The Mysterious Bell331 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 331: jodne wala mistri hissa 034 ep331-340

165 min read November 5, 2026

अंकुश:

कमरे में हवा भी साँस लेने से डर रही थी।

मैंने घंटी संदूकची के ढक्कन पर रख दी। पीतल ने लकड़ी को छुआ और एक छोटी सी खट हुई, जैसे कोई बूढ़ा आदमी कराह के बाद बैठ गया हो। मैंने दोनों हाथ ऊपर उठा दिए, जैसे कोई पकड़ा हुआ आदमी हार मान लेता है।

"सुनो सब," मैंने कहा। "आज कोई अकेले हाथ नहीं लगाएगा। न मैं, न पापा, न कोई।"

काजल ने अपनी घुटनों पर रखी किताब पर हाथ रख दिया। "तो कैसे खुलेगा?"

"जैसे लोहे का संदूक खुला था," मैंने कहा। "दो हाथ।"

माँ चारपाई के किनारे बैठी थीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर संदूकची की तरफ़। उनके चेहरे पर वो डर नहीं था जो बाहर गली में फैला था। उनके चेहरे पर थकान थी, और थकान के नीचे एक चीज़ और थी, जो मैं पहले कभी नहीं देख पाया था — शर्म।

"मैंने यह संदूकची अपनी माँ से ली थी," माँ ने कहा। "मेरी शादी के वक़्त मेरे पास बस यही थी। और मैंने इसे बाईस साल तक ऐसे रखा, जैसे इसमें कुछ नहीं है।"

"तो अब देख लो," पापा ने कहा। उनकी आवाज़ सूखी थी। "क्या है इसमें।"

पापा दीवार की तरफ़ देख रहे थे। दीवार पर पुराना कैलेंडर टँगा था, जिसका कोई पन्ना नहीं फटा था। वो उसी कैलेंडर को ऐसे देख रहे थे जैसे उस पर जवाब लिखा हो।

मीरा ने अपना कैमरा कमरे के कोने में रख दिया था, कपड़े के नीचे। उसकी लाल बत्ती अभी भी जल रही थी, और मुझे लगा कि वो लाल बत्ती इस कमरे की सबसे ईमानदार चीज़ है, क्योंकि वो हर बात रिकॉर्ड कर रही है और कोई फ़ैसला नहीं कर रही।

मीरा ने अपना हाथ आगे बढ़ाया। माँ ने भी।

दो हाथ, एक ही समय, एक ही ताले पर।

ताला छोटा था, मुट्ठी जितना, और उसका पीतल कावर हरी पपड़ी जैसा हो गया था। माँ ने बाएँ से पकड़ा और मीरा ने दाएँ से। मैंने देखा कि मीरा की उँगलियाँ काँप रही हैं, और माँ की उँगलियाँ नहीं काँप रही थीं। यही फ़र्क़ है उस आदमी में जिसने ज़िंदगी भर चुप रहकर सब सहा है, और उस आदमी में जो अभी सीख रहा है।

ताले ने एक बार खड़खड़ाया, फिर चुप हो गया।

"ज़ोर मत लगाओ," रेहाना आपा ने कहा। वो चारपाई से थोड़ा सटकर खड़ी थीं, दोनों हाथ साड़ी के पल्लू में। "ये ताला टूटेगा नहीं, ये बोलेगा।"

"क्या मतलब?" टिंकू ने पूछा। वो दरवाज़े के पास खड़ा था, और उसके पीछे चिंटू दरार से एक आँख लगाए था।

"मतलब," रेहाना आपा ने कहा, "ऐसे ताले धीरे खुलते हैं। जल्दी करोगे तो अंदर की चीज़ डर जाएगी।"

मीरा ने एक गहरी साँस ली। माँ ने आँखें बंद कर लीं, जैसे कोई प्रार्थना कर रही हो, और शायद कर भी रही थीं। फिर उन्होंने ताले को कसकर पकड़ा और मीरा ने उनका हाथ सहारा दिया।

ताला खुला।

खुला, इस तरह कि आवाज़ नहीं हुई। सिर्फ़ एक महीन सी चटक, जैसे सूखी लकड़ी के अंदर से कोई हड्डी हिली हो।

और फिर उसमें से एक गंध निकली। बंद कमरे की गंध नहीं। घर की गंध थी — पुरानी रुई और नैप्थलीन और बासी धूप। माँ के आँसू एकदम बह निकले, बिना आवाज़। उन्होंने मुँह पर हाथ रख लिया।

"ये मेरी माँ की संदूकची की गंध है," उन्होंने कहा। "मेरी माँ के घर की।"

ढक्कन उठाया तो अंदर सबसे ऊपर लाल रुई की मोटी पुड़िया थी, जैसे कोई बच्चे की चीज़ संभालकर रखी गई हो।

मैंने उसे छुआ नहीं। मैंने सिर्फ़ देखा।

लाल रुई के नीचे यह था — बल्कि यह नहीं, तीन चीज़ें थीं।

पहली। रुई के नीचे, बिल्कुल नीचे, एक चश्मा। टेढ़ा, एक काँच चटका हुआ, कान की डंडी बीच से टूटी हुई, और टूटी डंडी पर मैली सी टेप चढ़ी थी।

वो चश्मा मुझे पीपल के नीचे हर शाम दिखता था। किसी के चेहरे पर नहीं। एक अंधेरे कोने में, एक बंद दरवाज़े के पीछे।

"यह पापा का पुराना चश्मा है," काजल ने धीरे कहा। "पाँच साल पहले का। ये तो उन्होंने उस रात के बाद फेंक दिया था, ऐसा मुझे लगा था।"

पापा ने दीवार से नज़र नहीं हटाई। "टेप मैंने खुद लगाया था," उन्होंने बस इतना कहा।

दूसरी। एक मोटी रस्सी से बँधा छोटा सा कपड़े का पोटला। खोलने पर उसमें एक चीज़ निकली — मिट्टी के ढेर जैसा कुछ, सूखा, भूरा। मैंने उसे नाखून से छुआ तो वो चूर होने लगा।

रेहाना आपा ने झुककर देखा। "यह मिट्टी नहीं है," उन्होंने कहा। "यह राख है। जली काग़ज़ की राख।"

"तो ये राख कैसे बची?" मीरा ने पूछा। "राख तो उड़ जाती है।"

"पोटले में बंद थी," रेहाना आपा ने कहा। "जिसने बंद की, वो जानता था कि राख उड़ती है। इसीलिए उसने इसे पोटले में रखा — न फेंक सका, न जलने दिया।"

पापा की उँगलियाँ घुटने पर कस गईं।

तीसरी चीज़।

एक काग़ज़ का कोना। यह देखने में किसी चीज़ का कोना भर था, इतना छोटा कि दो उँगलियों में आ जाए। आधा जला, किनारे काला, कहीं से फटा हुआ, और उसके बीच में टेढ़ी-मेढ़ी स्याही से चार शब्द बचे थे।

मैंने पढ़ा। रोशनी कम थी, इसलिए मैंने उसे चिमनी की तरफ़ पकड़ा, जो अभी कमरे के फ़र्श पर जल रही थी। सब एकदम चुप हो गए, और कमरे में सिर्फ़ चिमनी की फुसफुसाहट बची।

स्याही घिसी हुई थी, जैसे लिखने वाले का हाथ काँपा हो और फिर किसी ने उँगली से मलकर मिटाने की कोशिश की हो। पर शब्द बच गए थे। बुद्धू आदमी, जो भी लिखता है, वो पोंछने के बाद भी बोलता रहता है। काग़ज़ की याददाश्त इंसान से तेज़ होती है।

शब्द थे — तीसरी मंज़िल, असली रजिस्टर।

और कोई नहीं।

कमरे में छह लोग साँस रोककर, और चार शब्द फ़र्श पर गिरे हुए।

"असली रजिस्टर," मीरा ने धीरे कहा, "भवन की तीसरी मंज़िल पर है।"

रेहाना आपा ने काग़ज़ का कोना मेरे हाथ से लिया। उन्होंने उसे बहुत करीब लाकर देखा, आँखें सिकोड़कर, बूढ़ी आँखें जो पंद्रह साल से काग़ज़ों में लाखों लकीरें खोज चुकी थीं। उनका चेहरा धीरे-धीरे बदलने लगा — पहले दुकानदार जैसा, फिर घबराया हुआ, फिर ऐसा जैसे कोई कपड़ा हाथ से खिसक गया हो।

उनका हाथ काँपने लगा।

"ये… ये मेरे काग़ज़ है," उन्होंने फुसफुसाया।

काजल ने आगे झुककर पूछा, "क्या?"

रेहाना आपा ने कोना उलट दिया, और उसकी पीठ पर भी हल्की सी नीली स्याही थी — बहुत महीन, और एक सीधी लकीर, जो सिर्फ़ कार्बन पेपर से आती है।

"ये कोना," उन्होंने कहा, "उस कॉपी का है जो मैंने उस रात बनाई थी। मैंने कार्बन पेपर से नकल उतारी थी और उसे अपने ब्लाउज़ के अंदर छिपाया था। वो कॉपी इससे बड़ी थी। जब मैंने उसे किसी को दिया, तब उसका एक कोना ऐसे ही फट गया था — क्योंकि मैंने उसे जल्दी में खींच लिया था।"

वो चुप हो गईं।

"तो ये कोना," मैंने कहा, "यहीं कैसे आया? उस कॉपी से, इस घर की संदूकची में?"

रेहाना आपा ने सिर हिलाया, बहुत धीरे। उन्होंने चारों तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "उस रात के बाद ये कोना सिर्फ़ उस आदमी के पास था जिसे मैंने वो काग़ज़ दिया था। और उस आदमी ने इसे… यहाँ छिपाया।"

मैंने कमरे में सबको देखा।

माँ चारपाई पर, दोनों हाथ गोदी में, आँखें नीची। काजल बाजू में खड़ी, होंठ भींचे हुए। मीरा मेरे बगल में, काग़ज़ की तरफ़ देखती हुई। टिंकू दरवाज़े के पास, जाने के लिए तैयार। रेहाना आपा सामने, सीधी मेरी आँखों में। और पापा — पापा दीवार की तरफ़।

दीवार पर कुछ नहीं था। सिर्फ़ पुराना कैलेंडर था।

और तभी मेरे अंदर एक चीज़ बैठ गई, ठंडी, जैसे पीठ पर कोई उँगली रेंग गई। पापा की चुप्पी मेरे लिए नई नहीं थी। उनकी चुप्पी इस घर का सबसे पुराना फ़र्नीचर थी। पर इस बार उनकी चुप्पी में कुछ अलग था। पहले वो ऐसे चुप होते थे जैसे डर के मारे गला घोंट रहे हों। अब वो ऐसे चुप थे जैसे जानते हों कि आगे क्या होगा, और नहीं चाहते थे कि कोई पूछे।

मैंने पूछा ही।

"पापा," मैंने कहा, "आपको पता है ये काग़ज़ इस संदूकची में कैसे आया?"

पापा ने दीवार से नज़र हटाई, पर मेरी तरफ़ नहीं देखा। उन्होंने अपनी रिंच — जो उन्होंने टेबल पर रखी थी — उठाई, फिर वापस रख दी। फिर उन्होंने कहा, "जो चीज़ चूल्हे के पीछे के दरवाज़े में बंद है, वो मैं नहीं हूँ।"

कमरे में सन्नाटा।

"ये क्या जवाब है?" काजल की आवाज़ तेज़ हो गई। "आप सीधी बात क्यों नहीं करते?"

"काजल।" माँ की आवाज़ तेज़ नहीं थी, पर उसमें वो कसावट थी जिससे बेटियाँ रुक जाती हैं।

पापा ने कुर्सी पीछे की और उठकर खड़े हो गए। उनकी कमर झुकी हुई थी, और इस रोशनी में वो अस्सी के लग रहे थे, पचपन के नहीं।

"मेरे पास बाईस साल का सन्नाटा है बेटा," उन्होंने कहा। "वो एक ही बार में नहीं टूटता।"

फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ था जो मैंने कभी-कभार ही देखा था — माँगना। जैसे वो कह रहे हों, अभी मत पूछो।

पर मैंने पूछ लिया, क्योंकि संदूकची मेरे सामने खुली थी और उसमें एक आदमी का चश्मा, एक पोटली राख और चार शब्द थे।

"पापा," मैंने कहा, "इस घर में कोई और है जो इस काग़ज़ के बारे में जानता है।"

पापा रुके।

"तुम्हें क्या लगता है?" उन्होंने पूछा।

"मुझे लगता है," मैंने कहा, "जो व्यक्ति इस कमरे में बैठा है, वो पहली बार ये काग़ज़ नहीं देख रहा।"

और उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।

बस इतना हुआ — कोई जवाब नहीं आया।

अब सुनो, जवाब न आना भी एक जवाब है। जब कोई आदमी "नहीं" कह देता है, तो एक दीवार खड़ी हो जाती है, और तुम उसे गिराते हो या उसके पीछे जाते हो। पर जब कोई आदमी कुछ भी नहीं कहता, तो दीवार नहीं होती — हवा होती है। और हवा से तुम लड़ नहीं सकते।

मीरा ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसने बहुत धीरे सिर हिलाया — मतलब, अभी छोड़ दो।

और मैंने छोड़ दिया।

क्योंकि तभी घंटी ने कुछ कहा।

उसने बहुत धीमे कहा। इतना धीमे कि मुझे लगा ये हवा है, या चिमनी का शोर है, या मेरा अपना खून है। पर नहीं, आवाज़ साफ़ थी। पीतल की आवाज़ पहचानी जाती है, जैसे माँ की आवाज़ गली के सौ शोर में भी पहचानी जाती है।

एक शब्द।

"ऊपर।"

मैंने संदूकची से नज़र उठाई। छत की तरफ़ देखा। पुरानी पीली छत, जिस पर बारिश के दाग थे। मुझे लगा मतलब छत का है, तो मैंने कहा, "क्या छत?"

घंटी चुप।

"तीसरी मंज़िल," टिंकू ने कहा। वो दरवाज़े से आगे आ गया था, और उसकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो बच्चों में होती है जब उन्हें लगता है कि बड़ों का खेल उन्हें समझ आ गया। "भवन की तीसरी मंज़िल। काग़ज़ पर लिखा है, इसलिए घंटी भी वही कह रही है।"

"टिंकू," माँ ने कहा, "तू चुप हो।"

"क्यों?" टिंकू ने कहा। "मैं चुप हो जाऊँगा, तो कौन बोलेगा? आप सब बड़े लोग बस एक-दूसरे को देख रहे हैं। मुझे नहीं दिखता कोई बोल रहा है।"

काजल ने अपनी हँसी रोकने की कोशिश की और एक छोटी सी फूँक निकल गई। यह पहली आवाज़ थी इस कमरे में जो डर की नहीं थी।

मैंने घंटी उठाई और उसे मुट्ठी में बंद कर लिया। फिर मैंने सबकी तरफ़ देखा।

"सुनो," मैंने कहा। "आज रात बारह बजे भवन की तीसरी मंज़िल पर नया ताला और सरकारी मुहर लगेगी। कल सुबह सात बजे मशीन आएगी। कल ग्यारह बजे दुकान सील होगी।"

"तो क्या करना है?" रेहाना आपा ने कहा।

"मुझे नहीं पता," मैंने कहा।

और यह सच था। मुझे नहीं पता था। यही तो सबसे बड़ी बात है — मैं जानता था कि मैं नहीं जानता। और अब मुझे ये सीखने की ज़रूरत नहीं थी कि न जानने में शर्म नहीं होती। माँ ने मुझे यही सिखाया था, बिना कहे, बाईस साल में।

"मुझे इतना पता है," मैंने आगे कहा, "कि अब सिर्फ़ दो चीज़ें बची हैं। एक, तीसरी मंज़िल का असली रजिस्टर। दो, हमारा इकट्ठा होना। और दोनों एक ही चीज़ हैं, क्योंकि उस रजिस्टर तक अकेले कोई नहीं पहुँच सकता।"

रेहाना आपा ने धीरे कहा, "क्यों नहीं?"

"क्योंकि काग़ज़ अकेले आदमी से डरता नहीं," मैंने कहा। "काग़ज़ भीड़ से डरता है।"

पापा ने पहली बार मेरी तरफ़ पूरी तरह देखा।

उनकी आँखों में कुछ था। मुझे लगा गर्व है, पर फिर लगा नहीं — यह गर्व नहीं था, यह डर था, यह डर कि मैं वही बोल रहा हूँ जो उन्होंने कभी सोचा था और नहीं कह पाए।

फिर उन्होंने कहा, बहुत धीमे, "काग़ज़ भीड़ से डरता है, पर भीड़ को बुलाने वाला सबसे पहले फँसता है।"

"जानता हूँ," मैंने कहा।

"नहीं जानता," उन्होंने कहा। "तू नहीं जानता। तू सोचता है तेरे पास घंटी है इसलिए तू सब बचा लेगा। पर घंटी किसी को नहीं बचा सकती। मैंने बाईस साल इसे माना है, और मैंने बाईस साल यही सहा है जो देख रहा है।"

कमरा फिर चुप हो गया।

और मुझे लगा कि अब मुझे कुछ कहना चाहिए, ऐसा कुछ जो सही हो, जो बुद्धिमानी भरा हो, जो पापा को समझा दे। पर मैंने कहा वही जो आया।

"मुझे बचाना मत," मैंने कहा। "मुझे समझना भी मत। मैं बस इतना कह रहा हूँ कि मैं अकेले नहीं जाऊँगा। ये घंटी जबसे मिली है, मैंने हर बार अकेले कुछ कोशिश की और हर बार आधा ही हुआ। अब आधा का ज़माना नहीं है।"

टिंकू ने ताली बजाई। एक छोटी सी, फिर शरमाकर हाथ पीछे छिपा लिया।

काजल ने मेरी तरफ़ देखा और बोली, "आज तू ठीक बोला।" मैंने कहा, "यानी आज तक ग़लत बोलता था?" उसने कहा, "बहुत ग़लत। पर सुन नहीं रहा था कोई।"

माँ ने चिमनी पर से पानी की केतली उठाई। उनके हाथ में एक सीधा-सादा काम था और मुझे लगा कि वो इसीलिए उसे कर रही थीं — हाथ को कुछ देना, ताकि दिल को सहारा मिले।

"मीरा," माँ ने कहा, "वो काग़ज़ संभाल के रख।"

मीरा ने काग़ज़ का कोना उठाया। उसने उसे अपनी छोटी डायरी के बीच रखा — वो डायरी जिस पर लोहे की कड़ी और एक रबर बैंड था। फिर उसने बैंड खींचकर कस दिया।

"अब," मीरा ने कहा, "यह काग़ज़ इस डायरी से बाहर नहीं जाएगा। और यह डायरी मेरे हाथ से नहीं जाएगी।"

"जब तक तुम्हें कुछ हो न जाए," काजल ने कहा।

"मुझे कुछ नहीं होगा," मीरा ने कहा। "मैं उस लड़की से बहुत डरती हूँ जो कुछ नहीं करती।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा, और मुझे उसकी आँखों में वो पुराना दाग़ दिखा — रमा मैडम वाला दाग़। पाँच साल पुराना। जब कोई इंसान अपनी ग़लती की तरफ़ देखता है, तो उसकी आँखों में एक अलग तरह की चमक आती है — न डर, न गुस्सा, बस सच।

मीरा ने डायरी उठाई और अपने बैग में डाल ली।

"तो अब साफ़ बात," उसने कहा। "भवन की तीसरी मंज़िल पर एक असली रजिस्टर है। वहाँ आज रात बारह बजे नया ताला लगेगा, और अगर मुझे ठीक से याद है, तो ताला लगाने से पहले वो जगह खाली रहेगी।"

"मतलब?" काजल ने कहा।

"मतलब यह," मीरा ने कहा, "कि आज रात बारह से पहले अगर हम उस कमरे तक नहीं पहुँचे, तो फिर वो रजिस्टर इतिहास हो जाएगा। और इतिहास का कोई फ़ायदा नहीं, क्योंकि इतिहास ताक़तवर के हाथ में रहता है।"

कमरे में फिर वो डर आया। अब यह डर नहीं था — यह गणित था। मुझे गणित से डर लगता है, क्योंकि गणित में भावना नहीं होती। और मुझे भावना वाले काम पसंद हैं।

"आज रात," मैंने कहा। "बारह से पहले।"

"आज रात," पापा ने कहा।

सबने उनकी तरफ़ देखा। यह पहली बार था कि उन्होंने इस कमरे में कुछ तय किया।

"पर वो हमारा काम नहीं है," उन्होंने कहा। "वो सलीम का काम है। रज़ा सलीम कल सुबह दस बजे रजिस्टर लाने वाला है।"

"पर कल सुबह सात बजे मशीन आएगी," मैंने कहा।

"तो मशीन रुकेगी," पापा ने कहा। "आज तक हर चीज़ रुकी है। मशीन भी रुकेगी।"

वो उठे और चलकर मेरे पास आए। उनका हाथ मेरे कंधे पर रखा — पहली बार, बहुत दिनों में, किसी डर या मजबूरी के बिना।

"तू सुन," उन्होंने कहा। "मैंने बाईस साल एक चीज़ नहीं कही, क्योंकि मुझे लगा कि चुप रहने से तेरा घर बचेगा। और उसी चुप्पी ने तेरा घर खोखला कर दिया। आज रात मैं चुप नहीं रहूँगा। पर तू भी एक वादा कर।"

"क्या?"

"अगर बात बिगड़े," उन्होंने कहा, "तो तू सबसे आख़िर में निकलेगा, सबसे पहले नहीं।"

मैं हँसा। "ये तो उल्टा है, पापा।"

"उल्टा सही है," उन्होंने कहा। "जो हाथ सबको निकालता है, वो आख़िर में निकलता है। यही तेरी माँ का हिसाब है — पहले सबको खिलाओ, फिर खुद खाओ।"

और मैंने सिर हिला दिया।

अब देखो, यही वो चीज़ है जो मुझे घंटी से मिली है और मैंने कभी किसी को नहीं बताया। मुझे सबसे ज़्यादा डर इस बात का नहीं था कि मैं हार जाऊँगा। डर इस बात का था कि मैं अकेला हार जाऊँगा। और यही डर — यही मुझे हर रात जगाता था।

पर आज, इस कमरे में, जब पापा ने मेरा कंधा पकड़ा, तो डर हल्का लगा। जैसे कोई बोझ दो लोगों ने मिलकर उठा लिया हो।

तभी संदूकची हिली।

नहीं, हिली नहीं। पूरी संदूकची नहीं हिली — उसके नीचे से कुछ खिसका।

धातु की आवाज़ आई। महीन, तेज़, और साफ़ — जैसे किसी पुराने लोहे का टुकड़ा लकड़ी के फ़र्श पर गिरा हो और फिसलकर रुक गया हो। मैंने सुना, सबने सुना, और सबकी गर्दन एक साथ नीचे झुक गई।

संदूकची के नीचे से, चारपाई की एक टाँग के पास से, एक चीज़ खिसककर आई।

एक चाबी।

मैंने उसे देखा।

बड़ी चाबी थी, जैसी पुरानी अलमारियों में लगती हैं — मोटा पीतल, लंबी डंडी, दाँते घिसे हुए, और छल्ले पर एक पीली पड़ी मोटी रस्सी बँधी थी। छल्ले पर थोड़ी ज़ंग थी, और दाँतों के बीच में कुछ जमा हुआ था, जैसे कोई पुराना तेल या लाह।

और मैंने चाबी देखी, और मैंने पापा को देखा।

पापा चाबी देखकर बेरंग हो गए।

बेरंग, सच में। चेहरे का लाल उड़ गया, होंठ पतले और सफ़ेद हो गए, और उनका हाथ जो मेरे कंधे पर था, वो पहले कस गया और फिर ढीला छूट गया, जैसे किसी ने हाथ से जान निकाल दी हो।

"पापा?" काजल ने कहा।

वो पीछे हटे एक कदम, फिर रुक गए। उन्होंने चाबी देखी, फिर दीवार की तरफ़ देखा, फिर चाबी।

माँ ने भी चाबी देखी, और उनके चेहरे पर वो भाव आया जो मैंने पहले देखा था — शर्म। पर अब वो शर्म उनकी अपनी नहीं थी; वो पापा के चेहरे की थी, जो उन्होंने सालों से उनको सिखाई थी।

"ये…" मैंने कहा। "ये किस चीज़ की है?"

पापा ने मुँह खोला, फिर बंद कर दिया।

रेहाना आपा ने झुककर चाबी उठानी चाही, पर मैंने हाथ आगे रखकर रोक दिया।

"नहीं," मैंने कहा। "आज कोई अकेले हाथ नहीं।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और मैंने अपना, और दोनों ने मिलकर चाबी उठाई।

हमारी उँगलियों में चाबी अचानक गरम लगी, और मुझे पता नहीं क्यों, मेरी पीठ पर ठंडी हवा फिर से चली।

और घंटी, जो अब भी संदूकची के ढक्कन पर रखी थी, एक बार फिर धीरे से बोली। इस बार पूरा वाक्य नहीं, सिर्फ़ दो शब्द।

"दो हाथ।"

मैंने चाबी उठाकर रोशनी में लाई। मैंने उसे अपनी आँखों के सामने किया और देखा — हाँ, छल्ले पर एक पतला सा निशान उभरा हुआ था। दो लकीरें और बीच में एक बिंदु।

वही निशान। चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर। पुराने बिजलीघर के ताले पर। उस्ताद की घंटी के छल्ले पर। मंसूर चाचा के काग़ज़ पर।

"पापा," मैंने कहा। "ये चाबी कहाँ की है?"

और पापा ने, बहुत देर बाद, इतना कहा जो सब कुछ कह दिया।

"ये चाबी," उन्होंने कहा, "मैंने बाईस साल किसी और को छूने नहीं दी।"

कमरा चुप।

"और आज ये यहाँ से कैसे निकली?" मैंने कहा। "अगर आपने इसे संभाला था, तो ये चाबी संदूकची के नीचे कैसे आई?"

पापा ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो डर था जो मुझे अब पहचान हो गया था।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "मैंने ये चाबी इस घर में रखी थी, संदूकची में नहीं। और मैंने इसे आज सुबह देखा था।"

मीरा की साँस रुक गई।

"आज सुबह?" मैंने कहा।

"हाँ," पापा ने कहा। "फिर मैंने इसे औज़ारदान में रख दिया था, कमीज़ की जेब में, जैसे हमेशा रखता था।"

"और अब?" मैंने पूछा।

पापा ने अपनी जेब में हाथ डाला। उनका हाथ थोड़ी देर अंदर रहा, फिर बाहर आया, खाली।

"अब नहीं है," उन्होंने कहा।

और मुझे लगा, अब देखो, यही तो सबसे बड़ी बात है। संदूकची में जो काग़ज़ छिपा था, वो किसी और ने छिपाया था। घर में जो चाबी घूम रही है, वो किसी और के हाथ में है।

और मैंने घंटी की तरफ़ देखा। घंटी ने चारपाई पर, संदूकची के ढक्कन पर, चुपचाप पड़े-पड़े मुझे देखा। और मुझे लगा जैसे कोई बूढ़ा आदमी मेरी तरफ़ देखकर हल्का-सा सिर हिला रहा हो — जैसे कह रहा हो, लड़के, ये तो बस शुरुआत है।

॥

रात के उस पल में कमरे की हवा इतनी भारी हो गई थी कि साँस लेने के लिए भी ज़ोर लगाना पड़ रहा था।

पापा की जेब खाली थी।

वो अपना हाथ जेब में डाले हुए ही खड़े रहे, जैसे उम्मीद कर रहे हों कि चाबी शर्मिंदा होकर वापस आ जाएगी। मगर चाबी मेरी और मीरा की उँगलियों के बीच थी, और उसका गरम होना अब भी मेरी हथेली में चुभ रहा था।

"पापा," मैंने धीरे से कहा, "आपने चाबी औज़ारदान में रखी थी, कमीज़ की जेब में रखी थी। और वो अब संदूकची के नीचे से निकली। इसका मतलब साफ़ है।"

पापा ने होंठ सिकोड़े।

"मतलब?" काजल बोली। "मतलब ये कि कोई हमारे घर में घुसा है, पापा। हमारे घर में। जब हम सो रहे थे, या जब हम भवन के पीछे वाली गली में खड़े थे।"

माँ ने काजल का हाथ पकड़कर उसे थोड़ा पीछे खींचा, पर काजल ने हाथ नहीं छोड़ा। काजल जब गुस्से में आती है, तो उसकी आवाज़ ऊँची नहीं होती — बस पतली और सीधी हो जाती है, जैसे कोई काँच की सुई बोल रही हो।

"माँ," काजल ने कहा, "आप चुप क्यों हैं? आपकी संदूकची है। आपके मायके से आई है। आपको कुछ पता है न?"

माँ ने एक लंबी साँस ली। उनके माथे पर चंदन का टीका था, और पसीने से वो हल्का घुल गया था।

"मुझे इतना पता है," माँ ने कहा, "कि ये संदूकची मैंने ब्याह के बाद खोली थी और फिर बंद कर दी। उसके बाद इसका ताला कभी नहीं हिला। और अगर ताला नहीं हिला, तो जो अंदर गया, वो बाहर से नहीं गया।"

कमरा चुप हो गया।

रेहाना आपा, जो अब तक चारपाई के किनारे बैठी थीं, उठकर खड़ी हो गईं। उनके हाथ में अपनी पुरानी ड्यूटी डायरी थी, जिसकी लाल जिल्द किनारों से उखड़ रही थी।

"इस घर में," उन्होंने कहा, "एक दरवाज़ा है जो गली की तरफ़ नहीं खुलता।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"वो चूल्हे के पीछे वाला दरवाज़ा," रेहाना आपा ने कहा। "जिसमें बाईस साल पुरानी चाबी लगी है। और जिसके पीछे से आज भी हवा आती है, जबकि वो बंद है।"

टिंकू, जो दरवाज़े की दरार से झाँक रहा था, अंदर आ गया। उसके हाथ में अब भी वो कार्डबोर्ड का माइक था जो उसने रिहर्सल के वक़्त बनाया था।

"उस्ताद," टिंकू ने कहा, "मुझे एक बात समझ नहीं आ रही। चाबी चोरी हो गई या चाबी रखी गई?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"फर्क क्या है?"

"बहुत फर्क है," टिंकू ने कहा, बिल्कुल गंभीर चेहरे से। "चोरी करने वाला चीज़ ले जाता है। रखने वाला चीज़ वहीं रखता है जहाँ से तुम्हें मिले, ताकि तुम्हें लगे कि तुम्हें कुछ मिला है।"

टिंकू तेरह साल का है, और मुझे कभी-कभी लगता है कि वो तेरह साल का नहीं, छह सौ साल का कोई थका हुआ मुंशी है जो बच्चे का भेस बदलकर घूम रहा है।

मैंने चाबी को अपनी हथेली पर रखा और मुट्ठी बंद कर ली।

"आज रात," मैंने कहा, "हम तीसरी मंज़िल पर जाने वाले हैं। बारह बजे से पहले। और उसके पहले हमें ये पता करना है कि ये चाबी किस दरवाज़े की है।"

पापा ने पहली बार उस रात मेरी आँखों में सीधा देखा।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "ये चाबी किसी दरवाज़े की नहीं है। ये एक वादे की है।"

"कौन सा वादा?"

"वो मैं नहीं बता सकता," उन्होंने कहा, "क्योंकि मैंने वो वादा निभाया नहीं। और जो वादा निभाया नहीं, उसका नाम लेने से वो और भारी हो जाता है।"

उस रात हममें से कोई ठीक से सोया नहीं।

मैं चारपाई पर लेटा रहा और छत को देखता रहा। घंटी मेरे सिरहाने रखी थी, और वो चुप थी — इतनी चुप कि मुझे लगा जैसे वो भी जाग रही है, आँखें बंद किए, सब सुन रही है।

दो बजे माँ उठकर रसोई में गईं और मुझे सुनी। तीन बजे काजल उठी और चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े को दूर से देखकर लौट आई। चार बजे टिंकू चारपाई के नीचे से उठा, पानी पिया, और मेरे पास आकर बैठ गया।

"उस्ताद," उसने फुसफुसाकर कहा, "अगर कल रात कुछ गड़बड़ हो गई तो मेरी माँ को क्या बताओगे?"

"कुछ नहीं होगा," मैंने कहा।

"वो तो मैंने भी सोचा था," टिंकू ने कहा, "जब पापा गए थे।"

मैं उठकर बैठ गया।

"टिंकू—"

"नहीं, सुनो," उसने कहा, बिना रुके। "मैं डर नहीं रहा। मैं बस ये कह रहा हूँ कि जब भी कोई कहता है कुछ नहीं होगा, तो उसके बाद कुछ होता ही है। मेरे पापा ने भी कहा था — बस एक दिन की बात है, फिर देखते हैं।" उसने अपने घुटने पर बँधी पट्टी को सहलाया। "तो अब कोई 'कुछ नहीं होगा' मत कहना। सीधा बताओ कि क्या हो सकता है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। अंधेरे में उसकी आँखें चमक रही थीं, और मुझे पता था कि इन आँखों में जो डर है वो मेरे डर से बड़ा है, और वो अब भी मेरे साथ बैठा है।

"हो सकता है," मैंने कहा, "कि हम तीसरी मंज़िल तक पहुँचें और वहाँ कोई हमारा इंतज़ार कर रहा हो। हो सकता है कि रजिस्टर वहाँ न हो। हो सकता है कि हमें कुछ ऐसा मिले जो हमें और बड़ी मुसीबत में डाल दे। और हो सकता है कि हम बाहर आ जाएँ पर जो साथ लाए हों वो पूरा न हो।"

टिंकू ने सिर हिलाया।

"ठीक है," उसने कहा। "अब मैं सो सकता हूँ।"

और वो चारपाई पर लेट गया, और मुझे हैरानी हुई कि उसे सच में नींद आ गई।

सुबह पाँच बजे माँ का चूल्हा जला, और साथ ही घर की हवा बदल गई।

यही बात मुझे माँ में सबसे ज़्यादा पसंद है। उनके हाथ में जब चकला या कड़छी आ जाती है, तो उनकी आँखों का डर कहीं पीछे चला जाता है। जैसे कोई कह रहा हो — पहले रोटी, फिर मुसीबत।

मैं आँगन में आया। सुबह की धूप पीपल की डालियों से छनकर आ रही थी, पर गली में एक अजीब सी चुप्पी थी।

पीपल के नीचे जोड़ केंद्र वाली टूटी मेज़ अब नहीं थी। चबूतरी पर मोटा ताला लगा था और ऊपर सील का काग़ज़ चिपका था, जिसका एक कोना हवा से हिल रहा था।

मैं वहीं खड़ा होकर देखता रहा।

तुम सोच रहे होगे कि एक चबूतरी बंद हो गई तो क्या हुआ, जगह तो बहुत हैं। मगर बात चबूतरी की नहीं थी। बात उस जगह की थी जहाँ लोग बैठकर अपनी टूटी चीज़ें रखते थे। और जिस दिन लोगों को लगेगा कि रखने की जगह ही नहीं है, उस दिन वो चीज़ें उठाकर वापस घर ले जाएँगे, फिर कभी नहीं लाएँगे।

शबनम आपा की गुमटी पर पहुँचा तो मीरा पहले से बैठी थी।

उसके सामने दो कटोरी चाय रखी थीं, दोनों ठंडी हो चुकी थीं। उसके हाथ में खुली डायरी थी और कैमरा बगल में तिपाई पर लगा था, लाल बत्ती बंद।

"तू सुबह-सुबह चाय क्यों बर्बाद कर रही है?" मैंने कहा, बेंच पर बैठते हुए।

"क्योंकि मैं चाय पीने नहीं आई," उसने कहा। "मैं यहाँ इसलिए बैठी हूँ कि तेरा घर सबसे पहले देख सकूँ। आज रात तू कहेगा कि अंकुश मैंने सब तय कर लिया, और फिर तू अकेला भवन की तरफ़ चल पड़ेगा।"

मैं चाय की तरफ़ हाथ बढ़ा रहा था। रुक गया।

"मैंने ऐसा कब कहा?"

"तेरी आँखें कह रही हैं," मीरा ने कहा। "तू कल रात से ऐसे घूम रहा है जैसे किसी ने तेरे नाम पर ज़मीन लिख दी हो और तू उसे अकेले मिटाने निकला हो।"

टिंकू उसी वक़्त गुमटी के मोड़ पर आया। उसके सिर पर माँ का गुलाबी दुपट्टा बँधा था, आँख पर काला एक काँच वाला चश्मा, और हाथ में कार्डबोर्ड का माइक।

"उस्ताद," उसने सलामी देते हुए कहा, "गुप्तचर टिंकू हाज़िर है।"

"दुपट्टा उतार," मैंने कहा।

"नहीं उतारूँगा। ये मेरी वर्दी है।"

"ये माँ का दुपट्टा है।"

"तो मैं माँ से माँग लूँगा," टिंकू ने कहा, और बेंच पर चढ़कर बैठ गया।

शबनम आपा गुमटी के भीतर से निकलीं। उनके हाथ में लोहे की चिमटी थी, जिसे उन्होंने पीतल की थाली पर रखा — ठक। वो आवाज़ ऐसी थी जैसे गुमटी खुद बोल उठी हो।

"सुनो," उन्होंने कहा, और तीनों की तरफ़ देखा, एक-एक को। "मैं एक बार कह रही हूँ, तीनों मेरे सामने बैठे हो तो साफ़ सुन लो। भवन में घुसना मौत को न्योता देने जैसा है।"

मीरा ने डायरी बंद कर दी।

"आपा," मीरा ने कहा, "हम वहाँ चोरी करने नहीं जा रहे।"

"और तुम क्या समझती हो, चोरी का मतलब सिर्फ़ सामान उठाना है?" शबनम आपा ने कहा। उन्होंने चाय उठाई और मेरे सामने रखी। "चोरी का मतलब है वहाँ से ज़िंदा लौटना भी, और ये कि तुम्हारे लौटने के बाद तुम्हारी गली तुम्हें पहचाने। मैंने बीस साल में कितने लोग देखे हैं जो किसी से लड़ने गए और लौटकर खुद को नहीं पहचान पाए।"

"तो हमें क्या करना चाहिए?" टिंकू ने पूछा। "बैठे रहें?"

शबनम आपा ने उसकी तरफ़ देखा, और उनकी आवाज़ नरम हो गई।

"बैठे नहीं रहना," उन्होंने कहा। "जाना। पर मेरी एक बात याद रखना — वहाँ पहुँचकर जो सबसे पहली चीज़ तुम्हें मिलेगी, वो काग़ज़ नहीं होगा। काग़ज़ तो बहाना है। सबसे पहली चीज़ होगी तुम्हारा अपना डर, जो तुम्हें कहेगा कि अब लौट चलो, बहुत हो गया। उस वक़्त याद रखना कि डर तुम्हारा नहीं है। वो उसका है, जिसने वो डर किसी और से माँगकर अपने यहाँ रख छोड़ा है।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"आपा," मैंने कहा, "आपको कुछ पता है क्या?"

"मुझे इतना पता है," उन्होंने कहा, "कि रणवीर भारद्वाज का भवन उस पुराने काग़ज़ की गंध छुपाने के लिए बना है, जिसे उसने ज़मीन से निकालकर दीवारों के भीतर रखा है। और जो आदमी अपनी इमारत के भीतर काग़ज़ रखता है, वो वहाँ दरवाज़े नहीं रखता — वो वहाँ गलियारे रखता है।" उन्होंने चिमटी उठाई। "गलियारे मतलब जाल।"

टिंकू ने गले में रखे कार्डबोर्ड माइक को मुँह के पास लाया।

"ये बात काटी जा सकती है," उसने फुसफुसाया।

"इसे काटने से पहले," मीरा ने कहा, "मैं पूरी बात रखती हूँ।"

और तभी गुलाबी दुपट्टे वाला गुप्तचर टिंकू चुप हो गया।

गली के मुँह से कोई आ रहा था।

मैंने उसकी चाल से पहचान लिया, चेहरा देखने से पहले। मोटी, एक तरफ़ झुकी चाल, जैसे हर कदम पर पैर के नीचे ज़मीन न हो।

बबलू पांडे।

गले में वो मोटी सोने की चेन नहीं थी। उसकी जगह उसने कमीज़ का कॉलर ऊपर उठा रखा था, जैसे ठंड लग रही हो। पान की थैली हाथ में लटकी थी, पर वो खुली थी और उसमें से पान गिरने ही वाला था। और उसके मुँह में पान नहीं था।

बबलू पांडे का मुँह बिना पान के मैंने पिछले कितने सालों में नहीं देखा था। मुझे लगा जैसे उसका चेहरा भी उतर गया हो, कुछ कम हो गया हो।

"एक चाय," उसने शबनम आपा से कहा, और आवाज़ रूखी थी, जैसे रात भर किसी ने उसे नींद न आने दी हो।

फिर वो मेरी तरफ़ देखकर हमारी बेंच के किनारे खड़ा हो गया। खड़ा रहा, बैठा नहीं। जैसे बैठने से कुछ टूट जाएगा।

टिंकू ने उसकी थैली देखी, फिर मेरी तरफ़ देखा, फिर अपना माइक नीचे किया।

"बबलू भाई," टिंकू ने कहा, "चोरी से पहले पान तो खत्म कर लो। बार-बार थैली टटोलने से मालूम पड़ता है कि तुम डर रहे हो।"

मैंने सोचा बबलू उसे डाँटेगा। वो मेरी तरफ़ ऐसे देखता है कि मेरी उम्र ही पूछने जाने लगती है।

पर बबलू ने कुछ और किया।

उसने थैली की तरफ़ देखा, और उसकी आवाज़ फट गई।

"मैं चोरी करने नहीं आया," उसने कहा। "मैं अपनी जान बचाने आया हूँ। और तुम तीनों बैठे मज़ाक कर रहे हो, जैसे ये कहानी तुम्हारी हो और मैं इसमें कोई खलनायक हूँ जिसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता।"

मीरा की आँखें उस पर जम गईं। मीरा का काम ही यही है — वो उसके हाथ देखती है, आवाज़ देखती है, और जो आदमी सामने बैठा है, उसकी आँखों में उस उँगली की तलाश करती है जो काँप रही हो।

बबलू की उँगली काँप रही थी। वो थैली की डोरी पकड़े हुए थी, और डोरी हिल रही थी।

"बैठ," मैंने कहा।

"मैं नहीं—"

"बबलू," मैंने कहा, "बैठ। तेरी टाँगें काँप रही हैं और यहाँ गली के पाँच लोग देख रहे हैं। तू अगर यहीं गिरा तो तेरी सारी मज़दूरी की इज़्ज़त गली में रह जाएगी।"

वो बैठ गया। बेंच के दूसरे सिरे पर, मुझसे दूर, जैसे मैं कोई गरम तवा हूँ।

शबनम आपा ने चाय लाकर उसके सामने रखी। बबलू ने चाय उठाई, दोनों हाथों से, और एक घूँट लिया। फिर उसने आँखें बंद कर लीं।

"मैं सिर्फ़ तुमसे एक बात कहने आया हूँ," उसने कहा, आँखें बंद रखकर। "और वो इसलिए नहीं कि मैं भला हो गया हूँ। मैं भला होने की उम्र से बहुत पहले निकल गया। मैं आया हूँ क्योंकि कल रात मैंने उस आदमी को देखा, और अब मुझे नींद नहीं आती।"

"रणवीर को?" मीरा ने कहा।

"रणवीर को नहीं," बबलू ने कहा। उसने आँखें खोलीं। "उसके पीछे जो चीज़ थी।"

चाय की भाप उसके चेहरे को ढक रही थी।

"मैं बाईस साल से उसके साथ हूँ," बबलू ने कहा। "मैंने उसके लिए गली-गली अंगूठे लिए हैं, काग़ज़ लिए हैं, धमकियाँ दी हैं। मैंने उस आदमी के मुँह से एक बार भी ऊँची आवाज़ नहीं सुनी। वो चिल्लाता नहीं। वो गुस्सा नहीं करता। वो मुस्कुराता है और तेरी ज़िंदगी बदल जाती है।"

"तो अब क्या बदला?" मैंने कहा।

बबलू ने चाय मेज़ पर रखी और उसकी आवाज़ धीमी हो गई।

"अब वो चिल्लाया," उसने कहा।

कुछ देर किसी ने कुछ नहीं कहा। गुमटी के भीतर चूल्हे पर कुछ गिरा, और शबनम आपा ने पलटकर देखा भी नहीं।

"कल रात," बबलू ने कहा, "मैं उसे कुछ काग़ज़ देने पीछे वाली गली में गया था। वो खिड़की के पास खड़ा था। और उसने मुझसे जो कहा, वो किसी आदमी ने नहीं कहा। मैं एक काग़ज़ देने गया था और वो मुझसे कहने लगा — इससे ज़्यादा चाहिए। और फिर उसने अपने हाथ की तरफ़ देखा।" बबलू ने अपनी गर्दन सहलाई। "उसके हाथ में कुछ था। मुझे ठीक नहीं दिखा। पर जब वो बोला, तो उसकी आवाज़ दो तरफ़ से आई। जैसे वो खुद बोल रहा हो, और कोई और उसके भीतर से बोल रहा हो।"

मेरी जेब में घंटी रखी थी, और अचानक मुझे लगा कि वो हल्की हो गई है। जैसे कुछ सुनकर चौकन्नी हो गई हो।

"बबलू," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में धार थी, "तू हमें ये सब क्यों बता रहा है? बाईस साल उसके साथ रहा है। तू अगर आज खड़ा होकर ये बात कह रहा है, तो तेरे पास कोई हिसाब है। वो हिसाब क्या है?"

बबलू ने मीरा की तरफ़ देखा। फिर उसकी तरफ़ देखा जैसे वो कोई चीज़ तोल रहा हो।

"सही पूछा," उसने कहा। "तू वाकई पत्रकार है।"

"जवाब दे।"

"मेरा कोई हिसाब नहीं है," बबलू ने कहा। "और अगर होता, तो मैं तुम्हारे पास नहीं आता। मैं सीधा भाग जाता। पर मैं भाग नहीं सकता। मेरी बीवी यहाँ है। मेरे साले का लड़का उसकी साइट पर काम करता है। मेरा सारा पैसा उन्हीं की ज़मीन पर बना है। और मुझे लगता है कि अब वो मुझे भी उसी ज़मीन में मिला देगा।"

शबनम आपा ने चिमटी उठाई और थाली पर पटकी। ठक।

"बस," उन्होंने कहा। "अब तू रोना बंद कर और काम की बात कर। मैंने तुझे बहुत बुरा आदमी देखा है, बबलू। पर बुरे आदमी को भी अगर नींद न आए, तो समझ लो कि ऊपर वाला कोई हिसाब खोल रहा है।"

बबलू ने अपना मुँह पोंछा और सीधा होकर बैठ गया। और उस वक़्त, पहली बार, उसका चेहरा उस बबलू जैसा दिखा जिसे गली जानती है — थोड़ा घमंडी, थोड़ा चालाक।

"सुनो ध्यान से," उसने कहा। "मैं एक बार कहूँगा, दोहराऊँगा नहीं।"

हम तीनों आगे झुके।

"भवन का पिछला दरवाज़ा," बबलू ने कहा, "रात नौ बजे खुलता है। सात मिनट के लिए।"

"सात मिनट?" टिंकू ने कहा।

"नौ बजे गार्ड बदलता है, और नया गार्ड आते ही पीछे के नल पर पानी पीने जाता है। उसे पानी पीने में, फिर दो मिनट उस बेंच पर बैठने में, कुल सात मिनट लगते हैं। उसके बाद वो लौटकर दरवाज़े के सामने खड़ा हो जाता है।"

"और उन सात मिनट में दरवाज़ा खुला रहता है?" मीरा ने कहा।

"दरवाज़ा खुला रहता है क्योंकि उसे गंदे कपड़ों के डिब्बे वहाँ से बाहर लाने होते हैं," बबलू ने कहा। "पीछे ट्रक वाले कमरे के बाहर कपड़ों का डिब्बा रहता है। गार्ड उसे बाहर खींचता है, क्योंकि अंदर सीढ़ियाँ चढ़ाकर लाना पड़ता है। डिब्बा दरवाज़े के बाहर रहता है और दरवाज़ा बंद नहीं हो पाता।"

"और अगर कोई अंदर जाना चाहे?" मैंने कहा।

"तो उसके पास सात मिनट हैं," बबलू ने कहा। "सात मिनट बाद अगर तुम दरवाज़े पर नहीं हो, तो गार्ड वापस दरवाज़ा बंद कर देगा — और फिर तुम तीसरी मंज़िल से उतरकर नीचे कभी नहीं आ सकते। क्योंकि नीचे का सारा रास्ता उसी दरवाज़े से होकर जाता है।"

मीरा ने अपनी डायरी खोली और लिखने लगी।

"सात मिनट में तीन मंज़िल कैसे चढ़ेंगे?" उसने कहा, बिना ऊपर देखे। "तीसरी मंज़िल पर अलमारी है, उसका ताला है, उसमें रजिस्टर है। हमें उसे खोलना है, निकालना है और रास्ता भी वापस आना है। सात मिनट में ये नहीं होता।"

"तो मत करो," बबलू ने कहा, और उसकी आवाज़ में फिर वही रूखापन लौट आया। "मैंने तुम्हें रास्ता बताया, ज़मानत नहीं दी।"

मैंने अपनी उँगलियों में घंटी को घुमाया।

"तीसरी मंज़िल का अलमारी वाला कमरा," मैंने कहा, "वो पिछले दरवाज़े से कितनी दूर है?"

बबलू ने कुछ देर सोचा।

"अगर तुम सीढ़ियों से सीधे जाओ," उसने कहा, "तेज़ चाल में दो मिनट। अगर बीच में किसी से टकरा गए, तो कुछ नहीं कह सकता।"

"तीसरी मंज़िल पर और कौन रहता है?"

"काग़ज़ बाँटने वाले दो लड़के," बबलू ने कहा। "पर वो नौ बजे तक अपना काम खत्म करके नीचे आ जाते हैं। मैंने उन्हें ही नौ बजे के बाद नीचे नहीं देखा।"

"और तू?" मीरा ने कहा।

"मैं इस वक़्त क्या हूँ, तू खुद सोच," बबलू ने कहा। "मैं तुम्हारे साथ अंदर नहीं जाऊँगा। मैं बाहर रहूँगा। तुम लौट आए तो मैं तुम्हें गली तक छोड़ दूँगा। और अगर तुम नहीं लौटे—" वो रुका।

"तो?" मैंने कहा।

"तो मैं भी फँसा हुआ मान लूँगा," बबलू ने कहा। "क्योंकि साहब को पता चल जाएगा कि रास्ता किसने बताया। और साहब उस नल पर पानी पीने नहीं जाता।"

मीरा ने अपनी कलम रख दी और सीधी होकर बैठ गई।

"मुझे एक बात साफ़ करनी है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो सपाटपन था जो मैं अब पहचान गया हूँ — वो सपाटपन जो तब आता है जब मीरा अपनी ही बात को खुद मानने को तैयार नहीं होती। "बबलू, तू बाईस साल उस आदमी के साथ रहा है। तूने अपने हाथ से उसके काग़ज़ बाँटे हैं। तूने मेरी दुकान वाली बाई का अंगूठा लिया है, तूने भोला भाई को कोरा काग़ज़ थमाया है, तूने उसे बारह हज़ार रुपये दिए हैं। तूने मेरी गली के चार लोगों से बिना पढ़े अंगूठा लिया है।" वो रुकी। "और अब तू आकर कहता है कि तेरी जान खतरे में है और तू हमारी मदद करना चाहता है। तू मुझे एक वजह दे कि मैं तुझ पर भरोसा क्यों करूँ।"

बबलू ने कुछ नहीं कहा।

"कोई वजह है?" मीरा ने पूछा।

"नहीं," बबलू ने कहा।

"तो फिर—"

"तो फिर मेरे पास कोई वजह नहीं है," बबलू ने कहा। "पर तेरे पास एक रास्ता है, जो मैंने दिया। और तेरे पास एक गली है, जो बचानी है। तू इन दोनों में से कोई वजह पसंद कर ले।"

शबनम आपा ने चिमटी उठाई और कुछ कहने ही वाली थीं कि मैंने हाथ उठाया।

"रुको," मैंने कहा।

सब मेरी तरफ़ देखने लगे।

मैंने घंटी को अपनी हथेली में लिया। वो ठंडी थी, पर इतनी नहीं जितनी कल रात थी। फिर मैंने बबलू की आँखों में देखा, और मुझे वो चीज़ दिखी जो मैंने पहले किसी की आँखों में नहीं देखी थी। आदमी डर रहा था, और डरते वक़्त उसकी आँखें बचने का रास्ता ढूँढ रही थीं। पर उसकी आँखों में बचने का रास्ता नहीं था। उसकी आँखों में सिर्फ़ मुझे रास्ता देना था।

"अंकुश," मीरा ने कहा, "तू सोच समझकर बोल।"

"मैं सोच ही रहा हूँ," मैंने कहा।

"ये वही आदमी है जिसने तेरी दुकान की जगह पर ठेका लिया—"

"नहीं," मैंने कहा। "ये वही आदमी है जिसने तेरी दुकान पर कभी ताला नहीं लगवाया, जब लगवा सकता था।"

मीरा चुप हो गई।

मैंने बबलू की तरफ़ देखा।

"बबलू," मैंने कहा, "आज मुझे तुझ पर भरोसा करना है।"

बबलू का चेहरा बदला।

"पर ये भरोसा मुफ़्त नहीं है," मैंने कहा। "अगर तूने हमें गलत रास्ता दिया, तो जो कुछ होगा, उसका हिसाब भगवान नहीं, ये गली माँगेगी। और ये गली तेरे साहब से ज़्यादा देर तक याद रखती है।"

बबलू ने एक लंबी साँस ली, जैसे बहुत दिनों बाद मुँह से पान निकाला हो।

"समझ गया," उसने कहा।

फिर उसने अपनी कमीज़ की अंदरूनी जेब से एक चीज़ निकाली और मेज़ पर रख दी।

वो एक पुराना पहचान कार्ड था।

प्लास्टिक की परत किनारों से उखड़ी हुई थी, और उसके भीतर काग़ज़ पीला हो चुका था। कार्ड पर एक फोटो थी — बबलू, कम से कम बाईस साल छोटा, दुबला, बिना सोने की चेन, किसी दफ़्तर की सफ़ेद कमीज़ में। नीचे नाम लिखा था — बबलू पांडे। और उसके नीचे कंपनी का नाम — भारद्वाज कंस्ट्रक्शन।

टिंकू ने कार्ड उठाकर उलटकर देखा।

"इसके पीछे कुछ लिखा है," उसने कहा।

बबलू ने हाथ बढ़ाया और कार्ड उससे ले लिया।

"ये रहने दो," उसने कहा। "ये तुम्हारे काम का नहीं।"

"तो फिर मेज़ पर क्यों रखा?" टिंकू ने कहा।

बबलू कुछ देर उसे देखता रहा। फिर उसने कार्ड उठाया और अपनी कमीज़ की जेब में रख लिया।

"ज़रूरत पड़ेगी," उसने कहा।

"कब?"

"जब गार्ड तुम्हें रोके," बबलू ने कहा, "तो एक ही चीज़ काम आएगी। वो कार्ड। उस पर पुरानी कंपनी का नाम है और मेरा चेहरा है। तुम उसे दिखा देना और कह देना कि तुम कपड़ों का डिब्बा उतारने आए हो।"

"और तू खुद क्यों नहीं दिखाता?" मीरा ने कहा।

बबलू ने उसकी तरफ़ देखा।

"क्योंकि मैं चेहरे से पहचाना जाता हूँ," उसने कहा। "और ये कार्ड मेरा पुराना चेहरा है। जो मुझे आज नहीं पहचानेगा।"

फिर वो उठा। बेंच से उठते वक़्त उसका हाथ मेज़ पर टिका और मेज़ हिल गई। उसने चाय का पूरा कटोरा खत्म किया और थैली अपनी जेब में ठूँसी।

"नौ बजे," उसने कहा। "आठ बजकर पचास मिनट पर तुम लोग पिछली गली में होना। सात मिनट बाद लौट आना।"

"अगर हम नहीं लौटे?" मैंने कहा।

"तो मैं भी फँस जाऊँगा," बबलू ने कहा, और चल दिया।

वो गली के मोड़ पर मुड़ा, एक बार रुका, जैसे कुछ कहने की सोच रहा हो, फिर चला गया।

और उसके जाते ही मेरी जेब में घंटी ठंडी हो गई।

इतनी ठंडी कि मुझे लगा जैसे किसी ने मेरी जेब में बर्फ का टुकड़ा रख दिया हो। मैंने हाथ जेब में डाला और घंटी निकाली। वो मेरी हथेली पर रखी थी, और उसका पीतल पहले से गहरा दिख रहा था, जैसे वो कोई बात पी रही हो।

मीरा ने देखा।

"क्या हुआ?"

"घंटी," मैंने कहा।

टिंकू ने मेरे हाथ के पास आकर देखा।

"बजी नहीं," उसने कहा।

"नहीं बजी," मैंने कहा। "पर बोलेगी।"

और तभी वो बोली।

पहले बहुत हल्की, जैसे किसी बूढ़े आदमी ने नींद में कुछ कहा हो। फिर साफ़, छोटे-छोटे शब्दों में, पहले जैसी रूखी आवाज़ में — न कोई नरमी, न कोई हमदर्दी।

"सात मिनट नहीं," घंटी ने कहा।

मैंने घंटी को कसकर पकड़ा।

"फिर क्या?" मैंने कहा।

"सात साल पुराना हिसाब।"

शबनम आपा ने चिमटी नीचे रख दी।

टिंकू ने अपना माइक धीरे से बेंच पर रख दिया, जैसे उसकी आवाज़ कहीं घंटी को न छू जाए।

मीरा ने अपनी कलम उठाई और डायरी में कुछ लिखा, पर उसकी कलम की नोक काग़ज़ पर रुक-रुककर चल रही थी।

"अंकुश," उसने कहा, "बबलू ने कहा कि वो बाईस साल से उसके साथ है।"

"हाँ," मैंने कहा।

"तो सात साल कहाँ से आए?"

मैंने घंटी को रोशनी में उठाया। सुबह की धूप उस पर पड़ी और उसका पीतल चमका, और मुझे उस चमक में बहुत दूर का कोई चेहरा दिखा — न किसी का नाम, न किसी की आँखें, बस एक आदमी जो किसी दरवाज़े पर खड़ा है और अपनी जेब टटोल रहा है।

मैंने घंटी नीचे की और शबनम आपा की तरफ़ देखा।

"आपा," मैंने कहा, "सात साल पहले इस गली में क्या हुआ था?"

शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा, और उनके चेहरे पर वो भाव आया जो तब आता है जब कोई पुरानी चीज़ अचानक सामने आ जाए और उसने उसे तीन साल से न देखा हो।

"सात साल पहले?" उन्होंने कहा।

"हाँ।"

उन्होंने गुमटी के भीतर देखा, जैसे वहाँ किसी से पूछ रही हों। फिर उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू सीधा किया और बेंच के किनारे बैठ गईं।

"सात साल पहले," उन्होंने कहा, "इस गली में एक आदमी रहता था जिसका नाम मुझे याद नहीं। वो चश्मे वाला था और साइकिलों के पुर्ज़े बेचता था। एक दिन वो अपनी दुकान बंद करके चला गया। लोगों ने कहा कि कर्ज़ था। लोगों ने यह भी कहा कि वो रणवीर भारद्वाज के यहाँ कुछ काग़ज़ लेकर गया था और लौटा नहीं।"

"और उसके बाद?"

"उसके बाद," शबनम आपा ने कहा, "उसकी दुकान पर ताला लगा और ताला आज तक लगा है।"

टिंकू ने कुछ कहना चाहा, पर मैंने हाथ उठाकर रोक दिया।

"वो दुकान कहाँ है?" मैंने पूछा।

शबनम आपा ने अपनी उँगली उठाई और गली की तरफ़ इशारा किया — उस तरफ़ नहीं जहाँ मेरी दुकान थी, बल्कि उसके उलटी तरफ़, जहाँ कभी मैंने गौर नहीं किया था।

"वहाँ," उन्होंने कहा। "उस मोड़ पर जहाँ से रास्ता पीछे के प्लॉट की तरफ़ जाता है। तीन दुकानें हैं, तीनों बंद। बीच वाली उसकी है।"

मैंने घंटी को जेब में रखा।

वो अब भी ठंडी थी, पर ठंडक बदल गई थी। पहले वो बर्फ जैसी थी, अब ऐसी थी जैसे बहुत दिनों से बंद पड़ी किसी कोठरी का दरवाज़ा खोला गया हो।

"मीरा," मैंने कहा।

"हाँ।"

"आज रात नौ बजे का हिसाब है।"

"हाँ।"

"पर उससे पहले," मैंने कहा, "हमें उस बंद दुकान पर जाना है।"

टिंकू ने अपना माइक उठाया।

"उस्ताद," उसने कहा, "आपको पता है ना कि हमारे पास बारह बजे से पहले तीसरी मंज़िल तक पहुँचना है, और उसके बाद कल सात बजे मशीन आनी है, और कल ग्यारह बजे दुकान सील होनी है?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"पता है," मैंने कहा।

"तो फिर एक और चीज़ क्यों जोड़ रहे हो?"

"क्योंकि," मैंने कहा, "घंटी सात साल पहले वाली बात कह रही है, और घंटी कभी बेकार बात नहीं करती। अगर वो कह रही है कि हिसाब सात साल पुराना है, तो इसका मतलब ये है कि रणवीर सिर्फ़ हमारी गली की ज़मीन नहीं ले रहा। वो उस आदमी का पूरा हिसाब मिटा रहा है — उसकी दुकान, उसका नाम, उसका सबूत। और जो उसने सात साल पहले शुरू किया था, वो आज हमारे सामने खत्म कर रहा है।"

शबनम आपा ने चिमटी उठाई और थाली पर रखी। ठक।

"तो फिर देर मत कर," उन्होंने कहा। "मैं तुम्हारे लिए रोटी रख देती हूँ। जो आदमी पुराना हिसाब खोलने जाए, वो भूखा नहीं जाता।"

मैंने घंटी को जेब में रखा और गली के उस मोड़ की तरफ़ देखा, जिधर मैंने कभी मुड़कर नहीं देखा था।

सुबह की धूप उस मोड़ पर पड़ रही थी, और वहाँ सच में तीन बंद दुकानें खड़ी थीं — सबके शटर गिरे हुए, सबके बोर्ड धूल से ढके, और बीच वाली दुकान के शटर पर एक काग़ज़ चिपका था जो हवा में हिल रहा था, जैसे कोई बहुत दिनों से हाथ हिला रहा हो और कोई देखने वाला न मिला हो।

॥

उस काग़ज़ तक पहुँचने में हमें बस चालीस कदम लगे। पर चालीस कदम में मेरी ज़िंदगी का वो हिस्सा बदल गया जिसे मैंने कभी देखा ही नहीं था।

तीन दुकानें, एक के बगल में एक, सबके शटर गिरे हुए। बाईं तरफ़ वाली की चादर पर ज़ंग ने ऐसा रंग बना दिया था जैसे कोई पुराना नक्शा दीवार पर चिपका हो। दाईं तरफ़ वाली के ऊपर लोहे का टुकड़ा लटक रहा था, जिस पर कभी नाम लिखा होगा, अब सिर्फ़ चार छेद बचे थे। और बीच वाली — बीच वाली के शटर पर वो काग़ज़ चिपका था, जो हवा में हिल रहा था, जैसे कोई बहुत दिनों से हाथ हिला रहा हो और कोई देखने वाला न मिला हो।

मैंने काग़ज़ को उँगली से दबाया। काग़ज़ सूखा था, पर उसके नीचे का गोंद अब भी चिपचिपा था।

"उस्ताद," टिंकू ने कहा, "इसे कोई हफ़्ते में चिपकाया है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तुम्हें कैसे पता?"

"क्योंकि गोंद सूखकर पीला नहीं हुआ, अभी भी सफ़ेद है। गली में काग़ज़ चिपकाने वाले पहले उँगली से पोंछते हैं, फिर दबाते हैं। इसमें दबाने का निशान एक ही तरफ़ है — जल्दी में लगाया है।"

मीरा ने टिंकू को देखा, फिर मुझे।

"ये लड़का," उसने कहा, "अगर पढ़ाई में भी ऐसा होता तो…" और फिर वो खुद चुप हो गई, क्योंकि उसे याद आ गया कि टिंकू स्कूल छोड़ चुका है और यह बात किसी को भूलनी नहीं चाहिए।

काग़ज़ पर कुछ लिखा था। मैंने पढ़ा।

"दुकान खाली है। सामान के लिए संपर्क करें।"

नीचे एक फ़ोन नंबर था, उँगली जितना मोटा, जैसे किसी ने जल्दी में लिखा हो। और उसके नीचे — मैंने अपनी आँखें सिकोड़ीं — उसके नीचे एक छोटा निशान था, जिसका रंग औरों से अलग था। गाढ़ा नीला। दो लकीरें। और बीच में एक बिंदु।

मेरे हाथ में कुछ ठंडा हुआ।

"मीरा," मैंने कहा, "ये देखो।"

उसने झुककर देखा और सीधी होकर मेरी तरफ़ देखने लगी। उसके चेहरे पर वो भाव था जो तब आता है जब कोई काग़ज़ का टुकड़ा आपको बता दे कि आप जिस चीज़ को पुरानी मान रहे थे, वो उतनी पुरानी है ही नहीं।

"ये वही निशान है," उसने कहा।

"हाँ।"

"अंकुश, ये निशान दुकान खाली होने के काग़ज़ पर नहीं होना चाहिए।"

"मुझे पता है।"

टिंकू ने शटर के नीचे झाँका। शटर और ज़मीन के बीच उँगली भर की दरार थी, और उस दरार से अंदर धूल जमी चौकी दिख रही थी। चौकी के पीछे कुछ लकड़ी का था, जिस पर कपड़ा ढका था। और उस कपड़े के ऊपर — मुझे लगा — एक किताब पड़ी थी।

"उस्ताद," टिंकू ने कहा, "अगर हम इस दरार को थोड़ा और बड़ा करें—"

"नहीं।"

"पर—"

"टिंकू, आज रात हमें उस भवन में जाना है, और अगर हम अभी इस शटर को छेड़ेंगे और किसी ने देख लिया, तो आज रात हम घर में बैठे होंगे और रजिस्टर उस तीसरी मंज़िल पर पड़ा हुआ होगा।"

वो चुप हो गया, पर उसकी आँखें शटर पर से हटी नहीं।

शबनम आपा पीछे खड़ी थीं। उन्होंने अपना हाथ दुपट्टे में पोंछा और धीरे से बोलीं, "सात साल पहले मैंने इस शटर को गिरते देखा था। उस दिन इस आदमी ने मुझसे उधार एक कटोरी चाय की भी वसूली कर ली थी। मैंने सोचा था बुरा आदमी है। अब लगता है, जल्दी में जाने वाला आदमी था।"

"क्यों?"

"क्योंकि जो आदमी जानता है कि वो लौटकर नहीं आएगा," उन्होंने कहा, "वो अपना हिसाब साफ़ कर जाता है।"

मैंने आख़िरी बार काग़ज़ को देखा और मुड़ गया।

"चलो," मैंने कहा। "शाम को घर चलना है। आज रात के लिए तैयारी करनी है।"

टिंकू ने पूछा, "तैयारी कैसी?"

"ऐसी," मैंने कहा, "जैसी आज तक नहीं की।"

और यह सच था। क्योंकि अब तक जो भी काम मैंने किया था, वो गली में हुआ था, गली के लोगों के बीच, गली के नाम पर। आज पहली बार मुझे किसी के घर में घुसकर उसका हिसाब उठाना था। और उस काम के लिए घंटी काफ़ी नहीं थी। मुझे लोग चाहिए थे।

शाम छह बजे घर पहुँचा तो माँ चूल्हे के पास बैठी थीं और काजल मेज़ पर किताब खोले बैठी थी, पर आँखें किताब में नहीं थीं।

मैंने जूते उतारे और पानी का गिलास उठाया।

"हाथ मुँह धो ले," माँ ने पीछे से कहा, बिना मुड़े।

"धो रहा हूँ।"

"नहीं धो रहा। मैं सुन रही हूँ, तेरी साँस अभी भी सड़क की है।"

मैंने नल खोला और सच में हाथ धोए। माँ की सुनने की ताक़त अजीब थी — वो चूल्हे के पास बैठकर भी जान जाती थीं कि मैंने नाक साफ़ की या जेब में हाथ डाला। बाईस साल से उन्होंने इस घर में सिर्फ़ आवाज़ें सुनी थीं, इसलिए उनकी सुनने की समझ किसी मशीन से ज़्यादा तेज़ हो गई थी।

मेज़ पर टिफ़िन रखा था। वही पुराना स्टील का टिफ़िन, जो मैं स्कूल के ज़माने में ले जाता था, जिसका ढक्कन ठीक से नहीं बैठता था और जिसे खोलने के लिए हर बार कोने पर चोट मारनी पड़ती थी।

"ये किसके लिए है?" मैंने पूछा।

माँ उठीं, कपड़े से हाथ पोंछे और मेरी तरफ़ आईं।

"तेरे लिए," उन्होंने कहा। "रोटी रखी है, दो सब्ज़ी वाली, दो सूखी। सूखी ऊपर रखी हैं, नीचे वाली जल्दी खराब नहीं होंगी। और अचार की पुड़िया उस छोटी जेब में है, उसी में चम्मच भी है।"

काजल ने किताब से सिर उठाया।

"अम्मी," उसने कहा, "ये स्कूल नहीं जा रहा।"

"मुझे पता है," माँ ने कहा। "पर जो बाहर जाता है, उसके हाथ में कुछ होना चाहिए। खाली हाथ निकलने वाले आदमी को रास्ता भी खाली मिलता है।"

मैंने टिफ़िन उठाया। वो भारी था। माँ ने पाँच रोटियाँ रखी थीं, और मैंने कभी नहीं सोचा था कि पाँच रोटियों का वज़न इतना लग सकता है।

"इतना क्यों?" मैंने कहा।

"क्योंकि तू अकेले नहीं जा रहा," उन्होंने कहा। "अगर कोई भूखा रह गया तो उसका हिसाब मुझसे लिया जाएगा।"

मुझे कुछ कहना था, पर कुछ निकला नहीं।

काजल ने किताब बंद की और मेज़ पर रखी।

"भाई," उसने कहा, धीरे से, "तू डर रहा है।"

"नहीं।"

"झूठा।" उसने कहा। "तेरा कान लाल है। जब तू डरता है, तेरा दाहिना कान लाल हो जाता है और तू उसे छूने लगता है।"

मेरा हाथ अपने आप कान की तरफ़ गया और मैंने उसे रोक लिया। काजल हँसी — वो हँसी जिसमें मज़ाक भी था और डर भी, और दोनों इतने मिले हुए थे कि अलग करना मुश्किल था।

"तेरे जाने से पहले," उसने कहा, "अम्मी पूरी गली का खाना बना देंगी और फिर कहेगी कि टिफ़िन भूल गया।"

"मैं नहीं भूलूँगा।"

"भूल जाएगा," काजल ने कहा। "डर के मारे। डर में आदमी अपना नाम भूल जाता है, टिफ़िन क्या चीज़ है।"

तभी पीछे के कमरे का दरवाज़ा खुला और पापा बाहर आए।

उनके हाथ में एक पुराना पेचकस था। लकड़ी का हत्था, चिकना, जैसे कोई सालों तक उसी को पकड़कर बैठा हो। हत्थे पर ग्रीस की परत जमी थी और पेचकस की नोक थोड़ी मुड़ी हुई थी, जैसे ज़्यादा इस्तेमाल से अपनी शक्ल खो चुकी हो।

वो मेरे सामने आकर खड़े हुए और कुछ देर मुझे देखते रहे।

"ले," उन्होंने कहा।

मैंने पेचकस लिया।

"ये किसलिए?"

"मशीन तोड़ने से ठीक नहीं होती," उन्होंने कहा। "इंसान भी नहीं।"

वो रुके, जैसे अपने ही शब्दों को तौल रहे हों।

"अगर वहाँ कुछ टूटा मिले," उन्होंने धीरे से कहा, "तो तोड़ना मत। खोलना। देखना कि अंदर क्या है, और फिर जोड़ना। मैंने बाईस साल यही नहीं किया, इसलिए आज तेरे सामने खड़ा हूँ।"

कमरे में चुप्पी हो गई।

माँ चूल्हे के पास खड़ी रहीं, काजल की किताब मेज़ पर खुली रही, और मैं वहीं खड़ा रहा, हाथ में पेचकस पकड़े।

फिर मैंने वो किया जो मैंने कभी नहीं किया था।

मैंने पापा का हाथ पकड़ा।

उनका हाथ खुरदुरा था, उँगलियों के जोड़ मोटे पड़ गए थे और हथेली पर एक पुराना सफ़ेद निशान था जो किसी जले हुए काम की याद दिलाता था। मैंने उसे कसकर पकड़ा, इतना कसकर कि वो हिले नहीं, बस मेरी तरफ़ देखने लगे।

"आज मैं अकेले नहीं जा रहा," मैंने कहा।

वो कुछ नहीं बोले।

"आज मेरे साथ ये घर जा रहा है," मैंने कहा। "माँ का टिफ़िन, तेरा पेचकस, काजल का डर, टिंकू का बस्ता, मीरा का कैमरा, शबनम आपा की रोटी, उस्ताद की सिलाई, दुबे अंकल की कुर्सी। सब साथ है। इसलिए आज अगर मैं गिरा, तो पूरी गली गिरेगी — और पूरी गली नहीं गिरती।"

पापा ने मेरा हाथ पकड़ा रखा, फिर धीरे से छोड़ा।

"जा," उन्होंने कहा। "और हाँ — घंटी को जेब में ऐसे रखना कि बजने पर आवाज़ दबे नहीं।"

"क्यों?"

"क्योंकि," उन्होंने कहा, "जब वो बोलेगी, तेरे पास सिर्फ़ दो पल होंगे। अगर उसे सुनने के लिए तुझे जेब में हाथ डालना पड़ा, तो वो दो पल गए।"

यह बात मैंने दिमाग़ में लिख ली।

सात बजे टिंकू आया।

वो सीधा आँगन में घुसा, बिना दस्तक दिए, हाथ में एक कपड़े का थैला लटकाए। थैला ऐसा लटका हुआ था जैसे उसमें कोई ज़िंदा चीज़ हो और वो हिल रही हो।

"ये क्या है?" काजल ने पूछा।

"जासूसी किट," टिंकू ने कहा, बड़े गर्व से।

उसने थैला खोलकर आँगन की चौकी पर रख दिया।

पहली चीज़ एक टूटा शीशा था। छोटा, हथेली जितना, एक कोना टूटा हुआ।

"इससे क्या होगा?" काजल ने पूछा।

"कोने के पीछे देखने के लिए," टिंकू ने कहा। "अगर कोई सीढ़ी के मोड़ पर खड़ा हो, तो सीधे नहीं दिखेगा। शीशा दीवार से सटाकर रखो, वो दिख जाएगा।"

दूसरी चीज़ चॉक थी। आधी घिसी, सफ़ेद।

"निशान के लिए," उसने कहा। "अगर हमें किसी दरवाज़े से वापस आना पड़े और रास्ता भूल जाए, तो दरवाज़े के नीचे एक छोटी लकीर। कोई नहीं समझेगा।"

तीसरी चीज़ पतंग की डोर थी। लंबी, सफ़ेद, कई जगह गाँठ लगी हुई।

"ये किसलिए?" मैंने पूछा।

इस बार टिंकू ने नीची आवाज़ में कहा, "अगर हममें से कोई अंदर फँस जाए और बाहर किसी को खबर करनी हो, तो डोर खिड़की से बाहर लटकाना है। नीचे खींचने पर ऊपर आवाज़ होगी।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तुमने ये सब सोचा कब?"

"रात को," उसने कहा। "जब आप सो गए थे।"

मेरे अंदर कुछ हुआ — कुछ ऐसा जो न गुस्सा था, न प्यार, बल्कि दोनों के बीच की एक ठंडी सी चीज़। यह लड़का तेरह साल का है और यह आज रात मेरे साथ किसी की तीसरी मंज़िल पर जा रहा है, और मैं उसके माँ को क्या जवाब दूँगा।

"टिंकू," मैंने कहा, "आज रात तुम सीढ़ियों तक नहीं चढ़ोगे।"

उसका चेहरा उतर गया।

"पर उस्ताद—"

"तुम गली में रहोगे," मैंने कहा। "पिछली गली के नुक्कड़ पर। अगर सात मिनट में हम बाहर न आएँ, तो तुम शबनम आपा की गुमटी की तरफ़ भागोगे और उन्हें बताओगे। वो समझ जाएँगी।"

वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा, फिर बोला, "ठीक है। पर शीशा और डोर मैं अपने पास रखूँगा।"

"रखो।"

तभी मीरा आई।

वो दरवाज़े पर खड़ी थी, एक हाथ में कैमरा, दूसरे में अपना फटा बैग, और उसके चेहरे पर वो भाव था जो पत्रकारों के चेहरे पर तब आता है जब उन्हें पता हो कि आज का काम उनकी नौकरी से बड़ा है।

"सब आ गए?" उसने पूछा।

"आ गए," मैंने कहा।

उसने बैग ज़मीन पर रखा और उसमें से एक काग़ज़ निकाला — वही गवाह वाला काग़ज़, जिस पर उसका नाम लिखा था और जिसे उसने मेरी जेब में रखवाया था।

"सुनो सब," उसने कहा, और उसकी आवाज़ बदल गई — अब वो मीरा दोस्त नहीं, मीरा पत्रकार थी। "अंदर जाकर कुछ नहीं होने वाला। न कोई तोड़फोड़, न कोई भागदौड़, न कोई वीरता। हमें सिर्फ़ एक चीज़ चाहिए — वो रजिस्टर। उसकी फोटो। और बाहर। बस।"

"अगर कोई आ जाए?" काजल ने पूछा।

"तो हम कहेंगे कि हम काग़ज़ बाँटने वाले लड़कों के साथ आए थे और रास्ता भूल गए," मीरा ने कहा।

"ये कितना सच है?" टिंकू ने पूछा।

"बिल्कुल झूठ है," मीरा ने कहा। "इसीलिए याद रखने में आसान है।"

काजल हँसी।

माँ ने तब तक चाय बना दी थी और हम सब आँगन में बैठ गए थे। पापा भी आए और दरवाज़े के पास एक स्टूल पर बैठ गए — वो नहीं बोले, बस सब सुनते रहे।

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।

"अंकुश, एक बात।"

"हाँ।"

"तेरे पास घंटी है, और घंटी के पास बातें हैं। पर आज रात अगर वो कुछ कहे और तेरी समझ में न आए, तो मत रुकना। क्योंकि वो कभी पूरी बात नहीं कहती। वो तेरे साथ खेलती है। आज रात हमें खेलना नहीं है।"

"मीरा," मैंने कहा, "तू डर रही है।"

"बहुत," उसने कहा, बिना झिझक। "और तुझे भी डरना चाहिए। जो आदमी डरता नहीं, वो अंदर जाकर अपना नाम भूल जाता है।"

रात साढ़े सात बजे हम निकले।

आँगन से बाहर निकलते वक़्त माँ ने मेरा हाथ पकड़ा और टिफ़िन मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"ले।"

"अम्मी—"

"ले," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो कड़कपन था जिसके आगे बहस नहीं चलती। "जब लौटेगा, खाली टिफ़िन लौटाना। खाली टिफ़िन का मतलब है तू खाया। और खाया मतलब तू ज़िंदा है।"

मैंने टिफ़िन लिया।

काजल दरवाज़े तक आई। उसने मेरी कमीज़ ठीक की, कॉलर सीधा किया और फिर धीरे से बोली, "भाई, घंटी अगर कुछ कहे और तू समझ न पाए, तो उसे दोबारा मत पूछना। वो दोबारा नहीं बोलती। तू बस उसकी बात मान लेना, चाहे वो कितनी भी बेवकूफ़ लगे।"

"तूने ये किससे सीखा?"

"तेरे से," उसने कहा। "पर तू भूल गया कि तू खुद क्या सिखाता है।"

रास्ते में गुमटी पड़ती थी। शबनम आपा बाहर खड़ी थीं, हाथ में वो लोहे की चिमटी, और मेज़ पर एक काग़ज़ में लिपटी रोटी रखी थी।

"रोटी रख दी है," उन्होंने कहा, मेरी तरफ़ देखकर भी नहीं देखा। "जब लौटे, ठंडी हो जाएगी। ठंडी रोटी भी रोटी होती है, यह मत सोचना कि बेकार है।"

"आपा—"

"जा," उन्होंने कहा। "और सुन — अगर उस भवन में कोई तुझे रोके, तो उससे यह कहना कि तेरे पीछे पूरी साइकिल गली खड़ी है। ज़रूरी नहीं कि वो डरे, पर वो एक बार रुकेगा ज़रूर। और एक बार रुकना ही काफ़ी होता है।"

पीपल के पास पहुँचे तो दुबे अंकल अपनी कुर्सी पर बैठे थे, नीली शर्ट पहने, हाथ में छड़ी। उन्होंने मुझे देखा और सिर हिलाया।

"जा रहे हो?" उन्होंने पूछा।

"जी।"

"रजिस्टर लेकर आना। काग़ज़ नहीं, रजिस्टर। काग़ज़ तो हर आदमी बना सकता है। रजिस्टर में जो लिखा होता है, वो मिटाने के लिए पूरा दफ़्तर चाहिए होता है।"

"अंकल, अगर कुछ हो जाए—"

"कुछ नहीं होगा," उन्होंने कहा। "और अगर हो जाए, तो मेरी उम्र का आदमी यहाँ बैठा है, तेरे पीछे। उसका मतलब समझता है?"

"समझता हूँ।"

आठ बजे हम गली के मुँह पर पहुँचे।

रात अंधेरी नहीं थी। शहर की रोशनी आसमान में चढ़कर वापस आती है, इसलिए ऐसी रातों में सब कुछ धुँधला-धुँधला दिखता है, जैसे किसी ने पूरी गली पर पुराना कपड़ा डाल दिया हो। सड़क सूनी थी, दूर कहीं एक ट्रक का हॉर्न बजा और फिर चुप हो गया।

हम रुके।

मैंने घंटी जेब से निकाली और उसे हथेली में रखा। वो ठंडी थी, पर बर्फ जैसी नहीं — नल के पानी जैसी।

तभी मीरा ने मेरी कलाई पकड़ी।

"रुक।"

सामने, गली के मुँह से थोड़ा आगे, एक सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी।

हमने उसे पहले नहीं देखा था। वो शायद वहाँ पहले से थी, या हमारे आने से ठीक पहले आई थी। उसकी बत्तियाँ बुझी हुई थीं, पर अंदर हल्की रोशनी थी — जैसे कोई अंदर बैठकर कुछ पढ़ रहा हो।

हम साँस रोककर खड़े रहे।

फिर गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

बिना आवाज़ के। बिना हॉर्न के। बस इतना धीरे कि जैसे वो हमें दिखाना चाहती हो कि वो जा रही है, पर जल्दी में नहीं है। उसकी पिछली बत्ती लाल हुई, फिर और लाल, फिर वो मुड़ी और अंधेरे में घुल गई।

टिंकू ने साँस छोड़ी।

"वो हमें देख रही थी," उसने कहा।

"पता नहीं," मीरा ने कहा। "पर वो हमारा इंतज़ार कर रही थी, ये पक्का है।"

"कैसे?"

"क्योंकि सफ़ेद गाड़ी रात आठ बजे सूनी गली में खड़ी नहीं रहती," मीरा ने कहा। "वो यह देख रही थी कि हम आते हैं या नहीं।"

मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ।

मैंने जेब से फ़ोन निकाला और बबलू का नंबर मिलाया।

घंटी बजी। एक। दो। तीन। पाँच। आठ।

फिर वो आवाज़ आई जो मुझे पसंद नहीं — "जिस नंबर पर आपने कॉल किया है, वो अभी बंद है।"

मैंने फ़ोन जेब में रखा।

"क्या हुआ?" काजल ने पूछा।

"बबलू का फ़ोन बंद है।"

"बंद?"

"बंद।"

चारों तरफ़ चुप्पी छा गई। टिंकू ने अपना थैला कसकर पकड़ा। मीरा ने कैमरा ऊपर उठाया और उसकी लाल बत्ती जल गई, छोटी सी, जैसे अंधेरे में कोई आँख खुली हो।

"अंकुश," मीरा ने कहा, "अगर बबलू का फ़ोन बंद है तो इसका मतलब या तो वो अंदर है, या वो किसी ऐसी जगह है जहाँ फ़ोन नहीं पहुँचता, या…"

"या उसने खुद बंद कर दिया," मैंने कहा।

"ये तीसरा वाला डरावना है," काजल ने कहा।

"हाँ," मैंने कहा।

मैंने पीछे मुड़कर गली को देखा। पीपल का पेड़ अंधेरे में एक बड़े आदमी जैसा खड़ा था। दुबे अंकल की कुर्सी दिख रही थी, पर वो खुद नहीं दिख रहे थे — शायद सो गए थे या कहीं गए थे। शबनम आपा की गुमटी पर एक छोटा दीया जल रहा था, जैसे किसी ने जान-बूझकर वहाँ रखा हो, ताकि हमें लौटते वक़्त रास्ता दिखे।

मैंने गहरी साँस ली।

"सुनो," मैंने कहा। "अगर बबलू नहीं आया, तो भी हमें जाना है। सात मिनट का हिसाब हमें घंटी ने नहीं दिया, बबलू ने दिया था। और घंटी ने सिर्फ़ एक बात कही थी — सात साल पुराना हिसाब। मतलब हिसाब हमें खुद देखना है।"

"पर अगर दरवाज़ा बंद हो गया और हम अंदर फँसे रहे?" टिंकू ने कहा।

"तब तुम वही करोगे जो तुमने पूरी रात सोचा है," मैंने कहा। "डोर खिड़की से लटकाओगे और शोर मचाओगे।"

वो थोड़ा सीधा खड़ा हो गया।

मैं आगे बढ़ा ही था कि टिंकू ने मेरी बाँह पकड़ी।

उसकी पकड़ में कुछ था — न डर, न उत्साह, कुछ और। जैसे उसे कुछ दिखा हो और वो अपनी आँखों पर भरोसा न कर रहा हो।

"उस्ताद," उसने दबी आवाज़ में कहा।

"क्या?"

"वहाँ देखिए।"

हम सब उसकी उँगली की तरफ़ देखने लगे।

दूर, नई बस्ती की तरफ़, जहाँ भवन stood — नहीं, जहाँ भवन खड़ा था — वहाँ अंधेरे में एक इमारत का आकार दिख रहा था, जैसे कोई बड़ा जानवर सो रहा हो। बाकी सब खिड़कियाँ काली थीं।

सिवाय एक के।

तीसरी मंज़िल पर, बाईं तरफ़, आख़िरी खिड़की में रोशनी जल रही थी। पीली, धीमी, हिलती हुई — जैसे मोमबत्ती हो या कोई पुराना बल्ब जो बार-बार बुझने को हो।

टिंकू ने वो देखा और फिर मेरी तरफ़ देखा।

"तीसरी मंज़िल," उसने कहा। "वही मंज़िल।"

मेरी जेब में घंटी अचानक गरम हो गई।

बहुत गरम।

जैसे किसी ने उसे आग पर रख दिया हो।

और फिर मैंने सुना — बहुत धीमी, बहुत छोटी आवाज़ में, ऐसी आवाज़ जो पहले कभी नहीं सुनी थी, जैसे उस घंटी से नहीं, उसके पीछे किसी दूसरी चीज़ से आ रही हो —

"अब दो हाथ नहीं।"

मैं रुका।

"तीन।"

हवा चल रही थी, पर पीपल का पत्ता भी नहीं हिला।

और मैं वहीं खड़ा रहा, हाथ जेब में, घंटी की गरमाहट उँगलियों में उतरती हुई, और सामने वो छोटी पीली खिड़की जल रही थी — बिल्कुल वैसे ही, जैसे कोई अंदर बैठा हो, हमारा इंतज़ार कर रहा हो, और यह जानता हो कि हम देर नहीं करेंगे।

॥

मैंने हाथ जेब से बाहर निकाला। घंटी की गरमाहट उँगलियों पर चिपकी रह गई, जैसे किसी ने उसे छुआ हो और छोड़ा न हो।

“तीन?” काजल ने धीरे से दोहराया। “तीन हाथ? मतलब?”

“मतलब दो नहीं, तीन जने अंदर जाएँगे,” मैंने कहा।

“कौन तीन?”

“यही तो सवाल है।”

मीरा ने कैमरा नीचे किया। “मैं एक हूँ। तुम दो।”

“मैं नहीं,” काजल ने कहा। “मैं सीढ़ी पर रहूँगी। कोई आए तो आवाज़ दे दूँगी।”

“काजल…”

“अंकुश, मैं बहस नहीं कर रही। माँ ने तुझे जाने दिया है, मुझे नहीं। मैं चुपचाप साथ आई हूँ। मैं सीढ़ी से ऊपर नहीं जाऊँगी। पर मैं यहाँ भी नहीं रुकूँगी।”

मैंने उसकी तरफ़ देखा। अंधेरे में उसका चेहरा आधा दिख रहा था, आधा नहीं। पर आवाज़ में वो कड़कपन था जो माँ से आया है, पापा से नहीं।

“ठीक है,” मैंने कहा। “तू सीढ़ी के नीचे रहेगी। दरवाज़े के अंदर, बाहर नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि बाहर सफ़ेद गाड़ी घूम रही है और अंदर सीढ़ी एक ही है।”

वो एक पल चुप रही, फिर सिर हिलाया।

टिंकू ने अपना थैला सीने से लगाया हुआ था, जैसे उसमें कोई जानवर बैठा हो और उसे गर्मी लग रही हो।

“और मैं?” उसने पूछा।

“तू नुक्कड़ पर,” मैंने कहा। “जहाँ हमने कहा था। सात मिनट। अगर हम सात मिनट में न आएँ, तू शबनम आपा को बताएगा और फिर दुबे अंकल के पास जाएगा। समझा?”

“उस्ताद, मैं…”

“टिंकू।”

“हाँ उस्ताद।”

“तीसरा हाथ तू नहीं है। तू चौथा है। चौथा सबसे ज़रूरी होता है। जो बाहर खड़ा रहता है, वही सबको बचाता है।”

उसने कुछ कहना चाहा, फिर रुक गया और सिर हिला दिया। मुझे पता था वो नाराज़ है। पर मुझे यह भी पता था कि वो नुक्कड़ पर खड़ा रहेगा, चाहे बारिश आए या आग।

हम चले।

गली का मुँह पीछे छूट गया। पीपल की छाया छूट गई। शबनम आपा का दीया छूट गया। नई बस्ती की सड़क शुरू हुई, जिस पर रात में भी एक अजीब सी चमक रहती है — नीली, ठंडी, जैसे चाँद नीचे उतर आया हो और सड़क पर पड़ा हो।

भवन दूर से एक सोए हुए जानवर जैसा दिख रहा था। जितने पास आते गए, उतना बड़ा होता गया।

हम भवन के सामने वाले रास्ते से नहीं गए। हम बाईं तरफ़ से मुड़े, जहाँ कचरे के दो बड़े डिब्बे दीवार से सटे खड़े थे। उनके पीछे से एक पतली गली अंदर जाती थी, जिसमें रोशनी नहीं थी — सिर्फ़ ऊपर की मंज़िलों से गिरती हुई हल्की पीली आभा।

गली के आख़िर में लोहे की सीढ़ी थी।

और सीढ़ी के नीचे, दीवार से टिककर, एक आदमी खड़ा था।

मैंने मीरा की कलाई पकड़ी। वो रुक गई।

“देखा?” मैंने फुसफुसाया।

“देखा।”

“कौन है?”

“पता नहीं। पर हिल नहीं रहा।”

वो आदमी हिला नहीं। सिर्फ़ इतना किया कि उसने अपना हाथ उठाया और हमें इशारा किया — आओ।

मैंने आगे बढ़कर देखा।

बबलू पांडे था।

वही मोटा शरीर, वही चमकती चेन, वही पानदान जेब में। पर आज कुछ अलग था। उसकी चेन उल्टी लटक रही थी, जैसे उसने जल्दी में पहनी हो। और उसके हाथ में एक कार्ड था — पुराना, प्लास्टिक की परत उखड़ी हुई, कोने मुड़े हुए। भारद्वाज कंस्ट्रक्शन का पुराना पहचान कार्ड।

“तुम लोग देर कर दी,” उसने कहा। आवाज़ में वो रौब नहीं था जो गुमटी पर होता है। सिर्फ़ थकान थी, और उसके नीचे कुछ और।

“बबलू भाई,” मैंने कहा, “तुम्हारा फ़ोन बंद था।”

“जानता हूँ।”

“क्यों?”

“क्योंकि मैंने बंद किया।”

वो एक कदम आगे आया। उसके जूतों में पान की पीक लगी थी, और तलवे कच्ची मिट्टी से भरे थे, जैसे वो कहीं और से आकर सीधे यहाँ पहुँचा हो।

“सुनो अंकुश,” उसने कहा। उसने पहली बार मुझे नाम से पुकारा, बिना ताना मारे। “मैं तुम्हें ऊपर ले जाऊँगा। पर तीन बातें पहले।”

“बोलो।”

“एक — जो मैं नहीं जानता, वो मुझसे मत पूछना। मैं सिर्फ़ रास्ता जानता हूँ, राज़ नहीं। दो — मैं अंदर तुम्हारे साथ रहूँगा, पर जो अलमारी खुलेगी, उसमें से मैं कुछ नहीं लूँगा। और तीन —”

वो रुका। उसने पान निकाला, मुँह में डाला, फिर बिना चबाए बोला।

“तीन — अगर मैं पीछे देखूँ और तुमसे कहूँ भागो, तो बिना सवाल भागना। चाहे तुम्हारे हाथ में कुछ भी हो। चाहे वो चीज़ तुम्हारी जान जितनी प्यारी हो।”

मैंने उसकी आँखों में देखा। अंधेरे में भी वो साफ़ थीं। और उनमें डर था। असली डर। वो डर जो आदमी को बोलने से नहीं रोकता, चलने से रोकता है।

“मंज़ूर,” मैंने कहा।

सीढ़ी लोहे की थी और उसकी हर सीढ़ी अलग आवाज़ करती थी। पहली — धीमी, जैसे कोई साँस ले रहा हो। दूसरी — तेज़, जैसे कोई खाँस रहा हो। तीसरी — चटक, जैसे कुछ टूट गया हो।

बबलू आगे चला। मैं उसके पीछे। मीरा मेरे पीछे। काजल सबसे नीचे, अंधेरे में, जहाँ से वो सिर्फ़ एक आकृति जैसी दिख रही थी।

बबलू हर चौथी सीढ़ी पर पीछे देखता। मैंने गिनना शुरू किया। पहली मंज़िल — एक पूरा गलियारा, बंद दरवाज़े, दीवार पर कोई पुराना पोस्टर जो फट गया था। दूसरी मंज़िल — एक लंबी खिड़की जिससे बाहर का अंधेरा अंदर झाँक रहा था। तीसरी — सीढ़ी खत्म।

दरवाज़ा खुला था।

आधा खुला, आधा बंद। बीच में एक हाथ जितनी दरार, जिसमें से पीली रोशनी निकल रही थी — वही रोशनी जो हमने नीचे से देखी थी।

बबलू ने हाथ से इशारा किया। हम रुके।

उसने दरवाज़े पर धीरे से हाथ रखा, फिर धक्का दिया। दरवाज़ा खुला, बिना आवाज़ के। उसके कब्ज़ों में तेल लगा था। किसी ने हाल में लगाया था।

कमरा बड़ा था। बहुत बड़ा नहीं, पर बड़ा। एक मेज़, दो कुर्सियाँ, एक टूटा पंखा छत से लटका हुआ, और दीवार पर कीलों से टँगा एक काग़ज़, जिस पर कोई तस्वीर छपी थी।

और कमरे की सबसे दूर वाली दीवार के साथ, पूरी ऊँचाई तक, लोहे की एक बड़ी अलमारी खड़ी थी।

उस पर ज़ंग के फूल उगे हुए थे। दो पाट, बीच में एक मोटा ताला। और ताले पर धूल की मोटी परत — सिवाय एक जगह के, जहाँ किसी ने उँगली फेरी थी।

“यही है?” मीरा ने फुसफुसाकर पूछा।

बबलू ने सिर हिलाया।

“तुम बाहर रुको,” मैंने उससे कहा।

“क्यों?”

“क्योंकि तुमने कहा था — कुछ नहीं लूँगा। और मैं चाहता हूँ कि तुम वो वादा निभाओ। दरवाज़े पर खड़े रहो। अगर सीढ़ी से कोई आवाज़ आए, खाँस देना।”

वो कुछ कहता, फिर रुक गया, और दरवाज़े की तरफ़ मुड़ गया।

मैं अलमारी के पास गया।

कदम धीरे रखे — फिर भी फर्श पर धूल की चादर में मेरे जूतों के निशान बनते गए। कमरे में एक गंध थी। बंद कमरे की गंध। पर उसके नीचे कुछ और भी था — जला हुआ काग़ज़, थोड़ा-सा, जैसे बहुत पहले यहाँ कुछ जला हो और उसकी गंध दीवारों में बैठ गई हो।

मैंने ताले को छुआ।

बड़ा ताला था। भारी। मोटी धातु, जिस पर ज़ंग हरी परत जमा चुकी थी।

“मंसूर चाचा का बनाया हुआ लगता है,” मैंने धीरे से कहा।

“क्यों?”

“देखो निशान। दो लकीरें और बीच में बिंदु। वही निशान जो चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर था। वही जो घंटी के छल्ले पर है।”

मीरा ने कैमरा ऊपर उठाया और ताले की तस्वीर ली।

“खोलो,” उसने कहा।

मैंने अपनी गले की चाबी निकाली। फिर याद आया — यह उस ताले की नहीं है। मैंने जेब से वो बड़ी पीतल की चाबी निकाली जो ब्याहता की संदूकची के नीचे से मिली थी, और उसे ताले में डाला।

वो अंदर गई। आधी तक गई, फिर रुक गई।

“नहीं,” मैंने कहा। “यह भी नहीं।”

मीरा ने कुछ कहा नहीं।

मैंने अलमारी के दोनों पाटों को पकड़ा और खींचा।

वो खुले।

आसानी से खुले। इतनी आसानी से कि मुझे लगा जैसे अलमारी खुद इंतज़ार कर रही थी। उसका कोई ताला नहीं था और वो अंदर से खुली पड़ी थी।

और अंदर कुछ नहीं था।

कुछ नहीं।

सिर्फ़ खाली शेल्फ़। चार शेल्फ़ें, ऊपर से नीचे तक, और हर शेल्फ़ पर धूल की मोटी परत। और उस धूल के बीच, नीचे की शेल्फ़ पर, एक चौकोर साफ़ जगह — जितनी बड़ी किसी मोटे रजिस्टर की हो सकती है।

मैं वहीं खड़ा रह गया। हाथ अलमारी के दरवाज़े पर, आँखें उस चौकोर निशान पर।

“क्या हुआ?” मीरा ने पूछा।

“खाली है,” मैंने कहा। आवाज़ मेरी अपनी नहीं लगी। “पूरी खाली है।”

“क्या मतलब खाली?”

“मतलब कोई रजिस्टर यहाँ नहीं है।”

वो पास आई और अंदर झाँका। उसका चेहरा बदल गया।

“पर धूल का निशान…”

“हाँ। रजिस्टर यहाँ था। महीनों, बरसों यहाँ रहा। और अब नहीं है।”

“कब निकला?”

मैंने नीचे झुककर देखा। चौकोर निशान के किनारे धूल टूटी हुई थी, और उस टूटी धूल में उँगलियों के निशान थे। मैंने अपनी उँगली उन पर रखी। निशान मेरे निशान से बड़े थे। मोटे हाथ के।

“हाल में निकला है,” मैंने कहा। “बहुत हाल में। शायद आज। शायद आज शाम।”

“शाम को?”

“वो रोशनी,” मैंने कहा। “जो हमने नीचे से देखी। यह रोशनी नहीं थी। यह कोई था। कोई यहाँ रोशनी लेकर बैठा था और उसने रजिस्टर निकाला।”

मीरा ने कैमरा उठाया और खाली शेल्फ़ की तस्वीर ली। फिर उसने मुझे देखा।

“अंकुश, अगर रजिस्टर यहाँ नहीं है, तो हम यहाँ क्यों आए हैं?”

“क्योंकि घंटी ने कहा था ऊपर।”

“घंटी गलत भी हो सकती है।”

“नहीं,” मैंने कहा। धीरे से, पर पक्का। “घंटी गलत नहीं होती। वो अधूरी होती है। बस।”

और तभी — टिंकू। नहीं, टिंकू नीचे था। यह टिंकू नहीं था।

काजल नहीं थी।

यह छींक थी — छोटी, दबी हुई, सीढ़ी की तरफ़ से नहीं, बल्कि कमरे के पीछे से, पर्दे के पीछे से, जहाँ कोई परदा तो नहीं था पर अंधेरा इतना घना था कि परदे जैसा लगता था।

हम तीनों जम गए।

मीरा ने कैमरा नीचे किया। बबलू दरवाज़े से हमारी तरफ़ घूमा। मैंने घंटी जेब में कसकर पकड़ ली — वो अब भी गरम थी, पर अलग तरह से, जैसे साँस ले रही हो।

छींक फिर आई। इस बार साफ़।

कमरे के बाएँ कोने से, जहाँ अलमारी की छाया थी, कोई उठा।

छोटा कद। दुबला। घुटने पर पट्टी।

मैंने आँखें सिकोड़ीं।

“टिंकू?” मैंने कहा। “तू यहाँ क्या कर रहा है? मैंने कहा था नुक्कड़ पर!”

वो सामने आया। उसके हाथ में जासूसी किट थी और चेहरे पर वो हालत जो बच्चों के चेहरे पर होती है जब वो जानते हैं कि उन्होंने गलती की है और वो भी जानते हैं कि वो गलती क्यों की।

“उस्ताद, मैं रुका था। सच में रुका था। पर फिर मैंने देखा कि सीढ़ी पर कोई चढ़ रहा है। सीढ़ी के पीछे एक और सीढ़ी है — लोहे की, बाहर, दीवार से सटी हुई। मैं उससे आया।”

“तूने क्यों?”

“क्योंकि मुझे लगा कि अगर तीन हाथ नहीं, चौथा भी चाहिए। मैंने सोचा, चौथा मैं हो सकता हूँ।”

मैंने गुस्से से देखा। फिर मेरी गुस्सा ढीली पड़ गई। क्योंकि उसके जूतों पर धूल थी, और उसकी आँखें वैसी थीं जैसी मेरी होती हैं जब मैं पापा से कोई सच छिपाता हूँ।

“बाद में बात करूँगा,” मैंने कहा। “अभी चुप रह।”

उसने सिर हिलाया और पीछे हट गया।

मैं अलमारी की तरफ़ लौटा। और तभी मेरी नज़र दीवार पर टँगी उस तस्वीर पर पड़ी जो मैंने पहले देखी थी — कीलों पर टँगा काग़ज़, जिस पर कोई चेहरा था।

मैं पास गया।

तस्वीर पुरानी थी। रंग उड़ चुके थे। एक आदमी था — लंबा, साफ़ कटे बाल, हाथ जोड़े हुए।

रणवीर भारद्वाज।

पर यह वो रणवीर नहीं था जिसे मैं जानता हूँ। यह जवान था। बहुत जवान। जैसे बीस साल पहले का।

और वो कहाँ खड़ा था?

एक साइकिल मरम्मत की दुकान के सामने।

मेरी दुकान के सामने।

पर यह मेरी दुकान नहीं थी। मेरी दुकान पीतल से बनी है, रंग उतरा हुआ है, और बोर्ड टेढ़ा टँगा है। इस तस्वीर में दुकान वैसी ही थी — टेढ़ा बोर्ड, एक ही खिड़की, बाहर रखी एक साइकिल, और दरवाज़े के पीछे कोई बैठा था जो दिख नहीं रहा था।

मेरा दिल ज़ोर से धड़का।

“मीरा,” मैंने कहा। आवाज़ फटी हुई निकली।

वो आई।

“यह देख।”

उसने देखा।

“अंकुश यह…”

“यह मेरी दुकान है।”

“क्या?”

“यह मेरी दुकान है। यही बोर्ड। यही टेढ़ा कोना। यही खिड़की।”

मीरा ने कैमरा उठाया और दीवार पर टँगी तस्वीर की फोटो ली।

और तभी मैंने देखा — रणवीर के गले में।

गोल ताबीज़। पीतल का। वही जो आज उसके गले में है और उस रात मंच के पीछे अंधेरे में कोयले जैसा चमका था।

“यह वही ताबीज़ है,” मैंने कहा।

“क्या?”

“वही।” मैंने मीरा का हाथ पकड़ा और तस्वीर के पास ले गया। “देख। गोल। बीच में बिंदु। किनारा मोटा। यह वही है।”

मीरा कुछ नहीं बोली। उसने सिर्फ़ कैमरा बंद किया और मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो डर था जो पहले सिर्फ़ एक बार आया था — उस रात, मशीन के पीछे वाले आदमी को देखकर।

मैंने तस्वीर को ध्यान से देखा।

फिर मैंने उसे उतारा।

उसका पीछे का हिस्सा मैला था। काग़ज़ पुराना था, किनारों से पीला पड़ा हुआ था। और उस पर कुछ लिखा था — पेंसिल से, हल्का, घिसा हुआ, जैसे किसी ने लिखा हो और फिर मिटाने की कोशिश की हो।

मैंने आँखें सिकोड़ीं।

“शंकरलाल,” मैंने पढ़ा।

मेरी साँस रुकी।

“क्या?” मीरा ने कहा।

“शंकरलाल,” मैंने दोहराया। “इसके नीचे कुछ और है।”

मैंने करीब ले जाकर देखा।

“भारद्वाज,” मैंने धीरे से कहा।

कमरे में सन्नाटा था। इतना कि मुझे अपनी धड़कन सुनाई दे रही थी।

“शंकरलाल भारद्वाज?” मीरा ने कहा।

“नहीं,” मैंने कहा। “शंकरलाल — और भारद्वाज। दो अलग नाम। दो अलग हाथों से लिखे। ऊपर वाला पुराना, नीचे वाला नया।”

“मतलब?”

“मतलब किसी ने शंकरलाल लिखा। फिर किसी और ने नीचे भारद्वाज जोड़ा। जैसे कोई कह रहा हो — यह मेरा है।”

मेरे मुँह से आवाज़ निकली नहीं।

शंकरलाल।

वही नाम जो पेचकस के हत्थे में मिला था। वही नाम जो तस्वीर के पीछे था। वही नाम जिसे पापा नहीं बोलते। वही नाम जो दादा जगदीश यादव के बड़े भाई का था।

और रणवीर।

वही रणवीर जो आज यहाँ का मालिक बना बैठा है, जो कंबल बाँटता है, जो मुस्कुराता है, जिसकी तस्वीर हर दीवार पर है।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा।

“मीरा, यह तस्वीर इस अलमारी के पीछे चिपकी है।”

“हाँ।”

“अलमारी खाली है।”

“हाँ।”

“तो कोई इसे देख नहीं सकता था। मतलब यह जान-बूझकर छिपाई गई।”

“हाँ।”

“तो यह सिर्फ़ तस्वीर नहीं है। यह सबूत है।”

उसने कैमरा उठाया।

“मैं इसे ले जा रही हूँ,” उसने कहा।

“नहीं,” मैंने कहा। “तू इसे यहीं लेकर फोटो खींच। फिर मैं इसे जेब में रखूँगा। अगर हम अलग हो जाएँ, तो…”

“तो क्या?”

“तो यह तेरे पास रहना चाहिए। तेरा चैनल है, तेरी आवाज़ है। मेरी जेब में यह सिर्फ़ काग़ज़ है। तेरी जेब में यह खबर है।”

उसने मेरी तरफ़ देखा। एक पल के लिए उसकी आँखें भीगी।

“ठीक है,” उसने कहा।

उसने फोटो ली। फिर तस्वीर मेरी तरफ़ बढ़ाई।

मैंने उसे मोड़कर जेब में रखा।

और तभी —

सीढ़ी से आवाज़ आई।

जूतों की आवाज़।

भारी जूते। लकड़ी के नहीं। लोहे के। धातु के। जैसे किसी ने जान-बूझकर ज़मीन पर ज़ोर से पैर रखा हो, ताकि सुनने वाला सुन ले।

एक। दो। तीन।

बबलू की आवाज़ आई — बहुत दबी, बहुत डरी हुई।

“अंकुश,” उसने कहा। “भागो।”

मैंने हाथ जेब में डाला।

घंटी बर्फ़ जैसी ठंडी थी।

इतनी ठंडी कि मेरी उँगलियाँ सुन्न हो गईं। जैसे मैंने उसे नहीं छुआ, जैसे किसी और ने उसे छुआ और मेरे हाथ तक ठंड भेज दी।

“भागो!” बबलू ने इस बार ज़ोर से कहा।

टिंकू ने पीछे देखा। मीरा ने कैमरा सीने से लगाया।

मैंने आख़िरी बार उस खाली अलमारी को देखा, उस चौकोर निशान को, और तस्वीर की उस जगह को जहाँ से मैंने उसे उतारा था — अब वहाँ सिर्फ़ चार कीलें थीं, खाली, जैसे किसी ने बहुत पहले ही उम्मीद छोड़ दी हो।

“सीढ़ी नहीं,” मैंने कहा।

“क्या?” मीरा ने कहा।

“सीढ़ी पर वो है। पीछे वाली सीढ़ी। वहाँ से आया है टिंकू। वहाँ से हम भी जाएँगे।”

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।

“तू जानता है रास्ता?”

“हाँ उस्ताद।”

“तो चल।”

हम पीछे की तरफ़ भागे। टिंकू आगे, मैं पीछे, मीरा बीच में। कोने से मुड़ते वक़्त मैंने पीछे देखा — बबलू अभी भी दरवाज़े पर खड़ा था, हाथ में पुराना पहचान कार्ड, मुँह में पान, और उसकी आँखों में वो डर था जो मैंने पहले कभी किसी ठग की आँखों में नहीं देखा था।

“बबलू!” मैंने कहा।

“जाओ,” उसने कहा। “मैं रोकता हूँ।”

“तुम…”

“जाओ अंकुश। यह मेरा हिसाब है। मैंने यह कर्ज़ खुद लिया था।”

और फिर भारी जूतों की आवाज़ दरवाज़े के ठीक बाहर रुकी, और कमरे की हवा एक पल के लिए रुक गई, जैसे पूरी इमारत ने साँस लेना बंद कर दिया हो।

॥

दरवाज़े के बाहर जूते रुके। फिर एक आवाज़ आई — धीमी, हकलाती, जैसे किसी ने बहुत देर रोने के बाद पहला शब्द निकाला हो।

"अंकुश भैया?"

मैंने साँस रोक ली।

"अंकुश भैया, मैं हूँ… भोला।"

बबलू ने पहले मेरी तरफ़ देखा, फिर दरवाज़े की तरफ़। उसका पान चबाना बंद हो गया था। उसने कुछ कहना चाहा, पर सिर्फ़ होंठ हिले, आवाज़ नहीं निकली।

दरवाज़े के फ्रेम में एक आदमी दिखा। खाकी कमीज़, आधी आस्तीन फटी हुई, कंधे पर टेप से बँधी पुरानी टॉर्च, और पैरों में वो मोटे जूते जिनकी नोक पर लोहा लगा था।

वही जूते। वही आवाज़।

मैं हँस पड़ा — नहीं, हँसना नहीं था, पर डर जब हद से ज़्यादा हो जाता है तो आदमी हँसता है। मेरा गला सूखा था, आवाज़ कर्कश निकली।

"अरे भोला भाई… तू है?"

वह अंदर आया, पर आधा कदम ही। जैसे दहलीज़ पर खड़ा आदमी कह रहा हो कि मैं अंदर नहीं, बाहर हूँ, मुझे गिनो मत।

टॉर्च उसके हाथ में काँप रही थी। उसकी रोशनी मेरे चेहरे से फिसलकर दीवार पर पड़ी, जहाँ चार खाली कीलें थीं।

"भैया, मुझे माफ़ कर दो," उसने कहा। "मैं जानता हूँ तुम यहाँ हो। मैं सीढ़ी चढ़ते वक़्त सुन रहा था। मुझे साहब ने कहा था कि आज रात कोई नहीं आएगा, तो अगर कोई आए तो बता देना। और मैंने… मैंने नहीं बताया।"

बबलू ने एक कदम आगे बढ़कर उसका कंधा पकड़ा।

"तू क्या कर रहा है भोला?" बबलू की आवाज़ दबी थी, पर उसमें वो गुस्सा था जो डर से पैदा होता है। "तुझे पता है साहब क्या करेंगे?"

"जानता हूँ," भोला ने कहा। "और साहब ने जो करना था, वो कर दिया बबलू भाई। शाम सात बजे।"

कमरा चुप हो गया।

"क्या कहा?" मैंने पूछा।

"नौकरी से निकाल दिया।" भोला ने टॉर्च नीचे की। "कहा — तेरा काम खत्म। दो सौ रुपये गिनकर हाथ में रखे, टॉर्च वापस माँगी, कहा चौकी की चाबी रख और निकल जा। ग्यारह साल, भैया। ग्यारह साल इस दरवाज़े पर खड़ा रहा, एक बार भी किसी की चीज़ नहीं छुई, और आज वो कह रहे हैं कि मैंने कुछ किया है।"

"क्या किया?" मीरा ने पूछा। उसने कैमरा नीचे कर लिया था, पर उँगली बटन पर थी।

"मैंने कुछ नहीं किया," भोला ने कहा। "मैंने बस एक बात से इनकार किया। साहब ने कहा था — कल सुबह जब सर्वे की टीम आए, तो तुम गवाही देना कि इस भवन की ज़मीन पर पहले कोई झोपड़ी नहीं थी। बस इतना। एक लाइन। और मैंने कह दिया — साहब, यहाँ झोपड़ी थी। मेरे पापा के ज़माने की। मैं झूठ नहीं बोल सकता।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

भोला की उम्र पचास के आसपास थी। दुबला, पसली दिखती हुई, गाल धँसे हुए। कमीज़ की जेब पर एक पुराना धब्बा था — चाय का, या दवा का। उसकी आँखों में वो डर था जो आदमी को छोटा नहीं करता, जो आदमी को इंसान बनाता है।

"तेरी बच्ची?" मैंने पूछा।

उसका मुँह खुला रह गया।

"तू… तुझे याद है?"

"आरज़ू," मैंने कहा। "आठ साल की। जिसे रात में दौरे पड़ते हैं। तू उसे दो महीने पहले दुकान पर लाया था, साइकिल के पीछे बैठाकर, क्योंकि उस दिन वो ठीक थी और तू उसे बाहर घुमाना चाहता था। और मैंने उसकी साइकिल की घंटी ठीक की थी, और तूने दस रुपये दिए थे, और मैंने नहीं लिए थे।"

भोला की आँखें भर आईं।

"तूने नहीं लिए थे," उसने कहा। "और उस रात आरज़ू ने कहा था — भैया की दुकान की घंटी सबसे अच्छी बजती है।"

मेरा गला भर गया। तुम सोच रहे होगे कि ये सब कहाँ जा रहा है, इतनी जल्दी में ये पुरानी बातें क्यों। तो सुनो — यही वजह है कि भोला आज रात यहाँ खड़ा था। डर के मारे नहीं। दवा के लिए।

"आरज़ू की दवा भवन के दवाखाने से आती थी," भोला ने कहा। "साहब के ट्रस्ट का मुफ़्त इलाज। हर महीने की पहली तारीख़ को दो पत्ते मिलते थे, बिल्कुल मुफ़्त। जिस दिन नौकरी गई, उसी शाम दवा की खिड़की पर लड़का बोला — तुम्हारा नाम कट गया। मैंने कहा, दवा बंद नहीं हो सकती, बच्ची को दौरे पड़ते हैं। वो बोला — साहब का हुक्म है।"

मीरा ने एक लंबी साँस ली।

"कितने दिन की दवा बची है?" उसने पूछा।

"आज रात की।" भोला ने होंठ काटे। "कल सुबह की नहीं है।"

फिर उसने अपनी जेब में हाथ डाला।

उसका हाथ काँप रहा था। वो हाथ जो ग्यारह साल टॉर्च पकड़ता रहा, जो कभी किसी चीज़ पर नहीं काँपा, आज काँप रहा था।

"मेरे पास यह है," उसने कहा। "और मैं जानता हूँ, यह मेरे पास नहीं होना चाहिए। पर मैं झूठ नहीं बोलूँगा। मुझे बस मेरी बच्ची की दवा चाहिए।"

उसने मेरी तरफ़ एक चीज़ बढ़ाई।

फटा हुआ खाता। मोटा, भूरे रंग की जिल्द वाला, बीच से आधा फटा, और किनारों से जला हुआ। जलने की गंध अब भी उसमें बसी थी — वो गंध जो किसी काग़ज़ को आग से बचाकर दूर रखने पर भी नहीं जाती।

मैंने उसे दोनों हाथों से पकड़ा।

पन्ने खुरदुरे थे, जैसे पानी में भीगकर सूखे हों। ऊपर के पन्ने पीले पड़ चुके थे, कुछ पर नीली स्याही उड़ गई थी, कुछ पर मोटी काली लकीरें खिंची थीं।

मैंने पहला पन्ना पलटा।

खाने। नाम। रकम। तारीख़। सब हाथ से लिखा, किसी पुराने मुनीम की तरह, सीधी लकीरों में।

दूसरा पन्ना। वही। नाम, रकम, नीचे अंगूठे का निशान।

तीसरा पन्ना आधा जला था। उसका ऊपरी कोना गायब था, और नीचे का कोना मुड़ा हुआ था, जैसे किसी ने आग बुझाते वक़्त उसे मुट्ठी में दबाया हो।

और उस पन्ने के बीच में, एक खाने में, नीली स्याही से लिखा था।

शंकर यादव।

नीचे तारीख़ थी — पाँच साल पहले की। और उसके नीचे, लाल स्याही का अंगूठा। आधा जल चुका था, पर उसका निचला हिस्सा बचा था — वो चपटा किनारा, वो घिसा हुआ मोड़, जो मैंने इक्यावन बार देखा था, हर महीने की पहली तारीख़ को, पापा के हाथ में।

मेरे हाथ काँपने लगे।

"अंकुश?" मीरा ने कहा।

मैंने जवाब नहीं दिया। मैं उस अंगूठे को देख रहा था। आदमी का अंगूठा उसकी आवाज़ जैसा होता है — हर आदमी की आवाज़ अलग, हर आदमी का अंगूठा अलग। पापा के अंगूठे का बायाँ किनारा थोड़ा टेढ़ा चलता है, क्योंकि उन्होंने जवानी में एक बार औज़ार से उँगली काट ली थी।

वो टेढ़ापन वहाँ था।

काग़ज़ पर।

लाल स्याही में।

मैंने खाते को दोनों हाथों से सीने से लगा लिया। पीछे से टिंकू की आवाज़ आई।

"उस्ताद?"

"रुक," मैंने कहा। "ज़रा रुक।"

और मैं बैठ गया — वहीं फ़र्श पर, चार खाली कीलों वाली दीवार के नीचे, उस अलमारी के सामने जो खाली थी।

मीरा मेरे पास बैठ गई। उसने कुछ नहीं पूछा। उसने सिर्फ़ खाते की तरफ़ देखा और फिर मेरी तरफ़, और मैंने उसकी आँखों में वो बात देखी जो आज तक किसी ने मेरे लिए नहीं देखी थी — वो मुझ पर तरस नहीं खा रही थी, वो मुझसे कह रही थी कि मैं तेरे साथ हूँ।

"यही है," मैंने कहा। "यही वो काग़ज़ है जो उसने पाँच साल पहले अंगूठे के नीचे रखा था।"

"पर यह वो काग़ज़ नहीं है," मीरा ने धीरे से कहा। "यह खाता है। इसमें और भी नाम हैं।"

मैंने पन्ना उलटा।

और मुझे वो मिला जो मुझे उम्मीद नहीं थी।

एक लंबी सूची। नाम, और हर नाम के आगे रकम, और हर रकम के आगे एक शब्द।

किशनलाल — चना — भरा हुआ।

नसीमा बाई — आटा — भरा हुआ।

भोला प्रसाद — चौकीदारी — बाक़ी।

रमेश भाई — नल — भरा हुआ।

उस्ताद अली बक्श — सिलाई — भरा हुआ।

मेरे पापा का नाम उसी सूची में था, और उनके आगे लिखा था — दुकान सात — बाक़ी।

"बाक़ी," मैंने ज़ोर से पढ़ा। "मतलब?"

भोला ने हाथ जोड़ लिए।

"मैं सच बोलूँगा भैया। यह खाता उनका नहीं है जो दुकान में बैठता है। यह उनका है जो मेज़ के पीछे बैठकर काग़ज़ बनाता है। और यह सूची उन लोगों की है जिन्हें बताया गया कि तुम्हारा हिसाब चुक गया, जबकि सच यह है कि तुम्हारा हिसाब उन्होंने कभी चुकाया ही नहीं।"

मीरा ने कैमरा उठाया।

"भोला भाई, एक बात साफ़ बताओ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो कड़कपन आ गया जो उसके चैनल पर लोग सुनते हैं। "यह खाता तुम्हारे पास कैसे आया?"

वह कुछ देर चुप रहा।

"मैं ग्यारह साल से उस कमरे में सफ़ाई करता हूँ जहाँ मुंशी बैठते हैं," उसने कहा। "नौ बजे के बाद, जब सब जाते हैं, मैं झाड़ू लगाता हूँ। एक साल पहले एक रात काग़ज़ जल रहे थे — कमरे के पीछे, लोहे के डिब्बे में। कोई जल्दी में था। मैंने दो पन्ने निकाल लिए, क्योंकि जलता काग़ज़ देखकर मुझसे रहा नहीं गया। मैंने सोचा, किसी का हिसाब होगा, किसी की मेहनत होगी। और यह… यह मैंने अपनी जेब में रख लिया।"

"और आज तक किसी को नहीं दिखाया?" मीरा ने पूछा।

"किसको दिखाता?" भोला ने कहा। "थाने में? जिसके पास यह काग़ज़ पहुँचता, वो अगले दिन साहब के दफ़्तर में बैठा होता। मेरे पास बच्ची है। मैंने सोचा, चुप रहूँगा, नौकरी बची रहेगी, दवा चलती रहेगी।"

"और आज?" मैंने पूछा।

"आज नौकरी गई, दवा गई।" उसकी आवाज़ टूटी। "अब मेरे पास क्या बचा है भैया? डरने के लिए कुछ नहीं बचा।"

मैं उठा।

मैंने खाता मीरा को दिया और भोला के पास गया। वह मुझसे उम्र में बड़ा था, बहुत बड़ा, और मेरी आँखों में वह छोटा हो गया था — नहीं, छोटा नहीं। थका हुआ। जैसे कोई आदमी बहुत लंबा रास्ता चलकर आया हो और अब उसे बैठने की जगह चाहिए।

मैंने उसका हाथ पकड़ा।

उसका हाथ खुरदुरा था, झाड़ू चलाने से, टॉर्च पकड़ने से, और उसमें एक जगह मोटी गाँठ थी।

"भोला भाई," मैंने कहा। "डरो मत।"

वह मेरी तरफ़ देखने लगा।

"यह काग़ज़ अब सिर्फ़ तुम्हारा नहीं है," मैंने कहा। "और न ही सिर्फ़ मेरे पापा का। यह अब पूरी गली का है। इसमें जो नाम लिखे हैं, वो सब एक ही चीज़ पर बिके थे — अपना डर। और आज से कोई अपना डर नहीं बेचेगा।"

"भैया, साहब…"

"साहब कुछ नहीं करेंगे," मैंने कहा। "क्योंकि अभी उनके पास एक काग़ज़ है, और उस काग़ज़ के नीचे मेरे पापा का अंगूठा है। कल तक यह उनकी ताक़त थी। आज से यह उनका सबूत है।"

भोला की आँखों से आँसू गिरे। वह अपना हाथ छुड़ाकर अपना चेहरा छिपाने लगा, जैसे मर्द को रोना नहीं चाहिए, जैसे उम्र भर उसने यही सीखा हो।

"बच्ची की दवा?" उसने धीरे से कहा।

"कल सुबह," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो यक़ीन था जो मुझे हिम्मत देता है। "मैं जानती हूँ कौन सी दवा है। मेरी मौसी को भी वही दी जाती थी। अस्पताल के बाहर पुरानी दवा की दुकान है, सकीना बी की। वहाँ मिल जाएगी। पैसा मैं देखूँगी।"

"नहीं," भोला ने कहा। "पैसा नहीं…"

"पैसा नहीं," मैंने कहा। "हिसाब। तुमने ग्यारह साल इस भवन के लिए रातें जागकर दीं, और इन्होंने तुम्हारी बच्ची की दवा बंद कर दी। यह हिसाब है, एहसान नहीं। और हमारी गली में हिसाब हमेशा चुकाया जाता है।"

भोला ने मेरा हाथ दोनों हाथों से पकड़ा और सिर झुका लिया।

उसी वक़्त टिंकू दरवाज़े की तरफ़ भागा।

"उस्ताद!"

मैं सीधा हुआ।

"क्या?"

"सीढ़ी," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ पतली हो गई थी। "नीचे से आवाज़ आई। पर जूतों की नहीं। लोहे की। जैसे कोई गेट में ज़ंजीर डाल रहा हो।"

मीरा ने तुरंत कैमरा उठाया और खाता अपनी बगल में दबाया।

"टिंकू, दरवाज़े पर रह," मैंने कहा। "अंदर मत आना, बाहर मत जाना। दरवाज़े के फ्रेम से चिपककर खड़ा रह, और जो सुनाई दे, मुझे बता।"

"हाँ उस्ताद।"

"मीरा, तू खाते की तस्वीरें ले। हर पन्ना, दोनों तरफ़, और अंगूठे की पास से। जल्दी।"

उसने कैमरा खोला।

"फ़्लैश?" उसने पूछा।

"नहीं। फ़्लैश से दीवार पर रोशनी जाएगी, बाहर से कोई देख लेगा। भोला भाई की टॉर्च।"

भोला ने टॉर्च जलाई और मीरा के कंधे के पीछे खड़ा हो गया, हाथ ऊँचा करके, और वो काँपता हाथ अब थोड़ा कम काँप रहा था। मीरा एक-एक पन्ना उलटती गई, क्लिक-क्लिक, और कमरे में सिर्फ़ वही आवाज़ बची।

मैंने बबलू की तरफ़ देखा।

वह अब भी दरवाज़े के बाहर खड़ा था, पीठ दीवार से सटाए, हाथ में वो पुराना पहचान कार्ड। मैं उसके पास गया।

"बबलू।"

"हूँ।"

"तूने कहा था — यह मेरा हिसाब है, मैंने यह कर्ज़ खुद लिया था।"

"हाँ।"

"क्या कर्ज़?"

वह कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर उसने पान को हल्के से थूका, दीवार की तरफ़, और अपनी जेब से वो कार्ड निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।

प्लास्टिक की परत उखड़ी हुई थी। ऊपर लिखा था — भारद्वाज कंस्ट्रक्शन। और नीचे, एक पुरानी तस्वीर में, एक जवान आदमी मुस्कुरा रहा था। वह बबलू था। बहुत पतला बबलू। सोने की चेन के बिना, पान के बिना।

"बारह साल पहले," उसने कहा। "मैं इस भवन का ड्राइवर था। साहब का। रात-दिन उनके साथ। उनके जूते मैं पोंछता था, उनकी चाय मैं लाता था। और एक रात वो मुझे बिजलीघर ले गए। बोले — गाड़ी रोक। फिर अंदर गए, और जब लौटे तो उनका चेहरा सफ़ेद था। उस रात के बाद उन्होंने मुझे बाहर नहीं जाने दिया। कहा — तू अब मेरा आदमी है। तनख्वाह तीन गुना। और मैं… मैं रुक गया।"

"और अब?"

"अब मैं डरता हूँ।" उसकी आवाज़ फटी। "मुझे पता है वो कमरे में क्या था। मैंने उसे देखा है। और मैं बारह साल से रोज़ उसी आदमी की गाड़ी चलाता हूँ। अब बता, मैं क्या हूँ?"

मैंने उसका कार्ड लौटाया।

"तू वो आदमी है," मैंने कहा, "जो आज रात भागकर हमें देखने आया था। फिर भी हमें भागने को कहा।"

वह मेरी तरफ़ देखता रहा, और उसकी आँखों में कुछ टूटा।

तभी भोला ने धीमे से कहा, "भैया।"

मैं मुड़ा।

वह अभी भी टॉर्च पकड़े खड़ा था, और मीरा आख़िरी पन्ना ले रही थी।

"भैया, एक बात मैंने अब तक नहीं कही," उसने कहा। "और यह बताने पर मेरी नौकरी और नहीं जाएगी, क्योंकि नौकरी जा चुकी है।"

"बोल।"

उसने उस खाली अलमारी की तरफ़ देखा।

"असली रजिस्टर कभी इस अलमारी में रहा ही नहीं।"

कमरे में सन्नाटा छा गया। मीरा की उँगली कैमरे के बटन पर रुक गई।

"क्या कहा?" मैंने कहा।

"मैं ग्यारह साल से हर रविवार इस अलमारी को पोंछता आया हूँ।" भोला ने कहा। "इसमें कभी कुछ नहीं था। ताला तीन महीने पहले बदला गया। उससे पहले भी यही हाल था — खुली, खाली, साफ़।"

"तो यह चौकोर निशान?" मीरा ने पूछा। "धूल में यह जो चौकोर जगह बनी है?"

"तीन महीने पहले तक यहाँ एक लोहे का बक्सा रहता था," भोला ने कहा। "बंद, हैवी, धूल खींचता हुआ। साहब ने खुद उठवाया। दो आदमी लेकर आए, बोरे में डालकर नीचे ले गए।"

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

लोहे का बक्सा।

वो हर जगह लौटता है। बिजलीघर में, अस्पताल के तहखाने में, अब यहाँ।

"और असली रजिस्टर?" मैंने पूछा। "वो कहाँ है?"

भोला ने अपनी कमीज़ की गरदन से हाथ फेरा, जैसे गला घुट रहा हो।

"वो हर हफ़्ते उनके साथ जाता है," उसने कहा। "हर हफ़्ते, एक तय रात को, साहब खुद आते हैं — ड्राइवर को नीचे छोड़कर ऊपर चढ़ते हैं, मुझे दरवाज़े से हटने को कहते हैं, और करीब आधे घंटे बाद नीचे उतरते हैं। हाथ में काला कपड़े का थैला। भारी। इतना भारी कि वो सीढ़ी के पहले मोड़ पर एक बार रुककर साँस लेते हैं।"

"कहाँ ले जाते हैं?" मीरा ने पूछा।

"मुझे नहीं पता।" भोला ने सिर हिलाया। "पर एक बार… एक बार वो थैला मेरी टॉर्च की रोशनी में आ गया। उसका कोना जला हुआ था, और उससे वही गंध आ रही थी जो इस खाते से आ रही है।"

मैंने खाते की तरफ़ देखा।

मीरा ने भी देखा।

"भैया," भोला ने धीमे से कहा, "वो हर हफ़्ते एक काग़ज़ ले जाता है, और हर हफ़्ते लौटकर ज़्यादा ठंडा होता आया है। मैंने उसे देखा है। पहले वो चलते वक़्त बातें करते थे। अब सीढ़ी पर सिर्फ़ उनके जूतों की आवाज़ आती है। कोई आदमी इतना चुप कैसे हो जाता है?"

मैंने जवाब नहीं दिया।

क्योंकि मैं जानता था। मैंने उस रात उनके पीछे छाया में एक और सिर देखा था।

तभी —

अलार्म बजा।

पहले एक लंबी चीख़, जैसे किसी पुरानी मशीन का गला फट रहा हो। फिर वो चीख़ तेज़ हुई, ऊपर उठी, और पूरा भवन उसकी आवाज़ से भर गया।

मैं दीवार से चिपक गया।

टिंकू ने कानों पर हाथ रख लिए। मीरा ने कैमरा सीने से लगाया। बबलू ने "ये क्या है" कहकर दरवाज़े से अंदर झाँका।

और भोला —

भोला ने टॉर्च गिरा दी और अपना माथा दोनों हाथों से पकड़कर फ़र्श पर बैठ गया।

"नहीं," वह फुसफुसाया। "नहीं, नहीं, नहीं।"

"भोला भाई!" मैं उसके पास झुका। "क्या हुआ?"

वह मेरी तरफ़ ऐसे देखने लगा जैसे मैंने उससे कोई बहुत बड़ा सवाल पूछ लिया हो।

"भैया, ये अलार्म…" उसकी आवाज़ काँप रही थी। "ये हफ़्ते वाले दिन का अलार्म है।"

"मतलब?"

"मतलब — ये अलार्म हर हफ़्ते एक तय दिन बजता है। सिर्फ़ उसी दिन। आग के जाँच वाले बाबू का नियम है। और उस दिन…" उसने मेरी कलाई पकड़ ली, बहुत ज़ोर से, "उस दिन इस भवन में कोई नहीं आता, भैया। कोई नहीं। न मुंशी, न मज़दूर, न साहब, न गाड़ी। पूरा भवन खाली रहता है। इसीलिए साहब ने आज का दिन चुना था।"

मेरे पेट में ठंडी गाँठ बन गई।

"पर आज तो…"

"आज वो दिन नहीं है," भोला ने कहा।

दीवार पर टँगी घड़ी में सुई चल रही थी। अलार्म अभी भी चीख़ रहा था। मीरा ने धीमे से कहा, "फिर ये कौन बजा रहा है?"

मैं दरवाज़े तक गया, टिंकू के पास, और पीछे की सीढ़ी की तरफ़ झाँका।

नीचे अंधेरा था। सिर्फ़ अंधेरा।

और फिर, उस अंधेरे में, नीचे से आवाज़ आई — भारी लोहे का गेट खुलने की, फिर ज़ंजीर खिंचने की, फिर ताला बंद होने की।

किसी ने नीचे का गेट बंद कर दिया था।

अलार्म अभी भी चीख़ रहा था, और उसकी आवाज़ के नीचे से एक आदमी की आवाज़ ऊपर आई, बहुत शांत, बहुत धीमी, जैसे कोई अपने ही घर में बोल रहा हो।

"तीसरी मंज़िल। चार लोग।"

और फिर सिर्फ़ अलार्म बचा।

॥

अलार्म की चीख़ दीवारों से टकराकर लौट रही थी, जैसे पूरा भवन एक ही साँस में चिल्ला रहा हो। मैंने टिंकू का कंधा पकड़ा और उसे दरवाज़े की तरफ़ खींचा।

"सीढ़ी," मैंने कहा। "जल्दी।"

मीरा ने कैमरा बैग में डाला, बबलू ने अपनी जेब टटोली, और भोला भाई — भोला भाई अभी भी फ़र्श पर बैठा था, दोनों हाथों में माथा दबाए, जैसे कोई उसे अंदर से खींच रहा हो।

"भोला भाई!" मैं दौड़कर उसके पास गया। "उठिए।"

"भैया, मैंने ग्यारह साल इस भवन में काम किया है।" उसकी आवाज़ अलार्म के नीचे दबी जा रही थी। "ग्यारह साल में मैंने इस अलार्म को सिर्फ़ एक बार बजते सुना है — उस दिन जब आग जाँच वाले बाबू आए थे। और उस दिन भी… उस दिन भी साहब ने मुझे पहले ही घर भेज दिया था।"

"आप क्यों डर रहे हैं?" मैंने उसका हाथ खींचा। "अलार्म बजा है, हम नहीं बजाया। हम यहाँ बुलाए गए हैं—"

"किसने बुलाया?" भोला ने मेरी तरफ़ देखा। "किसने, भैया? साहब ने? साहब ने तो बुलाया नहीं। और आज भवन खाली होना चाहिए था, और भवन खाली नहीं है — क्योंकि ऊपर कोई है। ऊपर कोई था ही। वो आवाज़… 'तीसरी मंज़िल, चार लोग'… किसी ने गिना है हमें।"

मेरे पीछे बबलू ने धीमे से कुछ कहा, जो अलार्म में घुल गया।

और तभी, सीढ़ी की तरफ़ से, रोशनी आई।

पहले सिर्फ़ एक पतली पीली लकीर — जैसे किसी ने टॉर्च जलाई हो। फिर वो लकीर चौड़ी हुई, और उस लकीर के पीछे से जूतों की आवाज़ आई। एक, दो, तीन… नहीं, चार जोड़ी जूते। एक जोड़ी हल्की, चिकनी — सफ़ेद चमड़े की। और तीन जोड़ी भारी, एक जैसी, जैसे सरकारी जूते हों जो बहुत साल से एक ही तरह से चल रहे हों।

मैंने टिंकू को अपने पीछे कर लिया।

और फिर वो ऊपर आया।

सफ़ेद कुर्ता। इस्त्री किया हुआ, कहीं एक भी सिलवट नहीं। हाथ में पीली जिल्द वाली फ़ाइल, जिसके कोने साफ़-साफ़ सधे हुए थे। चश्मा नाक पर, मुस्कान होंठों पर, और आँखों में वो ठहराव जो सिर्फ़ उस आदमी में होता है जिसने पूरी ज़िंदगी काग़ज़ों को घुमाकर लोगों को सीधा खड़ा कर दिया हो।

चंद्रेश सक्सेना।

उसके पीछे तीन सिपाही। दो के हाथ पीछे बँधे थे, एक के हाथ में लाठी और कंधे पर रस्सी लटकी थी।

चंद्रेश ने मुझे देखा, फिर मीरा को, फिर टिंकू को, फिर भोला को, और फिर बबलू को। और उसकी मुस्कान थोड़ी और फैल गई — ठीक वैसे, जैसे कोई बुढ़िया बाज़ार में सामान देखकर मुस्कुराती है।

"अरे," उसने कहा। आवाज़ बहुत मीठी, बहुत धीमी, शहद जैसी। "अरे, अरे, अरे। इतनी रात को? इतनी रात को, इतने सारे लोग, इतनी सारी सीढ़ियाँ चढ़कर?"

मैंने कुछ कहना चाहा, पर गला सूखा था।

अलार्म अभी भी बज रहा था। चंद्रेश ने पीछे मुड़कर एक सिपाही की तरफ़ देखा, और सिपाही ने सिर हिलाया। फिर वो पास की दीवार पर लगे लोहे के बक्से के पास गया, उसका ढक्कन खोला, अंदर हाथ डाला, और एक छोटा लोहे का पेच घुमाया।

अलार्म बंद हो गया।

अचानक इतनी चुप्पी फैल गई कि मेरे कानों में अपनी ही साँस की आवाज़ आने लगी। दीवार की घड़ी की टिक-टिक सुनाई देने लगी। नीचे की गली से किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आई, बहुत दूर से।

चंद्रेश ने अपनी फ़ाइल खोली, उसमें से एक काग़ज़ निकाला, और बिना देखे ही — जैसे उसे पहले से पता हो कि उस काग़ज़ में क्या लिखा है — उसे ऊपर उठाकर हवा में तान दिया।

"बेटा," उसने मुझसे कहा, "तुम्हारा नाम अंकुश यादव है, है ना? साइकिल गली, सातवाँ नंबर। दुकान के काग़ज़ में तुम्हारा नाम अभी तक मेरे पास जमा है।"

"आपने सही पहचाना," मैंने कहा। आवाज़ निकली, पर पतली।

"तो फिर सुनो।" चंद्रेश ने काग़ज़ नीचे किया। "रात के ग्यारह बजे हैं। यह भवन भारद्वाज कंस्ट्रक्शन का है। इसका मालिक मेरा मुवक्किल है। और भवन के दरवाज़े बंद होने के बाद, बिना मालिक की इजाज़त, अंदर घुसना…" उसने रुककर मीरा को देखा, "…चोरी कहलाता है, बेटा। सीधा, सादा, चोरी।"

बबलू ने पीछे से कुछ बड़बड़ाया। एक सिपाही ने उसकी तरफ़ देखा, और बबलू चुप हो गया।

मगर मीरा —

मीरा ने अपना फोन निकाला।

बिना हाथ काँपे, बिना एक पल गँवाए। मैंने सिर्फ़ इतना देखा कि उसने फोन की स्क्रीन पर उँगली रखी, कुछ दबाया, और फोन को सामने की तरफ़ उठा दिया — ठीक चंद्रेश के चेहरे के सामने, ठीक उसकी मुस्कान के सामने।

"नमस्ते," मीरा ने कैमरे में कहा, आवाज़ बिल्कुल साफ़, बिल्कुल ठंडी। "आप देख रहे हैं बस्ती की आवाज़। आज रात, भारद्वाज भवन की तीसरी मंज़िल पर, हमारे साथ वकील चंद्रेश सक्सेना मौजूद हैं, और उनके साथ तीन सिपाही। समय है रात के ग्यारह बजे के करीब। और सक्सेना जी अभी-अभी हमें बता रहे थे कि भवन में घुसना चोरी है।"

चंद्रेश की मुस्कान एक पल के लिए पत्थर जैसी हो गई।

फिर वो वापस आई। बिल्कुल वापस।

"बेटी," उसने कहा, "कैमरा ठीक है। पर कैमरे से कानून नहीं बदलता।"

"कानून नहीं बदलेगा," मीरा ने कहा। "सिर्फ़ लोगों को पता चलेगा कि कौन, कहाँ, क्या कर रहा है।"

उसी वक़्त एक सिपाही मेरी तरफ़ बढ़ा। दूसरा बबलू की तरफ़। तीसरा भोला की तरफ़।

"तुम," पहले सिपाही ने मेरा हाथ पकड़ा, "यहाँ खड़े रहो।"

"मैं खड़ा हूँ," मैंने कहा।

"बोलना मत।"

"मैं बोल नहीं रहा।"

"चुप।" उसने मेरा बाजू पकड़कर मुझे दीवार की तरफ़ खींचा।

दूसरे सिपाही ने बबलू का कंधा पकड़कर उसे दूसरी तरफ़ कर दिया। बबलू ने कुछ कहना चाहा, पर उसका गला सूख गया। उसकी सोने की चेन उसके गले में अटक गई, और उसने धीरे से उसे अंदर सरका दिया।

तीसरा सिपाही भोला भाई के पास गया।

और भोला भाई —

भोला भाई ने वो खाता, वो जला हुआ भूरी जिल्द वाला खाता, अपनी कमीज़ के अंदर सरकाने की कोशिश की। बहुत हल्की कोशिश, बहुत धीमी, जैसे कोई सोचे कि किसी ने देखा ही नहीं।

पर सिपाही ने देख लिया।

"हाथ खींचो," सिपाही ने कहा।

"साहब, यह मेरा—"

"हाथ खींचो।"

भोला का हाथ काँप रहा था। वो खाता उसकी कमीज़ और पेट के बीच से धीरे-धीरे बाहर आया, जैसे कोई बहुत पुरानी चीज़ हो जो बाहर आना नहीं चाहती।

सिपाही ने खाता अपने हाथ में लिया, उलटा-पलटा, और चंद्रेश की तरफ़ बढ़ा दिया।

"ये क्या है?" चंद्रेश ने पूछा। उसने खाता नहीं छुआ, सिर्फ़ देखा। "जला हुआ काग़ज़? रात के ग्यारह बजे, चोरी करने आए हो और एक जला हुआ काग़ज़ साथ लाए हो? बेटा, चोरी करनी है तो कुछ ऐसा उठाया होता जो बिकता हो।"

बबलू ने वहाँ से कुछ कहा। मैंने उसे रोका।

मैं शांत था।

मैं हैरान था कि मैं शांत क्यों था। मेरा दिल ज़ोर से धड़क रहा था, मेरी उँगलियाँ ठंडी थीं, मेरी जेब में घंटी अब भी बर्फ़ जैसी थी। और फिर भी, मेरी आवाज़ — जब मैंने बोला, मेरी आवाज़ नहीं काँपी।

"सक्सेना जी," मैंने कहा, "हम चोरी करने नहीं आए।"

चंद्रेश ने सिर घुमाया। "अच्छा।"

"हम सच देखने आए थे।"

"सच।" उसने काग़ज़ वाली फ़ाइल वापस खोली। "सच बड़ी अच्छी चीज़ है, बेटा। मुझे सच बहुत पसंद है। सिर्फ़ फ़र्क़ इतना है कि सच को यहाँ, इस भवन में, काग़ज़ में नहीं देखा जाता।" उसने उँगली ऊपर उठाई, सीधी, जैसे स्कूल के मास्टर उठाते हैं। "काग़ज़ में तारीख़ होती है। काग़ज़ में मोहर होती है। काग़ज़ में हस्ताक्षर होते हैं। और काग़ज़…" उसने फ़ाइल अपनी छाती से लगा ली, "…काग़ज़ उसी के पास रहता है जिसके पास वकील होता है।"

"और गवाह?" मैंने कहा।

चंद्रेश रुका।

"गवाह किसके पास रहता है?" मैंने कहा।

वो हँसा। छोटी, साफ़ हँसी, जैसे किसी ने बच्चे का कोई अच्छा सवाल सुनकर हँसा हो। पर उसकी आँखें नहीं हँसीं।

"गवाह बेटा," उसने कहा, "गवाह खुद आता है। गवाह को कोई रात के ग्यारह बजे सीढ़ियाँ चढ़ाकर नहीं लाता। गवाह को बुलाना पड़ता है। तारीख़ लगती है। काग़ज़ होता है। वो काग़ज़ जो तुम रात में चुराकर नहीं ला सकते।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा।

मीरा का कैमरा अभी भी चल रहा था। उसकी लाल बत्ती चंद्रेश के चेहरे पर पड़ रही थी।

"सक्सेना जी," मीरा ने कहा, "एक सवाल।"

"पूछो, बेटी।"

"अगर गवाह खुद आ जाए, तो काग़ज़ की ज़रूरत नहीं पड़ेगी?"

चंद्रेश ने फ़ाइल बंद कर दी।

"गवाह आएगा तो देखेंगे," उसने कहा। "अभी तो…" उसने अपनी कलाई पर सफ़ेद घड़ी देखी, "…अभी तो सिर्फ़ तुम चारों हो। और एक चोरी का इल्ज़ाम। और रात का वक़्त।"

वो सिपाही की तरफ़ मुड़ा।

"इनके हाथ की हर चीज़," उसने कहा, "नीचे ले जाओ। काग़ज़, बैग, फोन — सब।"

"फोन नहीं," मीरा ने कहा। "सीधा प्रसारण चल रहा है।"

चंद्रेश ने उसकी तरफ़ देखा।

"क्या?"

"सीधा प्रसारण," मीरा ने कहा, और फोन को थोड़ा और ऊपर उठा दिया, ठीक उसके चेहरे के सामने। "अभी, इस वक़्त, इस गली में कम से कम दो सौ लोग यह देख रहे हैं। मैंने आपको पहले बताया था।"

चंद्रेश ने फोन की स्क्रीन देखी।

मैंने नहीं देखा कि स्क्रीन पर क्या था। पर मैंने उसकी आँखें देखीं। बहुत छोटा-सा पल था। बहुत छोटा। पर मैंने देखा कि उसकी मुस्कान की एक लकीर, बाईं तरफ़ से, थोड़ी सी हिली।

और तभी, नीचे से, एक आवाज़ आई।

पहले सीढ़ी के पत्थर पर पैर की आवाज़। हल्की। बहुत हल्की। जैसे कोई आदमी सीढ़ियाँ चढ़ते वक़्त जान-बूझकर अपना बोझ कम कर रहा हो, ताकि नीचे वाले को पता न चले कि वो बड़ा आदमी है।

फिर एक और आवाज़ — कमीज़ की आस्तीन का खिसकना। फिर सीढ़ी के लोहे के हैंडल पर हाथ की पकड़।

चंद्रेश ने सीढ़ी की तरफ़ देखा। और उसके चेहरे पर कुछ ऐसा आया जो मैंने उस चेहरे पर पहले कभी नहीं देखा था — थोड़ी-सी चिढ़, जैसे किसी ने उसका तैयार किया हुआ भाषण बीच में रोक दिया हो।

मैंने भी देखा।

और सफ़ेद कुर्ते में, मुस्कुराते हुए, रणवीर भारद्वाज ऊपर आ गया।

उसके पीछे दो आदमी थे। दोनों काले कपड़ों में, दोनों के हाथ खाली, दोनों की आँखें सिर्फ़ हम पर। रणवीर के हाथ में कुछ नहीं था। न फ़ाइल, न काग़ज़, न फोन। सिर्फ़ उसकी मुस्कान थी, और वो मुस्कान उसके चेहरे पर उतनी ही स्वाभाविक लग रही थी जैसे सूरज पर रोशनी।

वो सीढ़ी के आख़िरी मोड़ पर रुका, हम सबको देखा, और फिर बहुत धीरे से बोला —

"ये मेरा भवन है, बेटा।"

उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था। कोई डाँट नहीं थी। सिर्फ़ एक ठंडा, साफ़ वाक्य, जैसे कोई अपने ही घर में आकर कहे कि यह मेरा घर है — और यह वाक्य इतना सच्चा लगे कि सुनने वाला शर्मिंदा हो जाए।

"ये मेरी मर्ज़ी से खुलता है," रणवीर ने कहा। "और ये मेरी मर्ज़ी से बंद होता है।"

वो आगे आया। सीधा मेरी तरफ़। और उसके चलने में कुछ ऐसा था कि सिपाही अपने आप एक कदम पीछे हट गए — जैसे रास्ता दे रहे हों।

"अंकुश," उसने कहा, मेरा नाम लेकर, बहुत अपनेपन से, जैसे कोई बड़ा भाई बुला रहा हो, "तुम्हें पता है, मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है। तुम मेहनत करते हो। तुम्हारी दुकान की जगह अच्छी है। तुम्हारे पापा ने बहुत साल पहले मेरे यहाँ अंगूठा लगाया था, और आज तुमने उसी अंगूठे को सबके सामने रखकर मेरा नाम खराब किया — मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने कहा, बच्चा है, समझ जाएगा।"

वो मेरे बहुत पास आ गया था। इतना पास कि मुझे उसके कुर्ते से साबुन की गंध आने लगी — और उसके नीचे, बहुत हल्की, बहुत दबी हुई, जले काग़ज़ की गंध।

"पर ये?" उसने अपने चारों तरफ़ हाथ घुमाया। "मेरा दफ़्तार? मेरी तीसरी मंज़िल? रात के ग्यारह बजे?"

वो मीरा के कैमरे की तरफ़ मुड़ा।

और फिर उसने वो किया जो मैंने सोचा भी नहीं था।

उसने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए।

ठीक कैमरे के सामने। ठीक मीरा की लाल बत्ती के सामने। जैसे वो कोई प्रार्थना कर रहा हो। जैसे वो किसी मंदिर में खड़ा हो।

"देखिए," उसने कैमरे से कहा, आवाज़ में एक अजीब-सी नरमी, "मैं जानता हूँ आप सब मुझे क्या समझते हैं। मैं जानता हूँ। पर मैं आपको सिर्फ़ इतना कहना चाहता हूँ — यह लड़का, अंकुश यादव, अपनी छोटी-सी साइकिल की दुकान से उठकर, मेरे दफ़्तार में, रात के ग्यारह बजे, चोरी करने आया है।"

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

"यह मेरी दुकान छीनना चाहता है," रणवीर ने कैमरे से कहा, "इसीलिए यह मेरे काग़ज़ों के पीछे पड़ा है। चार दिन पहले मैंने इसके हाथ में नौकरी की चिट्ठी रखी थी — इसकी माँ के इलाज के लिए। इसने लौटा दी। मैंने कहा, ठीक है, बेटा, तेरी मर्ज़ी। पर आज…" उसने अपनी जुड़ी हुई हथेलियाँ थोड़ी और ऊपर उठाईं, "…आज मैं आप सबसे कह रहा हूँ। देख लीजिए। सब देख लीजिए। मैं किसी का कुछ नहीं छीनता।"

और फिर उसने हाथ नीचे किए, कैमरे से नज़र हटाई, और मेरी तरफ़ देखा — और उसकी आँखों में वो मुस्कान थी जो मैंने पहले भी देखी थी। वो मुस्कान जिसमें मज़ाक नहीं था, शरारत नहीं थी, सिर्फ़ एक चीज़ थी।

ज़रूरत।

"बोल, अंकुश," उसने कहा, बहुत धीरे, इतना धीरे कि सिर्फ़ मैंने सुना। "बोल कि तू उस दराज़ से क्या लेने आया था।"

मैंने उसकी आँखों में देखा।

मेरी जेब में घंटी अब भी बर्फ़ जैसी थी।

और मेरे पीछे, कहीं बहुत दूर, चंद्रेश सक्सेना ने अपनी पीली फ़ाइल फिर खोली, और उसके पन्ने खिसकने की आवाज़ आई — धीरे, हल्की, ठीक वैसे, जैसे किसी तराज़ू में पलड़ा झुक रहा हो।

॥

रणवीर का सवाल हवा में लटका रहा।

"बोल, अंकुश। बोल कि तू उस दराज़ से क्या लेने आया था।"

मैंने उसकी आँखों में देखा। उसकी आँखों में वो मुस्कान थी जो बात करते वक़्त भी बनी रहती थी, जैसे कोई दीया हो जिसकी लौ हवा से नहीं हिलती।

मेरी जेब में घंटी बर्फ़ जैसी ठंडी थी।

और पीछे, मेरे कंधे के ठीक पीछे, चंद्रेश सक्सेना के हाथ में पीली फ़ाइल खुली थी और उसके पन्ने खिसकने की आवाज़ आ रही थी — धीरे, हल्की, ठीक वैसे, जैसे किसी तराज़ू में पलड़ा झुक रहा हो।

कमरा बड़ा था, पर अचानक छोटा लगने लगा।

तीसरी मंज़िल का वो खुला कमरा — खिड़की से आती पीली रोशनी, दीवार पर लगी कीलें जिन पर कभी कोई तस्वीर टँगी थी, फ़र्श पर धूल, और बीच में वो लोहे की बड़ी अलमारी — खाली, खुली, जैसे कोई मुँह खोलकर हँस रहा हो।

अलमारी के अंदर की धूल में मोटे रजिस्टर जैसा चौकोर निशान अभी भी बना हुआ था। मैंने उसे देखा और मुझे लगा कि वो निशान मेरी तरफ़ देख रहा है, जैसे कह रहा हो — मैं यहाँ था। मैं यहाँ था, और मुझे कोई उठाकर ले गया।

मैंने होंठ दबाए और कुछ नहीं कहा।

तभी रणवीर ने एक कदम पीछे हटकर अपनी आवाज़ थोड़ी ऊँची की — इतनी ऊँची कि कमरे के हर कोने तक पहुँच जाए, पर इतनी नहीं कि चीख लगे। वो आदमी चीखता नहीं था। वो आदमी बस इतना करता था कि सुनने वाले को लगे कि वो समझा रहा है।

"देखिए," उसने कहा, और अब वो सिपाहियों से बोल रहा था, कैमरे से बोल रहा था, आधा मेरी तरफ़ देखकर बोल रहा था, "देखिए, मैं सच कहूँ तो मुझे इस लड़के पर तरस आता है।"

मेरे पेट में कुछ ठंडा सा उतरा।

"इसका धंधा नहीं चल रहा," रणवीर ने कहा, बिल्कुल साधारण आवाज़ में, जैसे कोई मौसम की बात कर रहा हो। "साइकिल का काम अब कौन करता है, भाई? बच्चे स्कूटी पर स्कूल जाते हैं। ये दुकान दिन भर खाली बैठी रहती है। मैं जानता हूँ। मेरे आदमी बताते हैं। महीने में चार साइकिल आती हैं, वो भी पंचर।"

उसने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराया।

"मैंने इससे कोई नफ़रत नहीं की, अंकुश। मैंने तो यह भी सोचा कि इसकी माँ का इलाज चल रहा है, ज़रूरत है, इसलिए नौकरी दे दो। मैंने चिट्ठी भेजी। इसने लौटा दी। ठीक है। मेरी तरफ़ से कोई गिला नहीं। पर जब इंसान के पास काम न हो और उसके सामने कोई ऊँचा घर खड़ा हो, तो दिमाग़ में एक ही बात आती है — यह घर मेरा क्यों नहीं?"

"साहब," चंद्रेश ने बहुत मीठी आवाज़ में कहा, "मैं शिकायत पढ़ दूँ?"

रणवीर ने हाथ हिलाया — जैसे कोई बड़ा आदमी किसी छोटी चीज़ की इजाज़त देता है।

चंद्रेश ने फ़ाइल खोली।

और मैंने देखा कि वो फ़ाइल पहले से खुली हुई थी। पन्ने मोड़े हुए, कोने दबे हुए, जैसे इसे बार-बार खोला गया हो। मेरी नज़र उसके सबसे ऊपर के पन्ने पर पड़ी — वहाँ तारीख़ थी। आज की नहीं। पिछले हफ़्ते की।

मेरा सीना ठंडा हो गया।

"शिकायत," चंद्रेश ने पढ़ना शुरू किया, "कि अंकुश यादव, निवासी साइकिल गली, दुकान संख्या सात, ने पिछले कई दिनों से भारद्वाज कंस्ट्रक्शन के काग़ज़ों की चोरी, दफ़्तार में ज़बरदस्ती घुसने, और सरकारी मुहर वाले दस्तावेज़ों को नष्ट करने की कोशिश की है।"

"कब की शिकायत?" मीरा ने कहा।

उसकी आवाज़ तेज़ थी। कैमरा उसके हाथ में स्थिर था, लाल बत्ती जल रही थी, और मैं जानता था कि उस लाल बत्ती के पीछे गली के दो सौ लोग बैठे हैं — माँ, काजल, दुबे अंकल, शबनम आपा, उस्ताद, बच्चे, सब।

"कब की शिकायत?" मीरा ने फिर पूछा। "आज रात की है या पहले से तैयार थी?"

चंद्रेश मुस्कुराया। "बेटा, शिकायत काग़ज़ पर होती है, मुँह पर नहीं। काग़ज़ की अपनी तारीख़ होती है, अपनी मुहर होती है, और उसके साथ गवाह भी होते हैं।"

"कौन गवाह?" मीरा ने पूछा।

"तीन गवाह," चंद्रेश ने कहा, और उसके पन्ने फिर खिसके, "चौकीदार, गाड़ी चलाने वाला, और एक कर्मचारी — जिसके सामने इस लड़के ने कहा था कि उसे भवन के काग़ज़ चाहिए।"

मैंने पीछे देखा। भोला भाई दीवार के साथ सिकुड़ा खड़ा था, एक हाथ से अपनी कमीज़ पकड़े हुए, जैसे पकड़ न छूटे। उसका जला हुआ खाता एक सिपाही के हाथ में था, और वो सिपाही उसे ऐसे पकड़े थे जैसे कोई गीला काग़ज़ हो, कहीं फट न जाए — या कहीं बच न जाए।

बबलू ने होंठ हिलाए।

"साहब," बबलू ने धीरे से कहा, "साहब, बात तो…"

रणवीर ने सिर्फ़ घूमकर उसकी तरफ़ देखा।

बस। कुछ नहीं कहा। कोई धमकी नहीं, कोई गाली नहीं, कोई इशारा भी नहीं। सिर्फ़ देखा।

और बबलू पांडे — वही बबलू पांडे जिसने गुमटी उलटी थी, जिसने मेरा गला पकड़ा था, जिसकी सोने की चेन और पानदान पूरी गली में मशहूर थे — वो बबलू पांडे चुप हो गया। उसका मुँह खुला रह गया, और फिर धीरे से बंद हो गया। उसने अपनी जेब से वो पुराना पहचान कार्ड निकाला और उसे हाथ में पकड़कर देखने लगा — जैसे उसी में कोई जवाब लिखा हो।

उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।

तुम सोच रहे होगे कि इतनी सी बात पर वो क्यों डर गया। सुनो — डर बड़ी चीज़ों से नहीं आता। डर उस एक चीज़ से आता है जिसे आदमी सबसे ज़्यादा जानता है। बबलू जानता था कि इस आदमी की मुस्कान के पीछे क्या है। और मैं अभी सिर्फ़ अंदाज़ा लगा रहा था।

मीरा आगे आई।

उसने कैमरा ऊपर किया और सीधे उसमें बोली — मुझसे नहीं, कैमरे से। और उसकी आवाज़ में वो बात थी जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी। डर नहीं था। गुस्सा भी नहीं था। सिर्फ़ एक साफ़, ठंडा होश।

"ये सीधा प्रसारण चल रहा है," मीरा ने कहा। "इसे गली देख रही है। बाज़ार देख रहा है। और जो लोग ये देख रहे हैं, वो सब जानते हैं कि आज रात यहाँ क्या हुआ। इस कमरे का हर कोना रिकॉर्ड हो रहा है। सच को काग़ज़ से ढका जा सकता है, पर छुपाया नहीं जा सकता।"

रणवीर ने अपना सिर थोड़ा झुकाया, जैसे कोई तारीफ़ सुन रहा हो।

"बेटी," उसने कहा, बहुत नरमी से, "तू बहुत अच्छा बोलती है। सच में। तेरी आवाज़ में दम है। मुझे ऐसे लोग पसंद हैं।" वो दो कदम आगे आया और कैमरे के ठीक सामने रुक गया। "पर एक बात सुन ले। सच वो नहीं होता जो हम देखते हैं। सच वो नहीं होता जो हमें याद रहता है। सच वो होता है जो काग़ज़ पर लिखा होता है, मुहर लगी होती है, तारीख़ होती है, गवाह होते हैं। और यहाँ…"

उसने अपने चारों तरफ़ हाथ घुमाया। दीवारें, अलमारी, खिड़की, फ़र्श।

"…यहाँ सारे काग़ज़ मेरे हैं।"

वो एक पल रुका।

"सारे," उसने दोहराया, बहुत धीरे।

और मेरे अंदर कुछ टूटा।

नहीं, टूटा नहीं — उबला। गुस्सा ऐसे नहीं आता जैसे कोई लहर आती है। गुस्सा ऐसे आता है जैसे केतली में पानी उबलता है — पहले बुलबुले, फिर आवाज़, फिर ढक्कन हिलने लगता है। मेरे हाथ काँपने लगे। मेरे दिमाग़ में वो सब आया — संदूक में धूल का चौकोर निशान, भोला भाई की बात कि असली रजिस्टर कभी उस अलमारी में था ही नहीं, वो लोहे का बक्सा जिसे साहब ने खुद बोरे में डलवाकर उतरवाया, पापा का टेप से बँधा चश्मा, रेहाना आपा की कार्बन कॉपी का जला कोना, माँ का बाईस साल का सन्नाटा।

और मेरे मुँह से निकलने ही वाला था — "तो वो रजिस्टर कहाँ है? वो बक्सा कहाँ है? तेरे काग़ज़ों में ये क्यों नहीं लिखा कि तूने मेरे पापा से डराकर अंगूठा लिया था?"

पर मैंने खुद को रोका।

क्योंकि मैंने देखा कि वो मेरी तरफ़ देख रहा है। इंतज़ार कर रहा है। जैसे कोई मछुआरा डोरी को ढीला छोड़कर इंतज़ार करता है कि मछली खुद हिले।

और मैंने सोचा — अगर मैं अभी चिल्लाया, तो यही कहेगा कि देखिए, ये पागल है, ये गुस्से में है, इसने झूठ बोला। मेरे शब्द उसके काग़ज़ के सामने कुछ नहीं होंगे। मेरे पास काग़ज़ नहीं है। मेरे पास सिर्फ़ सच है, और उसके पास स्याही है।

इसलिए मैंने साँस ली।

लंबी साँस। जैसे पापा सीखाते थे, जब कोई पेंच जाम हो जाए तो ज़ोर मत लगाओ, पहले तेल डालो।

मैंने रणवीर की आँखों में देखा और बहुत साधारण आवाज़ में कहा —

"मैं चोर नहीं हूँ।"

वो रुका।

"मैं मरम्मत करने वाला हूँ," मैंने कहा। "मेरे पास औज़ार हैं, ग्रीस है, पेंच हैं। जो टूटा है, उसे जोड़ता हूँ। मैं किसी का कुछ नहीं छीनता। मैं तो उसे ठीक करता हूँ जो पहले से टूटा हुआ मिलता है।"

कमरे में एक पल के लिए सब चुप हो गया।

तभी रणवीर ने ताली बजाई।

एक। दो। तीन।

धीमी, साफ़, ठंडी तालियाँ। जैसे कोई स्टेज पर किसी की तारीफ़ कर रहा हो।

"यही तो मज़ेदार है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा आया जो मज़ाक जैसा था, पर मज़ाक नहीं था। "मरम्मत करने वाला खुद टूटा हुआ है।"

मैं जम गया।

"सुनो," उसने सिपाहियों की तरफ़ मुड़कर कहा, जैसे कोई हिसाब समझा रहा हो, "इसका बाप बाईस साल तक चुप रहा। क्यों? डर से। इसकी माँ आज तक अस्पताल के बिस्तर से उठ नहीं पाई। इसकी बहन अठारह साल की है और उसी अस्पताल में ट्रेनी है — कल को उसकी नौकरी भी जाएगी। और ये लड़का?" उसने मेरी तरफ़ देखा। "ये रात को उठकर छत पर जाता है। बैठकर अपनी गली देखता है। जैसे कोई आख़िरी बार देख रहा हो।"

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

ये बात मैंने किसी को नहीं बताई थी। छत पर जाना, बैठना, गली को देखना — ये मेरा सबसे छुपा हुआ कोना था। वो कोना जहाँ मैं खुद से भी नहीं मिलता था।

"ये डरा हुआ लड़का है," रणवीर ने कहा, बहुत शांति से। "और डरा हुआ आदमी कुछ भी कर सकता है। कल कोई उसके कान में कह दे कि मेरे भवन की तीसरी मंज़िल पर एक रजिस्टर है जो सब कुछ बदल देगा — और ये रात में निकल पड़ता है। इसके साथ कोई कैमरा वाली लड़की है, कोई बच्चा है, कोई चौकीदार है जिसे कल नौकरी से निकाला गया और जो अब बदला लेना चाहता है।"

भोला भाई ने एक आवाज़ निकाली — जैसे किसी जानवर के गले से निकलती है, जब उसे पता हो कि उसे मारा जाएगा पर भागने की जगह न हो।

"साहब," भोला भाई ने कहा, और उसकी आवाज़ गीली थी, "साहब, मेरी बच्ची है। आरज़ू। आठ साल की। उसे रात में दौरे पड़ते हैं। उसकी दवा… साहब, उसकी दवा बंद मत कराइए। मैं ग़लती कर दिया, मैं मानता हूँ। पर वो बच्ची क्या करे?"

वो हाथ जोड़कर खड़ा था। एक ग्यारह साल का चौकीदार, जिसकी कमीज़ के कोहनी फटी थी और जिसके जूते के नीचे से कील की नोक बाहर आ रही थी।

रणवीर ने उसकी तरफ़ देखा।

और मैंने देखा कि उसकी आँखों में कोई बदलाव नहीं आया। न गुस्सा, न तरस, न झुंझलाहट। बस।

"भोला," रणवीर ने कहा, "दवा काग़ज़ से चलती है। काग़ज़ से। और मैंने आज तक किसी की दवा नहीं रोकी।" उसने एक पल रुका। "पर आज तूने अपनी नौकरी के बदले उस लड़के को मेरे दरवाज़े पर ला दिया। ये तेरा हिसाब है।"

भोला भाई का सिर झुक गया।

और मैं कुछ नहीं कर सका। मैं उस आदमी के पास नहीं जा सका, उसका हाथ नहीं पकड़ सका, क्योंकि मेरे पैर जमे हुए थे और मेरे सामने एक फ़ाइल खुली थी जिसमें मेरा नाम लिखा था।

तभी मीरा ने कैमरा घुमाया और भोला भाई की तरफ़ किया।

"देख रहे हो?" उसने कैमरे से कहा। "ये आदमी सुन रहा है। ये देश सुन रहा है।"

रणवीर हँसा। छोटी, बहुत छोटी हँसी — जैसे कोई बच्चे की बात पर हँसता है।

"देश," उसने कहा, "देश कोई एक रात की कहानी से नहीं चलता, बेटी। देश काग़ज़ से चलता है। हर रोज़ सुबह होता है — मुहर, नाम, तारीख़। जो मुहर लगाता है, वो चलाता है। और यहाँ…" उसने शब्दों को तोला, "…यहाँ मुहर मेरे पास है।"

चंद्रेश ने फ़ाइल बंद की।

उस बंद होने की आवाज़ मुझे बहुत बड़ी लगी। जैसे किसी किताब का आख़िरी पन्ना पलटा गया हो।

"तो अब?" मीरा ने कहा।

"तो अब कुछ नहीं," चंद्रेश ने बहुत मीठी आवाज़ में कहा। "जो चीज़ें हमारे काग़ज़ों से जुड़ी हैं, वो नीचे चली जाएँगी। खाता, काग़ज़, हाँ, ये सब। बाक़ी लोग जा सकते हैं। मैं गिरफ़्तारी की बात नहीं कर रहा। मैं सिर्फ़ कह रहा हूँ कि सामान रहेगा।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "और तुम, बेटा, कल सुबह दस बजे दफ़्तार आ जाओ। जवाब देने।"

"किससे?" मैंने कहा।

"काग़ज़ से," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में इतनी मिठास थी कि मुँह में कड़वाहट आ गई।

सिपाही आगे बढ़ा और उसके हाथ से भोला भाई का जला खाता लेकर अपने बगल में दबा लिया।

टिंकू मेरे पीछे खड़ा था। उसके हाथ में वो गत्ते का कार्डबोर्ड माइक था, जो उसने घर पर बनाया था। उसकी उंगलियाँ सफ़ेद हो गई थीं।

"उस्ताद," उसने फुसफुसाया, "हम कुछ नहीं बोलेंगे?"

मैंने उसका कंधा पकड़ा। हल्का सा।

"बोलेंगे," मैंने कहा। "पर तब बोलेंगे जब काग़ज़ हमारे हाथ में होगा। अभी बोलेंगे तो वो कहेगा कि बच्चा बोल रहा है।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था, पर वो गिर नहीं रहा था।

"मैं बच्चा नहीं हूँ," उसने कहा।

"मुझे पता है," मैंने कहा।

रणवीर ने अपनी कमीज़ की कलाई ठीक की, अपने काले कपड़ों वाले दो आदमियों की तरफ़ देखा, और मुड़ गया।

वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।

उसके जूते धूल से भरे थे — सफ़ेद चमकते जूते, जिन पर आज धूल की पतली परत चढ़ी थी। और उसकी छोटी उँगली पर वो पतला चमकता धागा बँधा था, जहाँ पहले काली अंगूठी रहती थी।

वो दरवाज़े के पास पहुँचा। पीली टॉर्च की रोशनी बाहर गलियारे में पड़ रही थी।

और फिर वो रुका।

बिना मुड़े, बिना हमारी तरफ़ देखे, बस दरवाज़े की चौखट पर हाथ रखकर।

"अंकुश," उसने कहा।

मैंने कुछ नहीं कहा।

"कल इसी वक़्त," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वही ठंडी सफ़ाई थी, "तेरी दुकान के बोर्ड पर मेरा नाम लिखा होगा।"

कमरे में हवा रुक गई।

"जो बोर्ड तेरे दादा ने लगाया था," उसने कहा, "जिस पर पीतल की पट्टी थी। जिस पर तेरे पापा ने अपना नाम खुदवाया था। उसी बोर्ड पर। कल इसी वक़्त।"

वो चला गया।

उसके पीछे दो काले कपड़ों वाले आदमी गए। चंद्रेश ने अपनी पीली फ़ाइल दबाई और सिपाहियों को इशारा किया, और तीनों सिपाही खाता और काग़ज़ लेकर बाहर हो गए। एक सिपाही ने जाते वक़्त मेरी तरफ़ देखा — एक पल के लिए — और मुझे लगा कि उसकी आँखों में कुछ था। शायद झिझक। शायद कुछ और। पर वो भी चला गया।

दरवाज़ा खुला रह गया।

बबलू वहीं खड़ा था, दीवार के सहारे, हाथ में वो पुराना पहचान कार्ड। उसने एक लंबी साँस छोड़ी, जैसे कई मिनट से रोक रखी हो।

"मैंने कहा था," वो बोला, बिना किसी की तरफ़ देखे, "भागो कहूँ तो भागना। तुम भागे नहीं।"

"तू भी नहीं भागा," मैंने कहा।

उसने मेरी तरफ़ देखा। मोटा आदमी, जिसकी आँखें लाल थीं और जिसके होंठ हिल रहे थे।

"मैं तो बारह साल से भाग रहा हूँ," उसने कहा। "ये तेरा पहला दिन है।"

और वो भी निकल गया, भारी क़दमों से, सीढ़ी की तरफ़।

कमरा खाली हो गया।

मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे हाथ में पापा का पेचकस था — लकड़ी का चिकना हत्था, जिस पर छोटे-छोटे टेढ़े अक्षरों में पापा का नाम खुदा था, और आख़िरी सिरे पर बँधा वो लाल धागा, जो पुराना और फीका था, पर बँधा हुआ था।

मीरा ने कैमरा बंद नहीं किया।

"अभी भी चल रहा है," उसने धीरे से कहा, मेरी तरफ़ देखकर। "दो सौ से ज़्यादा लोग। कोई नहीं हटा।"

"बंद मत करना," मैंने कहा।

"नहीं करूँगी," उसने कहा।

तभी मेरी जेब में घंटी हिली।

बर्फ़ जैसी ठंडी घंटी, जो कई मिनट से चुप पड़ी थी, अचानक गरम होने लगी — जैसे किसी ने उसे हथेली में पकड़ लिया हो। और उसने एक ही शब्द कहा।

"नाम।"

मैंने आँखें बंद कीं।

"क्या नाम?" मैंने फुसफुसाकर पूछा।

पर घंटी चुप हो गई।

मैंने अलमारी की तरफ़ देखा। धूल में वो चौकोर निशान अब भी वहीं था — जहाँ रजिस्टर रखा था, या जहाँ वो बक्सा रखा था जिसे साहब ने बोरे में डलवाकर नीचे उतरवाया।

मैंने उस निशान के पास घुटने टेके और उँगली से धूल को हल्का सा छुआ।

और मैंने खुद से कहा — अंकुश, तेरे पास काग़ज़ नहीं है। तेरे पास स्याही नहीं है। तेरे पास मुहर नहीं है।

तेरे पास सिर्फ़ एक चीज़ है — तेरे हाथ।

और मैंने उसी वक़्त ठान लिया कि कल इसी वक़्त, जब वो मेरे बोर्ड पर अपना नाम लिखेगा, मैं वहाँ खड़ा होऊँगा। बोर्ड के नीचे नहीं। बोर्ड के सामने।

मीरा ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।

"नीचे काजल है," उसने कहा। "कई मिनट से। गेट बंद था।"

मैं उठा।

और जब मैं दरवाज़े से बाहर निकला, तो गलियारे की पीली टॉर्च की रोशनी में मुझे धूल पर कुछ निशान दिखे — लकड़ी के जूतों के निशान, सीधे सीढ़ी की तरफ़ जाते हुए।

उनमें से एक निशान बाक़ी सबसे अलग था। छोटा। जैसे कोई बच्चा उनके साथ चला हो।

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।

वो मेरे ठीक पीछे था, अपना कार्डबोर्ड माइक सीने से लगाए, आँखें नीची किए।

"टिंकू," मैंने कहा।

"हाँ उस्ताद।"

"तेरे जूते कहाँ हैं?"

उसने नीचे देखा। उसके पैरों में सिर्फ़ काले मोज़े थे।

"जूते…" उसने धीरे से कहा, "जूते मैंने सीढ़ी पर उतार दिए थे। आपने कहा था, आवाज़ न आए।"

मैंने गलियारे की धूल में पड़े उन छोटे निशानों को फिर देखा।

और मेरे पेट में कुछ ठंडा सा हिला।

क्योंकि वो निशान सीढ़ी की तरफ़ नहीं जा रहे थे।

वो निशान ऊपर से आ रहे थे।

नीचे से ऊपर। यानी कोई हमारे पीछे-पीछे इस मंज़िल तक आया था, और हमें पता भी नहीं चला।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा और बहुत धीरे कहा —

"कैमरा बंद मत करना। और अब एक बात याद रखना — जो आज रात के बाद होगा, वो सिर्फ़ हमारा नहीं होगा।"

वो समझ गई। उसने कुछ नहीं पूछा।

हम सीढ़ी की तरफ़ बढ़े, और पीछे वो खाली कमरा रह गया — खुली अलमारी, धूल का चौकोर निशान, दीवार पर कीलें, और हवा में अब भी हल्की-सी जले काग़ज़ की गंध।

नीचे काजल हमारा इंतज़ार कर रही थी।

और कल इसी वक़्त, उस आदमी ने कहा था, मेरे बोर्ड पर उसका नाम लिखा होगा।

मैंने जेब में घंटी को हाथ लगाया। वो अब भी गरम थी।

"नाम," मैंने खुद से कहा, बहुत धीरे। "अच्छा। नाम से ही शुरू करेंगे।"

॥

हम सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे। तीसरी मंज़िल की पीली टॉर्च की रोशनी पीछे छूट गई और आगे सिर्फ़ अंधेरा था — वो अंधेरा जो भवन की सीढ़ियों में बरसों से बैठा था और जिसे किसी ने नहीं पोंछा था।

टिंकू मेरे ठीक पीछे चल रहा था, काले मोज़ों में। उसकी साँस मेरी गर्दन पर लग रही थी, छोटी और तेज़, जैसे कोई दौड़कर आया हो और अब खड़ा न हो पा रहा हो।

"उस्ताद," उसने धीरे से कहा। "वो छोटे निशान…"

"चुप," मैंने कहा। "नीचे आते हैं।"

मीरा मेरे बाएँ थी, कैमरा अब भी उसके हाथ में, लाल बत्ती जल रही थी। उसका चेहरा उस रोशनी में लाल लग रहा था और आँखें, जो आम दिन झगड़ती रहती थीं, आज शांत थीं। बहुत शांत। जैसे वो भी अंदर से गिन रही हो — कितनी सीढ़ियाँ बची हैं।

दूसरी मंज़िल का गलियारा खाली था। दीवारों पर पुराने पोस्टर टँगे थे — भारद्वाज कंस्ट्रक्शन के, हाथ जोड़े रणवीर के, नीले सिरे वाले, धूल में हल्के पड़े। एक पोस्टर का कोना उखड़ा हुआ था और उसके नीचे से पुरानी पीली दीवार दिख रही थी, जैसे नई तस्वीर के नीचे कोई पुराना चेहरा छिपा हो।

नीचे से आवाज़ आई।

"भैया?"

काजल की आवाज़।

हम सीढ़ियों के आख़िरी मोड़ पर पहुँचे और वहाँ वो दीवार से सटकर खड़ी थी, दोनों हाथ सामने जुड़े, आँखें ऊपर उठाए। उसके हाथ में नर्सिंग की किताब दबी थी, जैसे ढाल पकड़ी हो।

"नीचे सब बंद है," उसने कहा, आवाज़ में कँपकँपी। "लोहे का गेट। बाहर से। मैंने खोलने की कोशिश की, हिला तक नहीं।"

मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।

"अब खुलेगा," मैंने कहा। "चल।"

हम नीचे उतरे। ग्राउंड फ्लोर का हॉल बड़ा था, ऊँची छत वाला, बीच में एक मेज़ और पीछे काँच का दरवाज़ा, जिसके बाहर गली की रोशनी धुँधली-सी दिख रही थी। लोहे का गेट बंद था — मोटी सलाखों वाला, बाहर से ज़ंजीर और ताला।

पर हमारे सामने, हॉल के बीच में, तीन सिपाही खड़े थे।

और उनके आगे, हाथ में पीली फ़ाइल लिए, चंद्रेश सक्सेना।

वो मुस्कुरा रहा था। वही मुस्कान जो कभी नहीं बदलती — जैसे चेहरे पर चिपका हुआ काग़ज़ हो और किसी ने उसे उतारने की ज़हमत न की हो।

"अंकुश जी," उसने मीठी आवाज़ में कहा। "इतनी रात, इतनी सीढ़ियाँ, इतना सामान। मेहनत बहुत की आपने।"

"और आपने?" मैंने कहा। "इतनी रात, तीन सिपाही, एक वकील, एक बंद गेट। अच्छी तैयारी है।"

वो हँसा। हल्का, छोटा, बिल्कुल वैसे जैसे कोई बड़ा आदमी बच्चे की मासूम बात पर हँसता है।

"तैयारी तो आपने भी की है," उसने कहा और टिंकू के हाथ के कार्डबोर्ड माइक पर नज़र डाली। "ये क्या है? ये भी कोई काग़ज़ है?"

"ये माइक है," टिंकू ने कहा, बिना डरे, और मुझे अंदर से गर्व हुआ।

"माइक," चंद्रेश ने दोहराया, मानो नया शब्द सीख रहा हो। "अच्छा। और कैमरा? ये भी आपका है?"

"मेरा है," मीरा ने कहा। "और चल रहा है।"

चंद्रेश की आँखें कैमरे पर गईं। उसकी मुस्कान ज़रा सी कसी, फिर फिर से ढीली हो गई।

"चलने दीजिए," उसने कहा। "अदालत में भी तो कुछ देखा जाएगा।"

वो आगे बढ़ा और मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया।

"अब जो आपके पास है, वो मुझे दीजिए," उसने कहा। "खाता, तस्वीर, काग़ज़ — जो भी है। ज़ब्ती का सामान है।"

मैंने हाथ पीछे नहीं खींचा। मैंने सीधे उसकी आँखों में देखा।

"आप किस हैसियत से माँग रहे हैं?" मैंने पूछा।

"वकील की हैसियत से," उसने कहा। "और गली के हित की हैसियत से।"

"गली का हित कब से आपके दफ़्तार के दराज़ में रहने लगा?" मैंने कहा।

एक सिपाही आगे आया। वो लंबा था, मुँछों वाला, और उसकी आँखें थकी हुई थीं — जैसे वो बारह घंटे की ड्यूटी के बाद भी यहाँ खड़ा हो।

"तुम्हें थाने चलना पड़ेगा," उसने कहा। "बिना इजाज़त घुसना, सामान छेड़ना — सब रजिस्टर में लिखा जाएगा।"

मेरा हाथ अपने आप जेब की तरफ़ गया। घंटी वहाँ थी, अब भी गरम।

तभी —

तभी सिपाही की जेब से फोन बजा।

वो पीछे हटा, फोन निकाला, देखा और उसका चेहरा बदल गया।

"दुबे सर," उसने चंद्रेश की तरफ़ देखते हुए कहा, "थाने से।"

उसने फोन कान पर रखा और हाँ-हूँ करने लगा। फिर उसने फोन चंद्रेश की तरफ़ बढ़ाया।

"सर, आपसे बात करनी है।"

चंद्रेश ने फोन लिया।

"दुबे जी," उसने मीठी आवाज़ में कहा। "हाँ… हाँ… बिल्कुल… पर ये लोग—"

फिर वो चुप हो गया। उसकी मुस्कान धीरे-धीरे पतली होने लगी, जैसे धूप में कोई काग़ज़ मुड़ता हो।

"पर दुबे जी," उसने कहा, "काग़ज़ ज़ब्ती का मामला है…"

फिर चुप।

"अच्छा," उसने कहा। "ठीक है। जैसा आप कहें।"

उसने फोन सिपाही को लौटाया और मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ बदल गया था। गुस्सा नहीं — कोई हिसाब। जैसे उसने मन में कुछ जोड़-घटा लिया हो।

"दुबे जी का कहना है," उसने कहा, "कि पहले मामला सुना जाए। सुना जाए, समझा जाए, फिर जो कानून कहे।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने बहुत हल्का सिर हिलाया।

"पर सुनने से पहले," चंद्रेश ने कहा, और उसकी आवाज़ फिर से मीठी हो गई, "सबूत तो सबूत होता है। वो अपनी जगह रहेगा।"

वो मेरी तरफ़ बढ़ा और उसने अपना हाथ फैला दिया।

"खाता," उसने कहा।

मेरी जेब से वो जला खाता नहीं निकला — वो तो सिपाही ले जा चुका था। पर मेरे पास रणवीर की जवानी की तस्वीर थी, वो धूल भरी पुरानी तस्वीर जिसमें वो मेरी दुकान के सामने खड़ा था, उसी पीतल के ताबीज़ के साथ। और उसके पीछे लिखा था — शंकरलाल, और नीचे नया जोड़ा — भारद्वाज।

मैंने वो तस्वीर जेब से निकाली और उसकी हथेली पर रख दी।

"ये भी सबूत है," मैंने कहा। "आपके साहब ने ये दीवार पर टाँगी थी।"

चंद्रेश ने तस्वीर को उलट-पलट कर देखा। उसने पीठ पर लिखा पढ़ा और उसकी आँखों में वो हिसाब फिर चला।

"अच्छा," उसने कहा।

और फिर उसने वो तस्वीर अपने पीले थैले में डाल दी।

"ये मेरे पास रहेगी," उसने कहा। "अदालत में पेश होगी।"

"आपके पास रहेगी या आपके दराज़ में?" मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ तेज़ थी और कैमरा अब भी चल रहा था।

चंद्रेश ने उसकी तरफ़ देखा, बिना गुस्सा हुए।

"बेटी," उसने कहा, "ये जो कैमरा आपके हाथ में है, इससे आप दुनिया को दिखा देंगी, ऐसा नहीं होता। दुनिया अपनी मर्ज़ी से देखती है। अदालत अपने काग़ज़ से। और मेरे पास काग़ज़ हैं।"

"और हमारे पास सच है," मीरा ने कहा।

"सच," चंद्रेश ने दोहराया, उसकी आवाज़ में जैसे कोई पुरानी, प्यारी चीज़ हो। "सबके पास होता है। अदालत में सब अपना सच लाते हैं। जीत उसकी होती है जिसका काग़ज़ टिक जाए।"

वो पीछे मुड़ा और सिपाहियों की तरफ़ देखा।

"अब सुनते हैं," उसने कहा। "दुबे जी ने कहा है तो सही। पर ज़्यादा देर नहीं। रात बारह बजे इस मंज़िल पर मुहर लगनी है।"

वो हॉल के कोने की तरफ़ बढ़ा, जहाँ एक पुरानी लकड़ी की बेंच रखी थी। उसने अपना पीला थैला उस पर रखा, खुद बैठा, और फ़ाइल खोलकर पढ़ने लगा — जैसे हम वहाँ हों ही नहीं।

तभी कुछ हुआ।

भीड़ थी — गेट के बाहर, सलाखों के पीछे, गली के लोग जमा हो गए थे। मुझे सानिया की आवाज़ सुनाई दी — "अरे, वो जा रहा है!" — और फिर गुड्डू की — "कौन? कौन?"

मैंने पीछे देखा।

भीड़ के बीच से एक मोटा साया खिसक रहा था। धीरे-धीरे, दीवार से सटकर, एक-एक कदम, कोई जल्दी नहीं — जैसे कोई बाज़ार में सामान देख रहा हो। पर उसकी चाल पहचानी हुई थी। वो चाल जो हमेशा एक तरफ़ झुककर चलती है, जैसे एक जेब भारी हो।

बबलू।

वो गली के मोड़ की तरफ़ बढ़ रहा था, और एक भी आदमी उसे रोक नहीं रहा था। क्योंकि भीड़ की नज़र ऊपर थी, भवन की खिड़कियों पर, सिपाहियों पर, मीरा के कैमरे पर।

"बबलू!" मैंने आवाज़ दी।

वो रुका। एक पल के लिए। फिर उसने कंधे के ऊपर से पीछे देखा — उसकी आँखें मिलीं — और उस आँखों में जो था, उसने मुझे अंदर तक ठंडा कर दिया।

डर। सिर्फ़ डर। वो डर जो बातों में छिपता है, हँसी में छिपता है, सोने की चेन में छिपता है, पर छिपता है — मिटता नहीं।

और फिर वो मुड़ा और भीड़ में घुल गया, जैसे पानी में स्याही।

मैं हिला नहीं। मेरे पैर भी नहीं हिले। क्योंकि मुझे उस पल में कुछ समझ आ गया था, और वो बात इतनी साफ़ थी कि मुझे अंदर से गुस्सा आया — खुद पर।

बबलू भागा नहीं था।

बबलू वापस बन गया था।

वो आदमी जो आज देर शाम गुमटी पर आया था, जिसने सच बताया था, जिसने पिछला दरवाज़ा, गार्ड का सात मिनट, तीसरी मंज़िल — सब बताया था — वो आदमी अब ख़त्म हो गया। उसकी जगह फिर वही पुराना बबलू आ गया था। क्योंकि सामने रणवीर खड़ा था, और सामने रणवीर खड़ा हो तो बबलू के हाथ काँपते हैं — यह मैं आज देख चुका था, थाने में भी, और यहाँ भी।

और मैंने अंदर से कहा — नहीं, बबलू। एक बार तो तूने सीधा खड़े होकर देखा था। एक बार तो तेरी आवाज़ काँपी थी, पर बोली थी। अब भाग के तू उसी पुराने कुएँ में गिर गया।

मैंने साँस ली।

तभी मेरे बगल से एक आवाज़ आई — रोने जैसी, पर रोना नहीं, उससे भी बुरी। जैसे किसी की साँस फँस गई हो और छूटने का रास्ता न मिल रहा हो।

भोला भाई।

वो मेज़ के पास खड़ा था, दोनों हाथ सामने लटके हुए, और उसकी आँखों से पानी बह रहा था — बिना आवाज़। वो रो रहा था जैसे आदमी रोता है जब कोई देख न रहा हो। पर देख रहे थे। बहुत लोग देख रहे थे।

"उस्ताद जी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई। "मैंने सब बता दिया… सब कुछ… जो मैंने साल भर सीने में दबाकर रखा था…"

"भोला भाई—"

"अब मेरी नौकरी तो गई ही," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में अब केवल दर्द था, "आरज़ू का इलाज भी रुक जाएगा। उसकी दवा—" उसने हाथ से हवा में कुछ पकड़ने की कोशिश की, जैसे दवा वहीं कहीं उड़ रही हो। "उसकी दवा उसी दफ़्तार से आती थी, अंकुश जी। उसी दफ़्तार से।"

मेरा गला सूख गया।

मैंने उसके पास जाकर उसके कंधे पर हाथ रखा। उसका कंधा हड्डी जैसा था, कपड़े के नीचे सिर्फ़ हड्डी।

"भोला भाई," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ जितनी नरम हो सकती थी, उतनी नरम थी। "तुमने सच बोला।"

वो रुका। उसने मेरी तरफ़ देखा।

"ये कम बात नहीं है," मैंने कहा। "ग्यारह साल चुप रहने के बाद, एक रात में, तीन आदमियों के सामने, कैमरे के सामने, अपने साहब के सामने — तुमने सच बोला। भोला भाई, इस गली में कितने आदमी हैं जो ये कर सकते हैं?"

"पर उससे दवा नहीं आएगी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ बच्चे जैसी थी।

"दवा आएगी," मैंने कहा। "आएगी। पर पहले तुम ये सुनो — तुमने जो किया, वो करने के लिए आदमी को अपने अंदर का सबसे डरा हुआ हिस्सा मारना पड़ता है। तुमने मारा। अब तुम वो आदमी नहीं हो जो कल था।"

उसने आँखें बंद कीं और उसके कंधे काँपने लगे।

मैंने उसे वहीं बेंच पर बैठा दिया और उसके सामने घुटने के बल बैठ गया।

"अब सुन," मैंने धीरे से कहा, ताकि सिर्फ़ वो सुने। "आरज़ू की दवा की बात मेरे सिर पर है। मेरे सिर पर। तू ये सोचकर मत सो कि तू अकेला है। कल सुबह — सुबह क्या, आज रात — हम इसका रास्ता निकालेंगे।"

"कैसे?" उसने पूछा, और उसकी आँखों में पहली बार कुछ और था — डर नहीं, सवाल।

"पता नहीं," मैंने कहा। "अभी नहीं पता। पर निकलेगा। हमारे पास जो है, वो तेरे पास नहीं था — अब हम सब एक जगह हैं।"

उसने मेरी तरफ़ देखा और कुछ कहने को हुआ, पर कह न सका। उसने सिर्फ़ मेरा हाथ पकड़ा और दबाया। उसकी पकड़ में वो ताक़त थी जो रोने के बाद आती है — थकी हुई, पर सच्ची।

मैं उठा।

और जब मैं उठा तो देखा — मीरा मेरी तरफ़ देख रही थी। उसका कैमरा अभी भी चल रहा था। पर उसका हाथ काँप रहा था। कैमरा उसके हाथ में हल्का-सा हिल रहा था, और वो हिलना उस लाल बत्ती में साफ़ दिख रहा था, जैसे कोई दीया हवा में जल रहा हो।

उसने मेरी आँखें मिलीं और उसने धीरे से कैमरा नीचे किया।

"बंद कर देती हूँ," उसने कहा।

मैंने सिर हिलाया।

उसने बटन दबाया। लाल बत्ती बुझ गई।

और उस पल, उस बुझी लाल बत्ती के साथ, मुझे लगा कि हम चारों — मैं, वो, टिंकू, काजल — एक अजीब सी खाली जगह में खड़े हैं। जहाँ अभी तक कोई नहीं देख रहा था। जहाँ हम सिर्फ़ अपने थे।

मीरा ने कैमरा सीने से लगाया और उसके हाथ अब भी काँप रहे थे।

"मीरा," मैंने धीरे से कहा।

"मैं ठीक हूँ," उसने कहा, बहुत जल्दी।

"तेरे हाथ काँप रहे हैं।"

"पता है," उसने कहा, और अपने हाथों को देखा, जैसे पहली बार देख रही हो। "दो सौ सत्तर लोग देख रहे थे, अंकुश। दो सौ सत्तर। मैं उन सबको देख रही थी — स्क्रीन पर, एक-एक टिप्पणी, एक-एक नाम। मैंने कभी इतने लोगों के सामने कुछ नहीं किया।"

"तूने किया," मैंने कहा।

"मैंने क्या किया?" उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो कड़वाहट आई जो सिर्फ़ उसके पास है। "मैंने सिर्फ़ कैमरा चालू रखा।"

"तूने उन्हें देखने दिया," मैंने कहा। "यही तो करना था। छिपाने की जगह दिखाना। यही फ़र्क़ है तेरे और मेरे बीच — मैं मरम्मत करता हूँ, तू गवाही देती है।"

वो हँसी। थोड़ी-सी। एक हल्की हँसी, जैसे बरसात में पहली बूँद।

"तू फ़िलॉसफ़र बन गया है," उसने कहा।

"मैं साइकिल मिस्त्री हूँ," मैंने कहा। "साइकिल मिस्त्री को फ़िलॉसफ़ी आती है।"

काजल ने भी हल्का सा मुँह बनाया — वैसे ही जैसे घर में करती है जब मैं कोई बड़ी बात कह देता हूँ।

पर हमारे बीच का माहौल भारी था। जितनी देर में हम हँसे, उतनी देर में हॉल के कोने से काग़ज़ खिसकने की आवाज़ आई।

चंद्रेश अपनी फ़ाइल बंद कर रहा था।

वो उठा, अपना पीला थैला उठाया, और सिपाहियों की तरफ़ देखा।

"अब चलते हैं," उसने कहा।

"कहाँ?" मैंने कहा।

"थाने," उसने कहा। "दुबे जी ने बुलाया है। मामला सुना जाएगा।"

"और ये?" मैंने सिपाही के हाथ की तरफ़ इशारा किया, जिसमें भोला का जला खाता दबा था।

"ये भी चलेगा," चंद्रेश ने कहा। "रजिस्टर में दर्ज होगा, नंबर लगेगा, और जब अदालत कहेगी तब बाहर आएगा।"

"ये उसका खाता है," मीरा ने कहा। "उसने ये जलते काग़ज़ों से निकाला है। ये उसका सबूत है।"

"बेटी," चंद्रेश ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो थकान आई जो झूठी होती है, "सबूत अदालत का होता है, आदमी का नहीं। जो काग़ज़ आदमी के पास रहता है, वो काग़ज़ नहीं, कहानी होती है। और कहानियाँ किसी भी तरह मुड़ जाती हैं।"

वो जैसे हमें सिखा रहा था, बड़े प्यार से, बड़े सब्र से।

और मुझे उसकी बात का एक हिस्सा सच लगा — और यही सबसे बुरा था।

क्योंकि मेरे पास कोई काग़ज़ नहीं था। मेरे पास तस्वीर थी — जो अब उसके थैले में थी। मेरे पास खाता था — जो अब सिपाही के हाथ में था। मेरे पास घंटी थी, चाबी थी, पेचकस था, और माँ-पापा का सच था।

पर इनमें से किसी पर मुहर नहीं थी।

तभी —

तभी मेरी जेब में घंटी हिली।

धीरे से। बहुत धीरे से, जैसे किसी ने सोते हुए बच्चे को छुआ हो। वो गरम थी और उस गरमाहट में एक शब्द आया, इतना धीमा कि मुझे लगा मैंने सुना नहीं, याद किया है।

"खाता।"

मैं रुका।

"नकल करके रखो," घंटी ने कहा।

मैंने आँखें बंद कीं।

"क्या?" मैंने फुसफुसाया।

पर घंटी चुप हो गई।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो मुझे देख रही थी, और उसका चेहरा कह रहा था कि उसने मेरी आँखों में कुछ बदलते देखा है।

"क्या कहा?" उसने पूछा।

मैं उसके पास गया।

"तेरे पास उस खाते की तस्वीर है?" मैंने पूछा।

"दो," उसने कहा। "दो तस्वीरें। मैंने सभा वाले दिन भी ली थीं।"

"भेज दे," मैंने कहा। "अभी। किसी ऐसे को जिस पर भरोसा है। और खुद भी रख।"

वो एक पल मेरी आँखों में देखती रही, फिर समझ गई।

"तू सोच रहा है कि वो खाता वापस नहीं आएगा," उसने कहा।

"मैं सोच रहा हूँ," मैंने कहा, "कि उसने आज रात जो भी देखा, वो सब उसके थैले में जाएगा। और वो थैला उस दफ़्तार में जाएगा जहाँ से चीज़ें वापस नहीं आतीं।"

मीरा ने फोन निकाला।

उसके हाथ अब भी काँप रहे थे, पर टाइप करने लगे थे — तेज़, तय, बिना रुके।

"भेज दिया," उसने कहा। "माँ के नंबर पर। और एक अपने ईमेल पर।"

"माँ के नंबर पर?" मैंने कहा।

"माँ को कोई नहीं ढूँढता," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो पुरानी चतुराई थी। "माँ के फोन में पाँच साल पुरानी तस्वीरें हैं, किसी को शक नहीं होगा।"

मैं हँसा। ज़ोर से नहीं, अंदर से।

तभी चंद्रेश ने हमारी तरफ़ देखा।

"क्या बात हो रही है?" उसने पूछा।

"कुछ नहीं," मीरा ने कहा, और फोन जेब में रख दिया। "माँ को बता रही हूँ कि देर होगी।"

चंद्रेश ने एक पल उसे देखा। फिर उसने कुछ नहीं कहा। वो मुड़ा और सिपाहियों की तरफ़ बढ़ा।

"चलो," उसने कहा।

और हम चले — सीढ़ियों से नीचे, ग्राउंड फ्लोर के बड़े हॉल से, बंद लोहे के गेट तक, जिसे एक सिपाही ने चाबी से खोला। गेट खुलते ही बाहर की हवा अंदर आई — ठंडी, थोड़ी नमी वाली, गली की हवा। मुझे लगा जैसे बरसों बाद साँस ली हो।

गली में लोग थे। बहुत लोग। चबूतरी के पास, नाली के पुल पर, मोड़ पर, दुकानों के सामने — सब जमा।

शबनम आपा सबसे आगे थी, हाथ में वो लोहे की चिमटी। उस्ताद अली बक्श अपनी दुकान के बाहर खड़े थे, गले में मापने का फीता, और उनकी आँखें सीधे मेरी तरफ़ थीं। दुबे अंकल थाने की तरफ़, अपनी कुर्सी पर नहीं, खड़े थे।

और पीपल के नीचे, चबूतरी के पास, माँ खड़ी थी।

माँ।

उनके हाथ में एक छोटा डिब्बा था — वही स्टील का डिब्बा जो वो सुबह लेकर आई थीं। और उनके पीछे पापा खड़े थे, वो टेप बँधा चश्मा पहने, हाथ में पुरानी रिंच, और उनका चेहरा उस पुरानी गली की तरह शांत था — जैसे सब जानता हो और कुछ न कहे।

मैंने माँ की तरफ़ देखा और मेरे कदम रुक गए।

"अंकुश," मीरा ने धीरे से कहा, "चल ना।"

"हाँ," मैंने कहा, और चला।

पर जैसे ही मैं आगे बढ़ा, घंटी फिर हिली।

इस बार ज़ोर से।

इतनी ज़ोर से कि मेरी जेब में वो काँपी और मुझे लगा जैसे कोई मेरी छाती के अंदर से आवाज़ दे रहा हो।

और उसने कहा —

"आज कोई बड़ा जोड़ टूटने वाला है।"

मेरे पैर वहीं जम गए।

"क्या?" मैंने फुसफुसाया।

"कौन सा?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ में जो उभरी, वो डर नहीं था — वो उस पुरानी चीज़ का एहसास था जो तब आता है जब आपको पता चल जाए कि कुछ आ रहा है और आप उसे रोक नहीं सकते।

घंटी ने कुछ नहीं कहा।

मैंने अपनी आँखों से गली को देखा — शबनम, उस्ताद, दुबे अंकल, माँ, पापा, टिंकू, काजल, मीरा, भोला, सिपाही, चंद्रेश, भीड़।

सब वहीं थे।

कोई टूटता नहीं दिख रहा था।

पर घंटी कभी झूठ नहीं बोलती थी।

मैंने गहरी साँस ली और आगे बढ़ा — चबूतरी की तरफ़, माँ की तरफ़, पापा की तरफ़, थाने की तरफ़।

और मेरे अंदर एक आवाज़ थी, बहुत शांत, बहुत साफ़:

"अंकुश, आज रात तेरे हाथ में सिर्फ़ एक चीज़ है — तेरे हाथ। और तेरे साथ जो लोग खड़े हैं, वो तेरे पास हैं। जो टूटने वाला है, उसे पहले पहचान। क्योंकि अगर तू नहीं पहचानेगा, तो उसे तोड़ने वाला पहचान जाएगा।"

मैंने चबूतरी की तरफ़ आँखें उठाईं और मन में बोला —

"दिखा दे। कौन टूटने वाला है।"

और ठीक उसी पल, माँ ने अपना डिब्बा खोला।

॥

माँ ने डिब्बा खोला।

और मैंने साँस रोक ली।

डिब्बे में सबसे ऊपर एक मुड़ा हुआ पन्ना था — माँ की हिसाब की कॉपी का, जिसके कोने पीले पड़ चुके थे और किनारे उँगली से बार-बार दबाने से घिस गए थे। उसके नीचे एक लिफ़ाफ़ा था, जिस पर कोई नाम नहीं लिखा था, बस एक छोटी सी तारीख़ और उसके नीचे माँ की लिखाई में दो शब्द — "बचा हुआ।"

और उसके नीचे, सबसे नीचे, एक छोटी सी पीतल की कड़ी थी। जिस तरह की कड़ी बच्चों के हाथ में पहनाई जाती है, फिर कभी नहीं निकाली जाती। कड़ी पर एक फूल खुदा था — छोटा, मामूली सा, जिसे देखकर मुझे उस्ताद की दुकान की दराज़ याद आई।

माँ ने वो पन्ना उठाया और बिना कुछ कहे मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।

मैंने लिया।

चबूतरी के नीचे लगी पीली रोशनी में उनकी लिखाई पढ़ी — काँपती, हड़बड़ाई, जैसे लिखते वक़्त हाथ नहीं, दिल लड़खड़ा रहा हो।

"पापा ने अंगूठा लगाया। मैं जानती थी। मैंने पूछा नहीं। मैंने बचाने के लिए चुपी चुनी। मेरी भी ग़लती है।"

नीचे तारीख़ थी। और तारीख़ के नीचे, उसी पन्ने पर, माँ ने एक और लाइन जोड़ी थी, बाद में, किसी और दिन, काले पेन से, ज़ोर से दबाकर —

"अब नहीं चुपूँगी।"

मेरे हाथ काँप रहे थे।

मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर वो चीज़ नहीं थी जो मैं ज़िंदगी भर देखता आया था — वो सहमी हुई, हर वक़्त कुछ छिपाती हुई, हर बात पर "कुछ नहीं हुआ" कह देने वाली चुप्पी। उनकी आँखें सूखी थीं। बिल्कुल सूखी। जैसे रोने का सारा पानी उन्होंने उन बाईस सालों में बहा दिया हो और अब सिर्फ़ साफ़ दिखने वाली चीज़ बची हो।

"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फट गई।

"पहले पूरी भीड़ के सामने सुन ले," उन्होंने कहा।

और वो मुड़ीं।

माँ ने पूरी गली की तरफ़ मुँह किया — शबनम आपा, उस्ताद, दुबे अंकल, भोला, चंद्रेश, सिपाही, सब। चंद्रेश की आँखें सिकुड़ गईं।

"यह डिब्बा," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ गली के हर कोने तक पहुँची, "…मैं सुबह से लिए घूम रही हूँ। इसमें मेरे बचाए हुए सात सौ इकहत्तर रुपये हैं। वकील के लिए। अंगूठा मिटाने के लिए। और एक पन्ना है — जिस पर मैंने अपनी ग़लती लिखी है।"

गली में सन्नाटा छा गया।

"मैंने बाईस साल चुप रहकर सोचा था कि मैं अपने घर को बचा रही हूँ।" उन्होंने कहा। "आज मुझे पता चला कि मैंने सिर्फ़ डर को खाना खिलाया।"

उन्होंने डिब्बा बंद किया और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।

"यह तेरे पास रहेगा," उन्होंने कहा। "क्योंकि जो मैं बाईस साल नहीं बोल पाई, वो अब कोई और बोलेगा — और वो तू है।"

मैंने डिब्बा लिया। भारी था। सात सौ इकहत्तर रुपये का वज़न नहीं था उसमें। बाईस साल की चुप्पी का वज़न था।

चंद्रेश आगे आया।

"सुशीला जी," उसने मीठी आवाज़ में कहा, "यह सब भावुकता अच्छी लगती है, पर काग़ज़—"

"काग़ज़ कल सुबह दस बजे देख लूँगा," मैंने कहा, और उसकी बात काट दी। "आपने ही तो बुलाया है।"

चंद्रेश ने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो मुस्कान आई जो उसके चेहरे से कभी नहीं उतरती, जैसे चिपकी हुई हो।

"हाँ," उसने कहा। "बुलाया है। और मैं तुम्हें याद दिला दूँ — काग़ज़ के साथ आना। बयान के साथ आना। और भोला का खाता तो सरकारी हिरासत में है, याद रखना।"

भोला ने सुना और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

चंद्रेश मुड़ा और सिपाहियों के साथ चला गया। उसके जाने के बाद गली में जो आवाज़ उठी, वो किसी एक की नहीं थी — वो पूरी गली की थी। बातें, सवाल, "ये क्या हो रहा है", "हम फँस गए", "अब क्या होगा"।

शबनम आपा ने अपनी चिमटी उठाई और चबूतरी के पत्थर पर ज़ोर से पटकी।

टन्।

सब चुप।

"अब सुनो," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो बारूद में होती है। "जो डर गया है, वो घर जाए और दरवाज़ा बंद करके बैठ जाए। पर याद रखे — वो दरवाज़ा भी किसी को सौंपना पड़ेगा। और जो नहीं डरा है, वो मेरी गुमटी पर आए। आज रात चाय मेरी तरफ़ से। और डाँट भी।"

मैं हँसा।

गली में पहली बार उस शाम कुछ हिला।

लोग हँसे नहीं, पर कंधे ढीले हुए। कुछ लोग गुमटी की तरफ़ चल पड़े। उस्ताद ने गले का फीता उतारकर जेब में रखा और दुकान का शटर आधा गिराया। दुबे अंकल ने मेरी तरफ़ देखा, धीरे से सिर हिलाया, और अपनी कुर्सी की तरफ़ लौट गए।

मीरा ने मेरा कंधा छुआ।

"अंकुश," उसने धीरे से कहा। "माँ ने जो किया… वो आसान नहीं था।"

"जानता हूँ," मैंने कहा।

"और घंटी ने जो कहा—"

"जानता हूँ," मैंने दोहराया, और मेरी आवाज़ में वो तीखापन आ गया जो मुझे खुद पसंद नहीं।

मीरा ने कुछ नहीं कहा।

रात ग्यारह बजे के आसपास गुमटी पर लोग जमा हुए। बहुत लोग नहीं — गिनती की लोग। शबनम आपा, उस्ताद, दुबे अंकल, भोला, माँ-पापा, काजल, टिंकू, मीरा, रज़िया — जो अब गुमटी के पीछे वाले कमरे में रहने लगी थी — और गली के चार-पाँच और लोग, जिनमें नसीमा बाई का बेटा साजिद और रमेश भाई थे।

शबनम आपा ने एक-एक को चाय पकड़ाई। खुद नहीं बैठी। खड़ी रही, हाथ में केतली, और हर किसी को देखती रही जैसे कोई माँ अपने बच्चों को स्कूल भेजने से पहले देखती है।

"एक बात साफ़ कर दूँ," उसने कहा, जब सबके हाथ में कप आ गए। "आज रात यहाँ कोई रोएगा नहीं। रोने से पेट नहीं भरता, और कल सुबह सात बजे मशीन आ रही है। जिसे रोना है, वो कल शाम को आए, जब काम हो जाए।"

किसी ने कुछ नहीं कहा।

"अब बताओ," उसने कहा। "क्या है जो हमारे पास है?"

"कुछ नहीं," रमेश भाई ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो हारे हुए आदमी की आवाज़ में होती है। "सब काग़ज़ उनके पास है। हमारे पास सिर्फ़ अंगूठे हैं, जो हमने खुद लगा दिए।"

"तो अंगूठे ही सही," उस्ताद ने कहा, और सबने उनकी तरफ़ देखा। वो अपनी लाठी पर झुके बैठे थे, और उनकी आवाज़ धीमी थी, जैसे पुरानी मशीन की टिक-टिक। "काग़ज़ उनका है। पर अंगूठा हमारा है। और जो अंगूठा अपनी मर्ज़ी से लगा है, वो कभी न कभी अपनी मर्ज़ी से कटेगा भी।"

"कब?" रमेश भाई ने पूछा।

"जब कोई उसे काटने की हिम्मत करे," उस्ताद ने कहा।

तभी दरवाज़े पर आहट हुई।

सबने देखा।

बबलू था। पर वो वाला बबलू नहीं जिसे मैं जानता था। न सोने की चेन, न पानदान, न पान। कमीज़ की जेब उलटी हुई थी, बाल बिखरे थे, और उसकी आँखें — उसकी आँखें लाल थीं। जैसे उसने रात भर रोया हो और फिर भी आँसू न सूखे हों।

वो दरवाज़े पर खड़ा रहा। अंदर नहीं आया।

"बबलू," शबनम आपा ने कहा, और उसकी आवाज़ सख़्त थी। "अंदर आ।"

"नहीं," उसने कहा। और उसकी आवाज़ में वो फटाहापन नहीं था। वो सूखी थी, जैसे किसी ने उसका गला निचोड़ दिया हो। "मैं आया हूँ बताने। फिर चला जाऊँगा।"

"क्या बताने?" मैंने कहा, और मैं खड़ा हो गया।

वो मेरी तरफ़ देख नहीं रहा था। वो ज़मीन देख रहा था।

"मैंने भोला की बात बताई थी," उसने कहा। "वो चिट्ठी, वो नौकरी, वो आरज़ू की दवा… सब। साहब को पता चल गया कि मैंने तुम्हारी मदद की।"

मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ।

"कैसे पता चला?" मीरा ने पूछा।

"पता नहीं," बबलू ने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई। "मैंने किसी को नहीं बताया था। पर उन्हें पता चल गया। और अब…"

वो रुका।

"अब क्या?" मैंने कहा।

"भोला को नौकरी से निकाला जा चुका है।" उसने कहा। "और आज शाम सात बजे अस्पताल से फोन आया था। आरज़ू की दवा बंद। कह दिया गया कि मरीज़ की फाइल में काग़ज़ी गड़बड़ है।"

गुमटी में सन्नाटा छा गया।

मैंने भोला की तरफ़ देखा। वो बैठा था, हाथ में ठंडी होती चाय, और उसका चेहरा पत्थर जैसा था। वो रोया नहीं। मुझे लगा यही सबसे बुरा था — कि वो अब रो भी नहीं सकता था।

"आठ साल की बच्ची है," भोला ने कहा, और उसकी आवाज़ जैसे किसी और की थी। "रात में दौरे पड़ते हैं। उसकी दवा बंद करने का मतलब है कि कुछ ही दिन हैं।"

मेरे हाथ की मुट्ठी बंद हो गई।

और उस पल, मुझे लगा कि मेरे अंदर से कुछ बाहर निकलेगा। गुस्सा। वो गुस्सा जो गली के मोड़ पर रणवीर के सफ़ेद कपड़ों को देखकर आता है। जो मुझसे कहता है — भाग कर जा, उस भवन के दरवाज़े पर ठोकर मार, ज़मीन पर गिरा, जो करना है कर। मुझे भोला का सफ़ेद चेहरा दिख रहा था, आरज़ू का चेहरा दिख रहा था जिसे मैंने कभी नहीं देखा, बस सुना था — आठ साल की बच्ची, जिसके दौरे पड़ते हैं, और जिसकी दवा रुक गई।

मैंने अपने हाथ खोले।

देखे।

उन पर ग्रीस के निशान थे। पुराने। किसी साइकिल की चेन के। किसी टूटी रॉड के। मेहनत के निशान।

और मैंने महसूस किया — यही हाथ हैं जो तोड़े नहीं, जोड़ते हैं। यही हाथ हैं जिनके बारे में पापा ने कहा था — तोड़ना मत, खोलना और जोड़ना।

मैंने गहरी साँस ली।

"भोला भाई," मैंने कहा।

उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो डर था — कि मैं भी कहूँगा, "देखा, मैंने कहा था न।"

"आपकी बेटी को दवा मिलेगी," मैंने कहा।

"कैसे?"

"पता नहीं," मैंने कहा। "पर मिलेगी।"

और यह पहली बार था जब मैंने झूठ नहीं बोला। यह मुझे पता था कि नहीं। क्योंकि मुझे नहीं पता था कि कैसे।

सिर्फ़ इतना पता था कि मैं इसे वैसे नहीं छोड़ूँगा।

मीरा ने अपनी कॉपी खोली।

"मैंने सोचा है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो आज पूरे दिन नहीं थी — दिशा। "हम रणवीर के खिलाफ़ अब और काग़ज़ नहीं ढूँढेंगे।"

"तो क्या?" काजल ने पूछा।

"लोग," मीरा ने कहा। "हमें लोगों की गवाही चाहिए।"

"गवाही?" रमेश भाई ने कहा। "कौन गवाही देगा? सब डरे हुए हैं।"

"सब नहीं," मीरा ने कहा, और उसने कॉपी पलटी। "जो लोग अंगूठा लगा चुके हैं, उनमें से कोई न कोई अब भी सच बोल सकता है। बस उसे एक ऐसा आदमी चाहिए जो पहले बोले। जो पहला नाम ले।"

"और वो पहला नाम कौन लेगा?" उस्ताद ने पूछा।

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।

"वो जो सबसे ज़्यादा हारा हुआ है," उसने कहा। "क्योंकि जिसके पास कुछ नहीं बचता, वो ही सबसे ज़ोर से बोलता है।"

शबनम आपा ने केतली रखी और अपनी कटोरी उठाई।

"कल सुबह," उसने कहा, "सात बजे, मशीन आने से पहले, सब यहीं। टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — इनके नाम लिखे जाएँगे। जो-जो अंगूठा लगा चुका है, उसका नाम। और जो गवाही देगा, उसके लिए मेरी गुमटी का कोना खाली है।"

"और अगर कोई नहीं आया?" किसी ने पीछे से पूछा।

"तो हम अकेले खड़े रहेंगे," शबनम ने कहा। "पर खड़े रहेंगे।"

मैं गुमटी से निकला तो रात गहरी थी। पीपल के नीचे अंधेरा था। गली में सिर्फ़ गुमटी की पीली रोशनी बची थी और दूर थाने की लाल बत्ती।

माँ-पापा मेरे साथ घर चले।

रास्ते में कोई कुछ नहीं बोला। पापा की रिंच उनके हाथ में थी, और उनका चश्मा टेप से बँधा था, और वो चलते हुए ऐसे देख रहे थे जैसे कोई बहुत पुरानी बात याद कर रहे हों।

घर पहुँचे।

माँ सीधी रसोई में गई। काजल उनके पीछे। मैंने पापा को बैठक में बैठते देखा और मैं उनके पास गया।

"पापा," मैंने कहा।

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"वो चाबी," मैंने कहा, और मैंने गले से निकालकर उन्हें दिखाई। "जो मुझे तुमने पंद्रह साल की उम्र में दी थी। तुमने कहा था — संभालकर रखना, इसका कोई न कोई मतलब है।"

पापा ने चाबी देखी।

उन्होंने हाथ बढ़ाया, और मैंने चाबी उनकी हथेली पर रख दी।

वो चाबी को देखते रहे — जैसे किसी को बरसों बाद देखा हो।

"यह किसी दुकान की नहीं है," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी थी।

"तो?"

"यह उस ताले की है," उन्होंने कहा, "जो हमारे घर में पीढ़ियों से रखा है। जिसके बारे में बस इतना पता है कि इसे कभी नहीं खोलना। और यह चाबी… यह चाबी उसी की है।"

"कहाँ है वो ताला?" मैंने पूछा।

पापा ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — शर्म। नहीं, शर्म नहीं। कुछ और।

"तू जानता है," उन्होंने कहा।

और मुझे याद आया।

मैंने रणवीर की फेंकी बड़ी काली चाबी अपनी जेब से निकाली — वो जो उसने भवन की छत पर मिट्टी पर फेंककर मुझे दी थी, यह कहकर कि मुझे इसे कभी खोलना नहीं है। मैंने उसे अपनी गले की चाबी के बगल में रखा।

दोनों चाबियाँ…

एक जैसी नहीं थीं। पर एक ही जैसी थीं। घिसे दाँते। एक ही धातु। एक ही बनावट। जैसे किसी एक आदमी ने एक बैठक में दोनों बनाई हों।

मेरा हाथ रुक गया।

"पापा," मैंने धीरे से कहा। "रणवीर के पास भी इसी जैसी चाबी है।"

पापा ने कुछ नहीं कहा।

"पापा?"

"मैंने वो ताला कभी नहीं खोला," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ टूट गई। "और शायद इसीलिए यह सब हुआ।"

तभी मेरी जेब में घंटी हिली। एक बार। धीरे से।

और उसने कहा —

"ताला लोहे का नहीं। सच्ची माफ़ी का।"

मैं बैठक में खड़ा रह गया।

"माफ़ी?" मैंने कहा।

घंटी चुप हो गई।

"माफ़ी से ताला खुलता है?" मैंने फिर पूछा। "इसका क्या मतलब है?"

कुछ नहीं।

सिर्फ़ रसोई से आती माँ की आवाज़ और काजल के हाथ में थाली की खनक।

मैं चारपाई पर बैठ गया। पापा वहीं थे, और उनके हाथ में चाबी थी और उनके चेहरे पर वो चुप्पी थी जो बाईस साल की थी और जो अब धीरे-धीरे टूट रही थी।

"पापा," मैंने कहा। "कल सुबह दस बजे मुझे दफ़्तार जाना है।"

"जानता हूँ।"

"अगर वो वहाँ मुझसे माफ़ी माँगे," मैंने कहा, "तो मैं क्या करूँ?"

पापा ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में एक पल के लिए कुछ चमका।

"माफ़ी माँगने वाले से माफ़ी लेना," उन्होंने कहा, "बहादुरी नहीं होती। माफ़ी देने वाले से देने की हिम्मत होती है। पर उससे पहले…" वो रुके। "उससे पहले तुझे पता होना चाहिए कि तू किसे माफ़ कर रहा है।"

मैं उनकी तरफ़ देखता रहा।

"तुमने किसे माफ़ किया?" मैंने पूछा।

उन्होंने चाबी मेरी हथेली पर रख दी और उठ खड़े हुए।

"अभी तक किसी को नहीं," उन्होंने कहा। "शायद इसीलिए यह ताला आज तक बंद है।"

और वो रसोई की तरफ़ चले गए।

मैं देर रात तक बैठा रहा। टिंकू अपने घर चला गया था, पर उसका कार्डबोर्ड माइक मेरे पास ही रह गया था — मेज़ पर पड़ा, काले ढक्कन वाला, जिस पर उसने पेंसिल से लिखा था "जोड़ स्कूल"। मैंने उसे उठाया और देखा, और मुझे हँसी आई — पहली बार उस दिन, सच्ची हँसी।

फिर मैंने माँ का डिब्बा खोला।

लिफ़ाफ़ा निकाला। उसमें सात सौ इकहत्तर रुपये थे — कुछ नोट पुराने, कुछ नए। कुछ सिक्के। और एक छोटी चिट्ठी, जिस पर माँ ने लिखा था — "अंकुश को, जब वो समझ जाए कि पैसा सब कुछ नहीं होता।"

मैंने वो चिट्ठी मोड़कर जेब में रखी।

और उस रात सोते वक़्त मैंने अपने आप से कहा — कल सुबह सात बजे मशीन आएगी, और दस बजे दफ़्तार है, और रात बारह बजे तीसरी मंज़िल का ताला-मुहर। सब एक ही दिन में।

पर नींद आ गई।

क्योंकि थका हुआ आदमी नींद को नहीं रोक सकता, चाहे उसके सिर पर कुछ भी हो।

सुबह मैं उठा तो सूरज निकल चुका था, और गली में एक अजीब सी आवाज़ थी — जैसे लोग इकट्ठे हों और किसी चीज़ को देख रहे हों।

मैंने चप्पल पहनी और दरवाज़ा खोला।

गली में सचमुच लोग थे। शबनम आपा, उस्ताद, दुबे अंकल, भोला — और कुछ और चेहरे जिन्हें मैंने कल रात गुमटी पर देखा था। सब मेरी दुकान के सामने खड़े थे। कोई बोल नहीं रहा था।

मैंने उनकी नज़रों की दिशा में देखा।

मेरी दुकान के शटर के ऊपर, जहाँ लकड़ी का टेढ़ा बोर्ड टँगा था — "अंकुश साइकिल रिपेयरिंग वर्क्स" — वहाँ अब दूसरा बोर्ड टँगा था। बड़ा, नया, चमकदार लकड़ी का, साफ़ पेंट किया हुआ, और उस पर सुंदर अक्षरों में लिखा था —

"रणवीर भारद्वाज।"

नीचे छोटे अक्षरों में: "साइकिल मरम्मत एवं सेवा केंद्र।"

और मेरा नाम… मेरा नाम नहीं था।

जहाँ मेरा नाम था, वहाँ सिर्फ़ पुराने पेंट का हल्का सा निशान बचा था, जैसे किसी ने बहुत मेहनत से मिटाया हो।

मैं सड़क पर खड़ा रह गया।

शबनम आपा ने कुछ कहना चाहा, पर मैंने हाथ उठाकर रोक दिया।

मैंने बोर्ड देखा। अच्छे से देखा। उसकी लकड़ी देखी। उसके कोनों पर लगी कीलें देखीं, जो अभी चमक रही थीं।

फिर मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी।

"अंकुश," टिंकू ने कहा, जो कहीं से दौड़कर आया था और हाँफ रहा था। "यह… यह रात में लगा। कोई नहीं देख पाया।"

"हाँ," मैंने कहा।

"तू कुछ बोल क्यों नहीं रहा?" उसने पूछा, और उसकी आवाज़ डर गई थी। "तू चुप क्यों है?"

मैंने अपनी हथेली देखी। ग्रीस के निशान। मेहनत के निशान।

और मैंने धीरे से कहा —

"क्योंकि जो बोलता है, वो थक जाता है। और मुझे आज थकना नहीं है।"

मैंने बोर्ड की तरफ़ आँखें उठाईं और मन में बोला — ठीक है, रणवीर। तेरा नाम मेरी दुकान पर है। अब देखता हूँ, तू इसे कितने दिन टिका पाता है।

क्योंकि बोर्ड लकड़ी का है।

और लकड़ी में दरारें पड़ती हैं।

और मैं दरारें जोड़ने वाला हूँ — तोड़ने वाला नहीं।

पर आज…

आज मुझे एक दरार चाहिए।

॥

सुबह की धूप उस दिन अजीब तरह से पीली थी। जैसे आसमान ने भी कोई बोर्ड लगा दिया हो और उसे देखकर मुस्कुरा रहा हो।

मैं गली के बीच खड़ा था, और मेरे पीछे पूरी गली खड़ी थी। शबनम आपा के हाथ में चिमटी थी, पर वो चिमटी उस दिन हथियार नहीं, सिर्फ़ औज़ार लग रही थी। उस्ताद अली बक्श अपनी लाठी के सहारे खड़े थे और उनका मोटा चश्मा उस नए बोर्ड पर टँगा हुआ था, जैसे वो बोर्ड से सवाल पूछ रहा हो। दुबे अंकल अपनी नीली शर्ट में, हाथ पीछे बाँधे, चुप खड़े थे और उनकी आँखें बोर्ड से हट ही नहीं रही थीं।

टिंकू मेरे बगल में खड़ा था और उसका कार्डबोर्ड माइक अब भी उसके हाथ में था, हालाँकि उस वक़्त किसी को माइक की ज़रूरत नहीं थी। चिंटू, सानिया, गुड्डू और रफ़ीक़ — चारों पीछे बेंच पर खड़े थे और उनके चेहरों पर वो भाव था जो बच्चों के चेहरे पर तभी आता है, जब उन्हें लगे कि कोई बहुत बड़ा खेल बिगड़ रहा है और उन्हें खेलने नहीं दिया जा रहा।

भोला भाई सबसे आगे खड़ा था। उसकी आँखें लाल थीं, कल रात से सूजी हुई थीं, और उसकी जेब में आरज़ू की ख़त्म होती दवा का पत्ता था। वो कुछ बोलना चाह रहा था, पर शायद उसके पास बोलने के लिए शब्द ही नहीं बचे थे।

और उस्ताद… उस्ताद बस पीछे खड़े हाथ में मशीन की नई सुई पकड़े थे। उस्ताद की आदत है — जब दुनिया में कुछ भी सही नहीं मिलता, तब भी वो अपनी सिलाई सोचते हैं। जैसे एक चीज़ ऐसी हो जो हमेशा बनी रहे, तो बाक़ी सब सह सकते हैं।

मैंने नए बोर्ड को देखा। लकड़ी अच्छी थी — सागौन जैसी, और पॉलिश ऐसी कि उस पर उस वक़्त सूरज की परछाईं दिख रही थी। शब्द बड़े और सुंदर थे। "रणवीर भारद्वाज" — और नीचे "साइकिल मरम्मत एवं सेवा केंद्र।"

साइकिल मरम्मत एवं सेवा केंद्र।

मैंने मन में सोचा — साइकिल मरम्मत। तो अब साइकिल ठीक होगी। पर उस साइकिल को चलाएगा कौन?

मेरे होंठों पर हल्की सी मुस्कान आई। और यह मुस्कान मेरी खुद की मुस्कान थी, किसी की मेहरबानी नहीं।

"अंकुश," शबनम आपा ने धीरे से कहा, मेरे कंधे के पास आकर। "कुछ बोल।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

क्योंकि जब तक झगड़ा नहीं होता, तब तक बोलने का कोई फ़ायदा नहीं। और मुझे उस वक़्त बोलने से ज़्यादा देखना था।

मैंने पूरी गली देखी।

किशनलाल काका अपनी किराने की दुकान के दरवाज़े पर खड़े थे, और उनके हाथ में चने का लोटा अब भी था, जैसे वो बीच में ही रुक गए हों। नसीमा बाई अपनी राशन की दुकान से बाहर आ गई थीं, और उनके हाथ में तराज़ू का पलड़ा था। भोला भाई की दुकान का शटर आधा गिरा था, और शटर के नीचे से रेडियो की आवाज़ नहीं आ रही थी — भोला ने भी रेडियो बंद कर दिया था। मार्की की दुकान बंद थी, और उनकी बंद दुकान के शटर पर आज किसी ने बैठना छोड़ दिया था।

और माँ… माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं, पल्लू हाथ में लपेटे, और उनकी आँखें भरी हुई थीं। पापा उनके बगल में खड़े थे और उनके हाथ में वो पुरानी रिंच थी, जो उस वक़्त काँप रही थी।

मैंने काजल को देखा। काजल मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसकी नज़रें कह रही थीं — बोल, भैया। कुछ बोल।

पर मैंने कुछ नहीं कहा।

मैं सिर्फ़ खड़ा रहा।

और तभी गली के मुँह से एक सफ़ेद गाड़ी आई।

उस गाड़ी की आवाज़ नहीं थी। बस धूल का एक बादल उठा, जैसे किसी ने ज़मीन पर चादर झाड़ दी हो। गाड़ी दुकान से ठीक बीस कदम दूर रुकी और उसमें से पहले सफ़ेद जूते उतरे।

फिर सफ़ेद पैंट।

फिर सफ़ेद कुर्ता।

फिर रणवीर भारद्वाज।

वो आज अपने पूरे रौब में था — कुर्ते पर कोई सिलवट नहीं, बाल साफ़ कटे हुए, और चेहरे पर वही मुस्कान जो उसकी सबसे बड़ी ताक़त है। पीछे दो काले कपड़ों वाले आदमी उतरे, और फिर एक वो मोटा आदमी जिसे मैंने कल भवन की तीसरी मंज़िल पर देखा था — वही जिसके हाथ में काग़ज़ों का बंडल था।

रणवीर ने गाड़ी से उतरकर एक बार पूरी गली देखी, और फिर उसकी आँखें मुझ पर आईं।

"अंकुश भाई," उसने हाथ जोड़े, धीरे से, जैसे कोई परिवार का बड़ा आदमी दुआ दे रहा हो। "सुबह-सुबह तकलीफ़ दी, माफ़ करना। पर यह काम आज ही होना था।"

"आपने तकलीफ़ नहीं दी," मैंने कहा, और अपनी आवाज़ मुझे खुद भी अपनी लगी — शांत, बिना काँपे। "तकलीफ़ तो मैंने खुद ली है, आपके बारे में सोच-सोचकर।"

वो हँसा। हल्की, साफ़ हँसी। और उस हँसी में बुराई नहीं थी — यही उसकी सबसे बड़ी बात है। उसकी हँसी में बुराई नहीं होती, इसीलिए लोग उसे भला मानते हैं।

"देखो," उसने अपने पीछे आए मोटे आदमी की तरफ़ इशारा किया, जो उस वक़्त बोर्ड के नीचे एक कील ठोंक रहा था। "यह बोर्ड मैंने खुद डिज़ाइन करवाया है। सागौन की लकड़ी, असली पॉलिश, और आने वाले दस साल तक टिकेगा। मुझे गली की चीज़ों से मोह है, अंकुश भाई। मैं यहाँ की मिट्टी से बना हूँ।"

"मिट्टी से बने हो," मैंने कहा, और अब मेरी आवाज़ में हल्का सा मज़ाक आ गया था — अपने आप। "तो मिट्टी को इतनी जल्दी क्यों बेच रहे हो?"

गली में एक ठंडी सन्नाटा पसर गया। कोई भी नहीं बोला। शबनम आपा ने होंठ भींच लिए।

रणवीर की मुस्कान एक इंच भी नहीं हिली। वो इस आदमी का सबसे बड़ा हुनर है — मुस्कान पर कभी दरार नहीं आती।

"बेटा," उसने कहा, और मेरे कंधे पर हाथ रखने के लिए हाथ बढ़ाया, पर मैं एक कदम पीछे हट गया तो उसने हाथ वापस किया। "आज से यह जगह मेरी है। काग़ज़ों में लिखा है। अदालत में लिखा है। सरकारी दफ़्तर में लिखा है। मैं ग़लत नहीं हो सकता।"

"काग़ज़," मैंने धीरे से दोहराया।

"हाँ। काग़ज़।"

"काग़ज़ बहुत बड़ी चीज़ है," मैंने कहा, और अब मैं बोर्ड के ठीक नीचे जाकर खड़ा हो गया — उसी जगह, जहाँ एक वक़्त पर मेरा नाम लिखा था। "काग़ज़ पर मैंने भी बहुत कुछ लिखा है। मरम्मत के हिसाब, ग्राहकों के नाम, उधार की लकीरें। सब काग़ज़ पर है। पर वो सब काग़ज़ पर लिखा होने से सच नहीं बन जाता। सच तो तब बनता है, जब कोई ग्राहक आकर कहे — भाई, तूने जो पहिया बदला था, वो आज भी कसा हुआ है।"

मैंने रुककर उसकी आँखों में देखा।

"और यह बोर्ड," मैंने ऊपर इशारा किया, "यह काग़ज़ नहीं है। यह लकड़ी है। लकड़ी पर नाम लिखने से दुकान नहीं बदलती। दुकान वो होती है जहाँ औज़ार टँगे होते हैं, जहाँ ग्रीस की गंध होती है, जहाँ सुबह चाय की केतली रखी होती है। और यहाँ… यहाँ वो सब है। इसलिए यह दुकान मेरी है। तुम्हारा बोर्ड तो सिर्फ़ मेहमान है।"

गली में पहली बार कुछ आवाज़ आई। कोई फुसफुसाया। और भोला भाई — भोला भाई, जो कल रात से रो रहा था — उसके चेहरे पर पहली बार कुछ उम्मीद जैसी चीज़ दिखी।

रणवीर ने सिर हिलाया। धीरे। जैसे किसी बच्चे की बात सुनकर सहमति दे रहा हो।

"ठीक है," उसने कहा। "तुम बहादुर बच्चा है। मैं तुम्हारी बहादुरी की क़द्र करता हूँ।"

वो मुड़ा और मोटे आदमी की तरफ़ गया, और फिर उसने कुछ कहा जो मुझे सुनाई नहीं दिया। मोटे आदमी ने बंडल खोला, और रणवीर ने उसमें से एक चीज़ निकाली।

सुनहरे रंग का एक छोटा कार्ड।

"यह क्या है?" टिंकू ने मेरे कान में फुसफुसाया।

"पता नहीं," मैंने कहा। "पर जो चीज़ चमकती हो और किसी की जेब से निकले, वो हमेशा अच्छी नहीं होती।"

रणवीर ने कार्ड मुझे दिया। मैंने उसे लिया। उस पर लिखा था — "साइकिल मरम्मत एवं सेवा केंद्र का स्वामित्व हस्तांतरण। आज शाम पाँच बजे।"

मैंने कार्ड उलटा किया। पीछे कुछ नहीं था। मैंने उसे फिर सीधा किया और पढ़ा — नीचे छोटी लाइन में लिखा था — "हस्ताक्षरकर्ता: अंकुश यादव।"

"आज शाम पाँच बजे," रणवीर ने कहा, मुस्कुराते हुए। "तुम इस काग़ज़ पर हस्ताक्षर कर दो, और बदले में मैं तुम्हें वह दे दूँगा जो तुम्हारे पास कभी था, और आज नहीं है।"

"क्या?"

वो मुस्कुराया और मुड़ गया। मोटे आदमी की तरफ़ देखा। मोटे आदमी ने गाड़ी की खिड़की से कुछ निकाला, और रणवीर के हाथ में रख दिया।

पुरानी लोहे की चाबी।

और यह वो चाबी नहीं थी जो रणवीर ने कल फेंकी थी — यह उसी जैसी थी, पर ज़्यादा पुरानी, ज़्यादा घिसी हुई, और उस पर लिपटी रस्सी पीली पड़ चुकी थी।

मेरा दिल धक्क से रह गया।

"यह?" मैंने धीरे से कहा।

"यह," रणवीर ने कहा, और चाबी को हवा में उठा दिया ताकि पूरी गली देख सके, "यह उस ताले की चाबी है जिसमें तुम्हारी खोई हुई याद बंद है। तुम्हारी सबसे प्यारी याद। जो ताले में बंद है और जिसे तुम आज तक ढूँढ नहीं पाए।"

मैंने चाबी देखी। और फिर — मैं झूठ नहीं कहूँगा — मेरे हाथ काँप गए।

क्योंकि मैंने वो ताला महसूस किया था। रात को सोते वक़्त। सुबह उठते वक़्त। जब मैं किसी पुरानी बात को याद करने की कोशिश करता हूँ और वो बात सिर्फ़ एहसास में आती है, ब्यौरे में नहीं। कुछ ऐसा है जो मेरे अंदर है पर मुझे नहीं दिखता। जैसे अंधेरे कमरे में कोई चीज़ हो, जिसे मैं छू नहीं सकता पर उसका होना जानता हूँ।

रणवीर ने मेरी आँखें देखीं और उसकी मुस्कान थोड़ी और बढ़ी।

"आज तुम्हारी दुकान मेरे नाम लिख दो," उसने कहा, धीरे से, सिर्फ़ मेरे सुनने लायक आवाज़ में, "और मैं यह चाबी तुम्हारे हाथ में रख दूँगा। तुम ताला खोल लेना। जो याद अंदर है, वो लौट आएगी। और तुम भी इंसान हो, मैं जानता हूँ कि तुम्हें वो याद चाहिए।"

उसने एक कदम पीछे हटकर अपनी हथेली में चाबी रखी और मेरी तरफ़ बढ़ा दी।

"सोच लो," उसने कहा। "मैं तुम्हारे साथ बुरा नहीं करना चाहता। तुम्हारी माँ बीमार हैं। तुम्हारे पापा की हालत देखो — काँप रहे हैं। तुम्हारी बहन को पढ़ाई के लिए पैसे चाहिए। और यह गली — यह गली मुझे दो, तुम अपनी याद ले लो। बदले में मैं इलाके को तरक़्क़ी दूँगा। सबको पक्के मकान। अस्पताल में नई मशीनें। तुम खुद चाहो तो मेरे यहाँ काम कर लेना — बड़ी तनख्वाह, साफ़ कुर्ता, बड़ी गाड़ी। यह क्या ज़िंदगी है — ग्रीस लगाकर, पहिया बदलकर, पानी में हाथ धोकर?"

मैं चुप रहा।

मुझे सुनने दो। गली को सुनने दो। मुझे हर बात सुननी है।

और तभी, पीछे से, एक आवाज़ आई।

"अंकुश!"

माँ दौड़कर आईं। उनकी आँखें भरी हुई थीं और साड़ी का पल्लू उनके हाथ में लिपटा था और वो मेरे पास आईं और मेरा हाथ पकड़ लिया।

"नहीं," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी थी, बस मेरे सुनने लायक। "नहीं बेटा। वो याद — वो तेरी है। पर वो दुकान से नहीं लौटेगी। तू यह मत कर। मैं जानती हूँ तू क्या खोया है। पर भगवान के लिए, यह मत कर।"

"माँ," मैंने कहा।

"मैंने तुझे पाला है," वो काँप रही थीं। "बाईस साल। मैंने तेरे पापा की चुप्पी सही है। मैंने यह सब सहा है। और आज तू मुझसे यह कह रहा है कि तू वो याद चाहता है जो ताले में है? वो याद मैं भी नहीं जानती क्या है। पर जो भी है — वो तेरी है। और वो तुझे वापस मिलेगी। बदले में नहीं। बेचकर नहीं। मेरा दूध पीकर तू बड़ा हुआ है — तू इसे किसी कीमत पर नहीं बेचेगा।"

मेरी आँखें भर आईं।

और मैंने पापा को देखा। वो दूर खड़े थे, पर उनका हाथ — जो रिंच पकड़े था — काँप रहा था। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में जो था वो माँ की आँखों से अलग था। वो डर नहीं था। वो एक ऐसा दर्द था जो कह रहा था — बेटा, अगर तू मेरी वजह से यह कर रहा है, तो मत कर। मैं बर्दाश्त कर लूँगा।

पापा ने कुछ कहा — दो शब्द, और मुझे पता नहीं कैसे सुनाई दिया, पर सुनाई दिया।

"मत कर।"

और तभी, मीरा आगे आई।

उसके हाथ में कैमरा था, और वो उस वक़्त शुरू कर रही थी। मैंने उसे तीन कदम बढ़ते देखा — कंधे तक कटे बाल, थका हुआ चेहरा, फटा बैग, और आँखों में वो ज़िद जो पाँच साल से चली आ रही थी।

"रणवीर जी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में जो था वो शांति नहीं थी — वो एक लंबे इंतज़ार के बाद आने वाली सफ़ाई थी। "यह कैमरा चालू है। और यह सीधा प्रसारण जा रहा है।"

रणवीर ने उसकी तरफ़ देखा, और उसके चेहरे पर वो भाव आया जो अब तक नहीं था — एक पल का ठहराव।

"तो?"

"तो," मीरा ने कहा, "यह चाबी जो आप हवा में घुमा रहे हैं — इसे हमारे सामने रखिए। और यह जो काग़ज़ आप अंकुश से हस्ताक्षर करवाना चाहते हैं — यह भी हमें दिखाइए। ताकि गली जान सके कि आपने किस कीमत पर यह सब बेचा है।"

गली में हलचल हुई। शबनम आपा एक कदम आगे आईं। उनके पीछे उस्ताद आए। फिर भोला भाई आगे आए। फिर किशनलाल काका, नसीमा बाई, दुबे अंकल।

पूरी गली एक-एक कदम आगे आ रही थी। धीरे-धीरे।

जैसे किसी कोशिश में, कोई रस्सी खींच रहा हो और सब उसे पकड़ रहे हों।

रणवीर ने गली को देखा। उसकी मुस्कान अब भी थी, पर वो मुस्कान पतली हो गई थी, जैसे कोई चीज़ अंदर से चटक गई हो।

"अच्छा," उसने कहा। "तो अब यह तमाशा है।" उसने हाथ उठाया और मीरा के कैमरे की तरफ़ इशारा किया।

"मीरा जी," उसने कहा, और अब उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो कभी शहद जैसी लगती है और कभी ज़हर जैसी। "आपने अपने चैनल पर पाँच साल पहले एक खबर चलाई थी। रमा मैडम के बारे में। मुझे याद है। आप उस वक़्त मेरे दफ़्तर में आई थीं। और मैंने आपको कुछ काग़ज़ दिखाए थे। और आपने उन काग़ज़ों को सच मान लिया था। और उसके बाद — आपने कभी मेरे पास आकर पूछा नहीं कि मैंने वो काग़ज़ क्यों दिए थे।"

मीरा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

मैंने उसे देखा। उसका हाथ कैमरे पर काँपा, पर वो रुका नहीं।

"हाँ," उसने कहा, धीरे से। "मैंने पूछा नहीं। यह मेरी ग़लती थी। और यह ग़लती मैं आज पूरी गली के सामने कबूल कर रही हूँ। पर आज जो सवाल है, वो मेरी ग़लती का नहीं है। आज सवाल यह है कि यह चाबी किस ताले की है, और आप इस काग़ज़ पर हस्ताक्षर क्यों चाहते हैं।"

गली में एक शांत, लंबी सन्नाटा छा गई।

और तभी उस्ताद अली बक़्श आगे आए।

उनकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़।

"रणवीर बेटा," उन्होंने कहा, और उनका हाथ अपनी लाठी पर टिका हुआ था, "मैं तुम्हें तब से जानता हूँ जब तुम इस गली में पहली बार आए थे। तुम्हारे बाप खलील भारद्वाज भी साइकिल ठीक करते थे। यह गली उनकी थी। तुम्हारा बचपन यहीं का है। तुम्हारी पहली साइकिल यहीं ठीक हुई थी — मेरी दुकान से चार कदम दूर, शंकर यादव के हाथ से। तो यह मुझे बताओ — तुम आज जो कर रहे हो, वो अपने बाप की गली के साथ कर रहे हो। तुम्हारे बाप को क्या जवाब दोगे?"

रणवीर उसकी तरफ़ मुड़ा। और उसकी आँखों में पहली बार कुछ और था — नाराज़गी नहीं, थकान।

"उस्ताद," उसने कहा। "मेरे बाप ने यह गली छोड़ी थी। मैंने नहीं छोड़ी। मैंने यहाँ बड़ी इमारतें खड़ी कीं। मैंने सड़कें बनवाईं। मैंने स्कूल बनवाए। मेरे बाप ने सिर्फ़ साइकिल ठीक की थी। गली को आगे बढ़ाना मेरा काम है।"

"आगे बढ़ाना?" उस्ताद ने धीरे से दोहराया। "या अपने बाप की जगह लेना?"

रणवीर के चेहरे पर पहली बार कुछ टूटा। एक पल के लिए। बस एक पल।

फिर उसने मुस्कान वापस लगाई और सीधा मेरी तरफ़ आया, और मेरे सामने खड़ा होकर चाबी मेरी तरफ़ बढ़ा दी।

"पाँच बजे तक का वक़्त," उसने कहा। "धोखा नहीं। बस जवाब — हाँ या ना। हाँ कहो तो चाबी तुम्हारी। ना कहो तो यह चाबी आज से उस ताले में हमेशा के लिए घूम जाएगी।"

उसने चाबी हवा में घुमाई। और मैंने उसे देखा — वो लोहे की चाबी — मेरे हाथ में आने के बस इतनी दूर।

मैंने अपनी आँखें बंद कीं।

और मन में वो सब आया जो रात को आया था। माँ का डिब्बा। सात सौ इकहत्तर रुपये। माँ की चिट्ठी — "पैसा सब कुछ नहीं होता।" टिंकू का कार्डबोर्ड माइक, जिस पर उसने लिखा था — "जोड़ स्कूल"।

जोड़ स्कूल।

जोड़।

मैंने अपनी आँखें खोलीं।

"रणवीर," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अब बिल्कुल शांत थी। "मुझे वो याद चाहिए। सच में चाहिए। पर मैं तुमसे नहीं लूँगा।"

उसकी आँखें सिकुड़ीं।

"क्योंकि यह याद," मैंने कहा, और अपने सीने पर हाथ रखा, "यह जो याद है न, यह कभी किसी दुकान से नहीं लौटेगी। यह जो खोई है, यह किसी ताले में नहीं है। यह मेरे रिश्तों में है। और रिश्ते ताले से नहीं खुलते — सच बोलने से खुलते हैं।"

मैंने रुककर उसकी आँखों में देखा।

"मैं बोर्ड को हाथ नहीं लगाऊँगा। यह तुम्हारा है। पर मैं चाबी भी नहीं लूँगा। क्योंकि जो याद मैं खुद जीतकर लौटाऊँगा, वो मेरी होगी। और जो चाबी से लौटेगी… वो तुम्हारी होगी। तुम्हारी जेब में बंद। हमेशा।"

गली में सन्नाटा छा गया।

माँ की आवाज़ आई, हल्की सी। "अंकुश…"

मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। क्योंकि अगर देखा, तो कहीं ना कहीं हिल जाऊँगा, और अभी हिलने का वक़्त नहीं था।

रणवीर ने चाबी को देखा। फिर मुझे देखा। फिर गली को। उसकी मुस्कान अब भी थी, पर उसके पीछे कुछ और था — कुछ ऐसा जो पहले कभी नहीं था।

"अच्छा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ थोड़ी धीमी थी। "तो तुम सोचते हो कि तुम अपनी याद वापस पा सकते हो। बिना मेरे? बिना इस चाबी के?"

"मुझे नहीं पता," मैंने सच कहा। "पर मैं यह जानता हूँ कि तुम्हारे ताले से मुझे याद नहीं मिलेगी — बस तुम्हारा एहसान मिलेगा। और मुझे तुम्हारा एहसान नहीं चाहिए।"

रणवीर ने चाबी जेब में डाली। फिर उसने अपना हाथ बढ़ाकर नए बोर्ड पर हल्की सी थपकी दी — जैसे कोई अपने नए फ़र्नीचर को सहलाता हो।

"ठीक है," उसने कहा, और अब उसकी आवाज़ में मिठास नहीं थी। सिर्फ़ एक ठंडी सी शांति थी। "पर एक बात याद रखो। आज शाम पाँच बजे तक अगर हमारा काम नहीं हुआ, तो कल सुबह सात बजे मशीन आएगी। और अगली बार जब मैं वापस आऊँगा, तो यह गली, यह दुकान, यह बोर्ड — सब कुछ काग़ज़ों में मेरा होगा। और तुम्हारी याद — वो ताले में हमेशा के लिए बंद रहेगी।"

वो मुड़ा।

और फिर, जाते वक़्त, उसने पीछे मुड़कर कहा — और यह बात उसने पूरी गली से कही, मुझसे नहीं।

"आप सब सुन लीजिए। मैंने यह गली खरीदी नहीं थी। मैंने इस गली को बनाया है। और आज से यह गली मेरी है। जो मेरे साथ है, उसका साथ है। और जो मेरे खिलाफ़ है… वो अपने को सँभाल ले।"

वो चला गया। उसके पीछे उसके आदमी चले।

गली में लोग खड़े रहे, साँस नहीं ले रहे थे, जैसे कोई तूफ़ान गुज़र गया हो और उन्हें पता नहीं कि तूफ़ान लौटेगा या नहीं।

मैंने घंटी जेब से निकाली। वो अब भी ठंडी थी।

और मैंने मन में सोचा — रणवीर ने कहा, आज शाम पाँच बजे। और वो यह भूल गया… कि पाँच बजे से पहले हमें दस बजे दफ़्तार भी जाना है।

और दस बजे से पहले सात बजे वाली मशीन भी रोकनी है।

तीन जंग, एक दिन।

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।

"उस्ताद," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो डर वापस आ गया था जो कल रात गया था।

"डर मत," मैंने कहा, और उसके सिर पर हाथ रखा। "याद रख — बोर्ड बदला, दुकान नहीं। दुकान वो है जहाँ हम औज़ार टाँगते हैं। और आज हमें अपने औज़ार टाँगने हैं।"

मैंने बोर्ड की तरफ़ आख़िरी बार देखा।

सागौन की लकड़ी। अच्छी लकड़ी। पर लकड़ी में दरारें पड़ती हैं। और मैं उन दरारों को जोड़ना जानता हूँ — तोड़ना नहीं।

क्योंकि मैं साइकिल मरम्मत करने वाला हूँ।

और साइकिल कभी एक बार में ठीक नहीं होती।

एक-एक पहिया। एक-एक पेंच।

आज पहला पहिया।

आज माँ का डिब्बा, पापा की रिंच, मीरा का कैमरा, उस्ताद की सुई, टिंकू का माइक, भोला की दवा, और इस गली का हर चेहरा — सब एक साथ।

और मशीन सात बजे आएगी।

पर आज सात बजे से पहले, एक बात होगी, जो रणवीर नहीं जानता।

क्योंकि रणवीर ने सिर्फ़ बोर्ड बदला है।

गली नहीं।

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