हो गई, जैसे कोई आख़िरी बात कहता हो जो सुनने वाले के सीने में रह जाए।

"कल से इस गली में तेरा नहीं, मेरा नाम होगा।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"यह बात आप कल भी कह चुके हैं।" मैंने कहा।

"आज नहीं कह रहा।" उसने कहा। "आज मैं बता रहा हूँ — कैसे।"

वो मुस्कुराया।

"तेरी घंटी कल बोलेगी।" उसने कहा। "पर तेरी नहीं, मेरी बात कहेगी। और जब वो मेरी बात कहेगी, तो पूरी गली सुनेगी। और फिर तेरा नाम… अपने आप मिट जाएगा। तुझे मिटाना नहीं पड़ेगा।"

मेरा दिल ज़ोर से धड़का।

"आप घंटी को क्या करेंगे?"

"कुछ नहीं।" उसने कहा। "मैं तो बस उसकी सबसे पुरानी आवाज़ बजवाऊँगा। वो आवाज़ जो उसने मुझसे ली थी।"

खिड़की उठी। काँच चढ़ा। इंजन चला। गाड़ी चली गई।

मैं सड़क पर अकेला खड़ा रह गया।

मेरे हाथ में कुछ नहीं था। घंटी अंदर मेज़ पर पड़ी थी।

मैं अंदर गया। घंटी उठाई। उसे छूकर देखा — ठंडी। पर अब जैसे उसमें एक और चीज़ थी, जो ठंडक से भी ज़्यादा ठंडी थी।

मैंने उसे जेब में रखा।

फिर मैंने अपनी कॉपी निकाली, और उस रात मैंने पहली बार कुछ ऐसा लिखा जो मैंने कभी नहीं लिखा था।

"आज रणवीर ने कहा कि कल से इस गली में उसका नाम होगा। और मेरा नहीं। मैंने सोचा — नाम कोयले से लिखा जाता है, बोर्ड पर लिखा जाता है, काग़ज़ पर लिखा जाता है। वो सब मिट जाता है।"

फिर मैंने नीचे लिखा —

"पर एक नाम होता है जो किसी काग़ज़ में नहीं होता। वो नाम उस वक़्त बनता है जब कोई औरत अपने बेटे को भूखा नहीं सोने देती। जब कोई बूढ़ा अपनी बेटी का काग़ज़ नहीं जलाता। जब कोई दर्ज़ी अपनी मशीन का परदा नहीं उठाता, पर उसे बेचता भी नहीं। वो नाम उन कामों में रहता है। और उन कामों को कोई गाड़ी, कोई काग़ज़, कोई अंगूठा — कोई नहीं मिटा सकता।"

मैंने कॉपी बंद की।

फिर मैं चारपाई पर लेट गया।

छत से पुराना पंखा लटक रहा था, जो चल नहीं रहा था। उसकी ब्लेड पर मकड़ी का जाला था।

मैंने आँखें बंद कीं।

और सोने से पहले मेरे सीने में एक आवाज़ उठी — घंटी से नहीं। मेरे ही अंदर से।

वो आवाज़ किसी और की थी। पर वो मेरी थी। जैसे कोई पुरानी आवाज़ अंदर से जवाब दे रही हो, जो मैंने सालों पहले खोई थी।

वो कह रही थी — "तेरा नाम किसी ने मिटाया नहीं है, बेटा। तेरा नाम बस कुछ दिनों के लिए नींद में है। नींद से उठने के लिए उसे कोई चीज़ नहीं चाहिए। बस तेरा हाथ चाहिए। और तेरा हाथ अभी भी तेरा है।"

मैं मुस्कुराया।

और सो गया।

सुबह जागूँगा तो पहले उस्ताद के साथ डॉक्टर इसरानी के रिकॉर्ड कमरे में जाना है। उस काग़ज़ को बचाना है जो आज किसी और के हाथ में जाने वाला है। और अगर वहाँ से एक नाम खुले, तो…

फिर भी। एक बात तो तय है।

रणवीर कहता है कि कल से इस गली में उसका नाम होगा। पर उसे यह नहीं पता — इस गली में नाम उस वक़्त लिया जाता है जब कोई औरत किसी की बेटी को अपनी बेटी कह दे। जब कोई बूढ़ा अपनी बाल्टी किसी और को दे दे, नल पर लड़े नहीं।

और वो काम अभी बाकी है।

वो गली में अभी भी ज़िंदा है।

बस उसे जगाने वाला कोई चाहिए।

मैं वो कोई बनूँगा।

नाम से नहीं। हाथ से।

॥

सुबह छह बजे मेरी आँख खुली, और सबसे पहले मैंने घंटी देखी।

वो मेज़ पर पड़ी थी, जहाँ रात को मैंने रखी थी। पर उसके चारों तरफ़ धूल में एक गोल घेरा बना हुआ था — जैसे कोई रात में उसे उठाकर देखकर वापस रख गया हो।

मैंने उसे उठाया। ठंडी। पहले भी ठंडी थी, पर आज उसकी ठंडक में एक अलग तरह की बात थी। जैसे वो किसी से बोलने से पहले मुँह बंद करके बैठी हो।

"तू बोल क्यों नहीं रही?" मैंने धीरे से कहा।

कोई जवाब नहीं।

"अरे, मैं तुझसे पूछ रहा हूँ।"

फिर भी कुछ नहीं।

मैंने उसे जेब में रखा और मुँह धोने चला गया। पानी ठंडा था। आईने में अपना चेहरा देखा — आँखों के नीचे कालापन, बाल बेतरतीब, गले में वही पुरानी चाबी। मैंने अपने आप से कहा — आज रिकॉर्ड कमरा खोलना है। आज वो काग़ज़ बचाना है जो किसी और के हाथ में जाने वाला है।

पर जब मैं अस्पताल पहुँचा, तो सूरज अभी पूरा नहीं निकला था और उस्ताद अली बक्श पहले से गेट पर खड़े थे।

"आ गए?" उन्होंने कहा।

"आप इतनी सुबह?"

"नींद नहीं आई।" उन्होंने अपना चश्मा ठीक किया। "जब पचास साल की मशीन धागा तोड़ने लगे, तो आदमी को सब कुछ टूटता दिखता है।"

हम अंदर गए। डॉक्टर इसरानी अपने कमरे के बाहर खड़े थे, हाथ में एक चाबी थी, और उनका चेहरा ऐसा था जैसे रात भर वो सोए ही नहीं।

"चाबी?" मैंने पूछा।

"यही है।" उन्होंने कहा। "और यही नहीं है।"

"मतलब?"

"मतलब यह कि रिकॉर्ड कमरे का जो नया ताला कल शाम लगा था, उसकी चाबी अब मेरे पास नहीं है। समिति वालों ने रात में फ़ैसला कर दिया — काग़ज़ साहब के दफ़्तार से आएँगे, तो चाबी भी साहब के दफ़्तार जाएगी। सुबह सात बजे कोई आदमी आकर ले गया।"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"कब ले गया?" मैंने पूछा।

"करीब आधा घंटा पहले। काला थैला था, सफ़ेद कुर्ता था, और मुँह पर कोई भाव नहीं था।"

मैं दौड़कर ऊपर गया। रिकॉर्ड कमरे के बाहर बूढ़ा सफ़ेद टोपी वाला आदमी अपनी चारपाई पर बैठा था, जो चालीस साल से वहीं बैठता है।

"काका, अंदर कौन गया?"

"मैंने किसी को जाते नहीं देखा।" उसने कहा, और उसकी आँखें ज़मीन पर थीं।

"काका, आप यहीं बैठे थे।"

"बेटा, मैं चालीस साल से यहाँ बैठा हूँ।" उसने धीरे से कहा। "इस दौरान मैंने बहुत कुछ देखा है और बहुत कुछ नहीं देखा है। आज वाला दूसरा है।"

मैं कमरे में गया। रैक खाली थे। धूल में चौकोर साफ़ जगहें बनी हुई थीं — जहाँ कल तक फाइलें रखी थीं। फ़र्श पर जले काग़ज़ की गंध अब भी बाकी थी, हल्की, जैसे किसी ने जल्दी में कुछ जलाया हो और बुझा दिया हो।

उस्ताद दरवाज़े पर खड़े थे। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस अपनी लाठी ज़मीन पर टिका दी।

"देर हो गई।" मैंने कहा।

"नहीं।" उन्होंने कहा। "देर तब होती है जब हाथ खाली रह जाए। हाथ में अभी भी एक चीज़ है — गली।"

मैं कमरे से बाहर आया। सीढ़ियों से नीचे उतरते वक़्त मुझे लगा कि अस्पताल भी आज खाली है। कल तक यहाँ मरीज़ों की भीड़ थी, बच्चों की आवाज़ थी, बूढ़ी औरतें बेंच पर बैठी मिलती थीं। आज सिर्फ़ सन्नाटा था। एक बूढ़ी मरीज़ बेंच पर बैठी थी, वो भी अपनी पुरानी परची को हाथ में लेकर ऐसे देख रही थी जैसे उस पर लिखा हुआ नाम ही उसका आख़िरी सहारा हो।

मैं बाहर निकला, और तभी समझ आया — आज गली सिर्फ़ चुप नहीं है। आज गली बदल रही है।

मोड़ पर खड़ी दो औरतें मुझे देखकर चुप हो गईं। एक ने दूसरी की कोहनी दबाई। मैं आगे बढ़ा तो सुना —

"वही है ना? जो काला जादू करता है?"

"हाँ, वो ही। मेरी बहन कह रही थी, जो उसके पास जाता है, उसका घर टूट जाता है।"

"भगवान बचाए।"

मैं रुका। मुड़ा।

"आंटी," मैंने कहा, "मैं काला जादू नहीं करता। मैं साइकिल ठीक करता हूँ। पंचर, चेन, ब्रेक — यही मेरा काम है।"

वो दोनों चुप हो गईं। एक ने मुँह फेर लिया। दूसरी ने कहा —

"बेटा, हमें कुछ नहीं पता। हम तो बस सुनकर कह रहे हैं।"

"किससे सुना?"

"अरे, गली में सब कह रहे हैं। स्कूल में भी कहा गया है। कल सुबह की सभा में कहा गया है कि बच्चों को उस दुकान से दूर रखो।"

पेट में कुछ ठंडा सा उतरा।

मैं सीधा स्कूल गया। गेट पर रामलाल बाबा झाड़ू लगा रहे थे। मुझे देखा तो रुक गए।

"रामलाल बाबा, स्कूल में क्या कहा गया कल?"

"बेटा…"

"साफ़ बोलिए।"

उन्होंने झाड़ू टिका दी।

"बच्चों के अभिभावकों की सभा थी। किसी ने कहा कि उस दुकान पर जाने वाले बच्चों के घर में बीमारी आती है, दिमाग़ खराब होता है। दो-तीन अम्माओं ने कह दिया कि हमारा बच्चा वहाँ नहीं जाएगा।"

"और स्कूल ने?"

"स्कूल ने कुछ नहीं कहा।" उन्होंने धीरे से कहा। "स्कूल चुप रहा। और बेटा, चुप रहना भी एक बात कहना होता है।"

मैं वहीं खड़ा रह गया।

तभी सानिया दिखी। स्कूल की वर्दी में, बैग कंधे पर। उसने मुझे देखा, और उसकी आँखें एक पल को रुकीं — फिर झुक गईं। वो दीवार की तरफ़ होकर निकल गई, जैसे मैं कोई खंभा हूँ।

"सानिया।"

वो रुकी, पर मुड़ी नहीं।

"तुम्हारे अब्बा ने कहा है?"

उसने सिर हिलाया। हल्का सा। हाँ में।

"तुम्हें मेरी दुकान पर नहीं आना है?"

वो कुछ नहीं बोली। बस बैग की पट्टा कसकर पकड़ लिया।

"ठीक है।" मैंने कहा। "पढ़ाई मत छोड़ना। और हाँ — तुम्हारी लाल कवर कॉपी में जो ट्रकों की लिस्ट है, वो किसी को मत देना। वो तुम्हारी है।"

वो चली गई। पर जाते वक़्त उसके कंधे हिल रहे थे।

मैं दुकान की तरफ़ मुड़ा। शबनम आपा की गुमटी से चाय की भाप नहीं उठ रही थी — बस चूल्हा जल रहा था, और वो बेंच पर बैठी थीं, हाथ में लोहे की चिमटी पकड़े, सामने देख रही थीं।

"आपा।"

"आ गया?" उन्होंने सिर उठाया।

"चाय नहीं बनी?"

"बनाई थी। तीन कप। कोई नहीं आया।" उन्होंने चिमटी मेज़ पर रखी। "सुबह से दो आदमी आए। दोनों ने नोटिस देखा, बैठे, फिर चले गए। एक ने कहा — शबनम, तू भी इस लड़के के चक्कर में बर्बाद हो जाएगी।"

"आपने क्या कहा?"

"मैंने कहा — मेरी बर्बादी मेरी चाय में है। जो पीना हो पिए, जो नहीं पीना हो, उसके लिए दरवाज़ा खुला है।" उन्होंने कहा, और फिर धीरे से। "पर बेटा, दरवाज़ा खुला रखना आसान है। उसमें से कोई आए, यह मुश्किल है।"

रज़िया पीछे से आई, बाल बाँधते हुए। उसने मुझे देखा, और उसकी आँख में गुस्सा था।

"तू रोज़ आता है।" उसने कहा। "और रोज़ गली में एक नई बात। मेरी बहन तेरे पीछे खड़ी है, इसीलिए आज उसकी गुमटी पर नोटिस लगा है।"

"बहन, चुप।" शबनम आपा ने कहा।

"मैं चुप नहीं रहूँगी।" रज़िया ने कहा। "पंद्रह साल बाद मैं लौटी हूँ, और मुझे यहाँ भी वही मिला — कोई लड़ता है, कोई भागता है, कोई चुप हो जाता है।"

मैं कुछ नहीं बोला। बोलता तो और बिगड़ता। मैंने सिर्फ़ इतना कहा —

"आपा, चूल्हा जलता रहे।"

"जलेगा।" उन्होंने कहा। "जिस दिन हाथ चिमटी उठाना भूल जाए, उस दिन बंद होगा।"

आगे बढ़ा तो उस्ताद की दुकान दिखी। शटर आधा गिरा था। वहीं खड़े भोला भाई हाथ में काग़ज़ लिए खड़े थे — वही सफ़ेद, बिना मुहर वाला।

"क्या है भोला भाई?"

"दो दिन।" उन्होंने कहा। "दो दिन में दुकान खाली करो, वरना ताला। नाम नहीं, मुहर नहीं, तारीख़ नहीं। बस काग़ज़।"

"उस्ताद ने देखा?"

"देखा। और उन्होंने कहा — मैं अपनी दुकान का ताला खुद लगाऊँगा, कोई और नहीं।" भोला भाई ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "पर बेटा, यह काग़ज़ ऐसे ही नहीं आया। कल शाम को सफ़ेद कुर्ते वाला यहाँ खड़ा था और उसने उस्ताद को गली के नाम पर चेताया था।"

मैंने काग़ज़ लिया, मोड़ा, जेब में रखा। मुझे पता था इसमें कोई मुहर नहीं है, कोई तारीख़ नहीं है। इसे किसी भी अदालत में कोई नहीं मानेगा। पर गली में यह काग़ज़ काम करता है। गली में डर काग़ज़ माँगता है, मुहर नहीं।

मैंने उस्ताद को खोजा। वो दुकान के पीछे वाले कमरे में बैठे थे, मशीन पर कपड़ा ढका हुआ था, और उनके सामने चाय का कप ठंडा पड़ा था।

"उस्ताद।"

"बैठ।"

मैं बैठ गया।

"रिकॉर्ड कमरा?" उन्होंने पूछा।

"खाली था।"

उन्होंने आँखें बंद कीं। फिर खोलीं।

"अच्छा हुआ।"

"अच्छा?"

"हाँ।" उन्होंने कहा। "अब हमें पता है कि वो काग़ज़ अब भी ज़िंदा है। अगर उसने जला दिया होता, तो हमें पता भी नहीं चलता। जो चीज़ उसने छिपाई है, वो उसके डर की गवाह है।"

"उस्ताद, आपकी दुकान का काग़ज़…"

"वो काग़ज़ मैंने दीवार पर टँगा रहने दिया है।" उन्होंने कहा। "क्योंकि जब गली उसे देखेगी, तो उसे याद रहेगा कि हम पर क्या गुज़री। और जिस दिन गली उसे उतारेगी, उस दिन मेरी दुकान खुद खुलेगी। मुझे ताले की चाबी नहीं चाहिए।"

मैंने चाय उठाई। ठंडी थी। फिर भी पी गया।

दोपहर में नल पर झगड़ा हुआ।

मैं दुकान पर बैठा था, एक पुरानी चेन साफ़ कर रहा था, तभी बाहर आवाज़ उठी। मैं दौड़कर गया।

सानिया के अब्बा और गुड्डू के पापा आमने-सामने खड़े थे। बीच में पानी की बाल्टी पड़ी थी, आधी उलटी, और गड्ढे में पानी फैल रहा था।

"मैंने पहले भरी थी!" सानिया के अब्बा चिल्लाए।

"तो क्या हुआ?" गुड्डू के पापा ने कहा। "पानी सबका है। नल सरकारी है।"

"सरकारी है, तो तेरे बाप का नहीं है।"

"और तेरे बाप का भी नहीं है।"

मैं बीच में आया।

"भाइयों, बात सिर्फ़ बाल्टी की है। मैं दो मिनट में पूरा नल चेक कर देता हूँ, फिर दोनों भर लेना।"

दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।

और फिर, जैसे किसी ने साथ में आवाज़ निकाली हो, दोनों मेरी तरफ़ मुड़ गए।

"तू चुप रह।" सानिया के अब्बा ने कहा।

"तेरी वजह से यह सब है।" गुड्डू के पापा ने कहा।

"मेरी वजह से?"

"हाँ।" सानिया के अब्बा ने कहा। "तेरे आने से पहले गली में सब ठीक था। तू आया, और रिश्ते टूटने लगे। कल मेरी बेटी को बुखार आया। कल से मेरी बीवी कह रही है कि तेरी दुकान के पास से बच्चों को गुज़ारना मत।"

"अंकल, मैंने किसी को कुछ नहीं किया।"

"तूने कुछ नहीं किया, इसीलिए तो डर है।" उन्होंने कहा। "जो आदमी कुछ नहीं करके सब ठीक कर देता है, वो कुछ करके सब बिगाड़ भी सकता है।"

मैं चुप हो गया।

क्योंकि उनकी बात में एक चीज़ सच थी। मैं सच में लोगों के रिश्ते जोड़ता था। और जो जोड़ता है, उसके हाथ में एक ताक़त होती है। और डर हमेशा ताक़त से ही पैदा होता है, काग़ज़ से नहीं।

मैंने बाल्टी उठाई। दोनों को एक-एक बार पानी भरकर दिया। दोनों ने लिया, और बिना एक शब्द कहे चले गए।

पर उनका चले जाना जीत नहीं थी। वो चुप्पी थी।

शाम चार बजे पुलिस आई।

दो खाकी जीपें चौक पर रुकीं। दरोगा उतरे, साथ में दो सिपाही। पीपल के नीचे जो मैंने मेज़ और बोर्ड चबूतरी के किनारे रखा था, वहाँ पहुँचे।

"यह क्या है?" दरोगा ने पूछा।

"जोड़ केंद्र।" मीरा ने कहा, जो वहीं आ गई थी, कैमरा हाथ में।

"क्या?"

"जगह जहाँ लोग अपनी टूटी चीज़ें लाते हैं।"

"मैंने तीन दिन की रोक दी थी, मैडम।" दरोगा ने कहा। "और यह सभा है। बिना अनुमति।"

"यह सभा नहीं है।" मैंने कहा। "यह मेज़ है।"

"तो मेज़ भी नहीं रहेगी।" उन्होंने कहा। "उठाओ सब।"

सिपाहियों ने मेज़ उठाई। बोर्ड उठाया। मैंने कुछ नहीं कहा। दुबे अंकल थाने के बाहर अपनी कुर्सी पर बैठे थे, और उनकी आँखों में वो चुप इशारा था — अभी मत बोल।

दरोगा मेरे पास आए।

"अंकुश, मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूँ।" उन्होंने धीरे से कहा। "मैं काग़ज़ का आदमी हूँ। मुझे जो काग़ज़ मिलता है, मैं वही करता हूँ।"

"तो काग़ज़ किसने दिया?"

वो मुस्कुराए। बस एक बार मुस्कुराए, और चले गए।

मेज़ चली गई। बोर्ड चला गया। पीपल के नीचे सिर्फ़ पत्थर की चबूतरी बची, और उस पर धूल।

और फिर गली में वो सन्नाटा छाया, जो मैंने पहले कभी नहीं सुना था।

आपको पता है, सन्नाटा कई तरह का होता है। रात का सन्नाटा अलग होता है — उसमें नींद होती है, चादर की सरसराहट होती है, किसी के खाँसने की आवाज़ होती है। पर यह सन्नाटा अलग था। इसमें कुछ नहीं था। शाम पाँच बजे, जब गली में बच्चों की आवाज़ आनी चाहिए थी, क्रिकेट की बैट की आवाज़ आनी चाहिए थी, किसी के डाँटने की आवाज़ आनी चाहिए थी — कुछ नहीं था।

मैं चबूतरी पर बैठ गया।

मैंने घंटी निकाली।

और बजाई।

टन।

बस टन। धातु की आवाज़। कोई शब्द नहीं। कोई फुसफुसाहट नहीं।

मैंने फिर बजाई।

टन।

"अरे," मैंने कहा, "बोल ना।"

टन।

"देख, मैं जानता हूँ तू नाराज़ है। मैं तुझे कल पटका था। मुझे माफ़ कर दे। पर अब बोल।"

टन।

"अरे, एक शब्द। एक ही शब्द।"

टन।

मेरा गला सूखने लगा। मैंने और ज़ोर से बजाया। हाथ दर्द करने लगा। घंटी गरम नहीं हो रही थी — ठंडी थी, बर्फ़ जैसी, और मेरी हथेली पर ठंडक ऐसे चिपक रही थी जैसे कोई पकड़ ले।

तभी पीछे से आवाज़ आई।

"बार-बार मत बजाओ।"

डॉक्टर इसरानी थे। हाथ में स्टील का डिब्बा, जिसमें चाय थी।

"बैठो।" उन्होंने कहा।

मैं बैठ गया। उन्होंने चाय मेरी तरफ़ बढ़ाई।

"नहीं पीनी?"

"गला सूखा है।"

"तो पियो। सूखा गला चुप्पी से नहीं भरता।"

मैंने पी ली।

वो चबूतरी पर मेरे पास बैठे। उनकी उम्र साठ के पार है, पर बैठते वक़्त वो कमर थोड़ी सीधी करते हैं, जैसे अंदर से कुछ कस रहे हों।

"अंकुश, तुम क्या सोच रहे हो?"

"कि मेरी घंटी टूट गई।"

"नहीं।" उन्होंने कहा। "तुम्हारी घंटी टूटी नहीं है। वो बस चुप है।"

"फ़र्क़ क्या है?"

"बहुत बड़ा फ़र्क़ है।" उन्होंने कहा। "टूटी चीज़ फिर जुड़ सकती है, पर उसके लिए हिस्से चाहिए। चुप चीज़ को कुछ नहीं चाहिए — बस आवाज़ चाहिए।"

"तो आवाज़ कहाँ गई?"

उन्होंने गली की तरफ़ देखा।

"तुम्हें पता है यह घंटी चलती कैसे है?"

"जब मैं बजाता हूँ।"

"नहीं।" उन्होंने कहा। "तुम सिर्फ़ हाथ लगाते हो। घंटी गली से चलती है। जब कोई औरत किसी की बेटी को अपनी बेटी कह दे, तब चलती है। जब कोई बूढ़ा अपनी बाल्टी किसी और को दे दे, तब चलती है। जब कोई दर्ज़ी अपनी मशीन का परदा न उठाए पर उसे बेचे भी नहीं, तब चलती है। आज गली में कोई किसी को कुछ नहीं दे रहा। इसीलिए घंटी चुप है।"

"तो यह मेरी गलती नहीं है।"

"नहीं।" उन्होंने कहा। "पर इसका इलाज तुम्हारे हाथ में है।"

"कैसे?"

"जब लोग डरते हैं, तो वो अपनी आवाज़ अंदर कर लेते हैं। तुम्हें उनकी आवाज़ बाहर निकालनी है। सभा से नहीं। काग़ज़ से नहीं। छोटी-छोटी बातों से। किसी के हाथ में पानी का गिलास थमा दो। किसी की साइकिल का पंचर मुफ़्त कर दो। किसी बच्चे को उसका नाम याद दिला दो।"

"डॉक्टर साहब, यह सब बहुत धीमा है। और रणवीर तेज़ है।"

"हाँ।" उन्होंने कहा। "वो तेज़ है क्योंकि वो तोड़ता है। तोड़ना तेज़ काम है। जोड़ना धीमा काम है। पर धीमा काम वो होता है जो टिकता है।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"आपको क्यों लगता है कि मैं यह सब कर पाऊँगा?"

वो एक पल चुप रहे।

"क्योंकि तुमने आज भी दुकान खोली।" उन्होंने कहा। "जब कोई नहीं आया, तब भी तुमने शटर उठाया। कोयले से अपना नाम लिखा। चाय बनाई। यही जोड़ना है, अंकुश। और कुछ नहीं।"

वो उठे।

"कल सुबह मैं तुम्हें एक चीज़ दिखाऊँगा। मेरे पास एक पुराना रजिस्टर है, जिसमें एक नाम कटा हुआ है। मैंने उसे अब तक नहीं खोला, क्योंकि मुझे डर था। अब खोलूँगा।"

"क्यों अब?"

"क्योंकि अब मेरे पास एक और डर है।" उन्होंने कहा। "यह डर कि अगर मैंने नहीं खोला, तो कोई और खोलेगा।"

वो चले गए।

मैं अकेला बैठा रहा।

घंटी मेरी हथेली में थी, ठंडी। मैंने उसे जेब में रखा।

रात आठ बजे मैंने दुकान बंद की, पर शटर पूरा नहीं गिराया। आधा खुला छोड़ा। मुझे लगा शायद कोई आए। शायद कोई फोन करे। शायद मीरा आए, या भोला भाई, या कोई बच्चा।

कोई नहीं आया।

मैं अंदर चारपाई पर लेटा। छत का पंखा वैसे ही लटका था, जैसे कल रात था। मकड़ी का जाला थोड़ा और बड़ा हो गया था।

और तभी बाहर गाड़ी रुकी।

मैंने आवाज़ पहचानी। वो बड़ी, भारी गाड़ी थी। उसका इंजन बाकी गाड़ियों से अलग आवाज़ करता था — थोड़ा गहरा, थोड़ा शांत, जैसे कोई बड़ा आदमी खाँस रहा हो।

मैं उठा। शटर उठाया।

सफ़ेद गाड़ी सामने खड़ी थी। पीछे की खिड़की आधी उतरी, और उसमें से एक चेहरा दिखा। हल्की धूल उसके जूतों पर थी, कुर्ता सफ़ेद, और उँगली पर कुछ काला नहीं था — काली अंगूठी नहीं थी, पर उसकी जगह एक पतला चमकता धागा बँधा था।

"अंकुश।"

"साहब।"

"मैं कहने आया हूँ कि कल से इस गली में तेरा नाम नहीं, मेरा नाम होगा।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"तुझे पता है, मैं कैसे करूँगा?"

"आप बताइए।"

"मैं कुछ नहीं करूँगा।" उसने कहा। "कल सुबह से गली में जो होगा, वो अपने आप होगा। एक अम्मा दूसरी अम्मा से नहीं बोलेगी। एक दुकानदार दूसरे दुकानदार के सामने चाय नहीं पिएगा। स्कूल का गेट उस तरफ़ से बंद हो जाएगा। तेरे पास कोई नहीं आएगा। और जब कोई नहीं आएगा, तो तेरा नाम खुद मिट जाएगा।"

"आपको लगता है कि नाम लोगों के आने से बनता है?"

"हाँ।" उसने कहा। "नाम भीड़ से बनता है। और भीड़ मैं तोड़ सकता हूँ।"

"नहीं।" मैंने कहा। "नाम भीड़ से नहीं बनता। नाम उस वक़्त बनता है जब कोई अकेला आदमी किसी अकेली औरत के हाथ में पानी का गिलास रख दे, और कोई न देखे।"

वो हँसा। छोटी, ठंडी हँसी।

"यह बातें तेरी गली में अच्छी लगती हैं।" उसने कहा। "पर बाहर दुनिया में काग़ज़ चलता है।"

"तो आप काग़ज़ लाइए।"

"मैं लाऊँगा।" उसने कहा। "और वो काग़ज़ जो तुझे सबसे ज़्यादा चुभेगा — वो तेरी ही घंटी का होगा।"

खिड़की ऊपर उठी। काँच चढ़ा। गाड़ी चली गई।

धूल उठी और फिर बैठ गई।

मैं सड़क पर खड़ा रहा। मेरे हाथ में घंटी थी।

मैंने उसे देखा। फिर धीरे से बजाया।

टन।

बस टन।

मैंने उसे उठाकर कान के पास लाया। कुछ सुनाई नहीं दिया।

और तभी, बहुत धीमे, बहुत दूर से, जैसे किसी और गली से, किसी और शहर से, किसी और साल से — आवाज़ आई।

"अंकुश।"

मेरा दिल ज़ोर से धड़का।

"हाँ?"

"गली सो रही है। उसे उठाना पड़ेगा। और उठाने का तरीक़ा तेरे पास है।"

"क्या है?"

"याद रख।" आवाज़ ने कहा। "जिस दिन गली में कोई अकेला आदमी किसी अजनबी को अपने घर की चाय पिला देगा, उस दिन मैं लौट आऊँगी।"

और फिर चुप्पी।

मैंने घंटी को जेब में रखा। मैंने शटर गिराया।

और मैंने अपनी कॉपी में आज की तारीख़ के नीचे एक लाइन लिखी —

"आज गली में कोई नहीं आया। पर आज मैं समझ गया कि घंटी किसकी है। वो मेरी नहीं है। वो गली की है। और अभी गली सो रही है।"

फिर नीचे लिखा —

"कल सुबह मैं अपनी दुकान का शटर उठाऊँगा। और उस पर एक काग़ज़ चिपकाऊँगा, जिस पर लिखा होगा — आज भी टूटी चीज़ लाओ।"

फिर नीचे —

"क्योंकि टूटी चीज़ें आती रहेंगी, तभी गली जागेगी।"

मैंने कॉपी बंद की, बत्ती बुझाई, और लेट गया।

और सोने से पहले मुझे एक बात साफ़ हो गई — रणवीर काग़ज़ से लड़ रहा है। और मैं टूटी चीज़ों से लड़ूँगा। काग़ज़ सूखता है, फटता है, जलता है। पर टूटी चीज़ जब जुड़ती है, उसकी आवाज़ आती है।

और आवाज़ को कोई काग़ज़ नहीं रोक सकता।

॥

सुबह छह बजे मैंने शटर उठाया। बाहर की हवा में अभी रात का ठंडापन बचा था। गली साफ़ दिख रही थी, जैसे किसी ने रात में झाड़ू लगा दी हो। पीपल के नीचे कुछ नहीं था। न मेज़, न कुर्सी, न बोर्ड। सिर्फ़ पत्थर की चबूतरी, और उस पर सूखी पत्तियाँ।

मैंने जेब से एक काग़ज़ निकाला। रात में काजल ने उस पर बड़े अक्षरों में लिख दिया था — आज भी टूटी चीज़ लाओ।

मैंने उसे शटर पर चिपकाया। और फिर दुकान के पीछे वाले कमरे से केतली लाया। चाय बनाई। दो कप। एक अपना, एक सामने रख दिया, किसी के आने के इंतज़ार में।

चाय ठंडी हो गई।

कोई नहीं आया।

सात बजे गली की औरतें नल पर पानी भरने आईं। तीन औरतें थीं। उनमें से एक ने मेरी तरफ़ देखा, फिर झट से नज़र फेर ली और धीरे से दूसरी से कहा — "वो खड़ा है।"

"कौन?"

"कौन और? वही। जिसके पास जाने से…" आवाज़ धीमी हो गई।

मैंने सुना। मैंने अनसुना कर दिया। मैं दुकान के बाहर रखी साइकिल की चेन में तेल डालने लगा।

आठ बजे तक मैंने पाँच साइकिलें साफ़ कर दीं जिनमें से एक भी टूटी नहीं थी।

तभी काजल आई। हाथ में दवा की पुड़िया, सिर पर दुपट्टा, आँखों में वो नींद जो रात भर की जाग से बची थी।

"चाय रखी है?"

"हाँ। ठंडी हो गई।"

"फिर बना।" वो बैठ गई। "भाई, सुन।"

"सुन रहा हूँ।"

"सुबह मैं अस्पताल जा रही थी। रास्ते में मुझे तीन औरतें मिलीं। तीनों ने मुझे देखकर सिर नीचा कर लिया। एक ने तो दुपट्टा ही मुँह पर खींच लिया।"

"क्यों?"

काजल ने मेरी तरफ़ देखा।

"क्योंकि मैं तेरी बहन हूँ।"

मेरे हाथ रुक गए।

"किसने कहा?"

"किसी ने कहा नहीं। बस… बात चल रही है। कहते हैं तेरे पास जो भी आता है, उसका घर टूट जाता है। तेरे हाथ में काला जादू है। तू घंटी बजाकर लोगों का नसीब खींच लेता है।"

मैं हँसा। पर हँसी मेरे गले में ही अटक गई।

"काला जादू?" मैंने कहा। "मेरे पास तो बस एक पेचकस है, काजल। और एक रिंच।"

"हँस मत।" उसने कहा। "सुबह सात बजे सानिया की अम्मी ने अपनी बेटी को स्कूल भेजते वक़्त कहा — रास्ते में उस दुकान की तरफ़ मत देखना।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"सानिया की अम्मी ने?"

"हाँ। और सानिया ने सिर्फ़ सिर हिलाया। कुछ नहीं बोली।"

मैंने साइकिल का तेल वाला कप बंद किया और दीवार से टिक गया।

सोचो ज़रा — कल तक यही सानिया मेरी दुकान पर आकर बैठती थी। मेरे औज़ार उलट-पुलट करती थी। कहती थी, अंकुश भैया, तुम्हारी दुकान में सबसे अच्छी गंध आती है। ग्रीस और चाय की।

आज उसने सिर हिलाया। कुछ नहीं बोली।

नौ बजे मैं शबनम आपा की गुमटी पर गया। वहाँ बाहर वाली बेंच खाली थी। कटोरी उलटी पड़ी थी। चूल्हे पर केतली चढ़ी थी, पर भाप धीमी थी, जैसे आग भी थक गई हो।

शबनम आपा चिमटी से समोसे उठा रही थीं। पास में रज़िया बैठी थी, हाथ में कोई पुराना कपड़ा लिए।

"आपा।"

"आ।" उन्होंने बिना देखे कहा।

"चाय।"

"चूल्हा जल रहा है। बना लूँ?"

"बना दो।"

वो मुड़ीं। मेरी तरफ़ देखा। और फिर वो काम जो वो हमेशा करती थीं — अपनी तेज़ ज़ुबान से सब कुछ सीधा कर देना — उस बार नहीं हुआ।

"बैठ।" उन्होंने कहा। "दो मिनट।"

मैं बैठा।

तभी गली के मोड़ से एक औरत आई। हरी साड़ी, हाथ में थैला। वो गुमटी तक आई, फिर मेरी तरफ़ देखा, फिर रुक गई। दो पल सोचा। फिर मुड़कर चली गई।

शबनम आपा ने चिमटी पटक दी।

"यह क्या है?"

"कुछ नहीं।"

"कुछ नहीं नहीं।" उन्होंने कहा। "वो मेरी बारह साल की ग्राहक है। रोज़ एक कटोरी चाय, एक समोसा, और दो बातें। आज वो बिना बात किए लौट गई।"

मैं चुप रहा।

"रज़िया।" शबनम आपा ने कहा। "तू बता। आज सुबह से कितने ग्राहक आए?"

रज़िया ने कपड़ा मोड़ा।

"तीन।" उसने कहा। "और तीनों ने पूछा कि काग़ज़ कब हटेगा।"

"चाय नहीं पूछी?"

"एक ने पूछी। फिर बोली — रहने दो, मैं नल पर भर लूँगी।"

शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा।

"सुन रहा है? मेरी गुमटी का बोर्ड ज़मीन पर है क्या? मेरे चूल्हे ने बारह साल में एक दिन नहीं छोड़ा। आज तीन ग्राहक आए।"

"आपा, काग़ज़ हटा दो।" मैंने धीरे से कहा।

"नहीं।" उन्होंने कहा।

"आपा—"

"नहीं, अंकुश।" उन्होंने केतली उठाई और कप में चाय डाली। "वो काग़ज़ मेरा नहीं है। वो काग़ज़ मेरे शटर पर बाहर से चिपका है। जिसने चिपकाया, वो आकर उतारेगा। मैं अपने शटर पर किसी का काग़ज़ नहीं छूऊँगी।"

फिर उन्होंने कप मेरे सामने रखा।

"पी। टूटी चीज़ें आएँगी तो मैं इन्हीं हाथों से उनका हिसाब लिखूँगी।"

मैंने चाय पी।

रज़िया ने अचानक कहा — "और कल?"

"कल क्या?"

"कल भी तीन ग्राहक आएँगे तो तुझे पता है न, भाई? तेरे कारण।"

अंकुश ने उसकी तरफ़ देखा।

"रज़िया।" शबनम आपा ने कहा।

"क्या है?" रज़िया उठ खड़ी हुई। "मैं झूठ बोल रही हूँ? पंद्रह साल बाद मैं लौटी हूँ। पंद्रह साल। और एक हफ़्ते में गुमटी पर काग़ज़ आ गया। तू कहेगी कि यह सब उस सफ़ेद कुर्ते वाले का काम है। पर मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। काग़ज़ पर नाम मेरे बहनोई का क्यों नहीं आया? क्यों सिर्फ़ हमारा?"

मैं कुछ कहने ही वाला था कि शबनम आपा ने हाथ उठाया।

"बस।" उन्होंने कहा। "दोनों चुप।"

और फिर वो धीमे से बोलीं, जैसे अपने आप से — "गुमटी मेरी है। और गुमटी का चूल्हा मैं बंद नहीं करूँगी। चाहे एक कप चाय बिके, चाहे एक भी नहीं।"

ग्यारह बजे मैं उस्ताद अली बक्श की दुकान के सामने खड़ा था।

उनकी दुकान का शटर आधा उठा था। अंदर अंधेरा था। सिलाई मशीन ढकी हुई थी — सफ़ेद कपड़े से, जिसके कोने में उन्होंने बड़ी करीने से गाँठ लगाई थी।

उस्ताद बाहर पत्थर की चौकी पर बैठे थे। हाथ में एक टूटी सुई थी, और वो उसे उलट-पलट कर देख रहे थे।

"उस्ताद।"

"आ।"

"दुकान कब तक?"

"बंद नहीं होगी।" उन्होंने कहा। "कपड़ा ढका है, कपड़ा उतरेगा। शटर आधा है, पूरा उठेगा।"

"काग़ज़?"

"काग़ज़ वहीं है।" उन्होंने दुकान की तरफ़ आँख से इशारा किया। "शटर पर। मैंने उतारा नहीं।"

"उस्ताद, दो दिन की बात है। कल दूसरा दिन है।"

"तो?"

"तो काग़ज़ उतारो। पहले तुम इसे उतार सकते हो। फिर लोग सोचेंगे—"

"लोग क्या सोचेंगे?" उन्होंने सुई नीचे रखी। "यही सोचेंगे कि अली बक्श डर गया। और डर एक बार आ जाए, तो फिर आदमी अपनी दुकान नहीं, अपना नाम भी उतार देता है।"

मैं चुप बैठ गया।

उस्ताद ने सुई की नोक देखी।

"यह सुई मेरी माँ की थी।" उन्होंने कहा। "टूटी है। पर टाँका लगाती है। पता है कैसे?"

"कैसे?"

"सिर्फ़ पहली सिलाई अच्छी करती है। उसके बाद टेढ़ी हो जाती है। पर टाँका लगता रहता है।" उन्होंने सुई अपनी जेब में रखी। "बस तुझे एक बात समझनी है। घंटी तेरी नहीं, गली की है। और गली जब सो जाए, घंटी सो जाती है। गली को सुलाने वाला कोई बाहर का नहीं, कोई अंदर का है।"

"मतलब?"

"मतलब — जिस दिन तू बोलेगा कि मैं अकेला सब ठीक करूँगा, उस दिन घंटी फिर चुप हो जाएगी।"

दोपहर बारह बजे स्कूल के गेट पर अभिभावकों की छोटी-सी भीड़ दिखी। मैं आगे नहीं गया। मैं दूर, पेड़ के पीछे खड़ा रहा।

तीन माँएँ, चार पिता, और स्कूल का एक मास्टर, जो एक हाथ में कॉपी लिए धीरे-धीरे बोल रहा था। मैं सिर्फ़ टुकड़े सुन पाया।

"…जो दुकान वाला है, उसके पास न जाएँ…"

"…बच्चों को रोक दिया है…"

"…उसकी घंटी है, हमें क्या पता उसमें क्या है…"

फिर गुड्डू के पापा बोले, ऊँची आवाज़ में —

"मैं साफ़ कहता हूँ। मेरा लड़का उसकी दुकान की तरफ़ से गुज़रेगा नहीं।"

और सानिया के अब्बा ने सिर हिलाया। "मेरी बेटी भी नहीं।"

मैं वहीं से लौट आया। रास्ते में मुझे अपनी ही दुकान का बोर्ड टेढ़ा दिखा। दो साल से टेढ़ा है। मैंने कभी सीधा करने की ज़हमत नहीं की।

आज उसे देखकर लगा कि वो मेरी तरफ़ भी टेढ़ा मुँह बना रहा है।

ढाई बजे नल पर झगड़ा हुआ।

मैं दुकान के पीछे किसी पुराने रिम को सीधा कर रहा था, तभी बाहर आवाज़ें उठीं।

"मैं पहले आया था!"

"तू पहले आया था तो बाल्टी पहले पानी से क्यों नहीं भरी गई?"

"रख दो बाल्टी नीचे!"

"तू रख!"

मैं दौड़कर गया। नल पर सानिया के अब्बा खड़े थे, एक हाथ में लोहे की बाल्टी, दूसरे हाथ में रस्सी। सामने गुड्डू के पापा, दोनों हाथ जेब में, गर्दन आगे।

पानी लगातार बह रहा था। बाल्टी एक तरफ़ पड़ी थी, और पानी उसके बाहर गिरकर मिट्टी में सोख रहा था।

"अब्बा—" सानिया पीछे खड़ी थी, डरकर।

"तू घर जा।" उसके अब्बा ने कहा।

"अब्बा, बाल्टी…"

"मैंने कहा, घर जा।"

मैं आगे आया।

"भाई साहब—"

दोनों ने एक साथ मेरी तरफ़ देखा।

"तू?" सानिया के अब्बा ने कहा।

"बाल्टी रखो। पानी भर लो। झगड़ा बाद में।"

"कौन हो तू?" गुड्डू के पापा ने कहा। "तू क्या है — गली का मुखिया?"

"मैं कुछ नहीं हूँ। बस रोज़ इसी नल पर हाथ धोता हूँ।"

"तो हाथ धो।" सानिया के अब्बा ने कहा। "और हमारे बीच मत आ।"

"पर बात तो—"

"बात नहीं।" उन्होंने कहा। और फिर उनकी आवाज़ ऊँची हुई। "सुन। तू अपनी दुकान में बैठ। तूने जो चीज़ें शुरू की हैं, उनका हिसाब तेरे पास है। मेरी बेटी रात भर बुखार में तड़पी और सुबह मुझे कोई कहता आया — इसका कारण उसकी घंटी है। अब तू छोटे-छोटे झगड़े सुलझाकर अपना नाम साफ़ मत करने चल।"

"वो घंटी—"

"वो घंटी तेरे पास से हटाई जानी चाहिए।" गुड्डू के पापा ने कहा।

मैं रुक गया।

"क्या कहा?"

"तूने सुना।" उन्होंने कहा। "एक बात बाहर से आई है, अंकुश। सब वही कह रहे हैं। तेरे पास जो जाता है, उसका घर टूटता है। तेरा अपना घर देख — तेरी माँ बेड पर है। तेरे पीछे पड़े हो हो, तू किसी और का घर जोड़ेगा?"

मैं वहीं खड़ा रहा।

बाल्टी पानी से भर गई और बहने लगी। सानिया के अब्बा ने उसे उठाया और चले गए।

गुड्डू के पापा ने मेरी तरफ़ देखा और कुछ कहने के बाद भी नहीं कहा। वो चले गए।

नल बहता रहा।

पानी मिट्टी में सोख गया और सिर्फ़ गीला दाग बचा। मैं वहीं खड़ा रहा। मुझे याद आया कि इसी गली में, कुछ हफ़्ते पहले, दो भाइयों ने मेरी दुकान पर बैठकर हाथ मिलाया था। मैंने मुझे याद दिलाया — वो सच था। पर इस वक़्त वो सच किसी और गली का सच लग रहा था।

शाम चार बजे पुलिस आई।

एक के बाद एक, दो खाकी जीपें। ब्रेक की चीख़। दरवाज़े खुलने की आवाज़। और फिर चौकी से पीपल तक की एक सीधी लकीर — दरोगा साहब उसमें सबसे आगे।

वो सीधे पीपल के नीचे पहुँचे और उस खाली चबूतरी को देखने लगे, जहाँ से उन्होंने खुद कल मेज़-कुर्सी हटवाई थी।

फिर वो मेरी तरफ़ मुड़े।

"अंकुश यादव।"

"जी।"

"यहाँ कुछ रखा है?"

"नहीं।"

"किसी ने कुछ रखने की बात कही?"

"नहीं।"

"अच्छा।" उन्होंने घड़ी देखी। "कल शाम से इस जगह पर किसी भी तरह की सभा, बैठक, मेला, चाय-पानी — सब पर रोक है। तीन दिन। यह पीपल अब सार्वजनिक जगह नहीं रही। इसे जो ज़मीन मिली है, उसका काग़ज़ नगरपालिका के पास है और उस पर यहाँ की कोई सभा दर्ज नहीं है।"

"साहब, हम यहाँ कुछ—"

"बहुत हो गया।" उन्होंने कहा। "तुम लोगों ने इस जगह को अड्डा बना रखा है। नाम रख दिया — जोड़ केंद्र। किसका जोड़? किसने सरकार से इजाज़त ली?"

"किसी ने पैसा नहीं लिया।"

"पैसे से मतलब नहीं।" उन्होंने कहा। "काग़ज़ से मतलब है। और काग़ज़ में जो नहीं है, वो अवैध है।"

मैंने सिपाही की तरफ़ देखा। वो चुप थे। उनके हाथ पीछे बँधे थे।

"एक बात." दरोगा ने कहा। "तुम्हारी दुकान का काग़ज़ भी अधूरा है। लाइसेंस, रजिस्ट्री, हिसाब। मैं जानता हूँ। मैंने पढ़ा है।"

"साहब—"

"मैं आज कोई कार्रवाई नहीं कर रहा।" उन्होंने कहा। "पर कल से जो सफ़ेद कुर्ते वाले आएँ, उनसे मुझे पूछना पड़ेगा कि तुमने पूछा था कि नहीं।"

वो मुड़ गए।

"साहब।" मैंने कहा।

वो रुके।

"एक बात पूछूँ?"

"पूछो।"

"कल आप ही ने मेज़ हटवाई। आप ही ने सभा पर रोक लगाई। और आज आप कह रहे हैं कि यह जगह सार्वजनिक नहीं। जब मैंने आपको कुछ नहीं दिया था, तब भी आप यही कह रहे थे?"

दरोगा ने मेरी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर कुछ भी नहीं था। न गुस्सा, न नरमी।

"अंकुश।" उन्होंने कहा। "मेरी नौकरी में एक ही नियम है — जो ऊपर से आता है, वो काग़ज़ पर आता है। और मैं उस काग़ज़ को नहीं पूछ सकता कि यह सच है या नहीं। मैं सिर्फ़ पूछ सकता हूँ — मुहर है या नहीं।" उन्होंने सिपाही की तरफ़ देखा। "चलो।"

वो चले गए।

जीपें उलटी मुड़ीं और गली के मुँह से बाहर निकल गईं। धूल बैठ गई।

मैं पीपल के नीचे खड़ा रहा।

चबूतरी खाली थी। उस पर एक सूखा हुआ पीपल का पत्ता पड़ा था। मैंने उसे उठाया, फिर उसे वहीं रख दिया।

छह बजे गली में बच्चों की आवाज़ नहीं आई।

यह सबसे डरावनी बात थी।

सोचो। हमारी गली में शाम छह बजे क्या होता है? चिंटू किसी की साइकिल की हवा निकालता दौड़ रहा होता है। गुड्डू और रफ़ीक़ पीपल के नीचे पत्थर से क्रिकेट खेलते हैं। सानिया ऊपर छत से आवाज़ देती है कि मेरी गिल्ली नहीं गिरी। कहीं से रेडियो बजता है। कहीं से तवे की आवाज़। कहीं से हँसी।

आज कुछ नहीं।

सिर्फ़ नल की टपक। सिर्फ़ किसी दरवाज़े का बंद होना। सिर्फ़ कुत्ते की एक लंबी साँस।

मैं दुकान के बाहर स्टूल पर बैठा रहा। सामने गली। शटर पर मेरा काग़ज़ — आज भी टूटी चीज़ लाओ। कोई नहीं आया। कोई नहीं आया।

मैं उठा। कमरे से घंटी लाया। वो ठंडी थी, पर ठंडी तो कल से ही थी।

मैंने बजाया।

टन।

मैंने इंतज़ार किया। कोई आवाज़ नहीं।

मैंने फिर बजाया। ज़ोर से।

टन।

फिर फिर।

टन। टन। टन।

कुछ नहीं।

मैंने घंटी कान के पास की। मैंने उसे हिलाया। मैंने उसे हथेली में रगड़ा। मैंने उसे एक बार माथे से लगाया — जैसे बच्चे बुखार में करते हैं।

"बोल।" मैंने कहा।

चुप।

"अरे, बोल न।"

चुप।

मेरी आवाज़ धीमी हुई।

"तू कल बोली थी। तूने कहा था कि गली सो रही है, उसे उठाना पड़ेगा। तूने कहा था — जिस दिन कोई अकेला आदमी किसी अजनबी को अपने घर की चाय पिलाएगा, तू लौट आएगी। मैंने काग़ज़ चिपका दिया। मैंने चाय बनाई। मैंने दो कप रखे। कोई नहीं आया। तो अब तू बोल।"

कुछ नहीं।

मैंने घंटी स्टूल पर रख दी और अपना चेहरा हाथों में छिपा लिया।

और तभी मुझे एक बात समझ आई — यह घंटी मेरी जेब में है। यह मेरे पास है। पर यह मेरी नहीं है। यह उस गली की है जो आज चुप है। और चुप गली में घंटी भी चुप।

मैं स्टूल पर बैठा रहा। धीरे-धीरे अंधेरा गहरा हो गया। कहीं कोई बत्ती नहीं जली। मैंने सोचा — क्या सारी गली मर गई है? क्या सारे लोग चले गए?

नहीं। लोग थे। दरवाज़ों के पीछे थे। बत्तियाँ जल रही थीं, पर परदों के पीछे। खिड़कियाँ खुल रही थीं, पर सिर्फ़ आधी। कोई बाहर नहीं झाँक रहा था।

सात बजे मेरे पीछे किसी के पैरों की आवाज़ आई। मैंने पलटकर देखा।

डॉक्टर निहाल इसरानी थे। हाथ में स्टील का छोटा डिब्बा। चश्मा नाक पर। कंधे थोड़े झुके।

"चाय?" उन्होंने डिब्बा मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"मैंने बनाई थी। ठंडी हो गई।"

"तो यह गरम है। पी।"

मैंने पी। गरम थी। गले से नीचे उतरी तो लगा कि कुछ ज़िंदा है अभी भी।

डॉक्टर साहब मेरे पास बैठ गए। कुछ देर चुप रहे। फिर बोले —

"बजाई?"

"बजाई।"

"कुछ नहीं?"

"कुछ नहीं।"

वो सिर हिलाया।

"अंकुश, मैं चालीस साल से इस गली में हूँ। मैंने यह घंटी नहीं देखी। पर मैंने इस गली को कई बार देखा है। एक बार यह गली चुप हुई थी — जब अस्पताल में दो लोग मरे थे और किसी ने किसी से बात नहीं की थी। दूसरी बार जब नल का झगड़ा साल भर चला। तीसरी बार जब बिजली घर बंद हुआ।"

"और घंटी?"

"मैं घंटी की बात नहीं कर रहा।" उन्होंने कहा। "मैं तेरी बात कर रहा हूँ। तू यह समझ रहा है कि घंटी चुप हो गई। सच यह है कि गली चुप हो गई, इसलिए घंटी चुप है। घंटी कोई जादू का डिब्बा नहीं है। यह गली की ज़ुबान है। और ज़ुबान वही बोलती है जो लोग बोलते हैं।"

"तो मैं क्या करूँ?"

"तू घंटी से जवाब माँगना बंद कर।" उन्होंने कहा। "और लोगों से माँग।"

"कौन सुन रहा है?"

"आज कोई नहीं।" उन्होंने कहा। "कल कोई होगा। पर एक बात याद रख — जब गली चुप हो, तब सबसे पहले वो औरत बोलती है जो सबसे ज़्यादा डरती है। आज वो डर रही है। इंतज़ार कर।"

वो उठे।

"और अंकुश।"

"जी।"

"कल सुबह उस्ताद के साथ मेरे पास आ। मेरा पुराना रजिस्टर है। उसमें एक नाम कटा हुआ है। मैंने उसे चालीस साल से नहीं खोला। अब खोलूँगा।"

वो चले गए। मैंने उन्हें जाते देखा। फिर डिब्बे में बची आधी चाय पी।

आठ बजे मैं घर गया।

माँ बैठी थीं, पलंग पर, पीठ में तकिया। आँखें आधी बंद। हाथ में कोई कपड़ा, जिसे वो बार-बार मोड़ रही थीं।

"माँ।"

"आ गया?"

"हाँ।"

"सुबह कुछ खाया?"

"खाया।"

वो मेरी तरफ़ देखने लगीं। और मैंने झूठ बोला कि खाया, वो जानती थीं कि झूठ है। पर वो कुछ नहीं बोलीं।

काजल रसोई में थी। उसने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से कहा —

"आज कितने बजे तक?"

"कुछ नहीं आया।"

वो चूल्हे के पास रुक गई।

"अंकुश।"

"हाँ।"

"क्या हम… क्या हम उस्ताद से कहें कि दुकान दो दिन के लिए बंद कर दें? सिर्फ़ दो दिन। बात ठंडी हो जाएगी। फिर—"

"नहीं।"

वो चुप हो गई।

मैं उसके पास गया।

"देख काजल। जिस शटर पर कोयले से लिखा है — आज भी टूटी चीज़ लाओ — वो शटर नहीं गिरेगा। तू समझ रही है? अगर मैं गिरा दूँ तो वो काग़ज़ सही हो जाता है। और मैं उसे सही नहीं होने दूँगा।"

काजल ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें भरी हुई थीं। पर उसने रोना शुरू नहीं किया।

"ठीक है।" उसने कहा। "पर आज रात खाना खाएगा। माँ ने कहा है।"

"खाऊँगा।"

"झूठ मत बोल।"

"नहीं बोला।"

रात नौ बजे मैं दुकान के बाहर खड़ा था।

गली में बत्तियाँ जल रही थीं। दरवाज़े बंद। कहीं से रेडियो की आवाज़ भी नहीं। कुत्ते भी नहीं भौंके। मालूम नहीं क्यों, मैंने पीपल के नीचे जाकर उस चबूतरी पर हाथ रख दिया। उस पत्थर पर भी ठंडक थी।

मैं वापस मुड़ा और तभी वो आई।

सफ़ेद गाड़ी।

कोई तेज़ आवाज़ नहीं। बस हवा में एक चमक बढ़ी और गाड़ी आकर मेरी दुकान के सामने रुकी। इंजन बंद हुआ। सड़क जैसे अपनी साँस रोक ले।

पीछे की खिड़की उतरी।

अंदर से वही चेहरा दिखा। हल्की रोशनी में उसके चेहरे की लकीरें और गहरी लग रही थीं। उसके जूते आज भी चमक रहे थे। उसकी उँगली पर वो काली अंगूठी वापस आ गई थी।

"अंकुश।"

"साहब।"

"बैठ जा।" उन्होंने अपने पास वाली सीट की तरफ़ इशारा किया।

"मैं खड़ा ठीक हूँ।"

"जैसी तेरी मर्ज़ी।" उन्होंने कहा। "मैंने तुझे कुछ कहने से पहले कुछ करते देखा है। गली खाली है?"

मैंने कोई जवाब नहीं दिया।

"खाली है।" उन्होंने खुद कहा। "मुझे पता है। आज तेरी दुकान पर एक आदमी नहीं आया। शबनम के पास तीन लोग आए। उस्ताद ने कपड़ा उतार दिया है। तुझे खबर भी नहीं होगी — शाम को स्कूल की सभा में मेरा एक आदमी बैठा था। उसने बच्चों के नाम लिखे।"

"बच्चों के नाम?"

"हाँ।" उन्होंने कहा। "जिन बच्चों के माँ-बाप ने कहा कि वो तेरी दुकान के पास नहीं जाएँगे, उनके नाम मेरे पास हैं। और जिन्होंने नहीं कहा, उनके भी।"

"आपको इन नामों से क्या मतलब?"

"तुझे आज समझ आया?" उन्होंने कहा। "अब मैं सीधा आया हूँ। मैं तेरी घंटी नहीं माँगने आया। मैं तेरी दुकान नहीं माँगने आया। मैं तुझे एक बात बताने आया हूँ।"

वो थोड़ा आगे झुके। उनकी आवाज़ धीमी हुई, बहुत धीमी, जैसे कोई आदमी अपने आप से बोल रहा हो।

"धन रणवीर भारद्वाज। तेरे और मेरे बीच फ़र्क़ यह नहीं है कि मैं बुरा हूँ और तू अच्छा है। फ़र्क़ यह है कि तू चीज़ें जोड़ता है और मैं चीज़ें तोड़ता हूँ। और तेरी बड़ी भूल यह है कि तू जोड़ता है लोगों को, पर उन्हें जोड़कर तू मुझसे लड़ रहा है। लोग जब जुड़ते हैं तो मुझमें ताक़त आती है, अंकुश। तूने कभी सोचा? तूने जिन दो भाइयों को जोड़ा, उनके जुड़ने की आधी आवाज़ मेरी जेब में गिरी। तूने जिन दो बुज़ुर्गों को जोड़ा, वही हुआ। तू मुझे ताक़त दे रहा है। और आज तेरी गली चुप है। इसका मतलब है कि तेरी घंटी अंदर से खोखली हो गई। यही सच है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरी आँखें नहीं झुकीं।

"तो आप मुझे क्यों बता रहे हैं?"

"क्योंकि मुझे तुझ पर तरस आता है।" उन्होंने कहा। और फिर उन्होंने धीरे से मुस्कुरा दिया। "और तेरे लिए एक ही रास्ता बचा है। जो मैं तुझे दे सकता हूँ।"

"क्या?"

"तेरी माँ का इलाज।" उन्होंने कहा। "बिना काग़ज़, बिना अंगूठा। तेरे नाम पर नहीं — तेरी माँ के नाम पर। दस दिन की दवा तेरे पास है। मैं उसे महीने में बदल सकता हूँ। अस्पताल का कोई काग़ज़ तुझसे नहीं माँगूँगा। तेरी दुकान का काग़ज़ भी साफ़ कर दूँगा। तेरी गली का नक़्शा नहीं बदलेगा। तू बस एक बात कह — मैं अपनी गली का हिस्सा नहीं हूँ, मैं अंकुश यादव भर हूँ।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"आपने मेरी माँ का नाम लिया।"

"लिया।"

"बुरा किया।" मैंने कहा। "क्योंकि आपने उनका नाम किसी सौदे में लिया है। और मेरी माँ का नाम किसी सौदे में नहीं जाता।"

वो मुस्कुराए। फिर उनका मुँह गंभीर हो गया।

"अच्छा।" उन्होंने कहा। "फिर सुन। कल से इस गली में तेरा नाम नहीं, मेरा नाम होगा। और यह बात मैं दोहराने नहीं आऊँगा।"

खिड़की ऊपर जाने लगी।

"साहब।" मैंने कहा।

वो रुके।

"आपने कहा कि आप काग़ज़ से खेलते हैं। ठीक है। पर मैं आपको एक बात बता दूँ। मेरी गली चुप है, यह सच है। पर चुप गली एक चीज़ करती है, जो शोर वाली गली नहीं करती। वो सुनती है। और लोग जब चुप में सुनते हैं, तब उन्हें सबसे हल्की आवाज़ भी सुनाई दे जाती है।"

खिड़की ऊपर चली गई। काँच बंद हुआ।

गाड़ी चली।

मैं वहीं खड़ा रहा। मेरी जेब में घंटी थी। ठंडी। चुप।

मैंने उसे निकाला। हथेली पर रखा। उस पर चाँद की रोशनी पड़ी। पीतल में मेरा चेहरा दिखा, ऊपर उलटा।

मैंने घंटी से धीरे से कहा —

"सुन। कल अगर कोई नहीं आया, तो भी मैं शटर उठाऊँगा। कल अगर तू चुप रही, तो भी मैं तुझे जेब में रखूँगा। और कल अगर इस गली में मेरा नाम नहीं होगा, तो भी मैं उस गली का लड़का रहूँगा।"

घंटी ने कुछ नहीं कहा।

पर मुझे लगा, जैसे उस पीतल के भीतर कहीं बहुत दूर, बहुत धीमे, किसी ने साँस ली।

मैंने शटर गिराया। उस पर कोयले से लिखा नाम देखा — वो अभी भी वहाँ था। किसी ने नहीं पोंछा।

और मैंने अपनी कॉपी में, आज की तारीख़ के नीचे लिखा —

"आज गली ने मुझसे बात नहीं की। और घंटी ने भी नहीं। पर जब रणवीर की गाड़ी गई, तब मुझे एक बात समझ आई — वो डरता है। डरता है इस बात से कि चुप गली कभी अचानक बोल पड़ेगी।"

नीचे लिखा —

"कल सुबह डॉक्टर इसरानी का रजिस्टर खुलेगा। उसमें एक कटा हुआ नाम है। और मुझे वही नाम चाहिए।"

फिर नीचे —

"कल मैं सबसे पहले उसी आदमी के पास जाऊँगा जो सबसे ज़्यादा डरता है।"

कॉपी बंद की, बत्ती बुझाई और लेट गया।

॥

सुबह मैंने शटर उठाया तो गली में धूल उठी, पर आवाज़ नहीं उठी।

यही सबसे अजीब बात थी। धूल तो उठी — शटर के नीचे से, पहियों की तरह — पर उसके साथ कोई नहीं उठा। न कोई नमस्ते, न कोई "भैया एक मिनट", न कोई साइकिल की घंटी। सिर्फ़ धूल उठी, हवा में घूमी, और वापस बैठ गई।

मैंने शटर पूरा ऊपर किया। ऊपर काजल का वो काग़ज़ अभी भी चिपका था — "आज भी टूटी चीज़ लो"।

आज भी टूटी चीज़ लो।

मैंने उसे देखा और सोचा — आज किसी ने नहीं लिया। आज मैं ख़ुद टूटा खड़ा हूँ और कोई लेने नहीं आया।

मैंने दुकान के बाहर वाली चौकी खींची, बैठा। पीपल की तरफ़ देखा। चबूतरी खाली थी। दरोगा ने कल जो मेज़, कुर्सी, टूलबॉक्स हटवाया था, उसकी जगह पर सिर्फ़ धूल में चौकोर निशान बचा था। जैसे किसी ने वहाँ से कोई चीज़ उठाई हो और ज़मीन याद रखे हुए हो।

मैंने चारों तरफ़ देखा। सामने उस्ताद की दुकान। शटर आधा उठा। मशीन सफ़ेद कपड़े से ढकी। उस्ताद बैठे थे, मोटा चश्मा, कान पर पेंसिल, हाथ में कुछ नहीं। बस हाथ। खाली हाथ। और उनका हाथ उस कपड़े की तरफ़ रखा था, जैसे कोई बच्चा सो रहा हो और वो उसे जगाना नहीं चाहते।

मैंने हाथ उठाया। उन्होंने सिर हिलाया। बस।

आधे घंटे बाद किशनलाल काका आए। अपनी दुकान से, पीछे की गली से, टेढ़ी चाल से। हाथ में चने का लोटा। वो आए, मेरी चौकी के पास खड़े हुए, और कुछ नहीं बोले। बस चने खाते रहे।

मैंने कहा, "काका, बोलिए ना।"

वो चबाते रहे। फिर बोले, "क्या बोलूँ, बेटा। सुबह से तीन आदमी आए थे मेरी दुकान पर। तीनों ने यही पूछा — काका, तुम्हारा काग़ज़ अभी बोरी के नीचे है ना?"

मेरा हाथ रुक गया।

"क्यों?"

"क्योंकि गली में बात चल रही है कि जो तेरे पास आया, उसका घर टूटता है। और जो तेरे पास नहीं आया, वो भी डर रहा है कि कहीं देर से न हो जाए।"

उन्होंने लोटा नीचे रखा। मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें उनके मोटे चश्मे के पीछे छोटी लगीं।

"अंकुश, मैं बूढ़ा हूँ। मैं नहीं जानता ये काला जादू क्या है। पर मैं इतना जानता हूँ — तू जो करता है, वो काला नहीं है। जो काला होता है, वो छिपकर किया जाता है। तू सबके सामने करता है।"

"तो फिर ये बात फैली कैसे?"

"क्योंकि जो बात सबसे ज़ोर से बोली जाती है, वही सच लगती है। और आज सुबह से तीन जगह यही बात बोली जा रही है — स्कूल के गेट पर, नल पर, और चाय की गुमटी पर। तीनों जगह एक ही आदमी की आवाज़ में।"

मैंने पूछा, "कौन?"

"सफ़ेद कुर्ते वाले। दो। सुबह सात बजे आए, अपना पानी का बोतल लाए, चाय पी, और जाते-जाते कह गए — अंकुश भाई के पास जाने से पहले सोच लेना। उनके जोड़ से घर नहीं जुड़ता, घर टूटता है। जोड़ नहीं होता, जाल होता है।"

मैंने मुँह बंद कर लिया।

किशनलाल काका ने मुझे देखा। फिर बोले, "और एक बात। स्कूल के गेट पर बच्चों के नाम लिखे जा रहे हैं। जो बच्चा तेरी दुकान के पास से नहीं गुज़रेगा, उसका नाम अलग सूची में। जो गुज़रेगा —"

वो रुक गए।

"क्या?"

"उसका नाम नहीं लिखा जाएगा।"

मैं उठा। मेरी चौकी पीछे हटी और धूल में लकीर बन गई।

"कौन लिख रहा है?"

"कोई सफ़ेद कुर्ता, हाथ में कॉपी। नाम नहीं पूछा मैंने। पर जो बच्चे नहीं आ रहे, उनकी माँएँ ख़ुद जाकर नाम लिखवा रही हैं।"

मैं वहीं खड़ा रहा। सूरज सिर पर चढ़ रहा था और मुझे ठंड लग रही थी।

मैंने कहा, "काका, आपका काग़ज़ कल सबके सामने खुलेगा।"

वो हँसे। बूढ़ी हँसी, जिसमें दाँत कम थे और सच ज़्यादा था।

"बेटा, अगर कल तक सबके सामने कोई आया। आज गली में सन्नाटा है। कल सन्नाटा और गहरा होगा। फिर तू अकेला बोलेगा और तेरी आवाज़ लौटकर तुझे ही सुनाई देगी।"

वो चले गए। चने का लोटा भूल गए मेरी चौकी पर। मैंने उठाया। उसमें चार चने बचे थे। मैंने एक खाया।

नमक नहीं था। फीका था। पर खाया।

फिर मैं चला।

स्कूल का गेट दोपहर में सबसे ज़्यादा भरा होता है — छुट्टी के वक़्त। मैं वहाँ पहुँचा तो देखा — गेट पर भीड़ थी, पर किसी के हाथ में स्कूल बैग नहीं था। बच्चे गेट के अंदर से बाहर झाँक रहे थे और उनकी माँएँ बाहर खड़ी थीं, आधी माँएँ गेट के अंदर बच्चों को पकड़े हुए थीं, जैसे कह रही हों — देखा? वो आ गया। अंदर रहो।

सानिया की अम्मी सबसे आगे थीं। सानिया उनकी साड़ी के पल्लू में हाथ डाले खड़ी थी।

मैंने दूर से हाथ उठाया। सानिया ने देखा। उसकी आँखें एक पल मेरी तरफ़ आईं, फिर अम्मी के हाथ की तरफ़ चली गईं और वहीं रह गईं।

सानिया की अम्मी ने मुझे देखा। फिर सबको देखा। फिर ज़ोर से बोलीं, "जिसके बच्चे को पढ़ाना है, वो मेरे साथ। जिसे जादूगर के पास भेजना है, वो उस तरफ़ से जाए।"

कुछ औरतें हँसीं।

कुछ नहीं हँसीं।

फिर गुड्डू की अम्मी बोलीं, "मैंने तो कल ही से गुड्डू का रास्ता बदल दिया है। अब वो दूसरी तरफ़ से जाता है।"

मैं वहीं खड़ा रहा। मैंने कुछ नहीं कहा। मुझे किसी से कुछ कहना भी नहीं था। मैं सिर्फ़ यह देखना चाहता था — कौन मेरी तरफ़ देखता है और कौन आँख फेरता है।

पूरा गेट आँखें फेर रहा था। सिर्फ़ एक — पीछे की दीवार से सटी एक औरत — सुनीता दीदी, जो स्कूल में बर्तन धोती हैं — उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। फिर जल्दी से नज़र नीचे कर ली। पर देखा था। मैंने देखा कि उन्होंने देखा था।

मैं वहाँ से चला।

गुमटी पर पहुँचा तो शबनम आपा चूल्हे के सामने बैठी थीं। चिमटी हाथ में थी, पर वो चिमटी से नहीं, बस हाथ से ही कड़ाही को हिला रही थीं। तेल में समोसे पड़े थे और वो देख रही थीं, जैसे देखने के लिए कुछ और नहीं बचा।

"आपा।"

"आ गया।"

"कितने आए?"

"आज?" उन्होंने चिमटी मेज़ पर रखी। "दो। एक ने चाय पी और कह गया कि काग़ज़ हटा दो। दूसरे ने चाय नहीं पी, सिर्फ़ पूछ गया कि रोज़ कितना नुक़सान हो रहा है।"

"और रज़िया?"

"अंदर है। गुस्से में है। कल से बोल नहीं रही मुझसे।"

मैंने पीछे देखा। गुमटी के पीछे वाले कमरे का परदा हिला, फिर रुक गया। रज़िया अंदर थी, सुन रही थी।

"आपा, वो काग़ज़ नहीं उतारा आपने?"

"नहीं।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैंने नहीं चिपकाया।" उन्होंने कहा। "जिसने चिपकाया है, वो आकर उतारेगा। अगर मैं ख़ुद उतारूँगी, तो सब कहेंगे — देखो, शबनम भी डर गई। और एक बात, मैं चूल्हा नहीं बुझाऊँगी। ये चूल्हा मेरे बाप ने जलाया था। इसे एक काग़ज़ नहीं बुझा सकता।"

फिर चुपचाप बोलीं, "अंकुश, उस्ताद की दुकान पर आज कुछ हुआ।"

मेरा पेट कस गया।

"क्या?"

"शाम को कोई दो आदमी आए थे। सफ़ेद कुर्ता। साथ में एक और — मोटा, हाथ में फ़ाइल। उन्होंने उस्ताद से कहा — आपकी दुकान का काग़ज़ असली नहीं, आपका लाइसेंस पुराना है, और आपकी दुकान की ज़मीन के काग़ज़ में गड़बड़ है। दो दिन में दुकान खाली कर दें, वरना कल से ताला लगेगा।"

मेरा हाथ मेज़ पर कस गया।

"उस्ताद ने क्या कहा?"

"उस्ताद ने कुछ नहीं कहा।" शबनम आपा ने कहा। "उन्होंने सिर्फ़ अपनी मशीन पर हाथ रखा और बोले — ताले की चाबी बनाने वाले से पूछ लेना, क्या ताला भी चाबी के बिना लगेगा।"

मैंने आँखें बंद कीं।

"और फिर?"

"फिर वो दोनों चले गए। और उस्ताद ने अपनी मशीन पर वो सफ़ेद कपड़ा ओढ़ दिया।"

मैं बाहर निकला। गुमटी के बाहर खड़ा हुआ। गली देखी।

गली खाली थी। पर खाली नहीं भी थी। हर दरवाज़े के पीछे कोई था — परदे के पीछे, खिड़की की जाली के पीछे, दीवार के पीछे। आज गली बंद थी। पूरी गली बंद।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी।

शाम चार बजे डॉक्टर इसरानी का फोन आया। मेरे फोन की घंटी बजी — पुराने रेडियो जैसी धुन — और उनकी आवाज़ आई, "अंकुश, आज कोई मरीज़ नहीं आया। पूरे दिन एक भी नहीं। अस्पताल के बाहर वाले बोर्ड पर किसी ने सफ़ेद पाउडर से लिख दिया — यहाँ आने से पहले सोच लें।"

मैंने कहा, "डॉक्टर साहब, आप मुझे बताने के लिए फोन कर रहे हैं?"

वो हँसे। बूढ़ी हँसी, थकी हुई।

"मैं तुझे यह बताने के लिए फोन कर रहा हूँ कि तू अकेला नहीं है। मैं भी उसी सूची में हूँ। गुमटी भी। उस्ताद भी। इसका मतलब — हमें एक-दूसरे से बात करनी है।"

मैंने कहा, "कल सुबह रजिस्टर।"

"कल सुबह रजिस्टर।" उन्होंने दोहराया। "पर आज शाम तुम नल पर जाना। मुझे पता है वहाँ कुछ होने वाला है।"

"कैसे पता?"

"क्योंकि जब गली सूखती है, तो पहला झगड़ा पानी पर होता है।"

वो फोन काट गया।

मैं शाम पाँच बजे नल पर पहुँचा। मैं पहले से जानता था कि मुझे वहाँ नहीं जाना चाहिए था। पर मैं गया। क्योंकि मैं यह भी जानता था कि अगर मैं नहीं जाऊँगा, तो कोई और बीच में पड़ेगा, और वो किसी और पर लगेगा।

नल पर भीड़ थी। दस-बारह लोग। दो बाल्टियाँ ज़मीन पर रखी थीं, दोनों भरी हुईं। एक बाल्टी के ऊपर हाथ — सानिया के अब्बा का। दूसरी के ऊपर हाथ — गुड्डू के पापा का।

और बीच में एक नई ईंट तिरछी रखी थी, जिससे नल का पानी गली की तरफ़ फैल रहा था।

"ये ईंट किसने रखी?" सानिया के अब्बा चिल्ला रहे थे।

"मैंने रखी।" गुड्डू के पापा बोले। "पानी गड्ढे में जाता है, मेरी बाल्टी में नहीं आता।"

"तो ईंट रखकर पूरी गली कीचड़ कर दोगे?"

"मैंने तुम्हारे हिस्से का पानी नहीं छीना। मैंने बस ईंट रखी।"

"ईंट रखने से पहले पूछ लेते।"

"किससे? तुमसे? तुम हो कौन?"

और फिर वो दोनों भिड़ गए।

शब्द नहीं — हाथ। गुड्डू के पापा ने सानिया के अब्बा का कंधा धक्का दिया, और सानिया के अब्बा का हाथ बाल्टी से छूट गया और बाल्टी गिर पड़ी। पानी फैल गया, ईंट के ऊपर, दोनों के पैरों पर, धूल में।

और मैं बीच में आ गया।

"रुकिए।" मैंने कहा। मैंने दोनों के बीच हाथ डाले। "रुकिए। एक बाल्टी के लिए?"

दोनों रुके। दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।

और फिर — दोनों की आँखों में वो चीज़ आई जो मुझे पता थी। मैंने उसे पहले भी देखा था — तीन दिन पहले, कल, परसों। वो नफ़रत नहीं थी। वो थकान थी। और जो थकान में इंसान करता है, वो नफ़रत में भी नहीं करता।

सानिया के अब्बा ने कहा, "तू हट।"

गुड्डू के पापा ने कहा, "तू यहाँ क्यों आया? तेरे पास जाने से लोगों के घर टूटते हैं। तू हमें सिखाने आया है?"

"मैं सिखाने नहीं —"

"तू हमारे बीच नहीं आया कर।" सानिया के अब्बा ने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी और यही सबसे बुरा था। "तेरे आने से पहले हम लड़ते थे, पर सुबह फिर बात कर लेते थे। अब तीन दिन से हम बात नहीं कर रहे। तीन दिन से हमारे बच्चों को कहना पड़ रहा है — तुम उस गली से नहीं जाओगे। और सबका कारण एक है।"

"कारण मैं नहीं —"

"कारण तू है।" उन्होंने कहा। "क्योंकि तेरे आने के बाद से इस गली में सुबह से सुबह तक सब कुछ बदल गया है। और जो बदलता है, उससे डर लगता है।"

मैं कुछ नहीं बोला।

मैंने बाल्टी उठाई। गिरी हुई। मैंने उसे नल के नीचे रखा, पानी भरा, दोनों के बीच रख दिया। मैंने ईंट उठाई और दूर फेंक दी।

फिर मैंने कहा, "एक बाल्टी पानी के लिए।" और चला गया।

मैं जब पीछे मुड़ा, तो दोनों खड़े थे। एक-दूसरे से नहीं, मेरी तरफ़ नहीं — बाल्टी की तरफ़। बाल्टी भरी थी। और उनके पैरों के नीचे कीचड़ था।

शाम छह बजे दो खाकी जीपें आईं।

मैं दुकान पर था। मैंने जीपों की आवाज़ सुनी और उठ बैठा। चार सिपाही उतरे। उनमें से एक — पुराना सिपाही, जिसने पहले भी एक बार मेरा नाम पूछा था — मेरी तरफ़ आया।

"अंकुश यादव?"

"हाँ।"

"ये जो पीपल के नीचे बोर्ड है — किसका?"

"जोड़ केंद्र का।"

"किसने लगाया?"

मैंने कहा, "मैंने।"

"आपके पास इसकी अनुमति है?"

"अनुमति किसी से नहीं ली। ये इलाके के लोगों का —"

"तो ये अवैध है।" उन्होंने कहा। "बिना अनुमति सभा, बिना अनुमति बोर्ड, बिना अनुमति केंद्र — इस शहर के नियम में ये सब एक ही काग़ज़ में आता है।"

मैंने कहा, "पर पीपल के नीचे तो पहले से बुज़ुर्ग बैठते हैं। वहाँ बंसी बाबा, रहमत बाबा —"

"बैठना अलग बात है। बोर्ड लगाना अलग।" उन्होंने कहा। "आज सभा हुई?"

"नहीं।"

"तो अच्छा है। अभी हटा दीजिए। कल से कुछ नहीं रहेगा।"

मैंने कहा, "कल से क्या मतलब?"

"मतलब — जो पीपल के नीचे रखा है, वो हटा दो। हम छह बजे फिर आएँगे। अगर मिला, तो हमें मजबूरी में उठाना पड़ेगा, और फिर काग़ज़ लिखा जाएगा। और तुम जानते हो, काग़ज़ लिखा जाए तो कितने दिन लगते हैं?"

मैं वहीं खड़ा रहा।

"क्यों कर रहे हैं आप यह?"

वो मेरे करीब आए। उनकी आवाज़ धीमी हो गई। "अंकुश, मैं बता दूँ? मुझे सिर्फ़ मुहर पूछने का हक़ है, सच का नहीं। मुहर ऊपर से आई है। मैं मुहर के साथ आया हूँ। और मुहर कभी यह नहीं बताती कि सच क्या है — सिर्फ़ यह बताती है कि ऊपर क्या है।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

उन्होंने कहा, "तुम्हारी दुकान का लाइसेंस अधूरा है। तुम्हारी रजिस्ट्री अधूरी है। तुम्हारा हिसाब अधूरा है। मैं कल तक तुम्हें रोक नहीं रहा। पर कल से — मुझे बताना पड़ेगा कि क्या फैसला लिया।"

वो लौट गए।

मैंने पीपल के नीचे जाकर बोर्ड उठाया। यही वो बोर्ड था जो मैंने सफ़ेद पेंट से बनाया था, जिस पर लिखा था — "टूटी चीज़ लाओ, टूटा रिश्ता साथ लाओ"। मैंने उसे अपनी दुकान के पीछे रख दिया। मेज़ भी उठा लाई, टूटी लकड़ी? वो दरोगा कल हटवा चुका था।

मैंने चारों तरफ़ देखा। कोई नहीं था। पीपल के नीचे खाली।

सात बजे गली में ऐसा सन्नाटा छा गया कि मुझे अपनी साँस सुनाई देने लगी।

मैंने अपने कान पकड़े। कभी-कभी सन्नाटा भी एक आवाज़ होता है। सिर्फ़ सुनने के लिए कान चाहिए, और सहने के लिए कालेज।

गली में बच्चों की आवाज़ नहीं आई। कोई गेंद नहीं उछली। कोई बैट नहीं खड़का। कोई नहीं भागा, कोई नहीं हँसा।

यही सबसे अजीब था। गली में सबसे ज़्यादा आवाज़ बच्चे करते थे। और आज वो सबसे पहले चुप हुए।

मैंने दुकान के पीछे वाले कमरे से घंटी निकाली। मेरी जेब में थी। पीतल। ठंडा।

मैंने उसे हथेली पर रखा।

"सुन।"

कुछ नहीं।

मैंने हिलाया। पीतल की आवाज़ आई — पीतल की। धातु की। टन-टन।

कोई आवाज़ नहीं।

मैंने फिर बजाया। ठीक उसी तरह जैसे मैंने पहले बजाया था — दो उँगलियों से, हल्के से, ऐसे जैसे कोई बहुत पुरानी चीज़ को नींद से जगाया जा रहा हो।

टन।

कोई जवाब नहीं।

मैंने फिर बजाया।

टन।

फिर बजाया।

टन।

फिर बजाया।

टन।

पाँच बार। दस बार। मैंने गिनती खो दी। मेरी उँगलियाँ लाल हो गईं। घंटी ठंडी थी। पहले वो गरम होती थी — जब वो बोलती थी, तब गरम होती थी। अब ठंडी थी।

मैंने उसे माथे से लगाया। कुछ नहीं। मैंने उसे रगड़ा। कुछ नहीं। मैंने उसे कान के पास ले जाकर फुसफुसाया, "कुछ तो बोल।"

सिर्फ़ धातु की गूँज।

मैं बैठ गया। फ़र्श पर। ट्रंक के पास। और मैंने पहली बार महसूस किया — वो डर जो मैंने कभी महसूस नहीं किया था। अब तक मैं घंटी से डरता था — कहीं कुछ गलत कह देगी, कहीं कुछ ऐसा बता देगी जो मैं सुनना नहीं चाहता। अब मुझे वो डर नहीं था।

अब मुझे यह डर था — क्या घंटी ख़त्म हो गई?

आठ बजे किसी ने शटर पर तीन दस्तकें दीं।

मैं उठा। शटर उठाया। डॉक्टर इसरानी खड़े थे। गरम चाय का स्टील का डिब्बा हाथ में। और उनके पीछे — बंसीलाल, अस्पताल का चौकीदार, जो मेरे साथ रात के वक़्त फाटक तक आया था।

मैंने उन्हें अंदर लाया।

डॉक्टर इसरानी ने चाय मेज़ पर रख दी। और फिर मेरे पास बैठ गए — वो बूढ़े, जिनके पास इलाज के लिए मरीज़ नहीं थे, पर सलाह के लिए एक लड़का था।

"क्या हुआ?" उन्होंने पूछा।

मैंने घंटी मेज़ पर रख दी।

"नहीं बोल रही।"

वो मुस्कुराए। धीरे से।

"जानता हूँ।"

"आपको कैसे पता?"

"क्योंकि गली चुप है।" उन्होंने कहा। "और मैंने तुम्हें कल कुछ बताया था जो तुमने सुना नहीं।"

"आपने कहा था — घंटी जादू का डिब्बा नहीं, गली की ज़ुबान है।"

"हाँ। और ज़ुबान तब बोलती है जब लोग बोलते हैं। जब लोग चुप होते हैं, ज़ुबान भी चुप हो जाती है।"

मैंने कहा, "डॉक्टर साहब, मैंने इसे हिलाया। रगड़ा। माथे से लगाया। कुछ नहीं। ये सिर्फ़ धातु है।"

डॉक्टर इसरानी ने घंटी उठाई। हथेली पर रखी। देखा।

"अंकुश, ये धातु थी, धातु है, और धातु रहेगी। इसमें जो बोलता है, वो धातु नहीं है। इसमें जो बोलता है, वो तुम्हारी गली है।"

"तो गली क्यों चुप है?"

"क्योंकि गली डर रही है।"

"डर किससे?"

"अपने आप से।" उन्होंने कहा। "डर से नहीं, अंकुश — शर्म से। गली शर्मिंदा है। उसे लग रहा है कि उसने तुम्हें अकेला छोड़ दिया। और शर्मिंदा आदमी चुप रहता है। बोलता नहीं, क्योंकि उसे पता है कि अगर बोलेगा, तो पहले यही कहेगा — मैंने तुम्हें अकेला क्यों छोड़ा। और यह कहना सबसे मुश्किल है।"

मैंने सिर झुकाया।

"तो कब बोलेगी?"

"जब कोई पहले बोलेगा।" उन्होंने कहा। "और वो कोई साहसी नहीं होगा। वो कोई सबसे कमज़ोर होगा। सबसे ज़्यादा डरने वाला। क्योंकि सबसे ज़्यादा डरने वाले के पास खोने को कुछ नहीं बचता — इसलिए वो पहले बोल पड़ता है।"

बंसीलाल ने कहा, "डॉक्टर साहब, आप कह रहे हैं कि घंटी को गली से बोलवाना है?"

"हाँ।"

"तो कैसे?"

"एक-एक करके।" डॉक्टर इसरानी ने कहा। "आज रात किसी एक दरवाज़े पर जाओ। कोई एक। जो सबसे ज़्यादा डरता है। जाओ और कहो — मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस तुम्हारे घर की चाय पीनी है।"

मैंने कहा, "किसके घर?"

वो उठे। अपना स्टील का डिब्बा उठाया। दरवाज़े की तरफ़ चले।

फिर रुके।

"अंकुश, तुम्हारी गली में सबसे ज़्यादा कौन डरता है?"

मैंने सोचा।

"सानिया की अम्मी।" मैंने कहा। "वो कल से बेटी को मेरी तरफ़ देखने तक नहीं देतीं। पर उनकी आँखों में जो था, वो गुस्सा नहीं था। वो डर था।"

"तो वहाँ जाओ।"

"अगर उन्होंने दरवाज़ा नहीं खोला?"

"तो दरवाज़े के बाहर बैठ जाओ।" उन्होंने कहा। "बिना बोले। बस बैठ जाओ। और अगर एक घंटे में भी दरवाज़ा नहीं खुला — तो चुपचाप लौट आना। पर अगर खुल गया — तो देखना, तुम्हारी गली वहीं से शुरू हो जाएगी।"

वो चले गए।

बंसीलाल भी गए, पर दरवाज़े पर रुके और बोले, "अंकुश, एक बात। मैं चालीस साल अस्पताल में हूँ। मैंने एक चीज़ सीखी है — जो चीज़ सबसे ज़्यादा डरने वाले के पास रखी होती है, वही सबसे सच्ची होती है।"

वो गए।

मैं कमरे में अकेला रहा। घंटी मेज़ पर थी। ठंडी।

मैंने चाय पी। स्टील के डिब्बे से। गरम थी। मेरे हाथ ठंडे थे और चाय गरम — यही असंतुलन मुझे ठीक लगा।

फिर मेरे फोन की घंटी बजी।

मैंने देखा। काजल का नंबर। मैंने उठाया।

"भैया।"

"हाँ।"

"माँ जागी थीं। उन्होंने पूछा — अंकुश ने खाया?"

मेरा गला भर आया।

"क्या कहा तुमने?"

"मैंने कहा — नहीं।"

"और?"

"फिर वो चुप हो गईं। और फिर बोलीं — उसे बोलना, जो हाथ घंटी पकड़ता है, वो खाना नहीं भूलता। और अगर भूल गया है, तो घंटी बोलेगी।"

मैं हँसा। हँसी में कुछ था।

"माँ को कैसे पता?"

"माँ को पता है, भैया।" काजल ने कहा। "वो बीमार हैं, बेहोश नहीं हैं।"

फोन कट गया।

मैं बाहर निकला। गली में खड़ा हुआ।

रात नौ बजे गली में कुछ आवाज़ आई। गाड़ी। और मुझे पता था कौन।

सफ़ेद गाड़ी मेरी दुकान के सामने रुकी। वो मेरी गली में चली आई थी — पहली बार। पहले वो गली के मुँह पर रुकती थी। आज वो मेरी दुकान के सामने रुकी।

खिड़की नीचे आई।

अंदर रणवीर बैठे थे। सफ़ेद कपड़े। हाथ जोड़े हुए — आदत से। वो इस गली में आकर भी हाथ जोड़ रहे थे। जैसे किसी मंदिर में आए हों। जैसे इस गली ने उन्हें न्योता दिया हो।

मैं अपनी चौकी पर बैठा रहा।

"अंकुश।"

"साहब।"

"आज गली चुप है।"

"है।"

"तूने शाम को बोर्ड उतार दिया?"

"उतार दिया।"

"अच्छा किया।" उन्होंने कहा। "कल से यहाँ कुछ नहीं रहेगा। तूने उतार दिया तो आधा काम हो गया।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

वो कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, "अंकुश, तुझे एक बात पूछूँ?"

"पूछिए।"

"तेरी घंटी आज बोली?"

मैंने कहा, "नहीं।"

उन्होंने मुस्कुरा दिया। छोटी सी मुस्कान — जैसे किसी किताब में उस पन्ने पर निशान लगा दिया जाए जो बाद में फाड़ना है।

"मुझे पता था।" उन्होंने कहा। "क्योंकि तेरी घंटी मेरी जेब में बोल रही है।"

मैंने देखा। मेरे चेहरे पर कुछ नहीं आया।

"आप झूठ बोल रहे हैं।"

"हाँ।" उन्होंने कहा। "पर तू इतना डर गया ना? एक पल के लिए। सच?"

मैंने कहा, "एक पल के लिए।"

"यही तो।" उन्होंने कहा। "मैं तुझे मारने नहीं आया। मैं तुझे तेरे ही हाथ से मारना चाहता हूँ।"

फिर वो सीधे बैठे।

"कल से इस गली में तेरा नाम नहीं, मेरा नाम होगा।"

मैंने कहा, "ये आपने कल भी कहा था।"

"कल कहा था।" उन्होंने कहा। "आज करने आया हूँ।"

खिड़की ऊपर जाने लगी।

और फिर — मुझे नहीं पता क्यों — मैंने कुछ कहा। शायद इसलिए कि मेरे अंदर कुछ टूट रहा था और टूटने से पहले इंसान कुछ कह देता है।

"साहब।"

वो रुके।

"पर मेरी गली में मेरा नाम बांटी नहीं जाता।" मैंने कहा। "वो उन लोगों के हाथ में है जो सुबह चाय पीते हैं। अगर वो आपका नाम लेंगे, तो आपका होगा। अगर वो मेरा लेंगे, तो मेरा।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"तूने आज किसी को चाय दी?"

"नहीं।"

"तो फिर?"

"तो फिर कल।" मैंने कहा। "कल कोई एक आदमी मेरी चाय पिएगा। और वो इस गली के बंद दरवाज़े से बाहर आएगा। और जो एक बाहर आया, वो बाकी के दरवाज़े खोल देगा। ये आप नहीं रोक सकते, साहब। ये सिर्फ़ एक चाय है। पर यही एक चाय आपके काग़ज़ों से भारी है।"

रणवीर ने मेरी तरफ़ देखा।

बहुत देर तक।

फिर वो हँसे। हँसी में पहले वाली बात नहीं थी। इसमें कुछ और था — जैसे कोई जुआरी ताश फेंट रहा हो और जानता हो कि इस बार पत्ते उसके ख़िलाफ़ हैं।

"ठीक है।" उन्होंने कहा। "कल चाय है। पर कल शाम तक — मैं देखूँगा कितने दरवाज़े खुलते हैं।"

खिड़की बंद हुई।

गाड़ी चली गई।

मैं वहीं बैठा रहा। घंटी मेरी जेब में थी।

मैंने उसे निकाला। हथेली पर रखा। ठंडी थी।

मैंने धीरे से कहा, "ऐसा कर, कल भी चुप रह।" और मुझे ख़ुद नहीं पता क्यों, मैं हँसा। "क्योंकि कल मुझे तेरी आवाज़ नहीं, उस औरत की आवाज़ चाहिए जो डरकर दरवाज़ा खोलेगी। तेरी आवाज़ आख़िरी चीज़ है। पहली चीज़ एक इंसान है।"

घंटी चुप रही।

पर मुझे लगा — जैसे पीतल के भीतर कहीं बहुत दूर, बहुत हल्के से किसी ने साँस ली।

मैं शटर गिराने लगा।

तभी — दुकान के पीछे से आवाज़ आई। ज़ोर की नहीं। हल्की। कोई सीढ़ी चढ़ने की आवाज़।

मैं रुका।

दुकान के पीछे से आवाज़ आई — "अंकुश।"

मैंने शटर उठाया और दुकान के पीछे गया। वहाँ सिर्फ़ छत थी, और छत पर — अंधेरा। मैंने ऊपर देखा। छत के कोने पर कुछ था — काग़ज़। एक काग़ज़, ईंट से दबा हुआ।

मैंने सीढ़ी लगाई। चढ़ा। ईंट हटाई। काग़ज़ उठाया। लेकर नीचे आया। कमरे में बत्ती जलाई।

काग़ज़ पर — मेरी ही लिखाई में — तीन लाइनें।

"मैंने अपने नाम का कोयला मिटाया नहीं। उसने मुझे मिटाया नहीं कर पाया। कल कोई एक दरवाज़ा खुलेगा — सबसे डरने वाले का। और उस दरवाज़े से गली लौटेगी।"

और नीचे, पेंसिल से, बहुत छोटे अक्षरों में, एक और लाइन थी — एक और भी सवाल, वही जो मेरी कॉपी में था —

"भाई।"

मैंने वो काग़ज़ देखा। यह मैंने नहीं लिखा था। मैंने इसे आज लिखा ही नहीं था। यहाँ तक कि मेरी कॉपी में भी यह नहीं लिखा था।

मैंने काग़ज़ पलटा।

पीछे — वही झुकी पेंसिल लिखाई। वही जो टिंकू के छोड़े काग़ज़ पर थी। वही जो दरवाज़े की धूल में थी। वही जो मेरी ही लिखाई जैसी थी और मेरी नहीं थी।

"अगर तू कल किसी डरने वाले के दरवाज़े पर जाएगा, तो उससे पहले वहाँ कोई और पहुँच जाएगा। कोई और नहीं — वही, जिसने तेरे नाम से तेरा ही काग़ज़ लिखा। जिसने तेरी कॉपी में 'भाई' लिखा। जो तेरे ही घर में है। तेरे ही बीच में। लक्ष्मी दीदी के ताले में। दादा की दराज़ में। जो बंद है — वो बाहर निकलने की तैयारी में है।"

मैंने उस काग़ज़ को मेज़ पर रख दिया।

मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने उन्हें जेब में डाल दिया।

फिर मैंने कॉपी खोली और लिखा —

"कल कोई एक दरवाज़ा। सबसे डरने वाला। सानिया की अम्मी।"

फिर लिखा —

"और उससे पहले, सुबह, डॉक्टर इसरानी का रजिस्टर। उसमें वो कटा नाम है जिसे मुझे चाहिए। और उस नाम से पहले मुझे यह जानना है — वो नाम काटा किसने?"

कॉपी बंद की।

बत्ती बुझाई।

और सोने से पहले, मैंने एक बात और सोची — आज पूरे दिन गली में जो चुप्पी थी, वो सिर्फ़ डर नहीं थी। उसमें एक शर्म भी थी। और शर्म का मतलब होता है — अंदर कहीं किसी ने अभी हार नहीं मानी। शर्मिंदा आदमी हारता नहीं — सिर्फ़ छुपता है। और जो छुपता है, वो लौट भी सकता है।

मैं लेटा। आँखें बंद कीं।

घंटी मेरी जेब में थी। ठंडी। चुप।

पर मुझे अब उसकी चुप्पी से डर नहीं लग रहा था।

क्योंकि अब मुझे पता था — घंटी चुप है, क्योंकि गली चुप है। और गली चुप है, क्योंकि मैंने उससे चाय नहीं माँगी।

कल मैं चाय माँगूँगा।

॥

सुबह चार बजे मेरी आँख खुली।

कमरे में अंधेरा था। बल्ब गुनगुना रहा था, जैसे उसे भी पता हो कि आज उसे ज़्यादा देर जलना है। मैं उठा। चारपाई पर बैठा। मेज़ पर वो काग़ज़ पड़ा था जो रात छत से मिला था। मैंने उसे फिर पढ़ा। फिर तीसरी बार पढ़ा।

नीचे पेंसिल में लिखा था — भाई।

और पीछे वही झुकी लिखाई — कल उस दरवाज़े पर वही पहले पहुँचेगा, जो तेरे ही घर में है।

मैंने काग़ज़ तह किया। कॉपी में रख दिया। फिर औज़ारों का ट्रंक खोला और घंटी निकाली।

हथेली पर रखी। ठंडी थी। पर पिछली रात से ज़रा कम ठंडी — या शायद मुझे लगा। मैंने उसे हल्का हिलाया। पीतल से सिर्फ़ टन निकला। कोई आवाज़ नहीं।

मैंने मन में कहा, आज सुबह पहले डॉक्टर इसरानी का रजिस्टर। फिर शाम को सानिया की अम्मी का दरवाज़ा।

यही क्रम था। यही मैंने रात कॉपी में लिखा था।

पर किसी ने इस क्रम को मेरे खिलाफ़ तैयार कर लिया था। मुझे उस वक़्त यह नहीं पता था। तुम सोच रहे होगे कि सुबह उठकर पहला काम तय था, तो उल्टा क्या होगा?

सुनो।

मैंने पाँच बजे शटर उठाया।

शटर आधा उठा था कि बाहर से आवाज़ आई — "बेटा।"

किशनलाल काका थे। उनके पीछे तीन औरतें थीं — एक बुढ़िया जिसके हाथ में कटोरा था, एक जवान औरत जिसके हाथ में बच्चा, और एक औरत जो कुछ नहीं कह रही थी, बस सिर झुकाए खड़ी थी।

मैंने शटर पूरा उठाया।

"काका, इतनी सुबह?"

किशनलाल ने मेरी तरफ़ देखा। और फिर पीछे मुड़कर तीनों औरतों को देखा। औरतें कुछ दूर खड़ी रहीं।

फिर काका ने धीरे से कहा, "रात में कोई घर-घर गया है।"

"कौन?"

"दो सफ़ेद कुर्ते वाले।"

मैंने अपनी उँगलियाँ जेब में घुसा दीं। घंटी जेब में थी। ठंडी।

"क्या कह गए?"

किशनलाल ने एक लंबी साँस ली — जैसे कहानी सुनाते वक़्त लोग लेते हैं, जब वो खुद उस कहानी से थके हुए हों।

"कह गए कि उस दुकान का जोड़ काला जादू है। जो वहाँ गया, उसका घर टूटा। नसीमा बाई की दुकान का हिसाब बिगड़ा — पता है तुम्हें? पिछले हफ़्ते उसका बेटा साजिद दो हज़ार का काग़ज़ ले आया था, और कल उसका उतना ही हिसाब गड़बड़ाया। औरतें सुनकर डर गईं।"

"काका, ये सब—"

"मैं जानता हूँ, बेटा," काका ने कह दिया। "मैं जानता हूँ कि ये सब झूठ है। पर जो झूठ घर-घर जाता है, वो सच से तेज़ हो जाता है।"

तभी पीछे खड़ी बुढ़िया आगे आई। उसके हाथ में कटोरा था।

"बेटा," उसने कहा, "मैं सिर्फ़ इतना पूछने आई हूँ — तूने मेरे घर का कुछ नहीं लिया। सही?"

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।

"अम्मी," मैंने धीरे से कहा, "मैंने आपके घर का नहीं, घर का नहीं — दुनिया का कुछ नहीं लिया।"

"तो फिर मेरे पोते का बुखार क्यों आया?"

वो कटोरा उठाए खड़ी थी। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। मैं उससे बहस नहीं करना चाहता था। और मैं उससे सहमत भी नहीं हो सकता था।

मैंने कहा, "अम्मी, पोते को डॉक्टर को दिखाइए।"

"अब डॉक्टर कहाँ ले जाऊँ?" वो फूट पड़ी। "अस्पताल का वार्ड बंद है! सील लगी है! मेरा पोता वहीं जाता था!"

मैं चुप हो गया।

किशनलाल ने उसका हाथ पकड़ा और पीछे ले गए। जवान औरत आगे आई, जिसके हाथ में बच्चा था — वो कुछ नहीं बोली। बस बच्चे को सीने से लगाया और चली गई।

तीसरी औरत ने आख़िरी में मेरी तरफ़ देखा। फिर एक शब्द कहा, "तेरे पास जाने से लोगों का भरोसा खत्म हो रहा है, अंकुश।"

और मैं वहीं खड़ा रह गया।

देखो, कोई झूठ यह नहीं कहता कि "तेरे पास काला जादू है।" झूठ यह कहता है — "तेरे पास जाने से लोगों का भरोसा खत्म हो रहा है।"

और यह वाक्य मेरे सीने में उतना ही लगा जितना सच लगता है।

मैं अंदर गया।

काजल ने आज पहली बार चाय नहीं बनाई थी। वो चूल्हे के पास खड़ी थी, पर हाथ खाली थे। उसने सिर्फ़ इतना कहा, "भैया, आज गली में कोई नहीं आएगा।"

"तू कैसे जानती है?"

"क्योंकि मैं अभी बाहर गई थी — सुबह पानी लेने। नल पर कोई नहीं था। और तीन घरों के दरवाज़े ऐसे बंद थे जैसे किसी ने रात में ही बंद कर दिए हों।"

"और सानिया की अम्मी का?"

"उनके दरवाज़े पर बाल्टी रखी थी। मतलब वो नल तक नहीं आई।"

मैंने सिर हिलाया।

और तभी मुझे याद आया — कल मैंने तय किया था, आज सुबह डॉक्टर इसरानी के पास रजिस्टर देखने जाना है। नौ बजे। मैंने काजल से कहा, "मैं डॉक्टर इसरानी के पास जा रहा हूँ।"

पर मैं नहीं गया।

क्योंकि उससे पहले शहर ने मुझे जाने नहीं दिया।

आठ बजे मैं स्कूल पहुँचा।

स्कूल के गेट पर आज लोहे का ताला नहीं था। पर अंदर आँगन में कुर्सियाँ लगी थीं। बारह-पंद्रह अभिभावक बैठे थे। कुछ मर्द थे, कुछ औरतें।

मैं दीवार के पीछे रुका। मुझे किसी ने बुलाया नहीं था। पर मैंने सुना।

प्रिंसिपल खड़े थे और हाथ में एक काग़ज़ था। किसी ने कहा, "यह सुबह की प्रार्थना से पहले कर लेंगे।"

फिर कोई औरत बोली — मैं आवाज़ पहचान गया, सानिया की अम्मी थीं — "मैं साफ़ कहना चाहती हूँ। मेरी बेटी उस गली से नहीं जाएगी। उस दुकान के सामने से तो कभी नहीं।"

गुड्डू के पापा ने कहा, "अम्मी, रास्ता तो वही है।"

"तो रास्ता बदल देंगे। पीछे की गली से।"

"वो गली काई वाली है।"

"जूतों पर काई लगेगी," सानिया की अम्मी ने कहा। "काला जादू नहीं लगेगा।"

मैंने दीवार पर हाथ रख दिया। मुझे लगा कि अगर मैं दीवार न सहारा लूँ, तो गिर जाऊँगा।

सुनीता दीदी ने कहा — मैंने उनकी आवाज़ पहचानी, जो आजकल स्कूल में बर्तन धोती हैं — "बच्चों को रोकने से क्या होगा?"

"सुनीता दीदी," किसी औरत ने कहा, "आप अपने राहुल की बात करें।"

"मैं अपने राहुल की ही बात कर रही हूँ," सुनीता ने कहा। "वो तीन महीने से स्कूल नहीं आया। अगर वो आता, तो आपसे पूछकर आता? आपसे रास्ता पूछकर?"

गली में सन्नाटा छा गया। सुनीता दीदी ज्यादा नहीं बोलीं।

फिर कोई सफ़ेद कुर्ते वाला बोला — मैंने पहली बार उसकी आवाज़ सुनी, मीठी थी, "बात सिर्फ़ सुरक्षा की है।"

मैं गेट से पीछे हट गया।

पर जाते-जाते सानिया को देख लिया।

वो गेट के अंदर खड़ी थी, बस्ता हाथ में। उसने मुझे देखा। मैंने उसकी तरफ़ मुस्कुराने की कोशिश की। वो नहीं मुस्कुराई। वो सिर्फ़ देखती रही — जैसे किसी अजनबी को देखते हैं, जिसने कुछ कहा हो और भुला दिया हो। और फिर अपनी अम्मी के पीछे हो गई।

मैं गुमटी की तरफ़ मुड़ा।

शबनम आपा की गुमटी पर वही काग़ज़ चिपका था — अस्थायी रूप से काम बंद। पर चूल्हा जल रहा था। तीन स्टूल बाहर थे। पर कोई नहीं बैठा था।

मैं अंदर गया।

शबनम आपा बर्तन धो रही थीं। पानी ठंडा था — भाप नहीं उठ रही थी। रज़िया पीछे बैठी थी, चूल्हे की तरफ़ पीठ किए।

"चाय?" मैंने कहा।

शबनम ने सिर उठाया। "बैठ।"

मैं स्टूल पर बैठ गया।

एक कप चाय आई। फिर दूसरी। फिर शबनम अपने लिए बैठ गईं।

"कितने ग्राहक?" मैंने पूछा।

"आज सुबह दो," उन्होंने कहा। "दोनों बारह-तेरह साल के बच्चे थे। दोनों ने एक घूँट में चाय पी और भाग गए। जैसे किसी ने उन्हें यहाँ आने को कहा था और वापस बुला लिया।"

"आपा, काग़ज़ उतार दें?"

उन्होंने सिर हिलाया। "उतारकर क्या करूँ? काग़ज़ वो नहीं है जो शटर पर लगा है। काग़ज़ वो है जो लोगों के दिमाग़ में लगा है। यहाँ से हटा, वहाँ से नहीं हटेगा।"

"तो बंद कर दें?"

"नहीं," उन्होंने तुरंत कहा। "चूल्हा जलेगा। तीन दिन जलेगा। फिर तीन दिन। फिर जब तक कोई आए — एक भी आए — यह जलेगा।"

"अगर कोई न आए?"

"तो आएगा," उन्होंने कहा। "मुझे पता है। क्योंकि इस गली में भूख लगती है। भूख अफ़वाह नहीं सुनती।"

रज़िया ने पीछे से कुछ कहा। मैं समझा नहीं।

शबनम ने पीछे देखा। "क्या बोली?"

"कुछ नहीं।"

"बोल ना।"

"मैंने कहा," रज़िया ने कहा — आवाज़ दबी हुई थी पर साफ़ — "कि जो आदमी गली में डर बो रहा है, उससे हमें लड़ना चाहिए। अंकुश से नहीं।"

मैंने अपना कप उठाया। एक घूँट लिया। चाय बहुत अच्छी थी। पर मेरे गले से नहीं उतर रही थी।

शबनम ने कहा, "अंकुश।"

"हूँ।"

"उस्ताद के पास जा। उसकी दुकान पर भी कुछ चल रहा है।"

मैं उठा। चाय के पैसे मेज़ पर रखे। शबनम ने उठाकर मेरे हाथ में वापस पकड़ा दिए।

"यह तेरे पैसे नहीं, इस गली के पैसे हैं," उन्होंने कहा। "जिस दिन तू यहाँ आना बंद कर देगा, उस दिन यह चूल्हा बुझेगा। और मुझे लगता है तू आज जाने की सोच रहा है।"

मैंने कुछ नहीं कहा। वो मुझसे ज़्यादा जानती थी।

मैं उस्ताद अली बक्श की दुकान पहुँचा।

शटर आधा उठा था। मशीन पर सफ़ेद कपड़ा ढका था। किनारे से गाँठ भी लगी थी — करीने से। उस्ताद स्टूल पर बैठे थे। उनके हाथ में एक पुरानी सुई थी — टूटी हुई।

मैं अंदर गया।

"उस्ताद।"

"आ गया।" उन्होंने सिर उठाया। "आपा ने भेजा।"

"कैसे पता?"

"आपा जब चूल्हा जलाए रखती है," उन्होंने कहा, "तो उसे पता होता है किसको कहाँ भेजना है।"

"ताले की बात सच है?"

"कल शाम दो सफ़ेद कुर्ते वाले आए। मोटी फ़ाइल थी। कहा — तेरी दुकान का काग़ज़ असली नहीं है। दो दिन में दुकान खाली कर दो। वरना ताला।"

"आपने क्या कहा?"

"मैंने कहा," उस्ताद ने सुई हवा में उठाई, "चाबी बनाने वाले को बुला लूँगा।"

"उस्ताद—"

"और फिर मैंने मशीन पर कपड़ा ओढ़ दिया।"

"क्यों?"

उन्होंने सुई डिब्बे में डाली। डिब्बा बंद किया। किनारे रखा।

"क्योंकि जब तक मशीन खुली रहेगी," उन्होंने कहा, "वो चलने की बात करेगी। और आज वो चलना नहीं चाहती।"

"उस्ताद, मशीन तो आपकी है—"

"मशीन नहीं है," उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "पहली सिलाई से पहले जो चीज़ होती है, वो सुई है। और आज सुई काँप रही है।"

"सुई काँप रही है?"

"मैंने आज दो टाँके लगाने चाहे," उन्होंने कहा। "दोनों बार धागा तीन बार टूटा। फिर मैंने कपड़ा ओढ़ दिया।"

"तो आप डर गए?"

वो रुके। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा — लंबा, सीधा।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "मैं पचास साल से सुई चला रहा हूँ। मैंने एक बार सुई से अपनी उँगली स"मैंने एक बार सुई से अपनी उँगली सिल दी थी।"

उस्ताद ने कहा और मैं चुप हो गया।

"पचास साल में एक बार," उन्होंने कहा। "तब मैं जवान था। सुई फँसी थी, मैंने ज़ोर लगाया, धागा खिंचा और सुई सीधी मेरे अंगूठे में घुस गई। खून निकला। मैंने पोंछा और फिर सिलाई की।"

"दर्द नहीं हुआ?"

"हुआ।" उन्होंने अपना अंगूठा देखा। "पर उस दिन मैंने एक बात सीखी। सुई तेज़ होती है, अंकुश। बहुत तेज़। वो कपड़ा चीर सकती है, उँगली चीर सकती है। पर कपड़ा सुई से नहीं जुड़ता। कपड़ा धागे से जुड़ता है।"

वो रुके।

"धागा कच्चा हो तो सुई कितनी भी अच्छी हो, टाँका नहीं टिकता। मैंने आज तीन बार धागा बदला। तीनों बार टूटा। तो मैंने कपड़ा ओढ़ दिया। क्योंकि आज धागा नहीं है।"

"उस्ताद, धागा तो बाज़ार में मिलता है।"

"बाज़ार में धागा मिलता है," उन्होंने कहा, "भरोसा नहीं मिलता।"

मैं उनके सामने बैठ गया। स्टूल खींचा। उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा। वो मशीन को देख रहे थे — ढकी हुई, चुप, सफ़ेद कपड़े के नीचे।

"घंटी सुई है," उन्होंने कहा। "गली का भरोसा धागा है। तू सुई को साफ़ करता रह, चमकाता रह, बजाता रह। धागा टूटा है तो टाँका नहीं लगेगा।"

"तो धागा कौन जोड़ेगा?"

"जिससे टूटा था।"

"वो तो पता ही नहीं कौन है।"

उन्होंने पहली बार मेरी तरफ़ देखा।

"पता है," उन्होंने कहा। "बस तू उसे अपने जैसा समझ रहा है।"

"मतलब?"

"तू सोचता है कि गली में जो डर गया है, वो बुरा है।" उन्होंने सुई की तरह सीधी बात कही। "नहीं। डरा हुआ आदमी बुरा नहीं होता। डरा हुआ आदमी थका होता है। और थके आदमी को एक ही चीज़ चाहिए — कोई एक इंसान जो उससे बिना हिसाब किताब के बात करे।"

मैंने उनकी मशीन की तरफ़ देखा।

"कल तक ये खुलेगी?"

"जिस दिन तेरी गली खुलेगी," उन्होंने कहा, "उस दिन ये खुलेगी।"

मैं उठा। जाते वक़्त रुका।

"उस्ताद, वो दो सफ़ेद कुर्ते वाले। फ़ाइल वाला। उसने कुछ और कहा था?"

उस्ताद ने सोचा। फिर बोले, "कहते वक़्त काग़ज़ हिला रहा था। और उसके हाथ में एक और काग़ज़ था — मुड़ा हुआ, छोटा। उस पर एक नाम लिखा था। मैंने पढ़ा नहीं। पर नाम लाल स्याही में था।"

"लाल स्याही?"

"हाँ।"

मैं बाहर निकला। धूप तेज़ थी, पर गली में छाया ज़्यादा थी।

मीरा स्कूल के गेट पर खड़ी थी। फोन हाथ में। मुझे देखकर हाथ उठाया — नमस्ते नहीं, "रुक" वाला इशारा।

"कहाँ थे?"

"उस्ताद के पास।"

"स्कूल वालों ने सूची बना ली है।"

"कौन सी सूची?"

"अभिभावक सभा।" उसने फोन पॉकेट में डाला। "दो सफ़ेद कुर्ते वाले सुबह सात बजे आए थे। काग़ज़ बाँटकर बोले — जो बच्चा उस गली के रास्ते आता है, उसका नाम अलग सूची में। जो नहीं आता, उसका नाम अलग।"

"अलग क्यों?"

"क्योंकि जो नहीं आता, उसे कुछ मिलेगा।" मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "नई कॉपी, कलम, स्कूल की फ़ीस में छूट। और जो आता है — उसे सिर्फ़ एक बात मिलेगी। कि उसका नाम सूची में है।"

"किसके हाथ में?"

"पता नहीं। सूची किसी को दिखाई नहीं जा रही।"

मैंने स्कूल का गेट देखा। लोहे की जाली। अंदर आँगन खाली था। छत पर कोई पतंग नहीं उड़ रही थी। आम दिन इतनी सुबह दो-तीन पतंगें तो होती ही थीं।

"बच्चे?"

"छत बंद है," मीरा ने कहा। "प्रिंसिपल ने लिख दिया — मरम्मत तक कोई छत पर नहीं जाएगा।"

"मरम्मत कब से शुरू हुई?"

"यही तो।" उसने मुझे देखा। "मरम्मत शुरू ही नहीं हुई।"

हम दोनों गेट के पास खड़े रहे। सुनीता दीदी सामने से निकलीं — सिर पर बर्तन का टब, हाथ में झाड़ू। उन्होंने मुझे देखा।

देखा और नज़र नीची कर ली।

रुकीं नहीं।

"सुनीता दीदी।"

वो एक कदम रुकीं।

"राहुल आज स्कूल आया?"

वो और नहीं रुकीं। बस इतना कहा, आगे देखती हुई, "कल से नहीं आ रहा।"

"क्यों?"

वो चलने लगीं।

फिर रुकीं। मुड़ीं। और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले कभी उनमें नहीं देखी थी — गुस्सा नहीं। शर्म।

"वो काग़ज़ मेरे हाथ में दिया गया था," उन्होंने धीरे कहा। "दो हज़ार रुपये दिए गए थे।" उनका गला रुँधा। "मैंने लिया। तेरे ऊपर इल्ज़ाम लगाने के लिए।"

मैं चुप रहा।

"मेरे राहुल की फ़ीस देनी थी," उन्होंने कहा। "पर मैंने नहीं सोचा कि वो इल्ज़ाम इस गली को इस तरह तोड़ेगा। अब राहुल कहता है — अम्मी, तुमने झूठ बोला। दो हफ़्ते से वो मुझसे ठीक से नहीं बोलता।"

"दीदी—"

"मुझे मत कहो कुछ।" उन्होंने हाथ उठाया। "मैं खुद नहीं पूछूँगी। मैं खुद तेरे मुँह से एक बार सुन लूँगी, अपने घर में। जिस दिन हिम्मत हो।"

और वो चली गईं।

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।

"यह क्या था?"

"यह," मैंने कहा, "यह पहला दरवाज़ा है।"

"क्या?"

"कुछ नहीं।"

उस वक़्त मुझे पता नहीं था कि मैं सही कह रहा हूँ।

सानिया की अम्मी गेट के अंदर से निकलीं। हाथ में थैला। पीछे सानिया — सिर झुकाए। मैंने सानिया को देखा। वो मुझे देखकर भी नहीं देख रही थी।

"सानिया।"

अम्मी रुकीं। सानिया ने सिर थोड़ा उठाया।

"स्कूल जा रही है," अम्मी ने कहा। सपाट आवाज़। "तू अपना काम कर।"

"अम्मी जी, आपसे एक बात—"

"मुझसे नहीं।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "सुबह से चार आदमी आए हैं। सब एक ही बात कह गए — तेरे पास जाने वाले का घर टूटता है। मेरी बेटी रात भर बुखार में तड़पी, तू जानता है?"

"अम्मी जी, वो बुखार—"

"मुझे नहीं पता बुखार क्या था।" उनकी आवाज़ काँपी। "मुझे यह पता है कि जिस दिन से तू दुकान खोली है, उस दिन से मैं रात में सोने से पहले अपने बच्चे का माथा छूकर सोती हूँ। यह पहले नहीं था।"

सानिया ने धीरे कहा, "अम्मी—"

"चुप।"

वो चल दीं।

सानिया मेरी तरफ़ देखती हुई चली — एक पल। और उस एक पल में उसकी आँखों में गुस्सा नहीं था। डर था। और डर के पीछे कुछ ऐसा जो कहना चाहता था पर कह नहीं सकता था।

मीरा ने धीरे कहा, "उसके हाथ में एक काग़ज़ था।"

"क्या?"

"सानिया के हाथ में। जब वो गेट से बाहर आ रही थी। छोटा काग़ज़, मुड़ा हुआ। मैंने देखा।"

"सूची?"

"पता नहीं।"

मैंने पीपल की तरफ़ देखा। वहाँ अब सिर्फ़ पत्थर की चबूतरी थी। मेज़ नहीं। बोर्ड नहीं। कुर्सी नहीं। टूलबॉक्स नहीं। ज़मीन पर धूल में एक चौकोर साफ़ निशान — जहाँ मेज़ रखी थी।

ऐसा लगा जैसे ज़मीन याद रखे हुए है।

ग्यारह बजे मैं गुमटी पर गया।

दो ग्राहक बैठे थे। दोनों मुझे जानते थे। मुझे देखकर एक उठ गया — half उठकर फिर बैठ गया, जैसे उसे याद आया कि उठना है या नहीं। दूसरे ने चाय का कप ऐसे पकड़ा जैसे कोई कीमती चीज़ हो।

शबनम आपा चूल्हे पर झुकी थीं। मैं गया तो उन्होंने सिर नहीं उठाया।

"बैठ।"

मैं बैठ गया।

"चाय?"

"हाँ।"

उन्होंने चाय उतारी। कप मेरे आगे रखा। फिर खुद भी सामने आकर बैठ गईं। पीतल की थाली बगल में रखी।

"सुबह से कितने आए?" मैंने पूछा।

"पाँच।"

"पाँच?"

"पाँच।" उन्होंने सामने देखा। "आम दिन चालीस आते हैं, अंकुश। आज पाँच। और उनमें से भी तीन ने सिर्फ़ पूछा कि तू यहाँ बैठा है क्या। चाय लिए बिना चले गए।"

"आपा—"

"मत कह।" उन्होंने कप उठाया। "मैं चूल्हा बंद नहीं करूँगी और ये काग़ज़ नहीं उतारूँगी। पर तू एक बात सुन।"

"कहिए।"

"जो ग्राहक आज नहीं आया," उन्होंने कहा, "वो भूखा नहीं है। वो डरा हुआ है। और डरा हुआ आदमी रोज़ नहीं आता, पर पूरा नहीं भूलता। मैं बीस साल से यह चूल्हा जला रही हूँ। मुझे पता है, शहर में भूख से ज़्यादा डर भगाता है।"

पीछे से रज़िया का कपड़ा खिसका। वो बर्तन धो रही थीं। टब का पानी ज़ोर से गिरा।

"रज़िया।"

"क्या?"

"अंदर से चाय लेकर आ।"

"मेरा पैर दुख रहा है।"

शबनम आपा ने कुछ नहीं कहा। बस चुपचाप उठकर खुद चाय लेने लगीं।

मैं बोला, "आपा, मैं ले आता हूँ।"

"तू बैठ।" उन्होंने पीछे देखा। "यहाँ जो पानी गिर रहा है, वो पैर का दर्द नहीं है।"

वो चाय लेने गईं।

मैंने थाली में देखा। उसमें एक काग़ज़ पड़ा था — मुड़ा हुआ। नोटिस नहीं। छोटा।

मैंने उठाया। खोला।

उस पर टाइप किया हुआ एक ही लाइन था। और नीचे कुछ नहीं। न मुहर, न तारीख़, न नाम।

"इस गुमटी में आने वाले हर आदमी के घर में पिछले दो महीने में कुछ टूटा है।"

मैंने काग़ज़ थाली में वापस रख दिया।

शबनम आपा आईं। उन्होंने देखा। थाली में देखा। कुछ नहीं बोलीं। चाय रखी। फिर वो भी बैठ गईं।

"कब मिला?"

"सुबह।" उन्होंने कप पकड़ा। "ग्यारह बजे। चाय उतारते वक़्त मेज़ के नीचे रखा था।"

"किसने रखा?"

"जो मेरी गुमटी में चाय पीकर जाता है," उन्होंने कहा, "उसके पैर मेरी मेज़ के नीचे तक आते हैं, अंकुश। मैं उन पैरों को नहीं पहचानती, क्योंकि उन्होंने मेरी आँखों में नहीं देखा।"

"आपने किसी को काग़ज़ रखते देखा नहीं?"

"मैंने किसी को कुछ रखते नहीं देखा।" उन्होंने अपनी आँखें सिकोड़ीं। "पर मैंने एक चीज़ देखी — जब मैं चाय लेकर अंदर गई थी, बाहर दो लोग बैठे थे। एक चला गया था, दूसरा जब चला तो मेरे चूल्हे की आग की तरफ़ देखकर मुस्कुराया।"

"कौन?"

"बात तू मान ले," उन्होंने कहा, "यह नाम जानने से तेरे हाथ में कुछ नहीं आएगा। जब वो मुस्कुराता है, तो जलती आग देखकर मुस्कुराता है। इसका मतलब सिर्फ़ इतना है कि उसे लगता है आग उसके हाथ में है।"

दोपहर तीन बजे खबर आई।

टिंकू की माँ आई थीं। हाँफती हुई। उनके हाथ में मिट्टी का तेल का डिब्बा था और पैर में सिर्फ़ एक चप्पल — दूसरी गली में गिर आई थी।

"उस्ताद की दुकान पर—"

"क्या?"

"दो आदमी आए हैं।" उन्होंने डिब्बा ज़मीन पर रख दिया। "बोल रहे हैं कि तीस बजे ताले की तैयारी है।"

मैं उठा। मीरा पीछे थी — वो भी उठी। हम भागे।

उस्ताद की दुकान तक पहुँचे तो दो सफ़ेद कुर्ते वाले बाहर खड़े थे। एक के हाथ में मोटी फ़ाइल थी, दूसरे के हाथ में कुछ नहीं। दुकान का शटर पूरा उठा हुआ था और मशीन पर से सफ़ेद कपड़ा उतरा हुआ था।

उस्ताद स्टूल पर बैठे थे। मशीन के सामने। हाथ में सुई नहीं थी। सिर्फ़ हाथ जोड़े हुए थे।

"उस्ताद?"

उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा।

फ़ाइल वाले ने कहा, "आ गए।"

"क्या हुआ?"

"कुछ नहीं हुआ।" उसने फ़ाइल खोली। "काग़ज़ दिखा रहे हैं। दुकान का काग़ज़ इस जगह के लिए नहीं है। तीस दिन — और अब तीन दिन। दोपहर तीन बजे ताले की तैयारी।"

"अगर वो तीस दिन होते," उस्ताद ने कहा, "तो मैं चाबी बना लेता।"

"अब?"

"अब?" उस्ताद ने कहा। "अब सुई नहीं।"

फ़ाइल वाले ने देखा। मशीन पर सुई नहीं थी। सिर्फ़ सुई का होल।

"सुई कहाँ है?"

"मैंने रख दी है," उस्ताद ने कहा। "जगह ऐसी है जहाँ काग़ज़ नहीं पहुँचता।"

वो कुछ नहीं बोला। फ़ाइल बंद की और मुड़ गया।

"उस्ताद—"

"अंकुश," उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "तू बैठ।"

"मैं बैठूँगा नहीं।"

"मैंने कहा, बैठ।"

उनकी आवाज़ ऐसी थी कि मैं बैठ गया। मीरा बाहर रुकी।

वो उठे। मशीन के पास गए। मशीन के ऊपर हाथ रखा — सफ़ेद कपड़े पर। जो अब मशीन पर नहीं था, मशीन के बगल में मेज़ पर पड़ा था।

"जब मैं तेरी उम्र का था," उन्होंने कहा, "मेरे पास दो चीज़ें थीं — मशीन और भाई। मशीन चली गई थी आग में। भाई भी। दोनों गए। मैंने मशीन वापस बनाई, दो साल लगे। भाई वापस नहीं आया।"

"उस्ताद—"

"आज मेरी मशीन पर तीस दिन का काग़ज़ आया। मैं मशीन नहीं छोड़ूँगा।" उन्होंने रुककर मेरी तरफ़ देखा। "पर आज मुझे यह भी समझ आ गया — मशीन दुकान में नहीं रहती। मशीन उन हाथों में रहती है जो इसे चलाते हैं। दुकान जाए तो जाए। पर सुई तेरे पास है।"

"सुई मेरे पास कब आई?"

"अभी आई है।" उन्होंने जेब से कुछ निकाला और मेरी हथेली पर रख दिया।

एक सुई। बहुत पुरानी। थोड़ी मुड़ी। अंगूठे के नाखून जितनी छोटी।

"यह—"

"यह वो है," उन्होंने कहा, "जिससे मैंने अपनी उँगली सिली थी।"

चार बजे से पहले किशनलाल काका की दुकान पर पानी का झगड़ा शुरू हो गया।

मैं वहाँ सिर्फ़ इसलिए गया था कि काका का बिक्री का काग़ज़ खोलवाना था। कुछ दिन से मैं उन्हें मना रहा था, वो टाल रहे थे। आज मैंने सोचा कि एक बार सीधा बैठूँगा।

पहुँचा तो दुकान के बाहर पाँच-छह लोग थे।

सानिया के अब्बा एक हाथ में बाल्टी पकड़े खड़े थे। गुड्डू के पापा दूसरी तरफ़।

बाल्टी पूरी भरी हुई थी। पानी किनारे से गिर रहा था। दोनों तरफ़ ज़मीन गीली थी।

"यह बाल्टी मेरी है," सानिया के अब्बा कह रहे थे।

"बाल्टी पर किसी का नाम नहीं होता," गुड्डू के पापा ने कहा।

"मेरी बीवी ने इसी बाल्टी से आज चार बार पानी भरा।"

"तो तेरे हाथ में कैसे आई?"

"मैंने अपनी बाल्टी किसी को दी नहीं।"

"मैंने उठाई—"

"अब उठाई है तो रख।"

दोनों एक-दूसरे के सामने खड़े थे। बाल्टी बीच में। और लोग चुप खड़े थे — कोई बीच में नहीं आ रहा था। दो हफ़्ते पहले यही गली होती तो चार लोग बीच में आ जाते, कोई हँसता, कोई कहता "अरे ऐसा क्या है"।

आज कोई नहीं।

आज सिर्फ़ आँखें थीं।

मैं आगे गया।

"भाई साहब?"

दोनों ने मेरी तरफ़ देखा। और दोनों के चेहरे पर वही भाव आया — वही जो सुबह सानिया की अम्मी के चेहरे पर था।

"तू आ गया," सानिया के अब्बा ने कहा।

"मैं बात करने आया हूँ—"

"बात?" उन्होंने बाल्टी नीचे रखी। "तेरे आने से पहले हम दोनों रोज़ नल पर मिलते थे। रोज़। पाँच साल से। मैंने इससे दोस्ती नहीं की थी, पर रोज़ एक-दूसरे को 'काका' कहते थे।"

गुड्डू के पापा ने कहा, "आज ये भी कहता है कि मैंने इसकी बाल्टी उठाई।"

"मैंने उठाई तो नहीं कहा—"

"तू बीच में मत आ।"

"मैं बीच में नहीं—"

"तेरे बिना यह झगड़ा ही नहीं होता," सानिया के अब्बा ने कहा।

वो चुप हो गए और खुद उस वाक्य से झटके में आए।

गुड्डू के पापा ने कहा, "सही कह रहा है। पहले ऐसा नहीं था। पहले हम नल पर मिलते, पानी भरते, दो बातें करते। अब हम सिर्फ़ यह देखते हैं कि कौन पहले यहाँ पहुँचता है।"

"तो मेरी ग़लती क्या है?"

"तेरी ग़लती?" सानिया के अब्बा ने कहा। "तेरी ग़लती यह है कि तू हमें खुद से बात करने की जगह देता है। तेरा बोर्ड हमें बुलाता था। तेरी दुकान हमें बुलाती थी। और अब हम जब एक जगह इकट्ठे बैठते हैं तो हमें लगता है कि हमसे कुछ छीना गया है।"

मैंने देखा कि गली के लोग सुन रहे थे। कोई सुन रहा था जो पहले नहीं सुनता था।

और मुझे समझ आया — यह लड़ाई बाल्टी की नहीं थी।

"बाल्टी मेरी है," सानिया के अब्बा ने कहा, और आवाज़ भारी हो गई।

"रख," मैंने कहा।

"क्या?"

"बाल्टी रख दीजिए।" मैं आगे बढ़ा। "और नल यहाँ से बीस कदम है। एक बाल्टी भरने में दो मिनट लगते हैं। लगाईए।"

दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।

"मैं बाल्टी नहीं बाँट रहा," मैंने कहा। "मैं सिर्फ़ इतना कह रहा हूँ कि आज नल पर पहले कोई पहुँचे, यह देखना बंद करो। नल में पानी पाँच साल से है, दस साल से है, सौ साल से है। उसने अपना हिसाब नहीं बदला।"

सन्नाटा।

फिर सानिया के अब्बा ने कहा, "तू अच्छी बातें करता है।"

"मुझे यही सिखाया गया था।"

"अच्छी बातें सुनने में अच्छी होती हैं," उन्होंने कहा। "पर मेरी बेटी रात भर बुखार में तड़पी। मुझे अच्छी बात नहीं चाहिए। मुझे यह चाहिए कि जो मेरी बेटी को खराब कर रहा है, वो थम जाए।"

और उन्होंने वो कह दिया जो सारी गली कह रही थी।

"तू अपनी दुकान बंद कर दे। तीन दिन के लिए। बस तीन दिन। हम सब साँस ले लें।"

मैं उस वक़्त कुछ नहीं बोला।

पर उस वक़्त मुझे पता चला कि दुकान बंद करना कितना आसान है और कितना मुश्किल।

एक शब्द में हो जाता — और हमेशा के लिए नहीं होता।

छह बजे खाकी जीप आई।

दो सिपाही उतरे। एक वो ही जो पहले आया था। दूसरा नया — पतला, हाथ पीछे बँधे।

दरोगा नहीं था।

पीपल के नीचे पहुँचकर उन्होंने वो चौकोर ज़मीन देखी जहाँ मेज़ रखी थी। फिर मेरी तरफ़ देखा।

"तुमने यहाँ कुछ रखा है? आज?"

"नहीं।"

"कुछ लगाने की कोशिश?"

"नहीं।"

"अच्छा है।" उसने जेब से काग़ज़ निकाला। "कल से इस जगह पर कोई बोर्ड, कोई मेज़, कोई सभा, कोई जमावड़ा नहीं। तीन दिन की रोक है। और तीन दिन बाद दरोगा जी खुद आएँगे।"

"मैंने कुछ नहीं किया।"

"मैंने भी कुछ नहीं किया," उसने कहा। "मुझे काग़ज़ दिया गया। मुझे सिर्फ़ इतना पता है कि जो ऊपर से आता है, वो काग़ज़ पर आता है।"

वो मुड़ने लगा। फिर रुका।

"सुन," उसने धीरे कहा, आवाज़ नीची करके, "आज रात कुछ मत करना। न बोर्ड, न चाय, न बात।"

"क्यों?" मैंने पूछा।

उसने मेरी तरफ़ देखा। लंबा। सीधा।

"क्योंकि आज काग़ज़ आया है कि अगर तीन दिन में गली में कुछ हुआ, तो उसे सिर्फ़ तेरे नाम पर लिखा जाएगा।" उसने साँस ली। "और मैं तुझे बताने आया हूँ। मुझे नहीं बताना चाहिए था। मैं अपनी नींद के लिए बता रहा हूँ। समझ गया?"

मैंने सिर हिलाया।

"काग़ज़ की नक़ल माँगूँ?"

"माँगेगा," उसने कहा, "तो मिलेगी नहीं।"

वो गया।

जीप चली गई।

और गली चुप हो गई।

वो चुप्पी कुछ और थी, मीरा।

मैंने उसे धीरे कहा, "तेरा कैमरा?"

"बंद है।"

"क्यों?"

"क्या रिकॉर्ड करूँ?" उसने कहा। "कि कोई नहीं आ रहा?"

शाम सात बजे मैंने घर जाने की सोची। फिर नहीं गया।

मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में बैठा रहा। बत्ती जल रही थी — वो पुरानी, गुनगुनाती हुई।

आज वो गुनगुनाती नहीं थी। सिर्फ़ जल रही थी।

मैंने घंटी निकाली।

जेब से। हथेली पर रखी।

आज सुबह से वो ठंडी थी। पर आज शाम — ठंडी नहीं। बर्फ़ जैसी।

मैंने बजाई।

टन।

बस टन।

धातु की आवाज़। सिर्फ़ धातु।

मैंने फिर बजाई।

टन।

मैंने तीसरी बार बजाई। चौथी बार। पाँचवीं बार।

टन। टन। टन। टन।

मैंने घंटी कान के पास ले जाकर हिलाई। दोनों हाथों में पकड़कर हिलाई। मेज़ पर रखकर उँगली से बजाई।

कुछ नहीं।

मैंने उसे माथे से लगाया।

ठंडी।

एक पल मुझे ऐसा लगा कि घंटी ने भीतर से साँस ली — जैसे कल रात ली थी। बहुत दूर से।

पर नहीं।

सिर्फ़ मेरा ही साँस लेना था।

मैं कुर्सी पर बैठ गया।

"ऐसा मत कर," मैंने कहा। आवाज़ धीमी थी।

"मैंने कहा था, कल चुप रहना। पर इतना चुप मत रहना कि मुझे तेरी आवाज़ भूल जाए।"

घंटी चुप।

"सुन, मैंने आज कुछ नहीं किया। मैंने सुबह शटर खोला, दोपहर में बाल्टी के बीच में पड़ा, शाम को बोर्ड नहीं लगाया। मैंने सबको मना कर दिया। मैंने कोई जोड़ नहीं किया। तो तू बोल। एक शब्द भी बोल दे।"

घंटी चुप।

"बोल।"

कुछ नहीं।

"बोल—"

मेरी आवाज़ टूट गई।

आठ बजे मैं दुकान के बाहर आया। गली में एक भी बत्ती नहीं जल रही थी। दूर गुमटी की तरफ़ से भी नहीं।

आम दिन आठ बजे शबनम की गुमटी पर लाइट होती, दो लोग बैठे होते, चिंटू की अम्मी चिल्लाती होती, सायकिल की घंटी बजती होती।

आज कुछ नहीं।

हवा भी नहीं।

मैं खड़ा रहा। पाँच मिनट।

फिर मैंने घंटी उठाई और ज़ोर से हवा में बजाई।

टन।

आवाज़ गली में गई। दीवारों से टकराई। और लौटी — टन, टन, टन — हल्की होकर।

और फिर सन्नाटा।

किसी ने दरवाज़ा नहीं खोला। किसी ने खिड़की नहीं खोली। कोई बच्चा नहीं चिल्लाया — "अंकुश भैया की घंटी!"

कुछ नहीं।

मैं ज़मीन पर बैठ गया। शटर के नीचे।

और तब — पीछे से आवाज़ आई।

"अंकुश।"

मैं उठा।

डॉक्टर इसरानी थे। हाथ में स्टील का डिब्बा। चप्पलों में। बिना स्टेथोस्कोप।

"बैठा क्यों है ज़मीन पर?"

"ठंडी है?"

"ज़मीन?"

"घंटी।" मैंने हथेली खोली।

उन्होंने देखा। फिर मेरे पास बैठ गए। डिब्बा बीच में रखा।

"चाय लाया हूँ।"

"डॉक्टर, आज—"

"पहले चाय।" उन्होंने ढक्कन खोला। भाप निकली। "और फिर मैं तुझसे एक बात कहूँगा।"

मैंने चाय पी। गरम थी। सुबह से मैंने कुछ नहीं खाया था।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "तू घंटी बजा रहा है।"

"हाँ।"

"क्यों?"

"क्योंकि—" मैं रुका। "क्योंकि वो चुप है।"

"तो ठीक है।"

"क्या?"

"वो चुप है," उन्होंने कहा, "क्योंकि गली चुप है। यह तेरी ग़लती नहीं। यह नियम है। जिस दिन मोहल्ला चुप हो जाए, घंटी भी चुप हो जाती है।"

"तो मैं क्या करूँ? उसे छोड़ दूँ?"

"तू उसे छोड़।" उन्होंने चाय पी। "पर उसे छोड़ने का मतलब यह नहीं कि तू गली भी छोड़ दे।"

"मुझे समझ नहीं आ रहा।"

"तू घंटी से पूछ रहा है," उन्होंने कहा। "घंटी से जवाब नहीं आ रहा, क्योंकि घंटी जिनके भरोसे से चलती है, वो लोग आज बोल नहीं रहे। घंटी उनकी आवाज़ नहीं ढूँढ पा रही, क्योंकि उन्होंने अपनी आवाज़ बंद कर दी है।"

"तो?"

"तो तू उनके पास जा," उन्होंने कहा। "जिन्होंने अपनी आवाज़ बंद की है।"

"सबने बंद कर दी है।"

"नहीं," उन्होंने कहा। "सबने नहीं की। कुछ लोगों ने चुप्पी ओढ़ी है। चुप्पी और चुप होना अलग बात है।"

"फ़र्क़?"

"चुप होना — जब बोलने की ज़रूरत नहीं होती," उन्होंने कहा। "चुप्पी ओढ़ना — जब बोलने की हिम्मत नहीं होती।"

"डॉक्टर, आपने किसी की बात नहीं सुनी। आज अम्मी जी ने कहा कि मैं अपनी दुकान बंद कर दूँ। तीन दिन के लिए। सिर्फ़ तीन दिन के लिए।"

"तो कर दे।"

मैं रुक गया।

"आप क्या कह रहे हैं?"

"तीन दिन नहीं करना," उन्होंने कहा। "पर तीन दिन में क्या करना है, इसका हिसाब कर।" वो उठे। "घंटी जादू का डिब्बा नहीं है, अंकुश। वो गली की ज़ुबान है। ज़ुबान से जवाब माँगना बंद कर। लोगों से माँग। जिससे डर लगता है, उससे उसका डर पूछ। और जिस दिन कोई एक इंसान तुझे अपने घर में चाय पर न बुलाए — उस दिन तेरी घंटी बोलेगी, मैं अपना स्टेथोस्कोप बेच दूँगा।"

उन्होंने डिब्बा उठाया।

"एक बात और।"

"क्या?"

"वो तीन दिन," उन्होंने कहा, "सिर्फ़ तीन दिन नहीं हैं। उनके भीतर एक नाम है।"

"क्या नाम?"

"तुझे पता है कौन।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "जिसके दरवाज़े पर जाने का तूने सोचा था। जिसके घर की औरत ने मुझे फोन किया कि डॉक्टर साहब, मेरी बेटी के बुखार की दवा आज रात तक दीजिए। उसने मुझे फोन किया, अंकुश। मुझे। मुझे फोन में रोते हुए बोली कि डॉक्टर, इन दिनों मैं रात में सो नहीं पाती और मुझे नहीं पता किससे कहूँ।"

"सानिया की अम्मी?"

"हाँ।" उन्होंने कहा। "मुझे दवा देते वक़्त उसने कहा — डॉक्टर साहब, मेरी बेटी का बुखार उतर गया है, पर मेरे अंदर जो डर आया है, वो नहीं उतरा।"

वो गए।

और देर रात — नौ बजकर कुछ मिनट पर — गाड़ी आई।

सफ़ेद।

आवाज़ से पहले उसकी रोशनी आई। मैंने सिर उठाया और देखा कि गली में वो रोशनी फैल रही है — जैसे कोई चीज़ गली के बीच से सबको जगा रही हो।

गली के मुँह पर रुकी।

इंजन चालू रहा।

खिड़की उतरी।

मैं शटर के नीचे खड़ा था।

रोशनी में मुझे सिर्फ़ हाथ दिखा — खिड़की के किनारे टिका। उस उँगली पर काली अंगूठी।

फिर आवाज़ आई।

"अंकुश।"

मैंने कुछ नहीं कहा। मुझे जवाब देने की ज़रूरत नहीं लगी।

"मुझे पता है तू खड़ा है।"

फिर वो कुछ सेकंड चुप रहा। मुझे लगा वो कुछ और कहेगा। पर नहीं।

फिर उसने धीरे कहा, आवाज़ बहुत साफ़, बहुत ठंडी:

"कल से इस गली में तेरा नाम नहीं, मेरा नाम होगा।"

खिड़की ऊपर गई।

गाड़ी चली गई।

रोशनी चली गई।

और अंधेरे में — मैं वहीं खड़ा रहा। घंटी हथेली में। बर्फ़ जैसी।

फिर मुझे कुछ सुनाई दिया।

गाड़ी के पीछे से कोई चीज़ सड़क पर गिरी थी — हल्की आवाज़। जिस तरह काग़ज़ गिरता है।

मैं गली के मुँह तक गया।

ज़मीन पर एक काग़ज़ पड़ा था। मुड़ा हुआ।

मैंने उठाया। खोला। मोबाइल की रोशनी में देखा।

उस पर एक ही लाइन थी। पेंसिल से।

नाम।

एक औरत का नाम।

पर वो नाम गली में कोई नहीं लेता था। गली उसे दूसरे नाम से जानती थी।

हम सब उसे "सानिया की अम्मी" कहते थे।

उसका असली नाम मैंने आज पहली बार पढ़ा।

मैंने वो काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा।

फिर मैं घूमा और दुकान के अंदर गया। बत्ती जलाई।

कॉपी खोली।

और लिखा —

"आज गली चुप हुई, पर एक औरत का नाम मेरे हाथ में है जो किसी और की जानकारी थी, मेरी नहीं। रणवीर इसे भेजकर कह रहा है कि वो उस दरवाज़े को जानता है। जिस दरवाज़े पर मैं कल सुबह जाने वाला था।

तो मैं आज रात जाऊँगा।

क्योंकि जो दरवाज़ा वो मुझसे पहले छूना चाहता है, वहीं से मेरी गली का धागा जुड़ेगा।

और यह भी लिखता हूँ — अगर कल सुबह तक घंटी नहीं बोली, तो मैं उसे नहीं बजाऊँगा। मैं उससे नहीं पूछूँगा।

मैं गली से पूछूँगा।"

मैंने कॉपी बंद की।

और जब बत्ती बुझाने लगा, मैंने घंटी उठाई। आख़िरी बार।

"एक बात सुन," मैंने कहा। "अगर तू चुप है क्योंकि गली चुप है, तो ठीक है। पर मैं तुझे यह बता देता हूँ — आज रात मैं अकेला उस दरवाज़े पर नहीं जाऊँगा।"

मैंने साँस ली।

"मैं उस औरत को भी साथ ले जाऊँगा जिसे सबने चुप कर दिया है — उसका नाम।"

घंटी चुप रही।

पर जब मैंने उसे हथेली पर रखा — एक पल के लिए — बर्फ़ नहीं थी।

इतनी ठंडी नहीं थी।

जितनी सुबह थी।

मैं मुस्कुराया।

और बत्ती बुझा दी।

॥

रात के ग्यारह बज चुके थे। गली में सिर्फ़ एक बत्ती जल रही थी — और वो भी सानिया के घर के बाहर, दरवाज़े के ऊपर, छोटी लालटेन जैसी।

मैं उस दरवाज़े के सामने खड़ा था। जिस दरवाज़े पर गली के किसी आदमी ने कभी इतनी रात तक दस्तक नहीं दी थी।

मेरी जेब में वो काग़ज़ था। पेंसिल से लिखा हुआ एक नाम। एक औरत का नाम, जिसे गली भूल चुकी थी।

मैंने दस्तक दी। एक। दो।

अंदर से आवाज़ आई। "कौन?"

"मैं हूँ। अंकुश।"

अंदर सन्नाटा। फिर चूड़ी की हल्की खनक। फिर कुंडी खुली।

आधा दरवाज़ा खुला। आधे में उनका चेहरा — थका, पुछा हुआ, आँखों में वो डर जो नींद में भी नहीं जाता।

"तुम?" उन्होंने कहा। "इस वक़्त?"

"एक बात है," मैंने कहा। "और वो ज़रूरी है।"

वो दरवाज़े की चौखट पकड़े खड़ी रहीं। पीछे से सानिया की खाँसी आई। सूखी, छोटी, बार-बार।

"सानिया सो रही है," उन्होंने धीरे कहा, जैसे खुद को ही समझा रही हों।

"मैं उससे नहीं मिलने आया," मैंने कहा। "मैं आपसे मिलने आया हूँ।"

उनका हाथ चौखट पर कस गया।

"देखो," उन्होंने कहा, आवाज़ में वो कड़वाहट जो डर से पहले आती है, "मैं तुमसे कोई झगड़ा नहीं करना चाहती। मेरी बेटी रात भर जागी है। मेरा आदमी कहता है तुम्हारी दुकान पर जाना ठीक नहीं। जो कहते हैं, मैं उसमें नहीं पड़ती। पर मुझे मेरी बेटी चाहिए, बस।"

"आपकी बेटी आपकी है," मैंने कहा। "उसमें मैं कुछ नहीं करूँगा।"

वो चुप रहीं।

फिर मैंने जेब से काग़ज़ निकाला। खोला। सामने रखा।

"ये आपका नाम है?"

उन्होंने देखा। मोबाइल की रोशनी में। और फिर उनका चेहरा कुछ ऐसा हुआ जैसे किसी ने अंदर से एक दरवाज़ा खोल दिया हो।

"ये…" उनकी आवाज़ फँस गई। "ये तुम्हें किसने दिया?"

"आज रात, नौ बजे, एक सफ़ेद गाड़ी से आकर इस गली के मुँह पर कोई ने ये गिराया," मैंने कहा। "ये मेरे लिए गिराया गया था। यानी जिसने गिराया, वो जानता है कि मैं इस दरवाज़े पर आने वाला था।"

"मतलब?"

"मतलब — आपका नाम, जो इस गली ने बरसों से नहीं बोला, साहब के काग़ज़ों में लिखा हुआ है," मैंने कहा। "और वो चाहता है कि मैं डरकर लौट जाऊँ। या और डरकर कुछ गलत कर बैठूँ।"

वो दरवाज़े पर टिक गईं। ऐसे, जैसे अगर दरवाज़ा न होता तो गिर जातीं।

"ज़ुबैदा," मैंने धीरे कहा।

मैंने उनका नाम बोला।

सिर्फ़ एक बार। बिना ज़ोर। बिना सवाल। बस नाम।

और वो रो पड़ीं।

नहीं — वो बैठ गईं, वहीं चौखट पर, और उन्होंने अपना चेहरा हाथों में ले लिया। रोना भी नहीं था, जैसे कोई सालों से रुका हुआ गला एक नाम सुनकर खुल गया हो।

मैं वहीं खड़ा रहा। मैंने हाथ नहीं बढ़ाया। कुछ नहीं कहा।

कुछ देर बाद वो बोलीं, हाथों के भीतर से, दबी आवाज़ में, "बारह साल से कोई ने मुझे ये नाम से नहीं बुलाया। इन सबने मुझे सानिया की अम्मी बना दिया। पहले अच्छा लगता था। अब लगता है जैसे मेरा कोई नाम ही नहीं था।"

"आपका नाम है," मैंने कहा। "और साहब को भी पता है। इसीलिए वो इसका इस्तेमाल कर रहा है।"

उन्होंने हाथ नीचे किए। आँखें लाल थीं, पर साफ़।

"तुम मुझसे क्या चाहते हो?"

मैंने साँस ली।

"एक गिलास पानी।"

वो ठिठकीं।

"क्या?"

"बस एक गिलास पानी," मैंने कहा। "और ये कि आप मुझे दरवाज़े के बाहर से नहीं, अंदर से पिलाएँ। बस इतना। कोई काग़ज़ नहीं, कोई अंगूठा नहीं, कोई वादा नहीं।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक।

फिर वो उठीं। दरवाज़ा थोड़ा और खोला। और अंदर चली गईं।

मैं चौखट पर खड़ा रहा। मैंने अंदर पैर नहीं रखा।

वो लौटीं। स्टील का गिलास। पानी।

उन्होंने गिलास मेरी तरफ़ बढ़ाया — और फिर हाथ रोक लिया।

"अगर मैं ये दे दूँ," उन्होंने कहा, "तो मेरे आदमी को क्या कहूँगी?"

"सच कह दीजिए," मैंने कहा। "कि एक लड़का रात में आया था, उसने मेरा नाम बोला, और मैंने उसे पानी पिला दिया।"

"और अगर वो नाराज़ हो?"

"तो मैं आपके आदमी से बात कर लूँगा," मैंने कहा। "पर आप झूठ मत बोलिए। इस गली में झूठ बहुत हो गया है।"

उन्होंने गिलास मेरे हाथ में रख दिया।

पानी ठंडा था। मैंने पिया। पूरा।

गिलास लौटाते वक़्त मेरी जेब से कोई चीज़ खड़खड़ाई। घंटी।

इतनी देर से वो चुप थी, बर्फ़ जैसी, बेजान — और जैसे ही उनका हाथ मेरे हाथ के पास आया, गिलास लेने, घंटी ने एक आवाज़ की।

बहुत छोटी। बहुत धीमी।

जैसे कोई दूर से कहे — ठीक है।

ज़ुबैदा ने गिलास पकड़ा और ठिठक गईं।

"ये आवाज़?" उन्होंने कहा।

"कुछ नहीं," मैंने कहा। "ये मेरी साइकिल की घंटी है। पुरानी है। कभी-कभी अपने आप बज जाती है।"

उन्होंने मुझे देखा। मैंने वो झूठ नहीं बढ़ाया। मैं चुप रहा।

फिर वो दरवाज़ा बंद करने लगीं।

और रुकीं।

"अंकुश।"

"जी।"

"वो सफ़ेद कुर्ते वाले," उन्होंने धीरे कहा, "कल रात भी आए थे। दो बजे। मेरे दरवाज़े पर। कहा कि जो काग़ज़ तुमने पढ़ा, वो अभी भी मेरे पास रहेगा। और जिस दिन मैं इसे किसी को बताऊँगी, उस दिन मेरे आदमी का नाम साइट से कट जाएगा।"

मेरा हाथ जेब पर गया।

"तो वो नाम उन्होंने आपको दिया था?"

"वो मेरा अपना नाम है," उन्होंने कहा, और इस बार आवाज़ में ज़रा भी काँप नहीं थी। "पर उन्होंने उसे काग़ज़ पर लिखकर ऐसा बना दिया जैसे मैं कुछ उधार ले रही हूँ।"

फिर उन्होंने दरवाज़ा बंद कर दिया।

कुंडी गिरी। अंदर बत्ती बुझी।

और मैं गली में लौटा — घंटी हथेली में। ठंडी थी, पर सुबह जितनी नहीं।

मैंने चलते-चलते कॉपी खोली, और पेंसिल से लिखा —

"उसका नाम ज़ुबैदा है। और उसने मुझे पानी पिलाया। घंटी ने सुना। बस।"

सुबह सात बजे सफ़ेद कुर्ते वाले पहले स्कूल पहुँचे।

किशनलाल काका ने बताया कि उनके हाथ में मोटा रजिस्टर था और वो एक-एक अभिभावक का नाम पूछ रहे थे।

"क्या पूछ रहे थे?"

"यही," काका ने कहा, दाल की बोरी पर बैठे-बैठे, आँखें नीची किए हुए। "कि तुम्हारा बच्चा अंकुश की दुकान के पास से जाता है? और अगर जाता है तो कल से बंद कर दो।"

"क्यों?"

"क्योंकि," काका ने कहा, और उनका हाथ चने के लोटे पर काँपा, "कह रहे थे कि अंकुश के पास जाने वाले का घर टूटता है। उसके हाथ में काला जादू है। और उसकी घंटी उस शहर से बोलती है जहाँ मुर्दे जाते हैं।"

मैं हँसा। सिर्फ़ इसलिए कि अगर न हँसता, तो कुछ और होता।

"काका," मैंने कहा, "आपने क्या कहा?"

काका ने सिर उठाया। बहुत देर तक मुझे देखा।

"मैंने कुछ नहीं कहा, बेटा," उन्होंने धीरे कहा। "और यही सबसे बड़ी बात है। जिस आदमी के पास पैसा है और काग़ज़ है, उसके सामने मैं चुप हो जाता हूँ। मैं बूढ़ा हूँ। मेरी दुकान का काग़ज़ बोरी के नीचे रखा है — जलाया नहीं। बस इतना काफ़ी है।"

मैं दुकान से निकला। स्कूल गेट तक गया।

वहाँ सानिया के अब्बा खड़े थे। और गुड्डू के पापा खड़े थे। और चिंटू की अम्मी, और रफ़ीक़ की अम्मी। चारों के हाथ में काग़ज़।

सानिया के अब्बा ने मुझे देखा और मुँह फेर लिया।

"सुनिए," मैंने कहा। "मैं सिर्फ़ इतना कहना चाहता हूँ कि बच्चों को मेरी दुकान से रोकने की ज़रूरत नहीं है। मैं उन्हें साइकिल ठीक करना सिखाता हूँ। उन्हें मज़दूरी नहीं देता, पैसा नहीं लेता।"

"तुम्हारे पास कोई नहीं आएगा," सानिया के अब्बा ने कहा, मेरी तरफ़ देखे बिना।

"अब्बा," सानिया ने पीछे से कहा। बस एक शब्द। वो भी धीरे। "अब्बा, वो उस्ताद के यहाँ से भी…"

"चुप," उसने कहा। "तू घर चल।"

सानिया ने मेरी तरफ़ देखा।

और उसकी नज़र में वो नहीं था जो पहले था। वो नज़र सवाल नहीं थी, नराज़गी नहीं थी — वो ऐसी थी जैसे कोई बच्चा किसी को आख़िरी बार देख रहा हो, चुपचाप, बिना कहे।

फिर वो मुड़ी और चली गई।

मैं स्कूल से गुमटी की तरफ़ गया।

शबनम आपा की गुमटी पर काग़ज़ अब भी चिपका था — अस्थायी रूप से काम बंद।

पर चूल्हा जल रहा था। धुआँ उठ रहा था। और मेज़ पर सिर्फ़ दो कटोरे रखे थे।

"इतना कम?" मैंने पूछा।

"आज तीन ग्राहक आए," उन्होंने कहा, चिमटी चलाते हुए, मेरी तरफ़ देखे बिना। "एक ने चाय ली, दो ने सिर्फ़ पूछा कि तेरी दुकान अभी चल रही है क्या। और एक बारह साल की लड़की आई थी, जो रोज़ आती थी। उसने मुझे देखकर चाय मँगाई, फिर तुम्हें दुकान के बाहर खड़ा देखा, और कहकर चली गई कि आंटी आज मत बनाइए।"

"आपा…"

"मैंने चूल्हा नहीं बुझाया," उन्होंने कहा, और इस बार सीधा मुझे देखा। "समझे? इस गुमटी में चूल्हा उस दिन बुझेगा जिस दिन मेरी लाश उठेगी। चाय नहीं बिक रही, खैर। पानी पीने वाले तो आते हैं। पानी पर किसी का ठेका नहीं है।"

रज़िया पीछे बर्तन धो रही थी। उसने मेरी तरफ़ देखा और मुँह फेर लिया।

"रज़िया," शबनम आपा ने कहा।

"मैं कुछ नहीं बोली," रज़िया ने कहा।

"नहीं बोली, इसलिए बोल।"

रज़िया ने बर्तन पटक दिया।

"बोलूँ क्या?" वो बोली। "कि सारी गली डर गई है? कि सुबह जो मेरे पास चाय लेने आते थे, वो आज मुँह फेरकर निकल गए? कि मुझे बीस साल का सामान बाँधकर जाना पड़ेगा या नहीं? ये सब किसकी वजह से है? मैं तुझे दोष नहीं दे रही, अंकुश। पर मैं जानती हूँ कि जो फ़ाइलें घूम रही हैं, उनमें तेरा नाम है। और जिसके नाम वाली फ़ाइल आती है, उसके आसपास सब फटता है।"

"रज़िया।" शबनम आपा की आवाज़ सख़्त हुई।

"सच बोल रही हूँ," रज़िया ने कहा, और उसकी आँखें भर आईं। "मैं पंद्रह साल बाद लौटी हूँ। मैं दोबारा जाना नहीं चाहती।"

मैं कुछ नहीं बोला।

क्योंकि उसकी बात में वो ज़हर नहीं था जो गुस्से में होता है। उसमें डर था।

और डर से लड़ना, मुझे अब तक नहीं आता था।

दोपहर में उस्ताद अली बक्श की दुकान की खबर आई।

भोला भाई ने बताया कि सुबह दस बजे दो सफ़ेद कुर्ते वाले आए, मोटी फ़ाइल लिए। उन्होंने शटर पर बिना मुहर काग़ज़ पहले ही चिपका दिया था — "दो दिन में दुकान खाली"।

"उस्ताद ने क्या कहा?" मैंने पूछा।

"कुछ नहीं," भोला ने कहा। "बस अपनी मशीन पर से सफ़ेद कपड़ा उतारा, और फिर सिर्फ़ इतना कहा — 'मशीन दुकान में नहीं रहती। हाथों में रहती है।' और अपनी सुई निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ा दी।"

मैं उनकी दुकान पर गया।

शटर आधा था। मशीन पर फिर से सफ़ेद कपड़ा ढका हुआ था।

उस्ताद स्टूल पर बैठे थे। हाथ में कुछ नहीं।

"उस्ताद।"

"बैठ," उन्होंने कहा।

मैं बैठ गया।

"फ़ाइल वाले के हाथ में एक नाम था," उन्होंने कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे। "लाल स्याही में। मैंने पढ़ा नहीं। मुझे लगा, जो नाम लाल स्याही में लिखा जाता है, वो पढ़ने के लिए नहीं होता।"

"कोई अंदाज़ा?"

उस्ताद ने धीरे सिर हिलाया।

"जब पचास साल पहले मेरी दुकान जली थी," उन्होंने कहा, "उस रात भी किसी के हाथ में लाल स्याही में एक नाम था। उस दिन से मुझे लगता था कि मैंने अपनी दुकान बचा ली। आज पता चला, मैंने सिर्फ़ समय बचाया था।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"तू डरा हुआ है।"

"हाँ," मैंने कहा। "और यही सबसे बड़ी बात है।"

"प्रश्न क्यों?"

"क्योंकि अब तक मुझे अपना डर नहीं दिखता था," मैंने कहा। "आज सुबह स्कूल के गेट पर जब सानिया ने मुझे उस तरह देखा, तब मैं डरा। घंटी के चुप होने से नहीं। उसकी नज़र से।"

उस्ताद ने कुछ देर सोचा। फिर बोले।

"ठीक है, अब सुन। मशीन तोड़ने पर भी टाँका लगता है। जिस दिन तू यह समझ लेगा कि गली तेरे बिना भी चलेगी — उस दिन तू काम का हो जाएगा।"

"और उस दिन तक?"

"उस दिन तक," उन्होंने कहा, और सफ़ेद कपड़े को एक बार फिर सीधा किया, "तू हर रोज़ सुबह शटर उठाएगा। भले कोई न आए। शटर उठेगा, तो गली को पता रहेगा कि कुछ खुला है।"

चार बजे शाम को नल पर झगड़ा शुरू हुआ।

वजह छोटी थी — एक बाल्टी। सानिया के अब्बा ने पहले भरी, गुड्डू के पापा को लगा कि उनकी बारी थी।

मैं दुकान से सुनकर गया।

दोनों आमने-सामने थे। बाल्टियाँ ज़मीन पर। पानी फैल रहा था।

"तुम्हारी बारी कल थी," सानिया के अब्बा कह रहे थे।

"कल तुमने तीन बाल्टी भरी थीं," गुड्डू के पापा कह रहे थे। "तीन! घर में किसी को नहाए बिना ही…"

"मेरी बीवी बीमार है।"

"तो मेरी बीवी कुएँ से लाए?"

बीच में कई औरतें खड़ी थीं। कोई कुछ नहीं कह रही थी।

मैं बीच में गया।

"दोनों एक-एक बाल्टी," मैंने कहा। "पानी तो चलता रहेगा।"

दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।

और मुझे सबसे पहले यही सुनना चाहिए था — कि जब आदमी डरा हुआ हो, तो वो अपना डर उस पर निकालता है जो बीच में आए।

"तू चुप रह," सानिया के अब्बा ने कहा। "सब तेरी वजह से है। तूने ये शुरू किया।"

"मैंने क्या शुरू किया?"

"तेरी घंटी ने," गुड्डू के पापा ने कहा। "तेरी दुकान में चार दिन से कोई नहीं। तेरे पास से गुज़रते हैं तो लगता है कोई चीज़ पीछे खड़ी है। अब बता — ये सब क्यों?"

"क्योंकि साहब ने तुम डरवाया," मैंने कहा। "मुझे नहीं, तुम्हें।"

"साहब का नाम मत ले," सानिया के अब्बा ने कहा, आवाज़ भारी हो गई। "साहब ने मेरी बेटी के स्कूल की फ़ीस माफ़ की। साहब ने मेरी बीवी की दवा का काग़ज़ दिया। और तू क्या देता है? एक पुरानी घंटी और एक दुकान, जिसमें चार रुपये की भी नहीं कमाई होती।"

मैं चुप हो गया।

क्योंकि वो सच बोल रहा था। और सच का जवाब मेरे पास नहीं था।

मैंने झुककर दोनों बाल्टियाँ उठाईं। एक-एक में आधा पानी डाला। सानिया के अब्बा की तरफ़ बढ़ाई।

उन्होंने नहीं ली।

"मैं इसे नहीं लूँगा," उन्होंने कहा।

"लीजिए," मैंने कहा। "पानी से किसी का झगड़ा नहीं मिटता, पर बाल्टी न भरने से बच्चे प्यासे रहते हैं।"

उन्होंने बाल्टी ली। किसी और ने नहीं दी — मैंने उनके हाथ में रखी।

दूसरी गुड्डू के पापा को दी।

और मैं लौट गया।

पीपल के नीचे पहले ही मेज़ और बोर्ड हट चुके थे। ज़मीन पर धूल में एक चौकोर साफ़ निशान बचा था।

मैंने उसे देखा और लगा, ज़मीन याद रखती है।

छह बजे शाम को पटेल — वो ही पुराना सिपाही जो पहले भी मेरा नाम पूछ चुका था — दो जीपों के साथ आया।

उसे देखकर लोग अपने दरवाज़ों में लौट गए। बच्चे एकदम भाग गए।

"अंकुश यादव," उसने कहा। "बाहर आओ।"

मैं आया।

उसके हाथ में काग़ज़ था। मोटा, मुड़ा हुआ।

"ये पढ़ो," उसने कहा। "नहीं, मैं पढ़ देता हूँ। लिखा है — 'उक्त स्थान पर बिना अनुमति सभा, बोर्ड और केंद्र के माध्यम से भीड़ एकत्र करने की शिकायत मिली है। तीन दिन तक स्थान पूर्ण रूप से खाली रखा जाए। कोई बोर्ड, मेज़, कुर्सी या केंद्र नहीं। उल्लंघन पर उक्त व्यक्ति के नाम पर कार्रवाई होगी।'"

"मेरा नाम कहाँ लिखा है?" मैंने पूछा।

"काग़ज़ पर नहीं," उसने कहा। "पर नीचे तुम्हारी दुकान का नंबर है। और ये काफ़ी है।"

मैंने काग़ज़ देखा। बिना मुहर। बिना तारीख़। सिर्फ़ एक टाइप किया हुआ काग़ज़।

"ये बिना मुहर है," मैंने कहा।

"मुझे पता है," उसने कहा।

"तो फिर आप इसे लागू कैसे कर रहे हैं?"

वो मेरी तरफ़ मुड़ा।

और इस बार उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, जैसे वो अपनी ही बात बता रहा हो।

"बेटा," उसने कहा, "मेरे पास सिर्फ़ मुहर पूछने का हक़ है। सच का नहीं। जिस दिन मैं सच पूछना शुरू कर दूँगा, उस दिन ये वर्दी मेरी नहीं रहेगी।"

वो मुड़ा। दो सिपाहियों ने पीपल के नीचे कोई चीज़ नहीं मिली, क्योंकि सब हट चुका था। पर उन्होंने वहाँ की ज़मीन पर एक और पीला काग़ज़ चिपका दिया।

फिर जीप चली गई।

मैंने वो चिपका काग़ज़ पढ़ा। बिना मुहर वाला था।

"तीन दिन के लिए।"

मैं उसे फाड़ नहींा।

मैं उस काग़ज़ को देखता रहा और सोचता रहा — कि मैंने कब से गली से कुछ छुपाना शुरू किया। मैंने कभी सभा का बोर्ड नहीं लगाया था। मैंने मेज़ नहीं रखी थी। वो चबूतरी पर थी।

पर जब काग़ज़ पर तेरा नाम लिखने का इशारा हो जाए, तो सच से कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

सात बजे शाम को गली में वो सन्नाटा छा गया जो पहले कभी नहीं था।

नल की टप-टप। किसी दरवाज़े की कुंडी। किसी बर्तन की आवाज़।

पर बच्चों की आवाज़ नहीं।

न ठेला। न पतंग। न क्रिकेट की लकड़ी। न कोई हँसी।

मैं दुकान के बाहर खड़ा सुनता रहा। सात बजे स्कूल की छुट्टी होती है। गली में चालीस बच्चे निकलते हैं।

आज किसी ने नहीं निकला।

मैंने कहा, "काजल, गली में कोई बच्चा क्यों नहीं?"

काजल दुकान के अंदर बैठी थी, नर्सिंग की किताब लिए, पन्ना पलटती हुई रुक गई।

"अंकुश," उसने कहा, "तुझे नहीं लगता कि ये सब ज़्यादा हो गया?"

"क्या?"

"ये सब।" उसने किताब बंद कर दी। "ये घंटी, ये जोड़ देने की बात, ये उस्ताद, ये डॉक्टर, ये काग़ज़। चार महीने पहले हम सिर्फ़ साइकिल ठीक करते थे।"

"और अब?"

"और अब माँ की दवा दस दिन की है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ सपाट थी, "और अस्पताल में नई खेप रुकी है। और मुझे रोज़ लगता है कि मैं स्कूल जाने के बजाय अस्पताल जा रही हूँ, क्योंकि वहाँ कोई मरीज़ नहीं आ रहा।"

मैं चुप रहा।

"तू इसे समझ," वो बोली, "मैं तुझे दोष नहीं दे रही। पर मुझे ये भी नहीं चाहिए कि मेरा भाई गली के मुँह पर अकेला खड़ा रहे और सारी गली उससे आँख चुराए।"

वो अंदर चली गई।

मैं बाहर खड़ा रहा।

फिर मैंने जेब से घंटी निकाली।

सुबह जितनी ठंडी नहीं थी। मैंने महसूस किया।

मैंने उसे बजाया।

टन।

बस। पीतल की आवाज़। कोई शब्द नहीं।

मैंने फिर बजाया।

टन।

"सुन," मैंने कहा।

टन।

"सुन न।"

टन। टन।

मैंने उसे ज़ोर से बजाया। इतनी ज़ोर से कि हाथ दुखा। गली में आवाज़ गई और लौट आई।

कुछ नहीं।

कोई आवाज़ नहीं। कोई फुसफुसाहट नहीं। कोई "ठीक है" नहीं। कोई "नाम" नहीं।

सिर्फ़ मैं, और मेरी हथेली, और पीतल।

मैंने उसे रगड़ा। माथे से लगाया। कान से लगाया। मुँह के पास लाया। मैंने हिलाया। मैंने झटका दिया। मैंने कहा — "बोल, बोल न, तूने कल रात बोला था, तूने कहा था कि आज पानी पिलाने वाली…"

चुप।

पूरी चुप।

मेरा गला सूखने लगा।

मैंने बार-बार बजाया। फिर दुकान के अंदर गया। ट्रंक खोला। पेचकस निकाला। घंटी को खोलने की कोशिश की — नहीं खुली।

मैं बैठ गया। फ़र्श पर।

और मुझे पहली बार लगा कि मैं अकेला हूँ। सच में अकेला। कि ये जो चीज़ मेरे साथ थी, ये चली गई।

कुछ देर बाद कदमों की आवाज़ आई।

डॉक्टर इसरानी।

वो अंदर आए। फ़र्श पर बैठा देखा। मेरे हाथ में घंटी देखी। और कुछ कहने से पहले, वो मेरे पास बैठ गए।

"बजाई?" उन्होंने पूछा।

"हाँ।"

"क्या निकला?"

"टन।"

उन्होंने सिर हिलाया।

"जानता था।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। "आपको पता था?"

"मुझे नहीं पता था," उन्होंने कहा। "पर डर रहा था।"

वो उठे। बोतल से पानी लाए। मुझे दिया।

"सुन," उन्होंने कहा, "जब मैं जवान था, इस अस्पताल में एक कंपाउंडर था। सलीम। तुमने उसका नाम सुना?"

"हाँ।"

"वो मर गया," उन्होंने कहा। "और उसके जाने के बाद मैंने यहाँ काम करना बंद कर देना चाहा। अस्पताल बंद कर देना चाहा। पर मैं नहीं बंद कर पाया, क्योंकि सुबह आठ बजे दरवाज़े पर तीन मरीज़ खड़े होते थे।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"तुम्हारी घंटी का ईंधन जादू नहीं है, अंकुश। लोगों का भरोसा है। जब तक मोहल्ले में कोई एक आदमी किसी दूसरे आदमी पर भरोसा करता है, घंटी काम करती है। जिस दिन मोहल्ला चुप हो जाए — वो अपनी ज़ुबान बंद कर ले — घंटी भी चुप हो जाती है।"

"तो आज गली चुप हो गई," मैंने कहा। "इसीलिए?"

"हाँ," उन्होंने कहा। "आज गली ने तुझसे बात करना बंद किया। बच्चे नहीं आए। शबनम के यहाँ चाय कम बिकी। उस्ताद ने शटर पर कपड़ा डाल दिया। और सबसे बड़ी बात — आज किसी ने किसी को कुछ नहीं कहा। सुबह नल पर दो आदमी लड़े, पर किसी ने सच नहीं पूछा। भरोसा वहीं टूटा।"

मैंने घंटी मेज़ पर रख दी।

"फिर ये वापस आएगी?"

"नहीं।"

मेरा दिल धक्क से रह गया।

"नहीं, यह चीज़ वापस नहीं आएगी," उन्होंने कहा। "तू इसे वापस लाएगा।"

वो खड़े हुए।

"मैं तुझे एक बात बताता हूँ जो मैंने चालीस साल में सीखी," उन्होंने कहा। "जब कोई काग़ज़ कहता है कि ये तुम्हारा नहीं है, तुम काग़ज़ नहीं बदलते। तुम वो चीज़ बदलते हो जो काग़ज़ के पीछे बैठी है। और वो चीज़ है लोगों का डर।"

"और डर कैसे जाता है?"

"डर नहीं जाता," उन्होंने कहा। "डर की जगह कोई और चीज़ लेती है। और वो चीज़ है एक इंसान का दूसरे इंसान पर भरोसा। एक छोटा सा भरोसा भी काफ़ी है।"

वो जाने लगे। दरवाज़े पर रुके।

"कल सुबह नौ बजे," उन्होंने कहा, "मैं वो रजिस्टर खोलूँगा। जिसमें चालीस साल पहले एक नाम काटा गया था। उस्ताद को भी बुला लेना।"

"डॉक्टर साहब।"

"हाँ।"

"आज सुबह सानिया के यहाँ से बारह साल पुराना नाम मिला था। मैंने उन्हें उनका नाम से बुलाया। और उन्होंने मुझे पानी पिलाया।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"और घंटी ने क्या कहा?"

"एक छोटी आवाज़ की। जैसे ठीक है।"

डॉक्टर इसरानी मुस्कुराए। पहली बार, पूरे दिन में।

"तो घंटी मरी नहीं है," उन्होंने कहा। "वो सिर्फ़ सो रही है। तू इसे जगाने की जगह पीट रहा था।"

वो चले गए।

मैंने घंटी उठाई। और उसे मेज़ पर नहीं रखा। जेब में रखा।

फिर मैंने कॉपी खोली और लिखा —

"आज गली चुप हुई। काग़ज़ आए — बिना मुहर। स्कूल ने बच्चों को रोका। शबनम के यहाँ तीन ग्राहक। उस्ताद ने शटर पर कपड़ा डाल दिया। नल पर दो आदमी लड़े और दोनों ने मुझे डाँटा। पुलिस ने पीपल खाली करा दिया। आज गली में एक भी बच्चा नहीं बोला।

घंटी चुप हो गई। पूरी चुप। सिर्फ़ टन। मैंने उसे पीटा, रगड़ा, झटका दिया। कुछ नहीं।

डॉक्टर साहब ने कहा — घंटी मरी नहीं, सोई है।

सो, तो सुबह जगेगी। पर सूरज से नहीं। किसी एक भरोसे से।

आज रात एक बात तय है — मैं कल घंटी से सवाल नहीं पूछूँगा। मैं अपने हाथ से एक-एक दरवाज़े पर जाऊँगा और सिर्फ़ इतना पूछूँगा — चाय पिएगा?

अगर कोई एक भी हाँ कहे, तो काफ़ी है।"

मैंने कॉपी बंद की।

नौ बजकर कुछ मिनट।

गली के मुँह पर रोशनी आई। फिर आवाज़।

सफ़ेद गाड़ी।

इंजन चालू रहा। खिड़की उतरी।

मैं दुकान के बाहर था। खड़ा था।

खिड़की के किनारे हाथ टिका। काली अंगूठी।

और इस बार मैंने इंतज़ार नहीं किया।

"बोल," मैंने कहा।

अंदर से हल्की हँसी आई।

"तू आज थका लगता है," रणवीर ने कहा।

"बोल।"

वो चुप रहा। फिर बोला, आवाज़ बहुत साफ़, धीमी, जैसे कोई खाता समझा रहा हो।

"कल से इस गली में तेरा नाम नहीं, मेरा नाम होगा।"

मैंने सिर हिलाया। "ये तो कल भी कहा था।"

"कल की बात अधूरी थी," उसने कहा। "आज पूरी कर दूँ?"

वो कुछ सेकंड चुप रहा।

"जो नाम तू कल रात लेकर गया था," उसने कहा, "वो मैं आज तेरे हाथ से ले लूँगा। ज़ुबैदा। अच्छा नाम है। बारह साल से कोई नहीं बोलता। कल पूरी गली उसे बोलेगी। पर उस तरह नहीं जैसे तू बोला।"

मेरा हाथ जेब पर गया। उस काग़ज़ पर।

"और जब गली उसका नाम बोलेगी," उसने कहा, "तब वो तेरे पास नहीं आएगी।"

"तू ये कर भी नहीं सकता," मैंने कहा।

"मैं ये करने नहीं आया," उसने कहा। "ये तो हो जाएगा। मैं तो सिर्फ़ पूछने आया था — तेरी घंटी बोली?"

मैं चुप रहा।

"नहीं बोली," उसने धीरे कहा। "सही है। जब मोहल्ला सो जाता है, तो घंटी भी सो जाती है।"

मेरे भीतर कुछ ठंडा हुआ। वो जानता था। वो घंटी के नियम का सच जानता था — या उसका कोई हिस्सा।

"क्यों चुप हो गया?" उसने कहा।

"एक सवाल है," मैंने कहा।

"पूछ।"

"जब घंटी सो जाती है," मैंने कहा, "तो तेरे बक्से में बैठी चीज़ क्या करती है?"

बहुत देर चुप्पी।

फिर वो बोला, आवाज़ बदल गई थी — वो पहली बार बदली थी।

"तू जानता है कि मैं क्या करता हूँ, अंकुश? मैं नाम नहीं छीनता। मैं सिर्फ़ लोगों को उनके नाम की याद दिलाता हूँ। तू भूलता है, मैं याद दिलाता हूँ। इसीलिए तू तीस साल का लगता है और मैं चालीस का।"

"तू आज अंदर से थका हुआ लग रहा है," मैंने कहा।

खिड़की उतरी रही। मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"क्योंकि आज तूने वो किया है जो मैंने नहीं सोचा था," मैंने कहा। "तूने उनके नाम का इस्तेमाल किया। ये सौदा नहीं है। ये तेरी बेचैनी है। और जो आदमी एक औरत के नाम से धमकाता है, वो अपना सब कुछ नाम से ही गँवाएगा।"

वो चुप रहा।

फिर खिड़की ऊपर हुई।

गाड़ी आगे बढ़ी। दो मीटर। रुकी।

खिड़की फिर उतरी। और अंदर से उसने एक ही शब्द कहा।

"कल देखेंगे।"

गाड़ी चली गई।

रोशनी चली गई।

मैं गली में खड़ा रहा। जेब से घंटी निकाली।

उसे हथेली पर रखा।

और एक पल के लिए — मुझे लगा — जितनी ठंडी सुबह थी, उतनी ठंडी नहीं थी।

"अभी सो जा," मैंने कहा। "कल सुबह मैं तुझे नहीं बजाऊँगा। मैं गली में जाऊँगा। दरवाज़े खटखटाऊँगा। जो दरवाज़ा खुलेगा, वो तेरा।"

घंटी चुप रही।

पर गरम थी।

मैं दुकान के अंदर गया। बत्ती जलाई।

कॉपी खोली।

और लिखा —

"कल सुबह सबसे पहले उसके घर जाऊँगा जिसे इस गली ने चुप कर दिया है। ज़ुबैदा के घर। और उसके बाद सानिया के अब्बा के घर। और उसके बाद गुड्डू के पापा के घर। मैं किसी को 'भरोसा करो' नहीं कहूँगा। मैं सिर्फ़ चाय माँगूँगा।

क्योंकि घंटी वो नहीं बोलती जो मैं चाहता हूँ। घंटी वो बोलती है जो गली करती है।

और आज गली ने कुछ नहीं किया। इसीलिए वो चुप है।

कल दो इंसानों को कुछ करना पड़ेगा। छोटा सा। एक गिलास पानी। एक चाय। एक माफ़ी।

और फिर जब वो बोलेगी — मैं उसे सबसे पहले यही पूछूँगा:

गली को सुनाई क्यों नहीं देता कि ज़ुबैदा का नाम किसी काग़ज़ की मुहर नहीं है?"

मैंने कॉपी बंद की।

बत्ती बुझाई।

और सोने से पहले, अंधेरे में, मैंने घंटी उठाई और उसे कान से लगाया।

बहुत दूर, बहुत धीमी — जैसे समंदर को किसी ने सीप में भर दिया हो — कुछ सुनाई दिया।

एक साँस।

बस।

मैं मुस्कुराया और उसे तकिये के नीचे नहीं रखा।

गले में बाँधी — काजल के दिए धागे से, दो गाँठ।

ताकि जब सुबह खटखटाने जाऊँ, वो मेरे साथ हो।

दरवाज़े पर।

गली में।

और उस औरत के नाम के साथ, जिसे बारह साल बाद किसी ने फिर बोला था।

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