The Mysterious Bell – Chapter 351: jodne wala mistri hissa 036 ep351-360
मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। एक कदम, दो कदम। सील की सफ़ेद पट्टी मेरे सामने थी, दो नीली मुहरें, बीच में एक लकीर, जैसे गली और अस्पताल के बीच कोई तलवार रख दी गई हो।
फिर एक हाथ मेरे सीने पर आया।
न ज़ोर से, न धक्के से। बस हथेली भर का दबाव।
"रुकिए।"
मैंने ऊपर देखा। सफ़ेद कमीज़, नीला पैंट, कंधे पर कोई फीता नहीं, नाम की पट्टी नहीं। बस एक आदमी। चालीस के आसपास। आँखों में वो चीज़ नहीं थी जो डर में होती है — वहाँ सिर्फ़ थकान थी।
"यह सील है," उसने कहा। "अंदर जाने की इजाज़त नहीं है।"
"मेरी माँ अंदर हैं।"
"मुझे पता है।"
"तो फिर?"
उसने हाथ नहीं हटाया। "मुझे हुक्म मिला है। मेरे हुक्म से ज़्यादा मेरी नौकरी है। आप मुझे मजबूर मत कीजिए।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। उसकी नज़र बार-बार उस पट्टी पर जा रही थी जो उसने खुद बाँधी थी, और हर बार जाते वक़्त उसका जबड़ा कसता था। यह वो आदमी था जिसे इस काम के लिए चुना गया था — शायद इसलिए कि वो ज़्यादा बोलता नहीं था।
तभी पीछे से पैरों की आवाज़ आई।
रेहाना आपा। सिर पर सफ़ेद कपड़ा, हाथ में वो पुरानी दवा की पर्ची, जिसे वो पिछले चार घंटे से पकड़े हुए थीं — जैसे पकड़ना ही उनका काम हो।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "आवाज़ सच में आई थी।"
मैं मुड़ा।
"मैं अंदर थी," वो बोलीं। "मैंने अपने कानों से सुना। तुम्हारी माँ ने आधा गिलास पानी पिया, फिर पलंग की तरफ़ देखकर कहा — अंकुश। फिर उन्होंने कहा — अंदर आ। ये मैंने सुना। मैं उनके सिरहाने खड़ी थी।"
"और डॉक्टर इसरानी?"
रेहाना ने होंठ भींचे।
"डॉक्टर साहब ने पहले एक बार देखा, फिर मुझे बाहर भेज दिया। उन्होंने कहा कि आज सुबह चार बजे तक जो भी आवाज़ें आएँ, उनमें से आधी बुखार की होती हैं। और उन्होंने यह भी कहा —"
"क्या?"
"उन्होंने कहा, अंकुश को अंदर नहीं आने देना। जब तक काग़ज़ साफ़ न हो जाए, तब तक किसी को अंदर नहीं आने देना।"
मैंने एक पल सोचा। मैंने डॉक्टर इसरानी को जितना जाना था, उन्होंने ऐसी बात कभी नहीं कही होती। भीतर बंद रहकर, दोनों पुराने हाथों में मरीज़ और सील, वो डर रहे थे — यह मुझे समझ आ रहा था। डर उन्हें नहीं था कि मैं कुछ तोड़ दूँगा। डर उन्हें यह था कि कहीं मैं उनकी जगह न ले लूँ।
मैं वापस दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
"अंकुश —" रेहाना ने कहा।
"आपा, मैं टूटने नहीं आया," मैंने कहा। "मैं बस सुनना चाहता हूँ।"
सफ़ेद कमीज़ वाले ने मेरा रास्ता नहीं रोका, पर साथ-साथ चला। मैं दरवाज़े के बगल में चिपक गया, जहाँ पट्टी और चौखट के बीच एक उँगली भर की दरार थी। उस दरार से अंदर की हवा आ रही थी — दवा, साबुन, और पुराने कंबल की गंध।
फिर साँस की मशीन की आवाज़ आई। धीरे-धीरे, नियम से। और फिर उसके नीचे से, किसी जानी हुई आवाज़ की खाँसी — हल्की, दबी, जैसे कोई कपड़े से मुँह ढँक कर खाँसे।
मैंने होंठ दरार के पास रखे।
"माँ।"
खाँसी रुकी। फिर कोई हिला। फिर कपड़ा घिसकर बिस्तर की तरफ़ खिसका।
"अंकुश?" — आवाज़ बहुत दूर से आई। "तू आया?"
"मैं बाहर हूँ, माँ। दरवाज़े के पीछे।"
एक पल चुप्पी। फिर उन्होंने वो कहा जो मुझे उम्मीद नहीं थी।
"सील मत तोड़ना।"
मैं एकदम सीधा खड़ा हो गया।
"माँ, तुम्हें कैसे पता कि सील —"
"मुझे सब पता है।" उनकी आवाज़ में हवा कम थी। "डॉक्टर साहब ने मेरे पास काग़ज़ रखा था, वो पढ़ लिया। तू नहीं तोड़ेगा, ये मुझे पता है। पर मैं तुझे याद दिला रही हूँ। तोड़ना मत। उनके पास तेरा एक झूठ चाहिए और काग़ज़ बदल जाएगा। आज तोड़ा, तो कल तेरे ऊपर आएगा।"
मैंने माथा चौखट पर टिका दिया।
"तुम इतनी कमज़ोर आवाज़ में भी मुझे समझा रही हो?"
"मैं बीमार हूँ, बेवकूफ़ नहीं हुई।"
मुझे हँसी आनी चाहिए थी। आई भी — पर गले तक आकर रुक गई।
फिर माँ ने वो पूछा जो पूछने के लिए उन्होंने शायद दस दिन से अपने अंदर रत्ती-रत्ती जोड़कर रखा था।
"अंकुश, एक बात बता।"
"हाँ।"
"अच्छे काम का हिसाब उल्टा क्यों आता है?"
मैं चुप रहा।
"मैंने आज दिन में तीन बार सोचा," उन्होंने कहा। "तूने किसी को किसी से जोड़ा, तो तेरा दुश्मन बड़ा हुआ। तूने किसी का दर्द देखा, तो किसी और का दर्द बढ़ा। तूने एक दरवाज़ा खोला, तो तीन बंद हुए। ये कैसा हिसाब है, बेटा? अपनी माँ के मुँह पर भी यह क्यों चलता है?"
मैंने उँगलियाँ चौखट पर कस दीं।
"माँ, यह —"
"हे, सुन। मैं रोने को नहीं कह रही। मैं तुझे ये कह रही हूँ कि अगर हिसाब इसी तरह चलता है, तो मुझे मेरी बीमारी पर तरस नहीं आता। मुझे तुझ पर आता है। तू जिसे भी जोड़ता है, उसका उल्टा कहीं न कहीं बजता दिखता है। यह बात छोड़ मत दे। इसका जवाब ढूँढ।"
मैंने आँखें बंद कर लीं। मेरे अंदर कुछ ऐसा रेंग रहा था जो न डर था, न गुस्सा। एक बीज। जैसे बरसों से मैं एक कमरे में रोशनी डाल रहा था और उस रोशनी को झेलने के लिए कमरे के सबसे अंधेरे कोने में कोई बैठा हुआ था — जो जितनी रोशनी बढ़ती थी, उतना ही फैलता था।
"माँ," मैंने धीरे से कहा। "मैं वादा करता हूँ।"
"क्या?"
"इस उल्टे हिसाब का जवाब मैं ढूँढूँगा। और मैं अकेला नहीं ढूँढूँगा। अब मैं तुम्हें भी उसमें शामिल कर रहा हूँ।"
माँ एक पल चुप रहीं। फिर उन्होंने कहा — और मुझे यह उम्मीद नहीं थी कि इतनी कमज़ोर आवाज़ में कोई इतनी साफ़ बात कह सकता है।
"अच्छा किया। मैं थक गई थी सिर्फ़ बीमार होकर।"
फिर साँस की मशीन ने उनकी आवाज़ के बीच आकर सब कुछ ढक दिया।
मैं दरवाज़े से हटा।
"माँ को आराम मिले," सफ़ेद कमीज़ वाले ने कहा। उसकी आवाज़ में पहले जैसी कड़क नहीं थी।
"आपका नाम?"
"रामलाल बाबा के रिश्तेदार नहीं हैं," उसने कहा। "मैं ज़िले के सिपाही भेजे गए लोगों में से नहीं हूँ। मुझे अस्पताल के संरक्षण के लिए रखा गया है। तीन दिन का काम है। तीन दिन बाद मैं फिर उसी मोहल्ले के नुक्कड़ पर बैठूँगा जहाँ से आया हूँ।"
"और उन तीन दिनों में?"
"तीन दिनों में मैं सिर्फ़ वो करूँगा जो काग़ज़ पर लिखा है।"
मैंने एक पल उसे देखा। फिर मैंने पीछे मुड़कर देखा कि कितने लोग खड़े हैं।
शालिनी, मीरा, टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू, भोला भाई, किशनलाल काका, नसीमा बाई, रमेश भाई, उस्ताद अली बक्श, शबनम आपा। और उनके पीछे बूढ़ी मैडम की झलक, जो अस्पताल की पहली मंज़िल की खिड़की से नीचे देख रही थीं।
सारी गली।
और मेरे सामने एक सफ़ेद कमीज़ वाला पहरेदार, जो तीन दिन का है।
मैंने रेहाना आपा की तरफ़ देखा।
"आपा, डॉक्टर साहब से एक बात कहिए। कहिए कि मैंने सील नहीं तोड़ी, आवाज़ सुनी, और पीछे हट गया। और यह भी पूछिए कि अगर माँ आधा गिलास पानी पी सकती हैं, तो पूरा गिलास कब पीएँगी।"
रेहाना की आँखों में पानी आया, पर वो मुस्कुराईं — वो हँसी जो बीमार लोगों के पास बैठकर सीखी जाती है।
"अच्छा।"
वो अंदर चली गईं।
मैं मुड़ा। मेरे पीछे शालिनी आ खड़ी थीं। उनके हाथ में वो मोटी काली फाइल थी, और आँखों में वो लाल लकीरें जो रात भर जागने से बनती हैं।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "जज साहब का मुहर लगा आदेश हमारे पास है। सील तोड़ने की इजाज़त सिर्फ़ उस पन्ने के लिए है, जो नीचे वाले कमरे में मिलेगा। अगर हम उसे गवाह के साथ निकालते हैं, तो अदालत का रास्ता साफ़ है। पर एक बात —"
"क्या?"
"अगर हम उसे जल्दी निकालते हैं, तो उनके पास वक़्त नहीं होगा। और जो वक़्त के लिए खेलते हैं, उन्हें खुद चलना पड़ता है।"
मैंने सिर हिलाया।
"समझ गया। आज दोपहर।"
"कब?"
"मशीन के रुकने से पहले।"
फिर मैंने रेहाना आपा की बात दोबारा अपने दिमाग़ में उठाई। चाबी। चाबी कहाँ रखी जाती है। मेरा हाथ जेब में गया। घंटी ठंडी थी। बर्फ़ जैसी नहीं — बस ठंडी।
"माँ," मैंने दरवाज़े की तरफ़ वापस देखते हुए धीरे से कहा, "तूने सही पूछा।"
मैं पीछे मुड़ा।
और तभी मेरी नज़र उस सफ़ेद कमीज़ वाले पर पड़ी।
वो अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाल रहा था। बहुत छोटा काग़ज़। किसी दुकान की पर्ची जैसा। वो उसे खोलकर हथेली पर रख लिया, फिर जेब से ही पेंसिल निकाली, और उस पर एक नाम लिखने लगा।
पेंसिल धीरे चल रही थी। जैसे कोई खुद नहीं जानता कि वो सही लिख रहा है या ग़लत।
मैं एक पल को रुका। उसने मुझे नहीं देखा।
फिर काग़ज़ हथेली से उतरकर उसकी जेब में चला गया।
"ये लिख क्या रहे थे?" मैंने पूछा।
रामलाल बाबा ने सिर उठाया। उनकी आँखों में एक पल के लिए जो चीज़ आई, वो डर नहीं थी। वो यह थी — जैसे किसी ने उन्हें किसी ऐसी चीज़ के लिए मजबूर किया हो, जिसे वो खुद भी नहीं चुनते।
"कुछ नहीं," उन्होंने कहा। "लोगों के नाम लिखता हूँ। जो मिलने आते हैं।"
"और अभी किसका नाम लिखा?"
"आपका।"
मैंने सिर हिलाया।
"अच्छा। फिर मेरे नाम के साथ यह भी लिख देते कि आज सुबह सील के सामने मैंने एक आवाज़ सुनी, और मैंने सील नहीं तोड़ी।"
उसके होंठ हिले, पर कुछ नहीं निकला।
"अंकुश," शालिनी ने धीरे से कहा। "काग़ज़ ज़रूरी है, पर सोच-समझकर।"
"सोच रहा हूँ," मैंने कहा। "पर अभी मुझे एक बात समझ में नहीं आ रही।"
"क्या?"
"मैं जब भी किसी को जोड़ता हूँ, कुछ न कुछ कहीं ज़रूर टूटता है। सल्लू चाचा का नाम रद्द हुआ, माँ की दवा घटी, गली का शटर गिरा, भवन की सीढ़ी बंद हुई। यह एक-दो बार नहीं हो रहा। बार-बार हो रहा है। और जितना मैं जोड़ता हूँ, उतना ही किसी और का हिसाब बढ़ता जाता है।"
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पहले कुछ सोचने वाली झलक आई, फिर वो झलक उतरकर किसी और चीज़ में बदल गई — किसी ऐसी चीज़ में जो वकील बनने से पहले हर इंसान एक बार देखता है।
"यह सवाल है," उन्होंने कहा। "और जिस दिन इसका जवाब मिलेगा, उस दिन यह शहर का नक़्शा बदल जाएगा।"
"तो जवाब कहाँ मिलेगा?"
"वहीं जहाँ हिसाब रखा जाता है," उन्होंने कहा। "जहाँ से चाबी गई।"
मैंने गले से नीचे तक साँस खींची।
अब मेरी नज़र आँगन के उस कोने पर गई जहाँ भोला भाई, रफ़ीक़ और चिंटू मिलकर कुछ ठीक कर रहे थे। काजल के पास वो पुरानी नर्सिंग दवा की थैली थी और उसने गुड्डू को कुछ समझाया। सानिया अपनी लाल कॉपी में कुछ लिख रही थी। बूढ़ी मैडम पहली मंज़िल की खिड़की से नीचे देख रही थीं, और जैसे ही मैंने उनकी तरफ़ देखा, परदा हिल गया।
फिर मैंने सफ़ेद कमीज़ वाले की तरफ़ मुड़कर देखा।
"रामलाल बाबा," मैंने कहा। "तीन दिन की नौकरी है?"
"हाँ।"
"तीन दिन में मुझसे एक बार बात करेंगे?"
"क्या बात?"
"वो लोग जो आपको नाम लिखने को कहते हैं, वो कौन हैं? और उनके पास यह काग़ज़ कहाँ से आता है?"
उसने मेरी तरफ़ देखा। इस बार उसकी आँखों में थकान के साथ एक और चीज़ आई — दया जैसी, पर दया नहीं। जैसे किसी बूढ़े ने किसी नए से कहा हो — तू अभी छोटा है, ये रास्ता लंबा है।
"तीन दिन में," उन्होंने कहा, "अगर तुम उस पन्ने के साथ बाहर निकले, तो मैं तुमसे एक बात कहूँगा।"
"और अगर नहीं निकला?"
"तो तीन दिन बाद मैं वो काग़ज़ फाड़कर फेंक दूँगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो पन्ना खुल जाए, उसके साथ नाम रहते हैं। और जो पन्ना बंद रहे, उसके साथ कोई नाम नहीं होना चाहिए।"
मुझे उसकी बात पूरी समझ नहीं आई। पर मैंने सिर हिला दिया — क्योंकि कभी-कभी आदमी को पूरी बात न समझने पर भी सिर हिलाना पड़ता है, वरना सामने वाला बोलना बंद कर देता है।
तभी मेरी जेब से एक आवाज़ आई।
बहुत हल्की। ठंडी। एक टिक जैसी।
मैंने हाथ जेब में डाला। घंटी की सतह पर उँगली फिसल गई, जैसे ठंडे पत्थर पर।
फिर मेरे कान के अंदर, बहुत धीमी आवाज़ में, घंटी ने कहा:
"जोड़ा, तो किसने खाया?"
मैं एक पल के लिए जम गया।
यह वो आवाज़ नहीं थी जो पहले आती थी। पहले घंटी कहती थी — बोल, देख, खोल। ये आवाज़ किसी के कान में फुसफुसाने जैसी नहीं थी। यह किसी के पेट की आवाज़ थी। जैसे किसी ने मेरे ही जोड़ों का हिसाब चुरा लिया हो, और अब बता रहा हो कि चोर कहीं और बैठा है।
मैंने घंटी को मुट्ठी में दबाया।
"कौन?" मैंने धीरे से पूछा। "किसने खाया?"
घंटी चुप रही।
"फिर कब बोलेगी?"
अब भी चुप्पी।
केवल इतना एहसास हुआ कि घंटी अब उन्हीं तीन शब्दों के बोझ से और ठंडी हो गई है, जैसे उसने एक नाम लिया हो और उसे अपने अंदर छिपा लिया हो।
मैंने एक पल के लिए आँखें बंद कीं, फिर खोलीं।
मैंने शालिनी की तरफ़ देखा।
"मुझे पीछे वाले प्लॉट पर जाना है।"
"अभी?"
"हाँ। ज़मीन का काग़ज़ कहाँ से बना, वहाँ पहले वो देखना है।"
शालिनी ने घड़ी देखी। फिर मेरी तरफ़ देखा।
"और तुम्हारी माँ?"
"वो अपना काम कर रही हैं," मैंने कहा। "मुझे बताने के लिए वो आईं — सील मत तोड़ना। और अब मुझे उनकी बात का जवाब देना है।"
मैंने पीछे मुड़कर सफ़ेद कमीज़ वाले की तरफ़ देखा।
"रामलाल बाबा।"
"हाँ।"
"अगर आप मेरी तरफ़ से कुछ पूछना चाहें, तो मैं अपने काम में लगा हूँ। पर काग़ज़ तीन दिन का है। मेरे पास उससे कम है।"
"कितना?"
"मुझे नहीं पता।"
"तो फिर —"
"तो फिर मैं चलता हूँ।"
और मैं मुड़ गया।
जैसे ही मैंने पहला कदम उठाया, मेरी जेब से फिर वही टिक आई। छोटी। ठंडी। किसी के नाखून की आवाज़ जैसी।
फिर कुछ नहीं।
मैंने हाथ जेब पर रखा। फिर हटा दिया।
और मैंने शालिनी से कहा — "मीरा को बोल दो कि उसी तरह पीछे से चले। भोला भाई को साथ रखो। टिंकू और बच्चों को अस्पताल के आँगन में ही रहने दो। और उस्ताद —"
"उस्ताद क्या?"
मैंने एक पल सोचा। "उस्ताद को कहना कि वो अपनी दुकान की तरफ़ से कोई काग़ज़ लेकर आएँ। जिस पर स्याही वो नहीं जो कल की हो। जिस पर हमारे हाथ न हों।"
शालिनी ने लिखने के लिए काग़ज़ निकाला। मैंने उनका हाथ थाम लिया।
"लिखने की ज़रूरत नहीं," मैंने कहा। "मौखिक कह दो। अगर इस गली में कुछ है जो स्याही में फँस जाता है, तो वो हमारा काम है।"
शालिनी ने सिर हिलाया। काग़ज़ वापस जेब में गया।
मैं चल पड़ा।
मैंने पीछे मुड़कर देखा नहीं।
पर सफ़ेद कमीज़ वाले की छाया मेरे कान के पीछे दरवाज़े की चौखट पर पड़ी रही — एक सीधी, ठंडी लकीर, जो मेरे कदम के साथ लंबी होती जा रही थी।
मैंने आँगन की धूल में अपने जूतों के निशान देखे। जैसे कोई मेरे रास्ते पर चल रहा हो। पर मेरे पीछे कोई नहीं था। सिर्फ़ शालिनी, दस कदम पीछे, फाइल लिए।
आँगन के बीच में, जहाँ सील की सफ़ेद रोशनी पड़ रही थी, एक लड़की खड़ी थी — सफ़ेद कपड़े में, हाथ में पतली पुरानी कॉपी। मैंने उसे पहले नहीं देखा था।
"तुम अंकुश हो?" उसने पूछा।
"हूँ।"
"मैं हमीदा दाई की बेटी का रिश्तेदार हूँ। जो काग़ज़ तुम्हें दिया गया, वो पूरा नहीं है।"
मैंने कदम रोक लिए।
"क्या मतलब?"
"तुम्हारे पास जो आधा जला काग़ज़ है न," उसने कहा। "वो एक काग़ज़ का आधा हिस्सा है। आधा और है। और उसमें एक नाम है जो तुम्हारे अपने घर का है।"
मैंने शालिनी की तरफ़ देखा।
"ये कब आई?" मैंने पूछा।
"मैंने इसे अन्दर आते नहीं देखा," शालिनी ने कहा।
लड़की ने कॉपी मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
"यह मुझे अपनी माँ की अलमारी में मिली," उसने कहा। "इसमें सुशीला यादव का नाम है। और नीचे एक लाइन है, जो मेरी माँ की लिखाई नहीं है।"
मैंने कॉपी ली। काग़ज़ हल्का था — इतना हल्का कि जैसे उसका कोई वज़न ही न हो। उसमें सिर्फ़ एक पन्ना था। और उस पन्ने पर मेरी माँ का नाम।
"तुम्हारी माँ कौन है?" मैंने पूछा।
"वो जो तीन दिन पहले अस्पताल के रसोई में काम करती थीं," उसने कहा। "और जिन्हें कल रात से काम पर नहीं आने को कहा गया है।"
मैंने शालिनी की तरफ़ देखा। फिर उस लड़की की तरफ़।
"और उस लाइन में क्या लिखा है?"
"उसमें लिखा है," उसने धीरे से कहा, "कि जो नाम जोड़ता है, उसका नाम पहले लिखा जाता है।"
मैं कुछ कहने ही वाला था कि मेरी जेब से, तीसरी बार, वो टिक आई। और इस बार टिक के साथ एक हल्की सी गरमी भी थी, जो पहले नहीं थी।
मैंने हाथ जेब में डाला।
घंटी अब भी ठंडी थी, पर उसकी सतह पर, जहाँ कल नई काली लकीर उभरी थी, वहाँ अब दो लकीरें थीं, बीच में एक बिंदु।
और घंटी के अंदर से, बहुत दूर से, धीमी आवाज़ में तीन शब्द आए, जो पहले कभी नहीं आए थे:
"अब मुझे भी भूख लगी है।"
मैंने घंटी को मुट्ठी में दबाया।
"क्या कहा तूने?"
घंटी चुप हो गई।
मैं धूल में खड़ा रह गया। मेरे सामने वो लड़की थी, जिसके हाथ में मेरी माँ का नाम लिखा एक पन्ना था। मेरे पीछे सफ़ेद कमीज़ वाला पहरेदार खड़ा था, जिसकी जेब में मेरा नाम लिखा एक काग़ज़ था। और मेरी जेब में वो घंटी थी, जो अब पहली बार अपनी भूख बोल रही थी।
मैंने शालिनी की तरफ़ देखा।
"ये सब —"
"अंकुश," उन्होंने धीरे से कहा, "तुम्हारी माँ ने तुमसे जो पूछा, वो अब हमें सबसे पहले जवाब देना पड़ेगा।"
मैंने सिर हिलाया।
मैंने उस लड़की से कहा — "तुम मेरे साथ चलो। काग़ज़ अपने पास रखो। जब तक मैं तुम्हें न कहूँ, किसी को नहीं देना।"
"और अगर कोई छीनने आए?"
मैंने उसकी ओर देखा।
"तो पहले मुझे छीनेगा।"
उसकी आँखें भर आईं — पर वो रोई नहीं। वो गली में पली लड़की थी। जिसे रोना नहीं आता, चुप होना आता है।
हम आँगन से बाहर निकले।
और जैसे ही मैं गली के मोड़ पर पहुँचा, मेरी जेब में घंटी ने एक आख़िरी बार कहा, इतनी धीमी आवाज़ में कि शायद मैंने ही सुना —
"जोड़ा, तो किसने खाया?"
मैंने एक पल के लिए कदम रोक लिया।
कहीं दूर, पीछे वाले प्लॉट से मशीन के टायर की रगड़ आ रही थी — वो धीमी, भारी आवाज़, जो अब हमारे पास रुकी हुई थी, पर जिसे रोकने वाला पापा अब भी वहीं कुछ कर रहे थे, जो मुझे नहीं पता।
मैंने गहरी साँस ली।
"चल," मैंने शालिनी से कहा।
और हम चल पड़े।
पर मेरे अंदर, जहाँ कल तक सिर्फ़ एक घंटी बजती थी, अब एक और चीज़ बज रही थी — एक ऐसा सवाल, जिसका जवाब शायद मेरी गली में नहीं, मेरे ही हाथों में था।
जो जोड़ता हूँ, वो कहाँ जाता है?
और जो खा रहा है, वो क्या मेरे ही हाथ से खा रहा है?
॥
"जोड़ा, तो किसने खाया?"
गली के मोड़ पर मेरी जेब से यह आवाज़ आई और मेरे पाँव अपने आप रुक गए।
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा। "क्या हुआ?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "घंटी को आज सुबह से बोलने का ज़्यादा मन है। जैसे उसने भी रात भर की नींद पूरी कर ली हो।"
वो लड़की मेरे पीछे खड़ी थी, कॉपी सीने से चिपकाए। उसकी आँखें मेरी जेब पर टिकी थीं, जैसे उसे भी लग रहा हो कि जेब में कोई ज़िंदा चीज़ बैठी है।
"तुम्हारा नाम क्या है?" मैंने पूछा।
वो एक पल रुकी। फिर बोली, "भैया, मेरा नाम बाद में पूछिएगा।"
"नाम में क्या रखा है?"
"नाम में बहुत कुछ रखा है।" उसने कॉपी अपनी बाँहों में और कस ली। "जिस काग़ज़ पर मेरी माँ की लिखाई नहीं है, उस पर मेरी माँ का नाम है। और उसके नीचे लिखा है कि जो नाम जोड़ता है, उसका नाम पहले लिखा जाता है। तो मैं अपना नाम नहीं बताऊँगी। जब तक आप इसे साफ़ नहीं करते।"
मैं उसे देखता रह गया।
गली में लड़कियाँ ऐसे ही बड़ी होती हैं। पहले चुप रहना सीखती हैं, फिर बोलना — और जब बोलती हैं तो सीधे हड्डी पर।
"ठीक है," मैंने कहा। "तू बता, तेरी माँ कहाँ है अभी?"
"घर पर। कल रात से रो रही है। उसने कहा कि अस्पताल की रसोई में अब नहीं जाना, और मुझे किसी से कुछ नहीं बताना। पर मैंने सोचा, अगर मैं नहीं बताऊँगी तो कौन बताएगा?"
"अच्छा किया।" मैंने उसके सिर पर हाथ रखा, फिर हटा लिया — क्योंकि मेरे हाथ में ग्रीस थी और वो गली की बच्ची थी। "चल, शबनम आपा के यहाँ चल। वहाँ तू बैठेगी, और जब तक मैं न कहूँ, कोई काग़ज़ नहीं दिखाना।"
"और अगर कोई छीनने आया?"
"तो पहले मुझे छीनेगा।"
उसने सिर हिलाया। और हम चल पड़े।
रास्ते में शालिनी धीरे से बोलीं, "अंकुश, आज दोपहर की बात भूल मत जाना। मशीन जब तक रुकी है, पीछे का प्लॉट देखना है।"
"भूला नहीं," मैंने कहा। "बस सुबह ही से कुछ ऐसा लग रहा है कि आज दिन मेरा नहीं, किसी और का है।"
दुकान पहुँचा तो पापा वहीं बैठे थे।
कमीज़ की आस्तीन चढ़ी हुई, हाथों में काली ग्रीस, और चेहरे पर वो थकान जो पूरी रात की होती है — बिना सोए नहीं, उठकर कुछ किए बिना।
"मशीन?" मैंने पूछा।
"टायर में हवा डाल दी," पापा ने कहा। छोटे वाक्य। "वाल्व भी ठीक कर दिया।"
मैं सुनकर रुक गया। "किसने?"
"पता नहीं। सुबह जाकर देखा तो टायर कड़ा था। मैंने पंप माँगा, और उन्होंने कहा कि हमने तो अपने आप भर दिया।" पापा ने हाथ पोंछा। "कल सुबह छह बजे मशीन चलेगी। काग़ज़ से पहले नहीं चलेगी, ऐसा उनका कहना है।"
मेरे पीछे शालिनी ने गहरी साँस ली।
तो सरकारी शर्त भी एक दिन की रह गई।
"पापा," मैंने कहा, "आप आज घर जाकर सो जाइए। मुझे आपकी ज़रूरत शाम को होगी।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। कुछ देर देखते रहे, जैसे मेरे चेहरे पर कोई लकीर खोज रहे हों।
"बेटा," उन्होंने कहा, "जो काम आज करेगा, वो अकेले मत करना।"
"नहीं करूँगा।"
"कह के नहीं, कर के दिखाना।" वो उठे और ट्रंक से अपना पुराना रिंच उठाकर ले गए — जाने किस चीज़ के लिए। पुरानी आदत।
शबनम आपा ने लड़की को देखा, फिर उसकी कॉपी देखी, फिर उसका हाथ पकड़कर गुमटी के पीछे वाले स्टूल पर बैठा दिया।
"यहाँ बैठ," आपा ने कहा। "मेरी गुमटी में आज तेरे सिवा कोई नहीं छूएगा। चाय पीती है?"
"नहीं।"
"तो पानी पी।" आपा ने कटोरी में पानी दिया और गर्म चिमटी अपने हाथ में उठाकर मेरी तरफ़ देखा। "अंकुश, ये बच्ची आज तक जो काग़ज़ लाई है, वो सबसे भारी काग़ज़ है जो तेरी दुकान पर आया। देख लेना।"
"देख रहा हूँ, आपा।"
"देखना और है," आपा ने कहा, "और मान लेना और है।"
मैं गुमटी के बाहर आया।
और तभी पीपल की तरफ़ से आवाज़ आई — बच्चों की चीख, फिर "छोड़ दे, छोड़ दे", फिर किसी लड़के की तेज़ हँसी।
मैं दौड़ा।
चबूतरी के पास टिंकू और एक लड़का आमने-सामने खड़े थे। बीच में एक बल्ला था — टेप से मढ़ा, दो जगह से कील ठोंका हुआ, हमारी गली का सबसे पुराना बल्ला। दोनों के हाथ उसी पर थे।
लड़का टिंकू से उम्र में बड़ा था, कद में भी। पतला, मुँह पर हल्की फुन्नी, और कमीज़ का एक कॉलर फटा हुआ।
"गोलू बेटा, वो वापस कर," सानिया चिल्ला रही थी।
"पहले ये कहे कि मैंने हँसा क्यों?" गोलू ने कहा। "मैंने तो कुछ नहीं कहा था।"
"तूने मेरे जूते देखे!" टिंकू बोला। उसकी आवाज़ काँप रही थी। "तूने मेरे जूतों पर हँसा! तूने कहा — उस्ताद के शागिर्द के पैर भी उस्ताद जैसे ही फटे हैं!"
"मैंने मज़ाक किया था।"
"मज़ाक मेरे जूतों पर बाद में करना। पहले मुझसे कहना!"
गोलू ने बल्ला झटक दिया। टिंकू का हाथ धूल पर खिंचा और फिर वो भी उस पर चढ़ गया।
मैं दोनों के बीच में घुसा, एक को कंधे से पकड़ा, दूसरे का कलाई पकड़ी।
"अरे ओ," मैंने कहा, "बल्ला तोड़ना है तो कम से कम मेरी दुकान पर आकर तोड़ो। वहाँ ज़मीन मेरी है, तोड़ने का हिसाब भी मैं लिख दूँगा।"
दोनों एक पल रुके।
"और अगर गला फाड़ना है," मैंने आगे कहा, "तो शबनम आपा की गुमटी जाओ। वहाँ गला सबसे ज़्यादा चलता है, और चाय का बहाना भी बन जाएगा।"
गोलू ने बल्ला छोड़ दिया। टिंकू ने उसे छीनकर सीने से लगाया।
"हमारी लड़ाई तुमसे नहीं है, भैया," गोलू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ढीठपन था जो डरे बच्चों की आवाज़ में आ जाता है। "हमारी लड़ाई इससे है। ये दुकान पर बैठता है, उस्ताद-उस्ताद करता है, और अब हमें ऐसे देखता है जैसे हम कुछ भी नहीं।"
"झूठ!" टिंकू चिल्लाया।
"झूठ नहीं। कल तूने हमें पतंग के पैसे माँगने पर यह कहा था कि मेरे पास वक़्त नहीं। वक़्त नहीं है! भई, यह दुकान के और पुर्ज़ों के वक़्त ही निकालता है!"
टिंकू की आँखें भर आईं, पर उसने आँसू पोंछ लिए। ज़ोर से पोंछे, जैसे गुस्से से।
"अच्छा," मैंने कहा। मैंने चारों तरफ़ देखा — सानिया, चिंटू, रफ़ीक़, गुड्डू, दो और बच्चे, और पीपल की चबूतरी पर बैठे दो बुज़ुर्ग जो बहाने से अख़बार पढ़ रहे थे। "अच्छा, दोनों चबूतरी पर बैठो।"
"क्यों?" गोलू ने कहा।
"क्योंकि मैं कह रहा हूँ।" मैंने बल्ला टिंकू से लिया और चबूतरी के बीच रख दिया। "अब सुनो। ये बल्ला मेरा है। बचपन से है। इसमें दो कील मैंने खुद ठोंकी हैं और एक टेप माँ ने लपेटा है। अब मैं कहता हूँ कि जब तक तुम दोनों यहाँ बैठकर एक-एक सच्ची बात नहीं बोलते, ये बल्ला किसी को नहीं मिलेगा। और अगर कोई झूठ बोला, तो समझ लेना ये बल्ला हमेशा के लिए टूटा।"
"भैया, ये तो बस बल्ला है," चिंटू ने कहा।
"हाँ बेटा," मैंने कहा। "बस बल्ला है। इसीलिए तो बात कर रहा हूँ।"
दोनों बैठ गए। टिंकू पहले नहीं बैठा। फिर मेरी तरफ़ देखा और बैठ गया।
"गोलू पहले," मैंने कहा।
गोलू ने मुँह फेरा। "मैं क्या बोलूँ?"
"जो बच्चों के बीच में कहने से डरता है।"
वो चुप रहा। उसने अपनी फटी कमीज़ की तरफ़ देखा, फिर धूल।
"मुझे जलन होती है," उसने धीरे से कहा।
"किससे?"
"इससे।" उसने टिंकू की तरफ़ सिर हिलाया। "ये दुकान पर बैठता है, आपके साथ चलता है, बड़े लोग इसका नाम लेते हैं। मेरे अब्बा साइट पर सीमेंट ढोते हैं। सुबह छह बजे निकलते हैं, रात नौ बजे आते हैं, और फिर भी जब कभी कोई घर में पूछता है कि क्या करते हो, तो अब्बा कहते हैं — बस, मज़दूरी। मैंने कभी किसी को यह कहते नहीं सुना कि गोलू का अब्बा। सिर्फ़ मज़दूरी। और मुझे लगता है कि अगर मेरे पास भी कोई उस्ताद होता, तो मेरा नाम भी होता।"
पीपल की पत्तियाँ हिलीं। किसी ने कुछ नहीं कहा।
"अब तू," मैंने टिंकू से कहा।
टिंकू ने बल्ले की तरफ़ देखा। उसके हाथ में अभी भी उसकी गरमी थी।
"मुझे डर लगता है," उसने कहा।
"किस बात का?"
"कि कोई मुझे भूल जाएगा।" उसकी आवाज़ बैठ गई। "पापा चले गए, तब माँ ने कहा कि अब तू ही सब कुछ है। और मैं सोचता हूँ — अगर मैं भी चुप हो गया, अगर मैं भी बस बैठ गया, तो किसी को फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। जब मैं दुकान पर कुछ करता हूँ, जब भैया मुझे बुलाते हैं, तब लगता है कोई मुझे याद रखेगा।" उसने गोलू की तरफ़ देखा। "इसलिए जब तूने मेरे जूतों पर हँसा, तो लगा तूने मेरे होने पर हँसा।"
गोलू ने उसकी तरफ़ देखा।
"तेरे जूते फटे हैं," उसने कहा।
"हाँ।"
"और मेरी कमीज़।"
"हाँ।"
दोनों एक साथ हँसे। वो हँसी थोड़ी देर रही, फिर हल्की पड़ गई, जैसे एक साँस में आई और चली गई।
"हाथ मिलाओ," मैंने कहा।
दोनों ने हाथ मिलाया। गोलू ने पहले हाथ बढ़ाया, फिर टिंकू ने।
और तभी मेरी जेब से आवाज़ आई।
न ज़ोर से, न धीरे। ठीक वैसे ही जैसे कोई किसी और के कमरे में गुनगुना रहा हो।
मैंने झट से चबूतरी पर रखे बल्ले की तरफ़ देखा।
दोनों कीलें चटककर बाहर आई थीं और वहीं गिरी थीं। टेप जगह से हिला था। और बल्ला — जो चटका हुआ था, जिस पर बच्चे मुँह बना रहे थे — वहीं, उसी जगह, अपने आप जुड़ गया था। अंदर से जुड़ा। बाहर कुछ नहीं दिखता था। जैसे दो हड्डियाँ एक हो जाएँ।
सानिया ने मुँह पर हाथ रख लिया।
"भैया —"
"कुछ नहीं हुआ," मैंने कहा। "बल्ला पुराना था।"
पर मेरी जेब में घंटी हल्की बजी।
"छोटा जोड़," उसने कहा। "बारह।"
और यह कहते हुए उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो पहले नहीं थी। जिससे मुझे अच्छा लगने की जगह ठंड लगी।
मैंने बल्ला उठाया। उसे सबसे पहले मैंने टिंकू को दिया, फिर टिंकू ने गोलू की तरफ़ बढ़ा दिया।
"अब तू," टिंकू ने कहा। "एक दिन तू बता देना।"
गोलू ने बल्ला लिया और उसका वज़न हाथ में लेकर खड़ा रह गया।
"तेरे अब्बा से कहना," मैंने धीरे से कहा, "कि एक दिन हमारी गली की तरफ़ भी देखें। साइट पर सब कुछ सीमेंट नहीं होता।"
गोलू ने मेरी तरफ़ देखा, फिर सिर हिलाया और चला गया। जाते वक़्त उसने एक बार पीछे मुड़कर टिंकू को देखा।
टिंकू चबूतरी पर बैठा रह गया।
"भैया," उसने कहा, "मैंने आपसे एक बात झूठ कही थी।"
"पता है," मैंने कहा। "जो सच कहने के बाद झूठ निकले, वो झूठ कम होता है, आदत ज़्यादा। धीरे-धीरे जाएगी।"
मैं दुकान की तरफ़ लौटा, और रास्ते में मेरे अंदर वही सवाल पीछा करता रहा जो सुबह घंटी ने छोड़ा था।
जोड़ा, तो किसने खाया?
मैंने अपनी कार्बन कॉपी निकाली — मीरा की दी हुई छोटी, जिसमें मैंने आख़िरी हिसाब लिखा था। एक सौ अठावन अंक। अब एक सौ सत्तर।
जब भी मैं किसी को जोड़ता हूँ, घंटी एक-दो अंक बढ़ती है। और वहीं, उसी आवाज़ में, मुझे खुद का हिसाब लिखने को कहती है।
"अच्छा काम करते हो," उस्ताद ने कहा। मैंने चौंककर पीछे देखा। वो सिलाई मशीन के पास खड़े थे, कैंची हाथ में। "बच्चों को जोड़ना छोटा काम नहीं होता। यहीं से बड़े झगड़े शुरू होते हैं और यहीं खत्म।"
"कहो, पर मज़ा नहीं आ रहा," मैंने कहा।
"मज़ा तब आएगा जब समझ जाओगे कि ये अंक किसी और के खाते में जा रहे हैं।"
"आपको कैसे पता?"
उस्ताद ने कैंची मेज़ पर रखी।
"क्योंकि मैंने एक बार खुद ऐसे ही लिखा था," उन्होंने कहा। "और फिर एक दिन देखा कि जिस दुकान में मैं बढ़िया काम कर रहा था, उसी की चाबी किसी और की जेब में पड़ी थी।"
दोपहर तीन बजे हम पीछे के प्लॉट की तरफ़ गए।
मशीन वहीं खड़ी थी, पर अब उसके पहिये कड़े थे। उसके पीछे दो ट्रक खाली खड़े थे, और सीमेंट की बोरियों पर एक आदमी बैठा बीड़ी पी रहा था। हमें देखकर वो उठा, और उसने वो काग़ज़ जेब से निकाला जिस पर शालिनी की नज़र पहले ही पड़ चुकी थी।
"काग़ज़ आ गया?" उसके हिसाब से मुझे पूछना नहीं था।
शालिनी ने कहा, "कल छह बजे से पहले मशीन नहीं चलेगी। यह आदेश में है।"
आदमी ने सिर हिलाया। "मैं तो भई मशीन नहीं चलाता। मैं सिर्फ़ बोरियाँ ढोता हूँ। पर ये आप हमारे मालिक से कहिए। वो कहते हैं — मशीन दो दिन पहले भी रुक सकती थी, हमने रोके रखी है।"
"क्यों रोकी?"
"इसीलिए।" उसने हमारी तरफ़ देखा, फिर वो पहला काम किया जो वो शायद कभी नहीं करता — उसने बीड़ी बुझाई और जेब में रखी। "मालिक परसों आए थे। कुछ बोले नहीं। सिर्फ़ बक्से की तरफ़ देखा और मुस्कुराए। उसके बाद से मुझे रात को नींद नहीं आती।"
मेरी नज़र एक पल को उसकी जेब पर गई, जहाँ बुझी हुई बीड़ी पड़ी थी, और मन से मैंने कहा कि आदमी डर कर भी ऐसे ही बोलते हैं।
हम वापस लौटे। रास्ते में शालिनी बोली, "आज रात। मशीन रुकी है, पर वो रुकी हुई नहीं है। देर मत करो।"
"आज रात," मैंने दोहराया।
और शाम हो गई।
शाम को गली में वो अजीब सी शांति थी जो सिर्फ़ उस दिन आती है जब सबने एक साथ कुछ झूठ बोला हो। भोला भाई के शटर अब पूरे खुले थे, पर वो बाहर बैठे भी नहीं थे। किशनलाल काका की दुकान पर चना भी नहीं भुना था। और शबनम आपा की गुमटी पर चाय बन रही थी, पर कोई बोल नहीं रहा था।
मैं दुकान पर बैठा किसी साइकिल का पहिया सीधा कर रहा था, तभी मेरी नज़र गली के कोने पर गई।
वहाँ खड़ा था।
सफ़ेद कुर्ता, हाथ में छोटा सा काला बैग, और दूसरे हाथ में एक कॉपी — जिस पर वो पेंसिल से कुछ लिख रहा था।
और जब लिखता, तो सिर उठाकर हमारी तरफ़ देखता — दुकान, चबूतरी, पीपल, फिर दुकान।
मैंने पहिया नीचे रखा और उसकी तरफ़ नहीं देखा। काम करने लगा, पर आँख की कोर से देखता रहा।
उसने एक लड़के को बुलाया। चिंटू था वो — पता नहीं कहाँ से वो वहाँ पहुँच गया। बात हुई, दो मिनट की। फिर चिंटू दौड़कर मेरे पास आया।
"भैया," उसने कहा, "वो अंकल कुछ पूछ रहे थे।"
"क्या पूछ रहे थे?"
चिंटू ने हाँफते हुए कहा, "पूछ रहे थे कि आज सुबह चबूतरी पर बल्ले से कौन लड़ा था। मैंने कहा — भैया, वो हमारी गली के लड़के हैं। फिर उन्होंने पूछा कि उस बड़े लड़के का नाम क्या है, जो अब्बा की जगह लड़ रहा था। मैंने कह दिया — गोलू।"
मेरे हाथ की रिंच रुक गई।
"और फिर?"
"फिर उन्होंने कॉपी में गोलू का नाम लिखा," चिंटू ने कहा। "नीली स्याही से। और नीचे एक तारीख़ लिखी।"
मैं उठ खड़ा हुआ।
"दुकान देखना," मैंने चिंटू से कहा। "कोई आए तो कहना कि भैया मंदिर की तरफ़ गए हैं।"
वो आदमी मंदिर के मोड़ पर मुड़कर फाटक की तरफ़ जा रहा था — उसी तरफ़ जहाँ पुराना बिजलीघर है। मैं उसके पीछे नहीं गया। मैंने दीवार के उस हिस्से पर नज़र डाली जहाँ वो खड़ा था, और वहाँ धूल पर नीली स्याही में दो लकीरें और बीच में एक बिंदु का निशान बना था।
वही निशान।
जो चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर है। जो मंसूर चाचा के पीले काग़ज़ पर है। जो घंटी के छल्ले पर है।
मैंने जेब में हाथ डाला।
"घंटी," मैंने धीरे से कहा। "ये निशान क्यों आ रहा है पूरे शहर में?"
घंटी चुप रही। फिर बोली, "क्योंकि अब वो निशान नहीं, पता बन रहा है।"
"किसका पता?"
"उसका।" और फिर — "आज रात बिजलीघर मत जाना।"
"क्यों?"
"क्योंकि आज रात वहाँ मैं नहीं, वो बोलेगा।"
और यह कहकर घंटी फिर चुप हो गई। इस बार ऐसे चुप हुई जैसे कोई बुज़ुर्ग बात कहकर मुँह फेर लेता है, ताकि सामने वाला अपनी समझ से काम करे।
मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा। वो गुमटी के बाहर खड़ी थीं, चिमटी हाथ में, और उनकी आँखें भी उसी फाटक की तरफ़ थीं।
"आपा," मैंने कहा।
"देख रही हूँ," उन्होंने कहा। "वो आदमी रोज़ इस वक़्त नहीं आता।"
"आपको पता है वो?"
"पता नहीं, पर पहचानती हूँ।" आपा ने चिमटी नीचे रखी। "ये वही लोग हैं जो काग़ज़ लाते हैं, पर काग़ज़ पर खुद का नाम नहीं लिखते।"
रात आई।
और मैंने घंटी की बात नहीं मानी।
मैं गया — पर अकेला नहीं। मेरे साथ टिंकू था, जो मेरे पीछे चुपचाप चल रहा था, और शालिनी फाटक से सौ कदम दूर खड़ी थीं।
बिजलीघर का फाटक पहले से टूटा हुआ था। अंदर अंधेरा था, बस दीवार के एक हिस्से से पीली नीली रोशनी की हल्की सी लकीर निकल रही थी।
हम अंदर गए।
छह लोहे के बड़े बक्से दीवार के साथ रखे थे। उनमें से आख़िरी बक्सा खुला था — और उसी के सामने, दीवार से टिककर, एक आदमी खड़ा था।
सफ़ेद कुर्ता।
पीठ हमारी तरफ़ थी, इसलिए चेहरा नहीं दिखा। पर उसके गले में एक चीज़ नीली हो रही थी — गोल, पीतल जैसा, और वो रोशनी दे रही थी जैसे कोई चीज़ अंदर से जल रही हो।
वो ताबीज़।
मैंने टिंकू का कंधा दबाया और उसे दीवार से चिपका लिया।
और तभी बक्से से आवाज़ आई।
न ज़ोर से, न तेज़। लगातार। जैसे कोई बड़ा जानवर सोते हुए गुनगुना रहा हो — और धीरे-धीरे जाग रहा हो। दीवार में कंपन हुआ। टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
वो आदमी नहीं हिला। उसने सिर्फ़ ताबीज़ पर हाथ रखा और एक लंबी साँस ली, वैसे जैसे बीमार आदमी दवा के बाद लेता है।
फिर उसने कहा — और उसकी आवाज़ चंद्रेश की नहीं, रणवीर भारद्वाज की थी, इतनी साफ़ कि मैं ठंडा हो गया:
"एक और जोड़ बना आजु। छोटा सा। दो लड़के।" वो हँसा। "बारह अंक मिले होंगे उसे। मैंने भी पूरे बारह लिए। तुझे पता है न, मुझे भी भूख लगती है।"
बक्से से आवाज़ आई — इस बार गुनगुनाहट नहीं, एक गहरी, छोटी गुर्राहट।
रणवीर वहीं खड़े रहे एक पल, फिर मुड़कर बाहर की तरफ़ चले।
हम दीवार से चिपके रहे, जब तक उनके पीछे का अंधेरा फाटक से बाहर नहीं निकल गया।
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली। उसकी सतह गरम नहीं थी।
बर्फ़ जैसी थी।
"घंटी," मैंने फुसफुसाकर कहा। "अब बोल। क्या हो रहा है?"
बहुत देर बाद, बहुत धीमी आवाज़ में, घंटी ने कहा:
"अब दो भूखे हैं। एक बक्से में। एक मेरे अंदर।"
॥
घंटी की आख़िरी बात बिजलीघर की दीवारों से टकराकर लौट आई, जैसे कोई पुराना कुआँ तुम्हारी अपनी आवाज़ वापस थूक देता है।
अब दो भूखे हैं। एक बक्से में। एक मेरे अंदर।
मैंने टिंकू का कंधा पकड़ा। उसका शरीर काँप रहा था, और उसकी उँगलियाँ मेरी कलाई पर इतनी ज़ोर से चिपकी थीं कि मुझे उसकी हड्डियाँ महसूस हुईं।
“उस्ताद,” उसने फुसफुसाया। “वो… वो रणवीर था न?”
“हाँ।”
“और बक्से से आवाज़ आ रही थी?”
“हाँ।”
“तो बक्से में कौन है?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। अंधेरे में उसका चेहरा सिर्फ़ आधा दिख रहा था, बाकी आधा उस पीली रोशनी की लकीर में, जो दीवार की दरार से आ रही थी।
“पता नहीं,” मैंने कहा। “पर जो भी है, वो भूखा है। और भूखे से सीधे नहीं उलझते।”
हम दीवार से चिपके-चिपके बाहर निकले। फाटक के पास पहुँचकर मैंने पीछे देखा — बक्सा अब भी खुला था, और उसके भीतर से आती गुर्राहट अब धीमी हो चुकी थी, जैसे जानवर खा चुका हो और अब सो रहा हो।
शालिनी सौ कदम दूर, उसी पुराने नीम के नीचे खड़ी थीं। उन्होंने हमें देखा और तेज़ी से आगे आईं।
“क्या हुआ?” उन्होंने पूछा। “तुम्हारा चेहरा…”
“रणवीर अंदर था,” मैंने कहा।
शालिनी रुक गईं।
“क्या?”
“बक्से के सामने खड़ा था। ताबीज़ पहने हुए। उसने बक्से से बात की, शालिनी। इंसान से नहीं। बक्से से। और कहा — एक और जोड़ बना आज, दो लड़के, बारह अंक, मैंने भी पूरे बारह लिए।”
शालिनी की साँस रुकी। उन्होंने अपना बैग सीने से लगाया, जैसे कोई ढाल पकड़ रही हों।
“तुम्हें पक्का पता है?”
“मैंने अपने कानों से सुना।”
वो कुछ देर चुप खड़ी रहीं। फिर उन्होंने बहुत धीमे से कहा, “तो मेरा शक सही था।”
“कौन सा शक?”
“तुम्हारे गोदाम वाले खाते में जो अक्षर थे — य, पू, बा। मैं सोच रही थी कि ये नामों के टुकड़े हैं।” उन्होंने बैग से एक मुड़ा काग़ज़ निकाला। “रात भर बैठकर मैंने उन्हें गिना। हर बार जब तुम कोई झगड़ा जोड़ते थे, उसी हफ़्ते के खाते में एक नई लकीर बढ़ती थी। और लकीर के आगे वही अक्षर। हर बार।”
मुझे ठंड लगी, और वो ठंड बिजलीघर की हवा से नहीं आई थी।
“मतलब मेरा अच्छा काम किसी के खाते में लिखा जा रहा है।”
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो वकील की आँखों में होती है जब उसे मुकदमा जीतता दिखने लगे, पर मुवक्किल का चेहरा उतरा हुआ हो।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “अभी यह बात किसी को नहीं बतानी।”
“क्यों?”
“क्योंकि अगर यह सच है, तो हम किसी गली वाले को भी यह नहीं बता सकते। जो आदमी लोगों के जोड़ से खाता भरता है, वो यह भी जानता है कि किस बात से जोड़ टूटता है।”
उनकी बात सही थी। और यही सबसे डरावनी थी।
टिंकू ने मेरी कमीज़ खींची।
“उस्ताद, घंटी।”
मैंने जेब से घंटी निकाली। वो अब भी बर्फ़ जैसी थी। मैंने उसे हथेली में दबाया, गरम करने की कोशिश की, पर वो गरम नहीं हुई।
घर लौटते वक़्त रास्ते में टिंकू ने तीन बार मुँह खोला और तीनों बार मैंने सिर हिलाकर चुप करा दिया। आख़िरी बार उसने कहा, “उस्ताद, बक्से में कुछ है। मुझे पता है। मेरे नाना कहते थे…”
“कल बताना,” मैंने कहा। “आज बस सो जा।”
पर वो नहीं सोया। और मैं भी नहीं सोया।
रात भर मैं चारपाई पर करवटें बदलता रहा। बाहर पीपल की पत्तियाँ हवा में खड़खड़ाती रहीं, और हर बार जब वो खड़खड़ाती थीं, मुझे लगता था कोई दरवाज़ा खुल रहा है।
सुबह मुझे नींद नहीं आई थी, बस आँख बंद थी। और उसी हालत में मैंने शटर के नीचे से आती आवाज़ सुनी — काग़ज़ खिसकने की आवाज़। पतली, हल्की, जैसे कोई जान-बूझकर धीरे से कुछ डाल रहा हो।
मैं उठा। चारपाई से पैर नीचे रखे। ज़मीन ठंडी थी।
बाहर जाकर देखा तो गली में सुबह की वो रोशनी थी, जो हर चीज़ को धुँधला और ईमानदार बना देती है। और शटर के नीचे, ज़मीन पर, एक काग़ज़ पड़ा था।
सफ़ेद। मुड़ा हुआ। ऊपर कोई नाम नहीं, नीचे कोई मुहर नहीं।
मैंने उठाया।
उस पर टाइप किया हुआ था, टेढ़ा-मेढ़ा, जैसे कोई जल्दी में पुरानी टाइप मशीन पर बना रहा हो। बड़ा-सा ऊपर लिखा था — सार्वजनिक भूमि पर अस्थायी निर्माण।
और नीचे:
पीपल के नीचे बना जोड़ केंद्र अवैध अतिक्रमण है। वहाँ बैठकर लोगों को जमा करना, काग़ज़ रखना और सलाह देना नगरपालिका नियमों के खिलाफ़ है। पीपल की ज़मीन सार्वजनिक है और उसे किसी भी निजी या सामूहिक गतिविधि के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। तीन दिन के अंदर जगह खाली कर दी जाए। ऐसा न होने पर सामान ज़ब्त किया जाएगा और कार्रवाई होगी।
तीन दिन।
मैं वहीं खड़ा रह गया, बिल्कुल सुन्न। बस मेरा हाथ उस काग़ज़ को पकड़े था और आँखें बार-बार उस एक लाइन को पढ़ रही थीं — तीन दिन के अंदर जगह खाली कर दी जाए।
कल।
कल मैंने पीपल के नीचे टिंकू और गोलू को बैठाया था। दोनों को एक-एक सच बोलने को कहा था। दोनों ने हाथ मिलाया था। बल्ले की कीलें चटककर गिरी थीं और बल्ला अपने आप जुड़ गया था। घंटी ने कहा था — छोटा जोड़, बारह।
और अगली सुबह, जोड़ केंद्र पर खाली करने का काग़ज़।
मुझे अपनी उँगलियों में ग्रीस महसूस हुई, जो वहाँ नहीं थी। मैंने काग़ज़ को दो बार मोड़ा और जेब में रखा, और कुछ देर ऐसे खड़ा रहा जैसे कोई आदमी अपने ही हाथों को पहचानने की कोशिश कर रहा हो।
पीछे से टिंकू की आवाज़ आई। “उस्ताद? क्या हुआ?”
“कुछ नहीं,” मैंने कहा। और यह मेरा पहला झूठ था उस दिन का। मुझे उस वक़्त पता नहीं था कि यही झूठ आज मुझसे सबसे बड़ी कीमत लेगा।
मैं गुमटी की तरफ़ चला।
शबनम आपा चूल्हे पर केतली रख रही थीं। सुबह की पहली भाप उठ रही थी और उसी भाप में उनका चेहरा थोड़ा नरम लग रहा था।
“इतनी सुबह?” उन्होंने कहा। “कल रात का असर है? चेहरा देखो अपना, जैसे किसी ने तुम्हें कुएँ में डालकर निकाला हो।”
“आपा,” मैंने कहा। “पीपल के नीचे कोई सामान रखता है क्या आजकल?”
उनके हाथ रुक गए। केतली की भाप उनके चश्मे पर जम गई, और उन्होंने उसे पोंछा नहीं।
“ये सवाल क्यों?”
मैंने काग़ज़ उनकी तरफ़ बढ़ाया।
शबनम आपा ने काग़ज़ पढ़ा। धीरे-धीरे। हर लाइन पर रुककर। फिर उन्होंने उसे मेरी तरफ़ वापस किया, और मेरी तरफ़ देखकर कहा, “किसने दिया?”
“शटर के नीचे पड़ा था।”
“किसने दिया?” उन्होंने दोहराया। उनकी आवाज़ वैसी ही थी जैसी तब होती है जब आपा को कुछ पता हो और वो बताना न चाहें।
“मुझे नहीं पता।”
“मुझे पता है।” उन्होंने केतली उतारी, चूल्हा बंद किया, और मेरे सामने आकर खड़ी हो गईं। “ये काग़ज़ वही लाते हैं जो अपना नाम नहीं लिखते। और ये काग़ज़ किसी दफ़्तार से नहीं आता, अंकुश। ये किसी की जेब से आता है और किसी के जेब में ही वापस जाता है।”
“पर इसमें नगरपालिका लिखा है।”
“इसमें कुछ नहीं लिखा।” उन्होंने काग़ज़ पर उँगली रखी। “नंबर नहीं, न तारीख़, न किसी का हस्ताक्षर, न मुहर। बस बड़ी-बड़ी बातें। डराने के लिए बना काग़ज़ है।”
“और अगर कल कोई आकर चबूतरी पर ताला लगा दे?”
शबनम आपा कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रहीं। फिर उन्होंने कहा, “तो ताला लगेगा। और हम उसे खोलेंगे। पर पहले ये बता — तेरे चेहरे पर डर काग़ज़ का है या किसी और चीज़ का?”
मैं चुप रह गया।
“बता,” उन्होंने कहा।
“कल रात मैं बिजलीघर गया था।”
आपा की आँखें सिकुड़ीं।
“घंटी ने मना किया था,” मैंने कहा। “और मैं फिर भी गया।”
वो मेरी तरफ़ देखती रहीं, और उनके चेहरे पर वो भाव आया जो माँ के चेहरे पर आता है जब बेटा कहे कि मैं गिर गया था पर चोट नहीं लगी।
“अंदर क्या देखा?” उन्होंने बहुत धीमे से पूछा।
“रणवीर।”
आपा के हाथ से चिमटी छूट गई। वो धातु की आवाज़ करती हुई ज़मीन पर गिरी और एक बार उछली।
“और?” उन्होंने कहा।
“और बक्से से आवाज़ आई।”
आपा ने एक कदम पीछे रखा। ऐसा नहीं कि वो डरीं — ऐसा कि उन्हें अपना संतुलन चाहिए था।
“मैंने तुमसे कहा था न,” उन्होंने कहा, “उस्ताद ने भी कहा था। ये लोग काग़ज़ नहीं लाते, ये लोग काग़ज़ के बहाने अपना रास्ता बनाते हैं। तुम उनके रास्ते पर खड़े हो गए।”
“आपा…”
“चुप।” उन्होंने हाथ उठाया। “पहले मुझे सोचने दे।”
वो वहीं चूल्हे के पास खड़ी रहीं। उनके होंठ हिल रहे थे पर आवाज़ नहीं आ रही थी। फिर उन्होंने चिमटी उठाई, सीधी की, और गुमटी की मेज़ पर पटक दी — इतनी ज़ोर से कि स्टील की थाली झनझना उठी।
“सुन सब,” उन्होंने गली की तरफ़ मुँह करके कहा, जैसे पूरी गली उनके सामने खड़ी हो। “आज जो भी आए, जो भी काग़ज़ दिखाए, उसे कहना — पहले चाय पी ले। और चाय पीने के बाद भी अगर काग़ज़ देने की हिम्मत बचे, तो दे दे।”
मुझे हँसी आई। शबनम आपा हमेशा अपनी हँसी एक तरफ़ रखकर सबसे ज़रूरी बात कह देती हैं।
पर हँसी ज़्यादा देर नहीं टिकी। क्योंकि उसके बाद जो हुआ, वो मेरे अंदर तक चला गया।
ग्यारह बजे पीपल के नीचे भीड़ जमा हो गई। कोई किसी को नहीं बता रहा था, फिर भी सब आ गए — जैसे गली की हवा ने खबर पहुँचा दी हो।
उस्ताद अली बक्श अपनी दुकान से निकलकर आए, हाथ में मोटा चश्मा। भोला भाई अपनी आधी गिरी शटर वाली दुकान से आए। किशनलाल काका चने का लोटा छोड़कर आए। नसीमा बाई अपनी राशन दुकान का ताला लगाकर आईं। रमेश भाई पानी की बाल्टी लेकर आए, और बाल्टी उनके हाथ में ही रह गई। बच्चे — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — पहले से चबूतरी पर बैठे थे, और गोलू भी उनके साथ, किनारे पर, थोड़ा झिझकते हुए।
चबूतरी पर जोड़ केंद्र की टूटी लकड़ी की मेज़ रखी थी, जिस पर मैंने सफ़ेद पेंट से बोर्ड बनाया था — टूटी चीज़ लाओ, टूटा रिश्ता साथ लाओ।
उसी मेज़ पर कोई काग़ज़ चिपका गया था।
मेरा हाथ वहीं रुक गया। मैंने वो काग़ज़ खोला। वही टाइप की लाइनें। वही तीन दिन।
“देख लिया?” पीछे से भोला भाई की आवाज़ आई। “सुबह मेरी दुकान के नीचे भी यही पड़ा था। मैंने सोचा किसी का कचरा है।”
“मेरे बोर्ड के नीचे भी,” नसीमा बाई ने कहा। “लगा रही थी कि एक ही है, नकल है। पर तीन जगह?”
उस्ताद ने काग़ज़ हाथ में लिया। उन्होंने उसे पलटा, सूँघा — हाँ, उस्ताद काग़ज़ सूँघते हैं, मुझे भी अब आदत हो गई है — और फिर बहुत धीमे से बोले, “नया है। स्याही दो दिन से ज़्यादा पुरानी नहीं।”
“किसने छापा?” मैंने पूछा।
“जिसके पास मशीन हो और नाम न हो।” उन्होंने काग़ज़ मुझे लौटाया। “और अंकुश, इसमें कोई तारीख़ नहीं, कोई मुहर नहीं। यानी ये चेतावनी नहीं, ये डर है। अगर ये काग़ज़ तुम्हें तोड़ सका, तो इसे कोई दफ़्तार नहीं चाहिए।”
किशनलाल काका कुछ बुदबुदाए। मैंने पूछा, “क्या कहा काका?”
“मैं कह रहा था,” उन्होंने लोटा नीचे रखा, “कि नगरपालिका पीपल के नीचे बैठकर लोगों को सलाह देने पर कभी काग़ज़ नहीं भेजती। यहाँ सालों से लोग काग़ज़ लेकर, हिसाब लेकर, झगड़े लेकर बैठते आए हैं। किसी ने नहीं रोका।”
“तो फिर अब क्यों?” रमेश भाई ने कहा।
और सब एक साथ चुप हो गए, क्योंकि सबको जवाब पता था।
क्योंकि अब पीपल के नीचे कोई बैठने लगा है जो चीज़ें जोड़ता है। और जो जोड़ता है, वो उनके धंधे में आड़े आता है।
मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा और चबूतरी पर बैठ गया।
“कल ही मैंने टिंकू और गोलू को यहीं बैठाया था,” मैंने कहा। “एक-एक सच निकलवाया। दोनों ने हाथ मिलाया।”
“मुझे पता है,” गोलू ने कहा। वो धीरे बोला, जैसे यहाँ बोलने का हक़ उसका नहीं। “मैं वहीं था। बल्ला अपने आप जुड़ा।”
“तो काग़ज़ कल रात का जवाब है,” मीरा ने कहा। वो कब आईं, मुझे पता नहीं चला। उन्होंने अपना कैमरा कंधे से उतारा और मेरे बगल में बैठ गईं। “तुमने एक रिश्ता जोड़ा, और अगली सुबह तुम्हारी जगह पर काग़ज़ आ गया। ये इत्तेफ़ाक़ नहीं है।”
“मीरा,” मैंने कहा, “क्या कोई ऐसा नियम है — किसी जगह पर लोग इकट्ठे न हों? कुछ ऐसा जिससे वो इसे रोक सकें?”
“रोकने के लिए नहीं,” उन्होंने कहा, “परेशान करने के लिए हाँ। असली काग़ज़ में तारीख़ होती है, नंबर होता है, सुनने का मौका होता है। इसमें कुछ नहीं। इसे लेकर अदालत नहीं जा सकते। पर तुम घर बैठकर डर सकते हो।”
मुझे शालिनी की बात याद आई — जो आदमी लोगों के जोड़ से खाता भरता है, वो जानता है किस बात से जोड़ टूटता है।
और मुझे कल रात का वो लम्हा याद आया — रणवीर का मुड़कर बाहर जाना, फाटक का अंधेरा, और घंटी की बर्फ़ जैसी सतह।
मैं उठ खड़ा हुआ।
“सब लोग,” मैंने कहा। “ये काग़ज़ मेरी जगह पर आया है। मैं इसका जवाब दूँगा। पर अभी मुझे कुछ सोचना है। अकेले।”
शबनम आपा ने कुछ कहना चाहा, फिर रुक गईं। उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा, “चाय रखी है। ठंडी मत होने दे।”
मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में गया। दरवाज़ा बंद किया। शटर भी गिरा दिया, आधा ही, ताकि अंदर अंधेरा रहे।
और मैंने घंटी निकाली।
वो अब भी ठंडी थी, पर इतनी नहीं जितनी रात में थी। मैंने उसे दोनों हाथों में लिया और अपने माथे से लगाया।
“घंटी,” मैंने कहा। “अब साफ़ बोल।”
कुछ देर कुछ नहीं हुआ। फिर धीरे से, बहुत धीरे से, जैसे कोई बुज़ुर्ग बुखार में बोलता है:
“पूछ।”
“ये काग़ज़ क्यों आया?”
“क्योंकि तूने जोड़ा।”
“तो जोड़ने की सज़ा है?”
“नहीं।” एक ठहराव। “जोड़ने का हिसाब है।”
“समझा नहीं।”
और फिर घंटी ने वो बात कही जो मुझे कल रात से लगातार खा रही थी, पर इस बार किसी पहेली की तरह नहीं — सीधे, सपाट, जैसे कोई बिल बढ़ाकर आपके सामने रख दे:
“हर जोड़ की आधी ऊर्जा दूसरी तरफ़ चली जाती है।”
कमरे की हवा जैसे भारी हो गई।
“दूसरी तरफ़?” मैंने कहा। मेरी आवाज़ सूखी थी।
“मरम्मत तेरी है,” घंटी ने कहा। “पर ऊर्जा दो लोगों की होती है। और एक हिस्सा चुपचाप खींच लिया जाता है।”
मैंने घंटी को मेज़ पर रख दिया, क्योंकि मेरे हाथ काँप रहे थे और मुझे लगा अगर मैंने उसे गिरा दिया तो खुद को माफ़ नहीं करूँगा।
“कौन खींचता है?” मैंने पूछा।
“जो भूखा है।”
“बक्सा?”
“बक्सा नहीं। बक्से में जो बैठा है।” घंटी फिर रुकी, और उस रुकने में कुछ ऐसा था जो मुझे अंदर तक डरा गया। “और वो भूखा अकेला नहीं है। जब तू जोड़ता है, तेरे अंदर भी एक चीज़ भरती है। जोड़ की ऊर्जा दो जगह जाती है — बाहर और भीतर। बाहर वाला हिस्सा कोई खींच लेता है। भीतर वाला हिस्सा तेरे पास रहता है।”
“तो मैंने क्या किया?”
“तूने भीतर वाला हिस्सा जोड़ा। और बाहर वाला उसके खाते में गया।”
मैंने आँखें बंद कर लीं।
और याद आने लगा। एक-एक करके, जैसे कोई पुरानी फ़िल्म धीमी गति से चले।
जिस दिन गिरधारी और मोहन की साइकिल वाली दरार जुड़ी — उसी हफ़्ते चबूतरी पर किसी ने बोला था कि नए बाज़ार में रणवीर भारद्वाज की बड़ी तस्वीर लगी है।
जिस दिन पीपल के नीचे बंसी बाबा और रहमत बाबा पैंतालीस साल बाद एक साथ बैठे — उसी शाम गली के मुँह पर सफ़ेद गाड़ी दो घंटे खड़ी रही थी।
जिस दिन कलीम और रामदीन ने पीपल के कोटर वाला डिब्बा खोला — उसी रात अस्पताल के गेट पर नया पीला नोटिस लगा था।
हाफ़िज़ बाबा और पंडित ब्रजकिशोर की पुरानी दुश्मनी टूटी — और उसके तीन दिन बाद स्कूल की छत की रिपोर्ट आई।
इब्राहीम चाचा और बृजमोहन बाबा — और फिर दुकान पर रणवीर का नया चमकदार बोर्ड।
नबी चाचा और श्यामलाल काका — और फिर दवा सूची से सल्लू चाचा का नाम कटा।
क़ादिर और बद्री — और फिर बीस दिन वाली सूची।
हर जोड़। हर बार। और हर बार वही सवाल, जो मैंने उस वक़्त हल्के में लिया था — भई, रणवीर आख़िर हर जगह क्यों फँसा हुआ है?
अब जवाब सामने था, और वो जवाब बहुत बदसूरत था। रणवीर हर जगह इसलिए नहीं था कि वो शहर में बड़ा है। रणवीर हर जगह इसलिए था कि मैं उसे बड़ा कर रहा था।
मैंने अपनी हथेली देखी। ग्रीस के निशान, पुराने, कई साल पुराने, नाखून के नीचे तक जमे हुए। यही हाथ हैं जो पहिए की तीलियाँ सीधी करते हैं, जो टूटी चीज़ों को जोड़ते हैं।
और यही हाथ अपने ही दुश्मन को पाल रहे थे।
मुझे माँ की आवाज़ याद आई — उस दरवाज़े की दरार से आई थी, कमज़ोर, खाँसी के बीच — अंकुश, अच्छे काम का हिसाब उल्टा क्यों आता है?
मैंने उस वक़्त जवाब नहीं दिया था। मैंने सिर्फ़ वादा किया था कि मैं जवाब ढूँढूँगा। और माँ की तरह माँ के सवाल भी ऐसे होते हैं कि वो इंतज़ार करते हैं, और जब जवाब आता है तो ऐसा आता है कि आदमी कुर्सी पकड़ कर बैठ जाए।
“घंटी,” मैंने कहा, और इस बार मेरी आवाज़ में वो मज़ाक नहीं था जो लोग मुझे पहचानते हैं। “उसका खाता कहाँ है?”
“तूने देखा है।”
“बिजलीघर।”
“हाँ।”
“और बात यही है कि मैं जोड़ता हूँ, वो खींचता है?”
“हाँ।”
“तो फिर मैं जोड़ना छोड़ दूँ?”
इस बार घंटी ने जवाब देने में देर लगाई। इतनी देर कि मुझे लगा वो चुप हो गई है, या मेरा सवाल उसके पास पहुँचा ही नहीं।
“अगर छोड़ेगा,” वो बोली, “तो टूटे हुए रिश्ते टूटे रहेंगे और वो वैसे ही खाएगा। जो जुड़ता है उससे उसे कुछ मिलता है, और जो टूटता है उससे भी। उसके लिए दोनों रास्ते खुले हैं।”
“तो मेरे पास रास्ता क्या है?”
“इसका जवाब तेरे पास नहीं है।” वो फिर रुकी। “इसका जवाब उस जगह है जहाँ नाम पहले लिखा जाता है।”
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
“वो लड़की,” मैंने कहा। “हमीदा दाई की बेटी की रिश्तेदार। उसने कहा था — जो नाम जोड़ता है, उसका नाम पहले लिखा जाता है।”
“तूने सुना था,” घंटी ने कहा। “अब समझ भी।”
मैंने घंटी उठाई और दरवाज़ा खोला।
बाहर शबनम आपा खड़ी थीं, हाथ में मिट्टी का कुल्हड़।
“चाय,” उन्होंने कहा। “और ये बात मुझे पहले बतानी थी कि तू बिजलीघर गया था। अब बता, घंटी ने क्या कहा?”
मैंने कुल्हड़ लिया। हाथ जल गया। पर मैंने उसे छोड़ा नहीं, क्योंकि उस जलन में कुछ ऐसा था जो मुझे असली दुनिया में रख रहा था।
“आपा,” मैंने कहा। “मैंने अपनी मेहनत से अपने ही दुश्मन को पाला है।”
आपा ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने वो किया जो वो हर बार करती हैं — उन्होंने कोई बड़ी बात नहीं कही, कोई झूठी तसल्ली नहीं दी। उन्होंने सिर्फ़ कहा, “कुल्हड़ में चाय है। पी। ठंडी हो गई तो मिट्टी का स्वाद आएगा और मुँह कड़वा लगेगा।”
मैंने चाय पी।
और उस वक़्त गुमटी के पीछे से आवाज़ आई।
मैंने मुड़कर देखा। वो नई लड़की थी — कल वाली — पुरानी पतली कॉपी सीने से लगाए खड़ी।
“मैंने कुछ सोचा है,” उसने धीरे से कहा, “पर आप सुनेंगे या नहीं, यह पहले हाँ कहिए।”
मैंने कुल्हड़ नीचे रखा।
“कहो,” मैंने कहा।
“मेरी माँ अस्पताल की रसोई में काम करती थी,” उसने कहा। “और उसने मुझे एक बात दो बार दोहराई थी। पहली बार जब मैं आठ साल की थी, और दूसरी बार अब, जब वो अस्पताल नहीं जा रही।” उसने कॉपी खोली। “उसने कहा था — जो नाम जोड़ता है, उसका नाम किसी और के खाते में पहले जाता है। चाहे वो इंसान जाने या न जाने।”
मेरी साँस रुक गई।
“किसी और के खाते में?” मैंने कहा।
“हाँ। और मेरी माँ कहती थी — इसीलिए कुछ लोग गली में बड़े-बड़े नाम कमाते हैं, और उनके हाथ कभी गंदे नहीं होते।”
शबनम आपा ने कुछ ऐसा कहा जो किसी गाली जैसा था पर गाली नहीं थी, और फिर बोलीं, “बैठ जा, बेटी। चाय पी। और ये सब पहले से बता।”
लड़की बैठ गई।
और मैंने अपने कमरे में लौटते वक़्त सिर्फ़ इतना सोचा — कल एक छोटा-सा जोड़ हुआ, दो लड़के, बारह अंक। और रणवीर ने बिजलीघर में खड़े होकर कहा था — मैंने भी पूरे बारह लिए।
उसे कैसे पता कि मुझे बारह मिले?
क्योंकि वो उसी लेन-देन का हिस्सा है।
दोपहर को वो हुआ जो मैं अपनी ज़िंदगी में नहीं भूलूँगा। मैं चबूतरी पर बैठा काग़ज़ पर उँगली फेर रहा था, और उस्ताद आकर मेरे पास बैठ गए।
“क्या सोच रहा है?” उन्होंने पूछा।
“सोच रहा हूँ,” मैंने कहा, “कि मैं जोड़ना छोड़ दूँ।”
उस्ताद ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने कुछ भोंडा कह दिया हो।
“और तू छोड़ देगा?” उन्होंने पूछा। “तो गिरधारी-मोहन फिर बोलना बंद कर देंगे। बंसी बाबा फिर रहमत बाबा को सलाम नहीं करेंगे। गोलू और टिंकू फिर एक-दूसरे को कोसेंगे। यही चाहता है तू?”
“नहीं।”
“तो फिर? तू सोच रहा है कि अच्छा करने से भी वो बढ़ता है, तो अच्छा करना क्यों? अंकुश, मैंने पचास साल पहले यही सोचकर सब छोड़ दिया था। बंद कर दिया।” उन्होंने अपनी सिलाई मशीन की तरफ़ देखा। “और उसके बाद मैंने देखा कि चीज़ें खुद-ब-खुद टूटती गईं। लोग झगड़ते गए। और मेरे हाथ साफ़ रहे।” उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। “पर मेरा नाम भी कभी किसी के खाते में नहीं लिखा गया, और अच्छाई भी किसी के काम नहीं आई।”
मैं चुप रहा।
“अच्छा करना बंद मत कर,” उन्होंने कहा। “बस अब सिर्फ़ अच्छा करके मत बैठ। किसी और को भी जोड़। उन लोगों को जोड़ जिनसे वो डरता है।”
“कौन डरता है?”
“जो खींचता है, वो अपने मालिक से भी डरता है,” उस्ताद ने कहा। “बक्से वाला मालिक नहीं है। बक्से वाला सिर्फ़ मुँह है।”
शाम को मीरा आई। उसके हाथ में एक नई कॉपी थी, और उस कॉपी में उसने रात से लेकर अब तक सब लिखा था — तारीख़ें, नाम, जगहें। उसने कॉपी मेरे सामने खोली।
“देख,” उसने कहा। “मैंने आज सुबह से पूरी गली की बातचीत के हिसाब से मिलाया। हर बार जब तुमने कोई बड़ा जोड़ किया, उसके तीन दिन के अंदर रणवीर की कोई चीज़ बढ़ी — नई ज़मीन, नया बोर्ड, नई सूची, नया नोटिस, नया काग़ज़।”
“मतलब?” मैंने कहा, हालाँकि मुझे पता था।
“मतलब, तुम उसकी सीढ़ी के दो सिरों पर खड़े हो। तुम रिश्ते जोड़ते हो, और वो सीढ़ी ऊपर चढ़ता है।”
मैंने कॉपी बंद कर दी।
“मीरा,” मैंने कहा, “अगर ये सच है तो मैं उसे रोकने के लिए क्या करूँ? जो काम मेरा है, वही उसे ताकत देता है।”
मीरा ने कुछ देर सोचा। फिर उसने वो कहा जो शायद उस वक़्त उसने खुद भी पूरा नहीं समझा था, पर जो कहना ज़रूरी था।
“तुम उसे रोकने के लिए मत सोच,” उसने कहा। “तुम यह सोच — उसने अब तक कौन सा जोड़ नहीं तोड़ा? और कौन सा जोड़ ऐसा है जो उसके बक्से को खुद डरा दे?”
मुझे घंटी की बात याद आई — वो डरता है उस सभा से जहाँ लोग सच बोलकर एक हो जाएँ।
और मुझे माँ का सवाल याद आया — अच्छे काम का हिसाब उल्टा क्यों आता है।
“माँ,” मैंने धीरे से कहा, आँखें बंद करके, जैसे दरवाज़े की दरार से बोल रहा हूँ। “अब मुझे जवाब मिल गया। उल्टा इसलिए आता है कि हम हिसाब अकेले लिखते हैं और उसे कोई और पढ़ता है। अब इस हिसाब में मैं एक और नाम जोड़ूँगा — तेरा।”
रात में बारिश आई। छोटी, तेज़, बिना गड़गड़ाहट वाली बारिश। मैंने दुकान का शटर बंद किया, टिंकू को घर भेजा, और पीछे वाले कमरे में घंटी अपने सामने रख दी।
“घंटी,” मैंने कहा। “एक आख़िरी बात।”
“पूछ।”
“अब तू जो बताया — तूने पहले क्यों नहीं बताया?”
“क्योंकि पहले यह बात तेरे भरोसे को तोड़ देती,” घंटी ने कहा। “अब तू इतना जुड़ा है कि टूटेगा नहीं।”
“तो आगे क्या?”
“आगे तेरा हिसाब बदलेगा।”
मैंने घंटी उठाई।
“मतलब?”
और घंटी ने वो कहा जिसने मेरे अंदर कुछ ठंडा कर दिया — बिल्कुल साफ़, बिना रहम, जैसे कोई बुज़ुर्ग आख़िरी वसीयत बता रहा हो:
“अब तू जोड़ेगा, तो वह और बढ़ेगा।”
कमरा चुप हो गया। बाहर बारिश टपक रही थी।
“तो फिर मैं क्या करूँ?” मैंने कहा।
घंटी की सतह पर वही दो लकीरें और बीच में बिंदु चमक उठा — एक पल के लिए, जैसे कोई आँख खुलकर बंद हो गई हो।
“कर वही,” वो बोली, “जो कोई अकेले नहीं कर सकता।”
“मतलब?”
“इसका जवाब रात में नहीं मिलेगा।” वो ठंडी हो गई। “सुबह उस औरत के पास जा जिसने कहा था — जो नाम जोड़ता है, उसका नाम पहले लिखा जाता है। और पूछ, वो नाम किस खाते में लिखा जाता है।”
मैंने घंटी जेब में रखी।
पर वो जेब में जाते-जाते एक बार फिर बोली, इतने धीमे कि मुझे लगा मैंने सुना ही नहीं:
“और अंकुश — कल से अपना हिसाब खुद लिखने लग। किसी और की कॉपी में मत छोड़।”
मैं देर तक बैठा रहा। बाहर बारिश की आवाज़ थी, और दूर कहीं पुराने बिजलीघर की तरफ़ से कोई धातु की आवाज़ — शायद बक्से का ढक्कन, शायद बारिश का टपकना पीतल पर।
और मेरी जेब में वो काग़ज़ था जिसमें लिखा था — तीन दिन।
तीन दिन में मुझे अगर यह नहीं समझा कि मेरी मेहनत का हिसाब किसके खाते में जा रहा है, तो चबूतरी तो बहुत पीछे की बात है, मैं खुद अपने ही हिसाब से मिट जाऊँगा।
॥
सुबह बारिश उतर चुकी थी, पर गली अभी भीगी थी। पीपल के पत्तों से पानी टपक रहा था और नाली के पत्थर पर काई जैसी चमक आ गई थी। मैंने शटर उठाया तो नीचे से पानी की एक पतली लकीर दुकान के अंदर तक आई हुई थी। ट्रंक के पास जाकर रुक गई थी, जैसे रास्ता भूल गई हो।
मैंने पोछा लिया, फिर दुकान की मेज़ पर एक नई कॉपी रखी।
नई कॉपी।
मेरी ज़िंदगी में पहली बार ऐसा हुआ कि मैंने अपना हिसाब खुद लिखना शुरू किया। पेंसिल उठाई और पहला नाम लिखा — माँ। सुशीला यादव। उसके नीचे एक लकीर खींची, जैसे कोई हिसाब का खाना बना रहा हो।
तुम सोच रहे होगे कि कॉपी खोलकर नाम लिखने में क्या बड़ी बात है। तो सुनो, बड़ी बात यह थी कि उस नाम के आगे मैंने कुछ नहीं लिखा। न रकम, न तारीख़, न मोहर। सिर्फ़ नाम। क्योंकि घंटी ने कहा था, कल से अपना हिसाब खुद लिखना। और मैंने तय किया था कि मेरे हिसाब में सबसे पहले वही नाम जाएगा जिसने मुझे चलना नहीं, बोलना सिखाया।
तभी दरवाज़े पर टिंकू की आवाज़ आई।
"उस्ताद!"
वो भीगा हुआ आया था, बाल माथे पर चिपके, और जासूसी थैला कंधे से लटक रहा था। उसने मेज़ पर नई कॉपी देखी और रुक गया।
"ये क्या है?"
"मेरा हिसाब," मैंने कहा।
"मतलब?"
"मतलब, अब से जो भी जोड़ होगा, उसका नाम यहाँ लिखा जाएगा। पहले माँ का। फिर तेरा।"
टिंकू की आँखें बड़ी हो गईं। "मेरा भी?"
"तेरा भी। और सबका। अब जा, सबको बुला ला। उस्ताद को, शबनम आपा को, मीरा को, भोला भाई को, नसीमा बाई को, किशनलाल काका को, रमेश भाई को, बच्चों को। सबको। कहना, अंकुश ने बुलाया है और बात बड़ी है।"
टिंकू एक पल खड़ा रहा, फिर उसने कुछ ऐसा पूछा जो उसकी उम्र से बड़ा था।
"उस्ताद, बात बुरी है या अच्छी?"
"बात सच है," मैंने कहा। "बुरी-अच्छी बाद में तय करेंगे।"
वो भाग गया।
मैंने उस वक़्त दुकान के बाहर देखा। सामने उस्ताद अली बक्श की दुकान थी। दरवाज़ा आधा खुला था और अंदर से सिलाई मशीन की टिक-टिक आ रही थी। टिक, टिक, टिक। जैसे कोई बूढ़ा दिल अपनी गिनती पूरी कर रहा हो।
आधे घंटे में दुकान भर गई।
पहले मीरा आई, कैमरा कंधे पर, बाल गीले, बैग फटा हुआ। फिर उस्ताद, अपनी लाठी के सहारे, धीरे-धीरे। फिर शबनम आपा, हाथ में लोहे की चिमटी, मुँह पर ऐसा भाव जैसे किसी को मारने आई हों। भोला भाई आधा शटर छोड़कर आए। नसीमा बाई साड़ी का पल्लू कंधे पर, रमेश भाई पीछे-पीछे, किशनलाल काका चने का लोटा लिए हुए, जैसे वो लोटा ही उनकी ढाल हो। बच्चों की टोली — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — चबूतरी से सटी बेंच पर बैठ गई। और सबसे पीछे, दरवाज़े की आड़ में, पापा खड़े थे। बोले कुछ नहीं। बस खड़े रहे।
मैंने घंटी जेब से निकालकर मेज़ पर रखी।
"ये क्या है?" रमेश भाई ने पूछा।
"यही तो बताने के लिए बुलाया है," मैंने कहा।
फिर मैंने सबको बताया। बिना घुमाए, बिना मीठा किए। कि हर जोड़ का आधा हिस्सा मेरे अंदर रहता है और आधा बाहर जाता है। कहाँ जाता है, यह भी बताया। बिजलीघर के उस खुले लोहे के बक्से तक, जहाँ कोई बैठा है जो मालिक नहीं, सिर्फ़ मुँह है। जो भूखा है। जो टूटे रिश्ते भी खाता है। और जिसके खाते में मेरी मेहनत का आधा हिस्सा खुद-ब-खुद चला जाता है।
दुकान में ऐसी चुप्पी छाई कि पीपल से टपकती बूँदें सुनाई देने लगीं।
फिर मीरा उठी।
और मीरा ने वो कहा जो मैं सुनना नहीं चाहता था, पर सुनना ज़रूरी था।
"ये तो सीधा धोखा है," उसने कहा। आवाज़ ऊँची नहीं थी, पर इतनी साफ़ थी कि कान में चुभ गई। "अंकुश, तू मज़दूर है और मज़दूरी किसी और को मिल रही है। तू रात-रात जागता है, गली-गली घूमता है, अपनी माँ को अस्पताल में छोड़कर दौड़ता है, और उसका आधा हिस्सा एक बक्से में बैठा कोई खा जाता है। इसे तू न्याय कहता है? इसे तू काम कहता है?"
"नहीं," मैंने कहा।
"तो फिर?"
"मैं इसे सच कहता हूँ," मैंने कहा। "और सच को न्याय कहने की ज़रूरत नहीं होती।"
मीरा ने कैमरा मेज़ पर रख दिया। ज़ोर से नहीं, धीरे से, पर उस धीमेपन में गुस्सा था।
"तू मुझे समझा रहा है या अपने आप को?"
मैं चुप रहा। क्योंकि वो सवाल सही था।
उस्ताद अली बक्श बेंच के कोने पर बैठे थे। उन्होंने पूरे वक़्त कुछ नहीं कहा। मैंने देखा, उनका हाथ गोद में रखे कपड़े पर था और उँगली धीरे-धीरे उसी टिक-टिक की लय पर चल रही थी। जैसे वो सिलाई मशीन नहीं, कोई पुरानी बात सुन रहे हों।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आप चुप क्यों हैं?"
उन्होंने चश्मा सीधा किया। "मैं सुन रहा हूँ।"
"क्या?"
"अपनी मशीन," उन्होंने कहा। "पचास साल से यही टिक-टिक है। जब मैंने इलियास से झगड़ा किया था, उस रात भी यही आवाज़ थी। और उस रात भी मुझे लगा था कि सब बंद कर देना चाहिए।"
"फिर आपने बंद किया?"
"हाँ," उन्होंने कहा। "और देखो, पचास साल से मैं उसी बंद दुकान में बैठा हूँ।"
फिर भोला भाई बोले। उनकी आवाज़ काँप रही थी।
"अंकुश भाई, मेरी आरज़ू है। रात में दौरे पड़ते हैं। उसकी दवा नौकरी जाने के दिन बंद कर दी गई थी। अगर मैं ये सब जानता हूँ और फिर भी चुप रहूँ, तो मैं उसके सामने क्या मुँह लेकर जाऊँगा?"
"भोला भाई…"
"मैं कहना यह चाहता हूँ," उन्होंने कहा, "कि अब जोड़ना बंद कर दे। हम डर सह लेंगे। हम गाली सह लेंगे। पर हम उसका पेट नहीं भरेंगे।"
नसीमा बाई ने साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ लिया। "मेरा साजिद उससे दो हज़ार ले चुका है," उसने कहा। "मुझे नहीं पता वो किस काम के पैसे थे। अगर तुम जोड़ोगे और वो बढ़ेगा, तो मेरा बेटा और अंदर धँसेगा।"
"और मेरी दुकान?" किशनलाल काका ने कहा। "चौदह साल से मैंने वो बिक्री का काग़ज़ बोरी के नीचे दबाकर रखा है। आज तक नहीं जलाया। क्यों? क्योंकि मुझे लगता था कोई तो आएगा जो सच निकालेगा। अब वो आया है। और तुम कह रहे हो कि उसकी ताकत भी मेरे ही हाथ से बढ़ रही है?"
कमरा भारी हो गया।
रमेश भाई ने मुँह खोला, फिर बंद कर दिया। सानिया ने रफ़ीक़ की तरफ़ देखा। रफ़ीक़ ने अपना टूटा चश्मा आँख पर लगाया, जैसे उससे सच ज़्यादा साफ़ दिखेगा।
और तभी टिंकू उठा।
"उस्ताद," उसने कहा। आवाज़ छोटी थी, पर सवाल बड़ा था। "अगर हम जोड़ेंगे, तो रणवीर और बड़ा होगा?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
मेरे मुँह में जवाब आया — नहीं टिंकू, ऐसा नहीं है, हम संभाल लेंगे, हम चालाकी करेंगे, हम कुछ ऐसा करेंगे कि उसे पता भी नहीं चलेगा। अच्छे जवाब। तसल्ली के जवाब। बड़ों के जवाब।
मेरा मुँह खुला, और बात गले में अटक गई।
क्योंकि तंत्र का नियम साफ़ था। मरम्मत के वक़्त मैं झूठ नहीं बोल सकता। मैं चुप रह सकता हूँ, बात छिपा सकता हूँ, पर झूठ नहीं।
तीन सेकंड की चुप्पी के बाद मैंने कहा, "हाँ।"
टिंकू का चेहरा उतर गया।
"और अगर हम न जोड़ें?"
मैंने घंटी की तरफ़ देखा। वो ठंडी पड़ी थी, जैसे चुप्पी भी कोई जवाब हो।
"तो भी वो बढ़ेगा," मैंने कहा। "क्योंकि टूटे रिश्ते भी उसे खिलाते हैं। और गली में रोज़ कुछ न कुछ टूटता है। आज भी टूटा होगा। कोई बाप बेटे से नहीं बोला होगा, कोई औरत अपनी बहन को याद करके चूल्हा जलाकर बैठी होगी, कोई दुकानदार उधार माँगने वाले को झूठ बोलकर टाल गया होगा।"
"तो हम कुछ भी करें," टिंकू ने धीरे से कहा, "वो बढ़ता ही रहेगा।"
"हाँ।"
"फिर हम लड़ क्यों रहे हैं?"
दुकान में इतनी चुप्पी छाई कि मुझे अपनी साँस भारी लगने लगी।
और उसी चुप्पी में दरवाज़े पर हलचल हुई।
बच्चों की टोली उठ खड़ी हुई। सानिया ने कहा, "देखो, हम लाए हैं।"
दरवाज़े पर एक बूढ़ा खड़ा था।
उम्र सत्तर के पार। कमर झुकी हुई, कपड़े धुले हुए पर बहुत पुराने, कंधे पर फटी चादर, हाथ में टिन का बना हुआ एक पुराना लालटेन जिसमें आग नहीं थी। और आँखें। आँखें इतनी धँसी हुई थीं कि लगता था कोई उन्हें भीतर से बंद कर आया है।
भैरों काका।
पुराने बिजलीघर का चौकीदार। जो बीस साल पहले वहाँ से हटाया गया था और तब से पीछे की झोपड़ी में पड़ा था। जिसके बारे में गली कहती थी कि वो पागल हो गया है। जिसके बारे में मैंने खुद एक बार मज़ाक में कहा था — "काका, वो बिजली नहीं आती अब, आप किसकी चौकीदारी करते हो।"
आज वो खुद मेरे दरवाज़े पर खड़ा था।
मैं उठा। "काका, आइए, बैठिए।"
वो नहीं बैठा। वो दरवाज़े के पास ही खड़ा रहा, जैसे अंदर आने से पहले कुछ तय कर रहा हो।
"तुम वही हो," उसने कहा। "जो घंटी वाला है।"
मेरे हाथ में घंटी थी। मैंने उसे मेज़ पर वापस रख दी।
"हाँ, काका।"
फिर वो बोला, और उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कुएँ से आ रही हो।
"मैं बीस साल से उस जगह के पीछे बैठा हूँ," उसने कहा। "मैंने तुम लोगों से कभी कुछ नहीं माँगा। एक बात नहीं कही। क्योंकि मुझे लगता था, कहूँगा तो कोई सुनेगा नहीं, और उल्टा मेरी बात बक्से तक पहुँच जाएगी।"
"कौन सा बक्सा, काका?"
"तुम जानते हो कौन सा," उसने कहा। "जो अब खुला है।"
फिर उसने अपनी टिन की लालटेन उठाई और मेज़ पर रख दी।
"सुनो," उसने कहा। "मैं रोज़ रात सोने से पहले उस गली में एक फेरा लगाता हूँ। बीस साल से। सर्दी हो या बारिश, मेरी आदत है। और मैंने एक बात नोटिस की। जिस रात मोहल्ले में कोई रिश्ता जुड़ता है, उस रात देर से उन बक्सों में से गुनगुनाहट आती है।"
"गुनगुनाहट?"
"हाँ। जैसे कोई सोते में गुनगुनाता है। जैसे किसी को नींद में अच्छी चीज़ दिख रही हो।" भैरों काका ने अपने हाथ की तरफ़ देखा। उसकी उँगलियाँ हिल रही थीं। "और जिस रात कोई रिश्ता टूटता है, उस रात वो खट-खट करता है। मैंने दोनों आवाज़ें सुनी हैं। बार-बार सुनी हैं।"
दुकान में कोई हिला नहीं।
"और काका," मीरा ने धीरे से कहा, "आपने कभी किसी को वहाँ देखा?"
भैरों काका ने एक लंबी साँस ली। जैसे कोई बोझ उठाने से पहले साँस भरता है।
"एक रात," उसने कहा। "मैं उस रात बीमार था, फिर भी उठकर गया। क्योंकि उस शाम गली में कुछ हुआ था, कोई दो भाई लड़े थे, मैंने सुना था। मैंने सोचा, देख आऊँ कि बक्सा आज गुनगुनाता है या नहीं।"
"क्या हुआ?"
"बक्सा गुनगुना रहा था," उसने कहा। "और उसके सामने एक आदमी खड़ा था। सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद जूते, और हाथ में काला थैला।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"आपने उसे पहचाना?"
"मैंने उसे नहीं पहचाना," भैरों काका ने कहा। "उसने मुझे पहचाना। मैं झाड़ी के पीछे था, वो मुड़ा, और मुझे देखकर मुस्कुराया।"
"क्या कहा?"
"कुछ नहीं," काका ने कहा। "वो बस मुस्कुराया और थैले को बक्से के ऊपर रखकर चला गया। और मैंने देखा कि थैले से कुछ टपक रहा था। बूँदें। काली। बारिश के पानी जैसी नहीं, गाढ़ी।"
"आपने उस थैले को छुआ?"
"नहीं।" काका की आवाज़ टूट गई। "और तीन दिन बाद उसने मेरा नाम लिया।"
"किसने?"
"बक्से ने।" वो मेज़ के किनारे पकड़कर खड़ा हो गया, जैसे अब बोलने के लिए सहारा चाहिए था। "रात के तीन बजे। सिर्फ़ तीन शब्द। भैरों। हम बोल रहे हैं। बस इतना। और मैं तीन रात नहीं सोया। चौथी रात मैं गया और उससे माफ़ी माँगी।"
"माफ़ी?" मैंने कहा। "किस लिए?"
"क्योंकि मैंने देखा था," उसने कहा। "और मैंने किसी को नहीं बताया। मैंने बीस साल अपनी गली के लोगों को जलते देखा और चुप रहा। यही मेरा गुनाह है।" उसने अपने सूखे होंठों पर जीभ फेरी। "और सुनो, तुम, घंटी वाले। वो बक्सा भूखा है। और भूखा चीज़ कभी चुप नहीं रहती। सोती है, गुनगुनाती है, पर चुप नहीं रहती।"
फिर उसने वो कहा जिसने दुकान की हवा भारी कर दी।
"वो गिनता है," उसने कहा। "मैंने महसूस किया है। जब गली में कोई झगड़ा होता है, वो खट करता है। जब कोई सुलह होती है, वो गुनगुनाता है। दोनों में उसका पेट भरता है। फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि सुलह में वो ज़्यादा खुश होता है। क्योंकि सुलह जुड़ती है, फिर जोड़ टिकता है, फिर कोई उसे तोड़ता है, और वो दोबारा खाता है। एक रिश्ते से वो दो बार खाता है। तुमने कभी सोचा?"
मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि सोचा था। रात भर सोचा था।
तभी टिंकू बोला, बहुत धीमे से, मगर साफ़।
"भैरों काका, आपको नहीं लगता कि हमें जोड़ना बंद कर देना चाहिए?"
भैरों काका ने उसकी तरफ़ देखा। बच्चे की तरफ़ ऐसे देखा जैसे बहुत सालों बाद किसी ने सही सवाल पूछा हो।
"बेटा," उसने कहा, "मैं बीस साल से यही सोचकर बैठा हूँ। न कुछ जोड़ा, न कुछ तोड़ा। और नतीजा? गली पहले से ज़्यादा टूटी हुई है। मेरा बेटा मुझसे नहीं बोलता। मेरी बहू मेरे मुँह नहीं लगती। मैंने कुछ नहीं किया, और मेरे हिस्से का भी वो खा गया।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "जो चुप रहता है, वो भी उसकी मेज़ पर परोसा जाता है।"
फिर वो बेंच के कोने पर बैठ गया, धीरे से, जैसे अपना आख़िरी हथियार रख रहा हो।
मैं मेज़ के पास गया।
मैंने नई कॉपी खोली।
"सब सुनो," मैंने कहा। "मैं झूठ नहीं बोलूँगा, इसलिए बात कड़वी होगी। हाँ, अगर हम जोड़ेंगे तो वो बढ़ेगा। और अगर हम नहीं जोड़ेंगे, तोभी वो बढ़ेगा, क्योंकि टूटना रुकेगा नहीं।" मैंने कॉपी उठाई। "इसका मतलब यह नहीं कि हम डरकर बैठ जाएँ। इसका मतलब यह है कि हमें तय करना होगा — क्या जोड़ें।"
"मतलब?" रमेश भाई ने कहा।
"मैंने कल रात सोचा," मैंने कहा। "जब भी कोई जोड़ खुलता है, उसका आधा हिस्सा उसके पास जाता है। घंटी ने कहा, आधा तेरे अंदर, आधा उसके। तो मैंने सोचा — अगर आधा हिस्सा जाना ही है, तो उसे ऐसा क्यों भेजें जो उसके गले में अटक जाए।"
"कैसे?" उस्ताद ने पहली बार सीधे देखा।
मैंने कॉपी आगे की। "हर जोड़ का एक नाम होगा," मैंने कहा। "और वो नाम यहाँ लिखा जाएगा। पहले माँ का लिखा है। फिर तेरा, टिंकू। फिर भोला भाई का, नसीमा बाई का, किशनलाल काका का, शबनम आपा का, गोलू का, सानिया का, रफ़ीक़ का, चिंटू का।"
"नाम लिखने से क्या होगा?" नसीमा बाई ने पूछा।
"पता नहीं," मैंने कहा।
सब हक्के-बक्के रह गए।
"मैं झूठ नहीं बोलूँगा," मैंने दोहराया। "मुझे पता नहीं कि इससे क्या होगा। पर इतना पता है कि वो बक्सा नाम पचा नहीं सकता। उसने भैरों काका का नाम लिया और फिर तीन दिन तक अंदर ही अंदर हिलता रहा। उसने हमें आज तक किसी का नाम नहीं बताया, क्योंकि वो नामों से डरता है। नाम बोलने से रिश्ता जुड़ता है। और रिश्ता जुड़ने से उसकी भूख बढ़ती है, पर उसका डर भी बढ़ता है। सो वो चाहता है कि हम चुप रहें, अकेले रहें, नाम न लें।"
उस्ताद ने धीरे से सिर हिलाया।
"अब बात समझ आई," उन्होंने कहा। "भूखा जितना खाता है, उतना मोटा होता है। और मोटा आदमी एक दिन अपना ही हाथ देख नहीं पाता, खा जाता है।"
"तो आप कह रहे हैं कि जोड़ते रहो?" भोला भाई ने कहा।
"मैं कह रहा हूँ," उस्ताद ने कहा, "कि जोड़ने से पहले तय करो कि तुम किसे जोड़ रहे हो। अगर तुम दो पुराने झगड़े जोड़ोगे, तो उसे खुराक मिलेगी। पर अगर तुम उस आदमी को जोड़ो जो डर के मारे चुप है, उस आदमी को जो पैसा लेकर बैठा है, उस औरत को जो आठ साल से अपनी बहन का नाम नहीं लेती — तो उसके पेट में वो चीज़ जाएगी जो उसे अंदर से खोखला करेगी।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"उस्ताद, आपने ये पहले क्यों नहीं कहा?"
"क्योंकि मैंने अपनी ज़िंदगी में यही गलती की थी," उन्होंने कहा। "मैंने अपने भाई से वो झगड़ा जोड़ लिया था जो सबसे आसान था। और उसकी कीमत मैंने पचास साल चुकाई। अब समय आया है कि महँगा जोड़ करें।"
शबनम आपा अब तक सबसे पीछे खड़ी थीं। उन्होंने पूरे वक़्त अपनी चिमटी हाथ में घुमाई थी, जैसे कोई तलवार सँभाल रही हो। अब वो आगे आईं।
और उन्होंने चिमटी मेज़ पर पटक दी।
पटाक।
आवाज़ ऐसी थी कि किशनलाल काका का चने का लोटा हाथ से छूटने-छूटने को हो गया।
"तो जोड़ना बंद?" शबनम आपा ने कहा। आवाज़ में वो सब था जो कमरे में किसी के पास नहीं था — गुस्सा नहीं, थकान नहीं, ज़िद। "सब बैठे हो, जैसे कोई परीक्षा का पेपर बाँट रहा हो। कोई कहता है जोड़ो, कोई कहता है मत जोड़ो, कोई कहता है सोचो, कोई कहता है पहले बताओ कि क्या होगा। मैं पूछती हूँ — तुम सब जब टूटे थे, तब किसने पूछा था कि क्या होगा?"
किसी ने जवाब नहीं दिया।
"मेरी बहन को मैंने पंद्रह साल नहीं देखा," उन्होंने कहा। "पंद्रह साल। उसके घर की छत गिरी तो मुझे किसी ने नहीं बताया। उसकी बेटी की शादी हुई तो मैंने सुना बाज़ार से। और मैं यहाँ बैठी रही, क्योंकि मुझे लगा कि अगर मैं पहले बोलूँगी तो मैं हार जाऊँगी।" उन्होंने चिमटी उठाई। "तो मैं कहती हूँ — जोड़ो। जोड़ो, चाहे उसका पेट भरे। पर मेरी बहन का नाम उस कॉपी में लिखो, अंकुश। सबसे ऊपर। मेरे नाम के ऊपर।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"आपा…"
"मैं सुन चुकी हूँ सब," उन्होंने कहा। "तूने कहा कि जोड़ने से वो और बड़ा होगा। ठीक है, बड़ा हो। पर मेरी बहन से बड़ा नहीं होगा। मैं उससे कहूँगी — रज़िया, तेरे हिस्से का आधा भी जाएगा, पर जाएगा किसी न किसी के साथ। और हम दोनों मिलकर उस आधे को इतना भारी कर देंगे कि वो उसे उगल देगा।"
कमरे में कोई साँस लेता रहा।
और तभी दरवाज़े पर साया पड़ा।
हम सब मुड़े।
दरवाज़े पर टिंकू की माँ खड़ी थीं।
बाल भीगे हुए, साड़ी का पल्लू सिर पर, हाथ में एक काग़ज़। उस काग़ज़ का रंग पीला था, पर भीगा हुआ था, इसलिए उस पर पानी की लकीरें बन गई थीं, जैसे काग़ज़ खुद रो रहा हो।
वो अंदर नहीं आईं। दरवाज़े पर ही खड़ी रहीं और सीधे मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश बेटा," उन्होंने कहा। आवाज़ सूखी थी।
"आपा, आइए, अंदर आइए, बैठिए—"
"पहले ये सुन ले," उन्होंने कहा।
उन्होंने काग़ज़ आगे बढ़ाया।
"ये सुबह स्कूल के गेट पर चिपका मिला। मैं पानी भरने गई थी।" उनका हाथ काँप रहा था। "उस पर लिखा है कि जो बच्चा महीने भर से नहीं आया, उसका नाम कट जाएगा। और नीचे एक सूची है।"
टिंकू ने एक कदम आगे बढ़ा।
"मेरा नाम?"
उसकी माँ ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। वो मुझे देखती रहीं।
"तेरा नाम नहीं है, बेटा," उन्होंने कहा। "पढ़ने वाले कोई और है।"
फिर उन्होंने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया, और उनकी उँगली सूची की सबसे ऊपर वाली लकीर पर रुकी।
"सबसे ऊपर तेरा नाम लिखा है, अंकुश।" उनकी आवाज़ टूट गई। "अंकुश यादव। साइकिल गली। और उसके आगे पेंसिल से दो शब्द लिखे हैं।"
मैंने काग़ज़ अपने हाथ में लिया।
पीला काग़ज़ भीगा हुआ था, स्याही फैल रही थी, पर दो शब्द साफ़ पढ़े जा रहे थे।
मैंने पढ़ा, और मेरी आवाज़ खुद मेरे कान में पराई लगी।
"जोड़ने वाला।"
कमरा शांत हो गया।
और मेरी जेब से घंटी, जो कल रात से ठंडी पड़ी थी, एक बार हल्की गरम हुई — इतनी धीमी कि जैसे कोई बुज़ुर्ग सिर्फ़ आँख उठाकर देख रहा हो, बोल नहीं रहा।
मैंने काग़ज़ सीधा किया।
और उस पीले काग़ज़ की सबसे नीचे वाली लकीर पर, जहाँ आम तौर पर मुहर होती है, वही निशान था — दो लकीरें, और बीच में एक बिंदु।
वही निशान जो चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर था।
वही निशान जो घंटी के छल्ले पर था।
और वही निशान जो कल शाम गली के कोने की धूल पर, किसी के जाने के बाद, अकेला छूट गया था।
॥
काग़ज़ मेरे हाथ में था और मेरे हाथ काँप रहे थे। अभी दो मिनट पहले इसी कमरे में शबनम आपा की आवाज़ गूँज रही थी — जोड़ो, चाहे उसका पेट भरे — और अब लग रहा था कि किसी ने कमरे की हवा तक उठाकर कहीं और रख दी हो।
टिंकू की माँ दरवाज़े पर ही खड़ी थीं। पानी उनके बालों से रिसकर गर्दन पर आ रहा था और वो उसे पोंछने की ज़हमत नहीं कर रही थीं। उनके हाथ में जो पीला काग़ज़ था, वो अब मेरे हाथ में था, पर उनकी उँगलियों के गीले निशान उस पर उभरे हुए थे, जैसे काग़ज़ पर कोई लिखकर चला गया हो।
"अंदर आ जाइए," मैंने कहा। "आपा, आप भीग रही हैं।"
"मैं भीग रही हूँ," उन्होंने दोहराया, जैसे ये बात उन्हें अभी समझ आई हो। "और तू सूखा बैठा है, अंकुश।"
ये सुनकर मेरी जीभ तालू से चिपक गई।
वो अंदर आईं। दरवाज़े की चौखट पर उनका हाथ रखा रह गया, जैसे वो अंदर आना चाहती हों और चौखट उन्हें छोड़ना नहीं चाहती हो। टिंकू दीवार के सहारे खड़ा था। उसका बस्ता उसके पैरों के पास पड़ा था, और वो बस्ते को देख नहीं रहा था। वो अपनी माँ के हाथ देख रहा था।
"बैठिए," मीरा ने आगे बढ़कर कहा। "आपा, चाय—"
"चाय नहीं।" उन्होंने सिर हिलाया। "मैं चाय पीने नहीं आई हूँ।"
कमरे में कोई हिला नहीं। शबनम आपा ने चिमटी मेज़ पर रख दी। उस्ताद अली बक्श कोने की कुर्सी पर बैठे थे और उनका चश्मा उनकी नाक पर बहुत नीचे आ गया था। भैरों काका दीवार के सहारे खड़े थे और उनकी टिन की लालटेन उनके हाथ में थी, जिसमें आग नहीं थी, फिर भी वो उसे पकड़े हुए थे, जैसे किसी का हाथ पकड़ा हो।
टिंकू की माँ ने एक गहरी साँस ली और सीधे मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश, मैं एक बात कहने आई हूँ और मैं इसे घुमाफिराकर नहीं कहूँगी," उन्होंने कहा। "आज रात के बाद, कल सुबह जो गाड़ी राँची जाती है, उसमें मेरे भाई का लड़का जाता है। उसके साथ ये लड़का भी जाएगा।"
कमरे में जो आवाज़ आई, वो किसी के मुँह से नहीं आई। वो कुर्सी की आवाज़ थी, जिस पर कोई उठता हुआ फिसल गया हो।
टिंकू ने धीरे से कहा, "माँ।"
"चुप।"
"माँ, मैं—"
"मैंने कहा चुप।" उनका हाथ हवा में उठा और फिर रुक गया, जैसे डंडा उठाकर भी मारना याद आ गया हो कि यह लड़का है, डंडा नहीं।
मैंने काग़ज़ मेज़ पर रखा। मेरी नज़र उसकी सबसे नीचे वाली लकीर पर गई, जहाँ वो निशान था — दो लकीरें, बीच में एक बिंदु। वही निशान जो चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर था, जो घंटी के छल्ले पर था, जो कल शाम गली के कोने की धूल पर अकेला छूट गया था।
"आपा," मैंने कहा, "ये काग़ज़ कल सुबह का नहीं है।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगीं।
"इस पर जो निशान है, वो आज का नहीं है," मैंने कहा। "ये उसी हाथ का निशान है जो हमारे घर के दरवाज़े पर, बाईस साल पहले, और कल शाम गली के मोड़ पर छूटा था। आपा, ये काग़ज़ किसी दफ़्तर से आया है, पर इसे किसी ने मेरे नाम के आगे हाथ से लिखा है।"
"मुझे नहीं पता किसने लिखा," उन्होंने कहा। आवाज़ में गुस्सा नहीं था, थकान थी। "मुझे ये पता है कि मैंने सुबह पाँच बजे उठकर चूल्हा जलाया, छह बजे पानी भरने गई, और वहाँ गेट पर ये काग़ज़ चिपका था। और मुझे ये भी पता है कि मेरे लड़के का नाम किसी सूची में नहीं है, पर मेरे लड़के को घर पर अकेला छोड़कर मैं कहीं नहीं जा सकती, क्योंकि यहाँ अब दिन में भी वो सफ़ेद कुर्ते वाले घूमते हैं।"
"आपा—"
"सुन ले पहले।" उन्होंने मेरी बात काटी। "मैं अनपढ़ नहीं हूँ, अंकुश। मैं जानती हूँ कि तू क्या कर रहा है। तेरी माँ मेरे घर आती थी, तब तू छोटा था और तेरे पापा हमारी छत ठीक करने आते थे। तेरी माँ ने मुझे बारह साल पहले एक बात कही थी — मेरा बेटा जब बड़ा होगा, वो सबका काम बिना पैसे करेगा, क्योंकि उसे औज़ार से ज़्यादा हाथ पसंद हैं।"
मेरा गला भर आया। मैंने कुछ नहीं कहा।
"और आज वो मेरे सामने है," उन्होंने कहा। "मेरा लड़का तेरी दुकान पर बैठकर पेंच सीख रहा है, और मैं रोज़ डरकर उसे ढूँढती हूँ। कल रात ये घर नहीं आया। मैंने दरवाज़े पर बैठकर पूरी रात सड़क देखी। इसका बाप चला गया तो मैंने सोचा था, अब बस इसी को पालूँगी। अब समझ आ रहा है कि पालना और बचाना दो अलग बातें हैं।"
टिंकू ने एक कदम आगे बढ़ा। उसकी आवाज़ बैठी हुई थी।
"माँ, मैं कहीं नहीं जाऊँगा।"
"बैठ जा।"
"मैं उस्ताद को छोड़कर नहीं—"
"मैंने कहा बैठ जा!"
कमरे में वो आवाज़ गूँज गई। शबनम आपा का हाथ उठा, जैसे वो बीच में आना चाहें, पर फिर रुक गया। टिंकू नहीं बैठा। वो वहीं खड़ा रहा, और मुझे उसकी आँखों में पानी दिखा। वो पानी उसने पोंछा नहीं। उसने अपनी आँखें एक बार भी नहीं झपकीं, जैसे झपकते ही आँसू गिर जाएँगे और वो गिरने नहीं देना चाहता था।
मैंने उसकी तरफ़ देखकर बहुत धीरे से सिर हिलाया। मतलब — चुप रह, मैं हूँ ना।
और यहीं से कमरा टूटने लगा।
"आपा ठीक कह रही हैं," भोला भाई ने कहा। वो दरवाज़े के पास खड़े थे और उनकी आवाज़ में वो हिम्मत नहीं थी जो सुबह थी। "मेरी आरज़ू को रात में दौरे पड़ते हैं। मैं कल रात दुकान पर था और मेरी बीवी अकेली उसे पकड़े बैठी रही। मेरा जला खाता सिपाही ले गया। मेरी दुकान सील की कतार में है। अंकुश भाई, मैं आपके साथ हूँ, पर मैं अपनी बच्ची से ये नहीं कह सकता कि तेरे बाप की दुकान बचाने के लिए तू रात भर मरे।"
"भोला भाई—" मैंने कहा।
"मैं झूठ नहीं बोल रहा," उन्होंने कहा, और उनकी आँखें भर आईं। "मैं डर गया हूँ। ये डर शर्म की बात है, पर ये सच है।"
नसीमा बाई ने अपना सिर उठाया। "मेरा साजिद दो हज़ार ले चुका है," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ सूखी थी। "मुझे नहीं पता वो किसे दे रहा है और किस बात पर दे रहा है। वो रात भर छत पर बैठा रहता है और मुझसे कुछ नहीं कहता। मैं आपकी लड़ाई में अपना बेटा नहीं खो सकती।"
"और मेरी बीवी की किडनी में पत्थर है," रमेश भाई ने कहा। वो दीवार के सहारे खड़े थे और उनकी मुट्ठी बंधी थी। "मुझे रोज़ तीन बाल्टी पानी चाहिए। कल एक पाइप वाला आया और बोला कि हाँ जी, काग़ज़ लाओ। काग़ज़ किसके पास है? तुम्हारे पास? नहीं। तो मैं क्या करूँ? मैं गली की लड़ाई में अपनी औरत को ढोता रहूँ?"
"रमेश भाई," मीरा ने कहा, "यही तो वो चाहता है—"
"मुझे पता है वो क्या चाहता है!" रमेश भाई ने कहा, और उनकी आवाज़ टूट गई। "मुझे पता है! पर जब औरत रात को कराहती है तो शहर की राजनीति याद नहीं रहती। माफ़ करना।"
किशनलाल काका ने अपनी लाठी की नोक ज़मीन पर टिकाई। वो बूढ़े थे और उनकी आँखें कमज़ोर थीं, पर उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो सिर्फ़ बूढ़ों में आती है — जिसने बहुत ज़्यादा देख लिया हो।
"मैं एक बात कहूँ?" उन्होंने कहा। "मैं चौदह साल से दाल की बोरी के नीचे एक काग़ज़ दबाए बैठा हूँ जिसमें मेरी दुकान बिकी हुई दिखाई गई है। मैंने वो कभी नहीं बेची। मैंने उसे जलाया भी नहीं। क्यों? क्योंकि मुझे डर था कि जलाने पर वो कहेगा कि तुमने सबूत मिटाया। अब सुनो — हम लड़ रहे हैं, पर हमें ये भी तो पता हो कि जीत कब होगी। मुझे कोई ऐसा आदमी दिखाओ जो बता दे कि ये कब खत्म होगा।"
किसी ने जवाब नहीं दिया।
"मैं बता दूँ?" मैंने कहा।
सब मेरी तरफ़ देखने लगे।
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा।
ये सुनकर कमरे में वो चुप्पी आई जो दरअसल एक चीख़ होती है, बस बिना आवाज़ के।
"मुझे नहीं पता कि ये कब खत्म होगा," मैंने दोहराया। "मुझे ये भी नहीं पता कि उसका खाता कैसे रुकेगा। मुझे इतना पता है कि वो मेरे हर जोड़ का आधा खा रहा है। मुझे इतना पता है कि जोड़ना बंद कर दूँ तो वो और खाएगा, क्योंकि टूटे रिश्ते भी उसकी रोटी हैं। और मुझे ये भी पता है कि जो आज यहाँ खड़ा है, अगर वो अपने घर जाकर अपने बेटे से एक सच्ची बात कहेगा, तो वो भी उसके हिस्से जाएगा।"
"तो फिर हम क्या करें?" नसीमा बाई ने कहा। "बैठे रहें? मर जाएँ?"
"नहीं," मैंने कहा। "पर मैं तुमसे ये नहीं कहूँगा कि आँख बंद करके मेरे पीछे चलो। मैंने वो कभी नहीं कहा।"
"तूने कल कहा था कि डरना मत," रमेश भाई ने कहा।
"मैंने कहा था," मैंने कहा। "और आज भी कहूँगा कि डरना मत — पर डर मतलब डरना मत। ये नहीं कहा कि डर को छुपाओ।" मैंने अपनी आवाज़ नीची की। "मैं आप सबसे झूठ नहीं बोलूँगा, क्योंकि जिस दिन मैं बोलूँगा, उस दिन मेरे सारे अंक शून्य हो जाएँगे, और फिर मेरे पास कुछ नहीं बचेगा — न औज़ार, न घंटी, न हिसाब।"
शबनम आपा ने अपनी चिमटी उठाई और वो मेज़ पर ज़ोर से पटकी।
"देखो," उन्होंने कहा, "अब मैं सुन चुकी हूँ सबको। कोई कहता है बंद कर दो, कोई कहता है पीछे हटो। मैं इन सबकी बात सुनकर एक बात कहूँगी।" वो सीधी खड़ी हुईं। "हम अगर जोड़ना बंद कर देंगे, तो उस आदमी को एक भी गोली नहीं चलानी पड़ेगी। वो सिर्फ़ ये देखेगा कि गली के लोग अपने ही घरों में दरवाज़े बंद करके बैठ गए। और जिस गली में लोग एक-दूसरे से सच नहीं बोलते, वहाँ वो जो चाहेगा लिखवा लेगा, जो चाहेगा अंगूठा लगवा लेगा।"
"तो क्या करें?" किशनलाल काका ने कहा। "लड़ें?"
"लड़ें," शबनम आपा ने कहा। "पर पता है लड़ना क्या है? लड़ना ये है कि कल सुबह मैं अपनी बहन के पास बैठकर ये कहूँ कि तेरे हिस्से का आधा भी उसके पेट में जाएगा, पर जाएगा मेरे साथ। और तू अगर मेरे साथ आएगी, तो वो उसे उगल देगा।"
"ये तो आप कह रही हैं," भोला भाई ने कहा, "पर कैसे? हमारे पास कोई तरीक़ा है?"
सब फिर मेरी तरफ़ देखने लगे।
और मैंने वो किया जो मुझे करना चाहिए था, और जो मुझे करते हुए सबसे ज़्यादा डर लगा।
कोई जवाब देने का सहारा नहीं था।
"नहीं है," मैंने कहा।
कमरा सुन्न हो गया।
"नहीं है," मैंने फिर कहा, धीरे से। "मेरे पास कोई तरीक़ा नहीं है कि वो और न बढ़े। मुझे सिर्फ़ इतना पता है कि वो मेरे जोड़ से खाता है। मुझे ये नहीं पता कि उसका मुँह कैसे बंद होगा। उस्ताद कहते हैं महँगा जोड़ करो। शबनम आपा कहती हैं उससे बड़ा जोड़ करो। पर मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगा — मैं अभी उस रास्ते पर खड़ा हूँ जिसका आगे का हिस्सा मुझे नहीं दिख रहा।"
उस्ताद अली बक्श ने अपना चश्मा उतारा और उसे कमीज़ से पोंछने लगे। उन्होंने कुछ नहीं कहा। उनकी चुप्पी कमरे में सबसे ऊँची आवाज़ थी।
"तो फिर हम क्यों लड़ें?" रमेश भाई ने कहा। उनकी आवाज़ अब गुस्से की नहीं थी। वो थकी हुई थी और थकी हुई आवाज़ गुस्से से ज़्यादा काटती है। "अगर तुम्हें खुद नहीं पता कि क्या होगा, तो मैं अपनी औरत को किस भरोसे पर ले जाऊँ?"
"इसी भरोसे पर," मैंने कहा, "कि मैं तुम्हें झूठ नहीं बोलूँगा।"
"ये भरोसा नहीं है," उन्होंने कहा। "ये तसल्ली है।"
और वो पहले आदमी थे जो उठे।
उन्होंने अपनी बाल्टी उठाई, दरवाज़े की तरफ़ बढ़े, फिर रुके और मेरी तरफ़ देखा।
"मैं तुम्हारे खिलाफ़ नहीं हूँ, अंकुश," उन्होंने कहा। "मैं अपने घर के साथ हूँ। फ़र्क़ ये है कि मेरे घर में सिर्फ़ मैं हूँ।"
वो चले गए।
उनके जाने के बाद कमरा वैसा नहीं रहा। कमरा हर बार थोड़ा-थोड़ा खाली होने लगा।
किशनलाल काका उठे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और कुछ कहने के लिए मुँह खोला, फिर बंद कर दिया। उनकी आँखों में वो बात थी जो बूढ़े लोग कहना चाहते हैं पर कह नहीं पाते, क्योंकि कहने से उनका बचा हुआ थोड़ा-सा यक़ीन भी चला जाएगा। उन्होंने अपने चने का लोटा उठाया, लाठी उठाई, और धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतर गए।
नसीमा बाई उठीं। उन्होंने अपना दुपट्टा सीधा किया।
"मैं कल सुबह आ जाऊँगी," उन्होंने कहा। "पर मैं साजिद को अकेला नहीं छोड़ सकती। वो रात भर छत पर बैठा है और मैं उसे देख नहीं सकती।"
"आपा, आप उससे—"
"मैं जानती हूँ," उन्होंने मेरी बात काटी, और उनकी आवाज़ में थोड़ी कड़वाहट थी। "मुझे लगेगा कि मैं तुम्हें छोड़कर जा रही हूँ। पर मैं अपने बेटे को छोड़कर नहीं जा सकती। माफ़ करना।" और वो चली गईं।
भोला भाई ने अपना रूमाल निकाला, माथा पोंछा, और दो कदम बढ़े।
"भाई," उन्होंने कहा, "मैं कल दुकान का शटर उठाऊँगा या नहीं, ये मुझे नहीं पता। पर ये पता है कि अगर आरज़ू की दवा कल भी चली तो मैं तुम्हारे काम आऊँगा।"
"भोला भाई, आपकी दुकान—"
"मेरी दुकान जाए भाड़ में," उन्होंने कहा, और मुझे लगा कि उन्होंने ये पहली बार इतनी साफ़ आवाज़ में कहा। फिर उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और मेरे कान के पास धीरे से कहा, "पर मैं तुमसे एक बात कहूँगा। तुमने आज जो सच बोला — कि तुम्हें नहीं पता — वो तुम्हें डुबोएगा। पर वो तुम्हें झूठ से बचाएगा। झूठ और भरोसा, दोनों साथ नहीं चलते।"
वो चले गए।
मैं खड़ा रहा। मैंने खुद को रोका, क्योंकि अगर मैं एक बार भी उनसे ये कहता कि रुक जाओ, तो मैं अपनी ही बात का झूठा हो जाता। और मैं झूठ नहीं बोल सकता था। मैं चुप बैठ सकता था, बात छुपा सकता था, पर झूठ — नहीं।
मीरा मेरे पास आई। उसका कैमरा मेज़ पर पड़ा था, लाल बत्ती बुझी हुई। उसने कुछ नहीं कहा। उसने सिर्फ़ अपनी कॉपी खोली और उसमें देखने लगी, जैसे वहाँ लिखा हुआ कुछ उसे अगली लाइन बता देगा। उसकी कलम टेबल पर रखी थी और वो उसे उठाने की ज़हमत नहीं कर रही थी।
और फिर उस्ताद उठे।
उन्होंने अपना मोटा चश्मा पहना, कान पर पेंसिल ठीक की, और मेरी तरफ़ देखा।
"पचास साल पहले," उन्होंने कहा, धीरे से, "मेरे भाई ने मुझसे यही पूछा था — कब खत्म होगा। और मैंने कहा था — जब हम जोड़ना बंद कर देंगे। वो दिन आया और आज तक खत्म नहीं हुआ।" उन्होंने लाठी उठाई। "मैं डरा हुआ आदमी हूँ, अंकुश। सत्तर साल का डरा हुआ आदमी, जिसने पचास साल अपने भाई से बात नहीं की। इसलिए मैं ये नहीं कहूँगा कि डरना मत। मैं ये कहूँगा कि अगर डर गए, तो मेरी दुकान पर आ जाना। वहाँ मशीन है, मैं तुम्हें सिलाई सिखा दूँगा। हाथ का काम डर को थोड़ा हल्का कर देता है।"
वो भी चले गए।
कमरे में अब गिने हुए लोग बचे थे। शबनम आपा, मीरा, भैरों काका, और दीवार के सहारे खड़ा टिंकू।
और टिंकू की माँ।
जो अब तक चुप खड़ी थीं और सब सुन रही थीं।
उन्होंने कुर्सी खींची और बैठ गईं। पहली बार वो बैठीं। उनके हाथ काँप रहे थे, और उन्होंने उन्हें अपनी साड़ी में छिपा लिया।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "मैं तुझसे बुरी नहीं हूँ।"
"मुझे पता है।"
"तू मेरे लड़के को सिखाता है, मैं जानती हूँ। उसके बाप के जाने के बाद ये बच्चा चुप हो गया था। छह महीने इसने किसी से ठीक से बात नहीं की। फिर तू आया और ये रोज़ सुबह दुकान की तरफ़ भागने लगा। मैंने सोचा था कि भगवान ने भेजा है।"
"तो फिर—"
"इसीलिए।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में वो बात थी जो माँ की आँखों में होती है — प्यार और डर, एक ही रंग में। "क्योंकि मैं उसे दोबारा नहीं खो सकती। तू उसे ज़िंदगी दे रहा है, और मैं देख रही हूँ कि ये ज़िंदगी उसे कहाँ खींच रही है। कल रात बारह बजे ये घर पर नहीं था। मैं सड़क पर खड़ी थी और मेरे हाथ में उसकी पुरानी कॉपी थी, जिसमें उसने पाँच रुपये जोड़कर लिखा था — 'उस्ताद के लिए नया पेचकस'।"
मेरी आँखें जलने लगीं।
"वो पाँच रुपये उसने अपने खाने से बचाए," उन्होंने कहा। "और मैं उस वक़्त सोच रही थी कि ये पाँच रुपये किस दिन उसकी जान लेंगे।"
शबनम आपा ने धीरे से कहा, "लक्ष्मी।"
"आपा, मुझे मत समझाइए," उन्होंने कहा। "मैं दो रात से सो नहीं रही। मैं जानती हूँ कि आप सब जो कर रहे हैं, वो सही है। मगर सही होना और मेरे लड़के का होना, दोनों एक साथ नहीं हो सकते। मैंने सोच लिया है। कल सुबह गाड़ी है।"
कमरा फिर चुप हो गया।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
वो दीवार के सहारे से हटा और मेज़ के पास आया। उसने काग़ज़ उठाया — वही पीला, भीगा काग़ज़ — और उसे दोनों हाथों से सीधा किया, जैसे वो कोई बहुत कीमती चीज़ हो।
"माँ," उसने कहा, "ये काग़ज़ तुमने कहाँ से लिया?"
"स्कूल के गेट से।"
"किसने चिपकाया?"
"पता नहीं।"
"तो इस पर अंकुश भैया का नाम किसने लिखा?"
उसकी माँ ने जवाब नहीं दिया।
"माँ," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में अब रोना नहीं था, कुछ और था — बहुत ठंडा, बहुत छोटा, जैसे किसी लड़के के अंदर से कोई आदमी बाहर झाँक रहा हो, "अगर ये काग़ज़ सच है, तो इस पर उस्ताद का नाम क्यों है? सूची में सिर्फ़ उनका नाम क्यों है? मेरा नाम क्यों नहीं?"
"क्योंकि—"
"क्योंकि मैं किसी के काम का नहीं हूँ," टिंकू ने कहा। "मैं तेरे लिए डर हूँ और उनके लिए औज़ार हूँ। इसलिए मेरा नाम किसी सूची में नहीं आता।"
उसकी माँ ने हाथ बढ़ाया, पर टिंकू पीछे हट गया। बहुत थोड़ा, बहुत धीरे, पर मैंने देख लिया और मुझे लगा कि कमरे में सबसे ज़्यादा चोट उसी एक कदम से हुई।
"मैं कल गाड़ी में नहीं बैठूँगा," टिंकू ने कहा।
"तू बैठेगा।"
"नहीं बैठूँगा।"
"मैं तेरी माँ हूँ—"
"और मैं उसका शागिर्द हूँ," टिंकू ने कहा। आवाज़ ऊँची नहीं थी। "तूने मुझे बाप दिया, माँ। उसने मुझे काम दिया। काम के बिना आदमी का कोई नाम नहीं होता। और मुझे नाम चाहिए। अगर तू मुझे भेज देगी, तो मैं वहाँ भी बस एक ऐसा लड़का रहूँगा जिसका नाम किसी सूची में नहीं आता।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी वहाँ थी। ठंडी। कल रात से ठंडी। एक बार हल्की गरम हुई थी, बस।
और मैंने उसे हाथ में लिया, और मैंने सोचा — अगर तू कुछ जानता है, तो अब बोल। कुछ भी बोल। एक शब्द। एक ही शब्द।
घंटी चुप रही।
मैंने उसे जेब में वापस रखा। और मैंने उस कमरे में खड़े होकर एक बात समझी जो मुझे पहले नहीं समझ आई थी — तंत्र मेरे काम का हिस्सा है, मेरे डर का नहीं। जब मैं डरता हूँ, तब वो चुप हो जाता है। जैसे वो भी सुन रहा हो कि मैं अब भी उसी भरोसे बैठा हूँ जो कल तक था।
मैंने टिंकू की माँ की तरफ़ देखा।
"आपा," मैंने कहा, "एक बात कहूँ? आप मना कर सकती हैं। पर सुन लीजिए।"
उन्होंने सिर हिलाया।
"कल सुबह गाड़ी है, ठीक है," मैंने कहा। "मैं उसे रोकूँगा नहीं। मैं तुम्हारी माँ हूँ के खिलाफ़ नहीं खड़ा होऊँगा। पर आज रात, सिर्फ़ आज रात, मुझे उसकी ज़रूरत है। एक काम है जो सिर्फ़ वो कर सकता है, क्योंकि वो छोटा है, पतला है, और उसकी आँखें गली में सबसे तेज़ हैं।"
"अंकुश—"
"आज रात के बाद वो गाड़ी में बैठेगा," मैंने कहा, "और मैं उसके हाथ में एक चीज़ रखूँगा — अपनी घंटी का पेंच। और मैं उससे ये कहूँगा कि जिस दिन तू लौटेगा, उस दिन ये पेंच मेरे हाथ में होगा और तेरे नाम की पहली लकीर मेरी कॉपी में। तब तक वो पेंच उसके पास रहेगा, याद दिलाने को कि यहाँ कोई उसका इंतज़ार कर रहा है।"
मैंने रुककर उनकी आँखों में देखा।
"पर आपा, मैं एक बात कहूँगा—" मेरी आवाज़ भारी हो गई। "अगर वो आज रात के बाद चला गया, तो ये गली उसे वापस नहीं बुला पाएगी। क्योंकि गली उसे उसके काम से जानती है, नाम से नहीं। और जिस दिन उसकी कुर्सी खाली दिखेगी, उस दिन किसी को याद नहीं आएगा कि वहाँ कोई था।"
टिंकू की माँ ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
कुछ देर वो ऐसे ही बैठीं। कमरे में सिर्फ़ मीरा की कलम की आवाज़ आ रही थी, जो अब वो उठा चुकी थी और किसी काग़ज़ पर कुछ लिख रही थी — मुझे नहीं पता क्या, पर मुझे लगा कि वो आज की तारीख़ लिख रही थी।
फिर उन्होंने आँखें खोलीं।
"एक शर्त पर," उन्होंने कहा।
"कहिए।"
"आज रात के बाद, तू खुद उसके सामने मना करेगा। अपने मुँह से कहेगा कि जा, और वहाँ जाकर पढ़, और यहाँ की बात भूल जा।"
मेरे अंदर कुछ टूटा। मुझे नहीं पता क्या। पर टूटा।
"आपा—"
"मैंने कहा।" उनकी आवाज़ साफ़ थी, जैसे उन्होंने रात भर इस वाक्य को रटा हो। "मैं तेरे मुँह से सुनना चाहती हूँ कि तू मेरे लड़के को जाने दे रहा है। मैं ये नहीं चाहती कि वो मुझसे डरकर जाए। मैं ये चाहती हूँ कि वो तुझसे उम्मीद लेकर जाए, कि जिस आदमी ने उसे काम सिखाया, उसने कहा — जा, तेरा यहाँ काम खत्म नहीं हुआ, बस तेरा रास्ता लंबा है।"
मैंने सिर हिलाया।
मेरे मुँह से निकला, "ठीक है।" और वो शब्द मेरे गले से ऐसे निकला जैसे किसी ने खींचकर निकाला हो।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
उसकी आँखों में अब भी पानी था, पर वो अब गिर नहीं रहा था। वो वहीं खड़ा था, और उसका बस्ता उसके पैरों के पास पड़ा था, और उसकी चप्पल का एक हिस्सा टूटा हुआ था, और उसके घुटने पर पट्टी थी, और उसकी जेब में वो लाल कवर वाली कॉपी थी जिसमें उसने कभी अपने खर्चे नहीं लिखे थे।
और तभी उसने वो कहा।
बहुत धीरे से। इतना धीरे कि मुझे लगा मैं उसकी आवाज़ सुनने की कल्पना कर रहा हूँ।
"उस्ताद, तुम मना करोगे ना?"
कमरा ऐसे रुक गया जैसे किसी ने साँस लेना बंद कर दिया हो।
शबनम आपा ने अपना सिर उठाया। मीरा की कलम रुक गई। भैरों काका ने लालटेन को दोनों हाथों से पकड़ लिया, जैसे कहीं गिर न जाए।
और टिंकू की माँ ने, जो अब तक दीवार की तरह सीधी बैठी थीं, एक बार अपनी आँखें बंद कीं। सिर्फ़ एक बार।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो मुझसे कुछ नहीं कह रहा था। वो मुझसे पूछ नहीं रहा था कि क्या करूँ। वो मुझसे ये पूछ रहा था कि तुम क्या हो — वो आदमी हो जो मेरी माँ के सामने सिर झुकाकर हाँ कह देगा, या वो जो आज रात के बाद मेरे नाम की पहली लकीर अपनी कॉपी में डालेगा।
और मेरी जेब में घंटी, जो कल रात से ठंडी थी, अब हल्की गरम हो रही थी।
एक इंच। बस एक इंच।
जैसे किसी बुज़ुर्ग ने आँखें उठाकर कमरे में देख लिया हो।
मैंने मुँह खोला।
और मैंने कहा, "हाँ। मैं मना करूँगा।"
टिंकू की आँखों से पानी गिर गया।
और उसकी माँ ने, बिना एक शब्द बोले, उठकर अपना पल्लू सीधा किया, कुर्सी को उसकी जगह पर रखा, और दरवाज़े की तरफ़ चल दीं।
दरवाज़े पर पहुँचकर वो रुकीं।
"अंकुश," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ अब टूटी नहीं थी, बस बहुत थकी हुई थी, "आज रात खाना खा लेना। भूखे आदमी के हाथ काँपते हैं और काँपते हाथ से कुछ भी ठीक नहीं होता।"
वो चली गईं।
दरवाज़ा खुला रह गया। बाहर गली में रोशनी कम हो रही थी और कहीं दूर किसी के दरवाज़े पर कोई बुज़ुर्ग खाँस रहा था।
मैं वहीं खड़ा रहा, और मेरे हाथ में घंटी थी, जो अब पूरी गरम हो चुकी थी, पर बोल नहीं रही थी। वो चुप थी — पर वो चुप्पी ठंडी नहीं थी। वो ऐसी चुप्पी थी जैसे कोई बूढ़ा सामने बैठा हो, हाथ जोड़े, और सिर्फ़ इतना कह रहा हो कि अब तेरी बारी है, बेटा।
॥
दरवाज़ा खुला रह गया था। बाहर गली में रोशनी कम हो रही थी और मैं वहीं खड़ा था, हाथ में गरम घंटी और मुँह में वो "हाँ" जो अभी भी किसी चीज़ जैसा लग रहा था — जैसे बहुत भारी चीज़ उठा ली हो और अब कहीं रखने की जगह न मिल रही हो।
पीछे टिंकू खड़ा था।
न वो रो रहा था, न हँस रहा था। बस खड़ा था। उसका बस्ता पैरों के पास पड़ा था, टूटी चप्पल आधी उतर गई थी, और घुटने की पट्टी पर धूल जम गई थी।
मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया। ज़ोर से नहीं, धीरे से, जैसे घर में कोई सो रहा हो।
"बैठ।" मैंने कहा।
वो बैठ गया। उसी चारपाई के कोने पर जहाँ मैं रोज़ औज़ार रखता हूँ और जहाँ माँ हमेशा डाँटती है कि बेटा, यहाँ मत बैठ, कमर टूट जाएगी।
मैंने दुकान के पीछे वाले ताखे से वो पुराना गुनगुनाता बल्ब जला दिया। रोशनी पीली थी, थोड़ी काँपती हुई। उसी में टिंकू का चेहरा ऐसा दिख रहा था जैसे किसी पुरानी तस्वीर में हो — जिसमें बच्चा मुस्कुरा तो रहा हो, पर आँखें अभी तय न कर पाई हों कि मुस्कुराना है या नहीं।
बाहर गली बहुत चुप थी।
आम दिन इस वक़्त तक शबनम आपा की गुमटी पर बर्तन खड़कते रहते, भोला भाई की दुकान से रेडियो बजता रहता, और दूर कहीं कुत्ते भौंकते रहते। आज कुछ नहीं। बस कभी-कभी पीपल की पत्तियाँ हिलती और लगता जैसे कोई बुज़ुर्ग दूर बैठकर धीरे-धीरे साँस ले रहा हो।
मैंने टिंकू के आगे वो लोहे का गिलास रख दिया जिसमें पानी था। उसने नहीं पिया।
"उस्ताद।"
"हूँ।"
"तुम सच में कहोगे?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"क्या कहूँगा?"
"वो ही।" उसने नीचे देखते हुए कहा। "कि जा, राँची जा, वहाँ पढ़।"
मैं एक पल चुप रहा। फिर चारपाई पर उसके पास बैठ गया। मेरे हाथ में घंटी थी, और वो अब भी गरम थी — बहुत ज़्यादा नहीं, बस इतनी कि जेब में रखने का मन न करे।
"तूने मुझसे एक बात पूछी थी," मैंने कहा। "कि तुम मना करोगे ना।"
"हाँ।"
"तो सुन। मैं उस बात का जवाब आज नहीं दूँगा। आज रात मैं सिर्फ़ इतना कहूँगा कि तेरी माँ के सामने जो कहा, वो मेरी ज़ुबान से निकला है और मैं उसे मुकरने वालों में से नहीं हूँ। पर तेरे सामने मैं एक और बात कहना चाहता हूँ, और वो ये है — तू मुझसे पूछ रहा है कि क्या करूँ। मैं तुझे यह नहीं बताऊँगा। आज रात तू खुद बता — क्या करना है।"
टिंकू ने सिर उठाया।
"मैं बताऊँ?"
"हाँ।"
"उस्ताद, मैं तेरह साल का हूँ।"
"तो?"
"तो मुझे क्या पता—"
"मुझे भी नहीं पता," मैंने कहा। "पर मैं चौबीस साल का हूँ और अब तक जो भी बड़े फ़ैसले लिए, आधे गलत निकले। तेरी उम्र का तो पता नहीं, पर मेरी उम्र में भी कोई जवाब जेब में लेकर नहीं घूमता। तू बता। अपनी बात बता। डर के बिना।"
वो चुप हो गया।
बल्ब गुनगुनाया। बाहर कहीं कोई दरवाज़ा धीरे से बंद हुआ।
"मुझे स्कूल से डर लगता है," उसने कहा।
मैंने कुछ नहीं कहा।
"ऐसे नहीं कि वहाँ मार पड़ती है। मार तो मेरे अब्बा भी नहीं मारते थे।" उसकी आवाज़ फिसल गई, और वो फिर सँभल गया। "मुझे इस बात से डर लगता है कि मास्टर जी क्लास में मेरा नाम पुकारेंगे और कोई बच्चा हँसेगा। और मैं जानता हूँ कि वो क्यों हँसेंगे — क्योंकि मेरा बस्ता फटा है, क्योंकि मेरी चप्पल टूटी है, क्योंकि मैं पिछली क्लास में बैठा रह जाऊँगा। मास्टर जी ने दो बार मुझे बुलाया और दोनों बार मेरे सामने कह दिया — ये बच्चा यहीं रह जाएगा, क्लास में आगे नहीं जाएगा। और मैं वहाँ बैठा रहा। मैं कुछ नहीं बोला। मुझे लगा अगर मैं बोलूँगा तो सब मुझे और देखेंगे।"
मेरे अंदर कुछ हिला।
वो जारी रहा।
"और सबसे ज़्यादा डर…" उसने कहा, और रुक गया। फिर बहुत धीरे, "सबसे ज़्यादा डर इस बात का है कि तुम मुझे भूल जाओगे।"
मैं एक पल के लिए हँस पड़ा। असली हँसी नहीं, वो हँसी जो आदमी तब हँसता है जब अंदर कुछ चुभ रहा हो, और वो हँसी से उसे दबाना चाहता हो।
"भूल जाऊँगा?" मैंने कहा। "टिंकू, मैं वो आदमी हूँ जो सुबह उठकर भूल जाता हूँ कि चाय में चीनी डाली थी या नहीं। दो बार नहा धोकर भूल जाता हूँ कि नहाया था। मैंने एक बार अपनी ही दुकान का शटर बंद करके तीन दिन उसे खुला समझकर घूमता रहा। मेरी याददाश्त बहुत खराब है, टिंकू।"
उसने मुझे देखा।
"पर दिल खराब नहीं है," मैंने कहा। "याददाश्त भूल जाती है चीज़ें। दिल नहीं भूलता आदमी।"
टिंकू हँसा। पहली बार उस रात। वो एक छोटी सी हँसी थी — नाक से निकली, आधी आँखों में ही रुक गई। पर हँसी थी।
"ये भी कोई बात हुई," उसने कहा। "तुमने दो बार नहाया?"
"तीन बार," मैंने कहा। "और तीसरी बार मुझे लगा मैं बार-बार नहा रहा हूँ क्योंकि शायद बदबू बाकी है। फिर माँ ने आकर कहा — बेटा, तू साबुन ही खा गया।"
वो और हँसा।
और फिर, हँसी धीरे-धीरे उतर गई। क्योंकि मेरी आवाज़ खुद धीमी हो रही थी।
मैंने घंटी को हथेली में लिया। वो हल्की गरम थी, जैसे बस अभी-अभी किसी ने छुआ हो और हटा दिया हो। मैंने उसे दोनों हाथों में ले लिया, ताकि वो ठंडी न लगे।
"टिंकू।"
"हाँ।"
"मुझे भी डर लगता है।"
वो चुप हुआ।
"मैंने किसी को नहीं बताया," मैंने कहा। "ना माँ को, ना काजल को, ना मीरा को। कभी किसी को नहीं। पर आज तुझे बता रहा हूँ, क्योंकि तू मुझसे अपना सबसे बड़ा डर बता चुका है, और अब बारी मेरी है।"
मैंने घंटी को नीचे देखा।
"मुझे यह डर लगता है कि जिस दिन मैं सबको बचाने निकलूँगा, उसी दिन मैं सबको खो दूँगा। हर एक को। इस गली को, इस दुकान को, इन लोगों को। मुझे यह डर लगता है कि एक-एक करके सब मेरे हाथ से चला जाएगा और मैं बीच में खड़ा चीखता रहूँगा — रुको, रुको — और कोई नहीं रुकेगा। मुझे यह डर लगता है कि मैं शाम को यहाँ बैठूँगा और चारों तरफ़ देखूँगा और हर जगह खाली कुर्सियाँ दिखेंगी। और मुझे यह डर लगता है कि उस दिन कोई कहेगा — अंकुश भाई, तुमने बहुत अच्छा किया। बाईस साल की गलती सुधार दी। और मैं कहूँगा — हाँ। और वो जो मैंने सुधारी, वो मेरी नहीं होगी, क्योंकि सुधारने वाले के पास अक्सर सिर्फ़ सुधार बचता है।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
"उस्ताद—"
"नहीं," मैंने कहा। "मैं तुझे रुलाने नहीं बैठा। मैं बस कह रहा हूँ — तुझे अपने स्कूल से डर लगता है, मुझे अपनी गली से डर लगता है। तेरा डर तेरह साल का है, मेरा डर चौबीस साल का। पर दोनों एक ही जगह से आते हैं। अंदर से। किसी के देखने से नहीं, अपने आप को देखने से।"
वो चुप बैठा रहा।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"और एक बात सुन। तेरे स्कूल वाला डर — वो तेरा नहीं है। वो उनका है जो तुझे देखकर हँसते हैं। मिट्टी में सबसे पहले वो हँसते हैं जो खुद पर हँसने से डरते हैं। मैं भी हँसता था, तेरी उम्र में। मैं भी किसी को नीचा दिखाता था, ताकि कोई मुझे नीचा न दिखा दे। तू मुझसे बेहतर है, टिंकू। तेरा डर सीधा है।"
उसने आँखें मलीं।
"उस्ताद—"
"क्या?"
"एक बात कहूँ?"
"कह।"
"मैं राँची जाना नहीं चाहता।"
"मुझे पता है।"
"पर माँ—"
"तेरी माँ बहुत मज़बूत औरत है," मैंने कहा। "और मज़बूत औरतें अक्सर अपने बेटों को दूर इसलिए भेजती हैं कि वो डरती हैं उन्हें कुछ हो जाएगा। तेरी माँ ने अपना आदमी खोया है। वो दोबारा किसी को खोना नहीं चाहती। इसीलिए वो तुझे अपने से दूर करके भी सोचती है कि वो तुझे बचा रही है।"
टिंकू ने सिर उठाया।
"मेरे अब्बा?"
"हाँ।"
"तुम जानते हो?"
"मैं जानता हूँ कि तेरे अब्बा छह महीने पहले गए। और उसके बाद से माँ क्या-क्या झेल रही है, वो भी जानता हूँ। पर टिंकू, मैं तुझे यह नहीं कहूँगा कि तू बड़ा होकर उसका दुख पूरा कर देगा। आज मैं सिर्फ़ इतना कहूँगा — तू जो है, वही रह। डर के साथ भी रह। और मुस्कुराना छोड़ मत।"
वो चुप हो गया। और उस चुप्पी में उसकी आँखों से फिर पानी आया, पर इस बार वो पोंछ नहीं रहा था। वो बस बहने दे रहा था, जैसे पानी को बहने देना भी एक काम हो।
और तभी मुझे आहट मिली।
दरवाज़े के बाहर किसी के पैर ज़मीन पर रगड़े थे।
मैंने सिर उठाया। दरवाज़ा आधा खुला था — मैंने उसे बंद समझा था, पर शायद हवा से या शायद किसी ने खोल दिया था।
बाहर, अँधेरे में, टिंकू की माँ खड़ी थीं।
न वो अंदर आईं, न वो चली गईं। वो बस खड़ी थीं, दीवार से सटकर, दोनों हाथ साड़ी के पल्लू में लपेटे हुए, और उनकी आँखें बह रही थीं।
मैं उठकर खड़ा हो गया।
"आपा—"
वो अंदर आईं।
धीरे। जैसे हर कदम में कोई पुराना बोझ उठा रही हों। वो चारपाई के पास आईं और नहीं बैठीं। बस खड़ी रहीं। एक हाथ से पल्लू खींचकर ठीक किया, फिर वो हाथ फिर से ढीला कर दिया, जैसे अब ताकत नहीं बची हो कुछ सँभालने की।
"मैंने सब सुन लिया," उन्होंने कहा।
मैंने कुछ नहीं कहा।
"मैं जानती हूँ यह सुनना ठीक नहीं था। पर मैं टिंकू को यहाँ छोड़कर जा नहीं पाई। दरवाज़े पर खड़ी थी। सोच रही थी — बस एक बात कहकर चली जाऊँगी। और तब मैंने सुना जो तुमने कहा।"
उनकी आवाज़ टूट गई। एक बार। फिर सँभल गई।
"अंकुश। मैं तुमसे एक बात कहना चाहती हूँ, और वो बात मैंने किसी से नहीं कही। ना अपने भाई से, ना अपनी बहन से, ना टिंकू से।"
वो एक लंबी साँस लेकर रुकीं।
"उस दिन," उन्होंने कहा, "जिस दिन इनके अब्बा गए, मैं अस्पताल में उनके सिरहाने बैठी थी। डॉक्टर साहब ने कहा — आपा, अब आप घर जाइए, आपने दो रात से सोया नहीं है। मैंने कहा — नहीं, मैं यहीं बैठूँगी। और मैं बैठी रही। और वो मर गए।"
मैंने देखा, टिंकू ने अपनी माँ की तरफ़ नहीं देखा। उसने नीचे देखा। जैसे वो यह बात पहली बार सुन रहा हो और साथ में जानता हो कि सुनना कितना तकलीफ़ देगा।
"उसके बाद से," टिंकू की माँ ने कहा, "मुझे हर अपने को खोने का डर लगता है। टिंकू जब देर से घर आता है, मुझे लगता है — कुछ हो गया। जब वो सो जाता है, मैं उसके सीने पर हाथ रखकर देखती हूँ कि साँस चल रही है या नहीं। इस गली में जब भी कोई चीखता है, मेरा कलेजा धक से रह जाता है। मैं जानती हूँ यह पागलपन है। पर यह पागलपन मेरे साथ सोता है। मेरे साथ उठता है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"और जब वो सफ़ेद कुर्ते वाला आया और उसने कहा कि मेरे बेटे का नाम सूची में है… तो मेरा पहला ख़याल यह नहीं था कि काग़ज़ क्या है। मेरा पहला ख़याल यह था कि अगर मैंने उसे रोका और कुछ हो गया, तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं करूँगी। इसीलिए मैं उसे राँची भेजना चाहती हूँ। अपनी बहन के पास नहीं। भाई के लड़के के पास नहीं। किसी ऐसी जगह जहाँ वो मेरी नज़र से दूर हो, ताकि जब मेरी नज़र के सामने कुछ न हो, तो मुझे डर भी न लगे।"
वो फिर टूट गईं। इस बार रुकीं नहीं। यह पहली बार था जब मैंने उन्हें इस तरह रोते देखा — न आवाज़, न हिचकी, बस चेहरा और हाथ काँपना।
टिंकू उठा। वो अपनी माँ के पास गया और उनसे लिपट गया। और वो — वो एक हाथ उसके सिर पर रखकर धीरे-धीरे सहलाने लगीं, जैसे चलती हुई गाड़ी को रोक रही हों।
मैं वहीं खड़ा रहा, चुप।
मेरी जेब में घंटी गरम हो रही थी।
एक इंच।
फिर दो इंच।
मैंने उसे जेब से निकाला। वो मेरे हाथ में काँप रही थी, और उसकी सतह पर वो पुरानी दो लकीरें और बीच में बिंदु वाला निशान चमक रहा था, धीरे-धीरे।
पर वो बजी नहीं।
वो बजी नहीं।
यह पहली बार था जब वो काँप रही थी और बोल नहीं रही थी। जैसे वो खुद कुछ बोलने की कगार पर हो, और फिर सोच ले कि नहीं, यह जगह मेरी नहीं है।
मैंने घंटी को दोनों हाथों में लिया और टिंकू की माँ के सामने रख दिया। उनके सामने, चारपाई पर, उनकी आँखों के सामने।
"आपा," मैंने कहा। "यह घंटी है।"
उन्होंने उसे नहीं छुआा। मैंने कहा था — दूसरे के हाथ में यह कुछ नहीं करती। पर शायद उन्होंने भी कभी वो बात नहीं सुनी थी, इसलिए वो चुप देखती रहीं।
"इससे जो जुड़ता है," मैंने कहा, "सिर्फ़ सच से जुड़ता है। मैं आज रात इससे कोई जोड़ नहीं करवाऊँगा।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
"उस्ताद—"
"आज रात नहीं," मैंने कहा। "आज रात जो जोड़ा जाएगा, वो डर का जोड़ होगा। तेरी माँ डर से रो रही हैं, तू डर से बैठा है, और मैं डर से खड़ा हूँ। इस डर में से कोई सच्ची बात नहीं निकलेगी। और जो सच्ची नहीं, वो टिकेगा नहीं। जोड़ टूटेगा और अंक दोगुने कटेंगे। इसलिए मैं कुछ नहीं करूँगा। बस एक बात कहूँगा।"
मैंने टिंकू की माँ की तरफ़ देखा।
"आपा, आज रात मैं आपसे कह रहा हूँ — कल रात जो आपने कहा था, कि मैं आपके बेटे को जाने के लिए कहूँगा — वो मैंने आपके सामने कह दिया, मेरी ज़ुबान से निकल गया है। पर आज रात मैं अपने दिल से कह रहा हूँ कि मुझे नहीं लगता कि यह सही होगा। मुझे लगता है कि आपका बेटा जहाँ है, वहीं ठीक है। और मुझे लगता है कि आप भी जानती हैं कि वो यहीं ठीक है, पर डर आपको सोचने नहीं दे रहा। मैं आपसे झूठ नहीं बोलूँगा। मैं यह भी नहीं कहूँगा कि आपका डर गलत है। आपका डर सही है। पर डर सही होने का मतलब यह नहीं होता कि डर के हिसाब से फ़ैसला करो।"
टिंकू की माँ ने आँखें बंद कीं।
"मुझे एक दिन दीजिए," उन्होंने कहा।
मैं चुप रहा।
"एक दिन," उन्होंने दोहराया। "आज रात वो यहाँ रहेगा — तुम्हारे साथ। कल सुबह मैं आऊँगी। और कल सुबह जो भी फ़ैसला होगा, मैं उसे अपने मुँह से कहूँगी, तुम्हारे मुँह से नहीं। और अगर मैं कहूँ कि वो जाए — तो मैं तुमसे नहीं कहूँगी कि तुम उसे मना करो। मैं खुद कहूँगी, और मेरे बेटे को मेरी बात माननी होगी या नहीं, वो उसका फ़ैसला है।"
टिंकू ने अपनी माँ की तरफ़ देखा।
उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "घंटी वाली बात मुझे समझ आ गई। मेरे अंदर आज रात कुछ नहीं है जो सच बोले। सिर्फ़ डर है और थकावट है। जब मेरे अंदर सच होगा, तब मैं खुद आकर तुम्हारे सामने बैठूँगी। और तब कोई ज़रूरत होगी तो इस घंटी से जोड़ना।"
मैंने सिर हिलाया।
"और एक बात," उन्होंने कहा, और आवाज़ में कुछ ऐसा लौटा जो आज रात अब तक नहीं था — माँ वाली कड़क। "इस लड़के को सुबह तुम्हारे घर से खाना खिलाकर भेजना। भूखा आदमी कोई भी फ़ैसला ठीक नहीं लेता।"
वो मुस्कुराई। बहुत थोड़ी देर। पर मुस्कुराई।
और फिर वो चली गईं।
दरवाज़ा इस बार मैंने खुद बंद किया।
टिंकू वहीं खड़ा रहा। फिर धीरे से बैठ गया। चारपाई पर।
"उस्ताद।"
"हूँ।"
"तुम बुरे आदमी नहीं हो।"
मैं हँसा।
"मुझे पता है। मैं सिर्फ़ थका हुआ आदमी हूँ जो बुरा दिखता है।"
"नहीं," उसने कहा। "तुम इसलिए बुरे नहीं हो कि तुमने मना नहीं किया। तुमने मेरी माँ की बात रखी और फिर उन्हीं के सामने उससे मुकर गए। ये अच्छे आदमी करते हैं।"
मैं चुप हो गया।
वो सही कह रहा था। और यही सबसे बड़ी बात थी — कि बच्चे अक्सर बड़ी जल्दी समझ जाते हैं।
"टिंकू," मैंने कहा।
"हाँ।"
"मुझे कुछ काम करना है आज रात। अकेले नहीं। तेरे साथ।"
उसकी आँखें चमकीं।
"क्या?"
"घंटी का पेंच।"
मैंने जेब से वो छोटा पीतल का पेंच निकाला जो पापा ने दिया था — गोल, चिकना, तेल में लिपटा, हल्की ज़ंग लगा हुआ।
"पेंच?" उसने कहा।
"हाँ। घंटी के तले का पेंच। पापा कहते हैं यह घंटी खोलकर साफ़ करते वक़्त बचा था। मैंने उसे अब तक हिलाया नहीं। पर आज रात हम इसे घंटी में लगाएँगे। देखेंगे क्या होता है।"
"ये करने से क्या होगा?"
"पता नहीं," मैंने कहा। "यही तो सबसे अच्छी बात है।"
उसने लंबी साँस ली।
"मैं तेरे साथ हूँ," उसने कहा।
"मुझे पता है।"
हम दोनों चारपाई पर बैठे। बल्ब गुनगुनाता रहा। बाहर गली में अब भी ख़ामोशी थी, पर उसमें कुछ बदल गया था। जैसे कोई गहरी नींद से हिलकर करवट बदल रहा हो।
मैंने घंटी उलटी की। नीचे का हिस्सा जहाँ वो छोटा-सा छेद था — मैंने उसे देखा। फिर पेंच को उसमें लगाया। एक बार घुमाया। दो बार।
घंटी ने आवाज़ नहीं दी।
बस, बहुत हल्की सी, किसी फुसफुसाहट जैसी हवा निकली — जैसे किसी ने बहुत दूर से अपनी साँस छोड़ी हो।
मैंने पेंच को पूरा घुमाया।
घंटी की सतह गरम थी, फिर ठंडी हो गई, फिर गरम।
चारपाई के नीचे से एक चीज़ फिसलकर आई — एक छोटा सा काग़ज़। जिसके ऊपर कुछ पेंसिल से लिखा था।
मैंने उसे उठाया।
"क्या है?" टिंकू ने पूछा।
"पता नहीं।"
मैंने उसे पढ़ना शुरू किया। पेंसिल की लिखाई थी, बहुत पुरानी, बहुत घिसी। ऊपर ऊपर पढ़ा जा रहा था — दो लकीरें। फिर एक नाम जो मिट गया था। फिर एक तारीख़ जो सिर्फ़ महीने और साल में बची थी।
और नीचे, बहुत छोटी लिखाई में, दो शब्द थे — "अभी बाकी है।"
मैंने काग़ज़ को मोड़कर जेब में रखा।
"टिंकू," मैंने कहा।
"हाँ।"
"आज रात सो जा। जैसे तू अपने घर में सोता है।"
"तुम?"
"मैं जागूँगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि आज रात के बाद कल सुबह आने वाली है, और मुझे नहीं पता वो क्या लेकर आएगी।"
वो चुप हो गया।
फिर उसने कहा, "मैं भी जागूँगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"ठीक है," मैंने कहा।
वो चारपाई पर लेट गया। मैं दरवाज़े के पास बैठ गया।
बाहर गली में पीपल की पत्तियाँ धीरे-धीरे हिल रही थीं।
रात बीत गई।
और अगले दिन सुबह, जब मैंने शटर उठाया, शटर के नीचे से एक लिफ़ाफ़ा खिसककर आया।
मैंने उसे उठाया। वो भारी था। नीला-सफ़ेद। ऊपर एक गोल मुहर लगी थी — भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की।
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला।
अंदर एक काग़ज़ था। सिर्फ़ एक।
और उस पर लिखा था — "लक्ष्मी देवी।"
टिंकू की माँ का नाम।
मैंने उसे पलटकर देखा। पीछे कुछ नहीं लिखा था। बस एक छोटी सी लाइन थी, नीली स्याही में — "कल शाम पाँच बजे। अकेले।"
और मेरे पीछे, दरवाज़े की चौखट पर, टिंकू खड़ा था।
उसने मेरे हाथ में काग़ज़ देखा।
"उस्ताद," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो सब था जो उम्र से पहले आ जाता है। "मेरी माँ का नाम क्यों?"
मैंने काग़ज़ को जेब में रखा।
"पता नहीं," मैंने कहा, और पहली बार मुझे इस बात का डर हुआ कि मेरी ज़ुबान टूटेगी क्योंकि मैं झूठ नहीं बोल सकता — "पर अब पता करना पड़ेगा।"
मेरी जेब में घंटी ठंडी थी।
बर्फ़ जैसी ठंडी।
पहली बार, बहुत दिनों में, उसने बोलना बंद कर दिया।
॥
सुबह के सात बजे थे और गली में उतनी ही ख़ामोशी थी जितनी रात में थी।
मैंने काग़ज़ को जेब में रखा और टिंकू की तरफ़ देखा। उसका चेहरा वैसा था, जैसे किसी ने उसकी कॉपी में उसका नाम मिटाकर किसी और का नाम लिख दिया हो, और वो देखकर भी कुछ न कह पा रहा हो।
"टिंकू," मैंने कहा, "मैं तुझसे झूठ नहीं बोलूँगा। मुझे नहीं पता कि तेरी माँ का नाम उस लिफ़ाफ़े पर क्यों लिखा है।"
"तो क्या करोगे?"
"जो मेरे बस में है। पहले उनसे पूछूँगा, फिर सोचूँगा।"
"अगर वो न बताएँ?"
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"तो भी पूछूँगा," मैंने कहा। "क्योंकि न पूछने से वो सवाल ख़त्म नहीं होता, बस बड़ा हो जाता है।"
तभी बाहर चप्पलों की आवाज़ आई। हल्की, जल्दी में पड़ी हुई।
टिंकू ने दरवाज़े की तरफ़ देखा और उसका चेहरा बदल गया। माँ आ रही थीं।
लक्ष्मी देवी सिर पर दुपट्टा खींचे अंदर आईं। उनके हाथ में कुछ नहीं था, पर उनकी चाल में वो चीज़ थी जो हाथ से ज़्यादा भारी होती है — फैसला।
"टिंकू, बाहर जा," उन्होंने कहा।
"अम्मी —"
"बाहर जा। दुकान के बाहर खड़ा हो। और जो मैंने कहा है, वो याद रख।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया। वो गया, पर दरवाज़े से बाहर निकलकर वहीं, दीवार से सटकर खड़ा हो गया। मुझे पता था वो सुन रहा है। और मुझे यह भी पता था कि लक्ष्मी देवी को भी पता है।
वो मेरे सामने बैठीं, पर मुझे बैठने को नहीं कहा।
"वो काग़ज़ दिखाओ," उन्होंने कहा।
मैंने निकाला। उन्होंने लिया। पढ़ा। बहुत देर तक पढ़ती रहीं, जैसे उस पर कुछ और लिखा हो जो सिर्फ़ उन्हें दिख रहा हो।
"कल रात," उन्होंने कहा, "मेरे पास एक फोन आया था।"
"किसका?"
"पता नहीं। नंबर नहीं दिखा। आवाज़ आदमी की थी, पर बूढ़ी नहीं। न जवान। बीच की।" उन्होंने काग़ज़ मेज़ पर रखा। "उसने कहा — अपने बेटे को सम्भालो। वो जिसे जोड़ रहा है, उसका नाम तुम्हारे बेटे के काग़ज़ में भी लिखा जा रहा है।"
मेरे हाथ रुक गए।
"और फिर?" मैंने पूछा।
"और फिर मैंने पूछा, तुम कौन हो।" उन्होंने मेरी आँखों में देखा। "उसने कहा, मैं वही हूँ जिसके खाते में तुम्हारा नाम भी जाएगा। और फोन कट गया।"
गली में कोई साइकिल गुज़री। घंटी नहीं बजी। मेरी जेब में जो घंटी थी, वो बर्फ़ जैसी ठंडी थी और उस पर कोई हलचल नहीं थी।
"लक्ष्मी दीदी," मैंने कहा, "आप कल शाम पाँच बजे नहीं जाएँगी।"
"तुम मुझे रोकोगे?"
"नहीं रोकूँगा। बस कहूँगा कि अकेले नहीं जाएँगी।"
उन्होंने काग़ज़ पर उँगली रखी।
"इस पर मेरा नाम है, अंकुश। मेरे बेटे के सामने नहीं — मेरे सामने लिखा है। मेरे नाम को मेरे बच्चे के डर से नहीं खींचा जा सकता। अगर मैं आज इस लिफ़ाफ़े के नीचे दब गई, तो कल टिंकू क्या सीखेगा? कि नाम आते ही आदमी चुप हो जाता है?"
मैं चुप रहा। वो सही थीं, और यही सही होने की सबसे ख़राब बात थी।
"फिर एक बात," उन्होंने कहा। "मेरा फैसला सुन लो। टिंकू राँची नहीं जाएगा। मैंने रात भर सोचा। मैं उसे अपने डर से बचाने के लिए भेज रही थी, और वही सबसे बड़ा डर है — कि मैं अपने डर से अपने बेटे को ख़ुद से दूर कर दूँ।"
"तो वो रहेगा?"
"रहेगा। पर आज रात वो घर में रहेगा। मेरे साथ।"
मैंने सिर हिलाया।
"और तुम आज रात क्या करने वाले हो?"
मैंने जवाब नहीं दिया। मेरे जवाब न देने पर उन्होंने आँखें सिकोड़ीं।
"अंकुश। तुम झूठ नहीं बोल सकते। मुझे पता है। इसीलिए मैं पूछ रही हूँ।"
"आज रात मुझे बिजलीघर जाना है।"
उन्होंने आँखें बंद कर लीं। बहुत देर तक बंद रखीं। फिर खोलीं।
"मैं तुम्हें रोक नहीं सकती। पर मैं एक बात कहूँगी — अगर उस बक्से के पास जाकर तुम्हें लगे कि यह अब बातों का नहीं, किसी और चीज़ का मामला है, तो लौट आना। वापस आना। घर आना। यह वही घर है जिसे तुम बचाने निकले हो। इसे बचाने में ख़ुद को मत ख़त्म कर देना।"
"मैं वापस आऊँगा," मैंने कहा।
"वादा?"
मैंने सोचा। वादा करने में कोई झूठ नहीं था — मैं वापस आना चाहता था। पर चाहना और होना दो अलग चीज़ें हैं।
"कोशिश नहीं करूँगा," मैंने कहा। "वापस आऊँगा।"
वो उठीं। दरवाज़े तक गईं, फिर रुकीं।
"टिंकू," उन्होंने बाहर कहा। "रोटी खाकर आना। तीन बजे। मैं दुकान पर आऊँगी।"
और वो चली गईं।
टिंकू अंदर आया। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर नीचे।
"सुन लिया?" मैंने पूछा।
"हाँ।"
"तो अब बता — तू क्या करेगा?"
वो कुछ देर चुप रहा।
"मैं घर जाऊँगा," उसने कहा। "तीन बजे। रोटी खाऊँगा। माँ के साथ बैठूँगा।"
"अच्छा किया।"
"और फिर रात में…" उसने आँखें उठाईं, "मैं सो जाऊँगा।"
हम दोनों जानते थे कि वो झूठ है। पर मैंने कुछ नहीं कहा। कभी-कभी झूठ को भी थोड़ी जगह मिलनी चाहिए, ताकि सच साँस ले सके।
दिन अजीब तरीके से शांत बीता।
ग्यारह बजे दुकान पर सील लगने की बात थी। ग्यारह बजे एक सिपाही आया, शालिनी का लगाया हुआ अदालती काग़ज़ पढ़ा, दो बार सिर खुजाया, और बोला — "काग़ज़ आ गया है तो अभी सील नहीं होगी।" मैंने कहा, "भाई साहब, चाय पी लीजिए।" उसने कहा चाय नहीं, नींबू पानी। मैंने नींबू पानी दिया और वो चला गया।
मीरा ने अपनी कॉपी में इस घटना को दर्ज किया — "सील टली, नींबू पानी के बदले।"
उस्ताद दिन भर चुप बैठे रहे। एक बार मशीन की सुई हिलाई, फिर रख दी। मैंने पूछा, "क्या सोच रहे हैं, उस्ताद?" उन्होंने कहा, "सोच नहीं रहा। गिन रहा हूँ।"
"क्या गिन रहे हैं?"
"जितनी बार मैंने आज तक किसी बंद चीज़ को खोला है और वो अच्छी निकली, और जितनी बार बुरी।" उन्होंने चश्मा साफ़ किया। "हिसाब बराबर नहीं है, बेटा। बुरी चीज़ें ज़्यादा बार निकली हैं। इसीलिए मैंने सीख लिया — जो बंद है, उसे धीरे खोलो। पहले आवाज़ सुनो।"
"और अगर अंदर से गाने की आवाज़ आ रही हो?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"फिर तो और धीमे खोलना।"
दोपहर चार बजे भैरों काका आया।
वो उस तरह आया जैसे गली में नहीं, किसी जंगल से निकला हो। झोपड़ी के कपड़े, हाथ में बिना आग वाली टिन की लालटेन, और आँखों में वो डर जो बहुत पुराना हो चुका हो तो शर्म बन जाता है।
"आज रात चलना है," उसने कहा, किसी सवाल की जगह नहीं छोड़ी।
"क्यों आज रात?"
"क्योंकि आज भवन में बड़ा काम हुआ है। बबलू का स्कूटर सुबह से वहाँ था। दस गाड़ियाँ लदी।" उसने लालटेन उतारकर मेज़ पर रखी। "जब भवन में काम बड़ा होता है, उस रात बक्सा ज़्यादा बोलता है। जैसे उसे बाज़ी मिल रही हो।"
"काका, आपने उस बक्से को कभी छुआ?"
"एक बार।" वो बैठ गया। "बीस साल पहले। मैं उस वक़्त यहाँ चौकीदार था। रात में कुत्ते भौंके, मैं देखने गया। बक्से के ऊपर का ढक्कन आधा खुला था। मैंने हाथ लगाया।"
"और?"
"और मेरी हथेली तीन दिन जलती रही। डॉक्टर ने कहा इंफ़ेक्शन। मेरा मन कहता है मैं पूरी ज़िंदगी उस एक छूने के बदले भर रहा हूँ।"
रात साढ़े ग्यारह बजे हम चले।
मैं, मीरा, उस्ताद अली बक्श और भैरों काका।
शबनम आपा ने गुमटी से चार कप चाय पिलाई, एक कप खाली ज़मीन पर रखकर दी, और कहा, "ये उसके लिए, जो रास्ते में मिलेगा।" मैंने पूछा, "किसके लिए?" उन्होंने कहा, "पता नहीं। पर जब मेरी कोई नहीं सुनता, मैं अंधेरे वाले को भी चाय दे देती हूँ। शायद वो भी किसी का हो।"
मैंने उस कप को हाथ में उठाया, एक घूँट खुद पिया, और फिर ज़मीन पर डाल दिया।
"अब चलो," मैंने कहा।
पुराने बाज़ार की गली संकरी और फिसलन भरी थी। बंद दुकानों के शटर रास्ते में दीवार जैसे बन गए थे। ऊपर बिजली के तार जाल जैसे लटके थे। कोई कुत्ता भूँका, फिर चुप हो गया, जैसे उसे भी पता हो कि आज रात भौंकने का कोई फ़ायदा नहीं।
बिजलीघर का फाटक लोहे का था, और उससे आधा हाथ भी ऊँचा था। भैरों काका ने जेब से पतला तार निकाला, कुंडी में डाला, एक झटका दिया — और फाटक खुल गया, इतनी आसानी से कि मुझे बुरा लगा। कोई ताला जो इतनी आसानी से खुले, वो आम तौर पर किसी को बुला रहा होता है।
अंदर घुसे तो पहली चीज़ जो मिली, वो गंध थी। जंग, नमी और जले काग़ज़ की गंध, तीनों साथ। मीरा ने नाक पर हाथ रखा।
"यहाँ कुछ जला है," उसने धीरे कहा।
"बहुत कुछ," भैरों काका ने कहा। "बीस साल में इतना जला है कि तुम गिन नहीं पाओगी।"
छह बक्से थे।
दीवार के साथ, बराबर अंतर पर, बड़े-बड़े लोहे के बक्से। मेरे कंधे से ऊँचे। हर बक्से पर जंग की मोटी परत, धूल की मोटी परत, मकड़ी के जाले, और ऊपर ढक्कन पर कुछ लिखा हुआ, जो अब पढ़ा नहीं जाता था।
पाँच बक्सों पर धूल इतनी थी कि उस पर उँगली चलाओ तो लकीर बन जाए।
छठे पर नहीं।
छठा बक्सा सबसे आख़िरी था। उसके ऊपर धूल नहीं थी। बिलकुल नहीं। जैसे हर सुबह कोई आकर उसे पोंछता हो। और उसके चारों तरफ़ ज़मीन पर धूल की एक गोल सीमा थी, जैसे कोई वहाँ रोज़ खड़ा होता हो और अपनी जगह बना चुका हो।
मेरी जेब में घंटी ठंडी थी। बर्फ़ जैसी। सुबह से।
तभी आवाज़ आई।
बहुत धीमी। गुनगुनाहट जैसी। जैसे कोई बूढ़ी औरत बैठकर कुछ सी रही हो और बहुत प्यार से कोई पुराना गीत गुनगुना रही हो।
मेरी साँस रुक गई।
क्योंकि यह धुन मैंने सुनी थी। बहुत बार सुनी थी। माँ रोटी बेलते वक़्त यही गुनगुनाती थीं, जब वो थक जाती थीं और उन्हें लगता था कोई सुन नहीं रहा।
"यह क्या है?" मीरा ने फुसफुसाया।
"यही तो हम देखने आए हैं," भैरों काका ने कहा, और उसकी आवाज़ में डर के साथ थोड़ा मज़ाक भी था। "बीस साल से मैं सोच रहा हूँ कि मैं पागल हो गया हूँ। तुम सुन रही हो न? मतलब मैं पागल नहीं हूँ।"
"काका," मैंने कहा, "किसने बनवाए थे ये बक्से?"
"पता नहीं। मेरे आने से पहले थे। बुज़ुर्ग कहते थे ये बिजलीघर के साथ आए थे।"
उस्ताद बक्सों के सामने गए, बहुत धीरे, बहुत संभलकर, जैसे किसी बीमार के पास जाते हों। उन्होंने अपना चश्मा उतारा और आँखें सिकोड़कर छठे बक्से को देखा।
"यहाँ लिखा है," उन्होंने कहा। "धूल के नीचे नहीं। बाजू पर। कोई नुकीली चीज़ से खुरचा है।"
"क्या लिखा है?"
"दो लकीरें। और बीच में एक बिंदु।"
मेरी रीढ़ में ठंडी सुई सी चली गई। वही निशान। चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर। घंटी के छल्ले पर। चौक की धूल में। और अब यहाँ।
मीरा ने अपना बैग खोला और कैमरा निकाला।
"नहीं," भैरों काका ने कहा। उसकी आवाज़ एकदम बदल गई थी — अब वो डरा हुआ नहीं था, सख़्त था। "यहाँ कुछ दिखाना मत।"
"क्यों?"
"क्योंकि यह चीज़ देखने से बढ़ती है।" उसने कैमरे पर हाथ रख दिया। "मैंने बीस साल देखा है। जिस रात कोई इसे देखता है, उस रात यह ज़्यादा बोलती है। दिखाना मतलब खिलाना।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया।
उसने कैमरा बंद कर दिया, पर बैग में वापस नहीं रखा। हाथ में पकड़े रही। मुझे पता था — अगर ज़रूरत पड़ी, वो एक सेकंड में चालू कर देगी। मीरा वही करती है जो सही होता है, पर उससे पहले वो हमेशा तैयार रहती है।
मैं छठे बक्से के पास गया।
एक कदम। दो कदम।
गुनगुनाहट तेज़ नहीं हुई। बस थोड़ी साफ़ हो गई, जैसे अब मुझे पता चल रहा हो कि यह माँ की आवाज़ जैसी क्यों लगती है — क्योंकि इसमें वही थकान है, वही धीमापन, वही हर लाइन के बाद थोड़ा सा विश्राम।
मैंने हाथ बढ़ाया।
उस्ताद ने कुछ कहा, बहुत धीरे, पर मैंने सुना नहीं।
मेरी उँगलियाँ बक्से की सतह पर पड़ीं।
वो ठंडी थी। लोहे जैसी ठंडी, हड्डी तक जाने वाली ठंडी।
और उसी वक़्त मेरी जेब में घंटी गरम हो गई।
बर्फ़ से अचानक आग। इतनी तेज़ कि मैंने हाथ जेब पर रख लिया।
"क्या हुआ?" मीरा ने पूछा।
"घंटी," मैंने कहा। "आज पूरे दिन बर्फ़ जैसी थी। अब गरम है।"
"क्या बोली?"
"कुछ नहीं।"
मैंने जेब से घंटी निकाली। उसके भीतर कुछ हलचल थी — बिना बजे, बिना आवाज़ के, जैसे कोई जानवर सोते से करवट बदल रहा हो और बताना चाह रहा हो कि मैं जाग रहा हूँ, डरो मत।
भैरों काका मेरे पीछे आए और उन्होंने बहुत धीमे कहा, "तुम्हारी जेब से मुझे गरमी लग रही है।"
"हाँ।"
"तो इसका मतलब इस पर लिखा है।"
"क्या?"
"यह बक्सा तुम्हारे खानदान का नहीं है।" उन्होंने लालटेन नीचे की। "पर तुम्हारी घंटी इसे पहचानती है।"
मैं कुछ कहने ही वाला था कि पीछे, फाटक की तरफ़ से, आवाज़ आई।
टक।
धातु पर लकड़ी या रबर जैसा कुछ।
सबकी साँस रुक गई।
"कौन है?" भैरों काका ने फुसफुसाया, इतना धीमे कि आवाज़ भी न बने।
कोई जवाब नहीं आया।
फिर एक और आवाज़ — हल्की, दबी, जैसे कोई जूता फिसलकर ज़मीन पर रख दिया गया हो।
मीरा ने कैमरा छाती से लगा लिया। उस्ताद ने मेरी बाँह पकड़ी। उनकी पकड़ मज़बूत थी, काँपती नहीं थी।
मैंने दीवार के साथ-साथ पीछे झाँका।
फाटक के पास, अंधेरे में, तीन छोटी आकृतियाँ खड़ी थीं। और एक चौथी, उनसे भी छोटी, जो झुककर ज़मीन पर कुछ उठा रही थी।
मेरा गुस्सा एकदम से सिर पर चढ़ा।
"टिंकू," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ जितनी धीमी थी उतनी ही सख़्त।
आकृतियाँ जम गईं।
"उस्ताद," टिंकू की आवाज़ आई, और उसमें डर नहीं, शर्म थी। "हम बस —"
"कौन-कौन है?"
"सानिया। रफ़ीक़। गुड्डू।" एक झिझक। "और चिंटू।"
"चिंटू ज़मीन पर क्यों झुका है?"
लंबी चुप्पी।
"मेरा जूता गिर गया," चिंटू की छोटी आवाज़ आई।
और फिर वो आवाज़ आई जिसका मुझे डर था।
टक।
जूता लोहे की चादर पर गिरा। आवाज़ बहुत बड़ी नहीं थी, पर उस घर में, उस रात, वो ऐसे गूँजी जैसे किसी ने ढोल बजा दिया हो।
गुनगुनाहट रुक गई।
पूरी तरह रुक गई।
यह और भी बुरा था। जो चीज़ गाती रहे, वो ज़िंदा है। जो चीज़ अचानक चुप हो जाए, वो सुन रही है।
मैंने एक कदम पीछे हटकर सबको इशारा किया। मीरा ने बच्चों को पकड़कर बक्सों के पीछे ले जाना शुरू किया। वो फुसफुसा रही थी, "नीचे, नीचे, सिर झुकाओ, मत हिलो।" रफ़ीक़ के सफ़ेद जूते अंधेरे में दिख रहे थे और उसने हाथ से उन्हें ढकने की कोशिश की, जो बिलकुल बेकार था।
तभी दूर, सड़क की तरफ़ से, रोशनी आई।
पहले हल्की, पीली, धूल में फैलती हुई। फिर तेज़। सफ़ेद गाड़ी की रोशनी, जो फाटक के फटे हिस्सों से छनकर अंदर आने लगी।
इंजन की आवाज़ धीमी थी। गाड़ी रुकी नहीं। बस धीमी हुई, और वो धीमापन उससे भी ज़्यादा डरावना था। जैसे कोई सोच रहा हो — रुकूँ या नहीं।
हम सब ज़मीन पर बैठ गए। मैंने सानिया का हाथ पकड़ा, वो मेरी तरफ़ देख भी नहीं रही थी, बस साँस रोके हुए थी। टिंकू मेरे बगल में दबकर बैठा था, और उसकी कोहनी मेरी पसली में गड़ रही थी, और उस वक़्त मुझे वही दर्द सबसे भरोसेमंद चीज़ लगा — क्योंकि जो दर्द दे रहा है, वो ज़िंदा है।
रोशनी धीरे-धीरे सरकी।
फिर रुकी।
फाटक के बाहर, सड़क पर, सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी।
और उसका शीशा नीचे उतर रहा था। मैंने सुना — खिसकने की वो हल्की आवाज़।
भैरों काका ने मेरा घुटना दबाया। उनका मतलब था — मत देखो।
मैंने देखा।
गाड़ी के अंदर से एक हाथ बाहर आया। सिर्फ़ हाथ। कुर्ते की सफ़ेद आस्तीन, और उँगलियों में कुछ। वो कुछ बाहर हवा में उठा — काग़ज़। फिर वो उँगली उस काग़ज़ पर रखी गई, जैसे कोई उसे पढ़ रहा हो या नाप रहा हो।
कुछ सेकंड।
फिर शीशा चढ़ गया।
गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ी। रोशनी दीवारों पर सरकती हुई गई, पीपल की छाया से गुज़री, गली के मोड़ पर मुड़ी, और गायब हो गई।
भैरों काका ने साँस छोड़ी। इतनी ज़ोर से कि लगा उन्होंने पूरे बीस साल का हवा एक साथ बाहर निकाल दिया।
"मेरी माँ," सानिया ने फुसफुसाया। "मेरी माँ कहती हैं ऐसी गाड़ियाँ ख़ाली नहीं होतीं।"
"आज यह भी ख़ाली नहीं थी," मैंने कहा।
"उसमें कौन था?"
"वही जो हर जगह होता है," उस्ताद ने कहा। "जो पीछे से देखता है और सामने नहीं आता।"
मैं उठा। घुटने में दर्द था। जेब में घंटी अब भी गरम थी, पर गरमी बदल गई थी — पहले जैसे कोई हाथ पकड़े हुए था, अब जैसे कोई धक्का दे रहा हो।
"चलो," मैंने कहा। "वापस।"
और फिर वो हुआ।
छठे बक्से से आवाज़ आई।
घंटी जैसी आवाज़। लेकिन घंटी कभी ऐसे नहीं बजती। यह अंदर से आई थी, दीवार के पीछे से, लोहे के पीछे से — जैसे किसी ने बंद मुट्ठी में घंटी पकड़ी हो और एक बार हिला दी हो।
टन।
सब जम गए।
टन।
मेरी जेब में घंटी ज़ोर से काँपी।
टन।
और फिर, अपने आप, बिना मेरे हाथ लगाए, मेरी घंटी बजी।
इतनी ज़ोर से कि मेरी जेब से आवाज़ बाहर निकली और उस सूनी जगह में फैल गई।
और उसके बाद, बहुत धीमे, बहुत साफ़, वैसे ही जैसे कोई बहुत करीब खड़े होकर कान में कह रहा हो, घंटी ने कहा —
"यहाँ तेरा भी हिस्सा है।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। मैंने बक्से की तरफ़ देखा।
छठा बक्सा। धूल रहित, गुनगुनाता, और अब चुप।
बिलकुल चुप।
और मुझे लगा, उस वक़्त, उस अंधेरे में खड़े-खड़े, कि उसने मेरी तरफ़ देखा है। आँखों से नहीं। किसी और तरीके से। जैसे कोई बहुत पुराना रिश्तेदार, जिसे तुमने कभी देखा नहीं, बस सुना है — और जो अब तुम्हारे सामने खड़ा है, और तुम्हें पहचानता है, और तुमसे बस एक बात कहना चाहता है — कि तुम यहाँ नए नहीं हो।
टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ा।
"उस्ताद," उसने कहा, और उसकी आवाज़ काँप रही थी। "इसका मतलब क्या है?"
मैंने उसका हाथ कसकर पकड़ा।
"मतलब यह है," मैंने कहा, "कि मैं सिर्फ़ इसे बंद करने नहीं आया था। मैं इसे पहचानने भी आया हूँ।"
"और पहचानने के बाद?"
मैंने बक्से को आख़िरी बार देखा।
"पहचानने के बाद," मैंने कहा, "आदमी को यह तय करना पड़ता है कि वो अपना हिस्सा छोड़ेगा या माँगेगा।"
हम लौट पड़े।
पीछे, बिजलीघर के अंधेरे में, छह बक्से खड़े रहे — पाँच धूल में लिपटे, और एक साफ़, जैसे किसी की नज़र में।
॥
पीछे मुड़कर मैंने आख़िरी बार देखा। बिजलीघर का फाटक, उसके पीछे छह बक्से — पाँच धूल में लिपटे, एक साफ़। जैसे किसी पुराने स्कूल की क्लास में पाँच बच्चे सिर रखकर सो रहे हों और एक जाग रहा हो। और जागने वाला हमेशा ज़्यादा डरावना लगता है, क्योंकि सोने वाले बेखबर हैं, जागने वाला सब देख रहा है।
टिंकू ने मेरा हाथ नहीं छोड़ा।
उसकी हथेली पसीने से भीगी थी और उँगलियाँ मेरी कलाई पर ऐसे कसी थीं जैसे कुएँ की रस्सी पकड़ी हो।
"उस्ताद," उसने धीरे से कहा, "वो आवाज़ अंदर से आई न?"
"आई।"
"मतलब बक्से में कोई है?"
मैंने साँस ली। रात की हवा में लोहे जैसी गंध थी, और उसमें उस्ताद की दुकान की सिलाई मशीन की पुरानी गंध मिली हुई थी — तेल, कपड़ा और धूल।
"बक्से में कुछ है," मैंने कहा। "कोई है या कुछ है, यह मुझे भी नहीं पता। और जो नहीं पता, उसे हम झूठ से भर देते हैं। मैं वो गलती नहीं करूँगा।"
उस्ताद ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"चलो," उन्होंने कहा। "यहाँ खड़े रहना ठीक नहीं। रात में जो दिखता है, सुबह वो आधा झूठ निकलता है। और बाकी आधा सच इतना भारी होता है कि उसे दिन में उठाना पड़ता है।"
भैरों काका ने अपनी टिन की लालटेन उठाई, जिसमें आग नहीं थी, सिर्फ़ बरसों की कालिख थी।
"मैं चलता हूँ," उन्होंने कहा। "मेरी झोपड़ी यहीं पीछे है। और सुनो — आज रात बक्से ने जो कहा, वो हर किसी को मत बताना। बात बढ़ाने से वो मज़बूत होता है।"
"कौन?" सानिया ने पूछा। उसकी आवाज़ में वो डर था जो बच्चों के सवालों में अक्सर बड़ों से ज़्यादा साफ़ सुनाई देता है।
भैरों काका ने उसकी तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
"जो सुनता है," उन्होंने कहा, और अपनी लालटेन लेकर झोपड़ी की तरफ़ चल दिए।
हम लौट पड़े।
रास्ते में सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू हमारे साथ चल रहे थे, और चारों चुप थे। चिंटू तो पूरे रास्ते अपना जूता देखता रहा, जो लोहे पर गिरा था और जिससे वो धुन रुक गई थी। उसे लग रहा था कि सब उसकी वजह से हुआ है।
मैंने उसका कंधा पकड़ा।
"चिंटू।"
"हाँ उस्ताद।"
"तेरा जूता गिरा, तेरी गलती नहीं। मैं तुझे वहाँ ले गया, वो मेरी गलती थी। और गलती बाँटने से बात हल्की होती है, यह याद रखना।"
उसने मेरी तरफ़ देखा और हल्का-सा सिर हिलाया। फिर बोला, "उस्ताद, सच बताऊँ? मुझे लगा था बक्से में कोई बंद है। कोई ज़िंदा।"
"और अब?"
"अब भी लगता है," उसने कहा। "बस अब ये भी लगता है कि वो ज़िंदा है तो किसी ने उसे वहाँ रखा है। अपने आप तो कोई वहाँ नहीं पहुँचता।"
मैं रुक गया।
बच्चों की बातों में कभी-कभी ऐसी बात आ जाती है जो बड़ों के बीस साल के हिसाब से नहीं निकलती। मैंने उसके सिर पर हाथ रखा और कुछ नहीं कहा।
गली के मोड़ पर हमें शबनम आपा मिलीं।
वो अपनी गुमटी के बाहर बेंच पर बैठी थीं, और चूल्हे की आग बुझी हुई थी, सिर्फ़ राख गरम थी। उनके हाथ में एक कटोरी थी।
"चार कप में से चौथा कप ख़ाली ज़मीन के लिए रखा था," उन्होंने कहा। "वो भी ठंडा हो गया। तुम लोग आ गए, अब मैं जलाऊँगी नहीं। सुबह जलाऊँगी।"
"आपा, आप सोई नहीं?" मैंने पूछा।
"मैं सोती हूँ क्या?" उन्होंने कहा। "मेरी नींद किसी और की रसोई में जलती है। जब तक वो नहीं जलती, मेरी आँख नहीं लगती।"
मीरा मेरे पीछे थी। उसने अपना कैमरा बंद, कपड़े में लपेटकर बगल में दबाया हुआ था। भैरों काका ने कहा था कि उस अंधेरे में कुछ नहीं दिखाना, और मीरा ने मान लिया था — यह मेरे लिए नई बात थी। मीरा जिसे कहना मुश्किल होता था, वो उसने आज मान लिया था।
"कुछ मिला?" शबनम आपा ने पूछा।
"कुछ मिला," उस्ताद ने कहा। "पर मिलने से ज़्यादा ज़रूरी यह है कि कुछ समझा।"
"तो समझा क्या?"
"यह समझा," उस्ताद ने कहा, "कि वो लड़का जिसे हम ढूँढ रहे हैं, वो हमें ढूँढ रहा है। और दोनों में अंतर यह है — वो जानता है कि हम कहाँ हैं।"
शबनम आपा ने कटोरी बेंच पर रखी।
"तो सुनो," उन्होंने कहा, "कल सुबह मैं कुछ नहीं पूछूँगी। मैं सिर्फ़ देखूँगी कि तुम लोग खाते हो या नहीं। बाकी तुम्हारा काम।"
और हम अपने-अपने घर चले गए।
रात को मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में गया। पापा जाग रहे थे। चारपाई पर बैठे थे और हाथ में पुरानी रिंच पकड़े थे, जिसे वो घुमाते नहीं थे, बस पकड़े हुए थे — जैसे कोई बच्चा रात में चादर का कोना पकड़ता है।
"आ गया?" उन्होंने कहा।
"आ गया।"
"कुछ हुआ?"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनका चश्मा टेप से बँधा था और एक काँच पर धूल थी। उनकी आँखें थकी हुई थीं, पर आवाज़ में वो डर नहीं था जो पहले था। कुछ बदला था। या शायद मैं बदल गया था।
"पापा," मैंने कहा, "बक्से ने कहा — यहाँ मेरा भी हिस्सा है।"
उन्होंने रिंच को घुटनों पर रखा।
"मुझे लगा था ऐसा ही कहेगा," उन्होंने कहा।
"आपको कैसे लगा?"
"क्योंकि जिस चीज़ में तेरे दादा का नाम है, उसमें तेरा हिस्सा न हो, यह मुमकिन नहीं," उन्होंने कहा। और फिर वो चुप हो गए, जैसे बहुत कह दिया हो।
मैंने अपनी नई कॉपी खोली, जिसमें सबसे ऊपर माँ का नाम लिखा था। उसके नीचे मैंने लिखा — बिजलीघर, छठा बक्सा, "यहाँ तेरा भी हिस्सा है"। तारीख़ लिखी। वक़्त लिखा। फिर मैंने कलम रख दी और पूछा, जो मैं कभी नहीं पूछता था।
"पापा, दादा कैसे थे?"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। कमरे में बल्ब गुनगुना रहा था और उसकी रोशनी में उनका चेहरा और भी पुराना लग रहा था।
"तेरे जैसे," उन्होंने कहा। "बस एक फ़र्क़ था — वो मुस्कुराते हुए भी रोते थे। तू रोते हुए भी मुस्कुराता है।"
और फिर वो लेट गए और परदा खींच लिया।
मैं बाहर आया। आसमान साफ़ था। घंटी मेरी जेब में ठंडी थी, और उसने आज रात फिर कुछ नहीं कहा।
सुबह मैंने आँख खोली तो सूरज निकल चुका था और गली में झाड़ू की आवाज़ आ रही थी। घंटी जेब में हल्की गरम थी, पर बोली नहीं। जैसे किसी ने मुझे उठा भी दिया हो और हाथ छोड़ भी दिया हो।
मैं शटर उठा ही रहा था कि मुझे रोने की आवाज़ सुनाई दी।
मैंने हाथ रोका।
लक्ष्मी देवी थीं। टिंकू की माँ। वो दौड़कर आ रही थीं, साड़ी का पल्लू सर से खिसक आया था और हाथ में एक काग़ज़ था जिसे वो ऐसे पकड़े थीं जैसे कोई जानवर पकड़ा हो और छूट जाने का डर हो।
मैंने शटर उठाया और आगे बढ़ा।
"आंटी —"
"देखो," उन्होंने कहा। आवाज़ फटी हुई थी। "देखो इसे।"
काग़ज़ भारद्वाज कंस्ट्रक्शन का था। ऊपर नीली गोल मोहर थी, नीचे तारीख़। और बीच में चार लाइनें, बड़े साफ़ अक्षरों में, जैसे किसी ने बड़ी मेहनत से ऐसी भाषा चुनी हो जिसमें कोई इल्ज़ाम न हो और बात फिर भी पूरी कह दी जाए।
उनका सिलाई का काम बंद।
लक्ष्मी देवी गली के कई घरों के कपड़े सीती थीं। छोटा-मोटा काम था, पर पक्का था। भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की तरफ़ से उन्हें साल भर पहले "सिलाई केंद्र" का काम मिला था — कंबलों की किनारी, स्कूल की वर्दी की मरम्मत, साइट के मज़दूरों के कपड़े। महीने के आख़िर में एक तय रकम। टिंकू की कॉपी, टिंकू का स्कूल, टिंकू का दूध — यही रकम उन सबको सँभालती थी।
काग़ज़ कह रहा था कि काम "अस्थायी रूप से बंद" किया जा रहा है और "आगे की समीक्षा" के बाद देखा जाएगा।
"आंटी, बैठिए।"
"मैं बैठने नहीं आई," उन्होंने कहा। और फिर उनकी आवाज़ नीचे गिर गई। "मैं यह देखने आई कि तुम सुन रहे हो या नहीं। मेरा काम गया, अंकुश। और मुझे पता है क्यों गया। मेरे बेटे का नाम उस सूची में नहीं है, इसलिए गया। मैं कल उस काग़ज़ पर अंगूठा नहीं लगाया, इसलिए गया।"
"आंटी —"
"अब सुनो," उन्होंने कहा। और उनकी आवाज़ में वो कड़क आ गई जो शबनम आपा की आवाज़ में होती है और जो सिर्फ़ उन औरतों की आवाज़ में आती है जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी किसी और के लिए खर्च कर दी हो। "अगर मैं यहाँ रही, तो टिंकू का स्कूल डूबेगा और मेरा काम डूबेगा। दोनों एक साथ डूबेंगे। मैं एक नहीं बचा सकती। और मैं अपने बेटे को यह देखने नहीं दूँगी कि उसकी माँ सुबह दूध के लिए पैसे गिन रही है।"
मैं कुछ कहता, उससे पहले मुझे पीछे किसी के होने का एहसास हुआ।
टिंकू दुकान के पीछे खड़ा था।
वो हमारी बात सुन रहा था। कितनी देर से सुन रहा था, पता नहीं। उसके हाथ में स्कूल का बस्ता था, और बस्ते का एक पट्टा सिला हुआ था — माँ की सिलाई हुई, तिरछी, पर मज़बूत।
वो आगे आया।
"माँ," उसने कहा।
लक्ष्मी देवी ने पलटकर देखा और मैंने उनकी आँखों में वो डर देखा जो माँओं की आँखों में तब आता है जब उन्हें लगता है कि बच्चे ने उनका दर्द देख लिया है। माँएँ दर्द छिपाने में बहुत अच्छी होती हैं, पर पकड़ी जाने पर सबसे ज़्यादा शर्मिंदा भी वही होती हैं।
"तू अंदर जा," उन्होंने कहा। "यह बड़ों की बात है।"
"मैं बड़ा हो रहा हूँ," टिंकू ने कहा।
और फिर उसने वो कहा जो मैं नहीं चाहता था कि वो कहे।
"मैं शहर चला जाऊँगा।"
गली में झाड़ू की आवाज़ रुक गई। पता नहीं किसने रोकी, या शायद मेरे कानों ने ही सुनना बंद कर दिया।
"मामा के यहाँ जाऊँगा," टिंकू ने कहा। आवाज़ साफ़ थी, और यही सबसे बुरी बात थी। अगर वो रोता, तो पता चलता कि वो डरा हुआ है। पर वो नहीं रोया। "वहाँ काम कर लूँगा। भाई के पास रहूँगा। आप अपना काम करो, मैं नहीं चाहता कि —"
"टिंकू," लक्ष्मी देवी ने कहा।
"मैं नहीं चाहता कि आप मेरी वजह से और रोओ," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार टूटी।
लक्ष्मी देवी ने अपना हाथ उसकी तरफ़ बढ़ाया और फिर रोक लिया। जैसे उन्हें पता था कि अगर उन्होंने बेटे को छुआ, तो वो फूट पड़ेंगी, और अगर वो फूट पड़ीं, तो सब बिखर जाएगा।
मेरे अंदर कुछ टूटा।
मैं नहीं जानता कि वो क्या था। गुस्सा था, या शर्म, या वो बेचैनी जो तब होती है जब तुम्हारे सामने किसी बच्चे को वो काम करना पड़े जो बड़ों को करना चाहिए था। तेरह साल का लड़का अपनी माँ को यह कह रहा था कि वो चला जाएगा, ताकि माँ की सिलाई बच जाए।
मैं कुछ नहीं बोला।
मैं पलटा और दुकान के अंदर गया। औज़ारों के ट्रंक से मैंने घंटी निकाली। वो हल्की गरम थी। मैंने उसे दोनों हाथों में पकड़ा और उसके ठंडे पीतल को अपनी हथेली की गरमी में ढक लिया।
"सुन," मैंने कहा।
घंटी ने धीमे से कहा — "बोल।"
"सौ अंक की शक्ति," मैंने कहा। "सच्ची ज़ुबान। रणवीर के सामने। मैं उससे सब कुछ कहलवाऊँगा। कोई झूठ नहीं बोलेगा। एक मिनट में उसका सारा सच बाहर आ जाएगा। और फिर गली के सामने, उसके ही मुँह से, वो सब निकलेगा जो बाईस साल से दबा है।"
घंटी चुप रही।
"सुन रही है तू?" मैंने कहा। "मैं तुझसे पूछ रहा हूँ।"
"सुन रही हूँ," घंटी ने कहा। "पर तू चीख़ रहा है।"
"तो सही कह रहा हूँ ना?"
"मैं नहीं बोलती कि सही है या ग़लत। मैं सिर्फ़ ये बोलती हूँ कि अभी तू जो बोल रहा है, वो तेरी आवाज़ नहीं है। ये किसी और की आवाज़ है।"
मैंने घंटी को कसकर पकड़ा और शटर की तरफ़ बढ़ा।
बाहर मीरा खड़ी थी।
वो सुबह-सुबह आई थी, हाथ में काग़ज़, पर काग़ज़ नहीं देख रही थी। मेरी तरफ़ देख रही थी। और उसकी आँखों में वो शक नहीं था जो पहले होता था। उसमें डर था।
"अंकुश," उसने कहा।
"मीरा, हट।"
"नहीं हटूँगी।"
"मीरा —"
"मैंने तेरी घंटी सुनी," उसने कहा। "दरवाज़े के बाहर से सुनी। तूने कहा — सौ अंक की शक्ति।"
"तो?"
"तो तू जानता है उसके साथ क्या जुड़ा है," उसने कहा। "भूल गया? तेरे पास जो सबसे प्यारी याद है, वो पुराने ताले में बंद हो जाएगी। और वो याद तुझे दिखेगी भी नहीं। तुझे सिर्फ़ यह लगेगा कि कुछ खो गया है। कुछ बहुत ज़रूरी। और तू उसे पहचान भी नहीं पाएगा।"
मैं रुक गया।
"मुझे पता है," मैंने कहा।
"तो फिर?"
"तो फिर मुझे यह भी पता है," मैंने कहा, "कि वो अगर बच्चे को शहर भेज रहा है, तो मैं कुछ तो करूँ। तेरे पास कोई तरीका है, मीरा? एक? सिर्फ़ एक तरीका जिससे वो मिनट में टिंकू का नाम सूची से हटवा दे और उसकी माँ का काम फिर से चालू कर दे?"
वो चुप रही।
"नहीं ना," मैंने कहा। "तो फिर मुझे मेरा तरीका इस्तेमाल करने दे।"
"गुस्से में जोड़ना," उस्ताद की आवाज़ पीछे से आई, "वो भी साठ अंक का जोड़ होता है। और उसका सबसे हल्का काट और भी होता है — वो तेरी सबसे प्यारी याद लेगा। तू पूरा खर्च करके भी जीतेगा नहीं। तू हैरान रह जाएगा कि इतना खोने के बाद जीत भी क्यों अधूरी लग रही है।"
उस्ताद आराम से चलकर आए और मेरे सामने खड़े हो गए। उनके हाथ में कैंची थी, कान पर पेंसिल, दाढ़ी सफ़ेद। उन्होंने मेरे हाथ से घंटी नहीं छीनी। उन्होंने सिर्फ़ कहा —
"गुस्सा कभी जोड़ नहीं करता। वो सिर्फ़ तोड़ने का नया रास्ता बनाता है। और उसमें उसे मज़ा आता है।"
"बक्से वाले को?" मैंने पूछा।
"उसको तो अपनी इज़्ज़त का मज़ा आता है," उस्ताद ने कहा। "इसीलिए वो चाहता है कि हममें से कोई एक चीख़ उठे। कोई एक गुस्से में कुछ कर बैठे। कोई एक ऐसा काम करे जो बाईस साल में न किया हो। क्योंकि जब टूटन होती है, तो वो खाता भरता है। और जब तुम गुस्से में जोड़ते हो, तो जोड़ का सबसे बड़ा हिस्सा तुम्हारा नहीं होता — वो उसका होता है।"
मैं कुछ देर उन्हें देखता रहा।
फिर मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरा हाथ नहीं पकड़ा। वो सिर्फ़ खड़ी रही। और शायद यही ज़्यादा काम कर गया कि उसने मुझे रोकने की कोशिश नहीं की दूसरी बार।
मैंने घंटी अपनी जेब में रखी।
"ठीक है," मैंने कहा।
"ठीक है?" मीरा ने पूछा।
"मैं नहीं जोड़ रहा," मैंने कहा। "मैं अभी कुछ नहीं कर रहा। मैं गुस्सा हूँ, और गुस्से में दिए वादे मैं नहीं देता। मेरी एक ही बात है — ठीक है, भगवान के वास्ते, कोई एक तरीका ढूँढ़ो जिसमें मेरी माँ की तरह की औरतें और टिंकू की तरह के बच्चे रोज़ न रोएँ।"
लक्ष्मी देवी मेरी तरफ़ देख रही थीं। उनका काग़ज़ हवा में काँप रहा था।
"बेटा," उन्होंने धीरे से कहा। "मेरा काम जाए, पर तुम कुछ ग़लत मत करना।"
वो जो कह रही थीं, वो बहुत भारी था। मैंने सिर हिलाया।
"आंटी," मैंने कहा, "काग़ज़ दे दीजिए।"
"क्यों?"
"क्योंकि इसे मुझे मेरी कॉपी में चिपकाना है।"
वो समझीं। उन्होंने मुझे काग़ज़ दिया।
फिर वो टिंकू का हाथ पकड़कर वापस चलीं — और टिंकू ने पलटकर मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में सवाल था।
मैंने कुछ कहा नहीं। क्योंकि अभी मेरे पास जवाब नहीं था, और मैं वो शख़्स नहीं बनना चाहता था जो गुस्से में सवालों के झूठे जवाब देता है।
मैंने दुकान खोली।
और पूरा दिन जोड़ केंद्र ख़ाली पड़ा।
मैंने चबूतरी पर मेज़ रखी, सफ़ेद पेंट से बना बोर्ड, चारों तरफ़ धूल झाड़ी। सुबह से दोपहर तक कोई नहीं आया। भोला भाई वहाँ से गुज़रे, पर आँख चुराकर। नसीमा बाई ने राशन की दुकान की बोरी बाहर रखी, आधी अंदर घुसी। किशनलाल काका अपनी कुर्सी पर बैठे चना खाते रहे और हवा में देखते रहे, जैसे मैं वहाँ नहीं हूँ।
चारों बच्चे आए, पर चुपचाप। सानिया ने मेरी मेज़ पर एक टूटा कटोरा रखा, फिर उठा लिया, फिर रख दिया।
"उस्ताद," उसने कहा, "कोई नहीं आ रहा।"
"आएँगे," मैंने कहा।
"कब?"
"जब उनके हाथ में कुछ टूटा होगा और दिल में कुछ बचा होगा। दोनों एक साथ होना ज़रूरी है।"
दोपहर के तीन बजे काजल आई। वो अस्पताल से आई थी, आँखें लाल थीं।
"माँ तीन बार पानी पी गईं," उसने कहा। "और उन्होंने पूछा कि बक्सा क्या कह रहा था।"
मैंने सिर उठाया।
"तूने बताया?"
"थोड़ा।" वो बैठ गई। "कहा कि एक बक्सा था और उसने कुछ कहा। और माँ हँसकर बोलीं — तो जब कुछ कहता है, तो कुछ सुनता भी होगा।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"माँ ऐसी बातें कब से कहने लगीं?" मैंने पूछा।
"अब से," काजल ने कहा। "और पापा ने जब सुना, वो चुप हो गए और छत पर चले गए।"
शाम हो रही थी। गली में धूप पीली होकर पीपल की जड़ों पर बैठ गई थी। बच्चे पतंग की डोर से खेल रहे थे जो खाली थी, बिना पतंग। मैं अपनी कॉपी में हिसाब लिख रहा था — या लिखने की कोशिश कर रहा था। उसमें एक ही लाइन थी, और वो मैं तीन बार मिटा चुका था।
घंटी चुप थी।
फिर मुझे गाड़ी की आवाज़ सुनाई दी।
वो आवाज़ मैं पहचानता हूँ। गली में गाड़ियाँ नहीं आतीं। जो गाड़ियाँ आती हैं, वो या तो खाँसती हैं — जैसे भैरों काका का पुराना टेम्पो — या बिलकुल चुपचाप आती हैं, जैसे कई बीमारियाँ आती हैं।
सफ़ेद गाड़ी दुकान के बाहर रुकी।
उसने हॉर्न नहीं बजाया। उसने धूल नहीं उड़ाई। वो बस आई और रुक गई, जैसे उसे पता हो कि मैं उसका इंतज़ार कर रहा था।
मैं कुर्सी से उठा नहीं।
मैंने पेन रख दी।
गाड़ी का शीशा धीरे से नीचे होने लगा। मुझे वो आवाज़ सुनाई दी — खिसकने की हल्की, चिकनी आवाज़, और मुझे पीछे से एक बार फिर चबूतरी दिखी जहाँ बबलू पान चबाकर बैठता था, और उसका पान का गीला दाग़ — जो एपिसोड के अंत में धूप में सूख रहा था, पर सूखा नहीं था। कुछ दाग़ ऐसे ही होते हैं। सूखते भी नहीं, और मिटते भी नहीं।
खिड़की के भीतर से आवाज़ आई।
वो आवाज़ मीठी थी। और उस मिठास में वो बात थी जो शहद में भी नहीं होती — यह पता होने का एहसास कि सामने वाला तुम्हारे बारे में कुछ जानता है जो तुम खुद नहीं जानते।
"अंकुश यादव।"
मैं खिड़की के पास गया। बाहर सड़क पर गाड़ी, और उसके भीतर बैठा आदमी। मैंने उसका चेहरा पूरा नहीं देखा। मैंने सिर्फ़ उसकी आस्तीन देखी, सफ़ेद। और उसकी उँगली, जिस पर पुरानी काली अंगूठी नहीं थी — उसकी जगह एक पतला चमकता धागा था, जैसे किसी ने अंगूठी उतारकर धागा बाँध लिया हो।
"कल तेरे पास एक तोहफ़ा आएगा," उसने कहा।
मैंने कुछ नहीं कहा।
"और तू नहीं समझेगा कि वो तेरा ही है," उसने कहा। "तू उसे सौदा समझेगा। या धमकी। या चाल। तू उसे खोलेगा, देखेगा, और अपने लोगों से कहेगा — यह हमारे काम का नहीं।"
"तो तुम क्यों बता रहे हो?"
वो हँसा। हँसी हल्की थी, और उस हँसी में मुझे रात की वो आवाज़ सुनाई दी — तीन टन की आवाज़, दीवार के पीछे से, बंद मुट्ठी में पकड़ी घंटी जैसी।
"क्योंकि मुझे तेरे सामने यह कहने में मज़ा आता है," उसने कहा। "कि तू जो सबसे ज़्यादा ढूँढ रहा है, वो तेरे पास आ रहा है। और जब वो आएगा, तू उसे पहचान नहीं पाएगा।"
"अगर नहीं पहचानूँगा," मैंने कहा, "तो मुझे क्या करना है?"
"कुछ भी नहीं," उसने कहा। "बस इतना कि उसे नकार मत देना। और मुझे लगता है, तू नकार देगा। क्योंकि तू अब भी सोचता है कि तू वो सब अपने हाथ से ठीक कर सकता है।"
मैंने जेब में घंटी को महसूस किया। वो गरम हो रही थी।
"मेरे पास घंटी है," मैंने कहा। "और मेरे पास गली है। और मेरे पास एक लड़का है जिसने आज सुबह कहा कि वो शहर चला जाएगा, क्योंकि एक ठेकेदार को उसका नाम सूची में नहीं चाहिए। इससे बता देता हूँ — तुम्हारे पास जो कुछ भी है, वो मेरे हिस्से का है। और मैं उसे लेने आऊँगा। तोहफ़े की तरह नहीं। हिसाब की तरह।"
वो फिर हँसा।
"तभी तो," उसने कहा, "मैं उसे तोहफ़ा कहकर भेज रहा हूँ।"
खिड़की चढ़ने लगी।
और उसके बंद होने से पहले, बहुत धीरे, मैंने उसकी आख़िरी बात सुनी। वो मुझसे नहीं कही गई थी। वो शायद उसके भीतर किसी से कही गई थी, या ख़ुद से, या उस चीज़ से जो उसके साथ बैठी थी और जिसे मैं नहीं देख सका।
"जो तेरा है," उसने कहा, "वो तेरे पास ही रहे, तो किसका फ़ायदा?"
गाड़ी चली गई।
धूल उसके पीछे उठी और फिर बैठ गई, और गली वैसी ही हो गई जैसी थी — सिवाय इसके कि अब मैं जानता था कि अगली सुबह तक कुछ आने वाला है, और वो कुछ नया नहीं होगा।
मैं दुकान के अंदर गया और कुर्सी पर बैठ गया।
कुछ देर बाद मीरा आई। उसने कुछ नहीं पूछा। वो सिर्फ़ मेरे सामने बैठ गई और अपनी कॉपी खोली, और मेरी तरफ़ देखा, जैसे कहे — बोल।
"कल कोई चीज़ आएगी," मैंने कहा।
"क्या?"
"वो नहीं बताया। बस कहा कि वो मेरी ही है और मैं उसे पहचान नहीं पाऊँगा।"
मीरा ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उसने कहा, "अगर वो तेरी ही है, तो तेरी होगी। और अगर तेरी है, तो तू उसे पहचान लेगा। चाहे वो कुछ भी हो। चाहे वो किसी मरे हुए आदमी की आवाज़ हो, या कोई काग़ज़ हो, या —"
"या क्या?"
"या कोई आदमी हो," उसने कहा। "जो आए और कहे कि मैं तेरा भाई हूँ।"
मैं कुछ नहीं बोला।
क्योंकि उस दिन, शाम को, मुझे वो बात समझ नहीं आई थी, पर मेरी हथेली जल रही थी। और जब मैंने घंटी को जेब से निकाला, तो वो सिर्फ़ एक बार बजी और बहुत धीमे, जैसे दूर से, वैसे ही जैसे कोई बंद कमरे में बोल रहा हो —
"अब हिसाब अपने आप बोलेगा।"
मैंने घंटी को मेज़ पर रखा और अपनी कॉपी खोली।
ऊपर माँ का नाम था। उसके नीचे मैंने लिखा — लक्ष्मी देवी, काम बंद। नीचे लिखा — टिंकू, तेरह साल, माँ को अपनी वजह से रोता नहीं देखना चाहता। और उसके नीचे सबसे छोटा, सबसे साफ़ अक्षरों में मैंने लिखा —
कल, दुकान पर, कुछ आएगा।
और मैंने उसके नीचे कलम रोक दी, क्योंकि मुझे नहीं पता था कि आगे क्या लिखना है। और उस अधूरी लाइन को देखते हुए मुझे पता चला कि मेरा हिसाब अब मेरा नहीं रहा। वो उन सबका हो गया है जिनके नाम मैंने उसमें लिखे हैं।
बाहर गली में शबनम आपा की गुमटी की लालटेन जल उठी। पीपल की छाया लंबी हो गई।
और उस पीली रोशनी में, दुकान के शटर पर, मुझे अपने साये के साथ एक दूसरा साया दिखा — छोटा, झुका हुआ, जैसे कोई मेरे पीछे खड़ा होकर मेरे कंधे के ऊपर से मेरी कॉपी देख रहा हो।
मैं पलटा।
कोई नहीं था।
और जब मैंने वापस मुड़कर कॉपी देखी, तो उस अधूरी लाइन के नीचे पेंसिल से कुछ लिखा हुआ था, बहुत छोटे अक्षरों में। मेरी लिखाई नहीं थी।
उस पर सिर्फ़ एक शब्द था।
भाई।
॥
मैं उस शब्द को देखता रहा।
भाई।
छोटे अक्षरों में, पेंसिल से, हल्का-सा झुका हुआ। जैसे किसी ने जल्दी में लिखा हो और फिर तुरंत हाथ खींच लिया हो। मेरी कलम उसके बगल में पड़ी थी, खुली, स्याही सूखी। और मेरा हाथ उस काग़ज़ से चार अंगुल दूर रह गया था, जैसे काग़ज़ ने खुद ही सीमा खींच दी हो।
मैंने पलटकर दुकान देखी।
शटर आधा नीचे था। उसकी दरार से गली की पीली रोशनी आ रही थी — शबनम आपा की गुमटी की लालटेन। पीछे के कमरे का बल्ब गुनगुना रहा था, जैसे कोई उम्रदराज़ आदमी पुरानी चारपाई पर साँस ले रहा हो। ट्रंक, औज़ार, अलमारी, चारपाई, दीवार पर टँगी रिंच — सब अपनी जगह। कोई नहीं था।
मैंने मेज़ के नीचे फ़र्श देखा। धूल थी। उस धूल पर पैर का एक भी निशान नहीं था। बिलकुल नहीं। जैसे किसी ने आकर कॉपी खोली, लिखा, और बिना ज़मीन छुए लौट गया हो।
मैंने होंठों से कहा, किसी से नहीं, खुद से, "ठीक है।"
और मेरी आवाज़ खोखली लगी।
मैंने घंटी उठाई। यह ठंडी थी — पर बर्फ़ जैसी नहीं। जैसे कोई बर्तन आग से उतरने के बाद देर तक अपनी गरमाहट याद रखता है, वैसी ठंडी। मैंने इसे कान के पास नहीं किया। मैंने इसे मेज़ पर वापस रख दिया और उँगली उस शब्द पर रख दी।
स्याही नहीं थी। पेंसिल थी। और पेंसिल की धूल सूखी थी — मतलब यह ज़्यादा पुरानी नहीं थी।
"कौन?" मैंने कहा। पूरी दुकान से। अलमारी से, ट्रंक से, पीछे के अंधेरे से, उस आधे खुले दरवाज़े से जिसके पीछे टॉर्च रखी थी।
कोई जवाब नहीं आया।
मैंने कॉपी बंद कर दी। बंद करके ट्रंक के ऊपर रख दी, उलटी। जैसे अगर मैंने उसे सीधा रखा, तो वो शब्द बढ़ जाएगा। जैसे वो साँस लेने लगेगा।
फिर बाहर से चप्पलों की आवाज़ आई।
धीमी, भारी, रबर घसीटती हुई। मैंने सिर उठाया। शटर के नीचे से जो पैर दिखे, उनके नाखून पीले थे और चप्पल का रबर घिसा हुआ। पुरानी चप्पल। भूरी।
"उस्ताद?" मैंने कहा, उठते हुए।
शटर मेरे हाथ से और ऊपर गया, और उस्ताद अली बक्श अंदर आए। उनके हाथ में कुछ नहीं था। न कैंची, न पेंसिल, न नापने का फीता। उनका मोटा चश्मा गले में लटक रहा था — जैसे वो उसे पहनना भूल गए हों।
और यह मैंने पहली बार देखा।
"बैठिए," मैंने कहा। "चाय बना लूँ —"
"चाय नहीं।" उनकी आवाज़ सूखी थी, जैसे दिन भर कुछ न बोले हों। "आज रात कुछ और चाहिए।"
वो मेज़ के सामने वाली पुरानी कुर्सी पर बैठे। कुर्सी चरमराई और उन्होंने उसे सँभाल लिया। फिर उन्होंने मेज़ पर नज़र डाली — घंटी, गले की पुरानी चाबी जो मैंने उतारकर रख दी थी, सील आदेश की नकल, मंसूर चाचा की बनाई चाबी की नक़ल, और कॉपी — उलटी पड़ी।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"तुम बताओ," उन्होंने कहा। "कॉपी क्यों उलटी है?"
मैं कुछ नहीं बोला।
उस्ताद ने धीरे से कॉपी सीधी की। खोली नहीं। सिर्फ़ ऊपर हाथ रखा, जैसे कोई ताबीज़ रखता है।
"मुझे पता है," उन्होंने कहा। "मैंने तुम्हारी आवाज़ सुनी थी। जब तुमने पूछा — कौन।"
बाहर गली में हवा चली। शटर की चादर हल्की हिली।
"कुछ नहीं हुआ, उस्ताद," मैंने कहा। "मैं थक गया हूँ। नींद —"
"अंकुश।"
मैं चुप हो गया।
उन्होंने अपना चश्मा उतारा और मेज़ पर रख दिया। फिर मेरी तरफ़ देखा, बिना चश्मे के। उनकी आँखें छोटी थीं और उनमें पानी जैसी चमक थी, जो बुढ़ापे में अक्सर आ जाती है — पर आज वो चमक सिर्फ़ उम्र की नहीं थी।
"पचास साल पहले," उन्होंने कहा, "मैं तुम्हारी उम्र का था। तुमसे ज़्यादा पतला भी। और ज़्यादा घमंडी।"
उन्होंने घंटी की तरफ़ देखा।
"उस वक़्त मेरे पास भी एक घंटी थी। इससे छोटी। पर उसकी आवाज़ इतनी साफ़ थी कि मैं रात में उसे सुनकर उठ बैठता था। और मेरे साथ था इलियास। मेरा भाई। मुझसे तीन साल छोटा। उसका हाथ मेरे हाथ से बड़ा था, और दिल उससे भी बड़ा। हम दोनों मिलकर उस घंटी को चलाते थे। दो लोग। एक घंटी। दो हिस्से। उसका हाथ पकड़ता और मेरा दिल सुनता।"
उन्होंने साँस ली।
"पहला जोड़ हमने दो भाइयों का किया था। मिठाई की दुकान वाले। बड़े भाई ने छोटे भाई को हिस्सेदारी से बाहर कर दिया था। छोटे भाई ने बड़े के घर के सामने धरना दिया था। हमने दोनों को एक चबूतरी पर बैठाया। मैंने अपनी तरफ़ से कुछ नहीं कहा। इलियास ने कहा — एक सच बोलो। भाई ने कहा कि बाप की बीमारी में पैसा मैंने लगाया था। छोटे ने कहा कि उस रात मैंने दुकान बंद नहीं की, ताकि भाई की दवा वक़्त पर पहुँचे। और फिर वो दोनों रोए। और घंटी ने कहा — दस।"
उन्होंने उँगली उठाई।
"दस अंक। पहला जोड़। मैं खुशी से पागल हो गया था। मुझे लगा मैं दुनिया बदल दूँगा।"
मैंने कुर्सी खींची और उनके सामने बैठ गया।
"फिर?"
"फिर होता गया," उन्होंने कहा। "एक जोड़, दो जोड़, तीन। गली में, बाज़ार में, स्कूल में। दो औरतें जो सालों से नहीं बोलीं। एक बाप-बेटा जो एक ही घर में अलग-अलग रहते थे। छोटे-छोटे जोड़। दस अंक, बारह अंक, पंद्रह। और मैं हर जोड़ के बाद मज़बूत होता गया।"
उन्होंने ठहरकर मेरी तरफ़ देखा।
"पर अंकुश, एक बात थी जो मुझे उस वक़्त समझ नहीं आई। हर जोड़ के बाद, शहर में एक और आदमी मज़बूत होता गया। मुझे नहीं पता था कौन था वो। कहाँ बैठा था। क्या था। पर मुझे यह दिखता था कि जिस दिन मैं जोड़ करता, उसके तीन दिन के अंदर उस इलाक़े में कोई नई मुसीबत आ जाती। किसी की दुकान का किराया बढ़ जाता। किसी का काग़ज़ गायब हो जाता। किसी की बेटी का रिश्ता टूट जाता।"
"और आप जोड़ते रहे?"
"मैं समझता था कि यह उस शहर का हिसाब है। मैंने सोचा — मैं एक रिश्ता जोड़ता हूँ, तो उसके बदले कहीं कुछ टूटता है। यह कीमत है। यह चुकानी पड़ती है।" उन्होंने धीरे से मुस्कुराया, और वो मुस्कान बहुत पुरानी थी। "और मैंने सोचा — मैं तो अच्छा काम कर रहा हूँ। कीमत तो हर चीज़ की होती है।"
"पर वो कीमत नहीं थी," मैंने कहा।
"नहीं।"
उन्होंने मेज़ पर रखे चश्मे को उठाया और फिर वापस रख दिया। पहली बार मुझे लगा कि उनके हाथ काँप रहे हैं।
"वो मेरा ही हिस्सा था," उन्होंने कहा। "जो मैं जोड़ता, उसका आधा मुझ तक आता, और आधा उस तरफ़ चला जाता। जिस चीज़ का नाम कोई जानता नहीं, जो हर जगह है और कहीं नहीं है। मैंने बहुत देर बाद समझा। और तब तक —"
वो रुके।
"तब तक क्या?"
"तब तक उसने मेरी दुकान के बाहर आकर खड़े होना शुरू कर दिया," उन्होंने कहा। "सफ़ेद कपड़े में। चमकते जूते। मुस्कुराता हुआ। और एक दिन इलियास से कहा कि तुम्हारे भाई जो जोड़ते हैं, उससे मेरी रोज़ी बढ़ती है। मुझे थोड़ा और जोड़ दो।"
मेरा पेट भारी हो गया।
"इलियास ने क्या कहा?"
"इलियास ने उसकी बात नहीं मानी," उस्ताद ने कहा। "इलियास उस दिन शांत था। उसने मुझसे कहा — भाई, तेरे जोड़ अच्छे हैं, पर तू जोड़ते वक़्त हिसाब के बाद वाला देखता ही नहीं। तू यह नहीं देखता कि हमारा जोड़ किस के घर की दीवार मज़बूत कर रहा है।"
"और आपने?"
"मैंने गुस्से में कहा कि अगर तुझे मेरा काम पसंद नहीं, तो मेरे साथ न रह।"
वो रुके। बाहर शटर पर एक पत्ता गिरा और खड़का।
"और वो चला गया?" मैंने पूछा।
"नहीं।" उन्होंने सिर हिलाया। "वो नहीं गया। वो रुका रहा। मुझे उस दिन लगा कि बात आगे नहीं बढ़ी। क्योंकि वो रुक गया। पर असल में — बात रुकने से बात खत्म नहीं होती, अंकुश। बात रुकने से दरवाज़ा बंद हो जाता है।"
"तो फिर?"
"तो फिर मैंने जोड़ना बंद कर दिया।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"एक रात मैंने घंटी ट्रंक में रख दी," उन्होंने कहा। "और अगली सुबह इलियास को बताया कि अब मैं यह काम नहीं करूँगा। मैंने सोचा — मैं जोड़ूँगा नहीं, तो वो मज़बूत नहीं होगा। मैंने सोचा यह सबसे सही फैसला है। मैंने सोचा मैंने अपना हिस्सा देख लिया है।"
"और उसने क्या कहा?"
"उसने कहा — भाई, तूने जोड़ना बंद कर दिया, पर हाथ में घंटी नहीं रखी। तूने डर हाथ में रख लिया।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें बहुत स्थिर थीं, जैसे इस वक़्त वो बूढ़े नहीं, वही पचास साल पुराना आदमी हों।
"और वो सही था, अंकुश। मैंने जोड़ना नहीं छोड़ा। मैंने जोड़ने से डरना शुरू कर दिया। फ़र्क़ है दोनों में। पहले मैं जोड़ता था, और हिसाब नहीं देखता था। फिर मैंने जोड़ना बंद कर दिया, और हिसाब देखना भी बंद कर दिया। मैं बैठ गया। चुप हो गया। और मुझे लगा कि मैंने युद्ध जीत लिया।"
"और इलियास?"
"वो उसी साल चला गया।" उस्ताद की आवाज़ धीमी हो गई। "उसने मुझसे झगड़ा नहीं किया। वो एक दिन दुकान से उठा, अपनी सिलाई मशीन समेटी, और चला गया। और पचास साल से वो मेरे सामने से निकलता है, और मेरी तरफ़ नहीं देखता।"
"पर —" मैंने कहा, "कल तो आपने — इलियास आए थे। मशीन के नीचे। घंटी —"
"आया था," उन्होंने कहा। "घंटी के छल्ले पर वही निशान लेकर आया था। और मैंने उससे एक शब्द भी नहीं पूछा।" उन्होंने मेज़ पर हाथ रखा। "क्योंकि मैंने पचास साल से यही सीखा है — चुप रहना।"
वो कुछ देर चुप रहे।
फिर मैंने कहा, बहुत धीरे, "उस्ताद, आप यह सब मुझे क्यों बता रहे हैं?"
"क्योंकि कल तुमने रणवीर की बात सुनी। कि कल तुम्हारे पास कुछ आएगा। और जब आएगा, तुम उसे नकार दोगे।"
"आपको कैसे पता?"
"मुझे पता है कि तुम मुझे क्या बताओगे," उन्होंने कहा। "तुम कहोगे — मैं उसे पहचान लूँगा। और मैं तुम्हें बताने आया हूँ कि पहचानना ही सब कुछ नहीं होता। पहचानने के बाद तुम क्या करते हो — वो ज़रूरी है।"
मैंने घंटी को देखा। वो मेज़ पर पड़ी थी, ठंडी।
"तो हल क्या है?" मैंने पूछा। "मैं जोड़ना बंद कर दूँ?"
"नहीं।"
"तो जोड़ता रहूँ, और वो बड़ा होता रहे? उसका बक्सा भरता रहे, और मेरा हिसाब खाली होता रहे?"
"नहीं।" उस्ताद ने मेज़ पर झुकते हुए कहा, "अंधा जोड़ना भी हल नहीं है। और डरकर जोड़ना तो बिलकुल नहीं।"
"तो फिर क्या?"
उन्होंने सीधे मेरी आँखों में देखा।
"जोड़ ऐसा हो कि ऊर्जा चुराने वाला डर जाए।"
मैंने साँस रोक ली।
"मतलब?"
"मतलब यह —" उन्होंने उँगली मेज़ पर रखी, जैसे कोई नाप ले रहे हों। "वो चोरी करता है, और चोरी उसे ताक़त देती है। पर उसे चोरी छुपकर करनी पड़ती है। क्यों? क्योंकि जिस दिन वो खुले में आ जाएगी, उस दिन वो चोरी नहीं रहेगी। वो मज़ाक बन जाएगी। और जिस चीज़ का लोग मज़ाक बना दें, वो किसी को डरा नहीं सकती।"
मैं कुर्सी पर पीछे झुका। मेरे पेट में कुछ हिला — जैसे कोई पुराना ताला अंदर से घूम गया हो।
"आप कह रहे हैं कि मुझे चोरी छुपाने के बजाय उसे दिखाना चाहिए," मैंने कहा। "हर जगह। हर सभा में। हर काग़ज़ में। हर नोटिस में।"
"हाँ।"
"पर वो और गुस्सा होगा। वो और टूटेगा। वो —"
"वो और मज़बूत होगा," उस्ताद ने कहा। "पर जिस दिन पूरी गली उसकी चोरी को जान जाएगी, तब वो जोड़ने के बजाय बचाने में लगेगी। और जब लोग बचाने में लगेंगे, तब चोरी छुपाने की जगह नहीं रहेगी।"
"पर यह तो रास्ता लंबा है।"
"हाँ।" उन्होंने सिर हिलाया। "यह रास्ता लंबा है। और यही रास्ता है।"
मैंने कुछ देर सोचा। मेरे अंदर एक आवाज़ कह रही थी कि उस्ताद का रास्ता सही है, पर उसमें एक कमज़ोरी है — वो चोरी छुपाने वाले को खुद बता रहे थे कि मैं तुझे उघाड़ने जा रहा हूँ। और जो आदमी रणवीर है, वो इतना सीधा खड़ा नहीं रहेगा।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आपने अपनी बात पूरी नहीं कही।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"आपने कहा — जोड़ ऐसा हो कि चुराने वाला डरे। पर आपने यह नहीं बताया कि उसे डरना चाहिए वो चोरी। क्योंकि जो चोरी छुपकर होती है, वो कहीं से भी आ सकती है। और जो खुले में हो जाए, वो और जगह छुपाने लगती है।"
उस्ताद कुछ देर मेरी तरफ़ देखते रहे। फिर उन्होंने धीमे से कहा — "अब तुम पचास साल पहले वाले मुझसे बात नहीं कर रहे। तुम अपने आज से बात कर रहे हो।"
"मैं बात कर रहा हूँ उस चीज़ से," मैंने कहा, "जो मेरे जोड़ का आधा हिस्सा खा रही है।"
वो खामोश हुए।
फिर मैंने घंटी उठाई और उसे अपनी हथेली में रखा। वो ठंडी थी। बर्फ़ जैसी नहीं, पर ठंडी।
"मुझे अब समझ आ रहा है," मैंने कहा। "मैं जोड़ बंद कर दूँ — तब भी वो खाएगा, क्योंकि टूटे रिश्ते भी उसे खिलाते हैं। और मैं जोड़ता रहूँ, तब भी वो खाएगा। दोनों में मैं हार रहा हूँ।"
"हाँ।"
"तो फिर मुझे जोड़ के अंदर ही कुछ बदलना होगा," मैंने कहा। "मुझे ऐसा जोड़ बनाना होगा जिसमें वो हिस्सा ले ही न सके।"
उस्ताद ने सिर हिलाया।
"और वो कैसे होगा?" मैंने पूछा।
"अगर मुझे पता होता," उन्होंने कहा, "तो मैं पचास साल यहाँ नहीं बैठा होता।"
मैं मुस्कुराया। पहली बार उस रात।
"तो मैं क्या करूँ?"
"तुम वो करो जो मैं नहीं कर सका," उन्होंने कहा। "तुम अपने जोड़ में उसे खुद बताओ कि तुम जानते हो वो हिस्सा लेता है। और तुम उसी वक़्त यह भी कहो कि तुम उसे उस हिस्से से ज़्यादा कुछ दे रहे हो — जो उसके पास नहीं है।"
"क्या?"
"याद," उस्ताद ने कहा। "जो चीज़ मैंने दी है। जो चीज़ तुम देते हो — माफ़ी, भरोसा, दो लोगों का जुड़ना। उसका कोई रूप नहीं है। उसे कोई पकड़ नहीं सकता। उसे कोई बेच नहीं सकता। और उसे खाया नहीं जा सकता, अंकुश। पर उसका असर — वो रणवीर के बक्से में नहीं जाता। वो उस दो आदमियों के बीच रहता है, जिन्होंने माफ़ी माँगी। और वो उस घर की दीवार में उतर जाता है। और वो उनके बच्चों के हाथ में चला जाता है।"
उन्होंने मेज़ पर हाथ रखा।
"तुम्हारे जोड़ से जो आधा जाता है, वो जाता है। पर तुम जो जोड़ते हो, उसका असली फल तुम्हारे ही लोगों के अंदर रह जाता है। और वो फल — वो कभी नहीं चोरी हो सकता।"
मैंने घंटी को हथेली में दबाया।
"तो मैं उसे चोरी पर थोड़ा कम रखूँ," मैंने कहा, "और जोड़ पर थोड़ा ज़्यादा।"
"नहीं।" उन्होंने सिर हिलाया। "तुम उसे कम नहीं कर सकते। तुम उसे यह दिखा सकते हो कि वो जो चुरा रहा है, वो कभी उसका नहीं होगा। और जो चीज़ कभी उसकी हो नहीं सकती — वो क्यों चुराएगा? एक बार, दो बार, सौ बार। पर एक दिन वो रुक जाएगा, क्योंकि चोरी का मज़ा तब है जब चुराई हुई चीज़ काम आए। जो चीज़ काम न आए, उसे चुराने में क्या मज़ा?"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"तो हल यह है," मैंने कहा, "कि मैं उसे चोरी करने दूँ, पर चुराई हुई चीज़ उसके काम की न रहने दूँ।"
"हाँ।" उस्ताद ने धीरे से कहा, "यह हल है।"
वो उठने को हुए। फिर रुक गए।
"अंकुश।"
"हाँ?"
"आज रात मैंने तुमसे जो कहा, वो मैंने इलियास के बाद पहली बार किसी से कहा है।" उन्होंने चश्मा उठाया। "पचास साल में।"
मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि कुछ कहना छोटा लगता।
उन्होंने चश्मा पहना। फिर मेज़ पर पड़ी कॉपी की तरफ़ देखा, और उनकी आँखें उस अधूरी लाइन पर रुक गईं।
"भाई," उन्होंने पढ़ा। फिर मुझसे पूछा, "तुमने लिखा?"
"नहीं।"
"और तुम इसे देखकर पूछ रहे थे कि कौन।"
"हाँ।"
उस्ताद ने कुछ देर सोचा।
"भाई," उन्होंने दोहराया। "अगर यह कोई बाहर वाला लिख गया होता, तो वो कहता — तेरा भाई। पर उसने सिर्फ़ भाई लिखा। बिना तेरा के। बिना मेरा के।"
मैंने कॉपी की तरफ़ देखा।
"मतलब वो कह रहा है — भाई," मैंने कहा। "किसका भाई? मेरा? उसका? किसी और का?"
"मतलब वो यह कह रहा है," उस्ताद ने कहा, "कि भाई जैसा कोई है। और वो कहीं है। और वो तुम्हें बता रहा है कि वो आ रहा है।"
मेरी हथेली में घंटी हल्की गरम हुई।
बहुत हल्की। जैसे किसी ने मेरे कान में बहुत धीरे से कहा हो और मैंने सुना न हो, सिर्फ़ महसूस किया हो।
"उस्ताद," मैंने कहा, "कल जो आएगा — वो अगर सच में मेरा कोई है, तो क्या मैं उसे पहचान पाऊँगा?"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था जो आज पहली बार साफ़ था — डर नहीं। बहुत पुराना दर्द, जो अब सिर्फ़ याद बन गया है।
"तुम पहचान लोगे," उन्होंने कहा। "पर असली सवाल यह है —
क्या वो तुम्हें पहचानेगा?"
वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़े। शटर उठाया। बाहर पीली रोशनी थी। उन्होंने एक क़दम बाहर रखा, फिर पलटे।
"एक बात और, अंकुश।"
"हाँ।"
"जब तुम इलियास से मिलो —" वो रुके। मेरी तरफ़ नहीं देखा। बाहर देखा। "जब तुम किसी से मिलो जो कहे कि वो तुम्हारा भाई है, तो उससे एक ही सवाल पूछना।"
"क्या?"
"पूछना — तुमने माफ़ी कब माँगी थी, और किससे?"
वो चले गए।
शटर मैंने धीरे से नीचे किया। आधा। क्योंकि पूरा बंद करने का मन नहीं था।
मैं कुर्सी पर बैठ गया। मेज़ पर घंटी, चाबी, सील आदेश की नकल, मंसूर की चाबी की नक़ल, कॉपी। और उस सबके ऊपर वो एक शब्द — भाई।
मैंने घंटी उठाई। गरम नहीं थी। ठंडी भी नहीं। जैसे चुप।
"तू जानती है," मैंने कहा। "तूने वो शब्द देखा। तूने कुछ कहा क्यों नहीं?"
कोई जवाब नहीं।
"मैं अब तेरी आवाज़ नहीं पूछूँगा," मैंने कहा। "मैं एक बात कहूँगा। अगर मैंने सही कहा, तो एक बार बज जाना।"
मैंने घंटी को मेज़ पर रखा और बोला — "मैं जोड़ बंद नहीं करूँगा। और मैं अंधा जोड़ भी नहीं करूँगा। मैं अब हर जोड़ में वो चीज़ डालूँगा जो चोरी नहीं हो सकती।"
घंटी नहीं बजी।
मैंने उसे और ध्यान से देखा। मेरी ग़लती नहीं थी — मैंने कुछ कम कहा था।
मैंने गहरी साँस ली और कहा — "और मैं उसे दिखाऊँगा कि उसका हिस्सा उसी का नहीं है। मैं उसका हिसाब खुद बोलूँगा।"
घंटी बजी।
एक बार। हल्की। और फिर उसकी सतह पर, पुराने दो लकीर-बिंदु वाले निशान के नीचे, एक नई रेखा उभरी — बहुत पतली, जैसे कुछ गरम चीज़ ठंडी होकर जम गई हो।
मैंने उसे देखा, पर नाम नहीं पूछा।
नाम पूछने का वक़्त नहीं था। काम का वक़्त था।
मैंने कॉपी खोली और एक नया पन्ना लिया। उस पर सिर्फ़ तीन लाइनें लिखीं। पहली — हर जोड़ में वो चीज़ डालें जो चोरी न हो सके। दूसरी — हर जोड़ के बाद उसका हिसाब खुले में लिखें, सबके सामने। और तीसरी, सबसे नीचे, छोटे अक्षरों में, मैंने उसी शब्द को दोबारा लिखा, पर इस बार मैंने उसके आगे कुछ जोड़ दिया —
भाई — वो सवाल जो मैं पूछूँगा।
मैंने कलम रखी और कुर्सी पीछे सरका दी।
बाहर गली में शबनम आपा की गुमटी की लालटेन अभी जल रही थी। पीपल की छाया लंबी थी। किसी ने रात की चाय की आवाज़ दूर से आई — कुल्हड़ की खनक। मेरा शरीर पहली बार दिन भर बाद हल्का लगा।
और तभी।
बाहर से दौड़ते हुए पैरों की आवाज़ आई।
नंगे पैर नहीं। चप्पल थी। पर चप्पल की आवाज़ बहुत तेज़ थी, और उसके साथ साँस फूलने की आवाज़। मैंने शटर की तरफ़ देखा।
एक हाथ शटर पर पड़ा और ज़ोर से ऊपर उठाया। मैंने कभी नहीं सोचा था कि शबनम आपा शटर उठा सकती हैं।
वो अंदर आईं। उनका मुँह खुला था, साँस लेने की जगह नहीं मिल रही थी, माथे पर चंदन पसीने से बह गया था और साड़ी का पल्लू कंधे से गिरा था।
"आपा —" मैंने उठते हुए कहा, "क्या हुआ? आप क्यों —"
"काजल —" उन्होंने हाँफते हुए कहा, "काजल — वो अस्पताल से आई थी। वो —"
"काजल ठीक है?"
"ठीक है। ठीक है। पर —" उन्होंने एक हाथ सीने पर रखा और दीवार पकड़कर खड़ी रहीं।
"आपा, बैठिए —"
"नहीं!" उनकी आवाज़ तेज़ हो गई, फिर अगले ही पल धीमी। "अंकुश, सुन।"
वो मेरी तरफ़ उठीं। उनकी आँखों में आँसू नहीं थे, पर उस तरह चमक रही थीं जैसे पुरानी लालटेन में तेल खत्म होने से पहले चमकती है।
"गुमटी पर चार बजे वाला टेम्पो नहीं आया," उन्होंने कहा। "का तो नहीं आया। पर — भारद्वाज भवन से एक नीला टेम्पो आया। और उस पर एक काला बक्सा था।"
मैं रुक गया।
"काला बक्सा?"
"हाँ। मोटा। लोहे जैसा। ऊपर से कपड़ा। दो आदमी थे।" उन्होंने साँस ली। "और वो बक्सा उन्होंने मेरी गुमटी के सामने उतार दिया। रास्ते में नहीं। मेरी गुमटी के सामने। और उस पर —"
वो रुकीं।
"उस पर क्या?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और मुझे लगा कि वो जो कहने जा रही हैं, वो वो खुद भी नहीं कहना चाहतीं।
"उस पर तेरा नाम है।" उनकी आवाज़ फूटी। "अंकुश यादव। पूरा नाम। मेरे गुमटी के सामने। सबके सामने।"
मेरी हथेली में घंटी अचानक गरम हुई, इतनी गरम कि मैंने इसे मेज़ पर गिरा दिया।
वो टन-टन बजी। और जब बजी, तो मुझे साफ़ सुना — बहुत धीमा, बहुत दूर से —
"वो नाम माँगता है।"
शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा। उन्हें नहीं सुनाई दिया था। वो बस खड़ी थीं, दीवार पकड़े, साँस ले रही थीं।
मैंने घंटी उठाई, जेब में डाली, और शटर की तरफ़ बढ़ा।
"अंकुश —" शबनम आपा ने कहा, "वो कह रहे थे —"
"क्या कह रहे थे?"
उन्होंने होंठ कसे।
"वो कह रहे थे — जिसका नाम है, वो ले जाए। और जो नहीं ले जाएगा, उसका नाम वो खुद उतार देगा।"
मैं शटर के नीचे से बाहर निकला। गली में हवा थी। पीपल की छाया में चबूतरी खाली थी। और गुमटी के सामने — पीली लालटेन की रोशनी में — बड़ा, मोटा, काला बक्सा खड़ा था।
उस पर सफ़ेद पेंट से मेरा पूरा नाम लिखा था।
और उसके बगल में, बक्से से थोड़ी दूर, एक आवाज़ आई। किसी ने कहा — "अंकुश भैया।"
मैंने घूमकर देखा।
टिंकू था। उसके हाथ में रोटी का टिफ़िन था। उसने मेरी आवाज़ सुनकर रास्ते से ही पुकार दिया था। और मुझे लगा कि उसने अभी कुछ और देखा है, क्योंकि उसके हाथ का टिफ़िन काँप रहा था।
"क्या हुआ?" मैंने कहा।
"वो —" टिंकू ने उँगली उठाई — "वो बक्सा अभी बोला।"
"क्या बोला?"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
"उसने तुम्हारा नाम लिया," उसने कहा, "और फिर कहा — भाई आ गया।"
मैंने घंटी निकाली। वो गरम थी, और बज रही थी, बिना रुके, बहुत धीमी, बहुत दूर से — जैसे कोई पुराना दरवाज़ा अंदर से खुल रहा हो।
॥
गुमटी के सामने वो बक्सा खड़ा था। काले लोहे जैसा मोटा, ऊपर से कपड़ा लिपटा हुआ, नीचे लकड़ी के दो फट्टे, और उस पर सफ़ेद पेंट से मेरा नाम।
अंकुश यादव।
पूरा नाम। जैसे स्कूल की हाज़िरी वाली कॉपी पर लिखते हैं। कोई मुहर नहीं, कोई तारीख़ नहीं, कोई पता नहीं। सिर्फ़ नाम। जैसे किसी ने कहा हो — बाकी बातें तू खुद समझ ले, तू तो समझता ही है।
टिंकू मेरे पास आ गया था और उसके हाथ में रोटी का टिफ़िन था। उसने टिफ़िन मेरे हाथ में दे दिया, जैसे अब उसके पास पकड़ने को कुछ और रह गया हो।
"अंकुश भैया, मैंने सच सुना।" उसकी आवाज़ छोटी हो गई थी। "बक्सा बोला था। धीरे से नहीं, साफ़ बोला था।"
"क्या बोला?"
"पहले तुम्हारा नाम लिया। फिर कहा — भाई आ गया।"
मैंने घंटी जेब से निकाली। वो गरम थी, पर आवाज़ नहीं कर रही थी। बस हल्की-हल्की काँप रही थी, जैसे बूढ़े हाथ काँपते हैं।
शबनम आपा गुमटी के दरवाज़े पर खड़ी थीं, दोनों हाथ से चौखट पकड़े। उनके माथे से चंदन पसीने के साथ बह गया था और चिमटी उनके हाथ में थी, पर उस वक़्त चिमटी हथियार नहीं लग रही थी। लकड़ी का एक टुकड़ा लग रही थी।
गली से लोग आने लगे। भोला भाई चप्पल घसीटते आए, नसीमा बाई साड़ी का पल्लू सँभालती आईं, किशनलाल काका की दुकान का ताला अधूरा लगा रह गया था। कोई भी बक्से के करीब नहीं आ रहा था। सब दूर से देख रहे थे। जैसे बक्सा नहीं, कोई बीमार आदमी बैठा हो।
"अंकुश," भोला भाई ने कहा, "इसे यहाँ से हटा। ये मेरी दुकान के सामने है।"
"भोला भाई, आपकी दुकान वहाँ है।" मैंने उँगली से इशारा किया। "ये गुमटी के सामने है।"
"तो गुमटी से हटवा।"
शबनम आपा ने कुछ नहीं कहा। वो बस मेरी तरफ़ देख रही थीं।
मैंने बक्से के चारों तरफ़ एक चक्कर लगाया। उस पर कहीं कोई मोहर नहीं थी। कोई भारद्वाज कंस्ट्रक्शन का निशान नहीं। कोई नंबर नहीं। सिर्फ़ मेरा नाम, और उस नाम के नीचे एक छोटा सा गोल निशान जो अधूरा था — जैसे कोई मोहर लगाई गई हो और फिर उसे पोंछ दिया गया हो।
मैंने हाथ लगाया। बक्सा ठंडा था। इतना ठंडा कि हथेली चिपक गई।
"जिसका नाम है, वो ले जाए।" बबलू के आदमियों ने यही कहा था। "और जो नहीं ले जाएगा, उसका नाम खुद उतार दिया जाएगा।"
मैं हँसा। सच में हँसा। और मेरी हँसी सुनकर सब चौंक गए, जैसे किसी ने मरघट में बाजा बजा दिया हो।
"देखो," मैंने कहा, "ये तो अच्छी बात है। मेरा नाम मिटाने का ज़िम्मा उन्होंने अपने ऊपर लिया है। मैं तो डर रहा था कि मुझे खुद करना पड़ेगा।"
कोई नहीं हँसा।
"अंकुश," मीरा ने कहा। वो मेरे पीछे खड़ी थी, कैमरा बंद, हाथ में सिर्फ़ कॉपी। "अंदर देखना है?"
"देखना है।"
"तो दुकान में ले चल। यहाँ सबके सामने नहीं।"
"नहीं।" मैंने कहा। "यहीं। अगर मैं इसे अकेले ले जाकर खोलूँगा, तो कल सब कहेंगे कि अंदर क्या था, पता नहीं। सबके सामने खुलेगा।"
शबनम आपा ने पहली बार कुछ कहा।
"मेज़ लाओ," उन्होंने कहा। "मेरी गुमटी की मेज़। बड़ी है।"
भोला भाई और रमेश भाई ने मिलकर मेज़ उठाई और बक्से के आगे रख दी। मैंने टिंकू से कहा कि वो अपनी माँ को बुला लाए, क्योंकि जो भी होने वाला था, वो अकेले नहीं देखना चाहता था।
और तभी पापा आए।
वो धीरे आए, सीधे नहीं। पीपल की छाया से निकलकर, दीवार के साथ-साथ, जैसे किसी की नज़र से बचकर आ रहे हों। उनके हाथ में कुछ नहीं था। यही सबसे डरावनी बात थी। पापा के हाथ में हमेशा कोई औज़ार होता है। उस दिन खाली थे।
उन्होंने बक्से को देखा। फिर नाम को देखा। फिर मेरी तरफ़ देखा।
"यह ताला —" उन्होंने धीमे से कहा, और रुक गए।
"कौन सा ताला, पापा? बक्सा अभी बंद है।"
वो नहीं बोले। उन्होंने होंठ कसे और वहीं खड़े रहे, बक्से से तीन कदम दूर, जैसे उन्हें भी अंदर जाने की इजाज़त नहीं थी।
मैंने बक्से का ढक्कन उठाया।
भारी था। मुझे लगा कि अंदर ईंटें भरी होंगी। पर अंदर ईंटें नहीं थीं। अंदर कुछ और था, और वो कुछ ऐसा था कि गली की सारी हवा एक झटके में रुक गई।
अंदर, एक मैले पीले कपड़े पर, एक ताला रखा था।
मोटा, काला, ज़ंग लगा हुआ। उसका कुंडा मोटा था, बीच में एक जगह चपटा, और उस चपटी जगह पर खुरचकर बनाया गया वही निशान — दो लकीरें और बीच में एक बिंदु।
मैंने ताला उठाया।
हाथ में लिया, तो वो मेरी हथेली में बैठ गया, जैसे उसे वहाँ बैठने की आदत हो।
मैं उसे पहचानता था।
मैं उसे बहुत अच्छी तरह पहचानता था।
यह वही ताला था जो पापा के पुराने संदूक पर लगा था। वो संदूक, जिसकी रस्सी कटी मिली थी, जिसका ताला खुला पड़ा था और जिसके अंदर की चीज़ें बिखरी हुई थीं। और फिर एक दिन वो ताला गायब हो गया था। पापा ने उसके बारे में कभी एक शब्द नहीं कहा। मैंने पूछा भी नहीं। मुझे लगा कि टूट गया होगा, कहीं गिर गया होगा।
मेरी आँखें भर आईं।
मैं झूठ नहीं बोलूँगा। मेरी आँखें भर आईं, बहुत भर आईं। गला भर गया, और एक पल के लिए मुझे अपना ही चेहरा नहीं सूझा। मैंने सोचा कि अगर मैंने एक बार पलक झपकाई, तो सब बह जाएगा, और सब देख रहे हैं।
तो मैंने बक्से की तरफ़ देखा और कहा —
"अरे वाह। ताला भेज दिया, चाबी भूल गए। बड़े लोग भी न, इतने बड़े कारोबार में, और इतनी छोटी भूल। मुझे तो उनसे यही उम्मीद थी कि चाबी भेजेंगे चाबी के साथ, और साथ में एक पर्ची — बेटा, चलो माफ़ करो।"
भोला भाई ने होंठ दबाकर हँसी रोकी। नसीमा बाई ने हँसा भी और तुरंत मुँह फेर लिया।
पर मेरे हाथ काँप रहे थे और मेरा दिल एक अजीब सी बात कह रहा था — "पहली याद।"
अंदर कपड़े के नीचे एक और चीज़ थी। एक मोटा काग़ज़, चार तह किया हुआ, ऊपर से मोहर की तरह दबा हुआ। मैंने उसे उठाया और पीली लालटेन की रोशनी में खोला।
काग़ज़ पर लिखाई मोटी थी, गहरी नीली स्याही, साफ़-सुथरी। जैसे किसी अच्छे स्कूल में पढ़े हुए आदमी की लिखाई हो, जिसने बहुत सारी किताबें पढ़ी हों और बहुत सारे लोगों के दस्तख़त लिए हों।
मैंने ज़ोर से पढ़ा, ताकि सब सुनें।
"अंकुश यादव, अब तक तुमने मुझे आधा समझा, और आधी ताक़त से शिकस्त दी। अब वैसा नहीं होगा। अब मैं पूरी ताक़त से खेलूँगा। मुझे तुम्हारी मरम्मतों की ज़रूरत उतनी ही है जितनी तुम्हें मेरे टूटने की। तुम्हारी पहली याद, जो तुम्हें सबसे प्यारी है, इस ताले के अंदर रहेगी। तुम उसे महसूस करोगे, पर देख नहीं पाओगे।"
मैं रुक गया। काग़ज़ के नीचे कुछ और लिखा था, पर वो पंक्ति अधूरी थी — जैसे लिखने वाले का हाथ बीच में ऊपर उठ गया हो।
गली में सन्नाटा था। एक आवाज़ आई — किसी बूढ़े की खाँसी। और फिर शबनम आपा बोलीं।
"पढ़ आगे।"
"आगे कुछ नहीं है।" मैंने कहा।
"अच्छे से पलट।" मीरा ने कहा।
मैंने काग़ज़ पलटा। पीठ खाली थी। सिर्फ़ एक जगह मोहर का हल्का नीला धब्बा था और उसके ऊपर कोई अक्षर नहीं। मैंने काग़ज़ मीरा को दिया। उसने उसे लालटेन के नीचे लिया, कोने सीधे किए, और फिर उसने मुझे देखा।
"अंकुश, नीचे किनारे पर कुछ है। बहुत छोटा।"
"क्या है?"
"पढ़ रही हूँ।" मीरा ने आँखें सिकोड़ीं। "लिखा है — ताला खोलना है, तो पहले वही रिश्ता जोड़ो जो तुमने खुद तोड़ा था।"
मैंने घंटी जेब में महसूस की। वो ठंडी हो गई थी।
"मैंने कौन सा रिश्ता तोड़ा था?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ मुझे ही अजीब लगी। "मैं तो सब जोड़ता फिरता हूँ। यही तो मेरा रोज़ का काम है।"
"तूने सब जोड़े हैं," मीरा ने कहा। "सबके। हमारे।" उसने उँगली उठाई। "अपना कौन सा जोड़ा?"
पापा ने वहीं, उसी जगह पर, धीरे से साँस ली। मैंने उनकी तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ नहीं देख रहे थे। वो ताले को देख रहे थे।
"पापा," मैंने कहा, "ये ताला आपके संदूक का है।"
"हाँ।"
"आपने मुझे बताया नहीं कि ये गायब हुआ।"
"तूने भी तो बहुत बातें नहीं बताईं।" उन्होंने धीमे से कहा।
मैं चुप हो गया।
"ये ताला मेरे बाप का था," पापा ने कहा। "दादा जगदीश यादव का। उनका हाथ इतना बड़ा था कि ये ताला उनकी हथेली में छिप जाता था।"
"और अब ये रणवीर के पास से निकला है।" मैंने कहा।
"निकला नहीं," पापा ने कहा। "भेजा है। वो चीज़ें लौटाता है जो उसने ली हों, अंकुश। यह उसकी सबसे बड़ी आदत है। वो लौटाकर अपनी बड़ाई दिखाता है।"
मैंने ताला उठाया, आँख के करीब लाया और उसका निशान देखा — दो लकीरें, बीच में बिंदु। वही निशान जो चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर था, जो घंटी के छल्ले पर था, जो बिजलीघर के बक्से पर खुरचा मिला था।
"मेरी पहली याद," मैंने धीरे से कहा। "मेरी पहली याद कौन सी है?"
किसी ने जवाब नहीं दिया।
"मैं सच में नहीं जानता," मैंने कहा। मैं हँसा, पर इस बार हँसी में कुछ नहीं था। "ये तो मज़ेदार बात है। आदमी अपनी पहली याद नहीं जानता। उसे पता है कि उसने पहली बार कब साइकिल चलाई, पता है कि उसने पहली बार कब झूठ बोला, पता है कि उसके पापा ने पहली बार कब उसके सिर पर हाथ रखा — पर सबसे पहली याद? वो कहाँ गई?"
"वो पहली याद सबसे ज़्यादा छुपी होती है," शबनम आपा ने कहा। उनकी आवाज़ भारी थी। "और सबसे ज़्यादा छुपी चीज़ सबसे ज़्यादा क़ीमती होती है।"
मैंने ताला जेब में डालने के लिए हाथ बढ़ाया, फिर रुक गया, और फिर उसे सीने से लगाकर जेब में रखा। जेब में घंटी भी थी। दोनों एक साथ छुए, तो अजीब सी गरमाहट हुई — जैसे दो पुराने दुश्मन एक ही बस में बैठ गए हों।
तभी दरवाज़े पर लक्ष्मी देवी खड़ी दिखीं।
उनके हाथ में एक फटा कपड़े का थैला था — टिंकू के कपड़ों का। उन्होंने साड़ी का पल्लू कंधे पर ठीक किया और अंदर आईं।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "मैंने फैसला सुना दिया था। टिंकू राँची नहीं जाएगा। आज रात वो मेरे साथ रहेगा।"
"अच्छा किया, बहन जी," शबनम आपा ने कहा।
"पर —" लक्ष्मी देवी ने रुककर मेरी तरफ़ देखा, "ये बक्सा क्या है? इस पर तेरा नाम क्यों है? गली में एक ही बात चल रही है कि साहब ने आख़िरी बाज़ी खेल दी।"
"यही है," मैंने कहा। "आख़िरी बाज़ी।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो सवाल था जो वो पूछना चाहता था पर पूछ नहीं रहा था — "तू मुझे छोड़ रहा है क्या?"
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"टिंकू, तू घर जा।"
"पर —"
"माँ के साथ जा। आज रात मेरी बात मत पूछ।" मैंने उसकी आँखों में देखा। "और सुबह छह बजे गुमटी पर आ जाना। मैं तेरे लिए एक चीज़ रख रहा हूँ।"
"क्या?"
"अभी नहीं बताऊँगा। वरना तू रात भर सो नहीं पाएगा, और मुझे तेरी माँ को जवाब देना पड़ेगा।"
टिंकू हँसा। हल्का, थोड़ा डरा हुआ, पर हँसा। उसने मेरा हाथ पकड़ा, दबाया और माँ के साथ चला गया।
लक्ष्मी देवी जाने से पहले रुकीं।
"अंकुश, एक बात कहूँ?"
"कहिए।"
"मैंने जब टिंकू के पापा को खोया था," उन्होंने धीमे से कहा, "तब मुझे लगा था कि मेरा सबसे पहला हँसना भी उनके साथ ही मर गया। बरसों बाद पता चला कि मेरा सबसे पहला हँसना टिंकू था, जब उसने पहली बार खड़े-खड़े गिरना सीखा। किसी चीज़ को भूलना पड़ता है, बेटा, तभी कुछ नई चीज़ याद आती है।"
वो चली गईं।
मैंने बक्से को देखा। अब वो अंदर से खाली था और बाहर से भारी लग रहा था।
"इसे उठाओ," मैंने भोला भाई से कहा। "मेरी दुकान के पीछे वाले कमरे में रखो। जो नाम वाला है, वो ले गया। अब साहब अपना वादा निभाएँ, मेरा नाम कहीं से उतारें।"
लोग हँसे। इस बार असली हँसी थी। और मैंने महसूस किया कि गली में हँसी अभी ज़िंदा है, और जब तक हँसी ज़िंदा है, घंटी भी ज़िंदा रहेगी।
बक्सा उठाकर अंदर रखा गया। भोला भाई ने अपने दोनों आदमियों से कहा कि रात भर दुकान के बाहर बैठेंगे नहीं, अंदर बैठेंगे। लोग एक-एक करके गए, पर कोई भी गली छोड़कर नहीं गया। आज सब वहीं सोए — किसी की चारपाई, किसी की छत, किसी की दुकान।
रात लगभग आठ बजे की थी। शबनम आपा ने चूल्हा जलाया और चाय बनाई। पहला कप मेरे आगे रखा।
"पी ले," उन्होंने कहा, "बतियाते हुए सोचेंगे।"
मैं बैठ गया। मीरा मेरे सामने बैठी और उसने ताला मेज़ पर रखकर उसे चारों तरफ़ से देखा।
"इस पर बाहर से कुछ नहीं लिखा," उसने कहा। "सिर्फ़ निशान।"
"ताले पर नाम नहीं लिखते," मैंने कहा। "नाम लिखो तो चोर को पता चल जाता है कि किसका ताला है।"
"अरे वाह," मीरा ने कहा, "तू आजकल दार्शनिक भी हो गया है।"
"भूख लगी है न, इसलिए।"
उसने ताला उठाया, हिलाया और कान के पास ले गई। फिर उसने उसे दूर कर दिया, जैसे चीज़ गरम हो।
"अंकुश —"
"क्या?"
"इसके अंदर से आवाज़ आती है।" उसकी आवाज़ धीमी थी। "जैसे कुछ खिसकता है। हल्का-हल्का।"
"ज़ंग होगी।"
"ज़ंग ऐसे नहीं खिसकती।"
मैंने ताला उससे लिया और कान लगाया।
पहले तो कुछ नहीं सुनाई दिया। सिर्फ़ अपनी ही नाड़ी सुनाई दी — कान में जब चीज़ दबाओ तो अपनी नाड़ी सुनाई देती है, यह सबको पता है। पर फिर, उस नाड़ी के पीछे, कुछ और था।
बहुत धीमी, बहुत सभ्य दस्तकें। जैसे कोई दरवाज़ा खटखटा रहा हो और जल्दी में न हो।
मैंने ताला मेज़ पर रख दिया।
"मीरा।"
"हाँ।"
"तूने पढ़ा था न, काग़ज़ पर? ताला खोलना है, तो पहले वही रिश्ता जोड़ो जो तुमने खुद तोड़ा था।"
"हाँ।"
"तो सवाल यह है," मैंने कहा, "मैंने कौन सा रिश्ता खुद तोड़ा?"
मीरा ने कॉपी खोली, पन्ना पलटा और उस पर पेंसिल से लिखा हुआ शब्द दिखाया।
भाई।
"ये किसने लिखा?" उसने पूछा।
"यही तो मैं सोच रहा हूँ। रात को कॉपी खुली थी, सुबह ये लिखा मिला, और फ़र्श पर एक पैर का निशान नहीं था।"
"यानी कोई ऐसा आया जिसके पैर नहीं छूटते।"
"या कोई ऐसा आया जो हमारे बीच से ही आया।"
मीरा ने मुझे देखा। उसके चेहरे पर वो भाव आया जो आता है जब कोई कुछ समझ जाता है और समझकर भी नहीं कहना चाहता।
"अंकुश, तेरे कोई भाई है?"
"मैंने कभी नहीं सोचा।" मैंने सच कहा। "माँ-पापा ने कभी नहीं कहा। काजल है, बस।"
"तो फिर बक्सा क्यों कहेगा कि भाई आ गया?"
मैं कुछ देर चुप बैठा रहा। शबनम आपा ने दूसरी चाय बनाई और मेरे आगे रखी।
"उस्ताद अली बक्श ने एक बात कही थी," मैंने धीमे से कहा। "जो कहे कि वो भाई है, उससे पूछना — तुमने माफ़ी कब माँगी थी, और किससे?"
"तो पूछना पड़ेगा।"
"पूछूँगा।" मैंने ताला जेब में रखा। "पर पहले एक चीज़ साफ़ करनी है।"
"क्या?"
"मैंने खुद किससे बोलना बंद किया था?"
और फिर मुझे याद आया। वो शाम। वो शाम जब पापा ने बताया था कि अंगूठा उन्होंने लगाया था, वो डर के मारे, माँ की दवा के लिए। मैंने उस दिन पापा से बोलना बंद कर दिया था। पूरे बारह दिन। घर में रहता था, खाता था, उनके सामने से गुज़रता था, और आँख नहीं मिलाता था। और जब बोला था, तो पहली बात यही कही थी — "आपने मुझे क्यों नहीं बताया?"
यही रिश्ता था। यही वो रिश्ता था जो मैंने खुद तोड़ा था।
और मुझे पता था कि वो अभी भी पूरा नहीं जुड़ा है। हम दोनों एक ही घर में रहते थे, एक ही चूल्हे का खाना खाते थे, पर बीच में एक काँच की दीवार थी, पतली, साफ़, जिस पर कुरेदने की इजाज़त नहीं थी।
"मीरा," मैंने कहा, "अगर ताले में मेरी पहली याद है, तो उसे याद रखने वाला कौन है?"
"तू।"
"नहीं।" मैंने सिर हिलाया। "याद हमेशा दो के बीच होती है। अकेले आदमी की कोई याद नहीं होती। वो बस हिसाब होता है। याद तब बनती है जब कोई दूसरा उसे याद रखे।"
मीरा ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपनी कॉपी में कुछ लिखा और कॉपी बंद कर दी।
तभी घंटी बजी।
मैंने जेब से निकाली। वो बर्फ जैसी ठंडी नहीं थी। वो गरम थी, पर आवाज़ बहुत धीमी, बहुत दूर से आ रही थी, जैसे कोई बूढ़ा आदमी आख़िरी बात कह रहा हो और उसकी साँस कम पड़ रही हो।
"क्या कहा?" मीरा ने पूछा।
मैंने कान लगाया।
और मैंने सुना — "अब खेल पूरा होगा।"
सिर्फ़ चार शब्द।
न मज़ाक, न चेतावनी, न सलाह। बस इतना — अब खेल पूरा होगा। जैसे कोई पुराना हिसाब आख़िरी पन्ने पर पहुँच गया हो और वो पन्ना खुद पलट रहा हो।
"क्या कहा?" मीरा ने फिर पूछा।
"कहा कि अब खेल पूरा होगा।"
"ये अच्छी बात है या बुरी?"
"दोनों," मैंने कहा। "जब खेल पूरा होता है, तो हारने वाले को भी पता चल जाता है कि वो हारा है। और जीतने वाले को भी। बीच में लटकना सबसे बुरा होता है।"
मैंने जेब में हाथ डाला और ताला निकाला। उसे दोनों हाथों से पकड़ा। वो भारी था, और ठंडा नहीं था — वो गुनगुना था, जैसे किसी के हाथ से अभी रखा गया हो।
"सुन," मैंने ताले से कहा। मैं जानता हूँ, ताले से बात करना पागलपन है। पर मैंने बात की। "मुझे नहीं पता तू किसकी याद रख रहा है। मुझे यह भी नहीं पता कि वो याद मेरी है भी या नहीं। पर मैं तुझे बता दूँ — जिसने तुझे भेजा है, वो समझता है कि याद तालों में बंद होती है।"
मैंने ताला मेज़ पर रखा।
"याद तालों में नहीं बंद होती। याद उनमें बंद होती है जो उसे याद रखते हैं। और मेरी गली के लोग मुझे याद रखते हैं। इसलिए तेरा मालिक जो भी खेल खेल रहा है, वो एक चीज़ भूल रहा है —"
शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा।
"— वो बहुत सारे लोगों से लड़ रहा है और मुझे सिर्फ़ एक आदमी से लड़ना है। खुद से।"
शबनम आपा ने कप मेज़ पर रखा और बोलीं — "बहाने मत बना। ताला हमारे सामने खोल।"
"आपा —"
"मैं जानती हूँ तुझे चाबी नहीं है।" उन्होंने आँखें सिकोड़ीं। "पर तेरे पास वही घंटी है जो सब बातें जानती है। उससे पूछ, चाबी कहाँ है।"
मैंने घंटी उठाई और उसे हथेली में रखकर हल्का हिलाया।
"सुन," मैंने कहा, "चाबी है कहीं?"
घंटी ने बहुत देर बाद जवाब दिया। इतनी देर बाद कि मुझे लगा कि वो बोलेगी ही नहीं।
"चाबी नहीं," उसने कहा। "खुद भी है।"
"मतलब?"
"खुद खुलेगा," घंटी ने कहा। "जब रिश्ता जुड़ेगा।"
"कौन सा रिश्ता?"
पर घंटी चुप हो गई। और उस चुप्पी में एक बात थी जो मुझे अंदर तक चुभी — जैसे घंटी जानती थी और नहीं बताना चाहती थी। जैसे वो भी उस ताले के अंदर बंद याद के बारे में सोच रही हो।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश, कल सुबह दस बजे चंद्रेश का दफ़्तार।"
"पता है।"
"और कल शाम पाँच बजे भवन।"
"पता है।"
"और आज रात बारह बजे अस्पताल की सीढ़ी।"
"पता है।"
"और कल सुबह सात बजे प्लॉट पर मशीन।"
"मीरा," मैंने कहा, "ये सब पता है। इसीलिए तो मैं ताले को जेब में रखकर सोने की सोच रहा हूँ।"
"और पीपल के जोड़ केंद्र पर तीन दिन?"
"वो भी पता है।"
"और गुमटी पर बीस दिन?"
"वो भी।"
मीरा ने कॉपी बंद की और अपनी तरफ़ से कहा —
"अंकुश, मुझे एक बात कहनी है और तू बुरा मत मानना।"
"मानूँगा।"
"मानना नहीं, सुनना।" उसने मेज़ पर झुककर कहा। "तू पिछले कुछ दिनों से हर चीज़ अकेले सँभाल रहा है। अस्पताल, स्कूल, दुकान, पीपल, बक्सा, ताला — सब। और जब कोई मदद देने आता है, तू कहता है — मैं देख लूँगा।"
"क्योंकि मैं देख लेता हूँ।"
"नहीं देखता।" उसकी आवाज़ सख़्त हो गई। "तू सिर्फ़ अपने ऊपर और बोझ डालता है, और फिर रात में बैठकर हिसाब लगाता है कि कितना बचा।"
मैं कुछ कहने ही वाला था कि गुमटी के बाहर से आवाज़ आई — कोई दौड़ रहा था। शटर उठा और काजल अंदर घुसी, उसके हाथ में दवा की प्लास्टिक थैली थी।
"अंकुश," वो हाँफ रही थी, "माँ ने तुझे बुलाया है।"
मैं खड़ा हो गया।
"क्या हुआ? तबीयत —"
"नहीं, तबीयत ठीक है।" उसने थैली मेज़ पर रखी। "उन्होंने ताला देखा है।"
"कैसे?"
"शबनम आपा की गुमटी से कोई खबर ले गया।" काजल ने मेरी तरफ़ देखा। "माँ कह रही हैं कि वो ताला उनके मायके से आया है।"
मैं रुक गया।
"क्या?"
"माँ कह रही हैं," काजल ने धीमे से कहा, "कि वो ताला नाना के घर से आया था। और उसकी चाबी उन्होंने बाईस साल अपने पास रखी थी।"
मेरा हाथ अपने आप जेब की तरफ़ गया, जहाँ गले की पुरानी चाबी लटक रही थी — वो चाबी जो पापा ने मुझे पंद्रह-सोलह साल की उम्र में दी थी और कभी नहीं बताया कि किस चीज़ की है।
मैंने उसे निकाला। हथेली में रखा। और उस पुराने काले ताले की तरफ़ देखा।
"मीरा," मैंने कहा, "मुझे एक काम करना है।"
"क्या?"
"माँ से पूछना है।"
"अभी?"
"अभी।" मैंने ताला जेब में रखा, घंटी दूसरी जेब में। "क्योंकि अगर ये चाबी इस ताले की है, तो मुझे यह जानना है कि माँ ने ये चाबी मुझे क्यों नहीं दी। और अगर ये चाबी इसकी नहीं है, तो मुझे यह जानना है कि माँ ने ये कहानी क्यों बनाई।"
शबनम आपा ने मेरा रास्ता रोका।
"अंकुश।"
"आपा, मुझे जाना है।"
"जाना है, तो सुनकर जा।" उन्होंने मेरी कमीज़ पकड़ी। "वो काग़ज़ — उस पर लिखा था कि ताला खोलना है तो पहले वही रिश्ता जोड़ो जो तुमने खुद तोड़ा था।"
"पता है।"
"तूने खुद किससे बोलना बंद किया था?"
मैंने उनकी आँखों में देखा।
"पापा से," मैंने कहा।
"और?"
मैं चुप रहा।
"और?" उन्होंने फिर कहा। उनकी आवाज़ अब धीमी थी। "सोच। बारह दिन पापा से नहीं बोला। उससे पहले?"
मैंने सोचा।
और मुझे याद आया — वो रात जब मैंने कहा था कि अब मैं सब अकेले सँभालूँगा। वो रात जब माँ ने कहा था कि बेटा, मुझे भी थोड़ा हिस्सा दे। और मैंने कहा था — नहीं, तुम आराम करो। वो रात जब मैंने हर किसी से कहा था कि तुम लोग पीछे रहो, मैं देख लूँगा।
मैंने अपनों से बोलना नहीं छोड़ा था। मैंने उनसे मदद लेना छोड़ दिया था। और मदद लेना छोड़ना भी एक रिश्ता तोड़ना है।
"आपा," मैंने धीरे से कहा, "मैं समझ गया।"
"क्या समझा?"
"जो रिश्ता मैंने खुद तोड़ा था, वो किसी एक आदमी से नहीं था।" मैंने जेब से ताला निकालकर हथेली पर रखा। "वो मेरे और मेरे अपनों के बीच का भरोसा था कि मैं उन पर भार नहीं, उनका साथी हूँ। मैंने वो तोड़ा था, आपा। जब मैंने हर बात अपने ऊपर ले ली और किसी को कुछ बताया नहीं।"
शबनम आपा ने मेरा कंधा छोड़ दिया। उनकी आँखें भर आई थीं और उन्होंने छुपाया नहीं।
"तो अब?" उन्होंने कहा।
"अब जोड़ूँगा।" मैंने ताला जेब में रखा। "पर एक बात है, आपा। ये जोड़ मुझे अकेले नहीं करना है। ये जोड़ पूरी गली को करना है। क्योंकि मैं अकेले जोड़ूँगा तो वो फिर वही होगा — मैंने सब अपने ऊपर ले लिया।"
मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा।
और बाहर, शटर के नीचे, धूल में, एक पैर का निशान था। ताज़ा। अकेला। सीधा आता हुआ, आधा, और फिर गायब।
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने बस घंटी निकाली और एक बार बजाई — ज़ोर से, साफ़, जैसे गली को बता रहा हो कि मैं अभी ज़िंदा हूँ।
घंटी ने पहले तो कुछ नहीं कहा। फिर बहुत धीमे से, बहुत थके हुए से कहा —
"घर जा। वहीं से शुरू होगा।"
मैंने सिर हिलाया।
"चल काजल," मैंने कहा, "माँ के पास।"
हम निकले। गली सूनी थी, पर सूनी नहीं थी — हर दरवाज़े के पीछे कोई जाग रहा था। सफ़ेद गाड़ी गली के मुँह पर नहीं थी। बिजलीघर के फाटक पर कोई नहीं था।
घर पहुँचे तो दरवाज़ा खुला था और भीतर से पीली रोशनी आ रही थी। माँ चारपाई पर बैठी थीं, साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ, हाथ में हिसाब की कॉपी। पापा कोने में बैठे थे, उनके सामने पुराना पंखा खुला पड़ा था और वो उसे ठीक करने के बहाने उसकी तारें देख रहे थे।
मैंने ताला माँ के सामने चारपाई पर रखा।
माँ ने उसे देखा। देखा और उनका हाथ कॉपी पर जम गया।
"ये —" उन्होंने धीमे से कहा।
"ये वही है, माँ," मैंने कहा। "और आपने कहा कि ये नाना के घर से आया था। अब बताइए सच।"
माँ ने पापा की तरफ़ देखा।
पापा ने पंखा रख दिया।
"मैं बताता हूँ," उन्होंने कहा।
और तभी — उसी पल — ताले के भीतर से आवाज़ आई।
धीमी, सभ्य, बिना जल्दी। जैसे कोई पुरानी याद दरवाज़ा खटखटा रही हो। एक दस्तक। फिर दूसरी। फिर तीसरी।
कमरे में चारों तरफ़ सन्नाटा हो गया। पापा का मुँह खुला रह गया और माँ की कॉपी उनके हाथ से फिसलकर गोद में गिर गई।
मैंने ताला उठाया। कान लगाया।
और उसके भीतर से, बहुत दूर से, मुझे एक आवाज़ सुनाई दी — बूढ़ी, थकी हुई, और फिर भी पहचानी हुई —
"अंकुश।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
"अंदर वाली," मैंने धीरे से कहा, "सब्र रख। मैं तुझे याद करके लाने आ रहा हूँ।"
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